शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

धन्यवाद, धन्यवाद, धन्यवाद, Oh God, If there is a God !!!

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जब भी हम साथ खरीदारी करने जाते हैं तो कपड़े की दुकान पर यह अक्सर होता है कि श्रीमती जी किसी किसी कपड़े को दुकानदार को दिखाने के लिये खोलने ही नहीं देती... एक नजर में ही उसे नापसंद कर बस मुँह बिचका कर कुछ और दिखाने को कहती हैं... मैं मन ही मन मुस्कुराता हूँ उस समय... दुकानदार भी कुछ नहीं कहता... हम दोनों ही इस बात को जानते हैं कि जिस कपड़े को एक ग्राहक ने देखने से ही इन्कार कर दिया उसे भी कोई दूसरा पसंद कर ले जायेगा... पहन कर इठलायेगा और शौक से पहनता रहेगा काफी समय तक... अच्छी दुकान चलने के लिये जरूरी है कि वहाँ हर पसंद, हर रंग, हर किस्म और हर बजट के कपड़े हों...

अपनी यह दुनिया भी कुछ ऐसीइच है ना... सोचिये कितनी बेरंग, कितनी उबाऊ, कितनी अझेल हो जाती यह दुनिया, अगर सारे के सारे एक ही तरह से सोचने लगते, सबकी आस्था एक ही होती, सबका धर्म एक ही होता, सबका ईश्वर भी एक ही होता, सबका आहार भी एक सा ही होता... सारे सारे के सारे शाकाहारी ही होते या फिर सारे के सारे माँसाहारी ही होते... फिर कहाँ होता अपने आहार, अपने कर्मकान्ड, अपनी पूजा पद्धति, अपने त्यौहार को मनाने का तरीका, अपने लाश को निपटाने का तरीका, अपने धर्म-अपने ईश्वर, अपने निष्कर्ष, अपने नजरिये को दूसरे पर लादने-दूसरे के मुकाबले बेहतर बताने की होड़... कहाँ जरूरत होती सवाल-जवाब की, आरोप-प्रत्यारोप की, स्पष्टीकरण की, जिद पर अड़ने की, दूसरे को जिद्दी बताने की... सारी दुनिया एक ही रंग की सी हो जाती... क्या ऐसी दुनिया में जीने में कोई मजा आता, आनंद मिलता... हम सबके सोचने के तरीके, नजरिये, आस्था, धार्मिक विश्वास/अविश्वास व जो हमें दिख रहा है उसके आधार पर निकाले गये हमारे निष्कर्षों का यह अंतर ही हमारी इस दुनिया को रंगीन, दिलचस्प, रहने लायक व दिनोंदिन इंसान के लिये और बेहतर बनाता है... सबसे बड़ी बात यह है कि यही अंतर हमें रात को चैन की नींद देता है क्योंकि अगले दिन फिर एक लड़ाई जो लड़नी होती है हमें... अपने विश्वासों को सही ठहराने की !

संशयवादी हूँ मैं, और संशयवादी की प्रार्थना तो आपको पता ही है...

Oh God, If there is a God, Save my Soul, If there is a Soul !

आज उसी प्रार्थना में कुछ और जोड़ने का मन कर रहा है, बस ऐसे ही...

Oh God (If there is a God), Thanks (If you understand it) for creating such a diverse world (If you really created it) !



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19 टिप्‍पणियां:

  1. दुनिया बनाने वाले क्‍या तेरे मन में समायी ...

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  2. सीख अच्छी लगी। संशय किसी के मिटाये नहीं मिटेगा..खुद ही समझना और महसूस करना होगा।

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  3. यकीनन यही विविधता ही दुनिया को रंगीन बनाती है.

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  4. इस विविधता में एकता भी शामिल हो जाए तो क्या कहना !

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  5. हम को मन की शक्ति देना , मन विजय करे , दूसरो की जय से पहले खुद को जय करे

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  6. बात आपकी गहन है -कोई कह रहा था आपका ब्लॉग दरअसल एक नारी का छद्म ब्लॉग है और मैं भी फ़िक्र मंद हो गया हूँ तब से ! या इलाही ये माज़रा क्या है -बस आपको करना इतना ही है कि अपनी असली वाली फोटो लगा दीजिये ..अब इससे काम नहीं चलने वाला -अब नज़रे लग गयीं है और लोग आप जानते ही हैं क़यामत की नज़र रखते हैं :P

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    देव,

    नर का हो या नारी का, है तो इंसान का ही... और लगायी हुई फोटो मेरी असली फोटो नहीं है... इस निष्कर्ष का आधार ?


