बुधवार, 30 नवंबर 2011

आने दो एफडीआई को मल्टी ब्रान्ड रिटेल में... देख ली जायेगी...

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यूनान-ओ- मिस्र-ओ- रोमा, सब मिट गए जहाँ से ।
अब तक मगर है बाकी, नाम-ओ-निशाँ हमारा !

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-जहाँ हमारा !


१२० करोड़ का मुल्क होने के कुछ अपने खास फायदे भी हैं... एक सबसे बड़ा फायदा यह कि बाकी दुनिया के लिये हम एक बड़ा व संभावनापूर्ण बाजार हैं... हमारे पास १२० करोड़ पेट हैं भरने को, १२० करोड़ तन हैं ढकने को...हमारा गरीबी रेखा से नीचे की आय का आंकड़ा मुख्य रूप से इस बात पर आधारित है कि एक हिन्दुस्तानी इससे कम में अपने को जिन्दा नहीं रख सकता... और यदि इससे भी कम कमाता है तो उसे सरकारी मदद की जरूरत है... यानी एक आम हिन्दुस्तानी अपने ऊपर कम से कम ३२ रूपये तो रोज खर्च करता ही है... अगर यह भी मान लिया जाये कि यह सारा पैसा केवल खाने पीने, साबुन-तेल व जरूरत भर कपड़ों में खर्च होता है तो ३२ x १२० = ३८४० करोड़ रोजाना का बाजार हैं हम और इसका तीस फीसदी वह मुनाफा है जो बिचौलियों तथा थोक व खुदरा व्यापारियों की जेब में जाता है... फिर मोटा-मोटा हिसाब करिये ३८४० का तीस फीसदी माने ११५२ करोड़ और साल के ३६५ दिन का जोड़ें तो ११५२ x ३६५ यानी ४२०४८० करोड़ सालाना के मुनाफे के पीछे की लड़ाई है यहाँ ... यह भी ध्यान में रखें कि यह चार लाख बीस हजार करोड़ सालाना की जो राशि मैंने आंकी है वह एक कंजर्वेटिव एस्टीमेट है और असली आंकड़ा इसका कई गुना हो सकता है... इस सारे मुनाफे का दो तिहाई जाता है खाना और किराना का सामान बेचने वालों के हिस्से में... बाकी दुनिया दुखी है कि चार लाख बीस हजार करोड़ रूपये के दो तिहाई यानी दो लाख अस्सी हजार करोड़ रूपया सालाना के इस मुनाफे में संगठित खुदरा व्यापार की हिस्सेदारी महज दो फीसदी ही है जबकि इसे पचीस फीसदी तक तो आसानी से बढ़ाया जा सकता है... यानी यह सारी हाय तौबा सत्तर हजार करोड़ सालाना (कम से कम) के मुनाफे को लेकर है...


इस बात पर कतई यकीन नहीं करिये कि दूर देस में बैठी कोई कंपनी केवल इसलिये इस महादेश में आना चाहती है कि वह चाहती है कि हमारे किसान को उसकी मेहनत का सही मोल मिले या हमारा खाना बेकार न हो या हमारे उपभोक्ता को सही दाम पर सामान मिले... खेल सारा का सारा मुनाफे के लिये एक नया बाजार तलाशने का ही है...

हंगामा केवल इसी फैसले पर बरपा है, इस बात पर दोनों पक्ष एक मिलीभगत वाली चुप्पी साधे हैं कि इस फैसले के साथ साथ ही सरकार ने एक और बड़ा फैसला लिया है और वह है सिंगल ब्रान्ड रिटेल में विदेशी सीधे निवेश की सीमा ५१% से बढ़ा १००% करने का...

इस फैसले के पक्ष में सरकार विरोध में विपक्षियों के अपने-अपने तर्क हैं... मैं उन्हें यहाँ दोहराना उचित नहीं समझता... आप काफी कुछ सुन चुके होंगे इस बारे में...

केवल दो उदाहरण रखूँगा आपके सामने...

पहला...

