रविवार, 18 दिसंबर 2011

'जोकपाल' बनकर रहेगा 'लोकपाल'...क्या भ्रष्टाचार की भी कोई जाति, वर्ग, धर्म या लिंग होता है ?... अब आप मौन क्यों हैं अन्ना ?

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सच कहूँ तो 'लोकपाल' या 'जनलोकपाल' की माँग को लेकर अन्ना व उनकी टीम द्वारा चलाये जा रहे इस आंदोलन का फैन तो मैं कभी भी नहीं रहा... क्योंकि मेरा मानना है कि सर्वत्र व्याप्त जो भ्रष्टाचार का बोलबाला आज हम देख रहे हैं उसकी जड़ें बहुत गहरी व हमारे सामूहिक मानस से जुड़ी हैं... आज हम लोगों के बीच भ्रष्टाचार व धन कमाने व जीवन में आगे बढ़ने के नाजायज तरीकों के लिये एक तरह की सहज सामाजिक स्वीकार्यता सी विकसित हो गयी है... 'जो सफल है वही सही व अनुकरणीय है' एक पूरी की पूरी पीढ़ी का यही जीवन मंत्र हो गया है... अब ऐसे  दौर में हमें असली नायक तो मिलने से रहे... जबकि हम युगों-युगों से अवतारों-नायकों-मसीहाओं की बाट जोहता समाज रहे हैं... तो एक बहुत बड़ी डिमांड पैदा हो गयी हमारे देश में नायकों की, नायक थे नहीं, पर पब्लिक में उनकी माँग बनी हुई थी... फिर अपना हिन्दुस्तानी जुगाड़ काम आया... छोटे-छोटे व्यक्तित्वों के बड़े-बड़े कट-आउट बनाये गये बाकायदा उनके चेहरे के चारों ओर आभामंडल पेन्ट किये हुऐ, चौराहों पर लगाये गये, रात-दिन अखबारों से, टीवी चैनलों से, पंडालों से, जलसों-रैलियों से उन व्यक्तित्वों की विशालता-विराटता-महानता के बखान किये गये... और मिल गयी हमको धर्म के, अध्यात्म के, योग के, जीवन दर्शन के, समाज सेवा-सुधार के, राजनीति के, खेल के, सिनेमा के, आदि-आदि के १५१ फीट ऊँचे कट आउट नायकों-महानायकों की एक लंबी लिस्ट...

आज के समय के सबसे चर्चित नायक हैं अन्ना व उनकी टीम-अन्ना... और भ्रष्टाचार को इस महादेश से उखाड़ फेंक फिर से रामराज्य (?)  बनाने के लिये कानूनन बने जिस अवतार के अवतरण का सपना दिखाती है यह टीम... वह अवतार है 'जनलोकपाल'... इसमें कोई शक नहीं कि हमारे विशाल मध्यवर्ग का एक तबका अपनी अपनी मोमबत्तियाँ, टीशर्टें, टोपियाँ, धूप के चश्मे, लहराते तिरंगे, ट्वीट्स, फेसबुक मैसेजेज् आदि आदि के साथ इस अवतार को जमीं पर लाने के लिये, और वह भी संसद के इसी सत्र में, कृतसंकल्प भी है... प्रयोग के तौर पर इस 'जनलोकपाल-अवतार' के करतब-करिश्मे देखने में भी कोई हर्ज  भी तो नहीं है आखिर...

