रविवार, 14 अगस्त 2011

आमरण अनशन पर अन्ना हजारे : आजादी की दूसरी लड़ाई तो नहीं ही है यह !!!

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अचानक मुझे आज वीपी सिंह की बहुत याद आ रही है... वीपी यानी दिवंगत भूतपूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह जी की... वे राजीव गाँधी जी की सरकार में मंत्री थे... तभी बोफोर्स घोटाले का खुलासा हुआ... इस भ्रष्टाचार के विरोध में वीपी ने सरकार व पार्टी दोनों को छोड़ दिया... देश में घूमे, जनता के बीच अलख जगाई, अपनी बात लोगों को समझाई... और १९८९ के चुनाव में कांग्रेस पार्टी को सत्ता से हटाने में कामयाबी हासिल की...

शायद सन १९९० में ही वीपी ने बरसों से धूल खाती जस्टिस बी० पी० मंडल आयोग की संस्तुतियों को भी लागू करने का फैसला किया... बहुत विरोध हुआ उनका... मैं क्योंकि समाज के उस वर्ग से आता हूँ जो जाति के कॉलम में 'सामान्य' लिखता है तथा मेरा परिवेश भी शहरी था, तो उस विरोध में मैं भी पूरे जोर शोर से शामिल था... बहुत बाद में जब मैंने हमारे गाँवों में फैली असमानता देखी तब समझ में आया कि मंडल रिपोर्ट को लागू करना कितना दूरगामी व सही कदम था... बहरहाल तमाम विरोध के बावजूद वीपी नहीं डिगे और नतीजे के तौर पर देश का सामाजिक-राजनीतिक परिदॄश्य ही बदल गया...हाशिये पर रह रहा हमारे समाज का ही एक वर्ग राजनीति के सेंटर स्टेज पर आ गया और कालांतर में उसी वर्ग से बहुत सी कद्दावर राजनीतिक शख्सियतों का उदय हुआ...

यह बातें यहाँ लिखने का मकसद सिर्फ यही है कि अगर किसी को भी लगता है कि सरकार किसी मुद्दे पर गंभीर नहीं है तो अपनी बात को जनता के दरबार में ले जाना ही लोकतांत्रिक तरीका है... लोकतंत्र की विसंगतियों, विद्रूपों, विरोधाभासों व अन्यायों का हल भी हमेशा लोकतंत्र ने ही दिया है, आगे भी देगा और देता रहेगा...

' अनशन पर बाबा रामदेव ' लेखमाला के पहले ही आलेख में मैंने लिखा था कि पहले के इसी तरह के आंदोलनों की तरह ही यह अनशन भी कुछेक दिन में अपनी तार्किक परिणति को प्राप्त होगा... आज फिर वही लिखना चाहूँगा... मेरे पास ठोस वजहें भी हैं इसके लिये...
  • अन्ना के आमरण अनशन के मामले में सरकार को घेरती, गाल बजाती विपक्षी पार्टियों में से भी क्या कोई टीम अन्ना द्वारा सुझाये संशोधनों को संसद में बहस के दौरान लोकपाल बिल में शामिल करवाने को तैयार है... जवाब है नहीं... पर बड़े ही सुविधाजनक तरीके से इस तथ्य को छिपाया जा रहा है।
  • यह बार बार सभी संवैधानिक पदों-संस्थाओं के ऊपर एकक्षत्र राज करने वाले, किसी के भी खिलाफ करवाई करने की क्षमता रखने वाले भस्मासुर जैसे लोकपाल की माँग के पीछे के क्या निहितार्थ हैं।
  • अन्ना अपनी टीम के बुजुर्ग हैं...आमरण अनशन ही करना है तो उनकी टीम के अपेक्षाकृत युवा क्यों नहीं आगे आते...जिनका शरीर भूख-प्यास को ज्यादा लंबे समय तक सह सकता है...
  • किसी भी लोकतंत्र में विधायिका यानी संसद ही नये कानून बनाने का काम करती है... यह काम उसी का है भी... क्या इलेक्ट्रानिक मीडिया द्वारा पोषित-समर्थित, और फेसबुक-एसएमएस-मिस्ड कॉल-रंगीन टीशर्टों-डिजाइनर पोस्टरों-टोपियों-नारों-साउन्ड बाइट्स-विजुअल्स के जरिये चलते  डिजाइनर आंदोलन के जरिये स्वयं को ही सिविल सोसाइटी कहता-मानता एक छोटा सा समूह आमरण अनशन की धमकी दे संसद का यह काम छीन सकता है।
  • कल सुबह झंडा फहराने के बाद अपने आस-पास दिखते जनतंत्र की रीढ़  ' आम-जन ' को पकड़ पूछियेगा कि क्या विचार है उसका लोकपाल के बारे में... नब्बे फीसदी से ज्यादा मामलों में आप यही पायेंगे कि उसे पता तक नहीं होगा कि क्या बला है यह...
  • प्रधान मंत्री को लिखे पत्र में जिस तरह की भाषा व शब्दों का प्रयोग हुआ है वह टीम अन्ना के प्रति आश्वस्त नहीं करता... यह कभी नहीं भूलना चाहिये कि प्रधानमंत्री हमारे लोकतंत्र के मुखिया हैं व उनको पत्र लिखते हुऐ मर्यादा का उल्लंघन नहीं होना चाहिये था... 

