रविवार, 22 जनवरी 2012

एक न्यायपूर्ण दुनिया के अस्तित्व में आने की राह में सबसे बड़ी बाधा हैं 'कर्मफल' व 'फैसले' की धार्मिक अवधारणायें !!!

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कई हजार साल का सभ्य इंसान का यह सफर और उतना ही पुरानी दास्तान सभ्यता की... फिर भी हैरान करने वाली बात यह है कि हमारी यह दुनिया कभी भी न्यायपूर्ण नहीं रही... इसमें मालिक रहे व गुलाम भी... शोषक रहे व शोषित भी... शासक  रहे व शासित भी.. सबके लिये न्याय के, सबको समानता के, हर किसी के लिये समान अवसरों के दावे तो हमेशा हुऐ, हो रहे हैं और होते ही रहेंगे... पर कहाँ क्या कमी हो जाती है कि यह सब संभव नहीं हो पाता... क्यों नहीं मानव जाति की सामूहिक चेतना जग कर इंकलाबी परिवर्तन लाती है निजाम में, सोचा है कभी...

क्यों लुटेरे-चोर-भ्रष्ट-माफिया-अपराधी-शोषक के खिलाफ नहीं खड़ा होता हुजूम... क्यों उसी के सताये उसी के घर-आफिस-मिल-फैक्ट्री-दुकान में उसी की सिर झुका कर नौकरी करने व उसका हुकुम बजाने में ही जिंदगी बिता ले जाते हैं... क्यों नहीं होती बगावत... क्यों रहती है बरकरार यथास्थिति... क्यों नहीं बहने पाती बयार बदलाव की, सोचा है कभी...


क्यों अपने ही हमनस्लों के हक को मारकर... अपने ही भाई-बहनों के हिस्से की खुशियों को छीनकर... अपने ही जैसे इंसानों की दुनिया को अंधेरा कर... उन्हें भूख-गरीबी-मजबूरी-जहालत की जिंदगी के लिये मजबूर कर... चोरी-फरेब से कमाये-बनाये अपने महलों में अपने बीबी बच्चों अपने परिवार के साथ ठहाके लगाते इतराते बेखौफ चैन की नींद सो पाता है कोई, सोचा है कभी...


पहला है कर्म व कर्मफल  की अवधारणा...


दबा-कुचला-शोषित अपने ही दुश्मन (शोषक) के हित साधने व उसकी ही चाकरी करने में यह सोच लगा रहता है कि 'प्रभु' तबका  आज यह जो मलाई उड़ा रहा है और उसे जो आज यह सूखी रोटी भी नसीब नहीं यह पूर्व के करमों का फल है दोनों के लिये... बिना किसी बदलाव की चाह या जरूरत महसूस किये वह बिता देता है जिंदगी... इस उम्मीद के साथ कि इस जनम के दुख-मुफलिसी को चुपचाप-बिना विरोध झेलने के कर्म के बदले में अगले जनम वह भी 'प्रभु' वर्ग में जनमेगा...


और दूसरा कारण है 'फैसले' का विधान...


शोषक यह सोचता है कि किसी तरह ऊपर वाले को खुश रख ले... गुनाह रोज करे और उसके सामने हर रोज माफी भी मांगता चले... लूट के माल का कुछ हिस्सा ऊपर वाले के काम में लगा दे... तो फैसला यकीनन उसी के हक में आयेगा... शोषित इस दुनिया में ही सबको समय से उसके करमों के मुताबिक न्याय मिलने की व्यवस्था को सुनिश्चित करने की ओर रूचि नहीं दिखाता... झेलता रहता है जुल्मों को...इस उम्मीद के साथ कि आखिरी फैसला तो उसी के हक में आना है...


और इसी तरह मुलतवी होता रहता है... एक ऐसी दुनिया का वजूद में आना... जहाँ सभी को उनका इंसानी हक और इंसाफ मिलता हो...



अब अगर कोई कहता है कि :-



एक न्यायपूर्ण दुनिया के अस्तित्व में आने की राह में सबसे बड़ी बाधा हैं 'कर्मफल' व 'फैसले' की धार्मिक अवधारणायें !!!




तो क्या कुछ गलत कहा जा रहा है यहाँ पर ?










