सोमवार, 26 दिसंबर 2011

Ohh, Mouth Watering !!! आइये असली खेल भी देखा जाये अब...

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बॉर्डर गावस्कर ट्रॉफी
जहाँ मैं रह रहा हूँ आजकल, वहाँ एक तो ठन्ड बहुत है ऊपर से कोहरे की मार... दोपहर बारह बजे तक भी रोशनी नहीं आ पाती पूरी... एक अजीब सी मुर्दनी छायी रहती है दिल-ओ-दिमाग पर... टी वी भी चीख-चीख कर 'लोकपाल' के अवतरण से संबंधित विवादों को ही हवा देता रहता है... ऐसे में एक बदलाव सा लेकर शुरू हो रहा है टीम इंडिया का 'टूर डाउन अंडर''... एक अरसे से आस्ट्रेलियन परंपरा रही है मेलबर्न में'बॉक्सिंग डे' के दिन विजिटिंग टीम के साथ टेस्ट मैच खेलने की... 'बॉक्सिंग डे' की परंपरा के अनुसार ही रंग बिरंगे कपड़े पहने जम कर खाने और जम कर पीने में भी मगन आस्ट्रेलियाई समर्थकों का सैलाब उमड़ पड़ता है मेलबर्न के मैदान पर... और ज्यादातर मामलों में आस्ट्रेलियाई टीम अपने समर्थकों को निराश भी नहीं करती...

इस बार 'बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी' के लिये खेले जा रहे चार मैचों की सीरिज के पहले टेस्ट की शुरूआत होगी 'बॉक्सिंग डे' के रोज... इस बार मामला कुछ अलग सा है... बहुत सालों में पहली बार आस्ट्रेलियाई टीम कमजोर मानी जा रही है अपने प्रतिद्व्न्दी के मुकाबले में... और माना जा रहा है कि भारतीय टीम इस बार जीत कर ही लौटेगी... पर... अगर क्रिकेट इतना पूर्वानुमेय व निश्चित होता तो क्या इसके इतने दीवाने होते ?... इसे ' गेम ऑफ ग्लोरियस अनसर्टेनिटीज' यों ही नहीं कहा जाता...

एक विशुद्ध क्रिकेट प्रेमी के लिये 'टेस्ट क्रिकेट' से बेहतर कुछ भी नहीं... किसी भी खिलाड़ी या टीम के लिये टेस्ट एक 'अल्टीमेट टैस्ट' की तरह है... क्रिकेट अन्य खेलों की तरह महज एक खेल नहीं है, यहाँ बहुत से कारक खेल पर असर डालते हैं... मिसाल के तौर पर आसमान में बादलों का घिरना या चटख धूप का निकलना, मैदान पर बह रही हवा की रफ्तार व दिशा, पिच पर घास का रहना या काटा जाना, पिच से बॉलर को मिलने वाली बाउंस, आउट फील्ड की तेजी या धीमापन, सीमा रेखा की पिच से दूरी, दर्शकों का समर्थन या हूटिंग, गेंद का नया या पुराना होना, पिच की मिट्टी का दरकना या बंधे रहना, बल्लेबाज की मानसिक दॄढ़ता, गेंदबाज की चतुराई, अंपायरिंग का स्तर आदि आदि बहुत सी चीजें हैं जिनके कारण इस खेल के बारे में निश्चितता से कभी कुछ नहीं कहा जा सकता... अगर यह सीरिज साथ-साथ देखते रहे आप और मैं तो काफी कुछ और बातें होंगी इसके बारे में...

अब आते हैं पहले मैच पर...

आस्ट्रेलिया ने प्लेइंग इलेवन की घोषणा कर दी है और टीम है...

1-David Warner, 2-Ed Cowan, 3-Shaun Marsh, 4-Ricky Ponting, 5-Michael Clarke (capt), 6-Michael Hussey, 7-Brad Haddin (wk), 8-Peter Siddle, 9-James Pattinson, 10-Nathan Lyon, 11-Ben Hilfenhaus. 


