बुधवार, 30 नवंबर 2011

आने दो एफडीआई को मल्टी ब्रान्ड रिटेल में... देख ली जायेगी...

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यूनान-ओ- मिस्र-ओ- रोमा, सब मिट गए जहाँ से ।
अब तक मगर है बाकी, नाम-ओ-निशाँ हमारा !

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-जहाँ हमारा !


१२० करोड़ का मुल्क होने के कुछ अपने खास फायदे भी हैं... एक सबसे बड़ा फायदा यह कि बाकी दुनिया के लिये हम एक बड़ा व संभावनापूर्ण बाजार हैं... हमारे पास १२० करोड़ पेट हैं भरने को, १२० करोड़ तन हैं ढकने को...हमारा गरीबी रेखा से नीचे की आय का आंकड़ा मुख्य रूप से इस बात पर आधारित है कि एक हिन्दुस्तानी इससे कम में अपने को जिन्दा नहीं रख सकता... और यदि इससे भी कम कमाता है तो उसे सरकारी मदद की जरूरत है... यानी एक आम हिन्दुस्तानी अपने ऊपर कम से कम ३२ रूपये तो रोज खर्च करता ही है... अगर यह भी मान लिया जाये कि यह सारा पैसा केवल खाने पीने, साबुन-तेल व जरूरत भर कपड़ों में खर्च होता है तो ३२ x १२० = ३८४० करोड़ रोजाना का बाजार हैं हम और इसका तीस फीसदी वह मुनाफा है जो बिचौलियों तथा थोक व खुदरा व्यापारियों की जेब में जाता है... फिर मोटा-मोटा हिसाब करिये ३८४० का तीस फीसदी माने ११५२ करोड़ और साल के ३६५ दिन का जोड़ें तो ११५२ x ३६५ यानी ४२०४८० करोड़ सालाना के मुनाफे के पीछे की लड़ाई है यहाँ ... यह भी ध्यान में रखें कि यह चार लाख बीस हजार करोड़ सालाना की जो राशि मैंने आंकी है वह एक कंजर्वेटिव एस्टीमेट है और असली आंकड़ा इसका कई गुना हो सकता है... इस सारे मुनाफे का दो तिहाई जाता है खाना और किराना का सामान बेचने वालों के हिस्से में... बाकी दुनिया दुखी है कि चार लाख बीस हजार करोड़ रूपये के दो तिहाई यानी दो लाख अस्सी हजार करोड़ रूपया सालाना के इस मुनाफे में संगठित खुदरा व्यापार की हिस्सेदारी महज दो फीसदी ही है जबकि इसे पचीस फीसदी तक तो आसानी से बढ़ाया जा सकता है... यानी यह सारी हाय तौबा सत्तर हजार करोड़ सालाना (कम से कम) के मुनाफे को लेकर है...


इस बात पर कतई यकीन नहीं करिये कि दूर देस में बैठी कोई कंपनी केवल इसलिये इस महादेश में आना चाहती है कि वह चाहती है कि हमारे किसान को उसकी मेहनत का सही मोल मिले या हमारा खाना बेकार न हो या हमारे उपभोक्ता को सही दाम पर सामान मिले... खेल सारा का सारा मुनाफे के लिये एक नया बाजार तलाशने का ही है...

हंगामा केवल इसी फैसले पर बरपा है, इस बात पर दोनों पक्ष एक मिलीभगत वाली चुप्पी साधे हैं कि इस फैसले के साथ साथ ही सरकार ने एक और बड़ा फैसला लिया है और वह है सिंगल ब्रान्ड रिटेल में विदेशी सीधे निवेश की सीमा ५१% से बढ़ा १००% करने का...

इस फैसले के पक्ष में सरकार विरोध में विपक्षियों के अपने-अपने तर्क हैं... मैं उन्हें यहाँ दोहराना उचित नहीं समझता... आप काफी कुछ सुन चुके होंगे इस बारे में...

केवल दो उदाहरण रखूँगा आपके सामने...

पहला...

