रविवार, 31 जुलाई 2011

लड़कियाँ-लड़कियाँ-लड़कियाँ... स्लट वॉक पर विशेष...

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लड़कियाँ
मैं देखता ही रह जाता हूँ उन्हें
हमेशा ही विस्मित करती हैं मुझे
जब भी देखता हूँ मैं उनको
मिलती हैं हरदम चहचहाती हुई
बिना किसी भी खास बात के
खुलकर हंसती-मुस्कुराती भी

लड़कियाँ
कभी नहीं दिखती वो बेतरतीब
घर से बाहर निकलती हैं सजी-संवरी
हमेशा पहने होती है रंगीन वस्त्र
समेटी चलती हैं खुशियों को हरदम
लगता है छिपा लेती हैं बड़ी खूबी से
हर असुंदरता हर काले पन को

लड़कियाँ
झेलती हैं दुनिया भर के दबाव
अकेले नहीं निकलना बाहर
कॉलोनी में चलो सर नीचा किये
ज्यादा हंसी मजाक शोभा नहीं देता
यह कपड़े शरीफों के लायक  नहीं
खबरदार किसी बाहरी से बात की तो

लड़कियाँ
हमेशा ही मानी जाती हैं दोयम
अपने कम लायक भाइयों के सामने
जाने अनजाने कोई न कोई
दिलाता रहता है यह अहसास
तुम इस घर में पल रही जरूर हो
पर हो किसी दूसरे की अमानत ही

लड़कियाँ
ज्यादातर तो नहीं देती दखल कहीं भी
फिर भी होती हैं कुछ दूसरी मिट्टी की
नहीं मानती जो खुद को दोयम
बोलती है खुल कर हर अन्याय पर
लगा देतें हैं लोग लेबल माथे पर उनके
बेहया, कुलटा, घर-उजाड़ू आदि आदि

लड़कियाँ
कहता है हमारा यह समाज
रहना चाहिये हमेशा उन्हें संरक्षा में ही
उनके बचपन में पिता-भाई की
जवानी में यह काम करेगा पति
और बुढ़ापे में बेटों पर होगा दायित्व
कभी नहीं रह पाती हैं वो आजाद 

लड़कियाँ
देती हैं अपना पूरा जीवन गुजार
पिता भाईयों पति और बेटों की
उपलब्धियों को ही अपना मान
शायद ही कभी होती है उनके पास
जमीन मकान या कोई संस्थान
जिसे कह सकती हों केवल अपना

लड़कियाँ
उनसे उम्मीद की जाती है हमेशा
दबी जबान में ही बातें करने की
नहीं कर सकती गुस्सा, लगा सकती ठहाके
एक ही भाव उचित माना जाता है उनका
हर छोटे दुख, विपदा तकलीफ पर
किसी पु्रूष के कंधे पर आंसू बहाना

लड़कियाँ
नहीं मानता हमारा यह समाज अभी भी
कि है उन्हें यह अधिकार विरोध जताने का 
लड़की होने के, घर से बाहर निकलने के
होटल जाकर खाने के, पसंदीदा कपड़े पहनने के
दिल की बात कहने के, पुरूष का प्रतियोगी होने के
कारण होते दैहिक छेड़छाड़ व अनाचार का

लड़कियाँ
बहुत ही मुश्किल है लड़की होना
आखिर तुम पैदा ही क्यों हुई लड़की
क्या जरूरत थी तुम्हें आवाज उठाने की
तुम भी तो चुप रह ही सकती हो
संस्कृतिवादियों की हाँ में हाँ मिलाती
शर्म-हया से आभूषित औरों की तरह


बस एक ही नुकसान होता तुमको
यह कविता कभी नहीं लिखी जाती... 
तुम पर... 
मेरे द्वारा...
कभी भी...






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चित्र साभार : गूगल इमेजे्ज


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70 टिप्‍पणियां:

  1. इस शानदार साहसी कविता पर आप को शतशत बधाई!
    मुझे लगा कि मैं अपनी ही कोई कविता पढ़ रहा हूँ।

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  2. सारे पक्षों को सम्यक रूप से उठाती कविता।

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  3. मतलब आप भी इन दिनों चल रहे स्त्री-पुरुष-विवाद पर रुचि ले रहे हैं! कविता पसन्द आई। कुछ कड़ियाँ तो अधिक ही।

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    समर्थन है मेरी तरफ़ से आपकी बातों का लेकिन कुछ कहना है।
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    गुलाम लोग मालिक की नकल करते हैं और उन्हीं चीजों को श्रेष्ठ मानते हैं जिन्हें उनके मालिक मानते हैं।
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    अब सवाल है कि स्त्रियाँ पुरुष बनना क्यों चाहती हैं? क्या पुरुष को इस तरह स्वीकारती हैं कि उनकी नकल की जाय?
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    लड़कियों की समानता का पक्षधर मैं भी हूँ लेकिन …छोड़िए… कविता है यहाँ और मैं बेकार बोल रहा हूँ।

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  4. :)
    हमारी कामना है कि आप हिंदी की सेवा यूं ही करते रहें। सोमवार को
    ब्लॉगर्स मीट वीकली में आप सादर आमंत्रित हैं।

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  5. भावपूर्ण -कभी कभी मैं भी यही सोचते हुए दुखी होता हूँ कि आखिर नारी को प्रकृति ने रचा ही क्यों ? क्या मात्र संतति संवहन के लिए -मानस में तुलसी कहते हैं -
    केहिं कर नारि रचा विधि माहीं पराधीन सपनेहूँ सुख नाहीं ...आखिर विधना ने नारी को रचा ही क्यों ? हमेशा दूसरों के आधीन और स्वप्न में सुखानुभूति नहीं!
    मार्मिक प्रसंग!
    अब नारी अगर इस बंधन से मुक्त होना चाहती है और जिस दिख रहा है तो यह भी उसी विधना (प्रकृति ) की कोई गुप्त गुम्फित चाल ही लगती है -
    लगता है वह उस सुदूर भविष्य के लिए नारी को तैयार कर रही है जब वह बच्चे नहीं जानेगी -प्रसव (सुख ?) दुःख नहीं झेलेगी -
    मगर तब भी क्या यौनाकर्षण बना रहेगा ? अभी तो बस इतने ही विचार स्फुलिंग! बहस अभी बाकी है निष्कर्ष अभी बाकी है -रचना जी की भी प्रतिक्रया चाहिए!

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  6. सुन्दर भावपूर्ण रचना. हमारा भी समर्थन है परन्तु स्लट वॉक को तो तौबा.

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  7. samyik rahana....
    sabhee pahluo par prakash daltee sunder abhivykti .

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  8. लड़कियों की आज़ादी , समानता के पक्षधर सब हैं पर ये आज़ादी और समानता लड़कियों को कैसे और कितनी दी जाये ये "पक्षधर " की मर्ज़ी पर निर्भर होना चाहिये । और आप भी कहा कविता की लिख कर आत्माओ को जगाने चले हैं जो समाज अपनी बेटियों के बेशर्म मोर्चा निकालने से नहीं जगा वो इन कविताओ से तो जगने से रहा ।
    लडकियां खुद ठीक कर लेगी सब कभी एक गाना सुना था भारत की आज़ादी को लेकर "एक बाग़ नहीं , एक खेत नहीं , हम सारी दुनिया मागेगे " । बस अब वही वक्त आने वाला हैं जब ये दुनिया लड़कियों की होगी और वो डंके की चोट पर जो चाहेगी करेगी क्युकी उनको समझ आ गया हैं स्वतंत्रता उनका जन्म सिद्ध अधिकार हैं । मुझ तो बड़ी ख़ुशी होती हैं जब नन्ही नन्ही लडकिया , टंक टॉप और शोर्ट में , जेंस और टॉप में , मिनी स्किर्ट में और हर प्रकार के कपड़ो में हंसती खिलखिलाती बड़ी हो रही हैं । वो जितने यहाँ ब्लॉग जगत में इन सब कपड़ो का विरोध कर रहे हैं उनकी भी बेटियाँ यही सब पहने आप को दिख जायेगी और अपने घर में वो कुछ नहीं कह पाते । सामाजिक मंच पर विरोध दर्ज करा देते हैं और खुश हो लेते हैं । बहुत सी ब्लॉग लिखती महिला खुद आप को इन कपड़ो में दिखाएगी पर इनका विरोध भी करती मिल जायेगी

    समय बदल रहा हैं और मुझे उम्मीद हैं आप की दोनों बेटियाँ जब बड़ी होगी तो आप की ये कविता पढ़ कर हसेगी और कहेगी पापा व्हेन दीड थिस हपन इन इंडिया [ Papa when did this happen in india }

    with lots of love to both your daughters and i am so happy they have father who can distinguish between right and wrong

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  9. बहुत अच्छा! आप हिन्दी की सेवा करते रहें! (ऊपर की एक टिप्पणी से उधार)।

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  10. आदरणीय प्रवीण जी,
    माफ़ी चाहता हूँ कि मैं शायद एक बहस यहाँ छेड़ने जा रहा हूँ हालांकि इसका इरादा न था। लेकिन रचना जी की सोच और उनकी बातों से ऐसा लगता है कि अब कुछ कहना ही होगा।

    कोशिश रहेगी कि कि व्यक्तिगत आक्षेपों से बचूँ लेकिन मैं पहले कह चुका हूँ कि मैं बुद्ध नहीं, मुझे भी क्रोध आता है और कड़े शब्द मैं भी बोलता हूँ। मैं कोई अपवाद नहीं।

    अब शुरु करते हैं बात।

    कुछ महिलाओं को ऐसा क्यों लगता है कि बस पहनने की छूट ही सब कुछ है। और जो स्लट वॉक कर रही हैं वे पहले से इतनी मुक्त हैं कि वे कुछ भी पहन सकें। सारी आजादी कपड़ों में ही दिख रही है? अमेरिका से आकर एक विदेशी ने आम भारतीय स्त्रियों में नया खुराफ़ात क्यों शुरु किया है? आज तक कितनी महिलाओं से मिले हैं आप या मैं जो सोचती हों? कल कहा था कि इन्हें पुरुष मालिक दिखते हैं। जी हाँ, उन्हें भी जो इसका विरोध कर रही हैं क्योंकि आखिर मर्द बनने या मर्दों के कपड़े पहनने में ही सारा संसार रखा है क्या? बार बार पढ़कर बचता रहा हूँ ऐसे लेख जिनमें कुछ नहीं है सिवाय कपड़ों के। आदमी की कीमत है या नहीं इनकी नजरों में। भारत में कितने प्रतिशत ऐसे लोग हैं जिनकी चिन्ता ये लोग कर रही हैं या कुछ लोग(पुरुष) कर रहे हैं? सिर्फ़ उच्चवर्गीय या मध्यमवर्गीय किस्म के लोग जिन्हें सारा सुख बस फिल्मी जीवन जीने में दिखता है, इन्हें देश की आन्तरिक समस्या का पता है? जहाँ 80-90 करोड़ लोगों की समस्या ये है ही नहीं वहाँ एक नया फसाद खड़ा किया जा रहा है। आज विस्तार से पढ़ा अखबार में स्लट वॉक के बारे में। इसलिए लगा कि सारे मानसिक रोगी जैसे(हों ही यह जरूरी नहीं) और समाज में बेकार की बहस करने वाली महिलाएँ और कुछ इनके समर्थक पुरुष नया तमाशा कर रहे हैं। जब देखो कपड़े, कपड़े, कपड़े और सिर्फ़ कपड़े और कुछ नहीं। ये कोई भला नहीं कर रहे समाज का। अब कहेंगे कि मैं क्यों भड़क रहा हूँ? मेरे ये सब कहने की आलोचना होगी और अपने को बचाने की कोशिश और कहा जाएगा कि मेरी सोच ऐसी है तो वैसी है या फिर मेरे जैसे ही लोगों के कारण स्त्री का हाल बुरा है।

    स्लट वॉक जैसा तमाशा शुरु करने वालों से पूछा जा सकता है कि और क्या किया गया है इनके द्वारा जिससे देश-समाज का भला हुआ तो जवाब नहीं है होगा इनके पास। मुझे कहते हुए दुख होता है कि 20लाख की आबादी वाले शहर में 20भी औरतें ऐसी नहीं मिलतीं जिनकी सोच में समानता की बात हो या कुछ महत्व का हो सिवाय विशेषाधिकार के। क्या भारत की गुलामी में भारतीयों का कोई दोष नहीं? इशारा समझ में आ रहा होगा। देश पर और उसके विषयों पर कभी सोचने का कष्ट करने वाले लोगों में कितनी महिलाएँ हैं। क्यों संसार के सारे विचारकों-वैज्ञानिकों में हाथों की अंगुलियों पर गिने जाने लायक लोग ही स्त्री-समाज से आते हैं? मैं कोई पक्षपात या स्त्री को कमजोर साबित करने की कोशिश नहीं कर रहा। क्या ये लोग भला करेंगे स्त्रियों का? सत्य स्वीकारने में आँखें मूँद कर रहने से क्या होगा?

