रविवार, 11 दिसंबर 2011

द ग्रेट इंडियन लोकपाल तमाशा !!! एक ढोंग का फूहड़ प्रदर्शन है यह !!!

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कल स्टार न्यूज का 'एक्सक्लूसिव' देख रहा था... किसी बड़ी गाड़ी में अन्ना हजारे ड्राइवर के साथ वाली सीट पर बैठे हुऐ थे व पीछे की सीट पर रिपोर्टर व उसके बगल में कैमरामैन... साक्षात्कार लोकपाल के मुद्दे पर चल रहे उनके आंदोलन को लेकर हो रहा था... पर एक बात जो खली वह यह कि कई कई बार अन्ना ने यह कहा कि मेरा पूरा जीवन देश व गरीब के लिये समर्पित रहा है व आगे भी रहेगा... अन्ना को बार बार इस बात को प्रमुखता से बताने की क्या जरूरत आन पड़ी यह समझ नहीं आया...

कुल मिलाकर मामला अब केवल चार बातों पर अटका पड़ा है...

पहली- ग्रुप 'सी' व 'डी' के कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में लेना... ग्रुप 'सी' के कर्मचारियों की संख्या ५७ लाख बताई जा रही है... और लोकपाल नौ सदस्यीय प्रस्तावित है... ग्रुप 'सी' के कर्मचारियों के पास फैसले लेने के अधिकार भी नहीं होते और सभी मामलों में उनका एक सुपीरियर अधिकारी उसी बिल्डिंग में उन पर नियंत्रण रखता है... अगर इनको लोकपाल के दायरे में शामिल किया गया और ' मेरा भारत महान- सौ में से निन्यानवे बेईमान' की तर्ज पर अगर इनमें से दो प्रतिशत की शिकायतें भी हर साल की गई तो एक लाख चौदह हजार शिकायतों को नौ लोग निपटाने में न जाने कितने दशक लगायेंगे... पर समझ यह नहीं आता कि सरकार क्यों अड़ी है, ले ले दायरे में... बाद की बाद देखी जायेगी... अगले साल नौ हजार सदस्यों वाले 'सर्वजनलोकपाल' के लिये आंदोलन होगा... यह कोर कमेटी बेरोजगार तो नहीं रहने वाली...

दूसरा- 'सिटिजन चार्टर' ... यह एक छोटी सी बात है हर कार्यालय के बाहर उसमें होने वाले काम, कार्यरत लोगों के नाम, पते, फोन नंबर, उनके दायित्व, उनके नियंत्रक अधिकारी के नाम, पते, फोन नंबर तथा किसी असुविधा की स्थिति में किससे शिकायत की जाये, भ्रष्टाचार की किससे शिकायत हो आदि आदि यह लिखा होता है... लोकपाल के दायरे में इसका क्रियान्वयन लाने में कोई बुराई नहीं... पर फिर वही शंका... केवल नौ लोकपाल कहाँ कहाँ देखेंगे इसे... सरकार न जाने क्यों अड़ी है इस पर...

तीसरा- 'प्रधानमंत्री का लोकपाल के दायरे में आना'... अपने आज के प्रधानमंत्री स्वयं इसके लिये राजी हैं... पर क्या इस विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र इस महादेश को अपने ही प्रधानमंत्री पर शक करना चाहिये... यह मानने का क्या आधार है कि हमें लोकपाल के नौ सदस्य तो एकदम ईमानदार मिलेंगे पर प्रधानमंत्री बेईमान... क्या ऐसा कोई प्रधानमंत्री संसद का सामना कर पायेगा जिसके खिलाफ किसी झूठी शिकायत पर ही लोकपाल की जाँच चल रही है... आपने अपनी न्यायिक सत्ता के दर्प में रेलवे स्टेशनों पर हंगामा मचाते न्यायाधीशों के किस्से तो सुने ही होंगे... अगर नौ में से कोई लोकपाल भी ऐसे ही बौरा गया तो क्या वह संसदीय लोकतंत्र को अस्थिर नहीं कर देगा ?... पर जंतर-मंतर पर लहराते तिरंगों व टोपी-बैनर-टीशर्ट धारी समर्थकों की भीड़ के बीच इस चिंता पर ध्यान देने की जहमत उठाती नहीं दिखती टीम अन्ना... भीड़ कुछ भी कहे पर संसद इस पर सोच समझ कर ही फैसला लेगी, इसका मुझे पूरा यकीन है...

चौथा- 'सीबीआई' का लोकपाल के आधीन आना... इसमें शक नहीं कि अब तक की सभी सरकारें अपने राजनीतिक सहयोगियों व विरोधियों पर दबाव डालने के लिये सीबीआई का रणनीतिक इस्तेमाल करती रही हैं... भ्रष्टाचार के जो मामले लोकपाल सीबीआई को जाँच करने को सौंपे उन मामलों में लोकपाल को मॉनिटरिंग तथा संबंधित अधिकारियों को नियंत्रित करने का अधिकार होना ही चाहिये... आशा है कि इस मसले पर सर्वसहमति हो ही जायेगी...