सन १९७७ में जनता पार्टी सरकार के तत्कालीन मंत्री (अब दिवंगत) जॉर्ज फर्नांडीज ने शीतल पेय बनाने वाली कंपनी कोकाकोला को बाहर का रास्ता दिखा दिया... भारतीय बाजार में कैम्पा कोला, डबल सेवन व थम्स अप जैसे बहुत से शीतल पेय ब्रांड उभर कर आ गये... फिर बाद की किसी सरकार ने कोका-पेप्सी को दोबारा न्यौता दिया... उस समय बहुत सी उम्मीद भी दिखाई गई कि कैसे इनके आने से व इनके बनाये पोटेटो चिप्स बिकने से भारत के आलू किसान को फायदा होगा... ऐसा कुछ हुआ नहीं... आज भी हर साल बेचारे किसान का आलू सही भाव न मिल पाने के कारण सड़ता है... अपनी गहरी जेबों की बदौलत इन कंपनियों ने भारतीय शीतल पेय के लगभग पूरे बाजार पर कब्जा कर लिया... और सबसे बड़ी बात तो यह कि आम हिन्दुस्तानी की मानसिकता ही बदल दी... गर्मी के मौसम में खासकर अगर आप देहात में भी जायेंगे तो पेप्सी-कोक ही मंगाये जायेंगे आपकी कायदे से खातिर के लिये... पेप्सी-कोक को चाव से पीते और उसी दुकान के बगल बिक रहे जूस (जो कि सस्ता भी है) की ओर झाँक कर भी न देखते अपने बच्चों को देख आत्मा को कष्ट पहुंचता है मेरी... यह हमारी भी नाकामी ही है कि हम अपनी जूस की दुकान चलाने वालों को ' फूड सेनिटेशन व हाइजीन' के बारे में जागरूक नहीं कर पाये... और कई ग्राहक इसीलिये मजबूरी में भी कोक-पेप्सी पीते हैं...

दूसरा...

केन्चुकी फ्राइड चिकन, मैक डोनाल्ड, कैफे कॉफी डे, बरिस्ता, डोमिनो, पिजा हट जैसे ब्रांड जब भारत में अपनी दुकानें खोले थे... तो इसी तरह की आशंकाओं के चलते विरोध हुआ था... पर आज क्या हाल है... बाकी की दुनिया में इनका ग्राहक वहाँ का आम आदमी है... पर भारत में केवल उच्च वर्ग व उच्च मध्य वर्ग ही इनका ग्राहक बन पाया है अभी तक... यह और बात है कि इनकी आड़ में भारत के परंपरागत स्नैक, फास्ट-फूड बेचने वालों ने भी अपने दाम काफी बड़ा दिये और शर्माशर्मी अपने ग्राहक के बैठने और आराम के लिये बेहतर सुविधायें भी दी... यानी इनके आने से भारतीय दुकानदार का फायदा भी बढ़ा व प्रोफाइल भी...

कुछ इसीलिये मैं अपने को इस कदम के समर्थन या विरोध में खड़ा नहीं पाता... अभी भारत के दस लाख से ज्यादा की आबादी वाले केवल ५३ शहरों के लिये इसे खोला गया है... ट्रायल के तौर पर आजमाने के लिये बुरा नहीं है यह आइडिया... चार पाँच साल बाद इसकी समीक्षा हो... और अगर यह कंपनियाँ उपभोक्ता को कम कीमत पर सामान देने, उत्पादक को उसकी जायज कीमत देने तथा बिचौलियों के नाजायज मुनाफे पर रोक लगाने के अपने दावे पर खरी न उतरें तो किसने कह दिया कि अब आगे और जॉर्ज फर्नांडीज नहीं पैदा होंगे इस देश में... :)

बाई द वे, मुझे यह जरूर बताइयेगा कि सिंगल ब्रांड रिटेल में विदेशी निवेश की सीमा ५१% से बढ़ा १००% करने का भी कोई विरोध कर रहा है क्या कोई इस देश में... जबकि यह फैसला सीधे-सीधे ज्यादा दूरगामी व हमारी अर्थव्यवस्था पर खराब असर डालने वाला है... यह पब्लिक को दिखाने के लिये राजनीतिक दलों द्वारा किये जा रहे जुबानी जमाखर्च, धरनों, बंद व विरोध प्रदर्शन से प्रभावित नहीं होइये... अंदरखाने सब मिले हुऐ हैं... बस केवल भावनाओं पर मरहम लगाया जा रहा है... दिख नहीं रहा कि किस तरह बेशर्म होकर प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक दोनों मीडिया इस फैसले में हमारे फायदे को रेखांकित कर रहे हैं...

गोलमाल है भई सब गोलमाल है इस मुल्क में...

इसलिये मेरे साथ साथ पोस्ट की शुरूआत में लिखी चार लाइनें एक बार फिर पढ़िये...