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बुधवार, 18 जनवरी 2012

हमारे संविधान निर्माताओं द्वारा प्रस्तावित एक उच्च लोकतांत्रिक आदर्श व लक्ष्य है 'धर्मनिरपेक्षता'... छोटे दिल, मोटी अकल व खोटी सोच रखने वालों की समझ से परे है यह...

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एक हमला अक्सर किया जाता है धर्म, संप्रदाय, पंथ, जाति या समुदाय विशेष की भावनाओं से खेल अपनी रोटियाँ सेंकने/रोटियाँ सेंकने की तमन्ना रखने वाले तत्वों के द्वारा 'धर्मनिरपेक्षता' के ऊपर... वे 'धर्मनिरपेक्ष' को एक गाली समान बना पेश करते हैं...  एक नया शब्द भी इन तत्वों द्वारा गढ़ा गया है और वह है 'छद्म-धर्म निरपेक्षता'... इसका भी जब तब इनके द्वारा गाली समान प्रयोग किया जाता है...

आइये देखते हैं कि  'धर्मनिरपेक्षता' वाकई में है क्या...

कैम्ब्रिज शब्दकोश के अनुसार 'Secularism' का अर्थ है :-

the belief that religion should not be involved with the ordinary social and political activities of a country.


'द फ्री डिक्शनरी' भी निम्न अर्थ बताती है :-  (अलग अलग स्रोतों से लिये गये)


1. Religious skepticism or indifference.
2. The view that religious considerations should be excluded from civil affairs or public education.

American Heritage® Dictionary of the English Language, Fourth Edition



1. (Philosophy) Philosophy a doctrine that rejects religion, esp in ethics
2. the attitude that religion should have no place in civil affairs
3. the state of being secular

Collins English Dictionary – Complete and Unabridged




1. a view that religion and religious considerations should be ignored or excluded from social and political matters.

2. an ethical system asserting that moral judgments should be made without reference to religious doctrine, as reward or punishment in an afterlife.

-Ologies & -Isms. Copyright 2008 The Gale Group, Inc.



यहाँ पर स्पष्ट है कि Secularism या 'धर्मनिरपेक्षता' का अर्थ कहीं से भी 'सर्व धर्म समभाव' नहीं है... एक सैंवैधानिक सिद्धान्त के रूप में 'धर्मनिरपेक्षता' के तहत प्रस्तावित ध्येय-आदर्श का पालन करने के लिये दो जरूरी शर्तें हैं...

पहली, समाज के विभिन्न वर्गों, मतों, पंथों , धर्मों व विश्वासों को मानने वाले  हमारे संविधान, हमारे कानून व हमारी सरकार की नीतियों के तहत एकदम बराबरी का दर्जा रखते हैं...

दूसरी, धर्म और राजनीति, धर्म व सार्वजनिक नीतियों का कोई घालमेल नहीं होना चाहिये यानी राजनीति व सरकारी नीतियों में धर्म का कोई दखल न हो, धार्मिक भावनाओं को भड़का कर वोट न माँगें जायें, धर्म के आधार पर नीतियाँ न बनें...

उदाहरणों से समझाया जाये तो...

* किसी शहर की सिविल लाइन की सड़क के रखरखाव के जिम्मेदार अधिकारी के लिये 'धर्मनिरपेक्षता' बनाये रखने का उसका फर्ज यह माँग करता है कि सड़क केवल और केवल वाहनों व पैदल पथिकों के लिये रहे... न कि 'सर्व धर्म समभाव' के नाम पर उस सड़क के बीचों बीच  मंदिर,  मजार आदि आदि उग जायें...

* किसी कस्बे के प्रशासन के मुखिया के लिये 'धर्मनिरपेक्षता' का  उसका यह कर्तव्य उससे यह आस रखता है कि उस कस्बे की मुख्य सड़क हमेशा आवागमन के लिये खुली रहे... न कि 'सर्व धर्म समभाव' के नाम पर कभी वह जागरण के लिये बंद कर दी जाये, कभी धार्मिक कव्वालियों के लिये, कभी लंगर के लिये और कभी कीर्तन-दरबार के लिये...

