शुक्रवार, 28 अक्तूबर 2011

दीपावली के अगले दिन भी वह गया क्यों नहीं ?

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हफ्ते में तीन चार बार सुबह-सवेरे बस यों ही अपने शहर की सड़कों पर एकाध घन्टा तेज-तेज चलने या फिर दौड़ने की आदत सी बन गई है ...

बहुत कुछ दिखता है इस सुबह की सैर के दौरान...

इस बार दीवाली के अगले दिन जो दिखा, उसी से जनमी है यह पोस्ट...





वह गया क्यों नहीं ?

सुबह साढ़े पाँच बजे
बड़े चौराहे पर
बिखरे पड़े हैं
रात के जश्न के निशान
चिथड़ा-चिथड़ा कागज के टुकड़े
जो कभी थे बम की झालर
कुछ फुंके हुऐ अनार
आसमानी आतिशबाजी के खोल
और खूब सारे खाली डिब्बे

उन्ही सब के बीच है 
कूड़ा बीनता वह परिवार
टाट के हाथ सिले
बड़े बड़े थैले हाथ में लिये
बटोर रहे हैं वे
पटाखों के खाली डब्बे
माँ बाप को जल्दी है
अगले चौराहे पर जाने की
वह कह रहे हैं बच्चों को
जल्दी से डब्बे बटोरने को

पर बच्चे तो बच्चे हैं
वह कर रहे हैं नजरअंदाज
हर झिड़की हर गाली को
और ढूंढ रहे हैं कुछ
बिना फूटे बमों को
जलने से बच गये पटाखों को
अधजली फुलझड़ियों को भी
मानो कर रहे हों खोज
थोड़ी सी रोशनी की
उजाले की, उत्सव की
अपने लिये भी

दीप जले, उत्सव मना
चले पटाखे, हुई रोशनी
पर अंधेरा गया क्या ?

यह जाता क्यों नहीं ?



...




किस्मत

अगले चौराहे पर दिखता है
एक ढेर सा किनारे पर
पास जाकर देखता हूँ
हैं बहुत सी मूर्तियाँ
लक्ष्मी-गणेश की
छोटे बड़े हर साईज की
जिन्हें फेंक गया है बेचने वाला
होगा इनमें शायद कोई नुक्स
पेंट उखड़ा होगा किसी का
या होगा कोई किनारा टूटा
नहीं होगा किसी का जोड़ा
नहीं होगा किसी का कोई ग्राहक

सोच में पड़ जाता हूँ 
इन्हीं में कुछ मूर्तियाँ
होंगी आज विराजमान
पूजास्थलों पर
वे पूजी जाती रहेंगी
अगले साल तक या जीवन भर
और कुछ का यह हाल है

बड़े अजीब हो भगवान 
आप भी ना
महज आपका बनाया इंसान ही नहीं
इंसान के हाथ बनाई गई
आपकी मूर्तियाँ भी
आती हैं इस दुनिया में
अलग-अलग किस्मत
जुदा-जुदा हश्र के साथ!




 


...

14 टिप्‍पणियां:

  1. वह गया क्यों नहीं बेहतरीन है।
    और
    किस्मत होती तो है,
    पर पहले से नहीं लिखी जाती,
    उसे कर्म और परिस्थितियाँ मिल कर लिखते हैं।

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  2. दीवाली के अगले दिन के दृश्‍य का सही चित्रण ..

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  3. बिल्कुल यही देखा मैने भी और लिखना चाहता था। यह जरूर कहूंगा कि आपने कहीं बेहतर लिखा!

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  4. both poems are true to life and very well composed
    we all felt the same way i think

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  5. मन से जाने पर ही अन्धकार जाता है ... बेहतरीन ..

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  6. सच को उजागर करती बढ़िया प्रस्तुति ...मेरे मन का सवाल भी यही है कि वो गया क्यूँ नहीं?

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  7. देखते तो सभी हैं। समझें. समझा सकें, वही तो कविता है।

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  8. पहली -सब की अपनी नियति है । वे इस में भी खुश रहते हैं ।
    दूसरी --इन्सान ने अपने ही हाथों स्वार्थ रचा हुआ है ।

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  9. दो नग्न सत्य आपने सामने धर दिए हैं ..दीवाली का प्रकाश मद्धिम पड़ गया है....और भगवान् की मूर्तियाँ तो जनाब वह भी मनुष्यों को गढ़ने में यही भूल चूक करता है

    आसमानी आतिशबाजी=यह शब्द युग्म मैंने भी आज इस्तेमाल किया !

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  10. देख कर व्यथित होता है मन , मगर कब तक !
    यह भी एक हकीकत है , क्या कीजे!

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  11. पिछले साल बकरा ईद के आसपास एक एक आर्टिकल आपको पढने को मिला था, अब उस पर जवाब पढने को मिला,, आपके विचार जानना चाहूंगा

    बीचों-बीच फंसे (प्रवीण शाह) जिनके जेहन से उठते ११ सवाल... और उत्तर देंगे हम।
    http://niraamish.blogspot.com/2011/11/animal-sacrifice-is-inhuman.html


    वैसे हमारी तरफ से इस ईद के तोहफे के लिये मौजूद है

    चर्चा-ए-गोश्तखोरी: चर्चा-ए-गोश्तखोरी -- बशीर अहमद और महात्मा नित्यानंद
    http://swami-nityanand-debate.blogspot.com/2011/08/blog-post.html

    गौपूजा-- आजका सबसे बडा देशद्रोह है- Rantan Lal http://www.scribd.com/doc/62151412/Gao-pooja-Ratan-Lal-Bansal

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  12. मुझे तो लगता है नियति से अधिक यह सब अटकलपच्चू या रैंडम है.
    सत्य, कटु सत्य को दिखाती बढिया कविताएँ.
    घुघूतीबासूती

    उत्तर देंहटाएं

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