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  11. जारी…

    एक बात बार-बार कही जा रही है कि कपड़ों का असर होता तो पांच साल की बच्चियाँ और 70 साल की बूढ़ी औरत बलात्कार का शिकार नहीं बनती। यह कितना बड़ा सत्य है कि इस तरह की घटनाओं का प्रतिशत दस भी नहीं है? मतलब 100 ब्लात्कार में कितने बलात्कार ऐसे होते हैं? झूठ-मूठ का फिल्मी कपड़ा पहनने का मन किया तो खोज लाये दो पैसे का तर्क। इससे कोई इनकार नहीं कि मानसिकता अधिक दोषी है लेकिन क्या बाहरी कारकों का कोई असर नहीं पड़ता? बुद्ध और ओशो की बात कर रही हैं ये लोग और कपड़ों की आजादी ही सब है इनके लिए। भारत की आम स्त्री का इनकी समस्याओं से कोई वास्ता नहीं है। अमेरिका में 12बजे रात को आराम से घूमती हैं तो यह भूल रही हैं कि अमेरिका में बलात्कार की दर कितनी है? बलात्कार की सबसे अधिक घटनाओं में अमेरिका 9वें स्थान पर और भारत 56वें स्थान पर है। मामला निश्चय ही मानस का है लेकिन मानस हवा से पैदा नहीं होता। समाज और हर भौतिक चीज का जिसे आदमी देखता है उसका भी असर पड़ता है।

    मान लें कि हो गई छूट सबको। क्या कर के दिखा देंगी ये। लड़ना समानता के लिए चाहिए तो शोर कपड़े पर किया जा रहा है। बुरका पहनने को तो नहीं कह रहा मैं लेकिन जानना चाहता हूँ कि महिलाओं और लड़कियों को अधिक गर्मी होती है या क्या है ऐसा कि इन्हें गले से लेकर पैर तक मूर्ति बनने की और अप्राकृतिक सामान पोतने की आवश्यकता होती है? वजह बताएगा कोई? लिपिस्टिक से लेकर पैर के नाखून तक रंगने का औचित्य बताएगा कोई? कारण में बहाना नहीं चलेगा। संसार भौतिक है और जवाब भी भौतिक है। यहाँ धर्म और ईश्वर जैसे बहाने नहीं चलेंगे। भौतिक जवाब चाहिए।

    मर्द इनसे अधिक कपड़े हमेशा पहनते हैं। यह अलग बात है कि न्यूनतम कपड़ों की आवश्यकता औरतों को अधिक मानी जाती है तो इसमें किसका दोष है। सभ्यता और संस्कृति का दिया है ये सब न कि हमने या आपने दिया है ये। जैसे कपड़ों में ये रहती हैं इन्हें क्या तकलीफ़ है इससे? मर्द तो कभी भी (कम से कम भारत में, मेरे भारत की बात से हमेशा माना जाय कि भारत न कि 10-20 करोड़ लोगों का इंडिया) यह नहीं कहते कि हमें सिर्फ़ जंघा तक के और नाभि तक के कपड़े पहनने की इजाजत चाहिए समाज से। लेकिन ये इतनी परेशान क्यों हैं। सभ्य और शालीन कपड़े मर्द पहने या औरत क्या समस्या है? मैं मानता हूँ कि आपको अधिकार है कुछ भी अपनी मर्जी का पहनने का तो क्या कल एक तौलिया लपेट कर आप कार्यालय पहुंच जाएंगे या कक्षा में पढ़ने चले जाएंगे? क्यों? वजह है न? मैं अपनी निजी सोच में कैसा हूँ इससे जवाब देने वाले को अधिक मतलब नहीं होना चाहिए क्योंकि मेरे सवाल हर जगह के लिए हैं।

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  12. जारी…

    कुल मिलाकर अपनी दमित इच्छाओं को पूरा करने के लिए शोर मचाया जा रहा है न कि किसी अधिकार के लिए। संसार का मूल कौन है- स्त्री ही तो है। अब बात जहाँ तक शरीर और बलात्कार की है तो निश्चय ही बलात्कार करने वाले मृत्युदंड जैसी सजा के भागीदार हैं और वे उनका मानस ही उनसे बलात्कार करवाता है लेकिन कितनी महिलाएँ बुद्ध है जो उम्मीद पुरुषों से की जाती है वे बुद्ध बनें। वासना मनुष्य निर्मित नहीं है, वह प्रकृति का दिया है तो प्रकृति से पूछा जाय लेकिन वह तो कोई चेतन जीव नहीं है। उत्प्रेरक और उत्तेजक रासायनिक प्रक्रिया में क्या भूमिका निभाते हैं, जाकर रसायन विज्ञान में देखा जाय न कि स्लट-वॉक कर के नंगे रहने की छूट मांगी जाय। जाओ पहनो जैसे मन करे, कोई रोके तो संविधान का हवाला देना कि अधिकार है।

    जो व्यवस्था लाखों साल में बनी है उसे चुनौती देने के लिए समझना भी तो होता है। क्यों मूलमंत्र है ज्ञान का। कभी सोचा है कुछ भी क्यों होता है? बस इनकी इच्छा पूरी की जाय, यही है इनकी समझ। लक्ष्मीबाई और कितूर की रानी चेनम्मा बनो तो किसने आलोचना की है आजतक लेकिन मैडोना और ब्रिटनी स्पीयर्स बनो तो लोगों को झेलना भी होगा। यह अलग विषय है कि गलत क्या है और सही क्या है? सही और गलत सापेक्ष हैं, सब जानते हैं तो किस आधार पर इन्हें निरपेक्ष मानकर हल्ला किया जा रहा है?

    आगे बहुत कुछ कहने को है लेकिन फिलहाल इतने पर रुक जाता हूँ। ब्लाग पर लिखने में और लड़ने में बहुत अन्तर है। दहेज प्रथा से अधिक लड़कियाँ मर जाती हैं या कम कपड़ों की छूट नहीं देने से। दहेज से लाखों घर भिखारी हो जाते हैं, शोषण की सारी सीमा पार कर ली जाती है और मैं मानता हूँ कि इसमें दोषी महिलाएँ भी हैं और अधिक हैं। पुरुष वर्ग दोषी रहा है लेकिन अपने को सौ प्रतिशत भला और अच्छा मान लेना आत्ममोह है, कोई तार्किक आधार है क्या इसका? http://anvarat.blogspot.com/2011/07/blog-post_05.html पर मैंने कुछ बातें कही थी।

    अब बार-बार कोई सारा दोष मर्द पर ही मढ़ दे तो कब तक कोई संयमित रहेगा। जैसे लगता है मर्द नहीं दानव हैं सारे पुरुष और मुझे नारीवादी का लेबल नहीं चाहिए अपने लिए।

    इतना काफ़ी है इस बार…॥

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  13. बहुत ही सुन्दर कविता......लड़की के जीवन के हर पक्ष पर प्रकाश डालती हुई...

    आखिर तुम पैदा ही क्यों हुई लड़की
    क्या जरूरत थी तुम्हें आवाज उठाने की

    इन पंक्तियों ने बहुत लोगो को सोच में डाल दिया है...पर वे क्यूँ ना आवाज़ उठाएँ...और वे अपना अधिकार किसी से मांग नहीं रहीं...बल्कि जता रही हैं....
    शुरुआत में लड़कियों के पढ़ने-लिखने पर भी बंदिश थी...हमारी कुछ बहनों ने इस बंधन को तोडा....काफी ताने-उलाहने उन्हें भी सुनने पड़े होंगे...कई लोग हँसे होंगे...छींटाकशी की गयी होगी....पर आज उनकी हिम्मत की बदौलत ही हम जैसे आज,यहाँ अपने विचार रखने में सक्षम हैं.

    लोग-बाग़ उनके सौन्दर्य में कमी होने की आशंका से परेशान हैं...उन्हें अपनी दृष्टि बदलनी होगी...या फिर वे अपनी धारणा बनाए रखें...आगे आने वाली पीढ़ी को महिला...साड़ी बिंदी में जितनी ख़ूबसूरत लगेगी....उतनी ही ख़ूबसूरत जींस और खुले बाल में भी लगेगी.

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  14. लड़कियों की पीड़ा दर्शाती बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति.

    साथ में टिप्पणी के संदर्भ में लिखी बातों ने भी प्रभावित किया है. खासतौर पर नेकी कर दरिया में डाल' की तर्ज पर ही टिप्पणी करें. बहुत अच्छा है. क्या किसी आलेख पर टिप्पणी करना जरुरी होता है?
    अगर हम उनके ब्लॉग पर टिप्पणी नहीं करेंगे तो हमारे ब्लॉग पर टिप्पणी नहीं करेंगे. इस मानसिकता को बदलने की जरूरत है. आप या तो अच्छा लिखो या बुरा लिखो लोग अपने आप आलोचना करने आ जायेंगे.
    नवभारत टाइम्स पर आप भी अपना ब्लॉग बनाये. मैंने भी बनाया है. एक बार जरुर पढ़ें.

    http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/SIRFIRAA-AAJAD-PANCHHI/

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  18. कुछ और कहने की इच्छा है।

    बोरा और चट्टी या पारदर्शी प्लास्टिक पहनने के लिए नहीं होते। आदमी साँप नहीं जो केँचुल में घुस जाये। मर्द हो या औरत शालीन और सभ्य साथ में मौसम के अनुकूल और शरीर के लिए आरामदायक कपड़े पहने तो इससे किसी को इनकार है? मुझे तो नहीं है। न डफ़ोल न कश्ती(भोजपुरी में कहते हैं मतलब डफोल को बहुत ढीला और चुस्त को कश्ती,)आदमी हैं तो बन्दर की तरह किसी भी हांडी में हाथ नहीं डाल दें और न किसी किसी चूहे या साँप के बिल में घुस जायें, घर मतलब घर होता है। अगर आप सैनिक हैं तो कपड़े भी सैनिकों की तरह चाहिए चाहे आप मर्द हों या औरत। लेकिन शौक से आप चमड़ी में चिपकाए कपड़े पहनना चाहें तो आलोचना तो होगी। यानि अपना काम जैसे कपड़ों का है वैसा पहनें न कि हमेशा रैंप पर और लँगटनाच(यह शब्द मेरा नहीं एक बड़े विद्वान लेखक का है जिनकी किताबें विश्वविद्यालयों में चलती हैं) के मौके पर पहनने वाले कपड़े पहनने की छूट मांगें।

    खूबसूरत होने की बात को अब मिनि स्कर्ट और फिर आगे तक ले जाने वाले लोगों के लिए आदि मानव हैं/थे। पता नहीं सुन्दर आदमी होता है कि कपड़ा? लेकिन एक बात तो लगती है भारत में कुछ महिलाएँ योगी की काल्पनिक अवस्था तक पहुँच चुकी हैं जिन्हें सब कुछ एक जैसा लगता है। जबकि यह भी बड़ा सच है कि महिलाएँ महिलाओं की भारी शत्रु साबित हुई हैं। अब कारण तो वे ही बताएंगी। कितना उच्च विचार है या कितनी ऊँची अवस्था है कि एक हाथ में फल और एक हाथ में कींचड़ दोनों इन्हें सुन्दर और सुपाच्य लगते हैं और इन दोनों को ग्रहण कर लेने की शक्ति भी आ गयी है।

    पुरुष इनकी नजरों में भूत ही लगता है।

    वो कत्ल भी करते तो चर्चा नहीं होती,
    मैं उफ़्फ़ भी करता तो हो जाता हूँ बदनाम।

    भारत का भाग्योदय हो रहा है! अब कुछ नारियाँ योग की सर्वोच्च अवस्था को पहुँच चुकी हैं जिनका सिंहनाद है समत्वं योग: उच्यते। जिनकी नजर में सर्प और रज्जु का भेद नहीं। एक फैशन है कि इन अनावश्यक मुद्दों पर लटके रहो और बालीवुडिया रेल कभी तो मिल ही जाएगी। तब तक पहले से ही बयान देने की आदत डाली जा रही है।

    तब तक शर्ट को पैर में और पैंट को उपर पहनने की मुहिम का भी प्रयत्न होना चाहिए क्योंकि ऐसे ही कामों को तो तरक्की कहते हैं।

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  19. बहुत खूबसूरत कवितायें लिखीं आपने तो जी! बहुत खूब! जय हो!