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  8. इंसान का तो है…
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    लेकिन एक्स-रे …हँसने के लिए कह रहे हैं…
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    वैसे संदेह कुछ सही भी हो सकता है…हाँ जरा टिप्पणी के लिए सीधे पोस्ट के नीचे वाला विकल्प कर देंगे तो एक क्लिक में काम हो जाएगा……

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  9. संदेह इंसान को सतर्क रखता है कि कहीं वह ग़लत जगह न फंस जाए।
    विश्वास की रक्षा के बहुत काम आता है संदेह।
    विश्वास को बचाने के लिए भी संदेह काम आता है और स्वयं विश्वास को पाने में भी संदेह बहुत काम देता है।
    संदेह बुद्धि का काम है। जो निर्बुद्धि लोग हैं, वे संदेह नहीं कर सकते और ऐसे लोग विश्वास भी नहीं कर सकते।
    निर्बुद्धि मनुष्य तो अंधा होता है और जब वह विश्वास करता है तो उसका विश्वास भी अंधा ही होगा। अंधविश्वास यही लोग करते हैं। जिनके पास बुद्धि है और वे उसका उपयोग नहीं करते , उनके विश्वास का भी मूल्य कुछ नहीं है।
    प्रभु परमेश्वर को पाना है तो हमें अपने रोम रोम से उसे पाना होगा और इंसान के इस पूरे वुजूद में सबसे बड़ी चीज़ यह बुद्धि ही तो है। ईश्वर की प्राप्ति इस बुद्धि से भी होनी आवश्यक है।
    पशु और मनुष्य में केवल बुद्धि का अंतर ही तो है।
    बुद्धि का विषय ही ज्ञान है।
    बुद्धि है तो संदेह अवश्य करेगी। संदेह जिज्ञासा को और जिज्ञासा खोज को जन्म देगी। जो ढूंढता है वह पाता है।
    जो ढूंढ रहे थे, वही मिला है या कुछ और मिल गया है।
    इसका फ़ैसला केवल बुद्धि ही कर सकती है, इंसान यह निर्णय केवल बुद्धि के बल पर ही ले सकता है।
    संदेह से नास्तिकता का जन्म होता है और जो चीज़ जन्म लेती है, उसकी मौत भी ज़रूर होती है। विश्वास की प्राप्ति होते ही संदेह का अंत हो जाता है।
    संदेह का अंत मनुष्य के स्वभाव से नहीं हो जाता बल्कि जिस विषय में संदेह था, उस विषय में निर्णायक फ़ैसला हो जाने पर, अपने फ़ैसले के सही होने का विश्वास होते ही केवल उस विषय में संदेह का अंत हो जाता है।
    संदेह जितना मज़बूत होगा, विश्वास भी उतना ही मज़बूत होगा।
    दृढ़ नास्तिक जब आस्तिक बनते हैं तो भी दृढ़ ही बनते हैं।
    आस्था, विश्वास, प्रेम और समर्पण की मंज़िल आसान नहीं है।
    यह एक बहुत कठिन डगर है।
    see entire article :
    http://vedquran.blogspot.com/2011/11/qurbani.html

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  10. प्रिय प्रवीण जी का ब्लॉग नारी का ब्लॉग नहीं है और नर का भी नहीं है बल्कि महानर का ब्लॉग है।
    इसकी गवाही तो हम सकते हैं और रही बात फ़ोटो की तो प्रिय प्रवीण जी के ब्लॉग पर जो स्केच नज़र आ रहा है, वह वास्तव में उनके ही फ़ोटो का स्केच है।
    उनका फ़ोटो पहले उनके ब्लॉग पर था लेकिन फिर वह ...
    इसके पीछे एक बड़ी मज़ेदार कहानी है।
    हा हा हा ...

    उस कहानी को प्रिय प्रवीण जी ख़ुद अपने मुंह से सुनाएं तो ज़्यादा अच्छा लगेगा।
    सेना में प्रिय प्रवीण जी को अल्फ़ा मेल कहा जाता था अर्थात महानर !

