शनिवार, 29 दिसंबर 2012

जाओ लड़की... पर यह दुनिया इतनी बुरी नहीं...

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अपने छोटे से गाँव से
उम्मीद की पोटली बाँध
चली आयीं थी जब तुम
मुल्क की राजधानी में
पढ़ने और भविष्य बनाने
तुम आशावान थी, लड़की


जहाँ रहा करती थी तुम
वहाँ बहुत कम लड़कियाँ
दिखा पाती हैं हौसला
इस तरह बाहर जाने का
पर तुम फिर भी गयी
तुम हिम्मती थी, लड़की


उस काली रात तक
सब कुछ ठीक ही था
आकर रूकी वह बस
थी जा रही गंतव्य को
और तुम उसमें चढ़ गयी
तुम विश्वासी थी, लड़की


बस में वह छह दरिंदे
निकले थे जो मौज लेने
टूट पड़े जब तुम पर
जम कर प्रतिरोध किया
जान की परवाह न कर
तुम अदम्य थी, लड़की


घायल, क्षत-विक्षत हुई
हालत बहुत खराब थी
पर तुम ने हार नहीं मानी
रही जीने के लिये जूझती
उम्मीद का दामन छोड़े बिन
तुम बेहद बहादुर थी, लड़की


आज तुम हो चली गयी
शोकाकुल सबको छोड़ कर
है सर सभी का झुका हुआ
अपराधबोध पूरे देश को है
तेरा भरोसा था जो टूट गया
हमें माफ कर देना, लड़की


तुझ पर जो बर्बरता हुई
अपवाद था, नियम नहीं
माना कि लुच्चे हैं, दरिंदे भी
पर अपने इसी समाज में
बाप बेटे भाई हैं, प्रेमी-पति भी
जो तस्वीर बदलेंगे , लड़की


तंद्रा से झकझोर कर अब
सब को जगा गयी है तू
तेरे जाने का दुख तो है
पर है यह दॄढ़ निश्चय भी
आगे ऐसा नहीं होने देंगे
कर हम पर भरोसा, लड़की



आज तुम हो चली गयी
नाम तुम्हारा नहीं जानता
कुछ अगर कह सकता तुम्हें
तो बार बार यही कहता मैं
माना कि तुम हो छली गयी
पर दुनिया इतनी बुरी नहीं, लड़की







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सोमवार, 24 दिसंबर 2012

तमाम चिंताओं व आक्रोश के बावजूद क्या हम में अगला बलात्कार रोक पाने की सामर्थ्य है ?...

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देश की राजधानी दिल्ली में चलती बस में हुऐ बर्बर बलात्कार ने मानो पूरे देश को तंद्रा से झकझोर कर जगा सा दिया है... इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने व दोषियों को जल्द से जल्द व कड़ी से कड़ी सजा देने की माँग लिये आंदोलित है सारा देश... आज दिन भर टीवी पर देख रहा था कि किस तरह स्वत: स्फूर्त युवाओं का राजपथ, इंडिया गेट व जंतर मंतर पर एकत्र वह जमावड़ा शाम होते होते हटा दिया गया... हर बार की तरह ही कुछ उत्पाती तत्व इस जमावड़े में घुस आये या घुसा दिये गये... हिंसा हुई और पुलिस प्रशासन को मौका मिल गया अपने मन की करने का... आंदोलनरत युवाओं को भीड़ व एक परिवर्तनकामी जन-आंदोलन का फर्क समझना होगा... यदि इस आक्रोश को किसी अंजाम तक पहुंचाना है तो आंदोलन के कर्णधारों को इसको उत्पातियों-उन्मादियों से मुक्त रखने का साहस स्वयं दिखाना होगा, उत्पातियों-उन्मादियों को छाँट अलग करने की अपेक्षा यदि पुलिस-प्रशासन से की जायेगी तो हर बार वही होगा जो आज हुआ...

दिल्ली में उस दिन जो हुआ वह कुछ इस प्रकार था... छह दरिंदे बस में जॉय राइड पर निकले, पहले उन्होंने एक यात्री को लूट उसके कुछ हजार रूपये छीने फिर बलात्कार के शिकार की तलाश में पीड़िता और उसके मित्र को उठा लिया... यह इत्तफाक था कि उन्हें जबरदस्त प्रतिरोध का सामना करना पड़ा... वरना ज्यादातर मामलों में पीड़िता उन छह दरिंदों का कोई प्रतिरोध न कर पाती... यही नहीं लाज-शर्म व परिवार की इज्जत के चलते यह मामला कभी दुनिया पर जाहिर भी नहीं होता... बस वह पीड़िता अपना पूरा जीवन उस दुस्वप्न को भुलाने की कोशिश करते करते बिता देती...

पर क्या कोई इंसान बलात्कारी दरिंदा अचानक एक ही पल में बन जाता है... नहीं, ऐसा संभव नहीं है... एक समाज के तौर पर हम कई ऐसी गलतियाँ करते हैं जो इन दरिंदों को जन्म देती हैं...

१- हम अपनी लड़कियों पर तमाम तरह की पाबंदियाँ लगाते हैं... पहनावे की पाबंदी, समय की पाबंदी, बाहर निकलते समय किसी पुरूष के संरक्षण में जाने की पाबंदी आदि आदि... मतलब कहीं न कहीं हम एक धारणा को पुष्ट कर रहे होते हैं कि अपनी इज्जत बचाना लड़की की खुद या उसके परिवार की जिम्मेदारी है... एक समाज के तौर पर अपनी लड़कियों के लिये भी एक भयमुक्त व सुरक्षित वातावरण बनाने, जिसमें उसको अपनी मर्जी से रहने, पहनने व किसी भी समय अकेले कहीं भी निर्बाध जाने की स्वतंत्रता हो, बनाने के बारे में हमने आज तक कभी सोचा तक नहीं है... ऐसी किसी भी माँग पर हम संस्कृति के पल्लू में अपना चेहरा छिपा लेते हैं...

२- हम एक कायर समाज हो गये हैं जिसमें खुले आम बसों में हैवान महिलाओं, बच्चियों यहाँ तक कि बच्चों के साथ भी अनुचित यौन स्पर्श व कई बार अश्लील फब्तियाँ भी कसते हैं और कहीं कोई विरोध नहीं करता... रेलों में रोजाना सफर करने वालों के संगठित समूह भी कई बार महिलाओं के साथ छेड़छाड़ करते हैं पर अधिकाँश मामलों में लोग दूसरी ओर देखना बेहतर समझते हैं... यही नजारा बाजारों, चौराहों, कॉलेजों का है...

३- भाषा के मामले में हमारी सारी गालियाँ यौनिक हैं व अपने विरोधी की माँ, बहन, बेटी या पत्नी के शीलभंग का इशारा देती हैं... खुल्लम खुल्ला यह गालियाँ दी जाती हैं... और हम इनको सुन भी सहज बने रहते हैं... जबकि यही गालियाँ हममें से कुछ के अवचेतन में गहरा और दूरगामी असर डाल देती हैं... यौनिक गालियों को व्यवहार से खत्म करने की जरूरत है...

४- हमारे ही लड़के जब लड़कियों से दुर्व्यवहार करते हैं और इसकी शिकायत होती है तो लड़के का परिवार अपने पद-पैसे-रसूख का पूरा इस्तेमाल करता है... अपने 'सपूत' को बेदाग बचाने के लिये... यही 'सपूत' फिर यारी-दोस्ती में अपने कारनामों का बखान करते हैं... दिन ब दिन नये रोमांच की तलाश करते हैं और अपने ही जैसे कई अनुसरणकर्ता बनाने में कामयाब रहते हैं...

५- समाज में स्त्रियों का दोयम दर्जा आज भी कायम है... कन्या के विवाह पर सामाजिकता व समाज में मुँह दिखाने के नाम पर दहेज को लेकर लंबी चौड़ी सौदेबाजी व दहेज के लेन देन से यह दोयम दर्जा और पुष्ट होता है... हैरत की बात तो यह है कि प्रबुद्ध वर्ग भी दहेज माँगने व इसके लेन देन में कुछ भी गलत नहीं मानता... जबकि प्रत्यक्ष रूप से यह परंपरा स्त्री का दर्जा एक इंसान से घटा लेन-देन के सामान बराबर कर देती है... पर हमारे समाज की अन्य कई विडंबनाओं की तरह हम इस पर मौन साधे हैं...

६- आजादी के बाद से आज तक जितने भी साम्प्रदायिक दंगे कहीं भी हुऐ... दंगाई भले ही किसी भी धर्म के रहे हों... दो बातें सभी मामलों में समान रहीं... पहली कि दंगाइयों ने पहला निशाना बनाया महिलाओं की अस्मत को... और दूसरी कि एकाध अपवाद को छोड़ किसी दंगाई को सजा नहीं हुई... वे जीवन भर अपने समाज के नेता भी बने रहे और लुच्चों-बलात्कारियों के संरक्षक भी...

७- महिलाओं के यौन उत्पीड़न के अधिकाँश मामले अव्वल तो पुलिस के पास तक पहुंचते ही नहीं हैं और अगर पहुंचते भी हैं तो अधिकारियों का रवैया उनमें दोषी को सजा दिलवाने की बजाय स्त्री के परिवार को सामाजिक लोकलाज का भय दिखा रफा दफा कराने का होता है... और वे कामयाब रहते हैं...

८- बलात्कार के जो मामले अदालतों तक पहुंचते भी हैं... उनमें अपराधी जमानत पा जाते हैं... तारीख पर तारीखें लगती रहती हैं... पीड़िता को हर स्तर पर असहज करने वाली, धीमी, लंबी व पीड़ादायक कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है... और अंतत: उसका प्रतिरोध दम तोड़ देता है और बलात्कारी फिर से आजाद और तत्पर हो जाते हैं अगला शिकार दबोचने को...

आइये सोचते हैं कि क्या कुछ ऐसा किया जाये कि अब अगला बलात्कार न हो कहीं भी...

यौन अपराधों के प्रति जागरूकता - छोटे छोटे यौन अपराधों से शुरू कर अपराधी एक दिन बलात्कारी दरिंदे में तब्दील हो जाता है सिर्फ इसीलिये क्योंकि पहले कभी किसी ने उसके बहके कदम नहीं थामे... हमें अनुचित यौन स्पर्श, भाषा व यौन उत्पीड़न के बारे में सभी को जागरूक करना होगा... बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी को... और प्रोत्साहित भी करना होगा कि अपने इर्दगिर्द ऐसा कोई मामला देखते ही वह इसको रिपोर्ट करे...

पुलिस प्रशासन की अग्रसक्रियता - बलात्कारी कहीं बाहर के किसी दूसरे ग्रह से नहीं आता... वह हमारे समाज के बीच ही पैदा होता, पलता व पनपता भी है... बलात्कार करने से पहले भी वह अपने व्यवहार से अपने इस कृत्य की ओर बढ़ने के संकेत समाज को दे रहा होता है... जरूरत यह है कि हमारी पुलिस व प्रशासन निष्क्रिय हो ऐसी किसी वारदात के होने के बाद कारवाई करने के बजाय प्रो-एक्टिव हो ऐसे तत्वों को ढूंढें हमारी बस्तियों, गलियों, बाजारों व कॉलोनियों के पार्कों में भी... जरूरत पड़ने पर उन्हें चुग्गा डाल फंसाया भी जाये... हमेशा उनको लगे कि कोई उनको देख रहा है... यह कार्य प्रयत्न माँगता है पर असंभव नहीं है...

यौन अपराधों पर प्रभावी कार्यवाही - पुलिस और प्रशासन के पास शिकायत होने पर भी प्रभावी कार्यवाही अक्सर नहीं हो पाती... तमाम तरह के दबाव अपना काम करने लगते हैं... इसलिये हर जिला स्तर पर स्त्री  अधिकारों-सम्मान के प्रति प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं का एक आब्जर्वर ग्रुप गठित हो, जिसे कानूनी दर्जा प्राप्त हो और जो दर्ज होने वाले हर अपराध पर प्रभावी कार्यवाही को सुनिश्चित करे...

त्वरित न्याय व दंड - इस पर सभी का जोर है अभी... हमें विशेष अदालतें बनानी होंगी... जो इस तरह के मामलों के पीड़ितों के प्रति संवेदनशील हों... रोजाना और निर्बाध सुनवाई करें व एक निश्चित समय सीमा में फैसला सुना दें... मौजूदा दंड भी नाकाफी है, यह तो सुनिश्चित किया ही जाना चाहिये कि कोई भी साबित बलात्कारी कम से कम ६५ साल की उम्र से पहले बाहर न आये...

सामाजिक हस्तक्षेप - समाज का रोल अहम है... यौन अपराध करने वाले अपने घरों में शान से पनाह पाते हैं और कई मामलों में तो उनके घर वाले अपने 'लालों' की इन उपलब्धियों का बखान भी करते हैं... समाज को इतना दबाव बनाना चाहिये कि उनके परिवार तक उनका बहिष्कार कर दें... समाज उनको छूत के रोगियों की तरह देखे... यह भविष्य के बलात्कारी के उस ओर बढ़ते कदम रोकने का सबसे सही तरीका है...

यह सब उपाय और तरीके एक समाज के तौर पर हम सबसे और व्यक्ति के तौर हम में से हरेक से काफी कुछ करना माँगते हैं... क्या हम यह कर पायेंगे...

तमाम चिंताओं व आक्रोश के बावजूद क्या हम में अगला बलात्कार रोक पाने की सामर्थ्य है ?...


सोचिये जरा...







आभार !






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सोमवार, 17 दिसंबर 2012

और आखिर खत्म हो ही गयी दुनिया...

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गतांक... से आगे...

आबाद होना स्टेशनों का


* अपने विश्व विद्मालय के इतिहास में सबसे कम उम्र में अर्थशास्त्र की प्रोफेसर बनने वाली कार्ला हमेशा की तरह सुबह विभाग को जाने घर से निकली और रोजाना की तरह ही सड़क पर पहुंचते ही टैक्सी को हाथ दिया... पर वह यह देख हैरान रह गयीं कि जिस टैक्सी में वे चढ़ीं उसकी पीछे की सीट पर पहले से ही कोई बैठा हुआ था... बिना किसी प्रस्तावना के वह अजनबी अपने लैपटॉप पर कार्ला को एक वीडियो दिखाने लगा...