    मुकेश कुमार तिवारी जी की यह कविता याद आ गयी आपकी कवितायें बांचकर -लड़कियां अपने आप में मुकम्मल जहां होती हैं:

    लड़कियाँ,
    तितली सी होती है
    जहाँ रहती है रंग भरती हैं
    चाहे चौराहे हो या गलियाँ
    फ़ुदकती रहती हैं आंगन में
    धमाचौकड़ी करती चिडियों सी

    लड़कियाँ,
    टुईयाँ सी होती है
    दिन भर बस बोलती रहती हैं
    पतंग सी होती हैं
    जब तक डोर से बंधी होती हैं
    डोलती रहती हैं इधर उधर
    फ़िर उतर आती हैं हौले से

    लड़कियाँ,
    खुश्बू की तरह होती हैं
    जहाँ रहती हैं महकती रहती है
    उधार की तरह होती हैं
    जब तक रह्ती हैं घर भरा लगता है
    वरना खाली ज़ेब सा

    लड़्कियाँ,
    सुबह के ख्वाब सी होती हैं
    जी चाहता हैं आँखों में बसी रहे
    हरदम और लुभाती रहे
    मुस्कुराहट सी होती हैं
    सजी रह्ती हैं होठों पर

    लड़कियाँ
    आँसूओं की तरह होती हैं
    बसी रहती हैं पलकों में
    जरा सा कुछ हुआ नही की छलक पड़ती हैं
    सड़कों पर दौड़ती जिन्दगी होती हैं
    वो शायद घर से बाहर नही निकले तो
    बेरंगी हो जाये हैं दुनियाँ
    या रंग ही गुम हो जाये
    लड़कियाँ,
    अपने आप में
    एक मुक्कमिल जहाँ होती हैं
    -------------------
    मुकेश कुमार तिवारी

    उत्तर देंहटाएं
  20. कविता तो बहुत ही शानदार है सर जी...लेकिन टिप्पणियाँ पढ़ी तो कविता के भाव से ध्यान हट गया, इसके लिए माफ़ी चाहूँगा...
    पहला सवाल तो चन्दन जी से उधार ही लिया गया समझिये... क्या कम कपडे पहनना स्वतंत्रता का द्योतक है ??

    वैसे अगर कोई पुरुष केवल जांघिये और बनियान में सड़क पर घूमता दिखे तो मैं उसे पागल ही कहूँगा....


    फिर चन्दन जी के एक सवाल का जवाब भी देना चाहूँगा.... (कि स्त्रियाँ पुरुष बनना क्यों चाहती हैं? )...
    इसका भी वही कारण है जो पुरुषों का महिला बनने के पीछे है...
    भले ही वो महिलाओं के कपडे पहनने तक नहीं उतरे हों लेकिन, बाल बड़े करना, कान छेदाना, बालों में हेयर बैंड लगाकर घूमना, थोड़े उदाहरण भर हैं...

    पहले कपडे पहनना शालीनता मानी जाती थी, चाहे वो पुरुष हो या स्त्री..
    लेकिन सलमान खान से लेकर मल्लिका शेरावत तक ने कब इसे फैशन और आजादी का रूप दे दिया पता ही नहीं चला... भगवान् जाने भविष्य क्या होगा...कहीं हम दुबारा आदिमानव तो बनने नहीं जा रहे....चिंतित हूँ....

    उत्तर देंहटाएं
  21. लड़कियां - आप जैसी ही इंसान होती हैं | ना वे तितली हैं , ना चिड़िया , ना खुशबू | ना ही आपके अस्तित्व को पूर्णता देने या संतति के जन्म के लिए बनी मशीन हैं लड़कियां |

    उनमे भी वही भावनाएं, वही मानस मस्तिष्क है जो आपमें है | @ अरविन्द जी - नारी को प्रकृति ने क्यों रचा यह पूछ रहे हैं आप ? पुरुष को क्यों रचा यह नहीं पूछते कभी ?

    @चन्दन जी - आप पूछ रहे हैं कि लड़कियां लड़का क्यों बनना चाहती हैं - मैं आपको बताना चाहती हूँ - कि यह "पुरुष एरोगंस" है कि आप यह समझ रहे हैं कि हम आप बनना चाहते हैं - लड़कियां इंसान हैं - और उसी तरह जीने का हक (- जो उनका है ही - आपको दान नहीं देना है ) चाहती हैं | वे पुरुष नहीं बनना चाहतीं - कृपया यह खुशफहमी न रखें कि हम आप बनना चाहते हैं [- क्योंकि इस विचार के पीछे आपकी सोच होगी कि हम आप इसलिए बनना चाहते हैं कि हम आपको खुद से श्रेष्ठ समझते हैं - जो हम नहीं समझते ] हम खुद को भी इंसान समझते हैं, और आपको भी - दोनों बराबर - तो कुछ और बनने का सवाल ही नहीं है ...आप भारत के भाग्योदय की बात कर रहे हैं - आपने देखा कि भारत ने हीना रब्बानी के आने पर कैसा सम्मान दिखाया स्त्री के प्रति?? हमारे मीडिया की इस चीपनेस पर मैंने एक पोस्ट लिखी है आज - समय मिले तो ज़रूर पढ़िए - यदि प्रवीण जी इजाज़त दें तो लिंक दे दूँगी यहाँ ...

    @प्रवीण जी - इस पोस्ट के लिए धन्यवाद , badhai sweekarein | आपने समझा कि जिसे मनोवैज्ञानिक कहते हैं - अटेंशन सीकिंग - बच्चा अपनी ओर ध्यान खींचने के लिए जैसे चीखता चिल्लाता है - क्योंकि उसके पेरेंट्स उसकी ज़रूरतों पर ध्यान ही नहीं दे रहे होते - उसी तरह की स्ट्रेटेजी है कुछ कुछ यह मूवमेंट | सही या नहीं की बात ही नहीं है - यह विरोध प्रदर्शन है - |

    उत्तर देंहटाएं
  22. शेखर सुमन जी,

    आप अनुपात बताएंगे कि कितने लड़के लड़कियों की तरह पहनना चाहते हैं और कितनी लड़कियाँ लड़कों की तरह?

    100 शहरी(अभी ग्रामीण स्थिति ऐसी नहीं कि इन मुद्दों पर उन्हें घसीटे)लड़की में 70-80 लड़कियाँ लड़कों की तरह कपड़े पहनना चाहती हैं लेकिन वे बेवकूफ़ किस्म के लड़के जो हेयर-बैंड लगा रहे हैं, वैसों की संख्या 100 में कितनी है? और अगर ऐसा लड़के कर रहे हैं तो वे भी आलोचना के पात्र हो सकते हैं।

    " बाल बड़े करना, कान छेदाना, बालों में हेयर बैंड लगाकर घूमना" यह सब लक्षण जिनमें हैं उनका पक्षपात नहीं कर रहा मैं।

    शिल्पा जी,
    अभी बिजली की स्थिति गड़बड़ है। आते ही जवाब देता हूँ।

    वैसे एक बात याद आती है, शायद किसी प्रसिद्ध आदमी ने ही कहा था कुछ साल पहले और नवनीत में छपा था कि अगर आप उन लोगों को जिनके पास कपड़े नहीं हैं, देते देते सारे कपड़े खोल कर फेंक देते हैं और आपका दिल इतना बड़ा है तब आपके लिए आलोचना एक शब्द भी नहीं हैं हमारे पास लेकिन जानबूझ कर आप कपड़े फेंक रहे हों तो चाहें आप मल्लिका हों या सलमान आलोचना के पात्र तो हैं ही। विकासवाद को मानने वाले लोग विकसित होते जाते हैं न कि आदिमानव होने लगते हैं।

    बस बिजली आते ही हाजिर होता हूँ।

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  23. unkae liyae jo sochtey haen bharat bahut safe haen aur desho kae mukable ladkiyon kae liyae
    -------------------

    Bogged down by an appaling women rights record -due to female foeticide, infanticide and human trafficking -India has been ranked the fourth most dangerous country in the world for women, a Thomson Reuters Foundation poll, declared Tuesday, has revealed.
    http://indianwomanhasarrived.blogspot.com/2011/06/its-merely-piece-of-news.html
    http://indianwomanhasarrived.blogspot.com/2011/06/blog-post_16.html

    ---------------------

    उत्तर देंहटाएं
  24. नारी सशक्तिकरण का मतलब नारी को सशक्त करना नहीं हैं ।

    नारी सशक्तिकरण या वूमन एम्पोवेर्मेंट का मतलब फेमिनिस्म भी नहीं हैं ।

    नारी सशक्तिकरण या वूमन एम्पोवेर्मेंट का मतलब पुरूष की नक़ल करना भी नहीं हैं , ये सब महज लोगो के दिमाग बसी भ्रान्तियाँ हैं ।

    नारी सशक्तिकरण या वूमन एम्पोवेर्मेंट का बहुत सीधा अर्थ हैं की नारी और पुरूष इस दुनिया मे बराबर हैं और ये बराबरी उन्हे प्रकृति से मिली है। नारी सशक्तिकरण या वूमन एम्पोवेर्मेंट के तहत कोई भी नारी किसी भी पुरूष से कुछ नहीं चाहती और ना समाज से कुछ चाहती हैं क्योकि वह अस्वीकार करती हैं की पुरूष उसका "मालिक " हैं । ये कोई चुनौती नहीं हैं , और ये कोई सत्ता की उथल पुथल भी नहीं हैं ये "एक जाग्रति हैं " की नारी और पुरूष दोनो इंसान हैं और दोनों समान अधिकार रखते हैं समाज मे ।

    बहुत से लोग "सशक्तिकरण" से ये समझते हैं की नारी को कमजोर से शक्तिशाली बनना हैं नहीं ये विचार धारा ही ग़लत हैं । "सशक्तिकरण " का अर्थ हैं की जो हमारा मूलभूत अधिकार हैं यानी सामाजिक व्यवस्था मे बराबरी की हिस्सेदारी वह हमे मिलना चाहिये ।

    कोई भी नारी जो "नारी सशक्तिकरण " को मानती हैं वह पुरूष से सामजिक बराबरी का अभियान चला रही हैं । अभियान कि हम और आप {यानि पुरूष } दुनिया मे ५० % के भागीदार हैं सो लिंग भेद के आधार पर कामो / अधिकारों का , नियमो का बटवारा ना करे ।

    नारी पुरूष एक दूसरे के पूरक हैं , इस सन्दर्भ मे उसका कोई औचित्य नहीं हैं क्योकि वह केवल नारी - पुरूष के वैवाहिक रिश्ते की परिभाषा हैं जबकि नारी -पुरूष और भी बहुत से रिश्तो मे बंधे होते हैं जहाँ लिंग भेद किया जाता हैं ।


    "नारी सशक्तिकरण " पुरूष को उसके आसन से हिलाने की कोई पहल नहीं हैं अपितु "नारी सशक्तिकरण " सोच हैं की हम तो बराबर ही हैं सो हमे आप से कुछ इसलिये नहीं चाहिये की हम महिला हैं । नहीं चाहिये हमे कोई इसी "लाइन " जिस मे खडा करके आप हमारे किये हुए कामो की तारीफ करके कहे "कि बहुत सुंदर कम किया हैं और आप इस पुरूस्कार की हकदार हैं क्योकि हम नारी को आगे बढ़ाना चाहते हैं " । ये हमारे मूल भूत अधिकारों का हनन हैं ।


    "नारी सशक्तिकरण " की समर्थक नारियाँ किसी की आँख की किरकिरी नहीं हैं क्योकि वह नारी और पुरूष को अलग अलग इकाई मानती हैं , वह पुरूष को मालिक ही नहीं मानती इसलिये वह अपने घर को कुरुक्षेत्र ना मान कर अपना कर्म युद्ध मानती हैं ।


    "नारी सशक्तिकरण " की समर्थक महिला चाहती हैं की समाज से ये सोच हो की " जो पुरूष के लिये सही वही नारी के लिये सही हैं ।

    "नारी सशक्तिकरण " के लिये जो भी अभियान चलाये जा रहे हैं वह ना तो पुरूष विरोधी हैं और नाही नारी समर्थक । वह सारे अभियान केवल मूलभूत अधिकारों को दुबारा से "बराबरी " से बांटने का प्रयास हैं ।

    "नारी सशक्तिकरण " को मानने वाले ये जानते हैं की इस विचार धारा को मानने वाली नारियाँ फेमिनिस्म का मतलब ये मानती हैं की हम जो कर रहे हैं या जो भी करते रहे हैं हमे उसको छोड़ कर आगे नहीं बढ़ना हैं अपितु हमे अपनी ताकत को बरकरार रखते हुए अपने को और सक्षम बनाना हैं ताकि हम हर वह काम कर सके जो हम चाहे । हमे इस लिये ना रोका जाये क्युकी हम नारी हैं


    मै नारी पुरुष समानता जो वस्तुत नारी सशक्तिकरण हैं की पुरोधा हूँ


    गलत का प्रतिकार करना नारीवाद नहीं हैं अगर आप को ये नारीवाद लगता हैं तो ये महज आप का अल्प ज्ञान हैं । नारीवाद/फेमिनिस्जिम से समय बहुत आगे जा चुका हैं ।

    http://indianwomanhasarrived.blogspot.com/2011/01/blog-post_08.html

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  25. चन्दन जी...
    क्या आप मुझे एक बात बता सकते हैं, इस बात का निर्धारण किसने किया था कि कौन से कपडे लड़कों के लिए हैं और कौन से लड़कियों के लिए...
    लड़कियों का जींस या शर्ट पहनना कभी गलत नहीं हो सकता ....
    मेरा बस इतना कहना है लड़के/लड़कियां कुछ भी पहने लेकिन तन पर कपडे होने चाहिए जिससे शालीनता कायम रहे...
    लड़के या लड़कियों का नंग धडंग घूमना स्वतंत्रता या आधुनिकता के श्रेणी में नहीं रखा जा सकता....