नौ सदस्यीय इस प्रस्तावित लोकपाल का सदस्य बनने के लिये जो योग्यतायें अनिवार्य रूप से किसी में होनी चाहिये वह है... ईमानदारी, निष्पक्षता, निर्भीकता, भ्रष्टों को उनके अंजाम तक पहुंचाने का उत्साह-संकल्प तथा हमारे तंत्र व नियमों की समझ व उसी तंत्र से भ्रष्टाचार निवारण का कार्य लेने का अनुभव... ऐसे में जब यह खबर आती है कि लोकपाल में आरक्षण की तैयारी है  और अपनी टीम अन्ना को इस पर कोई आपत्ति नहीं है ... लोकपाल में आरक्षण के पैरोकारों द्वारा नौ सदस्यीय लोकपाल पैनल में इस आरक्षण की माँग के पीछे समानता या रोजगार के अवसर जैसा कोई तर्क नहीं है... वजह सिर्फ इतनी है कि यदि नौ सदस्यीय पैनल में उनके वर्ग-जाति-धर्म के भी सदस्य होंगे तो आरोपित होने पर उनके हितों का भी ख्याल रखा जायेगा... उनको भय है कि आरक्षण न होने पर जातिगत पूर्वाग्रहों के चलते किसी जाति विशेष के आरोपियों के प्रति अन्याय हो सकता है... यहाँ पर यह भी ध्यान रहे कि भारत की उच्च न्यायपालिका में आरक्षण लागू नहीं है, व कभी भी कोई मुवक्किल यह कहता नहीं दिखता कि मेरा मुकदमा मेरी ही जाति के न्यायाधीश द्वारा सुना जाये... हमारी किसी भी अन्य संवैधानिक संस्था जैसे चुनाव आयोग, केन्द्रीय सतर्कता आयोग, महालेखाकार-नियंत्रक ( CAG ) में भी आरक्षण नहीं है...

ऐसे में जब कोई यहाँ पर यह कहता है कि...

Corruption is, ironically, the one realm where India’s caste identities, which otherwise assert themselves forcefully, vanish miraculously. The pantheon of our leaders who face grave corruption charges shows that corruption is the one area where caste and communal divisions don’t count: it is the ultimate equal-opportunity enterprise.

और यह यह पूछता भी है कि...

So, if corruption can be caste-blind, and if corruption can be truly secular, why can’t the Lokpal too be?


तो आप मौन क्यों हैं अन्ना ?

आपकी यह चुप्पी बहुत असहज करती है... क्यों नहीं आप जंतर मंतर से गर्जना करते कि लोकपाल वही बने जो चयन के समय उपलब्ध सभी उम्मीदवारों में से लोकपाल बनने के मानकों के आधार पर  सर्वाधिक योग्य हो... इससे कोई फर्क किसी को नहीं पड़ना चाहिये कि इस आधार पर चयन होने के बाद नौ के नौ सदस्य महिला ही बन जायें या मुस्लिम या ईसाई या पिछड़े या दलित या सिख या पारसी या ब्राह्मण ही...

बोलिये अन्ना, भ्रष्टाचार को खत्म करने की राह की सबसे पहली सीढ़ी है सच को कहने का साहस दिखाना...





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10 टिप्‍पणियां:

  1. Nice post .

    http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/main/tags/%27dharma%27

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  2. जाने कब सौभाग्य लिखा हो, देश कभी भी खुश होगा क्या?

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  3. एक बढ़िया पोस्ट के लिए आभार प्रवीण भाई ! शुभकामनायें आपको !

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  4. आप पूरे कांग्रेसी हैं और मैं अन्ना भक्त -पूर्वाग्रहियों में संवाद मुश्किल है !:)

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  5. प्रधानमंत्री का पद भी अब आरक्षित कर दिया जाय कि 2014 से 2019 यह जाति, फिर 2019 से 2024 यह जाति, अगर सब सामान्य रहा तब!

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  6. :-)

    वैसे आजकल एक और आरक्षण बहस का मुद्दा बना हुआ... वोह है मुस्लिम आरक्षण...

    अच्छा है....

    इतना आरक्षण दो कि एक दिन यह आरक्षण ही ना रहे... हा हा हा...

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  7. अरविन्द जी ,
    'वे' पूरे कांग्रेसी होते तो आरक्षण का विरोध क्यों करते :)

    टीप ,
    चूंकि अन्ना एंड कम्पनी के काम के तौर तरीकों से सहमत नहीं हूं / भरोसा भी नहीं है इसलिए उनसे कोई अपेक्षा भी नहीं कर रहा हूं !

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  8. आपको यह प्रश्न अन्ना से नहीं , आरक्षण की मांग कर रहे प्रबुद्ध नेताओं से करने चाहिए जिनकी चाहत अन्ना और उनके मुद्दों को हमेशा के लिए समाप्त कर देने या स्वयं झटक लेने की है !

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  9. बड़ी चिरकुट है भारत की पॉलिटी! हर मुद्दे का मण्डलीकरण कर भुरता बनाने में माहिर! :-(

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