उस दिन के बाद कार्ला कभी भी देखी नहीं गयी...

* टेनिस एस विक्टर अपने कोच की शुभकामनायें स्वीकार कर रात देर से सोये... अगले दिन सुबह उन्हें एक ग्रैन्ड स्लैम टूर्नामेंट खेलने दूसरे महाद्वीप जाने के लिये फ्लाईट पकड़नी थी... वह घर से एयरपोर्ट को निकले... पर अपनी फ्लाईट में वह नहीं थे... 

वे भी दोबारा कभी देखे नहीं गये...

* सिलिकॉन वैली के वह छहों युवा 'टैकी' भारत के एक प्रसिद्ध तकनीकी संस्थान से निकले थे व अपने अपने क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ दिमागों में उनकी गिनती होती थी... वह छहों आपस में गहरे दोस्त भी थे... आज उन सभी को एक अनाम वेंचर कैपिटलिस्ट ने एक प्रोजेक्ट पर बातचीत के लिये बुलाया था और उनके लिये एक चार्टर्ड प्लेन भी भेजा था... छहों दोस्त प्लेन में सवार हुए...

उनमें से कोई भी कभी दोबारा नहीं देखा गया...

दुनिया के हरेक हिस्से से इसी तरह लोग गायब हो रहे थे... यह वह लोग थे जो अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ माने और जाने जाते थे... किसी सरकार के पास उनके गायब होने का कोई स्पष्टीकरण नहीं था...



दिखना विचित्र विमानों का

और फिर एक नया मामला सामने आया... दुनिया के विभिन्न हिस्सों में, दिन में और रात में भी आकाश में कुछ विचित्र से विमान दिखायी देने लगे... ऐसे विमान दुनिया ने पहले कभी नहीं देखे थे... और इसी के साथ साथ अफवाहों का बाजार भी गर्म हो गया... मीडिया में, बहसों में और आम लोगों में भी अनुमान लगने लगे कि कोई बाहरी सभ्यता पृथ्वी से आदमियों को उठा ले जा रही है...

और आदमियों-औरतों का अचानक लापता होना बढ़ता ही चला गया...





शिखर बैठक


फिर से एक शिखर बैठक आयोजित की गयी... बैठक से पहले ही अफवाहें उड़ने लगीं कि वह बाहरी सभ्यता सभी राष्ट्राध्यक्षों को भी छीन कर ले जा सकती है... सुरक्षा के सारे इंतजाम किये गये... फिर भी ऐसी किसी घटना के वाकई घट जाने की स्थिति में दुनिया के वह तीस ताकतवर देश नेतृत्वविहीन न हों जाये इसे ध्यान में रखते हुऐ सभी राष्ट्राध्यक्ष अपने उत्तराधिकारी का इंतजाम भी करने के बाद शिखर बैठक के लिये गये...

पूरी दुनिया के मीडिया का जमावड़ा था वहाँ... वह तीसों उस हॉल में पहुँचे... और फिर वह घटा जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था... अचानक उस पूरे इलाके की बिजली चली गयी... यही नहीं उस हॉल के आस-पास के तकरीबन चार वर्ग किमी० के इलाके के सारे इलेक्ट्रानिक व मैकेनिकल उपकरणों, मोबाईल फोनों, रेडियो सेटों, वाहनों आदि ने अचानक काम करना बन्द कर दिया... और फिर वहाँ उपस्थित सभी ने देखा कि एक विशाल विचित्र विमान शिखर बैठक स्थल पर मंडरा रहा है... तकरीबन दस मिनट तक वह विमान मंडराता रहा... 

दस मिनट के बाद वह विमान कहीं दूर के लिये उड़ चला... उसके जाते ही बिजली भी आ गयी और सब कुछ यथावत भी हो गया... बस एक ही कमी थी... तीसों राष्ट्राध्यक्ष गायब हो चुके थे...

यह ३० सितम्बर २०४० का दिन था...




शुरू होना मिशन का


हमारे पाँचों स्टेशन आबाद हो चुके थे... कुल १,८०,००० आदमी व औरतें इस मिशन का हिस्सा बने... हमने ऊपर की दुनिया को उसके हाल पर छोड़ दिया था... सभी ने पूरे छह साल स्टेशनों में रहना था और यदि इसके बाद भी दुनिया बची रहती तो मिशन को वहीं खत्म कर सब के सब को वापस दुनिया में सामान्य जिंदगी गुजारने के लिये वापस चले जाना था...

पर हमारे अनुमान गलत साबित नहीं हुऐ... २०४३ की गर्मियों में छोटी सी झड़प से शुरू हुई लड़ाई नाभिकीय युद्ध में बदल गयी... दुनिया के तमाम मुल्कों की न्यूक्लियर डॉक्ट्राईन 'पारस्परिक सुनिश्चित सम्पूर्ण विनाश' के सिद्धान्त पर आधारित थी... और यही हुआ भी... जल, थल और आकाश से हजारों नाभिकीय हथियार एक दूसरे पर छोड़े गये... और पूरी दुनिया खत्म हो गयी... नाभिकीय उर्जा ने तमाम शहरों को धुंआ बना दिया... मानव की आबादी मटियामेट हो गयी... जंगल आग से जल गये... बर्फ के तमाम भंडार पिघल गये और नतीजे के तौर पर तमाम तटीय इलाके समुद्र का जलस्तर बढ़ने के कारण डूब गये... 

विस्फोटों के कारण धूल और धुंऐ के बादल उठे और उठते ही चले गये... यह बादल २०० किमी० की ऊंचाई तक गये और फिर नीचे बैठने में एक साल से भी ज्यादा का समय लिया... यानी एक साल तक पूरी दुनिया पर सूर्य की किरणें नहीं पहुंचने दी इन बादलों ने... नतीजा ज्यादातर जगह शून्य से तकरीबन अस्सी डिग्री नीचे का तापमान हो गया विस्फोटों से लगी आग बुझने के बाद... और तमाम तरह का जीवन खत्म हो गया...



योग्यतम की उत्तरजीविता
 

लेकिन जमीन और समुद्र के डेढ़ से दो किमी० नीचे बने स्टेशनों में जिंदगी अपने पूरे परवान पर थी... बाकी दुनिया को खोने का गम अगर था तो सम्पूर्ण विनाश के बाद भी मानव नस्ल को जिंदा रखने की चुनौतियाँ भी थीं... 

Theory of 'Natural Selection' और Theory of 'Survival of the Fittest' मानो पूर्णता से अपने को साबित कर चुकी थी...







जारी...




पिछली कड़ियाँ हैं :-

भाग-१ ईश्वर की खोज में.... ' अल्फा '
भाग-२ ईश्वर की खोज में... ' अल्फा केवल एक ही होता है '....
भाग-३ और वह भिडंत...
भाग ४ - बहुत ही जल्दी खत्म हो जायेगी, नस्ल इंसान की ! 
भाग-५ और वह रोंगटे खड़े कर देने वाला खौफनाक नजारा...
भाग ६ - वह दो रहस्यमय आदमी...



पाठकों से :-

आप चाहें तो मेरी इस सीरिज को कुछ भी कह सकते हैं, भविष्य फैंटसी, विज्ञान कल्पना या भविष्य कल्पना आदि आदि... पर मैं इसे एक लंबी कहानी ही कहूँगा... कल्पना के घोड़े दौड़ाकर यह कहानी लिखी जायेगी आपके साथ साथ... कोशिश करूँगा कि हर सोमवार को यथासंभव शीघ्रता से आपको नई किस्त मिले...




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सोमवार, 10 दिसंबर 2012

वह दो रहस्यमय आदमी !

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गताँक से आगे...



अब बहुत सी घटनायें बेहद तेजी से घटीं...

उनमें से जो सबसे महत्वपूर्ण थीं वह यह हैं...

* विश्व के तमाम देशों की साझेदारी वाली एक कंपनी का गठन हुआ जिसने तेल व गैस की खोज के लिये बहुत बड़े पैमाने पर दुनिया के तमाम हिस्सों उत्तरी व दक्षिणी ध्रुव, पर्वतों की घाटियों व गहरे समुद्र में भी खुदाई करना शुरू कर दिया।

* एक नयी बहुराष्ट्रीय कंपनी का उदय हुआ जो केवल स्वास्थ्य जाँच का काम करती थी... इस कंपनी ने बहुत ही सस्ते दामों में हेल्थ चेकअप करना शुरू किया... सबसे विशेष बात यह थी कि समाज के प्रतिष्ठित लोगों के चेकअप कंपनी मुफ्त करती थी... 

* शिखरवार्ता में शामिल उन तीस में से एक की मौत दिमाग की रक्तवाहिनियाँ फटने के कारण हुऐ रक्त स्राव से हुई तथा एक का सिर मोबाइल पर बात करते करते अचानक हुऐ एक धमाके में उड़ गया... बताया गया कि बम मोबाइल में था... दोनों ही मामलों में पूरी दुनिया के सहयोग से सत्ता का सहज हस्तांतरण हो गया उन दोनों के उत्तराधिकारियों के हाथ...




और वह दो रहस्यमय आदमी


दुनिया के हर हिस्से में दो रहस्यमय आदमी लोगों से मिलने उनके आफिस, घर, कॉलेज या खेल के मैदानों में जाते थे... और हर जगह लगभग यही बातें होतीं थी..

" मिस्टर वंडरकिड, हमें राष्ट्रपति ने भेजा है और यह है हमारा अथॉराइजेशन, हमें अभी और अकेले में आपसे कुछ बातें करनी हैं "

आइये मेरे कमरे में चलते हैं वंडरकिड बोला... कमरे में जाते ही उन दोनों ने खिडकियों के परदे गिरा दिये और दरवाजा भीतर से बोल्ट कर दिया... उनमें से एक ने लैपटॉप खोला और एक छोटी सी फिल्म वंडरकिड को दिखाई... फिल्म मिशन-सर्वाइवल ऑफ द रेस के बारे में थी... वंडरकिड की आँखें मानो हैरानी से फटी जा रही थीं...

" मिस्टर वंडरकिड, मिशन के हिसाब से आप एक ऐसे आदमी हैं जिनका बचे रहने से मानव सभ्यता को अपने आगे के सफर में आसानी होगी... हमने यह भी पता कर लिया है कि आपको कोई भी आनुवांशिक, मानसिक व शारीरिक बीमारी नहीं है और न ही आपके शरीर में कोई असाध्य संक्रमण है... आपको मिशन के बारे में बता दिया गया है... अब मैं कैमरा निकालने जा रहा हूँ ताकि आपकी सूचित सम्मति (Informed Consent) ली व रिकॉर्ड की जा सके..."

उनमें से एक ने कैमरा ऑन किया व वंडरकिड पर फोकस किया...  दूसरे ने वंडरकिड को सामने रखे लैपटॉप से कुछ जोर से बोल कर पढ़ने को कहा... वंडरकिड के पूरा पढ़ने के बाद दूसरे आदमी ने उससे पूछा " क्या आप सब कुछ जानते-समझते हुऐ मिशन सर्वाइवल ऑफ द रेस का हिस्सा बनने को तैयार हो ?"

"मैं सब कुछ जानते-समझते हुऐ मिशन-सर्वाइवल ऑफ द रेस का हिस्सा बनने को तैयार हूँ" जोर जोर से बोल दो बार दोहराया वंडरकिड ने... पहला आदमी कैमरे से यह सब रिकॉर्ड कर रहा था, रिकार्डिंग पूरी होने के बाद भी उसने कैमरे का फोकस वंडरकिड के चेहरे पर ही रखा व तीन बटन एक साथ दबाये... कैमरे के लेंस के ठीक ऊपर से नीले-हरे रंग की किरणें निकल वंडरकिड के माथे पर पड़ीं, उसे कुछ महसूस नहीं हुआ... 

वह दोनों मुस्कुराते हुऐ कमरे से बाहर निकले... वंडरकिड ने मिशन का हिस्सा बनने की रजामंदी जाहिर की थी... उन नीली-हरी किरणों के चलते उसे पिछले दो घंटे व आने वाले आधे घंटे में हुआ कुछ भी याद नहीं रहने वाला था... यह कुछ इस तरह का था मानो उसकी जिंदगी में यह ढाई घंटे घटे ही नहीं...

यह सूचित सम्मति तकरीबन दो लाख लोगों से लेने का लक्ष्य था...




और अचानक ही


और अचानक ही मुझे एजेंसी से बुलावा आया एक दिन... हर हाल में तुरंत पहुंचना था मुझे... पहुंचने पर पता चला कि अल्फा को गंभीर हॄदयाघात हुआ था... अपने खाने पीने का बिल्कुल भी ख्याल नहीं रखता था वह... टोकने पर कहता था कि मैं हार्टअटैक से ही मरना चाहता हूँ... मैं अस्पताल पहुँचा वह बोलने की हालत में नहीं था... और कुछ ही देर में उसने दम तोड़ दिया... काफी समय से साथ रहते रहते व उसके कारनामों को जानने के कारण अंदर ही अंदर बहुत लगाव हो गया था उससे मेरा... मशीनों-नलियों से जुड़े उसके शरीर को मशीनों-नलियों से अलग कर जब बाहर ले जाया जा रहा था तो मैंने स्ट्रैचर ट्रॉली रूकवायी, उसका चेहरा खोला, माथे को चूमा और बोला " बेफिक्र जाओ और खुश रहो, पॉप, तुमने अपना काम हमेशा अच्छे से किया!"... तब मुझे यह कतई महसूस नहीं हुआ पर देखने वालों ने मुझे बाद में बताया कि मेरी आँखों से आँसुओं की धार निकल रही थी तब...

अल्फा के किये नोमिनेशन के मुताबिक मैं ही नया अल्फा था... यह एक बहुत बड़ा दायित्व था... मैंने निश्चित कर लिया था कि मिशन को हर हाल में २०४० के सितम्बर महीने तक पूरा करना है...