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  26. शेखर जी की बात पर कुछ कह देते हैं।

    जब देश के लोग किसी प्रतिभाशाली और वैज्ञानिक सोच के साथ नहीं चलकर सलमान जैसे लोग के पीछे चलने लगें तो आगे क्या कहा जाय? तुरंत लोग हाजिर होकर कह डालेंगे कि सबको नहीं बदला जा सकता। लेकिन मैं यहाँ बदलने की नहीं समीक्षात्मक बातों की तरफ़ ध्यान दिलाना चाहता हूँ।


    अब शिल्पा जी से,

    "उनमे भी वही भावनाएं, वही मानस मस्तिष्क है जो आपमें है |"

    यह बात आपने मुझसे नहीं कही लेकिन किसने कहा कि औरत मशीन है? आपकी इस बात का यहाँ कोई महत्व नहीं क्योंकि न तो किसी ने ऐसा कहा है और न कोई कहने वाला है। आपकी इस बात से किसी का विरोध नहीं।

    "मैं आपको बताना चाहती हूँ - कि यह "पुरुष एरोगंस" है कि आप यह समझ रहे हैं कि हम आप बनना चाहते हैं"

    सवाल का जवाब "पुरुष एरोगेंस" है? ये "हम" कौन है? एक खास वर्ग के लोगों को कहा गया है सब कुछ न कि हर महिला को। हम समझ क्या रहे हैं?

    बदला कौन और कौन बदलना चाहता है। महिलाएँ हर क्षेत्र में जाएँ, इससे कोई परेशानी नहीं लेकिन हर जगह पुरुष दोषी है इसका बोर्ड लेकर लटकाती न रहें क्योंकि दोषी वे भी कम नहीं हैं। लेकिन यह चश्मा उतरे तब तो? देखने का नजरिया पलट लेने से सच छुप जाएगा क्या? बार बार ध्यान रहे कि सारी बातें सभी के लिए नहीं बल्कि एक खास वर्ग के लिए कही गई थीं।

    "- लड़कियां इंसान हैं - और उसी तरह जीने का हक (- जो उनका है ही - आपको दान नहीं देना है ) चाहती हैं |"

    हम दान दे कब रहे हैं। जहाँ तक मेरा खयाल है आप कन्यादान पर मेरे विचारों को अनवरत पर जाकर देख लें फिर आगे बात करें।

    "वे पुरुष नहीं बनना चाहतीं - कृपया यह खुशफहमी न रखें कि हम आप बनना चाहते हैं [- क्योंकि इस विचार के पीछे आपकी सोच होगी कि हम आप इसलिए बनना चाहते हैं कि हम आपको खुद से श्रेष्ठ समझते हैं - जो हम नहीं समझते ]"

    ये सिर्फ़ बयान है, कोई तर्क नहीं। कुछ उदाहरण, सबूत, तथ्य कुछ तो होना चाहिए? मेरी सोच मुझे मालूम है कि कैसी है? कौन किसकी नकल कर रहा है? प्राकृतिक उदाहरण देता हूँ। एक बच्चा जब बड़ों को कुछ करते देखता है तब उसकी इच्छा होती है कि वह भी वही करे। जैसे बच्चा हमेशा बड़ा बनना चाहता है जब किसी ऐसे काम को वह नहीं कर पाता जो सिर्फ़ बड़े कर पाते हैं।
    उदाहरणों की कमी नहीं होगी। आगे तो बढ़े कोई!

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  27. "हम खुद को भी इंसान समझते हैं, और आपको भी - दोनों बराबर - तो कुछ और बनने का सवाल ही नहीं है ...आप भारत के भाग्योदय की बात कर रहे हैं - आपने देखा कि भारत ने हीना रब्बानी के आने पर कैसा सम्मान दिखाया स्त्री के प्रति??"

    इस बात का क्या मतलब है इस जगह? मेरी समझ में कम आया। कृपया समझाने की कोशिश करें। जवाब है मेरे पास कि क्यों स्त्रियाँ उपभोग और प्रदर्शनी की वस्तु बन जाती हैं, और इसमें दोषी भी लगभग वही हैं। क्यों एक कैटरीना कैफ़ अपने फिल्म के लिए शीला की जवानी दिखाती है। माफ़ी चाहता हूँ कि मैं ऐसे फालतू के वाक्यों से बचने की कोशिश करता हूँ लेकिन यहाँ कर रहा हूँ। इसका असर एक नहीं हजारों शीलाओं पर पड़ता है। क्या आप बुद्ध हैं? बार बार बुद्ध की बात करना सिर्फ़ यह दिखाता है कौन दिव्यत्व को प्राप्त कर गया है कि उसके अन्दर कोई इच्छा नहीं पैदा होती? आप चूँकि स्त्री-वर्ग से आती हैं, इसलिए मैं आपसे अधिक बातें इन विषयों पर नहीं कह सकता क्योंकि मेरी नजरों में यह ठीक नहीं होगा।

    कैटरीना कैफ़ के विरोध में तो किसी औरत ने मोर्चा नहीं निकाला कभी। ग्लैमर के पीछे चमचागीरी करती हैं तब अधिकांश इस वर्ग की महिलाएँ जिसकी बात मैंने पहले की है। एक नहीं ऐसे हजार उदाहरण निकाल कर दिए जा सकते हैं जहाँ ऐसा कोई विरोध नहीं किया गया। क्यों? क्यों चुप रही महिलाएँ? उपभोग और प्रदर्शन की वस्तु बनते हुए क्यों नहीं रोका गया? आज चप्पल के विज्ञापन में भी क्यों स्त्रियाँ भाग लेती हैं? क्या आवश्यकता है? मतलब कुछ स्त्रियाँ जिनमें माडल और अभिनेत्रियाँ अधिक शामिल हैं, कुछ रूपये के लालच में ये सारी नौटंकी क्यों करती हैं और क्या इस क्षेत्र के अलावे उन्हें कोई क्षेत्र दिखा नहीं जहाँ वे जी सकें? शिक्षा से लेकर कई ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ लाखों महिलाएँ चैन से हैं(यहाँ मुद्दा ज्यादा आगे नहीं ले जाया जाय, मुद्दा इस विषय तक सीमित रहे वरना बह्स अन्तहीन होते देर न लगेगी)।

    रंगमंच की कलाकार महिलाएँ जिनकी प्रतिभा और योग्यता इन नकली कलाकारों की तुलना में बहुत अधिक महत्व की है, कितनी बार ऐसे तमाशों से दो चार होती हैं? एयर होस्टेस औरत ही क्यों? औरत खुद बनना चाहती है दिखावे की वस्तु अधिकांश मामलों में। अपवाद संभव है, इसलिए एक-दो नाम लेने से कोई लाभ नहीं।

    भारत गुलाम हुआ तो क्या उसे अमेरिका के लोग आजाद करा गये? भारत के लोग लड़े न कि अमेरिका के। ठीक इसी तरह स्त्री अपनी लड़ाई लड़े ब्लाग और कागज पर नहीं और विवेक से न कि दमित इच्छाओं की पूर्ति के लिए। हमेशा लड़ाई खुद लड़नी होती है। इस वर्ग की महिलाएँ कभी मूल चीजों पर लड़ाई नहीं छेड़ती, बस तमाशे शुरु करती रहती हैं।

    "हमारे ब्लोगर भाई - जो काफी समय से मीडिया की कमियों को पॉइंट करते आ रहे हैं - वे चुप क्यों रहे देश की इस तरह नाक कटवाने पर?"

    कौन चुप रहा? ब्लाग से कूद जाते क्या दिल्ली में सीधा? और वैसे भी चैनल देखने की फुरसत नहीं है, अगर होती तो बोलते।

    लड़ाई लड़ी जानी चाहिए भोग्या के रूप को हटाने के खिलाफ़ तो लड़ाई शुरु हो जाती है एक कदम और आगे दिखावे के लिए?

    अब मीडिया को क्या हम या ब्लागर चैनल खोलकर चलाते हैं कि हम कसूरवार हो गए? इसके लिए तो मोर्चा नहीं निकालती महिलाएँ? आपके सारे सवाल
    पर्स, कपड़े और जूतों पर हैं तो साफ है कि अस्सी प्रतिशत दोष महिलाओं का है। कभी समझाकर देखा है आपने महिलाओं को या बस अपने को पुरुष एरोगेंस के खिलाफ़ ही मानती हैं? वैसे एरोगेंस पैदा होता है, किया नहीं जाता।

    मीडिया हो, धारावाहिक हो, फिल्म हो या विज्ञापन आप हाल देखें महिलाओं के, सब जगह पुरुष दोषी का नारा मचाने से क्या होगा? स्थिति मजबूत करिए, हक मिलेगा। हक भीख मांगने से कौन देगा। हक है और आपका अधिकार है उसे पाने का। लेकिन ध्यान रहे कि शायद ही कोई ब्लागर हो जिसे मीडिया के इस कारनामे से खुशी होती हो, जिनके पास दिमाग है और जो सोचते हैं।

    महिलाओं को बस आरक्षण चाहिए, योग्यता नहीं, दिखावा बन्द करके सोचना शुरु करना चाहिए तो कुछ परीक्षा में कुछ अंक ले आती हैं और फुल कर कुप्पा कि बड़ा तीर मार लिया है, अखबार भी खूब छापते हैं और लोग भी ऐसे हैं ही जो इसे सच और विचारणीय मान बैठते हैं।

    लगता है कुछ अधिक कह रहा हूँ। लेकिन प्रवीण जी लिंक का इतना बुरा भी नहीं मानेंगे कि एक लिंक पर आपत्ति जता दें। इसलिए जरा यह लिंक देख लिया जाये कि स्त्री के बारे में मेरे खयाल क्या हैं-
    http://hindibhojpuri.blogspot.com/2011/03/29-10-8.html

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  28. जारी …

    जैसे ही इतना लिखा कि पढ़ने को कुछ मिल गया।

    अगर कोई कहता है कि किसान के बेटे ने पूरे देश में पहला स्थान हासिल किया या चपरासी के बेटे ने प्रशासनिक सेवा में प्रथम स्थान प्राप्त किया, मेरा मानना है कि किसानों का अपमान है यह। इसका सीधा सीधा अर्थ है कि किसान के बेटे इस लायक नहीं।

    अब शेखर जी की बात पर।

    आपकी सभी बातों पर मेरी सहमति है और मैं जब से इस ब्लाग पर कह रहा हूँ तब से मैंने हमेशा इसी का पक्ष लिया है लेकिन मेरी कोशिश है उन सवालों को उठाने की जो हैं और जिनके जवाब भी हैं लेकिन भुलावे में रखने में कुछ लोग अपने को सफल समझ रहे हैं।

    बात आपके सवाल की तो इसका जवाब कौन दे सकता है! लेकिन हम या आप तो निश्चय ही इसके लिए जिम्मेवार नहीं कि किसके लिए क्या वस्त्र हैं। उदाहरण के लिए लड़कियों की सैंडिल और पुरुषों के चप्पल पहन तो सकता है एक दूसरा लेकिन इसमें हम नहीं हमारे पूर्वजों ने जो निर्धारण किया था, वह ध्यान देने लायक है। पूर्वज गलत भी कर गए हैं बहुत कुछ, उसमें सुधार या आवश्यक हो पूर्ण विरोध भी होना चाहिए।

    हजारों-लाखों साल का इतिहास है कपड़ों का।

    लड़कियाँ क्या पहनें यह तो तय वे करें लेकिन बार-बार पुरुष-विरोधी वाक्य हमेशा नहीं माफ़ किया जा सकता। जैसे सैनिकों के लिए निश्चय ही धोती की तुलना में पैंट बेहतर है वैसे ही अपनी आवश्यकता को ध्यान में रखकर कपड़े पहने जाने चाहिए।

    वैसे आपका सवाल तो वैसे ही है जैसे यह पूछना कि शुरु से किताब में पन्ने सफ़ेद और स्याही काली ही क्यों?