सन १९७७ में जनता पार्टी सरकार के तत्कालीन मंत्री (अब दिवंगत) जॉर्ज फर्नांडीज ने शीतल पेय बनाने वाली कंपनी कोकाकोला को बाहर का रास्ता दिखा दिया... भारतीय बाजार में कैम्पा कोला, डबल सेवन व थम्स अप जैसे बहुत से शीतल पेय ब्रांड उभर कर आ गये... फिर बाद की किसी सरकार ने कोका-पेप्सी को दोबारा न्यौता दिया... उस समय बहुत सी उम्मीद भी दिखाई गई कि कैसे इनके आने से व इनके बनाये पोटेटो चिप्स बिकने से भारत के आलू किसान को फायदा होगा... ऐसा कुछ हुआ नहीं... आज भी हर साल बेचारे किसान का आलू सही भाव न मिल पाने के कारण सड़ता है... अपनी गहरी जेबों की बदौलत इन कंपनियों ने भारतीय शीतल पेय के लगभग पूरे बाजार पर कब्जा कर लिया... और सबसे बड़ी बात तो यह कि आम हिन्दुस्तानी की मानसिकता ही बदल दी... गर्मी के मौसम में खासकर अगर आप देहात में भी जायेंगे तो पेप्सी-कोक ही मंगाये जायेंगे आपकी कायदे से खातिर के लिये... पेप्सी-कोक को चाव से पीते और उसी दुकान के बगल बिक रहे जूस (जो कि सस्ता भी है) की ओर झाँक कर भी न देखते अपने बच्चों को देख आत्मा को कष्ट पहुंचता है मेरी... यह हमारी भी नाकामी ही है कि हम अपनी जूस की दुकान चलाने वालों को ' फूड सेनिटेशन व हाइजीन' के बारे में जागरूक नहीं कर पाये... और कई ग्राहक इसीलिये मजबूरी में भी कोक-पेप्सी पीते हैं...

दूसरा...

केन्चुकी फ्राइड चिकन, मैक डोनाल्ड, कैफे कॉफी डे, बरिस्ता, डोमिनो, पिजा हट जैसे ब्रांड जब भारत में अपनी दुकानें खोले थे... तो इसी तरह की आशंकाओं के चलते विरोध हुआ था... पर आज क्या हाल है... बाकी की दुनिया में इनका ग्राहक वहाँ का आम आदमी है... पर भारत में केवल उच्च वर्ग व उच्च मध्य वर्ग ही इनका ग्राहक बन पाया है अभी तक... यह और बात है कि इनकी आड़ में भारत के परंपरागत स्नैक, फास्ट-फूड बेचने वालों ने भी अपने दाम काफी बड़ा दिये और शर्माशर्मी अपने ग्राहक के बैठने और आराम के लिये बेहतर सुविधायें भी दी... यानी इनके आने से भारतीय दुकानदार का फायदा भी बढ़ा व प्रोफाइल भी...

कुछ इसीलिये मैं अपने को इस कदम के समर्थन या विरोध में खड़ा नहीं पाता... अभी भारत के दस लाख से ज्यादा की आबादी वाले केवल ५३ शहरों के लिये इसे खोला गया है... ट्रायल के तौर पर आजमाने के लिये बुरा नहीं है यह आइडिया... चार पाँच साल बाद इसकी समीक्षा हो... और अगर यह कंपनियाँ उपभोक्ता को कम कीमत पर सामान देने, उत्पादक को उसकी जायज कीमत देने तथा बिचौलियों के नाजायज मुनाफे पर रोक लगाने के अपने दावे पर खरी न उतरें तो किसने कह दिया कि अब आगे और जॉर्ज फर्नांडीज नहीं पैदा होंगे इस देश में... :)

बाई द वे, मुझे यह जरूर बताइयेगा कि सिंगल ब्रांड रिटेल में विदेशी निवेश की सीमा ५१% से बढ़ा १००% करने का भी कोई विरोध कर रहा है क्या कोई इस देश में... जबकि यह फैसला सीधे-सीधे ज्यादा दूरगामी व हमारी अर्थव्यवस्था पर खराब असर डालने वाला है... यह पब्लिक को दिखाने के लिये राजनीतिक दलों द्वारा किये जा रहे जुबानी जमाखर्च, धरनों, बंद व विरोध प्रदर्शन से प्रभावित नहीं होइये... अंदरखाने सब मिले हुऐ हैं... बस केवल भावनाओं पर मरहम लगाया जा रहा है... दिख नहीं रहा कि किस तरह बेशर्म होकर प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक दोनों मीडिया इस फैसले में हमारे फायदे को रेखांकित कर रहे हैं...

गोलमाल है भई सब गोलमाल है इस मुल्क में...

इसलिये मेरे साथ साथ पोस्ट की शुरूआत में लिखी चार लाइनें एक बार फिर पढ़िये...

सीना चार इंच फूला कि नहीं ?