 २०३९


जमीन के नीचे हमारे पाँचों स्टेशन २०३९ तक बन कर तैयार हो चुके थे... हरेक पूरी तरह से नाभिकीय उर्जा युक्त व ८०,००० आदमियों का साठ साल तक बाहर की दुनिया से कोई संपर्क रखे बिना भरण-पोषण करने में सक्षम था... इन स्टेशनों में भविष्य में आने वाली किसी भी आपात स्थिति से निपटने की क्षमता थी व पाँचों स्टेशन आपस में संपर्क में रहने वाले थे...

अभी भी थोड़े बहुत छोटे छोटे काम बचे थे... दुनिया में टकराव बढ़ रहा था ... मैंने ३० सितम्बर २०४० की डेडलाइन जारी कर दी... 




जारी...






पिछली कड़ियाँ हैं :-

भाग-१ ईश्वर की खोज में.... ' अल्फा '
भाग-२ ईश्वर की खोज में... ' अल्फा केवल एक ही होता है '....
भाग-३ और वह भिडंत...
भाग ४ - बहुत ही जल्दी खत्म हो जायेगी, नस्ल इंसान की ! 
भाग-५ और वह रोंगटे खड़े कर देने वाला खौफनाक नजारा...


पाठकों से :-

आप चाहें तो मेरी इस सीरिज को कुछ भी कह सकते हैं, भविष्य फैंटसी, विज्ञान कल्पना या भविष्य कल्पना आदि आदि... पर मैं इसे एक लंबी कहानी ही कहूँगा... कल्पना के घोड़े दौड़ाकर यह कहानी लिखी जायेगी आपके साथ साथ... कोशिश करूँगा कि हर सोमवार को यथासंभव शीघ्रता से आपको नई किस्त मिले...


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रविवार, 25 नवंबर 2012

और वह रोंगटे खड़े कर देने वाला खौफनाक नजारा...

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गताँक से आगे...

शिखरवार्ता



वह २०३७ का सितम्बर का महीना था, जब दुनिया के ३० असरदार देशों के शीर्ष नेता जुटे थे उस शिखरवार्ता के लिये, मेरे देश की राजधानी में... एजेंडा था 'विश्व शांति'... पहले तीन दिन जमकर भाषणबाजी हुई, प्रेस वार्ताओं का दौर चला, विश्वशाँति के लिये अपने प्रतिद्वन्दी या शत्रु देशों को सबसे बड़ा खतरा बताया गया कईयों के द्वारा तथा यह चेतावनी भी दी गयी कि शाँति बनाये रखने की जिम्मेदारी बयान देने वाले नेता के देश की नहीं अपितु विश्व समुदाय की है... उधर एजेंसी में हम सभी चौथे दिन की तैयारी में लगे थे...




वह चौथा दिन

दुनिया को यह कहा गया कि आज के आखिरी दिन सभी शीर्ष नेता बंद कमरे में केवल अपने खासमखास सहायकों के साथ एक दूसरे के साथ 'वन टू वन' वार्ता करेंगे और मुद्दे सुलझाने का प्रयास करेंगे... और वह खास मीटिंग शुरू हुई... एक बड़ी सी गोल मेज के चारों ओर बैठे थे तीसों राष्ट्राध्यक्ष और उनसे थोड़ा पीछे उनसे सटी कुर्सी पर उनके खुफिया एजेंसी प्रमुख... हमारे राष्ट्रपति ने एक छोटा सा संबोधन देकर स्टेज अल्फा को सौंप दिया...

अल्फा ने फिर वही दो घंटे का प्रेजेंटेशन दिया जिसमें बताया गया था कि किस तरह इंसान की नस्ल अगले कुछ सालों में खत्म हो सकती है और उसके बाद 'मिशन- सर्वाइवल आफ द रेस' के बारे में बताया गया... मैं देख रहा था कि कुछ राष्ट्राध्यक्ष तो पूरी उत्सुकता से इसे देख रहे थे... कुछ उबासियाँ भरते भी दिखे... और चार पाँच ऐसे भी थे जिनके चेहरे पर यह सब देखने के बाद एक जहरीली मुस्कान चिपक सी गयी...

पर इस बार अल्फा ने अपना प्रेजेंटेशन देने के बाद स्टेज नहीं छोड़ा बल्कि एक वीडियो दिखाने लगा... यह सभी वीडियो पिछले आठ महीनों में अलग-अलग मुल्कों में अलग-अलग जगहों पर खींचे गये थे... और यह राष्ट्राध्यक्षों के मेज पर बैठने के क्रम में ही था... बारी बारी से बड़ी स्क्रीन पर सभी राष्ट्राध्यक्षों को बिस्तर पर लेटे हुऐ तथा उनकी कोहनी के पास की नस पर किसी डॉक्टर को एक चमकीला सा इंजेक्शन सा लगाते हुऐ दिखाया गया... वीडियों में अपने को देखते ही एक ने अपने खुफिया एजेंसी प्रमुख को फाड़ खाने वाली नजरों से देखा... स्टेज से अल्फा ने मुस्कुराते हुऐ कहा " कृपया किसी पर गुस्सा न करिये, वे सब मजबूर थे "... अब कई गहरी चिंता में पड़ गये... आखिरकार वीडियो खत्म हुआ तो उनमें से चार-पाँच दहाड़े " क्या है इस सब का मतलब ? "

इस बार अल्फा सीरियस हो गया और उसने एक अगला वीडियो दिखाना शुरू किया... स्क्रीन पर वही चमकीला इंजेक्शन दिखाई दिया और कैमरे ने उसकी पारदर्शी सुई पर फोकस किया... सुई के बीच में हल्के गुलाबी रंग का कुछ था...वह आलपिन के सिर का भी आधा ही रहा होगा आकार में... यह एक 'बायोअल्ट्रामाइक्रोरोबोटिक यंत्र' है... इसे किसी भी इंसान की किसी भी नस के अंदर प्रवेश करा देने के तीन घंटों के अंदर यह स्वयंमेव उसके दिमाग की रक्तवाहिनियों तक पहुँचकर वहाँ अपने को जमा लेता है...और यह हमारे केंद्रीय नियंत्रण कक्ष द्वारा नियंत्रित है... यह इस प्रकार के मटीरियल से बनाया गया है कि आज की तारीख में हमारे सिवाय दुनिया में किसी के पास वह तकनीक नहीं है कि किसी के शरीर के भीतर इसकी मौजूदगी को डिटेक्ट तक कर सके... अब अल्फा ने मुझे इशारा किया...

मेरे हाथ में एक हैंड-हैल्ड स्कैनर था... मैंने बारी बारी से उसे सभी नेताओं के चेहरे के सामने रखना शुरू किया और उधर बड़ी स्क्रीन पर बारी बारी से उनका कपाल और कपाल के बीच में एक चमकता बिन्दु दिखाई देना शुरू हो गया... अब उनमें से कुछ पसीने से भीग चुके थे जबकि हॉल का तापमान १७ डिग्री सेल्सियस था...

"आगे बताओ"... बुझी सी आवाज में उनमें से कुछ बोले...

" यह सब यह बताने के लिये कि हमारा यह अनूठा यंत्र आप लोगों के मस्तिष्क में स्थापित हो गया है, इसमें किसी को कोई शक न रहे" अल्फा की आवाज गूंजी...



और वह खौफनाक नजारा


 "अब मैं दिखाउंगा कि हमारा यह यंत्र क्या क्या कर सकता है" अल्फा बोला... और स्क्रीन पर एक और वीडियो चालू हो गया... अल्फा ने अपने हाथ में पकड़े रिमोट का बटन दबाया और चलता हुआ वीडियो रूक गया बीच में ही... "सबसे पहले आप सब को यह भरोसा दिलाने के लिये कि यंत्र आपके दिमाग के भीतर लगा है और काम भी कर रहा है, मैं आपको थोड़ा कष्ट दूँगा मात्र पाँच मिनट तक" और उसने ईशारा किया... अचानक विश्व के वह तीसों शीर्ष नेता अपनी आँखें झपकाने लगे, सामान्य आँखें झपकने से फर्क यह था कि एक साथ सबकी पहले बाँयी आँख झपकी और फिर दाहिनी... झपकने की रफ्तार धीरे धीरे बढ़ती रही, पाँच मिनट पूरे होने तक आप इसे आँखों का झपकना नहीं, बल्कि एक अविश्वस्नीय रफ्तार से फड़फड़ाना कह सकते थे... ठीक पाँच मिनट बाद सब सामान्य हो गया लेकिन वह सभी काफी समय तक अपनी आँखों व सिर को मलते रहे... डर उनके चेहरों से साफ झलक रहा था...

"यह सिर्फ इसलिये कि आप मेरी बातों का भरोसा करें" कहा अल्फा ने... और फिर से वीडियो को चालू कर दिया... सामने एक आदमी था... " यह हमारे देश का एक शत्रु है जिसके फैलाये आतंक ने हमें बहुत नुकसान पहुँचाया, इसे जीने का कोई हक नहीं, हमें इसे मारना ही था इसलिये सोचा कि क्यों न अपने वीडियो का हीरो इसी को बना लिया जाये" अब गंभीर था अल्फा...

"सज्जनों, हार्ट अटैक का दर्द मानव को अनुभव होने वाले सबसे तेज दर्दों में गिना जाता है, पर इस यंत्र के जरिये हम अपने शिकार को इस से भी कई हजार गुना तेज दर्द दे सकते हैं" यह देखिये... और अचानक वीडियो पर दिखता आदमी बेहद दर्द में अजीबोगरीब तरीके से अपने शरीर को मोड़ने तोड़ने लगा, उसने अपने हाथ की उंगलियाँ मुँह के अंदर डाल दीं और एक झटके में ही दो उंगलियाँ अपने ही शरीर से अलग कर दीं... वीडियो यहीं पर बंद हो गया... "चार पाँच सेकेंड भी इस दर्द को झेलने के बाद पंद्रह दिन तक इंसान आइने में अपने आप को पहचानने लायक भी नहीं रहता" अल्फा का स्वर गूँजा...

"इस यंत्र को हमने विस्फोटक क्षमतायुक्त भी बनाया है, अगर हम हल्का विस्फोट करें तो दिमाग की रक्तवाहिनियाँ फटेंगी और 'ब्रेन हैमरेज' से मौत होगी, जैसी 'मुल्कविशेष' के पागल कुत्ते की हुई थी... और"... वीडियो फिर चालू हो गया, स्क्रीन पर वही पहले वाला आतंकी था... " अगर हम उच्च शक्ति का विस्फोट करें तो" अल्फा का चेहरा भावशून्य था... अचानक स्क्रीन पर दिख रहे आतंकी की खोपड़ी एक धमाके से उड़ गयी, सरविहीन शरीर काफी देर तक हरकत करता रहा...

पूरे हॉल में सन्नाटा था... अल्फा ने मुझे ईशारा किया... मैंने फोन पर कुछ निर्देश दिये... और एक बड़ी सी ट्रे में सुनहरे ब्रेसलेट व अंगूठियाँ लिये एक शख्स हॉल में आया... " यह अंगूठी या ब्रेसलेट आपको पहनने हैं, आपके पल-पल की खबर हमें इनसे मिलती रहेगी, किसी भी हाल में इनको अपने शरीर से तीन फुट से ज्यादा दूर नहीं होने देना है, ऐसा होते ही आपके दिमाग में जमे यंत्र में स्वयम ही विस्फोट हो जायेगा" बोला अल्फा... और जल्दी से जल्दी अंगूठी या ब्रेसलेट पहनने के लिये भगदड़ सी मच गयी...

यह सब हो जाने के बाद उनमें से दो-तीन से साहस जुटा पूछा " क्या चाहते हो हमसे"... अब पहली बार अल्फा मुस्कराया, एक गर्वीली व आश्वस्त मुस्कान थी वह " ज्यादा कुछ नहीं, केवल दो चीजें, पहली अगले चार साल तक किसी भी हाल में कोई मिसएडवेंचर नहीं और दूसरा 'मिशन-सर्वाईवल ऑफ द रेस' को सम्पूर्ण सहयोग तन-मन और धन का, मेरे ख्याल से कुछ ज्यादा नहीं मांग रहा मैं"...

अब बारी हमारे राष्ट्रपति की थी " यह देखना हमारा काम है कि अगले चार सालों तक आपलोग ही सत्ता में रहें, चाहे इसके लिये हमें आपके पड़ोसी से युद्ध की धमकी दिलानी पड़े या भूकंप-सुनामी पैदा करने पड़ें, यह हम पर छोड़ दीजिये "

इसी के साथ शिखरवार्ता समाप्त हो गयी...



बाद में


वह तीसों अगले दिन हमारे देश के एक खूबसूरत रिसोर्ट पर पिकनिक मनाने चले गये... सारे मीडिया में उनकी मित्रवत बॉन्डिंग के चर्चे थे...


और 'मिशन-सर्वाइवल ऑफ द रेस' अपने सबसे महत्वपूर्ण दौर में पहुँच चुका था...अब हमें दिन-रात भी कम पड़ने वाले थे काम करने को...








जारी....



पिछली कड़ियाँ हैं :-

भाग-१ ईश्वर की खोज में.... ' अल्फा '
भाग-२ ईश्वर की खोज में... ' अल्फा केवल एक ही होता है '....
भाग-३ और वह भिडंत...
भाग ४ - बहुत ही जल्दी खत्म हो जायेगी, नस्ल इंसान की ! 