    कारण है शरीर की संरचना, अंगों की व्ववस्था, समाज की व्यवस्था, इतिहास का विकास-क्रम, उपलब्धता, मौसम आदि। ये अकारण नहीं है। और जब यह व्यवस्था की गई तब लोगों ने उसका नाम याद न लिखा न रखा कि बता सकें कि किसने निर्धारित किया। यह क्रम है नंगे शरीर से पेड़ की छाल तक और फिर आज तक का।

    जवाब और विस्तार से दिया जा सकता है लेकिन यहाँ नहीं… विकास का क्रम समझा जाय न कि दस लाख साल के इतिहास को अपने हाथों लिखा जाय और वह भी तब जब वह बीत चुका है।

    लेकिन सवाल अभी बाकी रहता है कि जब शुरु में कोई चीज पुरुष पहनता है तब बाद में उसे स्त्री क्यों चाहती है कि पहनें, बहाना नहीं इसका जवाब तलाशा जाय। चहे समाझ शास्त्र से हो चाहे मनोविज्ञान से। तर्कों को आस्था से न मापा जाय।

    जैसे घड़ी निश्चय ही पुरुष ने हाथ में पहनना शुरु किया, फिर स्त्रियों के लिए घड़ी आई और वह भी छोटे आकार में। क्यों? घड़ी आवश्यकता थी मानव की लेकिन लाल रंग के जूते से हरे रंग के जूते में क्या आवश्यकता है और वैज्ञानिक जवाब चाहिए, ध्यान रहे।

    जैसे किसी ने काले जूते अनिवार्य किए तो क्यों किए, वजह थी कोई? वैसे ही कपड़े हैं। इतिहास और विकास-क्रम का खेल है सब।

    आगे बहुत कुछ कहा जा सकता है लेकिन अभी नहीं। मैं एक पोस्ट लिखने वाला था लेकिन अब नहीं लिखूंगा। यहीं सब बातें होने लगीं हैं। बाद में देखा जाएगा।

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  29. अभी तक बहुत सारे प्रश्नवाचक वाक्य लिख लिये।

    शेखर भाई,

    साड़ी पहनकर पुलिस और सेना काम काम करने को नहीं कह रहा मैं। बार-बार कहा कि सब चीजों पर ध्यान देकर आवश्यकता देखते हुए वस्त्र पहने जाएँ क्योंकि मानव के विकास और इतिहास में वस्त्र एक आवश्यकता के रूप देखा गया तभी यह आज है वरना जंगलों में शिकार करते और जानवरों की खाल भी पहनते लोग आज भी।

    उत्तर देंहटाएं
  30. badhiya..........achhi vimarsh........khaskar.....chandanji
    ko yuva-turk ke roop me dekhkar....

    pranam.

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  31. रचना जी,

    पहली बात कि मैं अंग्रेजी में की गई टिप्पणियों को महत्व नहीं देता। आपने नारी सशक्तिकरण की व्याख्या कर डाली है, उसमें ऐसा कुछ नहीं है जिस पर हम या कोई तर्क करे क्योंकि मैंने वह सब बात किसी न किसी रूप में खुद कह चुका हँ। और आपका यह लिखा ऐसा लगा जैसे कहीं से उठाकर चिपका दिया गया हो। सम्भव हो आपका ही लिखा है लेकिन यहाँ तो नहीं लिखा गया है, ऐसा लगा।

    किसके आँकड़ों को सही मानें? एक आप बताने की कोशिश कर रही हैं और एक भारत सरकार तो कभी कोई साइट। आँकड़ों की सत्यता पर संदेह भी किया जा सकता है क्योंकि आँकड़े विश्वसनीय कम ही होते हैं। खासकर विदेशी लोगों के तैयार किए आँकड़े तो चर्चा लायक कभी-कभार होते हैं। जिनका आदर्श अमेरिका हो या इंग्लैंड हो उनसे मुझे कुछ कहना ही नहीं है।

    मेरे प्रश्नवाचक एक भी वाक्य का जवाब नहीं दिया गया है लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से अल्प ज्ञानी मान लिया गया है। अल्प ज्ञानी होने के नाते ही कुछ सवाल किए हैं, जवाब देकर ज्ञान दें।

    नारी सशक्तिकरण की व्याख्या एकदम बेजान लगी। ऐसी घोषणा तो हर पार्टी चुनावी घोषणा-पत्र में करती है कि वे सबका भला चाहती हैं लेकिन ताजा उदाहरण दिख रहा है कि भारत के सत्तापक्ष और विपक्ष के लोग, यहाँ तक कि देश के पदमोही प्रधानमंत्री तक कितने घटिया बयान देते हैं।

    वैसे इस बहस की अन्तिम परिणति मुझे पता है।

    उत्तर देंहटाएं
  32. चन्दन जी आप किस टिपण्णी को , किस भाषा को और किस व्यक्ति को महत्व देते हैं ये मेरे लिये महत्वहीन हैं . मै आप की जैसी नहीं बनना चाहती . मेरे पास मेरा अपना दिमाग हैं , अपनी सोच हैं और मै अपने हिसाब से काम करती हूँ . !!!!!!!!!
    मेरे कमेन्ट में लिंक उपलब्ध हैं मैने ये कब और कहा लिखा . अगर आप की बात में वही प्रश्न हैं जो किसी और ने मुझ से कही और पूछे हैं और जिनका उत्तर में अपने तर्कों से पहले ही अपने ब्लॉग पर दे चुकी हूँ तो वही आप को भी दूंगी .
    अगर मेरे तर्क का उत्तर
    आप पास नहीं हैं तो मै कुछ नहीं कर सकती हूँ . अगर आप को वो किसी नेता का भाषण लगता हैं तो आप की अपनी सोच हैं और आप को अधिकार हैं अपनी सोच पर कायम रहने का . कभी संभव हो तो एक शब्द का absolutist का मतलब खोजिये और समझियेगा शायद आप को पता चलेगा जो मै कहती हूँ वो किस विचारधारा के अंतर्गत आता हैं .
    आप को लगता हैं आप के तर्क का जवाब नहीं दिया , जबकि आप की कही हर बात का सीधा और सरल जवाब मेरा कमेन्ट हैं जो आप जैसे तर्क देने वालो को मै हमेशा देती हूँ . मै पिछले ५ साल से ब्लॉग जगत में अपने तर्क पर कायम हूँ और हर दूसरे दिन एक नया " नारी समानता और सशक्तिकरण " विरोधी ब्लोगर जो अपने को नारी समानता का पक्षधर कहता हैं आ कर मेरे से अगर वही प्रश्न करेगा तो कट कॉपी पेस्ट सबसे आसन सुविधा हैं .
    मै नारी - नर समानता की पुरोधा हूँ और मानती हूँ नारी को हर वो अधिकार हैं की वो जैसे चाहे , जो चाहे , अपने लिये जो ठीक लगे करे . बस वो जो करे वो संविधान और कानून के दायरे में सही हो .

    अगर पुरुषो को लगता हैं नारी उनको कोपी कर रही हैं { ऐसा पुरुषो को लगता हैं जबकि मेरा ऊपर का कमेन्ट आप को बता चुका हैं ऐसा नहीं हैं } तो पुरुषो के अन्दर नारी से एक सीढ़ी ऊपर खड़े होने का अहसास हैं जबकि दोनों बराबर हर तरह से { आगे जानना हो मेरा नज़रिया तो १५ ऑगस्ट से नारी ब्लॉग पर होगा } तो पुरुषो को अपने आचरण को इतना बढ़िया रखना चाहिये था की उसको जो भी कोपी करता उसमे पुरुषो को अपना नुक्सान नहीं दिखता .

    इस पोस्ट पर मेरा ये आखरी कमेन्ट हैं

    उत्तर देंहटाएं
  33. रचना जी,

    अब आपके दिए सारे लिंक देख लिए। कुछ खास तो नहीं लगा मुझे। भारत अगर असुरक्षित जगह तो ब्लाग पर लिखने से और शोर मचाने भर से सुरक्षित हो जाएगा? इसके लिए क्या भावी कार्यक्रम हैं आपके पास? समाधान क्या है? बस यही कि सब नारी लोग भली हैं और पुरुष गए-गुजरे, इसी का शोर! कोई फायदा नहीं है। महिलाओं से मिली ही नहीं हैं आप सिवाय शहरी तमाशों के, ऐसा ही लग रहा है।

    अंग्रेजी अखबार सिर्फ़ भ्रम फैलाते हैं और देश के मामलों प्राय: झूठ बोलते हैं।

    www.shukrawar.net पर विष्णु नागर का संपादकीय पढ़ा जा सकता है। अब हर बार अपने को बुद्धिमान मानना सही नहीं है, इसलिए दूसरों की बात भी सुन ली जाय।

    मैं फिर कह रहा हूँ कि आपके नारी होने के चलते मैं सब कुछ नहीं कह रहा।

    आप फिर आईं और बिना कुछ तथ्य और तर्क के लिख कर चल दीं और कह दिया यह आपका आखिरी कमेंट है।

    "अगर पुरुषो को लगता हैं नारी उनको कोपी कर रही हैं"
    लगना क्या है? 100 में से 99 मामलों में ऐसा ही होता है या हो रहा है। 'दूध उजला होता है' और 'मुझे लोमड़ी कुत्ते जैसी लगती है।'इन दोनों वाक्य को देखिए। एक में लगना और एक में होना। जो हो रहा है वह आपको लगे या न लगे, इससे फर्क नहीं पड़ता। मेरे सवालों पर कोई जवाब दिया नहीं जा रहा लेकिन बार बार ऐलान किया जा रहा है सब जवाब दे दिया गया। अद्भुत अन्दाज हैं जवाब देने का कि प्रश्नकर्ता और जिज्ञासु को ही पता न चले कि उसके सवालों के जवाब दे दिए गए हैं।
    जब तक पूछने वालों को पता न चले और वे संतुष्ट नहीं हों तब तक उत्तर देनेवाले की योग्यता पर संदेह ही करेंगे सब।

    "मै नारी - नर समानता की पुरोधा हूँ"
    क्या आपको पुरोधा का अर्थ मालूम है? अगर नहीं तो उसका इस्तेमाल क्यों कर रही हैं?

    उत्तर देंहटाएं
  34. जारी…

    अपने को पुरोधा कहना सरासर गलत है और अहंकार है। यह एरोगेंस है! कोई अपने को आइरन लेडी कहे, कोई लेखनीवीर वीरंगना कहे, कोई अक्ल की मल्लिका कहे, कोई पुरोधा कहे तो उनको क्या कहें? अब सवाल उठेगा मेरे ऊपर कि मैंने तो भारत का भावी प्रधानमंत्री ही कह दिया है। वह कोई गुणात्मक शब्द नहीं है और उसमें गुणवाचक बोध कहीं से नहीं हो रहा है। किसी का लक्ष्य कोई भी जगह हो सकती है लेकिन अपने को पुरोधा कहना अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना है। व्यक्तिगत आक्षेप के कारण बने आपके शब्द और कुछ नहीं।

    " मै पिछले ५ साल से ब्लॉग जगत में अपने तर्क पर कायम हूँ और हर दूसरे दिन एक नया " नारी समानता और सशक्तिकरण " विरोधी ब्लोगर जो अपने को नारी समानता का पक्षधर कहता हैं आ कर मेरे से अगर वही प्रश्न करेगा तो कट कॉपी पेस्ट सबसे आसन सुविधा हैं ."

    यानि पिछले पाँच सालों से बस वह सब कह रही हैं जो बच्चा बच्चा जानता-समझता है। किसी तरह का समाधान प्रस्तुत नहीं कर रहीं आप सिवार शोर मचाने के। कम से कम रास्ता तो दिखाया होता ताकि अल्प ज्ञानि लोग उस पर चलते।

    नारी समानता विरोधी किसे कहा गया है? जब कोई इज्जत देने पर एकदम से सिर पर आ बैठने की कोशिश करे तो सिखाना आवश्यक है।

    आपको सरल हिन्दी में पूछे गए सवाल समझ में नहीं आते जो आप मान रही हैं कि आपने सबका जवाब दे दिया?

    अपने को नारी समानता का पक्षधर जो भी कह रहा है वह तो सामने मिलने पर ही दिख सकता है कि कितना नारी की समानता का पक्षधर है? सबूत तो ब्लाग पर नहीं दिखाया जा सकता।

    विलाप करने से क्या होगा?

    आपके पास अपना दिमाग है, यह सबको पता है। बताने की कोई आवश्यकता नहीं है। बात है मेरे किसी को महत्व देने और न देने कि तो आप या कोई यहाँ हिन्दी में आकर लिखें तो आगे तर्क भी किया जा सकता है। और तर्क करते वक्त ध्यान रहे कि तर्क व्यक्तिगत विचारों से नहीं सवालों और जवाबों से होते हैं।

    "अपनी सोच हैं और मै अपने हिसाब से काम करती हूँ . !!!!!!!!!"