आस्ट्रेलिया की इस टीम में दोनों ओपनर अपेक्षाकृत नये हैं... डेविड वार्नर उन चुनिंदा खिलाड़ियों में हैं जिन्होंने २०-२० से वनडे टीम और फिर टेस्ट टीम का सफर तय किया, गेंद पर ताकत से प्रहार करते हैं पर गेंदबाज के लिये एक उम्मीद हमेशा रहती है उनकी बैटिंग के दौरान... रिकी पोंटिंग व माइकल हसी खराब फॉर्म से जूझ रहे हैं व दोनों के लिये ही अगले दो टेस्ट बहुत अहम रहेंगे... खराब प्रदर्शन दोनों का ही कैरियर खत्म कर सकता है... कुल मिलाकर आस्ट्रेलियाई बल्लेबाजी बहुत प्रभावी नजर नहीं आती... अपना स्थान बचाये रखने के लिये पड़ते दबाव का काफी असर पोंटिंग व हसी के खेल की स्वाभाविक लय पर पड़ेगा, अब यह भारतीय गेंदबाजों के ऊपर है कि वह इस कमजोरी का कैसे दोहन करते हैं... शॉन मार्श व क्लार्क दोनों ही औसत खिलाड़ियों में ही कहे जायेंगे...

गेंदबाजी में दाहिने हाथ के ऑफ स्पिनर नाथन लियोन शायद ही कुछ असर छोड़ पायें... हिलफेन्हॉस लंबे विकेट टू विकेट स्पैल डालने के लिये जाने जाते हैं यदि दूसरे छोर से विकेट निकल रहे हों तो वह अपने छोर से रन रोक कर दबाव बढ़ाने में सक्षम हैं... जेम्स पैटिन्सन और पीटर सिडल के हाथ इस बार अपनी टीम की गेंदबाजी की कमान है... पैटिन्सन तेज हैं अच्छा उछाल पाते हैं... बदन पर आती तेज गेंद भारतीय कमजोरी है और वे बहुत अच्छी 'पर्फ्यूम बॉल' फेंकते हैं... 'पर्फ्यूम' बॉल बोले तो वह बॉल जो बल्लेबाज के चेहरे के पास से इतनी तेजी से निकले कि उसे चमड़े की गंध महसूस हो बस्स, बाकी ज्यादा कुछ करने-सोचने की स्थिति न रहे उसकी...पीटर सिडल मेहनती हैं और अच्छी गति से गेंद दोनों ओर स्विंग कराते हैं... 



भारत की टीम की घोषणा टॉस से पहले ही होगी पर संभावित टीम है...

1-Virender Sehwag, 2-Gautam Gambhir, 3-Rahul Dravid, 4-Sachin Tendulkar, 5-Virat Kohli, 6-VVS Laxman, 7-MS Dhoni (capt, wk), 8-R Ashwin, 9-Zaheer Khan, 10-Ishant Sharma, 11-Umesh Yadav. 

पहले भारत की गेंदबाजी की बात कर लें... अश्विन एक्युरेट हैं, एक छोर को बाँध सकते हैं, दूसरी टीम यदि दबाव में हो तो विकेट भी निकालेंगे... पर भारतीय आक्रमण का सबसे मारक अस्त्र अश्विन अभी इस सीरिज में नहीं बन सकते... उमेश यादव तेज हैं व उन्हें तेज गेंद डालने पर ही अभी अपना ध्यान लगाना चाहिये... पुछल्ले बल्लेबाजों को उनकी तेजी सस्ते में निबटा सकती है... सबसे बड़ा प्रश्न चिन्ह है जहीर खान व इंशात शर्मा, दोनों ही चोटों के बाद वापसी कर रहे हैं व दोनों ने ही मैच फिटनेस अभी तक साबित नहीं की है... बहुत बड़ा जुआ है इन दोनों पर दाँव लगाना... घुड़दौड़ में अक्सर कहा जाता है कि ' रेस में घोड़ा ही दौड़ता और जीतता है न कि रेपुटेशन'... यही बात क्रिकेट पर भी लागू होती है, इन दोनों के पहले किये गये प्रदर्शन के आधार पर ही चयनकर्ताओं ने इन पर दाँव लगाया है... हो सकता है चयनकर्ता सही साबित हों... पर मुझे अभी भी यह लगता है कि शुरूआत की एक-दो पारियों में इन दोनों की खूब ठुकाई होगी...