* दंगों के दौरान व्यवस्था बनाने कि जिम्मेदारी संभाले जवान/ सैनिक को यह आदेश मिलता है कि वह दंगाइयों को देखते ही गोली मार दे तो ट्रिगर पर उसकी उंगली सामने दिख रहे शख्स की नीयत व हरकत के आधार पर दबे न कि उसके पहने कपड़े,उसके हुलिये या उसके लगाये नारे व संबोधन के आधार पर...

* अधिकारी व सत्तासीन नेता से 'धर्मनिरपेक्षता' का तकाजा है कि वह अपने धार्मिक विश्वास को अपने घर की चहारदीवारी व अपने मन के अंदर ही सीमित रखे, धार्मिक आयोजनों में केवल और केवल अपनी निजी हैसियत से शामिल हो... न कि 'सर्व धर्म समभाव' की परंपरा निभाने के लिये सरकारी हैसियत से कीर्तन में भी जाये, होली मिलन में भी, इफ्तार में भी, कव्वाली में भी और उर्स में भी...


तो हमारे संविधान निर्माताओं द्वारा प्रस्तावित एक उच्च लोकतांत्रिक आदर्श व लक्ष्य है 'धर्मनिरपेक्षता'...


जिसे निभाने के लिये सबसे जरूरी चीज है अपने संवैधानिक कर्तव्य को दुनिया की हर चीज से बढ़कर मानना..


और शायद इसीलिये छोटे दिल, मोटी अकल व खोटी सोच रखने वालों की समझ से परे की चीज है यह...


इसीलिये आपको अक्सर 'धर्मनिरपेक्षता' को पानी पी पी कोसते लोग मिलेंगे...


यह वह शब्द है जो उन्हें हर पल, हर दम उनकी क्षुद्रता, तुच्छता व संविधान की आत्मा का गला घोंटने के उनके द्वारा किये गये पाप का अहसास जो कराता है !








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शुक्रवार, 13 जनवरी 2012

'अर्श' छूयेंगे या गिरेंगे 'फर्श' पर वाका में ?... Mind Games, 'Sea of Green' & 'Fast and Furious' WACA pitch !!!

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तेज व उछाल भरी वाका की पिच

सिडनी में जो कुछ हुआ वह सभी ने देखा ही...यह रहा स्कोर कार्ड ... बहुत बरस पहले 'सनी' सुनील गावस्कर की कही एक बात याद आती है वह यह कि टेस्ट मैच कुल तीस-तीस ओवर के पंद्रह सेशन का खेल होता है... और टेस्ट में पहले बल्लेबाजी करने वाली टीम अगर कम से कम चार सेशन क्रीज पर नहीं बिताती तो उसके लिये अनुकूल परिणाम निकालना काफी मुश्किल हो जाता है... और टॉस जीत पहले बल्लेबाजी करती हुई हमारी टीम पूरे साठ ओवर भी नहीं खेल पायी... यह ठीक है कि पहले दिन आसमान पर बादल छाये थे पर पिच में ऐसी कोई बात नहीं थी जो बल्लेबाजों को वहाँ रूक खेलने में दिक्कत होती... पर किसी ने भी विकेट पर रूकने का जज्बा नहीं दिखाया और अंत में धोनी बिना साझीदार नॉट-आउट एक छोर पर खड़े रह गये... भारत ने भी आस्ट्रेलिया के शुरूआती तीन विकेट बहुत ही सस्ते (३७ रन पर) निकाल दिये... पर फिर क्रीज पर साझेदारी जमी पोंटिंग व क्लार्क के बीच... पोंटिंग काफी समय से बड़ा स्कोर (शतक) न कर पाने के कारण टीम में अपनी जगह को लेकर दबाव का सामना कर रहे थे और अच्छा करने को कृतसंकल्प भी... नतीजा निकला २८८ रन की साझेदारी के रूप में... पोंटिंग के बाद आये हसी भी टीम में अपनी जगह बचाये रखने को लेकर दबाव में थे और उन्होंने तो ३३४ की नाबाद साझेदारी ही कर दी... कुल मिलाकर एक विकेट की कीमत पर आस्ट्रेलिया ने ६२२ रन कूट डाले और वह भी चार रन प्रति ओवर से बेहतर औसत से... किसी भी गेंदबाजी आक्रमण के लिये इस पिटाई के मनोवैज्ञानिक जख्मों से उबरना एक बहुत बड़ी चुनौती है... दूसरी पारी में चार सौ रन बना भारतीय बैटिंग ने इस हार को शर्मनाक होने से बचा कुछ इज्जत कमाई... भारत ने तीन चार दिन तक खेल से पूरी तरह ध्यान हटा इस पिटाई व हार भूलने का प्रयत्न भी किया ही है... अब हमारा गेंदबाजी आक्रमण सिडनी की इस पिटाई-कुटाई से जल्दी उबर अपना आत्मविश्वास वापस पा पाता है या नही इसी पर पर्थ का नतीजा निर्भर करेगा...