    अवश्य कीजिए लेकिन तर्क करते वक्त अपने हिसाब से काम नहीं सवालों के गम्भीर जवाब देने होते हैं। यहाँ दस बार विस्मयादिबोधक चिन्ह की आवश्यकता? कोई आश्चर्य है क्या कि आप अपने काम अपने हिसाब से करती हैं? इतना जोर देकर कहने की कोई जरूरत नहीं थी।

    कुल मिलाकर समझ तो इतना ही आया कि कोई तर्क वर्क नहीं बस शोर मचाया जा रहा है। अब आपका कमेंट आखरी है या नहीं यह तो आपको तय करना है लेकिन 5 सालों से एक ही बात पर आप अड़ी हैं वो भी बिना किसी को तर्क में हराये, यह लग रहा है।

    उत्तर देंहटाएं
  35. जारी…

    वैसे अंग्रेजी समझ तो नहीं आती लेकिन किसी बेवकूफ़ की बात को आधार मानकर हल्ला मचाना दिमागी कमजोरी को बयान करता है।
    Thomson Reuters Foundation कौन है यह? कहाँ का है? 213 जानकार(हमारी पुलिस जैसे जानकार?) लोगों ने जो कहा उस पर विवाद करना बेकार है। वजहें हैं।
    1) लगभग 150 करोड़ जनसंख्या है इन पाँच देशों की जहाँ यह सर्वे किया गया है। और भारत के लोग हमेशा विदेशी सर्वे को सही मानते हैं और प्राय: गलत होते हैं ये आँकड़े, जिन्हें सबूत चाहिए। मुझसे सम्पर्क करें।
    2) कितनी मूर्खता पूर्ण बात है यह देखिए। दुनिया के 210 से अधिक देशों में से 5देशों में सर्वे किए गए और उनमें भारत का स्थान चौथा घोषित कर दिया गया। मैं भी इसी भारत का रहने वाला हूँ न कि मंगल ग्रह का, खूब जानता हूँ ये सारे सर्वे।

    यानि 5 आदमी परीक्षा में शामिल हुआ और चौथा स्थान और इसपर लग रहा है जैसे आइंस्टाइन का सिद्धान्त है!

    आपके इस लिंक पर
    http://indianwomanhasarrived.blogspot.com/2011/06/blog-post_16.html
    कहा गया है कि भारत में दस करोड़ महिलाओं की तस्करी होती है। हालांकि इस पर आपत्ती जताई गई है लेकिन अंग्रेजी में "at least 100 million" कहा गया है।
    अब जरा बुद्धि का इस्तेमाल किया जाय तो पता चले कि 6 साल बीतते-बीतते सब महिलाएँ तस्करी का शिकार बन जाएंगी। पूरा बकवास है ये आँकड़ा।
    यानि भारत 2017 तक कैसा हो जाएगा खुस महसूस कर लें। और यह बात 2009 की है, इसलिए यह दुर्घटना 2015-16 तक ही हो जाएगी। कहा गया कि दस की जगह 7 और 8 करोड़ भी मान लें तो बहुत बुरी खबर है।(दस-बीस प्रतिशत गलत मान लेते हैं तब भी, इसकी बात शायद कही गयी है लिंक पर)

    कौन ब्लागर कहता है कि तस्करी खुशखबरी है?

    रद्दी और अवास्तविक आँकड़े पेश कर के क्या बताना चाहती हैं आप?


    यह भी एक नारी ने ही लिखा है, इसे भी देख लेने का कष्ट करेंगी।

    http://blogs.navbharattimes.indiatimes.com/redchilli/entry/%E0%A4%A4-%E0%A4%AB-%E0%A4%B0-%E0%A4%AE-%E0%A4%AC%E0%A4%B9%E0%A4%A8-%E0%A4%95-%E0%A4%96-%E0%A4%B2-%E0%A4%AB-%E0%A4%AD-%E0%A4%A8-%E0%A4%95-%E0%A4%B2-%E0%A4%B8-%E0%A4%B2%E0%A4%9F%E0%A4%B5-%E0%A4%95


    बहुत हो गया। अभी काफ़ी है इतना…

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  36. रचना जी,

    "मै आप की जैसी नहीं बनना चाहती . "

    अच्छा है। मेरे जैसी बन के क्या कीजिएगा?

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  37. कविता अच्छी है प्रवीण जी | पर लगता है ज्यादातर इनके विरोधी लोगों को बेशर्मी मोर्चे का सही मतलब अर्थ और कारण ही नहीं पता है और बिना पूरी तरह से जाने ही लोग इसका विरोध कर रहे है ये केवल महिलाओ को आधुनिक कपडे पहनने की आजादी के लिए नहीं निकाल गया था इसके लिए महिलाओ को ना तो किसी से इजाजत की जरुरत है और ना ही किसी मोर्चे की बेसर्मी मोर्चे की कई दूसरे उद्देश्य थे जो ना तो लोगों को समझ आये या ये कहे की लोग उसे समझना ही नहीं चाहते है और उसके एक छोटे पहलू को पकड़ कर ( जो की भारत के बेसर्मी मोर्चे में था ही नहीं स्लाट जैसे कपडे पहन कर मोर्चा निकालना ) उसमे भारतीय संस्कृति का नाम घुसा कर कोसना सुरु कर दिया | फिर इन लोगो से भी क्या शिकायत करना जो महिलाओ के इन्सान ही नहीं मानते और पुरुष को उस देवता की तरह मानते है जो महिला बनना चाहती है ऐसे सोच वालो को तो कुछ समझान ही बेकार है |

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  38. माफ़ कीजिये चन्दन जी आपकी बातें समझ के परे हैं...
    अंशुमाला जी की बात से सहमत हूँ...

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  39. अंशुमाला जी,

    पता नहीं चला आप क्या हैं।(अंशुमाली सूर्य का नाम है, तो पुरुष लेकिन माला से समझ में नहीं आया कि पुरुष की स्त्री?) लेकिन वैज्ञानिक सिद्धान्तों को एक वाक्य में कह देना अवैज्ञानिक है। सिद्ध करने के लिए सारे प्रमाण और प्रत्यक्ष प्रयोग दिखाने होते हैं।

    मैं भारतीय संस्कृति का(आप यह भी सोच सकते हैं कि मैंने खुद पर इस बात को क्यों ले लिया।)कोई बड़ा पक्षधर नहीं हूँ। आप जान लें कि भारतीय संस्कृति इतनी बुरी भी नहीं, वह भी मानव के विकास क्रम में एक पड़ाव है। वैज्ञानिक समझ के साथ कुछ कहें तो अच्छा लगेगा न कि जज के आन्दाज में आए और सीधे सीधे फैसला सुनाकर चले गए और वह भी तब जब आप जो कह रहे हैं उसका कोई सबूत नहीं है, ऐसा लग रहा है।

    अच्छा होता आप कहने के पहेल थोड़ा जान या समझ लेते। इतनी मेहनत के बिना किसी पर कुछ भी लिख मारना कहीं से सही नहीं है।

    जहाँ तक बात है महिला को इंसान मानने की, वह मैं बेहतर जानता हूँ कि मैं क्या मानता हूँ। और इतना इशारा काफ़ी होगा कि आज तक एक आदमी भी मेरे उपर इसका आरोप न लगा सका कि मैंने लड़कियों के साथ किसी किस्म की बदतमीजी की है। लेकिन यह तय है कि महिलाएँ सोचती कम है देश और समाज के बारे में(कुछ अपवाद हो सकते हैं)और यह कोई काल्पनिक कथा नहीं है। इतिहास बताता है मानव का और वह भी लाखों साल का। अब जाकर किसी ऐसी किताब से उदाहरण मत खोजिएगा जिसका नाम हो बहादुर नारियाँ, तेजस्वी नारियाँ, बिहार की बेटियाँ आदि

    और यह बेशर्मी मोर्चा जिन लोगों ने निकाला वे बड़े बुद्धिमान हैं और हम तो घोषित बेवकूफ़ तो कम दिमाग के प्राणी तो कम दिमाग वाली बात ही करेंगे। क्यों?

    और कुछ भी कहने के लिए अखबार की हेडिंग चिपकाने से क्या होगा? तथ्य, इतिहास, समाज, तर्क सबका ध्यान रखा जाना चाहिए, ऐसा यह कम-अक्ल इंसान(?) मानता है।
    बहुत बहुत धन्यवाद! आपके इस अन्दाज में लिखने का।

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  40. शेखर भाई,

    माफ़ करने लायक तो नहीं हूँ मैं। गलती मेरी है कि मैं नहीं समझा पाया। लेकिन मेरे खयाल से मैंने भारी भारी शब्दों और विचारों को तो नही लिखा था कि समझ में न आएँ। और अंशुमाला जी से सहमति का स्वागत है लेकिन वजह भी तो होनी चाहिए।

    जरा इशारा ही कर देते ताकि मैं आत्म-मंथन करता कि क्या ऐसा कह दिया जो समझ में नहीं आ सके।

    मैं एक अनीश्वरवादी व्यक्ति हूँ तो भारतीय संस्कृति का पक्ष लेकर कोसने की बात, ऐसे ही खत्म हो जाती है। संघी सोच और सांप्रदायिक सोच की जगह अनीश्वरवादी के पास नहीं होती, आप जानते होंगे।

    कोसने की बात पर समझ में आना चाहिए कि कोसने और प्रश्न पूछने में क्या अन्तर है। हमेशा हारे हुए लोग ऐसी बात करते हैं, यह मैं नहीं तर्कशास्त्री लोगों का विचार है।

    अब तो बस परिणाम बताने वाले वैज्ञानिक लोग अधिक आ गये हैं, ऐसा मैं मान रहा हूँ । कोई
    निष्कर्ष के पहले भी तो कुछ बता जाये ताकि ज्ञान-वर्धन हो सके।

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  41. भाई मैं थोडा कहा ज्यादा समझना वाले तर्ज़ पर कहना और पढना पसंद करता हूँ... बातें ज्यादा गोल नहीं घुमाता और न ही कोई तर्क है मेरे पास...
    हाँ मैं हार गया यही समझ लीजिये...
    पहले ही बहुत विषयांतर हो चूका है... अब और बतकुच्चन नहीं कर सकता (इसको चर्चा कहना बेवकूफी ही मालूम पड़ती है मुझे)...
    प्रवीण सर से माफ़ी सहित विदा लेता हूँ...

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  43. और हाँ...
    अंशुमाला जी पर की गयी आपकी टिप्पणी बहुत अजीब लगी, शायद आपको इस बात का घमंड हो गया है कि आप पुरुष हैं... जितनी जल्दी हो सके इस घमंड से बाहर निकलें...क्यूंकि ये निर्णय आपका नहीं था कि आपको पुरुष बन कर पैदा होना है या स्त्री... और हो सके तो अपनी हिंदी भी सुधारने पर ध्यान दें..शायद आपको अंशुमाला का अर्थ समझ में आ जाए...

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  44. शेखर भाई,

    माफ़ी चाहता हूँ लेकिन मुझे घमंड है, इसकी खबर अभी तक मुझे नहीं लगी है।

    और हाँ, हिन्दी तो सुधारने की कोशिश अवश्य होगी। सलाह के लिए धन्यवाद। लेकिन सुमन, सरोज नाम हमारे यहाँ दोनों के होते हैं और क्या कोई नाम सुनकर बता सकता कि व्यक्ति पुरुष है या स्त्री?

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  45. जैसे घड़ी निश्चय ही पुरुष ने हाथ में पहनना शुरु किया, फिर स्त्रियों के लिए घड़ी आई और वह भी छोटे आकार में। क्यों?

    hey raam
    आप को सूचित कर दूँ की आप की बहुत सी जानकारिया गलत हैं इस लिये क़ोई जवाब देना फिजूल हैं पर फिर भी कभी कभी मजा आता हैं जब लोग तिलमिलाते हैं और आप तो सब महिला ब्लोग्गर से ही नाराज हैं खेर मुद्दे की बात ये हैं की आप की जानकारियाँ गलत हैं

    अब आप इतना इतिहास इतिहास चिल्ला रहे हैं तो आप को बता ही दूँ
    The wrist watch was invented by the Swiss watch maker, Patek Phillippe in the late 1800s; though at first only women wore them.
    The man's wristwatch was invented by Louis Cartier in the early 1900s for Mr. Alberto Santos-Dumont. Dumont was working on the development of aircraft and found a pocket watch inconvenient to look at while in the aircraft. He asked his friend Cartier to design a watch for him.

    Thomas Jefferson was the one to invent the american wrist watch, which was later worn by Abraham Lincoln.