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  11. @जब आप ईश्वर की सत्ता पर चोट कर सकते हैं तो हम आपकी एक क्षुद्र सी फोटो पर नहीं - :)
    असली बात यह है कि आपकी यह फोटो देखते देखते हम अब ऊब गये हैं -दूसरी लगायिये !
    आप भी भगवान् की तरह रहस्यमयी लगते रहे हैं !

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    @ प्रिय चंदन कुमार मिश्र,

    टिप्पणी के लिए सीधे पोस्ट के नीचे वाला विकल्प वाकई सुविधाजनक है, लागू कर दिया है...

    धन्यवाद!


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    @ आदरणीय अरविन्द मिश्र जी,

    देव,

    आपकी फरमाईश भी पूरी कर दी गई है, एकदम ताजा फोटो है यह अभी-अभी लिया है... :)

    बताइयेगा जरूर कैसा दिखता/ती हूँ मैं ?.... ;)) X १००८



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  14. @बढियां है मगर जेंडर स्पष्ट नहीं है :)

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  15. उत्कृष्ट प्रस्तुति , आभार.



    कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधारने का कष्ट करें, आभारी होऊंगा .

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  16. praveen ji - there is a long debate going on on my blog - in which, one comment i refered to you as follows :

    १. @ -आदरणीय प्रवीण जी का कमेन्ट : आप भी जानते हैं, मैं भी , प्रवीण जी भी, सुज्ञ भैया भी - कि प्रवीण जी ने यहाँ अपने बारे में नहीं कहा - हमारी आस्थाओं के बारे में कहा है | क्या हम सब को अपनी अपनी आस्थाएं इतनी कमज़ोर - इतनी बेबस लगती हैंकि एक प्रवीण जी के आस्थावान न होने से हम इतने अशक्त महसूस करें कि उनकी कही हुई बात को घुमा फिर कर उन्हें आस्थावान साबित करने का प्रयास करें ? {{{ मैं प्रवीण जी के साथ हूँ - वे संशयवादी हैं - यह उनका अधिकार है | उनसे मेरी सिर्फ इतनी गुजारिश है कि संशयवाद पर रुके नहीं - यह एक रास्त है - मंजिल नहीं | संशय के हल खोजे - तब तक - और इतना अधिक , संशय करें - कि जब तक सत्य मिल न जाए - खोज को बंद न करें | न ये माने कि ईश्वर है, न ये मानें कि ईश्वर नहीं है | क्योंकि ये दोनों ही बातें उनके अपनी खोज नहीं हैं - दोनों ही निष्कर्ष उधार लिए निष्कर्ष हैं - औरों के हैं | }}} यदि आपकी अपनी आस्था गहरी है, सशक्त है - तो आप उन्हें कन्विंस कर दें कि ईश्वर हैं | उनकी बात को घुमा फिर कर उन्हें आस्थावान साबित न करें - कम से कम यहाँ नहीं | यह पोस्ट ईश्वर के होनें होने पर नहि है - यह सिर्फ कुर्बानी पर है | वास्तविकता यह है कि संशय ही सत्य की प्राप्ति की पहली सीढ़ी है | संशय हमें अपना शत्रु तभी लगता है जब हम अपने मन में जानते हैं कि हमारे भीतर संशय है जिसे हम आस्था के भारी पत्थर से दबा देना चाहते हैं | आस्था ईश्वर प्राप्ति के राह का मार्ग है यदि कुछ लोगों केलिए - तो यही आस्था और कुछ लोगों के लिए राह का रोड़ा है - कि उनके संशय उनके परम मित्र हैं - जो उनके साथ तब तक रहेंगे - जब तक वे खोजते खोजते असंशय की स्थिति में न पहुँच जायें | और वे हो सकता है उन लोगों से पहले पहुंचें जो तथाकथित "आस्था" को पकड़ कर चल रहे हैं - क्योंकि उनमे से अधिकतर सिर्फ लेबल ओढ़े हैं कि हम आस्था वाले हैं - वे कुछ ढूंढ ही नहीं रहे | वे सिर्फ एक ढाल की तरह आस्था को पकडे बैठे हैं - कि उन्हें कुछ खोजने की मेहनत न करनी पड़े | कृपया इस बात पर चर्चा अभी न करें - इस पोस्ट पर हम कुर्बानी पर बात कर लें - आस्था और अनास्था और संशयवाद पर बात फिर कभी. फिर किसी पोस्ट में सही |

    just thought i should inform you, moreover, this post is of the same nature..... :) ..... regards

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