सीना चार इंच फूला कि नहीं ?


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गुरुवार, 17 नवंबर 2011

कॉरपोरेट भ्रष्टाचार, यहाँ है काले धन का मूल स्रोत, उठाओ आवाज !!! पर यह आवाज क्या कभी उठेगी भी ?

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अपनी पिछली पोस्ट में मैंने इस बात की ओर ईशारा भी किया था, और इत्तेफाक देखिये कि वह बात आज ही जाहिर भी हो गई...
देखिये...
यह लिंक
और
यह...
और
यह भी...
उद्धृत करता हूँ...


NEW DELHI: The Central Information Commission has asked RBI to make public the names and other details of top 100 industrialists of the country who have defaulted on loans from public sector banks.

The commission also directed the central bank to post on its website complete information on all such industrialists as part of suo motu disclosure mandated under section 4 of the
RTI Act before December 31 and update it every year. RBI had objected to making this information public saying it was held by it in fiduciary capacity and disclosing it would adversely affect economic interests of the state.

Information commissioner Shailesh Gandhi
agreed that information was fiduciary in nature but said such exemption did not stand when there was larger public interest in the disclosure. The order was in response to an RTI application filed by Haryana-based P P Kapoor, who had sought details of default in loans taken from PSU banks by various industrialists besides list of defaulters, top 100 defaulters, name of the businessman, address, firm name, principal amount, interest amount, date of default and date of availing loan.

During the hearing, Gandhi asked RBI if the information about loan defaulters was held by it as part of statutory requirements. The PIO admitted that banks were providing information in fulfillment of statutory requirements. tnn


Gandhi in his order said, "In fact, information about industrialists who are loan defaulters of the country may put pressure on such persons to pay their dues. This would have the impact of alerting citizens about those who are defaulting in payments and could also have some impact in shaming them."


He said there was no doubt that details of top industrialists who had defaulted in repayment of loans must be brought to the citizens' knowledge and there was certainly a larger public interest that would be served on disclosure of the same, hence clause of fiduciary information did not stand.


"This (disclosure) could lead to safeguarding the economic and moral interests of the nation. The commission is convinced that the benefits accruing to the economic and moral fibre of the country far outweigh any damage to the fiduciary relationship of bankers and their customers if the details of the top defaulters are disclosed,"
he said. 


यह एक बहुत पुराना बिजनेस फंडा है हमारे बिजनेस घरानों का, आठ कंपनी खोलो, सात का लोन पचा जाओ और आठवीं को चमका कर रातों रात बिजनेसजगत का सितारा बन जाओ... १२० करोड़ के देश में महज १०० ऐसों के नाम जाहिर करने से कुछ नहीं होगा... कम से कम १२०० के नाम जाहिर हों और यह भी जाहिर हो कि उनकी कौन कौन सी कंपनियाँ सफलतापूर्वक चल रही हैं... काले धन का असली स्रोत यहीं पर है... पर क्या इनके खिलाफ आवाज उठेगी... शायद कभी नहीं... क्योंकि एनजीओ को, धार्मिक ट्रस्टों को, योग व आयुर्वेद के ट्रस्टों को अनाप-शनाप चंदे का पैसा देने में भी यही आगे हैं... और जबानी लफ्फाजी छोड़ कोई अपने पैरों पर कुल्हाड़ी नहीं मारने वाला !...अपने आकाओं के खिलाफ कैसे बोलेगा कोई ?

सुन रहे हो न भाई लोग !




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रविवार, 13 नवंबर 2011

क्या इनकी भी आर०सी० कटेगी कभी ? जनता के पैसे से ' प्रभुओं ' की हवाई उड़ानें क्यों ?

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हमारे हिन्दुस्तान का गाँव-देहात का आदमी जिस एक चीज से शायद सबसे ज्यादा घबराता है वह है उसके नाम की आर०सी० का कटना... आर०सी० बोले तो रिकवरी चालान... किसी भी सरकारी देय या बैंक से लिये किसी कर्ज के मामले में एक आम हिन्दुस्तानी ने जरा सा डिफाल्ट किया नहीं कि तड़ से कटी आर०सी०... फिर क्या होगा... रेवेन्यू विभाग का कोई भी अधिकारी, एस०डी०एम०, तहसीलदार, नायब तहसीलदार, कानूनगो, लेखपाल या कई मामलों में तो इनके ड्राईवर भी एक या दो खाकी वर्दी वालों के साथ उसे उसके घर से उठा ले जायेंगे व उसे तहसील की हवालात में बंद कर देंगे... उसे छोड़ा तभी जाता है जब उसके घरवाले कुल देय का आधा-तिहाई जमा कर दें।