बल्लेबाजी में सहवाग अच्छे फॉर्म व टच में हैं... अगर दौरे की शुरूआत की दो तीन पारियों में वे चल निकले... तो उनके द्वारा लगाई पिटाई के जख्मों से उबर नहीं पायेगा यह आस्ट्रेलियाई आक्रमण... गंभीर बड़े स्टेज का खिलाड़ी है और इस दौरे में उनके अच्छा करने की उम्मीद है... भारत को यदि अच्छा करना है तो द्रविड़ और लक्ष्मण  भारतीय पारी को बाँधे रखने का रोल निभाना होगा... लक्ष्मण की एक महारत पुछल्लो के साथ लंबी साझेदारियाँ निभाने की है, वह इस दौरे पर काम आयेगी... धोनी काफी सकारात्मक दिख व बोल रहे हैं यह खिलाड़ी अच्छा करेगा इस दौरे पर... मैं भी सभी की तरह मना रहा हूँ कि सचिन तेंदुलकर अपना 'अंतर्राष्ट्रीय सैकड़ों का सैकड़ा' जल्दी से जल्दी पूरा करें... एक फैन के नाते उनसे यह अपील भी है कि 'सैकड़ों का सैकड़ा' पूरा करते ही वह अपना बल्ला टाँग दें... मेरी इस अपील की तीन वजहें हैं... पहली तो यह कि इस रिकॉर्ड को पाने के बाद सचिन के पास पाने के लिये कुछ और नहीं रह जाता... दूसरी यह कि आजकल सचिन के खेल में वह पहले सी बात नहीं रही, अपेक्षाओं के बोझ तले दबे, रनों के लिये संघर्ष करते व दब कर खेलते सचिन को देखते हुऐ मन में हूक सी उठती है, जिसने भी अपने शिखर पर सचिन का खेल देखा होगा वह इस फर्क को समझ सकता है, मैं अपने मन में सचिन की वही छवि बरकरार रखना चाहता हूँ, सचिन अब उस स्तर पर है जहाँ पर उनके बनाये रनों की संख्या के बजाय रन बनाने का तरीका ज्यादा अहम है... तीसरी और सबसे अहम बात है कि ३८ बरस के सचिन अब मध्यक्रम की नयी पौध का रास्ता रोक रहे हैं जो उन्हें नहीं करना चाहिये... भारतीय की जगह सचिन यदि इंग्लिश या आस्ट्रेलियाई होते तो शायद काफी पहले ही सन्यास ले लिये होते...

इस बार किसके हाथ आयेगी ट्रॉफी?

अब बात आती है पहले मैच के परिणाम के बारे में कयास लगाने की... तो मेरी राय में भले ही बहुत थोड़ा सा ही सही पर आस्ट्रेलिया का पलड़ा भारी लग रहा है मुझे तो...

वैसे मुझसे ज्यादा खुश भी शायद कोई नहीं होगा अपने ही गलत होने पर ... :)

अब सोया जाये, सुबह उठना जो है मैच देखने... :)









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रविवार, 18 दिसंबर 2011

'जोकपाल' बनकर रहेगा 'लोकपाल'...क्या भ्रष्टाचार की भी कोई जाति, वर्ग, धर्म या लिंग होता है ?... अब आप मौन क्यों हैं अन्ना ?