पाठकों से :-

आप चाहें तो मेरी इस सीरिज को कुछ भी कह सकते हैं, भविष्य फैंटसी, विज्ञान कल्पना या भविष्य कल्पना आदि आदि... पर मैं इसे एक लंबी कहानी ही कहूँगा... कल्पना के घोड़े दौड़ाकर यह कहानी लिखी जायेगी आपके साथ साथ... कोशिश करूँगा कि हर सोमवार को यथासंभव शीघ्रता से आपको नई किस्त मिले... आपकी प्रतिक्रियायें अहम हैं क्योंकि वही इस कहानी की भविष्य की दिशा तय करेंगी...अगर आप टिप्पणी कर रहे हैं तो थोड़ा कल्पना को जोर दे यह भी बतायें कि अगर आप इसे लिख रहे होते तो अगली किस्त में क्या होता... तथ्यों को सही रखने के लिये हो सकता है कि मैं पहले के लिखे में कुछ बदलाव भी करूँ, जब भी ऐसा होगा, आपको बताया जायेगा... मुझे पाठकों से फीडबैक की आशा थी, है और भविष्य में भी रहेगी... फीडबैक इस कहानी को बेहतर बना सकता है ऐसा मैं मानता हूँ...


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गुरुवार, 22 नवंबर 2012

एक आवश्यकता का आविष्कार थे बालासाहब ठाकरे...

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सत्रह नवम्बर को मुम्बई का शेर चला गया हमेशा हमेशा के लिये... अब फिर वह दहाड़ नहीं सुनाई देगी... बालासाहब ठाकरे का विरोध करना बहुत आसान था, है, फैशनेबल भी है और बड़ी आसानी के साथ आपको प्रगतिशील सोच रखने वाले के तौर पर स्थापित भी कर देता है... पर मुझे लगता है बालासाहब ठाकरे का असली मूल्यांकन उनके जाने के बाद ही हो पायेगा... वह अपने दौर की जरूरत थे और भारत को आगे भी बहुत सारे बाला साहबों की जरूरत होगी, हर प्रान्त में... यह अलग बात है कि वह मिलें या नहीं...

१९ जून १९६६ को मुंबई की नौकरियों में गुजरातियों व दक्षिण भारतीयों के बढ़ते वर्चस्व के विरूद्ध मराठियों को वरीयता देने के मुद्दे पर उन्होंने शिव सेना की स्थापना की... उनका मानना था कि मुंबई महाराष्ट्र की राजधानी है अत: मुंबई का मूलत: मराठी चरित्र व मिजाज बरकरार रहना चाहिये... यह किसी भी तरीके से एक नाजायज माँग नहीं थी... यह बात और है कि ऐसा कहने से वे मीडिया के एक बड़े वर्ग के निशाने पर आ गये... पर ठाकरे अपने विश्वास और माँग पर अंत तक कायम रहे... कालांतर में इस तरह की माँग कई जगहों से उठी और आगे भी उठती रहेगी... आज जब मेरे उत्तराखन्ड के अधिकाँश शहर व कस्बे अपना मूलत: पहाड़ी चरित्र व मिजाज खोकर दिल्ली जैसा लगने लगे हैं तो कभी कभी शिद्दत से हूक उठती है कि काश हमारे प्रदेश में भी एक बाल ठाकरे होता जो ऐसा होने को रोक लेता...

बालासाहब के निधन पर प्रधानमंत्री ने कहा कि "ठाकरे के लिए महाराष्ट्र के हित खास तौर से महत्वपूर्ण थे और वह हमेशा इसकी जनता में गौरव की भावना पैदा करने के उत्सुक रहे।"  लगभग यही बात द्रमुक प्रमुख एम करूणानिधि ने भी कही कि "ठाकरे के लिए उनके राज्य के लोगों के हित ही सर्वोपरि थे।"...  इन हितों को साधने के उनके तौरतरीकों पर सवाल उठाये जा सकते हैं लेकिन मंशा पर नहीं...

बाद में बालासाहब ने हिंदू अस्मिता के मुद्दे भी उठाने शुरू किये, उन्होंने हिंदुत्‍व की बात की और खुलकर कहा  कि वो हिंदूवादी हैं। उन्होंने मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू करने का विरोध किया और इसी के चलते अपने अहम सिपहसालार छगन भुजबल को गंवाया भी... पर यह बाल ठाकरे की शख्सियत ही है कि वो कभी कुछ कहकर पलटे नहीं... बाल ठाकरे के लिये सत्ता ही एकमात्र लक्ष्य नही था, उनकी राजनीति स्वत;स्फूर्त थी , वे अपने समर्थकों के दिल-दिमाग पर एकछत्र राज करते थे... उनके व्यक्तित्व को, तौर तरीकों को और उनके असर को भी सामान्य राजनीतिक पैमाने पर मापना व परखना बेमानी होगा और मूर्खतापूर्ण भी...  उनमें एक दुर्लभ और आजकल लुप्तप्राय: किस्म की ईमानदारी थी... उनकी सोच और कार्यों में कभी कोई लाग-लपेट नहीं दिखा,  उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था कि लोग उनके बारे में क्या सोचते हैं... वे आज की राजनीति में एक अपवाद से थे... उन्हें न संसद जाना था, न मुख्यमंत्री बनना था, न उन्हें स्वयं के लिये सम्मान चाहिये थे... वह अपने विचारों व विश्वास के प्रति गजब के आस्थावान थे...

बालासाहब ने शिवसेना को एक आक्रामक दल की छवि दी... वे हिन्दू हित की बात करते थे... और आज की राजनीति में हिन्दू हितों की वोटों के चलते अक्सर बलि दे दी जाती है... मुंबई में हिन्दू हित की बात करने वाला कोई भी दल आसानी से बुलडोज कर जमींदोज कर दिया जाता अगर उनकी बनाई शिवसेना इतनी आक्रामक नहीं होती तो उसकी भी यही गत कर दी जाती ... 

आपने वह कहानी जरूर सुनी होगी जिसमें एक शरीफ आदमी का एक परिवार एक मौहल्ले में रहता है उसके चार बच्चे हैं दो लड़के और दो लड़कियाँ... सबसे बड़ा लड़का भी निहायत शरीफ और दब्बू है... दोनों लड़कियाँ बड़ी हो रही हैं और मोहल्ले के मवाली आते जाते उनको तंग करते रहते हैं... शिकायत करने पर भी नेता-पुलिस-प्रशासन बस गाल बजाई करते हैं, होता कुछ नहीं... परिवार बस्ती छोड़ने का मन बना रहा है... अचानक एक दिन चमत्कार होता है घर का सबसे प्रतिभावान छोटा लड़का अपनी बहनों की रक्षा के लिये हथियार उठा लेता है और एक गुन्डे को मार देता है और दो को अस्पताल भेज देता है... अदालत-पुलिस की नौटंकी के बाद जब वह घर आता है, तो वह भी एक मवाली हो चुका होता है... शरीफ और दब्बू बड़ा लड़का अपने पिता से अपने 'मवाली' छोटे भाई को घर से निकाल बाहर करने को कहता है तो पिता कहता है "यह ठीक है कि तेरा भाई आज एक शरीफ नहीं रहा, पर आज के दिन वह मुझे तुझ से ज्यादा प्यारा है, उसकी बगावत तेरी शराफत से ज्यादा कीमती है, कम से कम उसके चलते तेरी बहनें और माँ चैन से सर उठा जीते तो हैं, किसी की हिम्मत तो नहीं होती उनका अपमान करने की" 

बालासाहब भी हिन्दुस्तान के एक गरम मिजाज, बगावती और आक्रामक बेटे थे... उनकी यह आक्रामकता केवल और केवल इसलिये थी क्योंकि इसकी भी एक जरूरत थी उनके दौर के मुंबई, महाराष्ट्र और हिन्दुस्तान को... भारत को यदि अपना भारतीय और मूलत: हिन्दू चरित्र व मिजाज बरकरार रखना है तो आने वाले समय में बहुत से बालासाहबों की जरूरत पड़ने वाली है, ऐसा मुझे लगता है ...


बालासाहेब, 
आपको प्रणाम और अश्रुपूरित श्रद्धाँजलि भी... 



मुझे आप बहुत प्यारे थे, बाकी कईयों से बहुत बहुत ज्यादा ...







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रविवार, 18 नवंबर 2012

बहुत ही जल्दी खत्म हो जायेगी, नस्ल इंसान की !

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भाग-१ ईश्वर की खोज में.... ' अल्फा '
भाग-२ ईश्वर की खोज में... ' अल्फा केवल एक ही होता है '....
भाग-३ और वह भिडंत...

 




अब आगे...


हम अपने देश पहुँचे, रास्ते भर अल्फा सोता ही रहा, बस बीच बीच में खाने-पीने के लिये उठ जाता था वह, जाहिर था कि पिछले कुछ दिनों से शायद सो नहीं पाया था वह...

एयरपोर्ट पर वह बोला " सनी, जाओ और जम कर सोओ, दो दिनों के बाद मिलते हैं एजेंसी में "... " ओ के पॉप " मैंने कहा... और दौड़ता हुआ टैक्सी स्टैंड पहुँचा... मैंने अपने फ्लैट का पता ड्राईवर को बताया और जल्दी से जल्दी पहुँचाने को कहा... मैं फुटबॉल के विश्वकप के फाईनल के टीवी प्रसारण का एक सेकेंड भी मिस नहीं करना चाहता था...

दो दिन बाद मैं घर से एजेंसी के लिये निकला, रास्ते में मैंने समय काटने के लिये रेडियो ऑन किया... अचानक एक खबर ने मेरा ध्यान खींचा, खबर थी...

एक कॉन्फ्रेंस के बाद एक विश्व प्रसिद्ध टूरिस्ट स्पॉट पर छुट्टियाँ मनाने जा रहे 'न्यूक्लियर साईंटिस्ट्स' से भरे एक चार्टर्ड प्लेन  का संपर्क राडारों से टूट गया था, प्लेन में कुल मिलाकर विश्व के विभिन्न देशों के ४३ वैज्ञानिक सवार थे और यह सभी न्यक्लियर रिएक्टर निर्माण व संचालन के विशेषज्ञ थे...

एजेंसी में 'कनेक्शन' मानो मेरा ही इंतजार कर रहा था... "जाओ अंदर जाओ, अल्फा इज वेटिंग फॉर यू " बोला उसने और अपने लैपटॉप पर कुछ काम करने में लग गया...

अल्फा अपनी मेज पर ही नाश्ता कर रहा था... "चाय लोगे, सन्नी" पूछा उसने... मैंने अपने लिये एक कप बनाया और फिर उसके नाश्ते पर नजर डाली... अल्फा का खाना खाने का तरीका सारी एजेंसी में चर्चा का विषय था, वह बहुत-बहुत खाता था... अभी भी उसके सामने कम से कम एक दर्जन अंडों का आमलेट और दस से ज्यादा सैंडविच रखे थे... "यह नाश्ता तुम्हारे लिये कुछ ज्यादा नहीं है, पॉप" मैंने टोका उसे... "हाँ, ज्यादा तो है सन , पर अगर किसी ने बचपन में मेरी तरह फाके किये हों तो भर पेट खाना खाने लायक बन जाने पर वह मेरी तरह ही खाता है"... मैं चुप हो गया, उसके अभावग्रस्त बचपन और जीवन संघर्ष पर दसियों किताबें लिखी जा सकती थीं... "कल लगभग पूरी रात भर जगा रहा मैं, देर से सोया, इसलिये नाश्ता भी देर से ही हो रहा है" बताया उसने...

वह बहुत शान्त सा था... क्या उसने वह खबर नहीं सुनी, पर ऐसा कैसे हो सकता है... मुझसे रहा नहीं गया और आखिरकार मैंने पूछ ही लिया... "खबर सुनी पॉप ?"... उसने ज्यादा गौर नहीं किया मेरी बात पर और बोला 

"आज से तुम मेरे साथ इसी ऑफिस में काम करोगे, और तुम्हारा टास्क होगा 'मिशन-सर्वाइवल ऑफ द रेस' को संभव बनाना... "यह क्या है ?" पूछा मैंने... " यह मेरा मिशन है, 'अल्फा' का मिशन, हमें इसमें कामयाब होना है हर हाल में, आज की तारीख में हमारा आकलन यह है कि अगर यही स्थितियाँ बनी रही तो बहुत ही जल्दी खत्म हो जायेगी, नस्ल इंसान की ! और हमें बचाना है अपनी नस्ल को ....बहुत सा शुरूआती काम हम कर चुके हैं और अब सबसे महत्वपूर्ण और आखिरी काम होने बाकी हैं"... 

"अब बताओ, तुम क्या समझे? "... 

मेरे दिमाग ने अपने सामने की स्थिति का आकलन शुरू किया और थोड़ी देर बाद बोला मैं... " यानी वह तुम्हारे लिये रियेक्टर बनायेंगे ?"... "तुम्हारा कोड नेम 'प्रोफेसर' सही रखा गया है सन्नी, पर वे रियेक्टर मेरे या तुम्हारे लिये नहीं इंसान की नस्ल के लिये बनायेंगे" मुस्कुराते हुऐ बोला वह...

मैं अगले दिन से ही काम में जुट गया... 'अल्फा' ने एक टीम बनायी थी इस काम के लिये... यह एक बहुत बड़ी जिग-सॉ पहेली सा था, जिसे पूरी संपूर्णता में केवल 'अल्फा' ही समझ सकता था... 

मुझे दो मीटिंगों से पहले की तैयारी करनी थी... और इस तैयारी में पूरे पाँच साल लग गये... सन  २०३७  की शुरूआत हो चुकी थी दुनिया में...

२०३१ से २०३७ के बीच की दुनिया की मुख्य घटनायें थीं...