आज कुछ इसी तरह की बात हो रही है, निजी क्षेत्र की भारतीय विमान कंपनियाँ पिछले कुछ समय से घाटे में हैं... 'बेलआउट' की माँग कुछ इस तरह से की जा रही है मानो इन कंपनियों को जिन्दा रखने से गुरूतर कोई दायित्व सरकार का नहीं है... हमेशा की तरह हमारे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के हजारों-हजार करोड़ रूपयों के इन कंपनियों में एक्सपोजर का हवाला दिया जा रहा है... आइये देखते हैं कि हुआ क्या है...

पारदर्शिता के इस जमाने में कुछ अगर पूर्णत: अपारदर्शी है तो वह है हमारा कॉरपोरेट जगत... खास तौर पर हमारे कॉरपोरेट घराने... पीढ़ियों से यह घराने सरकारी यानी जनता के पैसे पर पलते आये हैं... इनके काम करने का तरीका सीधा-सादा है... महज चार-पाँच करोड़ की सीड कैपिटल से यह किसी भी नये बिजनेस वेन्चर के प्रमोटर-सर्वेसर्वा बन जाते हैं... एक आम हिन्दुस्तानी को भले ही महज पचास हजार के कर्ज के लिये हमारे बैंक जूते घिसवा दें... परंतु इन घरानों के नाम पर हमारे सरकारी बैंक बिना कुछ आगा-पीछा सोचे सैकड़ों करोड़ रूपये निवेश कर देते हैं... रातों रात एक बड़ी कंपनी खड़ी हो जाती है... फिर IPO ( इनीशियल पब्लिक आफरिंग) लाया जाता है, दूर-दराज बैठे निवेशक अपना पैसा लगाते हैं... और प्रमोटर ६०-७०% की हिस्सेदारी अपने पास रखे हुऐ उन शेयरों के मार्केट कैपिटलाइजेशन के आधार पर हजारों हजार करोड़ का मालिक बन बैठता है... कंपनी चली तो प्रमोटर के बल्ले-बल्ले... और नहीं चली तो सरकारी बैंकों के एनपीऐ की लंबी चौड़ी लिस्ट में एक नाम और जुड़ जाता है... प्रमोटर तब तक सैकड़ो करोड़ कमा-खपा-पचा होता है... फिर किसी नये बिजनेस में मौके तलाशे जाते हैं...

आज पूरी दुनिया की इकॉनामी में मंदी का दौर है... पर तीन-चार साल पहले जब अर्थव्यवस्था उछाल पर थी तो अतिशयोक्ति पूर्ण  Future Projections  का अंदाज लगाते हुऐ हमारी विमानन कंपनियों ने विमान निर्माता कंपनियों को बड़े-बड़े ऑर्डर दे दिये... इन आर्डरों के पीछे निहित स्वार्थ रहे... हवाई अड्डों में इतना महंगा निजी निवेश हो गया कि आज विमान कंपनियों को एअरपोर्ट के टैक्स देने में आफत आ रही है... कॉरपोरेट टॉप ब्रास को इन तमाम डील मेकिंग व काम के पदों पर बैठे लोगों को वाइन-डाइन कराने के मेहनत भरे (?) काम के लिये करोड़ों की तनख्वाहें दी गईं... एयरलाइन के पायलटों को इतने ज्यादा वेतन भत्ते दिये गये जिसके वे हकदार नहीं थे... जरा सोचिये, उदारीकरण के इस दौर में पायलट बनने के लिये केवल १०+२ पास होना ही तो जरूरी है... पिता के पास यदि पैसा हो तो बिना कोई प्रतियोगिता दिये आस्ट्रेलिया, सिंगापुर या अमेरिकी-लैटिन अमेरिकी फ्लाईंग स्कूलों से साल-छह महीने में पायलट बन कर तैयार हो जाते हैं... खर्चा भी हर हाल में डोनेशन मेडिकल कालेज से एम०बी०बी०एस० करवाने से कम ही होगा... वह दिन दूर नहीं जब हमारे महानगरों में कोई बड़ा पत्थर हिलाने पर उसके नीचे से दो-तीन पाइलट टहलते निकलेंगे... कुछ इसी तरह केबिन-क्रू को भी ग्लैमराइज व ओवर-पेड बना दिया गया... खास तौर से पायलट तो इतने अड़ियल हो गये हैं कि एयर इंडिया के पायलटों का एक धड़ा महज इसीलिये हड़ताल पर जाने की धमकी देता है क्योंकि वह नहीं चाहता कि दूसरे धड़े के पायलटों को बोईंग के नये प्लेन ' ड्रीमलाईनर' को चलाने का मौका मिले...