यह तो हुई मेरे दिल की बात... अब जरा सरकार पर अलोकतांत्रिक और अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंटने के आरोपों पर भी बात कर ली जाये...

सबसे पहले तो कानूनी स्थिति जानी जाये... देश के वर्तमान कानून के मुताबिक आत्महत्या करना, आत्महत्या के लिये उकसाना, आत्महत्या करने में किसी की मदद करना, आत्महत्या की प्रक्रिया को प्रचारित-प्रसारित करना व उसका महिमामंडन करना सभी संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आते हैं... एक उदाहरण से तुलना कीजिये... मानिये कोई शख्स यह कहता है कि उसके सुझाये संशोधन सहित लोकपाल बिल यदि १५ अगस्त तक पारित नहीं हुआ तो सोलह अगस्त को वह जयप्रकाश पार्क में हजारों लोगों की भीड़ व मीडिया की मौजूदगी में आत्मदाह कर या जहर पीकर आत्महत्या कर लेगा... तो ऐसी स्थिति में सरकार को क्या मूकदर्शक बनी रहेगी या उसे मूकदर्शक बने रहना चाहिये... नहीं, बिल्कुल नहीं... अब इसी स्थिति की तुलना अपनी माँगें पूरी न होने की स्थिति में आमरण अनशन करने की घोषणा से करिये... आमरण अनशन भी एक तरह से आत्महत्या का प्रयास ही है... अन्ना की जान को अनशन के कारण खतरा होने की स्थिति में उनके अनशन को समाप्त करवा कर उनकी प्राण रक्षा करना सरकार का संवैधानिक दायित्व है... मुझे पूरी उम्मीद है कि वह इसे निभायेगी भी... और इस काम के लिये सरकार की निंदा करने से बड़ा दोगलापन नहीं है मेरी नजर में...

क्षमा करेंगे अन्ना... १६ अगस्त सुबह दस बजे से शुरू होने वाला आपका आमरण अनशन किसी भी कोण से देखने पर भी आजादी की दूसरी लड़ाई नहीं कहा जा सकता... मेरे जैसे अनेकों को आप केवल और केवल निराश ही कर रहे हैं...

बहरहाल, जो भी हो, इस पूरे प्रसंग से हम सभी में लोकतंत्र की एक बेहतर समझ विकसित हो...

इसी आशा के साथ...






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चित्र साभार: गूगल इमेजे्ज


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18 टिप्‍पणियां:

  1. प्रवीण जी
    आप ने जो सवाल उठाये है वो हु ब हु वही सवाल है जो कांग्रेस ने उठाये है ये आप के नहीं लग रहे है :)
    इन सब के जवाब अन्ना की टीम कई बार दे चुकि है शायद आप की नजर नहीं पड़ी, अभी दो तीन घंटे पहले एन डी टीवी पर हम लोग में एक बार फिर आप के सभी सवालों के जवाब दिये गये है सुना होता तो शायद आप की उलझन सुलझ गई होती | फिर भी कुछ के जवाब मै दे रही हु |
    १ ये आन्दोलन कांग्रेस सरकार के खिलाफ नहीं है पक्ष विपक्ष सभी भ्रष्ट है तो उनसे साथ की क्या उम्मीद किया जाये ये तो सभी के लिए चेतावनी है |
    २- राज्यों में बना लोकायुक्त क्या भश्मासुर है जिसके कारण येदुरप्पा को स्तीफा देना पड़ा | वो सिर्फ जाँच करेगा सजा तो न्यायलय ही देगी |
    ३- मुझे भी समझ नहीं आता की हमेसा गाँधी जी ही आमरण अनशन क्यों करते थे नेहरू पटेल ना जाने कितने बड़े जवान हट्टे कट्टे नेता थे वो क्यों नहीं करते थे अनशन ४- संसद जो उन सांसदों से बनी है जो पैसे के बल पर राजनितिक सामाजिक समीकरण के बल पर धर्म जाति की राजनिती के बल पर संसद में आते है जो कभी भी आम गरीब वर्ग का प्रतिनिधित्व नहीं करते है जो पार्टी का हुक्म मानते है और साह बानो केस हर जाने के बाद नया कानून बना देते है जो महिला अरखन को बहुमत होने के बाद भी सबकी सहमति के नाम पर लटका के रखते है जो जमीन अधिग्रहण के नाम पर राजनिती करते है किन्तु उसके लिए नया कानून नहीं बनाते है , जो अपने पार्टी के हिसाब से टाडा पोटा मकोका जैसा कानून बनाते है और विरोधी दलों के राज्यों में वैसे कानून नहीं बनाने देते है , जो पैसे ले कर अपना वोट बेच देते है जो पैसे ले कर संसद में सवाल करते है जो ....................................... ये सांसद जो असल में संसद क्या आप के आदर्श है आप इन पर भरोसा करते है |
    @क्या इलेक्ट्रानिक मीडिया द्वारा पोषित-समर्थित ..............................................
    लगता है आप ने अन्ना के अरविंद केजरीवाल के किरण बेदी के यहाँ तक की भूषण( कितने बड़े ख़राब वकील थे उसे छोडिये )बाप बेटो के काम के बारे में कुछ नहीं जानते है |
    ५- एक तरफ आप कह रहे है की
    @इलेक्ट्रानिक मीडिया द्वारा पोषित-समर्थित, और फेसबुक-एसएमएस-मिस्ड कॉल-रंगीन टीशर्टों-डिजाइनर पोस्टरों-टोपियों-नारों-साउन्ड बाइट्स-विजुअल्स के जरिये चलते डिजाइनर आंदोलन के
    दूसरी तरफ कह रहे है की लोगों को पता ही नहीं है | हा सही है की जायदातर लोगों को इसकी बारीकी नहीं पता है आम आदमी को तो अपने खाने कमाने के आलावा कुछ भी नहीं पता है तो कुछ किया ही ना जाये | आज तक कितनी बार जमीन अधिग्रहण हुआ पर बेचारे किसानो को तो पता ही नहीं था की वो उसके खिलाफ कोर्ट जा सकते है जब बाद में कुछ किसान गये तो देखीये कैसे कोर्ट जाने वालो की लाईन लग गई अब हो रहा है ना किसानो को फायदा |
    अब आप बताइये की जो राजनिती में नहीं आना चाहता जिसका कोई भी इरादा पद पाने का नहीं है तो वो अपनी बात शांति पूर्ण आन्दोलन से ना करके कैसे करे राजनितिक दलों की तरह भारत बंद चक्का जाम बड़ी बड़ी रैलियों से करे |
    उम्मीद है जैसे एक दिन अप को आरक्षण के फायदे समझ आये उसी तरह आप को इस आन्दोलन के फायदे समझ आये किन्तु इतनी देर ना हो जाये की समझने का कोई फायदा ही ना हो |

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  2. आप इस बार तो एकदम सरकारी सोच लेकर आए हैं। मैं स्वयं अन्ना की बात को या हरकतों को बहुत महत्वपुर्ण नहीं मान रहा लेकिन आपसे बहुत जगह सहमत हूँ। यह सवाल तो है कि कैसा नागरिक समाज यानि सिविल सोसायटी? और अनशन और लोग क्यों नहीं करते? लेकिन सरकार पर आँख मूँद कर हर बार सहमति नहीं जताया जा सकता।

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  3. लोकतंत्र की समझ विकसित होने की आशा जरूर है.

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  4. प्रवीण जी
    पूरा का पूरा जो आपका आलेख है वह मनीष तिवारी की भाषा में है, चलिए आजाद है सब अपने अपने विचार के लिए पर जो आप कह रहे है कि नब्बे प्रतिशत लोग नहीं जानते की लोकपाल क्या है गलत है। लगता है आप आम आदमी के बीच नहीं रहते?

    ईमानदारी से पूछ कर देखिएगा सौ प्रतिशत आदमी उनके साथ जो होगा उन्हें पता होगा।

    ‘‘ये मेरे वतन के लोगों जरा आंख में भर लो पानी
    जो शहीद हुए हैं उनकी जरा याद करो कुर्बानी’’

    ‘‘स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाऐं...’’