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13 टिप्‍पणियां:

  1. मेरे कुछ प्रश्न है :
    1.अमरीका मे वाल-मार्ट जैसे महाकाय रीटेल माल होने के बात 10x10 कमरे वाले 7/11 बंद हो गये है क्या ?
    2.क्या थम्स अप/लिम्का जैसे ब्रांड की बिक्री कम होने का कारण पार्ले का लालच नही था जिसने इन्हे कोक को बेच दिया ?
    3.भारत मे पेप्सी के नमकीन ज्यादा बिकते है या हल्दीराम के ?
    4.क्या वालमार्ट भारत के हर नुक्कड़ चौराहे पर दुकान खोल रहा है ? दिल्ली जैसे शहर मे वालमार्ट कितने माल खोल पायेगा ?
    5. क्या वालमार्ट नुक्कड़ के पंसारी की तरह उधारी पर घर पहुंच किराना देगा ?

    और सबसे महत्वपूर्ण

    6.क्या नुक्कड़ का पंसारी वालमार्ट की तरह पक्का बिक्री कर वाला बिल देगा ?

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  2. हम कोई मध्यमार्ग नहीं अपना सकते क्या ? कुछ सुझाव देगें ? सनम न तुम हारे न हम !

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  3. मध्यम मार्ग अधिकातर घाटा पहुँचाता है शायद…कम कीमत पर सामान…हा हा हा , यह कम कीमत ने ही सब की जान ली न!…चार इंच कैसे फूलेगा…गुब्बारा नहीं है…इक़बाल साहब ने अपने को कुछ अधिक ईमानदार दिखाने के लिए यह पँक्तियाँ लिख मारीं थीं कि सब भारतीय इस नशे में ऐसे डूबें कि उतरने में शताब्दियों का या सहस्राब्दियों का समय लग जाय। ……अंग्रेज भी भारत में सिर्फ़ एक ही जगह व्यापार कर रहे थे न शुरू में, फिर देखा गया कि क्या होता है…और हाल से सारा मुल्क वाकिफ़ है…

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  4. बदलाव को कोई रोक न पायेगा। हम आर्थिक प्रगति भी चाहें और प्रोटेक्शन भी, यह चल नहीँ पायेगा। अपने घर में जहां अक्षमता है, वह हटानी ही होगी।
    आप की पोस्ट से लगभग सहमत।

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  5. आज के ज़माने में बड़ा मुश्किल है यूं दरवाज़े बंद करके बैठ पाना

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  6. गणित तो हमारे पक्ष में है पर राजनीति कभी साथ नहीं रही।

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  7. मेरी टिप्पणी कहाँ गायब हो गई?…देखिए शायद स्पैम में हो…वैसे गणित और हिसाब-किताब अच्छा रहा।

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    @ प्रिय चंदन कुमार मिश्र जी,

    धन्यवाद, स्पैम में केवल एक आपकी ही नहीं आशीष जी की टिप्पणी भी फंसी थी... दोनों को उबार दिया है... :)



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    @ आशीष श्रीवास्तव जी,

    2.क्या थम्स अप/लिम्का जैसे ब्रांड की बिक्री कम होने का कारण पार्ले का लालच नही था जिसने इन्हे कोक को बेच दिया ?

    जहाँ तक मुझे याद है पारले के रमेश चौहान कोक-पेप्सी का मुकाबला नहीं कर पाये इसलिये लिम्का-थम्स अप कोक को बेच कर कोक के ही बॉटलर बन गये थे...


    6.क्या नुक्कड़ का पंसारी/चौराहे का होटल वाला/मेन मार्केट का रेडीमेड वाला वालमार्ट की तरह पक्का बिक्री कर वाला बिल देगा ?

    आपने सही जगह चोट मारी है मझोले शहरों में कई बार मेरे साथ ऐसा हुआ है कि मैंने कोई महंगी जैकेट आदि खरीदी और पक्के बिल की माँग की तो मुझे वह सामान ही देने से मना कर दिया गया... एकाध अपवाद को छोड़ हमारे अधिकाँश खुदरा दुकानदार खुल्लम खुल्ला कर चोरी करते हैं और व्यापार मंडल आदि बना कर कर चोरी रोकने के लिये किये जा रहे प्रयासों में अवरोध डालते हैं... आज हमारे मूलभूत ढांचे में जो कमियाँ है उसका अहम कारण है सरकार के पास आर्थिक संसाधनों की कमी... और छोटे-मझोले दुकानदारों व व्यापारियों द्वारा की जा रही कर चोरी इसका एक अहम कारण है।... यह वर्ग सबसे ज्यादा मुखर व राजनीतिज्ञों को साध लेने में निपुण भी है ।




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    @ प्रिय चंदन कुमार मिश्र जी,

    ईस्ट इन्डिया कम्पनी के समय स्थितियाँ दूसरी थीं... सैकड़ों राजे-रजवाड़ों-निजाम-रियासतों में बंटा मुल्क... आज हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं... २१ वीं सदी के आत्मविश्वासी भारत को अपना बाजार खोलने से बाकी दुनिया के बाजार भी अपने लिये खुले मिलेंगे... जब पहली बार भारत में कंप्यूटर टैक्नॉलॉजी लाने की बातें हुई थी तो भी कइयों ने विरोध किया था... आज आइटी हमारा सबसे बड़ा एक्सपोर्ट है...