* विश्व के तमाम कच्चे तेल व प्राकृतिक गैस के भंडार २०५० तक पूरी तरह से खत्म हो जाने वाले थे... तेल बेचने से मिले पैसों पर आधारित अर्थव्यवस्था वाले देशों में पूरी तरह से निराशा घर कर गयी थी।
* विश्व के तमाम देश उर्जा के अन्य स्रोतों जैसे सौर उर्जा, पवन उर्जा, जल उर्जा तथा नाभिकीय उर्जा का अधिकाधिक प्रयोग करने की राह पर थे।
* २०३५ में एशिया की एक महाशक्ति के एक  महानगर में अचानक से विश्व में बहुत पहले खत्म हो गयी बीमारी चेचक का संक्रमण हो गया, बीमारी के टीके विकसित करने में छह माह लगे, तब तक वह बीमारी एक करोड़ सत्तर लाख जानें ले चुकी थी, उस देश की अर्थव्यवस्था कम से कम दस साल पीछे जा चुकी थी...
* लगभग सभी देश नाभिकीय उर्जा से अपनी उर्जा जरूरतें पूरी करने लगे थे, इसी के साथ यह संभावना भी सिर उठाने लगी थी कि नाभिकीय हथियार भी बहुत से ऐसे देशों को सुलभ हो जायेंगे जहाँ उन्मादियों का शासन था।
* २०३७ के आकड़ों के अनुसार दुनिया की ६० प्रतिशत आबादी डायबिटीज, मोटापा, हाइपरटेंशन, हॄदय रोग, गु्र्दा रोग आदि लाईफ स्टाइल डिजीज से ग्रस्त हो चुकी थी... और अधिकाँश मुल्क अपने कुल बजट का ३० प्रतिशत तक बीमारियों से निपटने में खर्च करने लगे थे...
* २०३७ में ही चारों तरफ समुद्र से घिरे, उच्च तकनीक पर आधारित अर्थव्यवस्था वाले आर्थिक महाशक्ति एक देश ने अपने प्रतिद्वन्दी दो देशों पर यह आरोप लगा सनसनी फैला दी कि २०३७ में ही उसके तटीय इलाकों को तबाह कर देने वाली सुनामी का आना कोई प्राकृतिक घटना नहीं थी, अपितु ऐसा उसके प्रतिद्वन्दी देशों ने समुद्र की तलहटी पर 'कंट्रोल्ड न्यूक्लियर एक्सपलोजन्स' कर इस सुनामी को जन्म दे उसकी अर्थव्यवस्था को क्षति पहुँचाई थी। दोनों ओर से खंडन व मंडन का सिलसिला काफी दिनों तक चलता रहा... 




और वह पहली मीटिंग

वह एक गुप्त जगह थी... उस मीटिंग को 'अल्फा' ने बुलाया था... और वह तीस भी आये थे... वह सभी अपने अपने मुल्कों की खुफिया एजेंसियों के प्रमुख थे... सबसे पहले 'अल्फा' ने अपना प्रेजेंटेशन दिया... सभी मंत्रमुग्ध होकर उसे देखते ही रह गये... कैसे पूरे दो घंटे बीत गये, पता ही नहीं चला... फिर कमरे की रोशनियाँ जलीं और 'अल्फा' की आवाज गूँजी... "तो सज्जनों, हमारे पास ज्यादा समय नहीं है, ज्यादा से ज्यादा चार-पाँच साल और, फैसला आपको करना है क्या आप इंसान की नस्ल को इस तरह खत्म हो जाने देंगे?... वे सभी आपस में चर्चा में लग गये... पंद्रह मिनट बाद एक स्वर में सभी बोले "नहीं !!!"... 

(यह केवल मैं और अल्फा जानते थे कि उनमें से ग्यारह पहले से ही मिशन से जुड़े हुऐ थे)

मुझे इसी क्षण का इन्तजार था... मैंने इंटरकॉम पर आदेश दिया... "तुम्हारा काम अब शुरू होता है, डॉक्टर"... और अपने दो सहायकों के साथ डॉक्टर ने कमरे में प्रवेश किया... एक बड़ी सी ट्रे थी उनके पास... बारी बारी से वे तीनों उन तीसों के पास गये व हरेक की कोहनी के पास की नस में एक चमकीला सा इन्जेक्शन सा लगाया... फिर एक और आदमी आया कमरे में, उसके पास भी एक ट्रे थी, ट्रे में चमकती धातु की कुछ अंगूठियाँ और  ब्रेसलेट थे,...  "आप इनमें से कोई एक पहन सकते हैं, याद रखिये कि किसी भी हाल में इसे उतारना नहीं है, कभी उतारना भी पड़े तो यह कभी भी आपसे तीन फीट से ज्यादा दूर न रहे"... सबने सिर हिलाया, उनमें से कोई भी कभी भी अपनी अंगूठी या ब्रेसलेट नहीं उतारने वाला था।

"अच्छा सज्जनों, फिर आप अपने अपने देश जा बताये तरीके से शिखरवार्ता की तैयारी करिये" अल्फा की आवाज गूंजी...

और हम सभी डाइनिंग एरिया की ओर बढ़ चले, हाथों में हाथ डाले व आपस में मर्दाना मजाक करते हुऐ...





जारी....


पाठकों से :-

आप चाहें तो मेरी इस सीरिज को कुछ भी कह सकते हैं, भविष्य फैंटसी, विज्ञान कल्पना या भविष्य कल्पना आदि आदि... पर मैं इसे एक लंबी कहानी ही कहूँगा... कल्पना के घोड़े दौड़ाकर यह कहानी लिखी जायेगी आपके साथ साथ... कोशिश करूँगा कि हर सोमवार को यथासंभव शीघ्रता से आपको नई किस्त मिले... आपकी प्रतिक्रियायें अहम हैं क्योंकि वही इस कहानी की भविष्य की दिशा तय करेंगी...अगर आप टिप्पणी कर रहे हैं तो थोड़ा कल्पना को जोर दे यह भी बतायें कि अगर आप इसे लिख रहे होते तो अगली किस्त में क्या होता... तथ्यों को सही रखने के लिये हो सकता है कि मैं पहले के लिखे में कुछ बदलाव भी करूँ, जब भी ऐसा होगा, आपको बताया जायेगा... मुझे पाठकों से फीडबैक की आशा थी, है और भविष्य में भी रहेगी... फीडबैक इस कहानी को बेहतर बना सकता है ऐसा मैं मानता हूँ...


शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

और वह भिडंत...

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भाग-१  ईश्वर की खोज में.... ' अल्फा '
व 
भाग-२  ईश्वर की खोज में... ' अल्फा केवल एक ही होता है '....
 
से आगे...


दिसंबर २०३२

दिसंबर २०३२ को मैं अपनी पहली फील्ड पोस्टिंग पर गया, मुझे एक 'मुल्क विशेष' के इरादों के बारे में पता लगाने का टास्क दिया गया था... बहुत स्रोतों से सूचना 'अल्फा' तक पहुँचती थी और उन में से ही एक स्रोत मैं भी था...

२००१ से २०३२ तक के विश्व की कुछ प्रमुख घटनायें इस प्रकार से थीं...

* ११ सितम्बर २००१ को कुछ इस्लाम को मानने वाले आतंकियों ने अमेरिका पर आतंकी हमला कर हजारों लोगों की जान ले ली...
* आतंक के सरगना को मारने के इरादे से अमेरिका ने अफगानिस्तान पर अपनी फौजें उतार दीं और मई २०११ में अपने एक सहयोगी मुल्क पाकिस्तान के भीतर जा सरगना को मार गिराया...
* ईरान नामक एक देश के राष्ट्रपति ने २०१२ में यहूदी देश इजरायल को दुनिया के नक्शे पर एक नासूर बताते हुऐ जल्दी ही उसे मिटाने की बात कही, जवाब में इजरायल ने कहा कि वह कभी भी किसी भी हालात में ईरान को एटम बम नहीं बनाने देगा...
* २०१५ की गर्मियों में अमेरिका व उसके सहयोगी देशों ने अफगानिस्तान की सत्ता अफगानी सरकार को सौंप अपनी फौजें वहाँ से हटा लीं...
* २०१७ में इस्लामी आतंकियों ने फिर एक बार अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया...
* २०१९ में पाकिस्तान के अधिकाँश भागों पर भी इस्लामी आतंकियों का कब्जा हो गया व पाकिस्तानी फौज का एक बड़ा हिस्सा उनके साथ मिल गया, इस्लामाबाद की चारों ओर से घेराबंदी कर दी गयी ...
* २०२० में इस्लामी आतंकियों का इस्लामाबाद पर भी कब्जा हो गया व वे भी पाकिस्तानी सेना में शामिल हो गये...पाकिस्तान पर कट्टरपंथियों का एक समूह शासन करने लगा... इसके तुरंत बाद ही पाकिस्तान ने अपनी पूर्वी सीमा पर स्थित पड़ासी मुल्क भारत से कुछ हिस्सों को आजाद कराने के लिये खुली व छिपी दोनों तरह की जंग का एलान कर दिया...
* २०२२ में बार बार पाकिस्तान की ओर से एटमी हमले की धमकी से आजिज आ भारतीय नेतृत्व ने पूरे विश्व के सामने ऐलान कर दिया कि कहीं से भी भारत पर ऐटमी हमला होने की स्थिति में भारत उस देश पर ३०० से ज्यादा नाभिकीय हमले एक साथ करेगा, चाहे इसके परिणाम दुनिया के लिये कुछ भी हों...
* इसके तुरंत बाद २०२२ में इजरायल ने भी समूचे विश्व के सामने यह ऐलान किया कि उसकी हवाई सीमा में कोई हमलावर मिसाईल या विमान घुसते ही स्वचालित रूप से उसके सारे नाभिकीय हथियार दुनिया के विभिन्न इलाकों के उसके दुश्मन मुल्कों की ओर रवाना कर दिये जायेंगे...
* २०२३ में यह भी साबित हो गया कि एड्स जैसी महामारी का कारण HIV एक कुदरती वायरस नहीं बल्कि बायोलॉजिकल वारफेयर के लिये विश्व के एक विकसित मुल्क द्वारा तैयार किया जा रहा वायरस था... जो जानबूझ कर छोड़ा गया... जिससे इसकी वैक्सीन विकसित हो सके... तथा HIV परिवार के उससे भी घातक अन्य वायरस जैविक युद्ध के लिये विकसित किये जा सकें जिनकी वैक्सीन केवल उसी देश के पास मौजूद हो...
* २०२४ में HIV के खिलाफ १००% प्रतिरोधक क्षमता वाली वैक्सीन विकसित कर ली गयी...
* २०२८ में चीन दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक व सैन्य शक्ति, अमेरिका दूसरी व भारत तीसरी सबसे बड़ी शक्ति के तौर पर जाना जाने लगा, विश्व में जिनका पहले प्रभुत्व था उन मुल्कों को यह नागवार गुजरा और कई ऐसे गुप्त समूह बन गये जो हर हाल में चीन व भारत को उनके पुराने हाल में फिर भेज देना चाहते थे...
* २०२९ में यूरोप के एक ताकतवर मुल्क के एक वैज्ञानिक ने यह आरोप लगा सनसनी फैला दी कि कुछ प्रयोगशालाओं में दशकों पहले विश्व से खत्म कर दी गयी महामारी चेचक व पोलियो के वायरसों का जैविक युद्ध के हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने पर काम किया जा रहा है... वह वैज्ञानिक तीन दिन बाद अपने घर में मृत पाया गया... पत्नि ने बताया शायद वह पागल हो गया था और उसी पागलपने में उसने जहर खा लिया था...
* २०३० में दुनिया की ५५ प्रतिशत आबादी डायबिटीज, मोटापा, हाइपरटेंशन, हॄदय रोग, गु्र्दा रोग आदि लाईफ स्टाइल डिजीज से ग्रस्त हो चुकी थी... २०१२ में मुम्बई, भारत के एक अस्पताल द्वारा पहली बार रिपोर्ट किया TDR TB (टोटली ड्रग रेजिस्टेंट ट्यूबरकुलोसिस) एक बहुत बड़ी समस्या बन चुका था व हर साल उससे समूचे विश्व में २० लाख मौतें होने लगीं थी... कोई भी ज्ञात दवाई इस बीमारी के खिलाफ काम नहीं कर रही थीं...
* २०३१ में यह खबर आई कि पाकिस्तान के एक आतंकी-जनरल ने अपने नियंत्रण के तीन नाभिकीय हथियार एक बहुत बड़ी रकम के बदले एक मुल्क को बेच दिये थे...
* २०३१ में ही एक 'मुल्क विशेष' का कट्टरपंथी शासक अपने करीबियों को यह कहते सुना गया कि दुनिया शायद जल्द ही खत्म होने वाली है, ऐसा उसने सपने में देखा है...

मुझे भी उसी 'मुल्क विशेष' में ही भेजा गया था... मेरे टास्क दो थे, पहला यह पता लगाना कि क्या वह 'तीन बम' उसी देश ने खरीदे थे, दूसरा यह कि उनका क्या प्रयोग होना था... मेरा काम मुख्य रूप से 'एजेंसी' के उस देश में मौजूद अनेकों इन्फॉर्मर्स से सूचना संकलित कर उनका विश्लेषण कर अपनी राय अल्फा को देना था...

मैं जाते ही अपने काम में जुट गया... धीरे-धीरे सूचनायें मुझ तक आने लगीं... पर निश्चितता से किसी नतीजे पर पहुँचने लायक सूचना मेरे से अभी बहुत दूर थी...

तभी वह फोन आया... वह भी उसके ऑफिशियल नंबर से... उसका नाम कुछ और था पर मैं उसको जूलू (Zulu) कहूँगा... मैं फोन उठाते ही बोला '"ठीक है, मैं अपनी एम्बेसी जा रहा हूँ, और पहली फ्लाइट से ही वापस चला जाउंगा "... बहुत जोर से ठहाका लगाकर हंसा वह " प्रोफेसर, (उसे मेरा नाम पता था) अगर मुझे तुमसे यही कहना होता तो क्या मैं खुद फोन करता, मेरे आदमी तुम्हें सड़क से उठा सीधा फ्लाईट में बैठा देते"... मैं झेंप सा गया... मुँह जब भी खोलो, समझदारी की ही बात बोलो, खास तौर पर अपने हमपेशा से, वरना तुमको ही शर्मिन्दा होना होगा, यह मेरे लिये बड़ा सबक था... " सॉरी" बस इतना ही मेरे मुँह से निकल पाया... " कोई बात नहीं बेटा, आओ साथ लंच करेंगे" वह अचानक मेरे पिता समान हो गया...