वाका पिच के क्यूतेटर कैमरॉन सदरलैन्ड

अब तीसरा टेस्ट है पर्थ में जहाँ वाका खेल मैदान की पिच दुनिया की सबसे तेज व उछाल भरी क्रिकेट पिचों में शुमार है... क्यूरेटर कैमरॉन सदरलैन्ड ने वाका की प्रसिद्धि के अनुरूप ही एक बहुत तेजी व उछाल भरी पिच देने का वादा भी किया है... क्रिकेट ही नहीं आस्ट्रेलियाई सभी खेल जबरदस्त प्रतिद्वंदिता से खेलते हैं और जीतने के लिये हर हथियार का इस्तेमाल करते है... माइन्ड गेम्स भी इसी में आते हैं... योजनाबद्ध तरीके से आस्ट्रेलियाई खिलाड़ी, पूर्व खिलाड़ी, कमेंटेटर, मीडिया यहाँ तक कि उनके क्यूरेटर भी किसी बड़े मैच या सीरिज से पहले इस तरह की बयानबाजी करते है जिससे विरोधी टीम के खिलाड़ी घोर मानसिक दबाव में आ जायें... इसे वे विरोधी पक्ष का 'मेंटल डिस्इंटीग्रेशन' या मानसिक विखंडन करना कहते हैं... यही खेल उन्होंने पर्थ से पहले शुरू कर ही दिया है... पहले मीडिया बखान करता है कि पिच 'हरे समंदर' सी दिख रही है... फिर क्यूरेटर कहता है कि पिच पहले की वाका पिचों से कम से कम २० प्रतिशत ज्यादा तेज व उछाल भरी होगी... भारतीय टीम के भ्रम को और बढ़ाने के लिये वह यह साथ में और जोड़ देता है कि पिच में गर्मी के कारण दरारें भी पड़ सकती हैं... आस्ट्रेलिया का मीडिया कह रहा है कि भारतीय टीम धोनी व सहवाग दो गुटों में बंट गई है... भारतीय खिलाड़ियों के टेम्परामेंट के बारे में भी तरह तरह की बातें की जा रही हैं... आस्ट्रेलियाई मीडिया द्वारा पूरी सीरिज को सचिन के महाशतक पर केन्द्रित करने की कोशिश भी की जा रही है... यह सब एक चतुर रणनीति है... पर्थ में बॉल बल्ले पर उछाल व तेजी के साथ आयेगी... अगर छोटी बदन पर आती गेंदों पर डक किया गया या किसी भी तरह से बल्ले से उनको नहीं खेला गया तो भारतीय बल्लेबाज अच्छा प्रदर्शन कर सकते हैं... ऐसे में सहवाग काफी खतरनाक हो सकते हैं इसीलिये आस्ट्रेलियाई मीडिया उनको लक्ष्य कर रहा है... यह सब बयानबाजी इसलिये भी है कि भारतीय बल्लेबाज मन ही मन तेजी व उछाल के किस्से व पिच की घास के बारे में सोच दबाव में आयें व भारतीय गेंदबाजी आक्रमण अति उत्साहित हो जाये...