    प्रयोग के तौर पर ५३ शहरों में आजमाने में कुछ बुराई नहीं है... हो सकता है कि इम्प्रोवाइज करने की हमारी क्षमता के कारण १०-२० साल बाद 'हिन्दमार्ट' अमेरिका में जाकर वालमार्ट को टक्कर दे... नये दौर के हिन्दुस्तानी को प्रतिस्पर्धा में अव्वल आना सीखना ही होगा !



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  11. आदरणीय,

    यह ब्लागर इन दिनों पगलाया हुआ है, टिप्पणियों को इस हाल तक रोज पहुँचाया जा रहा है। धन्यवाद स्वीकार है।

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    स्थितियाँ दूसरी या और थीं। ये हर तरह के लोग, हर तरह से प्रयोग करते रहे हैं। …

    यहाँ या इस बार तकनीक नहीं, घुमावदार सीढी आ रही होगी। और बात रही साफ्टवेयर की तो…भारत, हमारा देश हार्डवेयर में उधार और भीख से ही काम चला रहा है। साफ्टवेयर का क्या है, वह तो भारत ऐसा बनाता है कि दुनिया के सबसे बेहतरीन साफ्टवेयर डाटाबेस, सर्वर आदि किसी जगह कोई स्थान नहीं दिखता। निर्यात तो होता है लेकिन पता नहीं किस तरह का कि बस सामान्य ज्ञान की पत्रिकाओं-किताबों में या अखबारों में 'देखने' भर के लिए और खुश होने भर के लिए।

    खुला बाजार…और पक्का बिल…कुछ बातें सही तो हैं ही आप सबकी। लेकिन कागजी काम और धोखे का, और लूट का होता है। इसका गणित भी अधिक मुश्किल नहीं। हम इससे इत्तेफाक नहीं रखते कि खुला बाजार, अर्थतंत्र, सकल घरेलू उत्पाद…ये सब क्या है, कितना है कि भारत तेजी से बढता देश है जैसे जुमलों पर ताली बजाएँ बल्कि इन बातों का, इन तालियों का भारत पर वास्तविक (कागजी नहीं)असर कैसा और क्या पड़ता है और हम देखते क्या हैं, हर रोज सच कैसा है?…

    धीरे-धीरे एकाधिकार का ही इतिहास रहा है ऐसे कामों का। …जरा कम समझते हैं हम। मॉल और ऐसे मार्ट में घूमते भी नहीं, साधारण दुकान और साधारण खरीदार…इसलिए कुछ खास असर व्यक्तिगत भी नहीं पड़ेगा हमपर। फिर भी, कुछ इधर उधर हुआ, तो क्षमा चाहेंगे।

    और हाँ, 53 क्या जहर का पैकेट एक आदमी पर आजमाना भी काफी होता है परिणाम के लिए।

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  12. मेरी टिप्पणी फिर कहाँ गायब हो गई? मेरे साथ कुछ अधिक हो रहा है ऐसा…

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  13. हा भाई देख ली जाएगी क्योकि हमारा तो कोई नुकशान तो होने वाला नहीं है | जब देशी लोगो को बड़े बड़े मॉल खोलने की इजाजत दी गई थी तब भी यही दलील दी गई थी की लोगो को सस्ता सामान मिलेगा और मिला क्या आज भी इन मॉल में १०- ५० पैसे की भारी भरकम छुट हमें मिलती है इन शानदार मॉल में और बदले में ५०० की जगह १००० का बिल बनवाके आते है | किसानो के बारे में भी यही कहा था की उन्हें सीधी खरीद से दाम अच्छे मिलेंगे देखिये पिछले दसक में किसान कितने अमीर हो गये आत्महत्या कर मुआवजा पा कर | मंत्री जी कहते है की देशी को छुट दी थी तब भी ऐसे ही हल्ला हुआ था बताइए क्या फर्क बड़ा किराने वाले को, सही कहा मंत्री जी मॉल में खरीदने वाले तो आसमान से टपके है न किराने वाले के ग्राहक तो कही गये ही नहीं | आ जाने दीजिये फिर देखि जाएगी फिर होगा वही "भयल बिया मोर करबो का " उसके बाद मर के जी के निभानी ही पड़गी क्योकि तलाक तो हमारे यहाँ मान्य नहीं है | तैयार रहो जनता रूपी बेटी सरकार की साख के लिए सरकारी ऑनर किलिंग के लिए |

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