एक मैक्सिकन रेस्त्रां में हम मिले... खूब जमकर खाया-पिया... खूब सारी बातें की... उसने अपनी बेटी के बारे में बताया... बोला कि मेरे जैसा वर खोज रहा है उसके लिये... खाना खाते खाते अचानक उसने प्लेट में थोड़ा ज्यादा सॉस डाल दिया, मैंने सामान्य रूप से बातों के क्रम को बनाये रखा पर अब मेरी नजरें उसके हाथ के चम्मच काँटे पर थीं... खाना खाते खाते अचानक उसने काँटे की नोक से सॉस पर दो आकार बनाये  '+ α' ... मेरे होंठो पर हल्की मुस्कुराहट उभरी... उसने चम्मच से जल्दी जल्दी सारी प्लेट साफ कर दी...

वह अल्फा से मिलना चाहता था।

यह एक इमरजेंसी थी... उसी शाम मैं अपने देश के लिये फ्लाईट पर सवार हो गया... १२ घंटे बाद मैं एजेंसी के आफिस में था, मैंने 'कनेक्शन' को खबर दी कि जुलू अल्फा से मिलना चाहता है... और कनेक्शन मुस्कुराने लगा... शायद मैंने कोई बड़ा काम कर दिखाया था...

अल्फा और जुलू आपस में कैसे मिले, यह बताना यहाँ जरूरी नहीं... पर 'अल्फा' को 'अल्फा' क्यों कहते थे यह बताना अब जरूरी हो गया है... तब दुनिया का लगभग हर मुल्क अपनी एक जासूसी एजेंसी रखता था... मुल्कों में सत्ता परिवर्तन होते रहते थे, कभी कभी सरफिरे, जनूनी यहाँ तक कि पागल भी शासक बन जाते थे... पर जासूसी एजेंसियाँ हमेशा ही समझदारों के ही हाथ में रहती थीं... दुनिया की सारी जासूसी एजेंसियों के प्रमुखों का एक अनौपचारिक क्लब सा होता था, यह दुनिया का सबसे रहस्यमयी और एक्सक्लुसिव क्लब था... ' अल्फा' इस क्लब के सरगना को कहा जाता था... मुल्क एक दूसरे के खिलाफ आतंक फैलाते थे, रहस्यों को खरीदते थे, एक दूसरे के जासूसों को बेनकाब करते थे, कभी कभी इस काम में जानें भी ली जाती थीं... पर यह झगड़े, राजनीति व नफरत कभी पूरी मानवता को ही न निगल बैठे, इसीलिये यह क्लब बना था... एक तरह से 'अल्फा' केवल अपने देश का ही नहीं पूरी मानवता का रक्षक था...

जुलू अल्फा से मिलना चाहता था क्योंकि जुलू की निगाह में दुनिया खतरे में थी...

वो दोनों मिले, कहाँ मिले कैसे मिले, यह मैं नहीं बताना चाहता, पर जुलू ने अल्फा को बताया कि उसके 'मुल्क विशेष' के हुक्मरान ने ही वह तीनों बम खरीदे हैं, और बहुत जल्द ही उसकी उन्हें भारत व इजरायल के खिलाफ इस्तेमाल करने की योजना है... उसका ख्याल था, जो सही भी था कि ऐसा होते ही अपने खुले ऐलान के मुताबिक दोनों देश अपने सारे नाभिकीय हथियार, जो हजारों की संख्या में थे, अपने अपने दुश्मनों की ओर रवाना कर देंगे और महज एक दो दिनों में ही पूरी दुनिया नष्ट हो जायेगी...

पर अल्फा को हर हाल में इसे रोकना था...

और उसने यह किया भी...

और वह भिडंत

अचानक घटनायें तेजी से घटित हुई और तीन दिन के भीतर ही हमारे राष्ट्रपति उस 'मुल्क विशेष' के प्रधान मंत्री से 'तेल के दामों के उतारचढ़ाव व विश्व की अर्थव्यवस्था पर इसके कुप्रभाव' को रोकने के लिये शिखरवार्ता के लिये उस 'मुल्क विशेष' की राजधानी को रवाना हो गये... यह अभूतपूर्व था... और राष्ट्रपति की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिये हमारी वायुसेना के लड़ाकू विमान, हैलीकॉप्टर व एक बहुत बड़ा सुरक्षा दल भी साथ गये... अल्फा भी दल का हिस्सा था और पूरे घटनाचक्र के दौरान मैं उसके साथ रहा...

एयरपोर्ट पर स्वागत के तुरंत बाद दोनों नेता शिखरवार्ता के लिये निर्धारित जगह पहुँचे... मीडिया के लिये मुस्कुराने व फोटो खिंचाने के बाद घोषणा हुई कि अब वे दोनों बंद कमरे में एक दूसरे से वार्ता करेंगे व केवल अनुवादक व निजी सचिव ही उनके साथ रहेंगे... बहरहाल अब राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री दोनों एक कमरे में थे जिसे 'एजेंसी' व 'मुल्क विशेष' के खुफिया विभाग ने पहले से ही सैनिटाइज किया हुआ था... हमारी ओर से अल्फा, मैं और राष्ट्रपति थे और उनकी तरफ से प्रधानमंत्री, जुलू और उनकी फौज का एक बंदा... वार्ता शुरू होते ही राष्ट्रपति ने इशारा किया... अल्फा उठा और प्रधानमंत्री के पास गया, अपने टेबलेट पीसी पर उसने प्रधानमंत्री को एक वीडियो दिखाया... अचानक प्रधानमंत्री के चेहरे का रंग उतर सा गया... फिर अल्फा ने एक दूसरा वीडियो प्रधानमंत्री को दिखाया... प्रधानमंत्री को उस एयरकंडीशन्ड रूम में ही पसीना सा आ गया... जुलू की ओर देख वह चिल्लाया " हरामी, तूने हमारे महान देश को धोखा दिया है "... जुलू चेहरे पर कोई भाव लाये बिना बैठा रहा... अब अल्फा ने राष्ट्रपति की ओर इशारा किया... और पहली बार राष्ट्रपति ने मुँह खोला "मिस्टर प्राइम मिनिस्टर आपको अगले पाँच मिनट के भीतर ही कुछ जरूरी फोन कॉल करनी होंगी"... निस्तेज, सर झुकाये बैठे प्रधान मंत्री ने फौजी बंदे को इशारा किया, पर जुलू ने अपना फोन आगे बढ़ा दिया... कुल तीन मिनट तक बातें हुई...

'मुल्क विशेष' की राजधानी के हवाई अड्डे पर अचानक गतिविधियाँ बढ़ गयीं... मुल्क विशेष की सेना के तीन भारी भरकम हैलीकॉप्टर उतरे व उनमें से तीन काफी भारी बड़े बक्से क्रेन द्वारा उतारे गये... हरेक हैलीकॉप्टर से चार चार वैज्ञानिक से दिखते आदमी भी उतरे... बड़ी ही शीघ्रता से यह सारा सामान व आदमी हमारे कार्गो प्लेन में चढ़ाये गये... और प्लेन रनवे पर दौड़ता उड़ान भर आँखों से ओझल हो गया...

उधर मीटिंग रूम में राष्ट्रपति प्रधानमंत्री के साथ बड़ी तल्लीनता से वीडियो गेम खेल रहे थे... मैं, अल्फा, जुलू और फौजी मेज पर लगे खाने पीने के सामान का सफाया करने में जुट गये... तकरीबन सवा घंटे के बाद अल्फा के फोन पर कॉल आई, वह खुश नजर आया... " मेरा ख्याल है अब हम मीटिंग खत्म कर सकते हैं सर, पंछी उड़ कर सरहद से पार निकल गया है "...

अब राष्ट्रपति को अपना काम करना था... मुस्कुराते हुऐ राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री के गले में हाथ डाला और बाहर चलने को कहा... बाहर पूरी दुनिया के मीडिया के कैमरे लगे थे... " हमारे दोनों महान देशों ने दुनिया की अर्थव्यवस्था को तेल की कीमत के उतारचढ़ाव के नुकसान से बचाने के लिये एक रणनीति तैयार की है, सभी स्टेकहोल्डर्स से बात करने के बाद यह दुनिया के सामने होगी " कहा राष्ट्रपति ने...

तय यह हुआ कि यहीं से दोनों नेता रात के खाने पर जायेंगे और रात का खाना खाने के बाद राष्ट्रपति अपने देश रवाना हो जायेंगे... बहुत शानदार रात्रिभोज था, और उतना ही लजीज खाना भी... जुलू लगातार चिंतित लग रहा था... वह अल्फा के पास आया... अल्फा ने उसका हाथ दबाया और बोला "चिंता मत करो, पागल कुत्ता जिंदा नहीं छोड़ा जायेगा"... ठीक डेढ़ घंटे में रात्रिभोज खत्म हुआ और विदाई के बाद राष्ट्रपति का प्लेन रनवे की ओर बढ़ा... अल्फा और मैं पीछे की सीट पर बैठे थे... अल्फा ने अपनी जेब से फोन निकाल एक मैसेज किया... और रेडियो खोल न्यूज चैनल लगा दिया... पाँच मिनट के बाद खबर आने लगी... ' दिमाग की रक्त वाहिनियों में रक्तस्राव के कारण 'मुल्क विशेष' के प्रधानमंत्री को कोमा की अवस्था में अस्पताल ले जाया गया है, सूत्र बताते हैं कि पिछले एक दिन की अतिव्यस्तता व तनाव के चलते ऐसा हुआ होगा' रेडियो कह रहा था... "पागल कुत्ता अपने अंजाम तक पहुँच गया है" मुस्कुरा कर कहा अल्फा ने और अगले ही पल खर्राटे भरने लगा... अस्पताल में जाने के कुछ घंटे बाद ही प्रधानमंत्री की मृत्यु की घोषणा कर दी गयी...

(जारी)...

अगली किश्त में पढ़ियेगा 'मिशन-सर्वाइवल ऑफ द रेस'...

पाठकों से :-

आप चाहें तो मेरी इस सीरिज को कुछ भी कह सकते हैं, भविष्य फैंटसी, विज्ञान कल्पना या भविष्य कल्पना आदि आदि... पर मैं इसे एक लंबी कहानी ही कहूँगा... कल्पना के घोड़े दौड़ाकर यह कहानी लिखी जायेगी आपके साथ साथ... कोशिश करूँगा कि हर सोमवार को यथासंभव शीघ्रता से आपको नई किस्त मिले... आपकी प्रतिक्रियायें अहम हैं क्योंकि वही इस कहानी की भविष्य की दिशा तय करेंगी...अगर आप टिप्पणी कर रहे हैं तो थोड़ा कल्पना को जोर दे यह भी बतायें कि अगर आप इसे लिख रहे होते तो अगली किस्त में क्या होता... तथ्यों को सही रखने के लिये हो सकता है कि मैं पहले के लिखे में कुछ बदलाव भी करूँ, जब भी ऐसा होगा, आपको बताया जायेगा... मुझे पाठकों से फीडबैक की आशा थी, है और भविष्य में भी रहेगी... फीडबैक इस कहानी को बेहतर बना सकता है ऐसा मैं मानता हूँ...






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शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

करवाचौथ पर...

.
.
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वो
थे
दो
आजाद
परिंदे

जो
अगर
उड़ते
रहते
साथ साथ
देते
एक दूसरे
के
परों को
ताकत

तो
शायद
नाप देते
आसमान

देख लेते
दुनिया को
इस छोर से
उस
छोर तक

पर
उन्होंने
बाँधा
एक दूजे को
इक
रिश्ते की
डोर से

मिल
बनाया
खुद ही
एक नीड़
जिसे
घर कहते हैं
और
वे
खुद
कहलाये
पति-पत्नी

उड़ते
अब भी
हैं
वे
पर
यह
उड़ान
होती है
नीड़ के
इर्द गिर्द
ही

आज
उनमें से
एक
रहेगा
भूखा
निर्जल
पूरे
दिन भर

मन्नत
माँगते
कि
जब भी
साथ छूटे
तो
वही जाये
पहले

रहते
हुऐ
अखंड-सुहागन

मुझे
अच्छा
नहीं लगता
यह
पर्व

मैं
नहीं चाहता
कि
कोई
सोचे तक
भी
मुझे
छोड़
पहले जाने की



जाने क्यों
क्या करूँ
मैं कुछ
ऐसा ही हूँ.... 






...



आज मेरी पत्नी श्री से बहुत बहस हुई... हमारे यहाँ करवा चौथ मनाने की परंपरा नहीं है... परंतु पिछले वर्ष मेरे मना करने पर भी उन्होंने यह व्रत रख लिया... इस बार मेरी ओर से पक्की मनाही है... इसी बहस के बाद उपजे अपने मनोभावों को यहाँ लिख दिया है... बस...



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रविवार, 28 अक्तूबर 2012

ईश्वर की खोज में... ' अल्फा केवल एक ही होता है '....

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भाग- १ { ईश्वर की खोज में.... ' अल्फा ' } से आगे...


 इंटरव्यू

इंटरव्यू के दिन मैं सुबह सुबह तैयार हो समय से पाँच मिनट पहले बताई गयी जगह पहुँच गया... जिस होटल में इंटरव्यू था वहाँ लॉबी में एक बोर्ड पर नोटिस लगा था... एक हॉल में जाने को कहा गया था नोटिस में... मैं उस हॉल में पहुंचा... वेटर से दिखने वाले एक आदमी ने मुझे चाय कॉफी के लिये पूछा... मैंने उसे एक कप ब्लैक कॉफी, बिना चीनी के लाने को कहा और खिड़की के पास खड़ा हो बाहर का जायजा लेने लगा... हॉल में मुझी जैसे दो उम्मीदवार और थे... एक लड़का और एक बहुत सुन्दर लड़की भी... बहरहाल उस समय मैं किसी से कोई बात करने के मूड में नहीं था, मैं स्थिति का आकलन कर रहा था... मैंने अनुमान लगाया कि हमें कहीं और ले जाया जायेगा...

