बुधवार, 18 जनवरी 2012

हमारे संविधान निर्माताओं द्वारा प्रस्तावित एक उच्च लोकतांत्रिक आदर्श व लक्ष्य है 'धर्मनिरपेक्षता'... छोटे दिल, मोटी अकल व खोटी सोच रखने वालों की समझ से परे है यह...

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एक हमला अक्सर किया जाता है धर्म, संप्रदाय, पंथ, जाति या समुदाय विशेष की भावनाओं से खेल अपनी रोटियाँ सेंकने/रोटियाँ सेंकने की तमन्ना रखने वाले तत्वों के द्वारा 'धर्मनिरपेक्षता' के ऊपर... वे 'धर्मनिरपेक्ष' को एक गाली समान बना पेश करते हैं...  एक नया शब्द भी इन तत्वों द्वारा गढ़ा गया है और वह है 'छद्म-धर्म निरपेक्षता'... इसका भी जब तब इनके द्वारा गाली समान प्रयोग किया जाता है...

आइये देखते हैं कि  'धर्मनिरपेक्षता' वाकई में है क्या...

कैम्ब्रिज शब्दकोश के अनुसार 'Secularism' का अर्थ है :-

the belief that religion should not be involved with the ordinary social and political activities of a country.


'द फ्री डिक्शनरी' भी निम्न अर्थ बताती है :-  (अलग अलग स्रोतों से लिये गये)


1. Religious skepticism or indifference.
2. The view that religious considerations should be excluded from civil affairs or public education.

American Heritage® Dictionary of the English Language, Fourth Edition



1. (Philosophy) Philosophy a doctrine that rejects religion, esp in ethics
2. the attitude that religion should have no place in civil affairs
3. the state of being secular

Collins English Dictionary – Complete and Unabridged




1. a view that religion and religious considerations should be ignored or excluded from social and political matters.

2. an ethical system asserting that moral judgments should be made without reference to religious doctrine, as reward or punishment in an afterlife.

-Ologies & -Isms. Copyright 2008 The Gale Group, Inc.



यहाँ पर स्पष्ट है कि Secularism या 'धर्मनिरपेक्षता' का अर्थ कहीं से भी 'सर्व धर्म समभाव' नहीं है... एक सैंवैधानिक सिद्धान्त के रूप में 'धर्मनिरपेक्षता' के तहत प्रस्तावित ध्येय-आदर्श का पालन करने के लिये दो जरूरी शर्तें हैं...

पहली, समाज के विभिन्न वर्गों, मतों, पंथों , धर्मों व विश्वासों को मानने वाले  हमारे संविधान, हमारे कानून व हमारी सरकार की नीतियों के तहत एकदम बराबरी का दर्जा रखते हैं...

दूसरी, धर्म और राजनीति, धर्म व सार्वजनिक नीतियों का कोई घालमेल नहीं होना चाहिये यानी राजनीति व सरकारी नीतियों में धर्म का कोई दखल न हो, धार्मिक भावनाओं को भड़का कर वोट न माँगें जायें, धर्म के आधार पर नीतियाँ न बनें...

उदाहरणों से समझाया जाये तो...

* किसी शहर की सिविल लाइन की सड़क के रखरखाव के जिम्मेदार अधिकारी के लिये 'धर्मनिरपेक्षता' बनाये रखने का उसका फर्ज यह माँग करता है कि सड़क केवल और केवल वाहनों व पैदल पथिकों के लिये रहे... न कि 'सर्व धर्म समभाव' के नाम पर उस सड़क के बीचों बीच  मंदिर,  मजार आदि आदि उग जायें...

* किसी कस्बे के प्रशासन के मुखिया के लिये 'धर्मनिरपेक्षता' का  उसका यह कर्तव्य उससे यह आस रखता है कि उस कस्बे की मुख्य सड़क हमेशा आवागमन के लिये खुली रहे... न कि 'सर्व धर्म समभाव' के नाम पर कभी वह जागरण के लिये बंद कर दी जाये, कभी धार्मिक कव्वालियों के लिये, कभी लंगर के लिये और कभी कीर्तन-दरबार के लिये...

* दंगों के दौरान व्यवस्था बनाने कि जिम्मेदारी संभाले जवान/ सैनिक को यह आदेश मिलता है कि वह दंगाइयों को देखते ही गोली मार दे तो ट्रिगर पर उसकी उंगली सामने दिख रहे शख्स की नीयत व हरकत के आधार पर दबे न कि उसके पहने कपड़े,उसके हुलिये या उसके लगाये नारे व संबोधन के आधार पर...

* अधिकारी व सत्तासीन नेता से 'धर्मनिरपेक्षता' का तकाजा है कि वह अपने धार्मिक विश्वास को अपने घर की चहारदीवारी व अपने मन के अंदर ही सीमित रखे, धार्मिक आयोजनों में केवल और केवल अपनी निजी हैसियत से शामिल हो... न कि 'सर्व धर्म समभाव' की परंपरा निभाने के लिये सरकारी हैसियत से कीर्तन में भी जाये, होली मिलन में भी, इफ्तार में भी, कव्वाली में भी और उर्स में भी...


तो हमारे संविधान निर्माताओं द्वारा प्रस्तावित एक उच्च लोकतांत्रिक आदर्श व लक्ष्य है 'धर्मनिरपेक्षता'...