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सच कहूँ तो 'लोकपाल' या 'जनलोकपाल' की माँग को लेकर अन्ना व उनकी टीम द्वारा चलाये जा रहे इस आंदोलन का फैन तो मैं कभी भी नहीं रहा... क्योंकि मेरा मानना है कि सर्वत्र व्याप्त जो भ्रष्टाचार का बोलबाला आज हम देख रहे हैं उसकी जड़ें बहुत गहरी व हमारे सामूहिक मानस से जुड़ी हैं... आज हम लोगों के बीच भ्रष्टाचार व धन कमाने व जीवन में आगे बढ़ने के नाजायज तरीकों के लिये एक तरह की सहज सामाजिक स्वीकार्यता सी विकसित हो गयी है... 'जो सफल है वही सही व अनुकरणीय है' एक पूरी की पूरी पीढ़ी का यही जीवन मंत्र हो गया है... अब ऐसे  दौर में हमें असली नायक तो मिलने से रहे... जबकि हम युगों-युगों से अवतारों-नायकों-मसीहाओं की बाट जोहता समाज रहे हैं... तो एक बहुत बड़ी डिमांड पैदा हो गयी हमारे देश में नायकों की, नायक थे नहीं, पर पब्लिक में उनकी माँग बनी हुई थी... फिर अपना हिन्दुस्तानी जुगाड़ काम आया... छोटे-छोटे व्यक्तित्वों के बड़े-बड़े कट-आउट बनाये गये बाकायदा उनके चेहरे के चारों ओर आभामंडल पेन्ट किये हुऐ, चौराहों पर लगाये गये, रात-दिन अखबारों से, टीवी चैनलों से, पंडालों से, जलसों-रैलियों से उन व्यक्तित्वों की विशालता-विराटता-महानता के बखान किये गये... और मिल गयी हमको धर्म के, अध्यात्म के, योग के, जीवन दर्शन के, समाज सेवा-सुधार के, राजनीति के, खेल के, सिनेमा के, आदि-आदि के १५१ फीट ऊँचे कट आउट नायकों-महानायकों की एक लंबी लिस्ट...

आज के समय के सबसे चर्चित नायक हैं अन्ना व उनकी टीम-अन्ना... और भ्रष्टाचार को इस महादेश से उखाड़ फेंक फिर से रामराज्य (?)  बनाने के लिये कानूनन बने जिस अवतार के अवतरण का सपना दिखाती है यह टीम... वह अवतार है 'जनलोकपाल'... इसमें कोई शक नहीं कि हमारे विशाल मध्यवर्ग का एक तबका अपनी अपनी मोमबत्तियाँ, टीशर्टें, टोपियाँ, धूप के चश्मे, लहराते तिरंगे, ट्वीट्स, फेसबुक मैसेजेज् आदि आदि के साथ इस अवतार को जमीं पर लाने के लिये, और वह भी संसद के इसी सत्र में, कृतसंकल्प भी है... प्रयोग के तौर पर इस 'जनलोकपाल-अवतार' के करतब-करिश्मे देखने में भी कोई हर्ज  भी तो नहीं है आखिर...

नौ सदस्यीय इस प्रस्तावित लोकपाल का सदस्य बनने के लिये जो योग्यतायें अनिवार्य रूप से किसी में होनी चाहिये वह है... ईमानदारी, निष्पक्षता, निर्भीकता, भ्रष्टों को उनके अंजाम तक पहुंचाने का उत्साह-संकल्प तथा हमारे तंत्र व नियमों की समझ व उसी तंत्र से भ्रष्टाचार निवारण का कार्य लेने का अनुभव... ऐसे में जब यह खबर आती है कि लोकपाल में आरक्षण की तैयारी है  और अपनी टीम अन्ना को इस पर कोई आपत्ति नहीं है ... लोकपाल में आरक्षण के पैरोकारों द्वारा नौ सदस्यीय लोकपाल पैनल में इस आरक्षण की माँग के पीछे समानता या रोजगार के अवसर जैसा कोई तर्क नहीं है... वजह सिर्फ इतनी है कि यदि नौ सदस्यीय पैनल में उनके वर्ग-जाति-धर्म के भी सदस्य होंगे तो आरोपित होने पर उनके हितों का भी ख्याल रखा जायेगा... उनको भय है कि आरक्षण न होने पर जातिगत पूर्वाग्रहों के चलते किसी जाति विशेष के आरोपियों के प्रति अन्याय हो सकता है... यहाँ पर यह भी ध्यान रहे कि भारत की उच्च न्यायपालिका में आरक्षण लागू नहीं है, व कभी भी कोई मुवक्किल यह कहता नहीं दिखता कि मेरा मुकदमा मेरी ही जाति के न्यायाधीश द्वारा सुना जाये... हमारी किसी भी अन्य संवैधानिक संस्था जैसे चुनाव आयोग, केन्द्रीय सतर्कता आयोग, महालेखाकार-नियंत्रक ( CAG ) में भी आरक्षण नहीं है...