मेरा अनुमान सही निकला, मैं अभी कॉफी खत्म भी नहीं कर पाया था कि एक शख्स ने, जो अपनी चाल ढाल व हेयरकट से फौजी सा लग रहा था, हॉल में प्रवेश किया... बिना किसी प्रस्तावना के उसने हम तीनों को नाम से पुकारा और कहा " चलिये हमें दूसरी जगह चलना है, गाड़ी बाहर खड़ी है "...

होटल के पोर्श में एक वैन खड़ी थी... हम तीनों उस पर चढ़े... हमारे चढ़ने के बाद वही आदमी ड्राइविंग सीट पर बैठा और इंजन स्टार्ट किया... फिर न जाने उसने कौन से बटन दबाये कि हमारे और ड्राइवर के बीच एक पार्टिशन गाड़ी के फर्श से ऊपर उठ सरक गया और सारी खिड़कियों पर एक और काला शीशा चढ़ गया... यह राहत की बात थी कि लाइट जल रही थी... अंदर एक छोटी सी डिस्प्ले स्क्रीन पर वह फिर हमें दिखा और बोला " सॉरी, पर मुझे ऐसे ही निर्देश हैं "...

तकरीबन एक घंटे तक गाड़ी दौड़ती रही... मैं गाड़ी के मूवमेंट व इंजन के एक्सलरेशन व ब्रेक आदि लेने से अंदाजा सा लगाता रहा कि आखिर हमें कहाँ ले जाया जा रहा है... आखिर मुझे केवल इतना ही समझ में आ पाया कि गाड़ी शहर से बाहर किसी हाइवे में दौड़ रही है...

आखिरकार गाड़ी रूकी... वह एक बहुत बड़े गैराज के अंदर जाकर रूकी थी... हम तीनों बाहर निकले... उसने हमें सीढ़ी चढ़ने का इशारा किया... अब हम एक बहुत बड़ी इमारत की लॉबी  में थे... एक सख्त सी दिखने वाली अधेड़ महिला हमारे पास आई... " उस तरफ लाइन से काफी सारे बाथरूम हैं... जाओ... बाथरूम में रखे साबुन से नहाओ... और बाथरूम में रखे टीशर्ट-पाजामा व स्लिपर पहन लो... याद रहे अपने सारे कपड़े, घड़ी, अंगूठी, ब्रेसलेट, ताबीज वगैरह सब के सब तुमने बाथरूम में ही उतार देने हैं... मैंने वैसा ही किया, बाहर निकला तो मुझे एक बंदा बाहर अपना इंतजार करता मिला... उसने फिर भी मेरी तलाशी ली... " पार्टनर, अंडरवियर तक तो उतरवा लिये, अब क्या बच्चे की जान लोगे " मजाक किया मैंने... पर वह भावशून्य चेहरा बनाये रहा... "जल्दी चलो, बड़ी देर लगाते हो नहाने में, हमें देर हो रही है " कह वह लगभग दौड़ाता सा हुआ मुझे एक कमरे के बाहर छोड़ गया...

" तुम अंदर आ सकते हो "... एक आवाज गूँजी और मैं कमरे के अंदर था... एक बड़ी सी गोल मेज के चारों ओर वह सातों बैठे थे... मैंने सातों को देख जायजा लिया और मेरी नजर उनमें से एक पर जाकर अटक गयी... वह एक विशालकाय आदमी था, सुपरहैवीवेट बॉक्सर जैसी डील डौल वाला... मोटी और छोटी गर्दन और उसके ऊपर बड़ा सा सिर... बाल खिचड़ी काले-सफेद थे, पर उसने उन्हें बहुत छोटा कटाया हुआ था... पर सबसे विशिष्ट थी उसकी आँखें... ऐसा लगता था कि वह उनसे आपके अंदर ही नहीं आपके आर-पार भी झाँक सकता हो... उन आँखों ने बहुत कुछ देखा था... और उनसे ताकत व जिम्मेदारी दोनों झलक रही थीं...

इंटरव्यू शुरू हुआ... उन लोगों ने मेरा पूरा बैकग्राउंड चैक किया था... प्राइमरी में मेरे साथ पढ़े दोस्तों तक से पूछा गया था मेरे बारे में... कुछ छोटे मोटे सवाल किये गये मुझ से... उस के बाद उनमें से एक बोला " अल्फा, अब तुम पूछो जो भी पूछना है "...  तो वह विशालकाय आदमी 'अल्फा' है...

" माई सन "... उसकी आवाज पूरे कमरे में गूंज रही थी... " तुम्हें कुछ समझ में आ रहा है कि तुम किस दुनिया और धंधे में एंट्री ले रहे हो ? "...
" इतना बेवकूफ समझते हो अगर मुझे, तो बुलाया क्यों यहाँ " झुंझला कर कहा मैंने...
बहुत देर तक उसके हंसने की आवाज गूँजती रही... " यू हैव ए प्वायंट, सन्नी "... मुझे अपने इंजीनियरिंग के प्रिय प्रोफेसर सा लगा वह यह कहता हुआ...
" अच्छा यह बताओ कि एक कठिन टास्क है, जिसमें तुम्हारे असफल होने की संभावना सफल होने से कहीं ज्यादा है, क्या चुनौती के तौर पर तुम उसे लोगे ? और असफल होने पर तुम्हारी क्या प्रतिक्रिया होगी ? " पूछा अल्फा ने...
अब हंसने की बारी मेरी थी... " जिस धंधे में तुम हो, क्या उसमें 'टास्क' चुनने की आजादी है ? "...
फिर थोड़ा गंभीर होते हुऐ मैं बोला " टास्क में असफल होने का कोई विकल्प मैं नहीं रखना चाहता, और शायद इसीलिये मुझे तुम लोगों का धंधा पसंद है।"
काफी देर तक चुप रहा अल्फा... फिर बोला " तुम काम के आदमी हो"... उसने हाथ आगे बढ़ाया " हमारी दुनिया में स्वागत है सन्नी "
मैंने उसका हाथ अपने हाथों में थामा " अच्छी कटेगी तुम्हारे साथ, पॉप "

मेरे और उसके कई सालों के साथ के दौरान मैं हमेशा उसके लिये 'सन्नी' रहा और वह मेरे लिये 'पॉप'...


' अल्फा केवल एक ही होता है '


तीन दिन बाद ट्रेनिंग का बुलावा आया...  नौ महीने की ट्रेनिंग... सख्त कहना भी एक तरह का अन्डरस्टेटमेंट होगा उस ट्रेनिंग के लिये... हम में से कोई नहीं जानता था कि शरीर और दिमाग की कष्ट सह पाने की कोई सीमा नहीं होती... आप जब तक जिंदा रहते हैं झेलते ही रहते हैं... और सबसे बड़ी बात यह है कि झेलने के बाद भी मौत को ख्याल में भी नहीं लाते, जिंदा ही रहना चाहते हैं...

फिर छह महीने का अगला हिस्सा था... 'सॉफ्ट स्किल्स' के लिये... यहाँ इन्सान की कमजोरियों-मजबूतियों को पहचानना व उनको अपने मिशन की सफलता के लिये इस्तेमाल करना सिखाया गया... हमें यह भी सिखाया गया कि दिये गये टास्क को पूरा करना है हर हाल में... जिसकी भी वजह से वह पूरा नहीं हो पाता, वह 'रूकावट' है... और रूकावट हटनी ही चाहिये हर हाल में...

मैंने टॉप  किया दोनों कोर्सों में... महज एक हफ्ते का आराम मिला... और ठीक एक हफ्ते के बाद मैं 'एजेन्सी' के दफ्तर में था...

रिसेप्शन पर कार्यरत लड़की को मेरे आने का पहले से ही पता था... बिना मेरे कुछ पूछे " कमरा नं० १८८ ए " बोला उसने और फिर से काम में लग गयी... शायद लैपटॉप पर कुछ गेम खेल रही थी...

कमरे के बाहर पहुँचते ही अंदर से आवाज आई " प्लीज कम इन "... मैं अंदर गया... एक बुजुर्ग सा आदमी था वह, चेहरे से लग रहा था कि बहुत कुछ देखा व झेला है उसने... मैंने मुस्कुराकर उसका अभिवादन किया... पर वह पूर्ववत चेहरा बनाये रहा...  कुछ दिनों में मुझे पता चला कि पूरी एजेंसी उसे 'कनेक्शन' कहती है... और 'कनेक्शन' आपके लिये मुस्कराये, ऐसा तभी होगा जब कोई बहुत बड़ी सफलता पाई हो आपने...

"एजेंसी में तुम्हें ' प्रोफेसर' के नाम से जाना जायेगा" कहा उसने... "अल्फा ने तुमको मध्य एशिया की पेट्रो इकॉनॉमी वाले एक मुल्क में भेजने को कहा है'... कमरा नं० १८९ में तुमको तुम्हारी पहचान से संबंधित सब ब्रीफिंग कर दी जायेगी, एक ऑयल कम्पनी के सीनियर मार्केटिंग मैनेजर बन कर जा रहे हो तुम वहाँ"

"बाकी सब ठीक है पर यह बताओ कि कितने 'अल्फा' हैं एजेंसी में ?" मैंने पूछा...
" अल्फा केवल एक ही होता है, एजेंसी में ही नहीं, हमारी पूरी दुनिया में केवल एक ही अल्फा है " कुछ खीझ कर बोला वह...

मेरी ब्रीफिंग पूरे १५ दिन चली और सोलहवें दिन मैंने अपनी पोस्टिंग वाले देश को फ्लाईट पकड़ ली...



(जारी...)







पाठकों से :-

आप चाहें तो मेरी इस सीरिज को कुछ भी कह सकते हैं, भविष्य फैंटसी, विज्ञान कल्पना या भविष्य कल्पना आदि आदि... पर मैं इसे एक लंबी कहानी ही कहूँगा... कल्पना के घोड़े दौड़ाकर यह कहानी लिखी जायेगी आपके साथ साथ... कोशिश करूँगा कि हर सोमवार को आपको नई किस्त मिले... आपकी प्रतिक्रियायें अहम हैं क्योंकि वही इस कहानी की भविष्य की दिशा तय करेंगी...अगर आप टिप्पणी कर रहे हैं तो थोड़ा कल्पना को जोर दे यह भी बतायें कि अगर आप इसे लिख रहे होते तो अगली किस्त में क्या होता... तथ्यों को सही रखने के लिये हो सकता है कि मैं पहले के लिखे में कुछ बदलाव भी करूँ, जब भी ऐसा होगा, आपको बताया जायेगा...

सोमवार, 22 अक्तूबर 2012

ईश्वर की खोज में.... ' अल्फा '

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पृथ्वीवासी मेरी मानव संतानों,

मैं कमांडर 'अल्फा'  यह संदेश आप सभी के लिये लिख रहा हूँ... मिशन 'ईश्वर की खोज में' अपने अंजाम को पाने में कामयाब रहा... और आज हमारे मिशन पर निकलने के १८५४६ साल बाद हम ईश्वर को पाने में कामयाब रहे...

एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है अब मेरे ऊपर, कि तुम सबको बताऊँ कि क्या क्या और कैसे हुआ इस मिशन के दौरान... कैसे हम ईश्वर तक पहुँचे और हमें वहाँ क्या मिला, क्या दिखा...

यह मेरा ही आइडिया था कि हम ईश्वर तक पहुँचने का एक प्रयास जरूर करें... मुझे अपार खुशी है कि हम कामयाब हुऐ... चलिये अब इस कहानी को शुरूआत से शुरू करते हैं...


अल्फा

'अल्फा' ,  हाँ १८५४६ साल पहले जब हम इस खोज में निकले थे तो हमारी दुनिया मुझे इसी नाम से जानती थी... ६० साल का था तब मैं... मैं आज भी ६० साल का ही हूँ... सही कहूँ तो मैं सन् २०७० से ६० ही साल का हूँ... ऐसा क्यों है इसे समझने के लिये तुमको मेरी पूरी कहानी पढ़नी पड़ेगी...

आज सन् २०७९० चल रहा होगा पृथ्वी में... और पूरी दुनिया में कोई भौगोलिक सीमायें नहीं हैं... ऐसे में इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं तुमको यह न बताऊँ कि मैं किस देश में पैदा हुआ था... बस इतना जानना तुम्हारे लिये काफी है कि मेरी पैदाइश सन २०१० की है...

यह सारा किस्सा शुरू हुआ सन २०३१ की गर्मियों में... तब की दुनिया के सर्वश्रेष्ठ इंजीनियरिंग कॉलेज से डिग्री लेने के बाद मैंने कोई नौकरी करने की बजाय समाज शास्त्र की पढ़ाई करने के लिये एक दूसरे विश्वविद्मालय में दाखिला ले लिया... मेरे पिता उस समय के अमीरों में माने जाते थे इसलिये मुझ पर किसी तरह का कोई दबाव नहीं था... उस समय के और विद्मार्थियों की तरह ही मेरा समय भी पढ़ाई, फुटबॉल-बास्केटबॉल के मैदान और विश्वविद्मालय की कैंटीन के बीच बीतता था... हाँ एक गर्लफ्रेन्ड भी थी मेरी...

कुल मिलाकर मेरी जिंदगी चल रही थी बड़े सुकून से... फिर अचानक वह हुआ जिसने मेरी पूरी दुनिया और दुनिया को देखने का नजरिया ही बदल दिया... 

वह जुलाई का महीना था... हमारे नोटिस बोर्ड पर एक नोटिस लगा देखा मैंने... मेरे देश के 'वाह्य सुरक्षा विभाग' का नोटिस था वह... कैंपस प्लेसमेंट के लिये आने वाली थी उनकी टीम... एक अलग सा अनुभव लेने के लिये मैंने भी अप्लाई कर दिया... 