जिसे निभाने के लिये सबसे जरूरी चीज है अपने संवैधानिक कर्तव्य को दुनिया की हर चीज से बढ़कर मानना..


और शायद इसीलिये छोटे दिल, मोटी अकल व खोटी सोच रखने वालों की समझ से परे की चीज है यह...


इसीलिये आपको अक्सर 'धर्मनिरपेक्षता' को पानी पी पी कोसते लोग मिलेंगे...


यह वह शब्द है जो उन्हें हर पल, हर दम उनकी क्षुद्रता, तुच्छता व संविधान की आत्मा का गला घोंटने के उनके द्वारा किये गये पाप का अहसास जो कराता है !








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11 टिप्‍पणियां:

  1. छोटे दिल , मोटी अक्ल , खोटी सोच :)

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  2. " छोटे दिल, मोटी अकल व खोटी सोच रखने वालों की समझ से परे की चीज है यह..."

    पूरे लेख का सार है जी !

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  3. अर्थपूर्ण हैं, अर्थ निकाले जाते जो भी,
    नीलामी, बोली तक लाये आत्मा को भी,

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  4. तो मतलब छद्म धर्मनिरपेक्ष जैसा कुछ होता ही नहीं?
    यानी जो खुदको धर्मनिरपेक्ष बता रहा हैं उसे मान लिया जाए कि वो धर्मनिर्पेक्ष ही हैं भले ही वह व्यवहार में एक बैलेंस बना कर न रखें.
    मुझे याद हैं एक बार फिल्म समीक्षक जयप्रकाश चौकसे ने मनोज कुमार निर्देशित फिल्मों को 'छद्म देशभक्ति' से ओत प्रोत फिल्में कहा था.क्यों कहा था आप भी समझते होंगे.कोई क्या विचार व्यक्त कर रहा हैं ये उतना महत्तवपूर्ण नहीं हैं जितना ये कि इसके पीछे उसका उद्देश्य क्या हैं.या कहीं सिर्फ दिखावे के लिए तो ऐसा नहीं कर रहा हैं.

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  5. नफरत फैलाने वाली सांप्रदायिक ताकते हमेशा चाहती हैं कि नफरत फैले, भला उन्हें यह कैसे मंज़ूर हो कि सद्भाव बढे. सो सद्भाव बढाने वाले टार्गेट तो होंगे ही. इसलिए उनके चेले-चपाटे (जो कि हर जगह फैले हैं) अपने कुतर्कों से हमले करते हैं.

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  6. निभाने के लिये सबसे जरूरी चीज है अपने संवैधानिक कर्तव्य को दुनिया की हर चीज से बढ़कर मानना..

    yes i hv always said the same thing

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  7. ऑफ़कोर्स, निरपेक्षता एक उच्च सामाजिक और लोकतांत्रिक आदर्श व लक्ष्य है। प्रशासन को धर्मनिरपेक्ष होना ही चाहिये।

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  8. विचारोत्तेजक विमर्श ...धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है सभी धर्मों का सम्मान! ?

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  9. आज संविधान परिभाषित यथार्थ सेकुलर कोई नहीं है। राज्य के लिए सेकुलरता का अभिप्राय यह है कि राज्य अपने नागरिकों में धर्म के आधार पर विभेद नहीं करेगा। जनसाधारण की धार्मिक पहचान की अवहेलना करते हुए, जन को सर्व साधारण दृष्टि, निरपेक्ष दृष्टि से लेना ही यथार्थ सेकुलरता है। किन्तु आज यथार्थ सेकुलरता पर ईमानदारी से चलने वाला कोई सेकुलर नहीं है। जैसे धार्मिकता का मात्र दिखावा और धर्म की ओट में अधर्म करने वालों को हम पाखंडी मानते है।उसी तरह ये सेकुलर, यथार्थ सेक्युलरता के मात्र दिखावेबाज है, इसीलिए इन्हें छद्म सेक्युलर कहा जाता है। ये भी धर्मनिरपेक्षता की ओट में छुप कर, धूर्तता युक्त, पक्षपात कर मात्र अपना हित साधते है। अतः धर्म पाखंडियों की तरह ही ये धर्म-सेकुलर भी सेकुलरता में विकृति वाहक होने के कारण, वितृष्णा और गरियाने के पात्र बनते है।
    यह मूढ़ता है कि लोग व्यक्तिगत भी बढ़चढ़ कर सेक्युलर दिखाने में लगे है। वस्तुतः सेक्युलरिज्म राज्य व्यवस्था होती है। राजनैतिक प्रबंध-व्यवस्था ही सेक्युलरिज्म के नियमानुसार होती है।यह पूरी तरह एक शासन व्यवस्था होती है। व्यक्तिगत रूप से नागरिक अपना अपना धर्म पालन करने को स्वतन्त्र होता है और यह उसका संवैधानिक अधिकार भी। सज्जन नागरिक 'सर्व धर्म समभाव' की बड़ाई भी नहीं मारता। सज्जन व्यक्ति तो बस 'अन्य मतावलंबियों से सौहार्द भाव' रखता है उनसे द्वेष नहीं करता। वह अपने धर्म का धर्मानुयायी हो सकता है या फिर सौहार्दशाली नास्तिक, किन्तु सेक्युलर होना संभव ही नहीं हो सकता। अगर फिर भी कोई सेक्युलर होने का दिखावा करता है तो वह पाखंडी ही है।

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