ऐसे में जब कोई यहाँ पर यह कहता है कि...

Corruption is, ironically, the one realm where India’s caste identities, which otherwise assert themselves forcefully, vanish miraculously. The pantheon of our leaders who face grave corruption charges shows that corruption is the one area where caste and communal divisions don’t count: it is the ultimate equal-opportunity enterprise.

और यह यह पूछता भी है कि...

So, if corruption can be caste-blind, and if corruption can be truly secular, why can’t the Lokpal too be?


तो आप मौन क्यों हैं अन्ना ?

आपकी यह चुप्पी बहुत असहज करती है... क्यों नहीं आप जंतर मंतर से गर्जना करते कि लोकपाल वही बने जो चयन के समय उपलब्ध सभी उम्मीदवारों में से लोकपाल बनने के मानकों के आधार पर  सर्वाधिक योग्य हो... इससे कोई फर्क किसी को नहीं पड़ना चाहिये कि इस आधार पर चयन होने के बाद नौ के नौ सदस्य महिला ही बन जायें या मुस्लिम या ईसाई या पिछड़े या दलित या सिख या पारसी या ब्राह्मण ही...

बोलिये अन्ना, भ्रष्टाचार को खत्म करने की राह की सबसे पहली सीढ़ी है सच को कहने का साहस दिखाना...





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रविवार, 11 दिसंबर 2011

द ग्रेट इंडियन लोकपाल तमाशा !!! एक ढोंग का फूहड़ प्रदर्शन है यह !!!

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कल स्टार न्यूज का 'एक्सक्लूसिव' देख रहा था... किसी बड़ी गाड़ी में अन्ना हजारे ड्राइवर के साथ वाली सीट पर बैठे हुऐ थे व पीछे की सीट पर रिपोर्टर व उसके बगल में कैमरामैन... साक्षात्कार लोकपाल के मुद्दे पर चल रहे उनके आंदोलन को लेकर हो रहा था... पर एक बात जो खली वह यह कि कई कई बार अन्ना ने यह कहा कि मेरा पूरा जीवन देश व गरीब के लिये समर्पित रहा है व आगे भी रहेगा... अन्ना को बार बार इस बात को प्रमुखता से बताने की क्या जरूरत आन पड़ी यह समझ नहीं आया...

कुल मिलाकर मामला अब केवल चार बातों पर अटका पड़ा है...

पहली- ग्रुप 'सी' व 'डी' के कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में लेना... ग्रुप 'सी' के कर्मचारियों की संख्या ५७ लाख बताई जा रही है... और लोकपाल नौ सदस्यीय प्रस्तावित है... ग्रुप 'सी' के कर्मचारियों के पास फैसले लेने के अधिकार भी नहीं होते और सभी मामलों में उनका एक सुपीरियर अधिकारी उसी बिल्डिंग में उन पर नियंत्रण रखता है... अगर इनको लोकपाल के दायरे में शामिल किया गया और ' मेरा भारत महान- सौ में से निन्यानवे बेईमान' की तर्ज पर अगर इनमें से दो प्रतिशत की शिकायतें भी हर साल की गई तो एक लाख चौदह हजार शिकायतों को नौ लोग निपटाने में न जाने कितने दशक लगायेंगे... पर समझ यह नहीं आता कि सरकार क्यों अड़ी है, ले ले दायरे में... बाद की बाद देखी जायेगी... अगले साल नौ हजार सदस्यों वाले 'सर्वजनलोकपाल' के लिये आंदोलन होगा... यह कोर कमेटी बेरोजगार तो नहीं रहने वाली...

दूसरा- 'सिटिजन चार्टर' ... यह एक छोटी सी बात है हर कार्यालय के बाहर उसमें होने वाले काम, कार्यरत लोगों के नाम, पते, फोन नंबर, उनके दायित्व, उनके नियंत्रक अधिकारी के नाम, पते, फोन नंबर तथा किसी असुविधा की स्थिति में किससे शिकायत की जाये, भ्रष्टाचार की किससे शिकायत हो आदि आदि यह लिखा होता है... लोकपाल के दायरे में इसका क्रियान्वयन लाने में कोई बुराई नहीं... पर फिर वही शंका... केवल नौ लोकपाल कहाँ कहाँ देखेंगे इसे... सरकार न जाने क्यों अड़ी है इस पर...