कुल मिलाकर पूरी तरह से आश्वस्त होते हुऐ कि यदि पैसा डूबेगा तो सरकारी ही (जो बेचारी जनता का ही है)... एक आर्थिक रूप से अक्षम मॉडल के आधार पर हमारे विमानन क्षेत्र के लिये सपने गढ़े गये... किराया जो तेल के खर्चे, एयरपोर्ट के खर्चे, विमान के लीज के किराये, स्टाफ की तन्खवाह व लोड फैक्टर आदि के आधार पर निर्धारित होना था... असामान्य रूप से घटा दिया गया, कई मामलों में तो हवाईजहाज का सफर ट्रेन के सफर से भी सस्ता कर दिया... इतना सस्ता किराया देख पब्लिक हवाई जहाजों की ओर दौड़ी... तो हवाई उड़ान भरने वालों की दिनोंदिन बढ़ती संख्या दिखाकर सार्वजनिक बैंकों को भविष्य में मोटे लाभ के सपने दिखा उनका और पैसा कंपनियों में फंसा दिया गया...

अब जब यह विमानन कंपनियाँ घाटे में डूब रही हैं तो गुहार लगाई जा रही है सरकार से 'बेलआउट' की... जबकि सरकार को इन सबकी आर०सी० काटनी चाहिये... बैंको ने यह जो एक्सपोजर लिया है इन कंपनियों में उसकी जमानत के तौर पर जो भी चल या अचल संपत्ति रखी गई थी वह भी जब्त हो... सरकारी पैसा 'प्रभु-वर्ग' को हवाई यात्रा करवाने के काम में तो हरगिज-हरगिज नहीं इस्तेमाल होना चाहिये...

क्या इन सब प्रमोटर-मालिकों भी आर०सी० कटेगी कभी ? लोकपाल के दायरे में आयेगा क्या कभी कॉरपोरेट भ्रष्टाचार ? सुन रहे हो क्या India Against Corruption ?



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शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

धन्यवाद, धन्यवाद, धन्यवाद, Oh God, If there is a God !!!

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जब भी हम साथ खरीदारी करने जाते हैं तो कपड़े की दुकान पर यह अक्सर होता है कि श्रीमती जी किसी किसी कपड़े को दुकानदार को दिखाने के लिये खोलने ही नहीं देती... एक नजर में ही उसे नापसंद कर बस मुँह बिचका कर कुछ और दिखाने को कहती हैं... मैं मन ही मन मुस्कुराता हूँ उस समय... दुकानदार भी कुछ नहीं कहता... हम दोनों ही इस बात को जानते हैं कि जिस कपड़े को एक ग्राहक ने देखने से ही इन्कार कर दिया उसे भी कोई दूसरा पसंद कर ले जायेगा... पहन कर इठलायेगा और शौक से पहनता रहेगा काफी समय तक... अच्छी दुकान चलने के लिये जरूरी है कि वहाँ हर पसंद, हर रंग, हर किस्म और हर बजट के कपड़े हों...

अपनी यह दुनिया भी कुछ ऐसीइच है ना... सोचिये कितनी बेरंग, कितनी उबाऊ, कितनी अझेल हो जाती यह दुनिया, अगर सारे के सारे एक ही तरह से सोचने लगते, सबकी आस्था एक ही होती, सबका धर्म एक ही होता, सबका ईश्वर भी एक ही होता, सबका आहार भी एक सा ही होता... सारे सारे के सारे शाकाहारी ही होते या फिर सारे के सारे माँसाहारी ही होते... फिर कहाँ होता अपने आहार, अपने कर्मकान्ड, अपनी पूजा पद्धति, अपने त्यौहार को मनाने का तरीका, अपने लाश को निपटाने का तरीका, अपने धर्म-अपने ईश्वर, अपने निष्कर्ष, अपने नजरिये को दूसरे पर लादने-दूसरे के मुकाबले बेहतर बताने की होड़... कहाँ जरूरत होती सवाल-जवाब की, आरोप-प्रत्यारोप की, स्पष्टीकरण की, जिद पर अड़ने की, दूसरे को जिद्दी बताने की... सारी दुनिया एक ही रंग की सी हो जाती... क्या ऐसी दुनिया में जीने में कोई मजा आता, आनंद मिलता... हम सबके सोचने के तरीके, नजरिये, आस्था, धार्मिक विश्वास/अविश्वास व जो हमें दिख रहा है उसके आधार पर निकाले गये हमारे निष्कर्षों का यह अंतर ही हमारी इस दुनिया को रंगीन, दिलचस्प, रहने लायक व दिनोंदिन इंसान के लिये और बेहतर बनाता है... सबसे बड़ी बात यह है कि यही अंतर हमें रात को चैन की नींद देता है क्योंकि अगले दिन फिर एक लड़ाई जो लड़नी होती है हमें... अपने विश्वासों को सही ठहराने की !