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  46. रचना जी,

    तिलमिलाया कौन यह तो दिख रहा है कि जवाब छोड़कर फ़िजूल बातों को कहना शुरु कर दिया गया।

    मेरी जानकारी कहाँ गलत थी, यह तो बताना ही चाहिए न? लेकिन आपने खुद इतिहास की शिक्षा इतनी नहीं ली थी कि बता सकें कि कलाई घड़ी का आविष्कार किसने किया था। इंटरनेट पर खोज कर चिपका गयीं। मैं तो खुश हुआ कि चलो यह तो पता चला कि घड़ी किसने पहनी लेकिन फिर दुखी होना पड़ा। वजह नीचे है।

    अफ़सोस है कि आप इतिहास का मतलब भी नहीं जानतीं। मानव के इतिहास और उसके विकास क्रम की बात मेरे द्वारा कि गयी। लेकिन आपने वैज्ञानिक आविष्कारों के इतिहास को ही भारी ज्ञान मान लिया । कोई बात नहीं।

    जरा इन सभी लिंकों को देखकर इनका खंडन किया जाय कि सबसे पहले हाथ पर घड़ी विख्यात वैज्ञानिक ब्लेज पास्कल ने पहनी थी।

    http://inventors.about.com/od/frenchinventors/a/Biography-Of-Blaise-Pascal.htm

    http://terrismathproject.tripod.com/id10.html

    http://prezi.com/1mu44t7nuby4/blaise-pascals-inventions/

    http://www.reformationsa.org/articles/Blaise%20Pascal.htm

    http://www.blurtit.com/q438115.html

    http://worldwidefreeresources.com/upload/CH320_T_21.pdf

    http://pstcc11.pstcc.edu/~csit/gmw/history_people_pascal.htm

    http://www.funtrivia.com/askft/Question90996.html

    http://www.worthpoint.com/blog-entry/short-history-wristwatch पर तो तस्वीर भी है।

    http://www.christianity.com/ChurchHistory/11630138/

    http://inventors.about.com/od/cstartinventions/a/clock.htm

    "Wrist Watch

    In 1504, the first portable (but not very accurate) timepiece was invented in Nuremberg, Germany by Peter Henlein. The first reported person to actually wear a watch on the wrist was the French mathematician and philosopher, Blaise Pascal (1623-1662). With a piece of string, he attached his pocket watch to his wrist."

    आप संदर्भों को सही समझ भी नहीं सकतीं और बौखला ल्कर मेरे कहने को चिल्लाना कह रही हैं। मैं भी ऐसे शब्द लिखता हूँ लेकिन संदर्भ ध्यान रहे, इसकी कोशिश जरूर करता हूँ।

    अब ब्लेज पास्कल जो कैलकुलेटर के निर्माता हैं, उनकी बात पर खंडन करना होगा। क्यों, कीजिए खंडन। मेरा ऐसा कोई विचार नहीं था लेकिन आपका बहुत बहुत धन्यवाद कि आपके चलते कलाई घड़ी की पड़ताल हो गयी।

    कुछ लोग खुश हुए होंगे कि मैं पलटी खा गया लेकिन अब तो संकट है!

    वैसे भी घड़ी का निर्माण पहले पुरुषों ने किया क्योंकि प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास में गणित और विज्ञान में स्त्रियाँ गायब सी हैं और आधुनिक विज्ञान की बात सब जानते हैं।

    मेरा इरादा स्त्रियों को इन सब क्षेत्रों में पीछा दिखाना कतई नहीं है लेकिन जब कुछ लोग स्वयं को वीर और महान घोषित करने लगें तो आवश्यक है कि उन्हें कुछ बताया जाय।

    इतिहास का अर्थ समझने की कोशिश की जाय मोहतरमा। तिलमिलाने का सवाल मेरे लिए पैदा नहीं हुआ अभी तक। वैसे तर्क में ये सब कहानियाँ और लफ़्फ़ाजी छोड़कर भी कुछ कहें।

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  47. pascal nae pocket watch pehni thee
    jaantee thee so nahin likhaa

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  48. रचना जी,

    और हे राम कह देने से राम और कृष्ण नहीं आ जाएंगे। ये चुटकुले कहाँ प्रयोग होते हैं, इसकी समझ भी होनी चाहिए। अब गाँव-घर में स्त्रियाँ जो गाली देती हैं, वह भी कह देने मात्र से आपकी बात साबित नहीं होती। कुछ दिन पहले भी छद्मवेष-धारी महापुरुषों की ज्ञान की सीमा से परिचित हो चुका हूँ और अब भी वही हो रहा है। भागना, भागना और बस भागना कोई समाधान नहीं है।

    वैसे अगर आप मेरे सभी सवालों का जवाब देतीं तो एक अच्छी किताब बन जाती जिससे मेरे जैसे और लोगों का भी ज्ञान-वर्धन होता। अब यह मत कह दीजिएगा कि मेरे सवाल फालतू हैं, मेरी हर बात फालतू है क्योंकि जब कोई यह सब शुरु कर दे तब ……

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  49. सवाल था कि सबसे पहले हाथ में घड़ी पहनी किसने? अब पलट कर कलाई घड़ी पर आ जाना ठीक नहीं। इस हिसाब से तो घड़ी बालू और पानी वाली भी होती थी। अब सबसे पहले कम्प्यूटर का वजन 30 टन था तो उसे कम्प्यूटर ही नहीं कहें, यह ठीक नहीं।

    वैसे यह बात विषय से अलग है।

    इतिहास में अब यह ध्यान बेकार ही है कि सबसे पहले जूते पहने गए तो बायें पर में दायें पैर में।

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  50. लो जी! इत्ती भावपूर्ण कविता गई एक किनारे
    चन्दन जी की विचारोत्तेजक टिप्पणियाँ और उन पर हमेशा की तरह बचकानी प्रतिक्रियाएं रूख मोड़ गईं

    रचना (जी) के पुरोधा होने के दावे पर हाय -तौबा नाहीँ होना चाहिए
    पिछली बार उनको एक टिप्पणी में हिंदी लिखते देख खुशी जाहिर कर दी थी मैंने, तो उन्होंने इसे 'व्यक्तिगत आक्षेप' कह आपत्ति ले डाली थी. :-)

    टिप्पणियों से
    स्त्री को संबोधित एक कथनांश याद आता है
    कि
    'स्त्री नंबर एक बनो, ना कि पुरुष नंबर दो!'

    कल से एक पोस्ट अधूरी पड़ी है स्लट वाक पर, लगता है कल लिख ही डालूं बाक़ी

    अब आगे कुछ कहना गड़बड़ है, यहाँ तो जूते भी निकल आए है :-)

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  53. इधर गूगल देव कहते हैं कि सर्वर में दिक्कत है हम कमेन्ट नहीं छाप सकते, बाद में आइए

    उधर तीनों कमेन्ट छप जाते है :-)

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  54. एक बहुत ही सहज और खूबसूरत नज़्म...
    लड़कीपन की पूरी कहानी कह दी है आपने...सभी आयामों को बखूबी समेटा है...आभार

    अपने पिता शिवराम की एक रचना, जो कि उन्होंने अपने नाटक के लिए लिखी थीं, यहां प्रस्तुत करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूं...

    हम लड़किया, हम लड़कियां, हम लड़कियां
    तूफ़ानों से टक्कर लेती लड़कियां

    हम मुस्काएं, जग मुस्काए
    हम चहकें, जग खिल-खिल जाए
    तपता सूरज बीच गगन में
    पुलकित और मुदित हो जाए
    तारों के झिलमिल प्रकाश में
    चंदा मामा देख लजाए
    रात्रि-दिवस के मध्य खुलें जो खिड़कियां
    हम लड़किया, हम लड़कियां, हम लड़कियां

    स्वेद हमारा भूमण्डल को स्वर्ग बनाए
    श्रम हमारा वन-उपवन में फूल खिलाए
    बिना पंख के उड़े गगन में
    तारों से झोली भर लाएं
    चट्टानों का चुम्बन लें तो
    पिघलें और तरल हो जाएं
    ज्यों सावन में उमड़े-घुमड़े बदरियां
    हम लड़किया, हम लड़कियां, हम लड़कियां

    दीवारों को घर में बदलें
    संबंधों में हम रस घोलें
    आंगन हमसे चहके-महके
    धरती डोले जो हम बोलें
    सारी दुनियां निकले उसमें
    हम जो अपनी मुट्ठी खोलें
    ज्यों झोंका ठंड़ी बयार भरी दोपहरियां
    हम लड़किया, हम लड़कियां, हम लड़कियां

    हम रचें विश्व को सृजन करें हम
    दें खुशी जगत को कष्ट सहें हम
    पीड़ा के पर्वत से निकली
    निर्मल सरिता सी सदा बहें हम
    दें अखिल विश्व को जीवन जीवन-सौरभ
    प्रेम के सागर की उद्‍गम हम
    फिर भी हिस्से आएं हमारे सिसकियां
    हम लड़किया, हम लड़कियां, हम लड़कियां

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  55. श्रीमान चन्दन कुमार मिश्र जी
    कितनी मेहनत आप ने की है मै नहीं जानती मेरे लिए तो आप एक नंबर के आलसी निकले मेरे नाम के ऊपर एक क्लिक करते आप को मेरे बारे में बहुत कुछ पता चल जाता सबसे बड़ी वो बात पता चल जाती जिसके लिए आप सबसे ज्यादा चिंतित है की मै क्या हूँ नारी या नर :)) वैसे किरण कुमार, प्रफ्फुल पटेल , ज्योति बसु इन नामो से आप को क्या लगता है की ये पुरुष है या नारी ????? :))))))
    देखा यदि सही दिशा में मेहनत ना की जाये तो कैसे वो बिल्कुल बेकार हो जाती है टिप्पणी लिख मारी मुझे पर किन्तु गलत सोच रख कर सही दिशा में महनत करते तो पहले मेरे बारे में बड़ी आसानी से जान लेते फिर लिखते |
    दूसरी चिंता आप की है की महिलाए समाज देश के बारे में ज्यादा नहीं सोचती है लो जी इसका जवाब भी आप को मेरे ब्लॉग पर जा कर मिल जाता पर आप ने उतनी भी मेहनत नहीं की | आप जैसे पुरुषो से इतने सालो में हम महिलाओ ने यही तो सिखा है की समाज और देश की चिंता के नाम पर बस पान की दुकान पर बैठ कर और आज के समय में ब्लॉग पर बकर बकर कर इतिश्री समझ लेना और कहना की देखो हमें समाज देश की कितनी चिंता है तो जी ये महान काम मै भी पिछले एक सवा साल से अपने ब्लॉग से कर रही हूँ और मेरे ही जैसी कई दूसरी महिला ब्लोगर भी है जो ना केवल ब्लॉग पर लिख रही है बल्कि उससे आगे बढ़ कर जमीनी रूप से कुछ कर भी रही है पर शायद आप को ऐसी महिला ब्लागरो तक पहुचने की मेहनत नहीं की | बाकि अब क्या कहे आप जैसे फुरसत वाले लोग नहीं है सो यही ख़त्म |

    उत्तर देंहटाएं
  56. अंशुलामा जी,

    बहुत बहुत धन्यवाद आपके इस ऐतिहासिक वक्तव्य के लिए। इसे तो भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा छपवाया जाना चाहिए। मेरी पहुँच उस तक नहीं है, इसलिए यह काम आपको खुद ही करना होगा।

    मैंने सुमन और सरोज का उदाहरण दिया और आपने किरण कुमार और ज्योति बसु का। मतलब दुहराया, लाभ कुछ नहीं।

    आप पर आरोप पत्र तो दाखिल नहीं किया था मैंने कि आपने आधी बात नर और नारी पर खर्च कर दी। आप मुझसे सीधे कह सकती थीं कि मैंने नहीं देखा। मैं इसे स्वीकारता हूँ कि मैंने इस पर ध्यान नहीं दिया लेकिन आपने इसके पूर्व का जो अपना वक्तव्य दिया था उससे पहले मेरे बारे में क्या जानती थीं और आपने कोशिश की जानने की? अब आप लोग तो इतने व्यस्त हैं कि यह भी कह देंगी कि मेरे बारे में न तो जानने की जरूरत है न फुरसत।

    कुछ साल पहले एक विवाद छपा था कि "था या थी शेक्सपीयर" अब वह था चाहे थी साहित्य पर क्या असर होने वाला है भला।


    मैं चाय और पान की दुकान की बकर-बकर करता हूँ या नहीं, ये आपको कैसे पता चल गया। बस इतना ही बता देने का कष्ट करें तो यह कम-अक्ल आपको भी मान लें कि आप तो फोटो देखकर भविष्य बताने वालों से दस नहीं दस लाख कदम आगे निकल गयीं।

    "आप जैसे पुरुषो से इतने सालो में हम महिलाओ ने यही तो सिखा है की समाज और देश की चिंता के नाम पर बस पान की दुकान पर बैठ कर और आज के समय में ब्लॉग पर बकर बकर कर इतिश्री समझ लेना और कहना की देखो हमें समाज देश की कितनी चिंता है तो जी ये महान काम मै भी पिछले एक सवा साल से अपने ब्लॉग से कर रही हूँ और मेरे ही जैसी कई दूसरी महिला ब्लोगर भी है जो ना केवल ब्लॉग पर लिख रही है बल्कि उससे आगे बढ़ कर जमीनी रूप से कुछ कर भी रही है पर शायद आप को ऐसी महिला ब्लागरो तक पहुचने की मेहनत नहीं की |"

