गुरुवार, 25 अगस्त 2011

आमरण अनशन पर अन्ना हजारे : अवतार के अवतरण की प्रतीक्षा में नतमस्तक हमारे बीच के चंद लोग !!!

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युग-युगों से हम अवतारों की छांव में जीते, अवतारों को पूजते और एक नये अवतार की प्रतीक्षा करते देश रहे हैं... हमारा विश्वास रहा है कि चाहे कितनी भी गंदगी हो, चाहे उसे फैलाने में हम सब भी बराबर के साझीदार रहे हों, फिर भी कभी न कभी एक अवतार जन्मेगा और एक झटके में सब कुछ उजला साफ कर देगा... आज की 'स्वयंभू नागरिक समाज की प्रतिनिधि' यह 'टीम अन्ना' जनलोकपाल के रूप में एक ऐसे ही अवतार के अवतरण का सपना दिखा रही है ( जो ६५% भ्रष्टाचार को शर्तिया खत्म कर देगा, न जाने कहाँ से आया यह आंकड़ा )... और इसी कारण कुछ के लिये अन्ना मसीहा-उद्धारक समान हो गये हैं... जिसे देखो कह रहा है ' मैं हूँ अन्ना '...

यह खास तौर पर शहरी मध्य और उच्च मध्यवर्ग का आंदोलन है, आप गौर से यदि देखेंगे तो समाज के दलित वर्ग, मेहनतकश-मजदूर, छोटे किसान, रोज कुआं खोदने-रोज पानी पीने वाले वर्ग की कोई हिस्सेदारी इसमें है ही नहीं... यह सभी के लिये गंगा नहाने का मौका भी है... मरीज की अंटी की आखिरी पाई भी खींच लेने वाले डॉक्टर, मुवक्किल को जोंक की तरह चूसने वाले और फिर दूसरी पार्टी से मिल जाने वाले वकील, नेताओं और धंधेबाजों के बीच दलाली करते, पेड न्यूज निकालते प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के छोटे-बड़े नाम, शिक्षा के नाम पर मुनाफे की दुकानें खोले शिक्षाविद , हिंसा और सेक्स को दिखा अपनी तिजोरियाँ भरते फिल्मकार, बिना सुविधा शुल्क लिये कभी कोई काम न करने की कसम खाये सरकारी कर्मचारी, देश के संसाधनों का अंधाधुंध मुनाफा कमाने के लिये बेलगाम दोहन करते कॉरपोरेट हाउस... जिंदगी भर घूस की कमाई खा अपनी सात पीढ़ियों का इंतजाम कर चुके रिटायर नौकरशाह... किस किस का नाम लिया जाये... सभी तो 'इन्डिया अगेन्स्ट करप्शन' की टीशर्ट पहने और 'मैं अन्ना हूँ' लिखी गाँधी टोपी पहने गंगा नहा रहे हैं...

इस आंदोलन के नेता कहते हैं कि वे जीवन में कभी चुनाव नहीं लड़ेंगे... वह बार बार मंच से सभी राजनीतिज्ञों के चोर और भ्रष्ट होने की बात भी कहते हैं और भीड़ तालियाँ बजाती है... यह आंदोलन राजनीति को हेय और राजनीतिज्ञों को गिरा हुआ बनाकर पेश कर रहा है... यह संसदीय लोकतंत्र का अनशन नाम के अस्त्र से गला दबा चार या पाँच लोगों का सोचा हुआ 'भस्मासुर' को जन्म देता एक बिल उसी संसद से पारित करवाने का भी मंसूबा रखता है... इसके कर्ता-धर्ताओं को इतनी जल्दी है कि वे संसद की स्थाई समिति के सामने तक जनलोकपाल बिल को नहीं जाने देना चाहते... क्या सारी बुद्धि, ज्ञान व देश के प्रति ईमानदारी का ठेका सिर्फ और सिर्फ 'टीम अन्ना' के पास ही है/ रहना चाहिये...

जैसे अंदाजे लगाये जा रहे हैं कि यह आंदोलन बड़े मीडिया हाउसों व कार्पोरेट ग्रुपों द्वारा समर्थित पोषित है... संसदीय लोकतंत्र को कमजोर करने व समस्त राजनीतिज्ञों को कालिख पुता दिखाने के पीछे उनके अपने निहित स्वार्थ हैं... ऐसा होने पर वे देश के सभी संसाधनों का बेरोकटोक निजी लाभ के लिये दोहन कर सकेंगे... जनलोकपाल के दायरे में निजी कॉरपोरेट घरानों, मीडिया हाउसों व एनजीओ को भी शामिल होना चाहिये... पर यह माँग कोई उठा रहा है क्या ?... एक बार यह माँग तो उठाईये फिर देखिये मीडिया कैसे आपको अछूत बना देता है...