देर सबेर लोकपाल आ ही जायेगा... पर क्या इससे भ्रष्टाचार छूमंतर हो जायेगा... भ्रष्टाचार को, कर चोरी को, धन कमाने के नाजायज तरीकों को जो एक सहज सामाजिक स्वीकार्यता आज मिली हुई है, क्या हम लोगों के इस रूख में बदलाव आयेगा कभी...

कितना अच्छा होता कि अन्ना अपनी सभा में हर आने वालों से कहते कि घर जाते हुऐ हाथ में एक कोयले का टुकड़ा रखो... और घर जाते हुऐ रास्ते में मिलने वाले हर भ्रष्ट, करचोर, नाजायज कमाई करने वाले शख्स के मकान की बाहरी दीवार पर काले रंग का एक क्रॉस बनाते जाना... बहुत सारे मकानों की दीवारें काली होतीं... कईयों को पहला निशान अपने ही मकान की बाहरी दीवार पर भी लगाना होता... पर ईमानदारी से काली की गई यह दीवारें एक नये उजाले का आगाज होतीं... वह उजाला जो कोई भी जोकपाल-लोकपाल या जनलोकपाल नहीं ला सकता... पर क्या ७४ साल की उम्र में इस तरह की अपील करने का रिस्क उठा सकते हैं अन्ना... मुझे नहीं लगता...

इस तरह के आंदोलन कितने ही चलें... हम बदलने वाले नहीं... क्योंकि यह बदलाव हमारे दिल से नहीं उपजा है... यह केवल मुंह दिखाई-फर्जअदाई का ढोंग रचा जा रहा है... बहरहाल हर चमत्कार को नमस्कार करने वाले अपने देश की परंपरा को सम्मान देते हुऐ इस ढोंग को भी नमस्कार करिये !








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12 टिप्‍पणियां:

  1. बात तो आपने सोलह आने सही कही है. सबसे बड़ी बात तो ये है कि भ्रष्टाचार को हर कोई मिटाना चाहता है पर अपने आप को बदलना कोई नही चाहता. बेहतरीन आलेख.

    आभार.

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  2. अगले साल नौ हजार सदस्यों वाले 'सर्वजनलोकपाल' के लिये आंदोलन होगा... यह कोर कमेटी बेरोजगार तो नहीं रहने वाली...

    क्योंकि यह बदलाव हमारे दिल से नहीं उपजा है... यह केवल मुंह दिखाई-फर्जअदाई का ढोंग रचा जा रहा है... बहरहाल हर चमत्कार को नमस्कार करने वाले अपने देश की परंपरा को सम्मान देते हुऐ इस ढोंग को भी नमस्कार करिये !

    सत्य कथन।

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  3. आज पूरा पक चुके यही सुनते सुनते ... :(

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  4. कुछ दिनों में यह सब देखकर भ्रष्टाचार ही पक कर चला जायेगा।

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  5. मैने इस मूद्दे पर कुछ नही कहना क्योंकि कहीं पढा था कि

    "यहाँ (भारत भूमी) पर ज्ञान ना बांटे, यहाँ पर सब ज्ञानी है!"

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  6. kitna pakata hai anna. Mera dimag kharab ho gaya . Wo hi pakau bate bar bar sunata hai.

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  9. धन कमाने के नाजायज तरीकों को जो एक सहज सामाजिक स्वीकार्यता आज मिली हुई है, क्या हम लोगों के इस रूख में बदलाव आयेगा कभी...
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    शायद आये। ज्यादा होप नहीं है। पर निराशा से कहाँ काम चलेगा!

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  10. कांग्रेस सरकार की नाकामयाबियों और भ्रष्टाचार से त्रस्त भारतीय जनता जो कि हमेशा चमत्कार की आशा रखती है, को अन्ना के रूप में नया हीरो मिल गया और हमेशा की तरह बिना देखे-समझे बस चल पड़े भेड़-चाल. हालाँकि टीम अन्ना की बहुत से बातें सही हैं, लेकिन बहुत से बातें गलत भी है... और सबसे ज्यादा गलत है अपने आप को महा ज्ञानी और पुरे भारत को बेवक़ूफ़ समझने की सोच...

    और अगर कोई उनके विचार से सहमत ना हो तो वोह देश का गद्दार समझा जाने लगा है.

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  11. praveen ji read my views also in these posts
    http://allinrandommind.blogspot.com/2011/08/are-laws-solution-for-problems.html
    http://allinrandommind.blogspot.com/2011/12/janlokpal-bill-critic.html
    http://allinrandommind.blogspot.com/2011/12/india-idolism-and-team-anna.html
    http://allinrandommind.blogspot.com/2011/04/anna-hazare-hero.html

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  12. उन विकसित देशों में भ्रष्टाचार कम है जहां लोकतंत्र भी है. लोकतंत्र तो हमारे यहां है बस विकसित होने में समय लगेगा. आज के विकसित देशों ने भी वो सब कल देखा है जो आज हम देख रहे हैं.

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