शुक्रवार, 13 जनवरी 2012

'अर्श' छूयेंगे या गिरेंगे 'फर्श' पर वाका में ?... Mind Games, 'Sea of Green' & 'Fast and Furious' WACA pitch !!!

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तेज व उछाल भरी वाका की पिच

सिडनी में जो कुछ हुआ वह सभी ने देखा ही...यह रहा स्कोर कार्ड ... बहुत बरस पहले 'सनी' सुनील गावस्कर की कही एक बात याद आती है वह यह कि टेस्ट मैच कुल तीस-तीस ओवर के पंद्रह सेशन का खेल होता है... और टेस्ट में पहले बल्लेबाजी करने वाली टीम अगर कम से कम चार सेशन क्रीज पर नहीं बिताती तो उसके लिये अनुकूल परिणाम निकालना काफी मुश्किल हो जाता है... और टॉस जीत पहले बल्लेबाजी करती हुई हमारी टीम पूरे साठ ओवर भी नहीं खेल पायी... यह ठीक है कि पहले दिन आसमान पर बादल छाये थे पर पिच में ऐसी कोई बात नहीं थी जो बल्लेबाजों को वहाँ रूक खेलने में दिक्कत होती... पर किसी ने भी विकेट पर रूकने का जज्बा नहीं दिखाया और अंत में धोनी बिना साझीदार नॉट-आउट एक छोर पर खड़े रह गये... भारत ने भी आस्ट्रेलिया के शुरूआती तीन विकेट बहुत ही सस्ते (३७ रन पर) निकाल दिये... पर फिर क्रीज पर साझेदारी जमी पोंटिंग व क्लार्क के बीच... पोंटिंग काफी समय से बड़ा स्कोर (शतक) न कर पाने के कारण टीम में अपनी जगह को लेकर दबाव का सामना कर रहे थे और अच्छा करने को कृतसंकल्प भी... नतीजा निकला २८८ रन की साझेदारी के रूप में... पोंटिंग के बाद आये हसी भी टीम में अपनी जगह बचाये रखने को लेकर दबाव में थे और उन्होंने तो ३३४ की नाबाद साझेदारी ही कर दी... कुल मिलाकर एक विकेट की कीमत पर आस्ट्रेलिया ने ६२२ रन कूट डाले और वह भी चार रन प्रति ओवर से बेहतर औसत से... किसी भी गेंदबाजी आक्रमण के लिये इस पिटाई के मनोवैज्ञानिक जख्मों से उबरना एक बहुत बड़ी चुनौती है... दूसरी पारी में चार सौ रन बना भारतीय बैटिंग ने इस हार को शर्मनाक होने से बचा कुछ इज्जत कमाई... भारत ने तीन चार दिन तक खेल से पूरी तरह ध्यान हटा इस पिटाई व हार भूलने का प्रयत्न भी किया ही है... अब हमारा गेंदबाजी आक्रमण सिडनी की इस पिटाई-कुटाई से जल्दी उबर अपना आत्मविश्वास वापस पा पाता है या नही इसी पर पर्थ का नतीजा निर्भर करेगा...

वाका पिच के क्यूतेटर कैमरॉन सदरलैन्ड

अब तीसरा टेस्ट है पर्थ में जहाँ वाका खेल मैदान की पिच दुनिया की सबसे तेज व उछाल भरी क्रिकेट पिचों में शुमार है... क्यूरेटर कैमरॉन सदरलैन्ड ने वाका की प्रसिद्धि के अनुरूप ही एक बहुत तेजी व उछाल भरी पिच देने का वादा भी किया है... क्रिकेट ही नहीं आस्ट्रेलियाई सभी खेल जबरदस्त प्रतिद्वंदिता से खेलते हैं और जीतने के लिये हर हथियार का इस्तेमाल करते है... माइन्ड गेम्स भी इसी में आते हैं... योजनाबद्ध तरीके से आस्ट्रेलियाई खिलाड़ी, पूर्व खिलाड़ी, कमेंटेटर, मीडिया यहाँ तक कि उनके क्यूरेटर भी किसी बड़े मैच या सीरिज से पहले इस तरह की बयानबाजी करते है जिससे विरोधी टीम के खिलाड़ी घोर मानसिक दबाव में आ जायें... इसे वे विरोधी पक्ष का 'मेंटल डिस्इंटीग्रेशन' या मानसिक विखंडन करना कहते हैं... यही खेल उन्होंने पर्थ से पहले शुरू कर ही दिया है... पहले मीडिया बखान करता है कि पिच 'हरे समंदर' सी दिख रही है... फिर क्यूरेटर कहता है कि पिच पहले की वाका पिचों से कम से कम २० प्रतिशत ज्यादा तेज व उछाल भरी होगी... भारतीय टीम के भ्रम को और बढ़ाने के लिये वह यह साथ में और जोड़ देता है कि पिच में गर्मी के कारण दरारें भी पड़ सकती हैं... आस्ट्रेलिया का मीडिया कह रहा है कि भारतीय टीम धोनी व सहवाग दो गुटों में बंट गई है... भारतीय खिलाड़ियों के टेम्परामेंट के बारे में भी तरह तरह की बातें की जा रही हैं... आस्ट्रेलियाई मीडिया द्वारा पूरी सीरिज को सचिन के महाशतक पर केन्द्रित करने की कोशिश भी की जा रही है... यह सब एक चतुर रणनीति है... पर्थ में बॉल बल्ले पर उछाल व तेजी के साथ आयेगी... अगर छोटी बदन पर आती गेंदों पर डक किया गया या किसी भी तरह से बल्ले से उनको नहीं खेला गया तो भारतीय बल्लेबाज अच्छा प्रदर्शन कर सकते हैं... ऐसे में सहवाग काफी खतरनाक हो सकते हैं इसीलिये आस्ट्रेलियाई मीडिया उनको लक्ष्य कर रहा है... यह सब बयानबाजी इसलिये भी है कि भारतीय बल्लेबाज मन ही मन तेजी व उछाल के किस्से व पिच की घास के बारे में सोच दबाव में आयें व भारतीय गेंदबाजी आक्रमण अति उत्साहित हो जाये...