तीन दिन के बाद इम्तहान हुआ... मुझे आज भी याद है कि मैंने सारे सवाल सही हल किये थे... उसके बाद हमें फिटनेस टेस्ट के लिये बुलाया गया... जिस जगह बुलाया गया वहाँ मेरे देश की सेना के विशिष्ट कमांडो की भी ट्रेनिंग होती थी... पूरे एक सप्ताह तक चला यह टेस्ट... भूख, प्यास, थकान, नींद का अभाव आदि झेलने की हमारे शरीर की क्षमताओं को उनकी पूरी सीमा जाँचा गया वहाँ,,, फिर शुरू हुआ मेडिकल जाँचों का दौर... इसके बाद मनोवैज्ञानिकों की एक पूरी टीम ने हम सबके व्यवहार का आकलन किया पूरे एक महीने तक... आज जब सोचता हूँ तो हंसी आती है कि कैसे उस समय हमारे साथ ही रहते हुऐ कुछ उम्मीदवार असलियत में अपने क्षेत्र के प्रतिष्ठित मनोवैज्ञानिक थे... जो हमारे मन को भांपने के लिये ही हमारे साथ रह रहे थे...

और आखिर वह दिन आया जब मेरा फाइनल इंटरव्यू था... यह इंटरव्यू मेरे जीवन की पूरी दिशा बदल देने वाला था....


(जारी..)





पाठकों से :-

आप चाहें तो मेरी इस सीरिज को कुछ भी कह सकते हैं, भविष्य फैंटसी, विज्ञान कल्पना या भविष्य कल्पना आदि आदि... पर मैं इसे एक लंबी कहानी ही कहूँगा... कल्पना के घोड़े दौड़ाकर यह कहानी लिखी जायेगी आपके साथ साथ... कोशिश करूँगा कि हर सोमवार को आपको नई किस्त मिले... आपकी प्रतिक्रियायें अहम हैं क्योंकि वही इस कहानी की भविष्य की दिशा तय करेंगी...अगर आप टिप्पणी कर रहे हैं तो थोड़ा कल्पना को जोर दे यह भी बतायें कि अगर आप इसे लिख रहे होते तो अगली किस्त में क्या होता... तथ्यों को सही रखने के लिये हो सकता है कि मैं पहले के लिखे में कुछ बदलाव भी करूँ, जब भी ऐसा होगा, आपको बताया जायेगा...





...

मंगलवार, 16 अक्तूबर 2012

काश, तुम्हारे जैसी ही बेटी, दुनिया के हर बाप के नसीब में होती... तुम्हें सलाम !

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वह भी तो
अपने आस पड़ोस की
आम बच्चियों की तरह ही है
कभी किसी बात पर
तो कभी बिना बात के
चहकती-मुस्कराती हुई सी

और हर बच्ची की तरह ही
उसकी भी चाहत है
अपने आस-पास की दुनिया को
जानने और समझने की
अपनी जिंदगी को जीने की

वह अपने इस जीवन पर
अपना अधिकार मानती है
वह पढ़ना भी चाहती है

और इसीलिये नहीं मानती
जाहिल 'रेडियो मुल्ला' का
अंधेरों की ओर धकेलता
हर औरत-बच्ची को
घर में बंद रहने का
मध्य युगीन फरमान

वह उठाती है आवाज
लिख कर, बोल कर
और बहस कर के भी
बताती है वह दुनिया को
हर उपलब्ध मंच पर
पढ़ना चाहती हैं लड़कियाँ
जायज हक है यह उनका

वह जारी रखती है
अपने स्कूल को जाना

और उजाले की इस डोर से
पड़ जाती है खतरे में
हुकूमत अंधेरों की

रवाना कर दिये जाते हैं
दो नामर्द वहशी दरिंदे
छोटी सी उस बुलबुल को
खामोश करने की खातिर







 
 कामयाब रहते हैं वो
उसे नुकसान पहुँचाने में
आज जूझ रही है बुलबुल
अपनी जिंदगी के लिये
लेती है साँस मशीन से
पर उजाले की जीत पर
उसका भरोसा डिगा नहीं

हम सबकी रोशन दुनिया को
निगलने की कोशिशें तो
करते ही रहते हैं अंधेरे
जाने कितनी सदियों से
है उजाला फिर भी बना हुआ
और उम्मीदें हैं कायम भी

क्योंकि अंधेरों के बीचोंबीच
हौसला दिखाता है कोई
जलाने का एक छोटा सा चिराग
मानने से कर इन्कार
अंधेरों-आँधियों के हुक्म को







मलाला युसुफजाई !

काश तुम्हारे जैसी एक बेटी
होती नसीब में
दुनिया के हर बाप के
उस 'रेडियो मुल्ला' के भी


तुम्हें मेरा सलाम !








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जानिये मलाला यसुफजाई के बारे में...

 यहाँ पर   

पढ़िेये उसकी डायरी भी
 
मलाला की डायरी



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शुक्रवार, 5 अक्तूबर 2012

मुझे अपना भाई बनाओगे, डॉक्टर ?

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मोबाईल की घंटी ने मुझे जगाया... दीवाली का अगला दिन था वह... "हलो" ... बॉस थे दूसरी तरफ... " यह केस तुमको दे रहा हूँ शुरूआत से, हाई प्रोफाइल मामला है, साल्व करने के बाद ही कुछ कहना, कोई 'मैस अप' नहीं होना चाहिये।"

मैं जल्दी से तैयार हुआ, फ्रीज से निकाल ठंडा नाश्ता किया... वह अभी तक सो ही रही थी... कल बहुत मस्ती की थी हम दोनों ने, सारे महानगर की आतिशबाजी देखी, फिर देर रात उसका बनाकर लाया खाना खाया... पता नहीं क्यों वह कमिट नहीं होना चाहती अभी जबकि मेरी उम्र निकली जा रही है...

चुपके से दरवाजा खोल मैं बाहर निकल गया।




मरने वाला हॉट शॉट कॉरपोरेट इंजीनियरिंग फर्म का अधिकारी था... जिस बिल्डिंग में वह अकेला रहता था उसी के दूसरे माले पर उसका बड़ा भाई, जो कार्डियोलोजिस्ट था अपनी बीबी और दो बच्चों के साथ रहता था... सुबह दरवाजा न खुलने पर कामवाली ने बड़े भाई के घर से चाबी ले दरवाजा खोला था... लाश बेड पर पसरी हुई थी, केवल एक गोली सीने पर, पिस्टल पास ही पड़ा था... फारेंसिक टीम ने फिंगर प्रिंट उठाये और मैंने फ्लैट का फर्नीचर और घरेलू सामान छोड़ बाकी सभी चीजों को गत्ते के डब्बों में पैक कर आफिस ले जाने को कहा।




मैं पूरे एक हफ्ते उसके सामान व लैपटॉप को खंगालता रहा... फिंगर प्रिंट्स की भी रिपोर्ट आ गयी थी... पूरे घर में या तो उसके फिंगर प्रिंट्स थे या कामवाली के या भाई के परिवार के... पिस्टल पर भी उसी के फिंगर प्रिन्ट्स थे पर ट्रिगर पर कोई प्रिन्ट नहीं था।




वह क्लीनिक में मरीज देख रहा था... " कैसे आये आफिसर ?"... " आपको कातिल का कुछ अंदाजा है?"... "यह अंदाजा लगाना तो तुम्हारा काम है"... कंधे उचकाये उसने... मैं एक फीकी हंसी हंसा और बाहर आ गया।




इस बार मैंने उसकी कार के आगे अपनी कार अड़ा दी... " डॉक्टर, मुझे लगता है कि तुमने ही अपने भाई को मारा है... मेरे पास आज सबूत नहीं है पर याद रखना कातिल कभी बच नहीं सकता कानून से "... उसका चेहरा उतर सा गया... " अपना कार्ड दो, मैं शाम को तुमसे मिलने आउंगा, आफिसर!"




मैं अकेले बैठा था टीवी के सामने, हाथ में जिन का गिलास, गिलास की तली में पड़े ' आनियन इन ब्राईन' से उठते छोटे छोटे बुलबुलों को देखता... तभी बैल बजी... वही था...

"लोगे कुछ डॉक्टर ?"... "शुक्रिया, मैं पीना छोड़ चुका हूँ"... मैंने एक ग्लास में आरेंज जूस डाल उसे पकड़ाया...

"आफिसर, तुम मुझे काबिल आदमी लगते हो, उसके पास से कुछ बरामद हुआ क्या ?, क्या जानते हो उसके बारे में ?"

अब वह मुद्दे पर आ गया था, मैंने एक गहरी साँस ली... " बम फोड़ने वाला था तुम्हारा भाई, सादे सामानों से बने पर बेहद खूबसूरत डिजाईन के बम होते वो, तभी फटते जब वह चाहता, जगहें भी उसने तलाश लीं थी"

उसके चेहरे से मानो खून सा उतर गया... वह उठा, तकरीबन आधा गिलास ब्रान्डी से भरा और हलक से नीचे उतार लिया...

" एक डील करोगे आफिसर, मैं तुमको कातिल दे दूंगा पर तुम यह बम वाली बात किसी पर भी जाहिर न करना "

अब वह मेरी टेरीटरी में था... ऐसे सैकड़ों डील हम करते और फिर उनसे मुकर जाते हैं... क्या करें, काम ही ऐसा है... मैंने हाथ बढ़ाया " डील !"

" तुम्हारी नेम प्लेट से जाहिर होता है तुम फौज में थे ना आफिसर... बब्बा भी फौज में थे... सिपाही... एक गश्त के दौरान पहाड़ से गिरे, दाहिने पैर की दो हड्डियाँ ऐसी टूटी कि कभी सीधी नहीं जुड़ पायी... साढ़े चार साल की नौकरी के बाद ही चौथायी पेंशन के साथ घर आना पड़ा उनको... फिर चाय का होटल खोला उन्होंने... सुबह चार बजे से माई कोयले सुलगा भट्टी जलाती और बब्बा गाँव निकल पड़ते ताजा दूध लेने... खुद को मिटा कर हम दोनों को बनाया उन्होंने... मैं डॉक्टर बना और वह ईंजीनियर... वह मुझे 'टैबलेट' कहता और मैं उसे 'नटबोल्ट'... उसने शादी नहीं की तमाम कहने पर भी... कुछ समय से बदल गया था वह... हर समय प्रार्थना में लगा रहता, ऊपर वाले को याद करता रहता... बदले की बातें भी करने लगा था वह... मुझे अच्छा नहीं लगता था यह... मुझे बब्बा की याद आती थी, पंद्रह अगस्त-छब्बीस जनवरी को झंडे को सीना तान नम आंखों से सलामी देने वाले बब्बा... उन दोनों दिन हमारी दुकान में हर किसी को एक कप चाय और दो बूंदी के लड्डू खिलाये जाते थे सारा दिन बिना पैसा लिये... बब्बा इसे अपना सबसे बड़ा त्यौहार मानते थे... दीवाली के दिन फिर हममें बहस हुई पर वह नहीं माना... मैंने फैसला कर लिया, शाम वह घर आया खाना खाने तो मैंने उस से कहा कि मैं भी उसके साथ हूँ... चारों तरफ पटाखे छूट रहे थे... मैं उसके फ्लैट पर पहुंचा, दस्ताने पहने था मैं... वह टीवी देख रहा था..."क्या बात, टैबलेट, ठन्ड इतनी तो नहीं है।"... "मुझे हल्का बुखार सा है"... "डाक्टर को बुखार"... उसने मजाक उड़ाया..." 'नटबोल्ट' अब तो मैं तेरे साथ हूँ, कुछ हो गया तो अपनी हिफाजत का भी सोचना होगा, वह पिस्टल तो दिखा जो तूने पिछले महीने खरीदी है"... वह उठा, दराज से पिस्टल निकाली, मैगजीन लगायी और बड़ी शान से बताने लगा उसके बारे मैं... मैंने पिस्टल हाथ में ली, अनलाक किया और निशाना ले एक गोली दाग दी, ठीक दिल के ऊपर... धड़कता दिल धीरे धीरे खाली हुआ... उसकी आँखें खुली की खुली रह गयीं... मैंने उसके माथे को चूमा... आँखों को बन्द किया... " मुझे माफ करना 'नटबोल्ट'... पर मैं बब्बा को इस उम्र में तिल तिल कर मरते नहीं देख सकता"... और मैं चाबी लगा बाहर निकल गया"...

एक गहरी साँस ले वह रूक गया... काफी देर सिर झुकाये न जाने क्या सोचता सा रहा... फिर मेरी आँखों में आँखें डाल बोला बेहद धीमी आवाज में... 

"मुझे अरेस्ट कर लो आफिसर... कह देना मैंने ईर्ष्यावश उसे मारा... यह बम वाला एंगल निकाल दो... नहीं तो बब्बा फिर भी जीते जी मर जायेंगे ।"

मुझे अचानक जाम में मजा आना बन्द हो गया...

"मैं आता हूँ डॉक्टर, एक घंटे तक मेरा यहीं इंतजार करना...  मुझे कुछ बहुत जरूरी काम निपटाना है ।"





मैं आफिस गया, फाइल निकाली... आखिरी पेज पर लिखा...  

No headway made, There are no viable clues to proceed any further, Recommended closure of the case. ...

फिर मैंने केस से संबंधित बरामद सामान का गत्ते का कार्टन उठाया और उसे कार की डिक्की में लाद लिया...




ईंट भट्ठे में कार घुसते ही शमशाद भाई दौड़ कर पास आये... पहले भी कई बार वहाँ जा चुका था मैं... वह मेरा मकसद जानते थे...मैंने कार्टन उठाया... वह आगे आगे चले... हम भट्ठी के ऊपर चढ़े... लड़के ने दहकती भट्टी का ढक्कन सरिये से उठाया... मैंने कार्टन अन्दर डाल दिया और उसके जलकर राख होने तक वहीं खड़ा रहा...





वह सोफा पर बैठा हुआ था... पस्त सा... मेरे घुसते ही उसने दोनों हाथ आगे बढ़ाये... "हथकड़ी लगा दो आफिसर" ...

मैंने आगे बढ़ उसे सीने में भींच लिया...

बड़ी हिम्मत लगी यह कहने में... " मुझे अपना भाई बनाओगे, डॉक्टर ?...

वह बच्चों की तरह सुबक सुबक कर रो रहा था, मेरे सीने से चिपटकर...  

मेरी आँखें भी भर आई थीं...

ऐसा मेरी जिंदगी में पहली बार हो रहा था...









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