बहरहाल पर्थ ऐसी जगह है जहाँ दोनों कप्तान टॉस जीतने के बजाय हारना ज्यादा पसंद करेंगे जिससे पहले बल्लेबाजी या गेंदबाजी करने का जटिल फैसला दूसरे को ही करना पड़े... फिर भी मैं धोनी के टॉस जीतने पर उन्हें पहले बल्लेबाजी करते ही देखना चाहूँगा... पहले गेंदबाजी करना कम से कम पर्थ पर नकारात्मक सोच की ही चुगली करेगा... तेज व उछाल लेती गेंदें क्योंकि स्टंप से काफी ऊपर जा रही होती हैं इसलिये यदि उनको किसी तरह बल्ला ऑफर न किया जाये तो वे आपका विकेट नहीं ले सकती... बल्ला ऑफर न करने के तरीके हैं डक करना, गेंद की लाईन से हट जाना या गेंद को शरीर पर झेलना... अगर भारतीय बल्लेबाजों ने गेंद को शरीर पर झेलने का साहस दिखाया तो कोई कारण नहीं कि टीम अच्छा स्कोर न कर पाये... सचिन-राहुल-लक्ष्मण की त्रिमूर्ति के लिये अपनी चमक आस्ट्रेलियाई जमीन पर बिखेरने का शायद यह आखिरी मौका है... भारतीय टेल यानी पुछल्ले बल्लेबाजों को भी कम से कम तीस चालीस ओवर पिच पर टिकने का माद्दा दिखाना होगा... रही बात गेंदबाजों की तो सिडनी की पिटाई के बाद सिर उठा कर बॉलिंग करने के लिये भी उनको काफी बड़ा दिल दिखाना होगा... पिच से तेजी व उछाल मिलने पर अक्सर भारतीय गेंदबाज ज्यादा जोश में आ एक साथ बहुत सारे लाइन लेंग्थ के वेरियेशन ट्राई करने लगते हैं जबकि ऐसी पिच पर जरूरत होती है अपने लिये सजाये फील्ड के अनुसार एक ही लाइन व लेंग्थ पर गेंद डालने की... बाकी काम पिच व रन न निकल पाने के कारण बल्लेबाज की व्यग्रता कर डालती है... जहीर अपने बयानों से काफी आत्मविश्वास भरे नजर आ रहे हैं यदि उन्होंने गेंदबाजी 'स्पीयरहेड' तथा नये लड़कों के गाइड का अपना रोल जिम्मेदारी से निभाया तो यह आस्ट्रेलियाई बल्लेबाजी भी तेज उछाल भरी वाका पिच पर दबाव में आ सकती है...

अंत में अपना अंदाजा आपको बताऊँ तो मुझे लगता है कि पर्थ में हमारी टीम २००८ की तरह कुछ खास करेगी व धारा के विपरीत जा हम यह मैच जीत सकते हैं... पर यदि यह संभव नहीं हुआ तो कम से कम मैं तो एडीलेड टेस्ट नहीं ही देखूंगा टीवी पर... यह अपने आपको दी गयी मेरी सजा होगी बिना बात की आशावादिता के लिये...

और हाँ अगर पर्थ में भी हम हारते हैं तो मैं सचिन-राहुल-लक्ष्मण की त्रिमूर्ति के लिये कोई जगह अगली टेस्ट सीरिज में नहीं खाली पाता भारतीय टीम में... अगर हारना ही है तो नये खिलाड़ियों के साथ हारना बेहतर है बनिस्बत अपने कैरियर के अंत की ओर बढ़ रहे सितारों के साथ... कम से कम नये खिलाड़ी कुछ अनुभव तो अर्जित करेंगे ही, भविष्य की एक विजेता टीम का हिस्सा बनने के लिये...





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रविवार, 1 जनवरी 2012

'पारस' पत्थर को खोजने के लिये 'फलित ज्योतिष शास्त्रियों' द्वारा निकाले शुभ मुहूर्त में 'कीमियागिरी' का एक शोध विभाग खोले भारत सरकार... आइये मिल कर यह माँग करी जाये...

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भारतीय मूल के ब्रिटिश वैज्ञानिक व नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ० 'वेंकी' वेंकटरमण रामाकृष्णन ने चेन्नई में भारतीय विद्माभवन में आयोजित द्वितिय के०वी० नरसिंहम स्मृति व्याख्यान में यह बयान देकर हलचल सी मचा दी है...

उन्होंने कहा...

"He termed astrology and alchemy fake disciplines that depended on the power of suggestion and said homeopathy was based on belief."