संशयवादी हूँ मैं, और संशयवादी की प्रार्थना तो आपको पता ही है...

Oh God, If there is a God, Save my Soul, If there is a Soul !

आज उसी प्रार्थना में कुछ और जोड़ने का मन कर रहा है, बस ऐसे ही...

Oh God (If there is a God), Thanks (If you understand it) for creating such a diverse world (If you really created it) !



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रविवार, 6 नवंबर 2011

भारत महादेश के 'नागरिक समाज' की जबरिया प्रतिनिधि बनी एक 'चौकड़ी' और उसके चंगुल में अन्ना !

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Very soon, I am thinking on the lines of restructuring the Core Committee. I am hereby informing all the members of Team Anna. The reason being I have received letters from all over the country and states in favor of this agitation saying, ‘I am ready to pledge my life for this noble cause.’ The letters are written by retired Supreme Court Judges, retired High Court Judges, Brigadiers and Colonels from Army, Professors and Principals and educated people with idealism. Soon, these people will be categorized taking in to consideration the type of work they are willing to do. I have decided to put to use such people from all over the country and states who are willing to do voluntary service to the society.
The applicants have no expectations whatsoever and have applied with the aim of serving the nation and the society at large. Now we need to ensure these people and expand the members of Team Anna. Also we need to have able people and form a working committee. All members from every state will be given preference when forming a Core Committee. For effective communication they will be linked on-line.
The expenses of food and shelter for say 100 volunteers will be fulfilled by donations from people having clean character. It will enable us to build an effective agitation throughout the country. We have a long battle to fight ahead. In order to have a corruption-free India we can put all this to use.The people who have been alienated from this agitation…. I believe that not only India but for other countries too this will serve as a good example to rid their country off corruption. We do not want to form organizations but create volunteers on District and State level.
When there is an agitation happening at national level you will see people rising for the occasion from every state. In this struggle there won’t be a President, a Secretary or a treasurer. People will only work in the capacity of volunteers. Naturally we will need financial aid. No cash will be accepted. Donations in form of cheque or draft are welcome. But it should come from people having belief in lakhs of martyrs like Bhagat Singh, Rajguru and Sukhdev.
K.B Hazare
23.10.2011



ऐसा चाहा था अन्ना ने !

आंदोलन की 'कोर कमेटी' को और व्यापक व विस्तारित करने की इस इच्छा में कुछ भी गलत नहीं है...


अब इस बात का पुख्ता सबूत भी पेश कर दिया गया है कि वाकई अन्ना हजारे ने ही ऐसा चाहा था, फिर भी ऐसा लिखने पर राजू पारूलेकर को निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा टारगेट कर बदनाम व अपमानित किया जा रहा है... 

फिर भी मौन हैं अन्ना...

यद्मपि मैं इस आंदोलन के तौरतरीकों को सही नहीं मानता और परिणामों को लेकर भी अन्ना जितना आशावान नहीं, परंतु एक व्यक्ति के तौर पर अन्ना का प्रशंसक हूँ... इसलिये इस प्रकरण पर उनका रवैया खलता है... क्या यह आशा नावाजिब है कि एक ऐसा शख्स जिसकी ओर देश एक आशा से देख रहा हो, और कुछ नहीं भी तो कम-से-कम सत्य को कहने-स्वीकारने का साहस दिखाये...

मैं आपके लिये दिल से चिंतित हूँ अन्ना... 

आप कुछ कुपात्रों के चंगुल में फंसे दिखते हैं अब...

मेरी शुभकामनायें आपके साथ हैं !

 










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