    मेरे जैसे लोग से आपको सीखने की क्या आवश्यकता है? साक्षात बुद्धि का कोश जिनके पास जेब में हो वे भला किसी से सीखेंगे कैसे? आज कल "प्रभात खबर में" हर दिन किसी महिला के बारे में छपता है जिसने कुछ विशेष किया है। आप संचार या मीडिया में हैं और इतना तो सोच लेती कि वह एक सूचना देने का साधन मात्र है। किसी को सवाल का जवाब नहीं बस आक्षेप सूझ रहा है। अब ऐसे लोगों से कहने की आवश्यकता मैं भी नहीं समझ रहा क्योंकि जितना कह दिया है वह मेरे खयाल कुछ साल तक के लिए काफ़ी होगा ही।
    अब लगता है कि सचमुच बिना कुछ जाने बोलने वालों से पाला पड़ा है। पान की दुकान पर बकर-बकर करना और ब्लाग लिखना

    अब सारे महिला ब्लागरों की सूची तैयार करके उनके बारे में पता लगाने का काम तो कोई पेशेवर पत्रकार महोदय ही कर सकते हैं और फिलहाल मैं तो नहीं करने वाला।

    मेरे जैसे का मतलब तो मैं समझ ही गया लेकिन अब हँसी आती है आप सब बोलागर(शब्द है, छोहगर, लुरगर, उसी तरह बस बोलने में ही बुद्धिमान बोलागर) लोगों की बात सुन कर।

    आपके लिखे को न तो मैं कार्ल मार्क्स का लिखा मानता हूँ न गाँधी का, न प्रेमचंद का न सुभद्रा कुमारी चौहान का कि जाकर पढ़ता। जाकर पढ़ता भी लेकिन अब आपके जवाब से आपके मानसिक स्तर का पता चलता है और पढ़ने की कोई जरूरत नहीं लगती।

    पान के दुकान वाले तो फुरसत में रहते ही हैं। वैसे भी आम चुनाव करना है तो आप जैसे लोग व्यस्त रहेंगे ही।

    एक बात हमेशा याद रहे कि जब एक ब्लागर अपनी टिप्पणी किसी ब्लाग पर करता है और फिर वापस उस ब्लाग पर आता है तो इसका मतलब कुछ तो होता है! अब चाहे वह टिप्पणीकर्ता मैं हूँ या कोई और हो।

    मेरे बारे में तो बहुत कुछ मालूम हो गया होगा आपको। जो आदमी कम्प्यूटर पर ही यह जान जाता है कि कौन बकर-बकर करता है वह तो सब कुछ जान सकता होगा। तो और कुछ मेरे बारे में बता दिया जाय।

    वैसे एक किताब है "हिन्दी के यूरोपीय विद्वान"। उसे पढ़कर पूरे यूरोप को हिन्दी प्रेमी और हिन्दी का विद्वान कहना कितना जायज है, आप समझती हैं।

    अन्तिम बात कि जरा मेरा लिखा देखने से मालूम तो हो सकता था कि क्या और कितना घटिया सोचता और लिखता हूँ।

    संचार क्षेत्र में हैं तो जरा लिखने से आन्दोलन तक की चरणबद्ध प्रक्रिया और रणनीति भी समझ लें, आगे भी काम आएगा। गाँधी के हिन्द स्वराज को, प्रेमचन्द के गोदान को, मार्क्स के लेखों को और संसार के सभी बड़े लेखकों को एक नजर देख लें कि लिखा कब और उसका असर किस पर, कब, कैसे और क्यों पड़ा।

    और एक बात सब के लिए।

    जिनके पास जवाब न हों वे मुझसे कुछ कहने की कोशिश ना करें तो बेहतर क्योंकि मैं इतना मूर्ख और इतने ज्ञानी लोग, संतुलन नहीं होगा।

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  57. देखिये चन्दन जी अब हाथ पर घडी की बात तो आप ने की थी हम उसके ही विषय में तो लिखेगे . हम जेब घडी के बारे में लिख देते तो आप कहते विषय बदल दिया . कपड़ो की बात से आप घडी और जूत्ते पर आगये अब ये तो गलत हुआ ना इस गरीब देश में कपडा नसीब नहीं होता हैं गाँधी जी कहते थे एक ही कपडा पहनो कब कहा इतिहास जानता हैं क्यूँ कहा ये भी , इस गरीब देश में घडी की बात करना पोलिटिक्स करने जैसा हुआ , वो जैसे जय ललिता और करुना निधि करते हैं क़ोई टी वी बांटता हैं क़ोई मिक्सी , क़ोई लेप टॉप देने की घोषणा करता हैं आप शायद अपने सपने को पूरा करने के लिये जब राजनीती में होगी तो घडी और जूत्ते देगे वो भी बस पुरुषो क्युकी औरतो को इसकी क्या जरुरत हैं

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  58. अजीब हाल है! अब मैं क्या करूंगा राजनीति में जाकर, यह भी लोग जान गये। बड़े चमत्कारी लोग हैं आप सब। सब कुछ जान जाते हैं मन में ही। इसका अन्दाजा भी लगा लिया!

    बुद्धि को गिरवी रख कर आए महामानवों! मैं अगर गलती से प्रधानमंत्री बन गया तो आप लोगों को तो कष्ट होगा। इसलिए उपाय पहले से कर लें। सुझाव है।

    बार-बार आम के बगीचे में गिरे हुए पत्तों को गिनने में लगे हैं आप लोग।

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  59. jab bangae tab daekhaege
    abhi sae in dhamkiyon sae to darnae sae rahey
    aur jan lokpaal bil aa jayegaa to har pradhan mantri aam aadmi hi hogaa

    aur yae kament jab aap pradhan mantri hogae sansad mae paesh kar diyaa jayegaa aur is par sansad me behas hogi ki aap anti woman empowerment haen aur woman blogar ko dhamki daetey haen

    phir sansad sae nishkasan bhi sambhav haen

    bhavishya kisnae dekha

    banjaaye to achcha
    naa banae to ussae bhi achcha

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  60. लोकपाल को निरस्त भी तो किया जा सकेगा क्योंकि प्रधानमंत्री बनने के लिए जितने मत चाहिए उतने तो इसे निरस्त भी कर सकते हैं क्योंकि संसद को अधिकार है कि वह अपने पास किये गये किसी भी नियम-अधिनियम को निरस्त कर सकती है।

    ये महज जानकारी देने की धृष्टता थी। प्रधानमंत्री बनने के बाद यह पद रहेगा तब तो कुछ करेगा कोई। और सवाल पूछना अगर एंटी-वुमन है तो यह तो मैं हमेशा करता रहूंगा जी!

    वैसे न बनें तो खुशी होगी क्योंकि महान लोगों को यह अधिक अच्छा लग रहा है।

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  61. और सवाल पूछने मात्र से मेरे ऊपर कोई मुकद्दमा नहीं चलने वाला क्योंकि यह कहीं से गलत नहीं है। धन्य हैं आप! प्रणाम! एक थी भारत-कोकिला और एक हैं मस्तक-खोखला।

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  62. भयंकर बहस हो गयी एक कविता पर ...
    लड़कियां बहुत झेलती है , सहन करती है इसमें क्या शक है ...इसमें क्या गलत है कि लड़कियों को समानता का अधिकार मिलना चाहिए ,ये भी ठीक है कि उन्हें खुद तय करने देना चाहिए कि उन्हें क्या पहनना है ...
    मुझे नहीं लगता कि शालीनता का अनुरोध करने वाले लोंग लड़कियों की जींस पहनने या खुले बालों पर ऐतराज करते होंगे ...सबसे बड़ी शालीनता आँखों और व्यवहार में होती है , वह नहीं है तो लाख कपड़े पहन रखे हो , क्या फर्क पड़ेगा ...हाँ , उन्हें शालीन बने रहने का अनुरोध लड़कों /पुरुषों से भी करना चाहिए
    एक पक्ष यह भी है कि शालीनता लड़कियों के साथ लड़कों को भी सिखानी चाहिए , वे शालीन हुए तो शायद इससे फर्क नहीं पड़ेगा कि लड़कियां क्या पहनते हैं , क्या नहीं पहनती है !
    ऐसे किसी प्रदर्शन का विरोध यदि मैं करती हूँ तो सिर्फ इसलिए कि मैं मानती हूँ कि विरोध प्रदर्शन के लिए वस्त्रहीन होना कहाँ आवश्यक है !
    यह तो मैं अपनी टिप्पणियों और कविता कहानियों में कई बार लिख चुकी कि हंसती हुई स्त्री को देख लोगों की पेशानी पर बल पड़ जाते हैं , वही रोती हुई स्त्री के आगे कंधे बढ़ा देते हैं लोंग , मकसद कुछ भी हो ! इससे किसी वॉक का क्या लेना देना !

    उत्तर देंहटाएं
  63. एक हैं मस्तक-खोखला। होता हैं उनका जो वो नहीं हैं और ना हो सकते हैं रह गयी बात चन्दन मिश्र की तो ये शायद अनभिज्ञ हैं की लोकपाल बिल और जन लोक पाल बिल दो अलग अलग बात हैं

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  64. प्रवीणजी, बहुत ही अच्छी लगी यह कविता-सिरीज़ । बधाई ।

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  65. नाम बताकर कुछ कहते साहब/साहिबा!

    मेरे लिखे का जन लोकपाल या लोकपाल से कोई संबंध है, ये निष्कर्ष कैसे निकाल लिया गया? इस बात का जिक्र तो मैंने किया ही नहीं।

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  66. वैसे तो मैं खुद इस तरह की बात कहने से बचता हूँ लेकिन अब कह ही देता हूँ.मेरा मानना है कि एक पाठक के सवालों के जवाब ब्लॉगर को ही देने चाहिये ताकि अनावश्यक विवादों से बचा जा सके.इस तरह की नीति आदर्श तो नहीं कही जा सकती और इससे थोडा नुकसान भी होता है मैं भी ऐसी नीति अपनाने वाले ब्लॉग पर मेरे बारे में एक अन्य पाठक को हुई गलतफहमी को दूर नहीं कर पाया था.लेकिन यहाँ का माहौल देखकर लगता है कि फिलहाल हिंदी ब्लॉगिंग में ये जरूरी भी है.क्योंकि कई लोग व्यक्तिगत आरोप प्रत्यारोप पर उतर आते है.निरर्थक बहस शुरू कर देते हैं.खासकर कोई महिला सामने हो तो ये प्रवृति कुछ पुरूषों में ज्यादा देखी जाती है कि वे उस महिला के बेहद बेहद बेहद जरूरी तर्कों या प्रश्नों को मजाक में उडाने का सेडिस्टिक आनंद उठाने लगते है कई तो कुछ और न कर नाम पर ही पिल पडते है.कमेंट पॉलिसी तो खैर ब्लॉगर की ही होगी और होनी भी चाहिये लेकिन मुझे लगता है ऐसा करने पर माहौल खराब होने की संभावना कम हो जाती है.

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  67. for very long you are absent from naari blog praveen

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  68. लड़कियों का हर पक्ष सहजता से रख दिया है .... गहन अभिव्यक्ति

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  69. उपरोक्‍त वाद-विवाद पढा. लेकिन मेरा ये मानना है कि आजकल महिलाऐं इसलिये समानता, आधुनिकता, स्‍वतंत्रता आदि का शब्‍द उपयोग लिये जाने का कारण अपनी प्रकृति को नकारना है. ईश्‍वर जब पुरूष को शारीरिक रूप से महिलाओं से ज्‍यादा सक्षम बनाया है तो इसे स्‍वीकार किया जाना चाहिये. न तो महिलाओं को शारीरिक कमी को पुरूषों के समकक्ष लाने का कारण बनना चाहिये और न ही पुरूषों को अपनी मजबूती का फायदा उठाना चाहिये.

    यह तो सत्‍य है कि महिलाओं में जीवतंता, धैर्य आदि गुण होते है तो पुरूष में सटीकता, तार्किक आदि गुण ज्‍यादा होते है. इसलिये बात वस्‍त्र ही नहीं विचार, रहन-सहन, खान-पान, कार्यक्षमता, कार्य करने के तरीके आदि बातों पर पुरूष व महिलाओं में भिन्‍नता होती है.

    लेकिन इसमें क्‍या उचित है क्‍या अनुचित यह काल, समय, भौगौलिक, सामाजिक व आर्थिक परिस्थितयों, शारीरिक अवस्‍था, समाज, देश आदि देखकर चुनाव करना चाहिये और किया भी जाता है. जो व्‍यक्ति इन से अलग जाता है जो कि सिर्फ दिखावें के लिये ज्‍यादा होता है, (क्‍योंकि आजकल हरके लीक से हटकर कुछ करना चाहता है इस चक्‍कर में वह खुद ही हट जाता है इसका ध्‍यान ही नहीं रहता है) मेरे अनुसार गलत है.

    किसी वस्‍तु या साम्रग्री का सदुपयोग किया जाये तो अच्‍छा है लेकिन यदि उसका दुरूपयोग किया जायेगा. तो यह गलत है चाकू से सब्‍जी आदि काटी जाये, प्राणी आदि तो नहीं ? वाहन यात्रा को सुगम बनाने के लिये है न कि किसी को टक्‍कर मारने या अवरोधक बनाने में. ऐसे अनेक उदाहरण दिये जा सकते है

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