यानी 'फलित ज्योतिष शास्त्र' व 'कीमियागिरी' छद्म विज्ञान हैं तथा सलाह-सुझाव की ताकत पर आधारित हैं व होम्योपैथी लोगों के विश्वास पर आधारित है ।

उन्होंने यह भी कहा कि...

"Both can lead people away from taking more effective actions based on logic and contemplation." 

यानी 'फलित ज्योतिष शास्त्र' व होम्योपैथी दोनों ही लोगों को तर्क व अवलोकन पर आधारित अधिक प्रभावी फैसले लेने से विरत करते हैं...

आगे वे कहते हैं कि...

"A culture based on superstition will always do worse than that based on science,"

अंधविश्वास पर आधारित कोई भी संस्कृति हमेशा ही विज्ञान पर आधारित संस्कृति से पिछड़ी ही रहेगी !


पर इस सबसे हमें क्या...    

डॉ० वेंकटरमण रामाकृष्णन को हमारे देश की अति प्राचीन व महान संस्कृति के बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं है... वह केवल उसी के बारे में जानते हैं जो इंद्रियों से ग्राह्य है... जबकि यह सारे मामले हमारे व उनके ज्ञान व समझ से परे हैं...

इसलिये मैं आज ही भारत सरकार से माँग करता हूँ कि डॉ० वेंकटरमण रामाकृष्णन को मुँहतोड़ जवाब देने के लिये...

फलित ज्योतिष  को उसका प्राचीन गौरव फिर से लौटाने के लिये...
१- 'फलित ज्योतिष शास्त्र' को भारत का राष्ट्रीय विज्ञान घोषित किया जाये ।
२- भारत के हर विद्मार्थी को शब्दज्ञान होने के तुरंत बाद से ही फलित ज्योतिष का अध्ययन अनिवार्य हो।
३- भारत के हर विश्वविद्मालय में ज्योतिष विभाग हो।
४- प्रत्येक सरकारी व निजी संस्थान में फलित ज्योतिष शास्त्री का पद सृजित किया जाये...जन्मपत्री देख कर नयी भर्तियाँ हों तथा हर काम का समय शुभमुहूर्त देख कर ही तय किया जाये।

भारत को विश्व का सर्वाधिक अमीर देश बनाने के लिये...
१- कीमियागिरी का अखिल भारतीय संस्थान खोला जाये।
२- श्रेष्ठ भारतीय वैज्ञानिक वहाँ दिन रात पारस पत्थर बनाने के लिये या लोहे, जस्ते व ऐलुमिनियम जैसी सस्ती धातुओं को सोने में बदलने के लिये दिन रात रिसर्च करें... यह कला पहले हमें ज्ञात थी...
३- सफलता प्राप्त होते ही भारत के अंदर की हर लोहे की चीज, चाहे वह मैनहोल का ढक्कन ही क्यों न हो को सोने का बना दिया जाये ।
४- इस तरह भारत दुनिया का सबसे अमीर देश हो फिर से एक बार सोने की चिड़िया कहलाये।

होम्योपैथी जैसी परा-वैज्ञानिक पद्धति का लाभ जन-जन को देने के लिये...
१- होम्योपैथी हमारी राष्ट्रीय चिकित्सा पद्धति घोषित हो।
२- भारत के हर अस्पताल व क्लीनिक में होम्योपैथ की तैनाती हो।
३- प्रत्येक मरीज को अपनी किसी भी बीमारी के लिये सबसे पहले होम्योपैथ को दिखाना अनिवार्य हो... किसी भी दूसरी पद्धति की चिकित्सा तभी दी जाये जब होम्योपैथी से सफलता न मिले।
४- होम्योपैथी का प्रयोग पशु चिकित्सा में, फसल-सब्जी उगाने में व बागवानी में तो सफलतापूर्वक हो ही रहा है... अब इससे भी आगे जाकर रॉकेट फ्यूल में, आटोमोबाइल में, भवन-पुल-राजमार्ग निर्माण में, आदि आदि जीवन के हर क्षेत्र में होम्योपैथी का प्रयोग व इसके असर पर शोध की जाये ।




बताइयेगा जरूर कि क्या आप इन माँगों में मेरे साथ हैं कि नहीं ...








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