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  5. स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं और ढेर सारी बधाईयां

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  6. अन्ना का जो मुद्दा है, उसके साथ मैं तन-मन से हूं...

    लेकिन दिमाग कुछ सवाल करने लगा है...

    15 अगस्त आज़ादी के साथ-साथ उन रणबांकुरों को सलामी देने का भी दिन है जिनकी वजह से हम अपने घरों में सलामत बैठते हैं...क्या देश के सबसे बड़े दिन घरों में अंधेरा करना सही होगा...

    क्या देश में सिविल सोसायटी के अलावा और कोई अच्छे आदमी नही है जिनकी देश के ज्वलंत मुद्दों पर राय लेनी चाहिए...

    टीम अन्ना से जुड़े कुछ लोगों के फाउंडेशन-एनजीओ के पास अमेरिका से बहुत मोटी रकम आने की ख़बरें हैं..

    जय हिंद...

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  7. प्रिय प्रवीण जी ,
    मैंने कभी कांग्रेस को वोट नहीं दिया और ना ही आगे इसकी कोई गुंजायश दिखाई देती है ! कांग्रेस की तुलना में मेरी पहली और अंतिम पसंद निस्संदेह अन्ना हैं !

    तो क्या ? महज़ इसी बिना पे मैं तर्कहीन भी हो जाऊं ? मुझे आपके तर्कों से सहमति है फिर भले ही यही तर्क कांग्रेस ने भी दिए हों !

    भ्रष्ट राजनेताओं / अफसरों / न्यायविदों / जनगण की लहलहाती फसल में से ही लोकपाल को सामने आना है तो फिर भस्मासुर लोकपाल की संभावना भी प्रबल है ही ! इसके बावजूद अति अधिकार संपन्न /अधिकार केंद्रित लोकपाल का आग्रह / जिद / हठ मेरी भी समझ से परे है !

    ( क्रिकेट की जुबान में कहूं तो फील्डिंग की अच्छी जमावट के बिना निरंकुश बैट्समैन की अगवानी जैसा )

    और फिर १६ अगस्त की त्वरा ? समय क्या कहीं भागा जा रहा है ?

    चिंतायें कुछ और भी हैं पर फिलहाल चिंतनपरक आलेख के लिए आभार !

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  8. i hv never voted for congress but the way bjp and others are running after anna is a clear indication that they want to prove themself non corrupt which is not right

    in larger context the anna has created a stir that is close to common man

    but

    in his supporters are people like bhushan father son duo father puts in a public interst litigation against politicians and the son fights the case of the very politican and tries to "settle" the case outside the court

    and we cant disrespect our soldiers by a blackout

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  9. प्रवीण भाई,
    फिर अलग ढफली बजाई आपने ??

    आपसे सहमत होते ही मुझे कांग्रेसी मान लिया जाएगा जो मैं बिलकुल नहीं अतः शांत रहकर तटस्थ रहना क्या बुरा है ....

    अफ़सोस है कि यहाँ या तो आप पार्टी क के मेंबर हैं अथवा बी के ! आपके चेहरे और लेख को इसी नज़रिए से पसंद नापसंद किया जाएगा !

    यहाँ यह कोई मानने को तैयार नहीं कि आप किसी पार्टी को सपोर्ट नहीं करते !

    देखते हैं कि देश से कट्टरता कब समाप्त होती है ! आने वाले समय में शिक्षित बच्चे जरूर इस अंध मानसिकता से मुक्ति पा लेंगे ऐसा मेरा विश्वास है !

    यह सड़ी गली पीढ़ी की मानसिकता और पद लोलुपता का असर इस देश से जल्द खत्म हो, यही कामना है !

    आजकल अपना अपना चेहरा दिखाने के लालच में देश से भ्रष्टाचार एवं अपनी गरीबी मिटाने के लिए सैकड़ों लोग जंतर मंतर और किला का रास्ता ढूंढ रहे हैं !

    बड़ा अच्छा मौका है, हाथ से निकल न जाए, .....अगले इलेक्शन का इंतज़ार कौन करे !

    केवल पोलिटिकल स्टंट और कुछ नहीं !

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  10. नक्कारखाने मे तुती की आवाज!

    कोई हमे कांग्रेसी कहे, इससे पहले चलते है हम!