तीसरा- 'प्रधानमंत्री का लोकपाल के दायरे में आना'... अपने आज के प्रधानमंत्री स्वयं इसके लिये राजी हैं... पर क्या इस विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र इस महादेश को अपने ही प्रधानमंत्री पर शक करना चाहिये... यह मानने का क्या आधार है कि हमें लोकपाल के नौ सदस्य तो एकदम ईमानदार मिलेंगे पर प्रधानमंत्री बेईमान... क्या ऐसा कोई प्रधानमंत्री संसद का सामना कर पायेगा जिसके खिलाफ किसी झूठी शिकायत पर ही लोकपाल की जाँच चल रही है... आपने अपनी न्यायिक सत्ता के दर्प में रेलवे स्टेशनों पर हंगामा मचाते न्यायाधीशों के किस्से तो सुने ही होंगे... अगर नौ में से कोई लोकपाल भी ऐसे ही बौरा गया तो क्या वह संसदीय लोकतंत्र को अस्थिर नहीं कर देगा ?... पर जंतर-मंतर पर लहराते तिरंगों व टोपी-बैनर-टीशर्ट धारी समर्थकों की भीड़ के बीच इस चिंता पर ध्यान देने की जहमत उठाती नहीं दिखती टीम अन्ना... भीड़ कुछ भी कहे पर संसद इस पर सोच समझ कर ही फैसला लेगी, इसका मुझे पूरा यकीन है...

चौथा- 'सीबीआई' का लोकपाल के आधीन आना... इसमें शक नहीं कि अब तक की सभी सरकारें अपने राजनीतिक सहयोगियों व विरोधियों पर दबाव डालने के लिये सीबीआई का रणनीतिक इस्तेमाल करती रही हैं... भ्रष्टाचार के जो मामले लोकपाल सीबीआई को जाँच करने को सौंपे उन मामलों में लोकपाल को मॉनिटरिंग तथा संबंधित अधिकारियों को नियंत्रित करने का अधिकार होना ही चाहिये... आशा है कि इस मसले पर सर्वसहमति हो ही जायेगी...

देर सबेर लोकपाल आ ही जायेगा... पर क्या इससे भ्रष्टाचार छूमंतर हो जायेगा... भ्रष्टाचार को, कर चोरी को, धन कमाने के नाजायज तरीकों को जो एक सहज सामाजिक स्वीकार्यता आज मिली हुई है, क्या हम लोगों के इस रूख में बदलाव आयेगा कभी...

कितना अच्छा होता कि अन्ना अपनी सभा में हर आने वालों से कहते कि घर जाते हुऐ हाथ में एक कोयले का टुकड़ा रखो... और घर जाते हुऐ रास्ते में मिलने वाले हर भ्रष्ट, करचोर, नाजायज कमाई करने वाले शख्स के मकान की बाहरी दीवार पर काले रंग का एक क्रॉस बनाते जाना... बहुत सारे मकानों की दीवारें काली होतीं... कईयों को पहला निशान अपने ही मकान की बाहरी दीवार पर भी लगाना होता... पर ईमानदारी से काली की गई यह दीवारें एक नये उजाले का आगाज होतीं... वह उजाला जो कोई भी जोकपाल-लोकपाल या जनलोकपाल नहीं ला सकता... पर क्या ७४ साल की उम्र में इस तरह की अपील करने का रिस्क उठा सकते हैं अन्ना... मुझे नहीं लगता...

इस तरह के आंदोलन कितने ही चलें... हम बदलने वाले नहीं... क्योंकि यह बदलाव हमारे दिल से नहीं उपजा है... यह केवल मुंह दिखाई-फर्जअदाई का ढोंग रचा जा रहा है... बहरहाल हर चमत्कार को नमस्कार करने वाले अपने देश की परंपरा को सम्मान देते हुऐ इस ढोंग को भी नमस्कार करिये !








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