बहरहाल पर्थ ऐसी जगह है जहाँ दोनों कप्तान टॉस जीतने के बजाय हारना ज्यादा पसंद करेंगे जिससे पहले बल्लेबाजी या गेंदबाजी करने का जटिल फैसला दूसरे को ही करना पड़े... फिर भी मैं धोनी के टॉस जीतने पर उन्हें पहले बल्लेबाजी करते ही देखना चाहूँगा... पहले गेंदबाजी करना कम से कम पर्थ पर नकारात्मक सोच की ही चुगली करेगा... तेज व उछाल लेती गेंदें क्योंकि स्टंप से काफी ऊपर जा रही होती हैं इसलिये यदि उनको किसी तरह बल्ला ऑफर न किया जाये तो वे आपका विकेट नहीं ले सकती... बल्ला ऑफर न करने के तरीके हैं डक करना, गेंद की लाईन से हट जाना या गेंद को शरीर पर झेलना... अगर भारतीय बल्लेबाजों ने गेंद को शरीर पर झेलने का साहस दिखाया तो कोई कारण नहीं कि टीम अच्छा स्कोर न कर पाये... सचिन-राहुल-लक्ष्मण की त्रिमूर्ति के लिये अपनी चमक आस्ट्रेलियाई जमीन पर बिखेरने का शायद यह आखिरी मौका है... भारतीय टेल यानी पुछल्ले बल्लेबाजों को भी कम से कम तीस चालीस ओवर पिच पर टिकने का माद्दा दिखाना होगा... रही बात गेंदबाजों की तो सिडनी की पिटाई के बाद सिर उठा कर बॉलिंग करने के लिये भी उनको काफी बड़ा दिल दिखाना होगा... पिच से तेजी व उछाल मिलने पर अक्सर भारतीय गेंदबाज ज्यादा जोश में आ एक साथ बहुत सारे लाइन लेंग्थ के वेरियेशन ट्राई करने लगते हैं जबकि ऐसी पिच पर जरूरत होती है अपने लिये सजाये फील्ड के अनुसार एक ही लाइन व लेंग्थ पर गेंद डालने की... बाकी काम पिच व रन न निकल पाने के कारण बल्लेबाज की व्यग्रता कर डालती है... जहीर अपने बयानों से काफी आत्मविश्वास भरे नजर आ रहे हैं यदि उन्होंने गेंदबाजी 'स्पीयरहेड' तथा नये लड़कों के गाइड का अपना रोल जिम्मेदारी से निभाया तो यह आस्ट्रेलियाई बल्लेबाजी भी तेज उछाल भरी वाका पिच पर दबाव में आ सकती है...

अंत में अपना अंदाजा आपको बताऊँ तो मुझे लगता है कि पर्थ में हमारी टीम २००८ की तरह कुछ खास करेगी व धारा के विपरीत जा हम यह मैच जीत सकते हैं... पर यदि यह संभव नहीं हुआ तो कम से कम मैं तो एडीलेड टेस्ट नहीं ही देखूंगा टीवी पर... यह अपने आपको दी गयी मेरी सजा होगी बिना बात की आशावादिता के लिये...

और हाँ अगर पर्थ में भी हम हारते हैं तो मैं सचिन-राहुल-लक्ष्मण की त्रिमूर्ति के लिये कोई जगह अगली टेस्ट सीरिज में नहीं खाली पाता भारतीय टीम में... अगर हारना ही है तो नये खिलाड़ियों के साथ हारना बेहतर है बनिस्बत अपने कैरियर के अंत की ओर बढ़ रहे सितारों के साथ... कम से कम नये खिलाड़ी कुछ अनुभव तो अर्जित करेंगे ही, भविष्य की एक विजेता टीम का हिस्सा बनने के लिये...





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4 टिप्‍पणियां:

  1. लक्षण तो फर्श से भी नीचे वाली जगह के हैं !

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  2. खिलाड़ी क्या हमेशा जीतते ही रहेंगे भाई! :)
    क्रिकेट को बहुत ज्यादा भाव देता है अपना मीडिया। हर छींक खबर बनती है। एक शतक सालों गाया जाता है। खिलाड़ी वीआईपी बन जाते हैं। अब वीआईपी होने के बाद खेलना थोड़ा मुश्किल का काम होता है न!

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