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  11. आखिर लोकपाल बिल के लिए जवाबदेह कौन होगा? क्या टीम अन्ना लोकपाल बिल के लिए जवाबदेह हो सकती है? और अगर वह जवाबदेह नहीं हो सकते तो आखिर किस मुंह से लोकतंत्र के कान पर तमंचा रखकर अपने बिल को पास करवाने की धमकी दे सकती यह टीम? किसी भी कानून के लिए केवल और केवल चुनी हुई सरकार ही जवाबदेह हो सकती है, क्योंकि अपने कार्यकाल के बाद उसे फिर से जनता के समक्ष उपस्थित होना है, यही हमारे लोकतंत्र की मजबूती है... मानता हूँ कि आज 70-80 प्रतिशत राजनेता भ्रष्ट है, लेकिन क्या आमजन इतनी ही तादाद में भ्रष्ठ नहीं है?

    आज के समय केवल तानाशाही अथवा लोकतंत्र के द्वारा ही भ्रष्टाचार पर काबू पाया जा सकता है, तानाशाही के अच्छे-बुरे दोनों परिणाम हो सकते हैं... आमतौर पर बुरे परिणामों की ही संभावना अधिक रहती है. वहीँ लोकतंत्र जनता का आइना होता है, जैसी जनता वैसा शासन... इसलिए आज के युग में एकमात्र लोकतंत्र ही एक सही विकल्प नज़र आता है. इसलिए ज़रूरत है चुनावों के द्वारा हर बार सुधार किया जाए. भ्रष्ट लोगों को बाहर का रास्ता दिखाया जाय. अगर ऐसा हो जाय तो कोई भी पार्टी घपला करते समय सौ नहीं बल्कि एक हज़ार बार सोचेगी, क्योंकि उसे पता होगा कि फिर एक बार जनता के समक्ष प्रस्तुत होना है... लेकिन भ्रष्ठाचार-भ्रष्ठाचार चिल्लाने वाले यही लोग चुनाव के समय अपनी-अपनी पसंद की पार्टी के उम्मीदवार को ही वोट डालते नज़र आते हैं, चाहे प्रत्याशी कितना ही भ्रष्ठ क्यों ना हो?

    जितने भी लोग भ्रष्ठाचार के विरुद्ध अलख जगाते दिखाई दे रहे हैं, यह सब के सब भ्रष्ठाचार के विरुद्ध नहीं अपितु सरकार के विरुद्ध विद्रोह का अलख जगा रहे हैं... वर्ना क्या कोई कानून कभी इस प्रकार बन सकता है? और अगर इस तरह ब्लैक मेल करके कानून बन भी जाए तो उसके दुष्परिणामों के लिए कौन ज़िम्मेदार होगा? कौन जवाबदेह होगा?

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  12. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  13. जे बात , केतना अगर मगर लगा रहे हैं जी आप लोग , और इत्ता भारी भरकम लिखे जाने के बावजूद मुझे एक बात कोई नहीं समझा रहा है कि चलिए मान लिया कि अन्ना हज़ारी की पूरी टीम उनकी सोच से इत्तेफ़ाक रखती हर सोच और विचार भी कहीं न कहीं भ्रष्टाचार का अंग ही है तो भी जनलोकपाल विधेयक को आने देना चाहिए । अब अन्ना की टीम ने कभी ये मांग तो नहीं की है कि जनलोकपाल विधेयक की ज़द में खुद इसका मसौदा तैयार करने वाली टीम नहीं आएगी ...मगर जहां वो चौडे होकर इसे लाने पर आमादा हैं वहीं इसका विरोध करने वाले जाने कौन रजिस्टर खोले बैठे हैं ....कमाल की सूचनाएं ला रहे हैं . तो लब्बो लुआब ये कि यदि दो में से एक को चुनना है तो सभी तर्कों से परे जाकर , अन्ना का रास्ता ही चुनना चाहूंगा ..और हां ये मेरे दिल की बात है ....

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  14. केवल और केवल दूसरे अरविन्द(केजरीवाल ) समुचित जवाब दे सकते हैं -
    दिल में इक लहर सी उठी है अभी
    कोई ताजा हवा चली है अभी ..
    अभी तो गुलाम अली की ये ग़ज़ल सुन रहा हूँ!

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  15. अरविन्द मिश्र जी की टिप्पणी लाजवाब है।

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  16. आदरणीय प्रवीण जी
    बहुत सटीक प्रस्तुति

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  17. जाग रहा है हिन्दुस्तान!
    बहुत बढ़िया सामयिक प्रस्तुति और जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनायें!

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