अनशन को २०० से ज्यादा घंटे हो चुके हैं... समय दोनों पक्षों के पास कम बचा है... टीम अन्ना के पास इसलिये क्योंकि अब ज्यादा समय तक अनशन जारी रखने से अन्ना के शरीर के विभिन्न अंगों को अपूरणीय क्षति हो सकती है... सरकार के पास इसलिये क्योंकि अन्ना के जीवन या स्वास्थ्य को कोई नुकसान होने की स्थिति में उसके सामने बड़ी मुश्किल खड़ी हो जायेगी... इसलिये अब इस आंदोलन ने ज्यादा नहीं चलना है...

मेरे कुछ मित्र कहते हैं कि इस आंदोलन के नाम पर सरकार और टीम अन्ना के बीच 'नूरा-कुश्ती' हो रही है... 'टीम अन्ना' को नायक होने का मौका मिल रहा है और सरकार को घोटालों के कारण दागदार हो गई अपनी छवि को अगले साल होने वाले महत्वपूर्ण चुनावों से पहले फिर से चमकाने का... हो सकता है कि मेरे मित्र गलत हों, फिर भी एक संभावना तो है ही...

और यदि यह नूरा कुश्ती नहीं है तो आज रात या कल में ही सरकार को अन्ना को अपनी अभिरक्षा में ले उनके अनशन को चिकित्सकीय कारणों से तुड़वाना होगा... और फिर से हम वहीं खड़े होंगे जहाँ अप्रैल में खड़े थे...

अवतार शायद अभी नहीं उतरेगा... क्या किया जाये... वैसे घोर कलियुग भी तो नहीं आया है अब तक... अवतार ने आना तो तभी ही है न ?





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11 टिप्‍पणियां:

  1. कहा गया है न अन्नो वै ब्रह्म:। लेकिन यहाँ अन्ना वै ब्रह्म: हो गया है देश में। सही तो कहा है कि निम्न मध्यवर्ग और निम्न वर्ग शामिल नहीं है। बस कुछ लोग ज्यादा बुद्धिमान हो गए हैं और देश में अब कानून उन्हीं के जिद्दी स्वभाव से चलेगा। मुद्दा तो रामदेव का इससे बेहतर था, भले नीतियाँ गलत थीं कुछ। एक प्रतिशत भ्रष्टाचार कम होगा, इसमें संदेह है। भकोल किस्म के लोग !

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  2. चुनाव लड़ने में बुराई क्‍या है, कहें कि हम चुनाव लडेंगे, आप इसी तरह साथ दीजिएगा. हम वह सब कुछ करेंगे जो हम चाहते हैं, आप चाहते हैं, वरना... (तब की तब बात होगी.)

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  3. मनुष्य की नैसर्गिक प्रवृत्ति रही है वह एक गाड फिगर ढूंढता है -अन्ना मिल गए हैं !

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  4. नूरा कुश्ती वाली बात सही भी हो सकती है.... अनशन के पहले ही दिन जब अन्ना को जेल में भेजा गया था, तब शाम को एन.डी.टी.वी. पर ब्रेकिंग न्यूज़ फ्लैश हुई थी कि प्रशांत भूषण और सरकार में हुई बातचीत में कई मुद्दों पर सहमति बन गयी है... उसके बाद एंकर भी काफी देर तक यही बताता रहा... यही न्यूज़ कई और मीडिया सूत्रों से भी पता चली थी... लेकिन थोड़ी देर बाद अचानक न्यूज़ फ्लैश होना बंद हो गयी और उसके बाद फिर कभी एन.डी.टी.वी. पर उसके बारे में चर्चा भी नहीं हुई...

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  5. देख लो हिन्दओ !!!
    60 साल में ही तुमने क्या दुर्गत बना दी है देश की।
    कहते थे कि गुलाम वंश ने ये किया और मुगल वंश ने वह किया।
    गजनवी ने अमुक जुलम ढाया और अंग्रेजो ने जलिया वाला बाग बना दिया परंतु हिन्दुओ ने जब शासन किया तो कितने क्विंटल हिन्दू मारे ?
    कोई तौलने वाली मसीन तौल नहीं सकती।।।
    अब तो बंद कर दो बेकार का राग और बन जाओ

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  7. ऐसा होने पर वे देश के सभी संसाधनों का बेरोकटोक निजी लाभ के लिये दोहन कर सकेंगे... जनलोकपाल के दायरे में निजी कॉरपोरेट घरानों, मीडिया हाउसों व एनजीओ को भी शामिल होना चाहिये...

    बेहतर...लाजवाब...

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  8. अन्‍ना हजारे ने कहा कि देश में जनतंत्र की हत्‍या की जा रही है और भ्रष्‍ट सरकार की बलि ली जाएगी। यानि खून के बदले खून?

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  9. भारतीयों में अनुयायी बनने की अप्रतिम क्षमता है।

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  10. यह भी एक नजरिया है ... पता नहीं क्या सही है, क्या नहीं ... कुछ समझ में आता नहीं कि कौन बड़ा राजनीतिज्ञ है ?

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