बुधवार, 13 जुलाई 2011

क्या होती है आत्मा ?

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आध्यात्म, धर्म, कर्मफल, पुनर्जन्म, इहलोक-परलोक आदि आदि विषयों पर आपसी तर्क वितर्क के दौरान एक शब्द जो बार बार प्रयोग होता है वह है  ' आत्मा '....

आइये आज देखते हैं कि क्या है यह...

मोटे तौर पर देखें तो अमूमन हम लोग कई अलग अलग प्रयोजनों के लिये इसे प्रयोग करते हैं देखें यहाँ...

१- आत्मा = जीवन ,...
 यहाँ पर जीवित और मृत शरीर के बीच फर्क करने के लिये इस शब्द का प्रयोग किया जाता है यानि यदि प्राणी जीवित है तो उसके पास शरीर व आत्मा दोनों मौजूद हैं और यदि मृत है तो मात्र शरीर है... यहाँ पर आत्मा का अभिप्राय जीवित होने से है...

२- आत्मा = व्यक्ति या व्यक्तित्व,...
यहाँ पर किसी व्यक्ति को परिभाषित करने के लिये यह शब्द प्रयोग होता है... जैसे कि आप यह कह सकते हैं कि " यह ब्लॉग लेखक एक दुखी आत्मा है "... :)

३- आत्मा= किसी व्यक्ति की बुद्धि, अर्जित ज्ञान, विवेक, अनुभव, दया-करूणा-ईर्ष्या-ममता आदि भावनायें, जीवन मूल्य, जीवन लक्ष्य, धार्मिक-आध्यात्मिक विश्वास आदि आदि का निचोड़ व इस निचोड़ पर आधारित उस व्यक्ति की प्रतिक्रियायें...
यहाँ पर इस शब्द का प्रयोग कुछ इस तरह होता है... " एक झटके में लाखों कमाने का मौका था मेरे पास, पर मेरी आत्मा ने यह गवारा नहीं किया "

४- चौथा व सबसे जटिल व विवादास्पद प्रयोग है ' आत्मा ' के तौर पर किसी ऐसी चीज की कल्पना का जो यह कहें कि कथित रूप से वातावरण में मौजूद रहती हैं गर्भावस्था के दौरान शरीर में प्रवेश कर जाती हैं और मृत्यु के साथ शरीर से निकल जाती है दोबारा से जन्म, तुरंत फैसले, परमात्मा से मिलन या प्रलय के दिन होने वाले फैसले का इंतजार करने के लिये ( आपके धार्मिक विश्वासों के अनुसार )...

 मैं यहाँ पर उपरोक्त चौथे प्रयोग में वर्णित 'आत्मा' के शरीर से बाहर रहने व गर्भावस्था के दौरान बाहर से प्रवेश करने के बारे में कह रहा हूँ इसके कारण भी हैं मेरे पास... 
  • embryology  के हमारे ज्ञान के परिणाम स्वरूप हमें आज यह पता है कि गर्भधारण अण्डाणु के शुक्राण द्वारा निषेचन का परिणाम है।
  • मानव स्त्री अपने अंडाशयों में चालीस हजार से भी ज्यादा अंडाणुओं के साथ जन्म लेती है निश्चित तौर पर इतनी ' सुप्त आत्मायें ' नारी शरीर में पहले से मौजूद नहीं हो सकती।
  • रही बात पुरूष की, तो वीर्य में स्पर्म काउंट होती है अमूमन ८० से १२० मिलियन प्रति क्यूबिक मिमी०... एक मिली० में एक हजार क्यूबिक मिमी० होते हैं... और पुरूष के एक बार के वीर्यपात में मात्रा होती है तकरीबन ३ से ५ मिली०... कैलकुलेटर निकालिये और हिसाब लगाइये... निश्चित तौर पर इतने सारे शुक्राणुओं में भी ' सुप्त आत्मायें ' कपड़ों पर सूख जाने, वाशिंग मशीन में धुलने, नालियों में बह जाने या कूड़ेदान में फेंक दिये जाने मात्र के लिये मौजूद नहीं हो सकती...
उपरोक्त लिखे से यह जाहिर है कि नवजात के लिये आत्मा उसके पिता या माता के शरीर में से तो आती नहीं... अब मानने वाले यह तर्क देंगे कि वह बाहर से आती है... उसका स्वरूप कोई भी ठीक से नहीं बताता पर जो कुछ गोल मोल भाषा में बताया जाता है या पता चलता है वह है कि वह उर्जा या विचार स्वरूप सी है...

निशेचन से पहले अंडाणु या शुक्राणु भी लंबा जीवन जीने की क्षमता नहीं रखते, आदर्श परिस्थितियों में भी उनका जीवन काल कुछ ही दिनों का होता है पर दोनों के संयोग से बना भ्रूण गर्भाशय के अंदर खुद को बढ़ाने, पोषण माता से लेने व एक पूर्ण मानव शरीर में बदल जाने की क्षमता रखता है... इस क्षमता को यदि ' आत्मा ' कहा जाये तो शायद ही कोई विवाद होगा... मरने के बाद परिवेश से भोजन जल ग्रहण कर स्वयं को चलायमान-गतिमान-स्वस्थ रखने की इस क्षमता का अंत भी हो जाता है और शरीर सड़ने लग जाता है ।

परंतु विवाद तब पैदा होता है जब यह कहा जाने लगता है कि किसी व्यक्ति की बुद्धि, अर्जित ज्ञान, विवेक, अनुभव, दया-करूणा-ईर्ष्या-ममता आदि भावनायें, जीवन मूल्य, जीवन लक्ष्य, धार्मिक-आध्यात्मिक विश्वास, तथ्य और तर्कों के आधार पर निकाले उसके निष्कर्ष आदि सब बेकार हैं... वह तो किसी परमसत्ता की योजना का हिस्सा मात्र है... वह एक ऐसी आत्मा है जो अजर-अमर है... जो जीवन आज वह जी रहा है वह उसके पहले के किये का प्रतिफल है और जो इस जीवन में वह ' आत्मा' कर रही है उसके आधार पर भविष्य की उसकी यात्रा का निर्धारण होगा...

क्या यह संभव है...  बुद्धि, अर्जित ज्ञान, विवेक, अनुभव, दया-करूणा-ईर्ष्या-ममता आदि भावनायें, जीवन मूल्य, जीवन लक्ष्य, धार्मिक-आध्यात्मिक विश्वास, तथ्य और तर्कों के आधार पर निकाले उसके निष्कर्ष क्या ट्रान्सफर हो सकते हैं... वह भी कई जीवनकाल व विभिन्न प्राणि योनियों में लिये जन्मों के दौरान... मुझे इस पर यकीन नहीं...

मैं तो मानता हूँ कि गीता के श्लोक " नैनम् छिन्दन्ति शस्त्राणि, नैनम् दहति पावका ... में वर्णित आत्मा भी उपरोक्त वर्णित अजर अमर व केवल और केवल आवागमन के चक्र से पार पाने  के प्रयास में रत ' आत्मा ' न होकर ... किसी भी हाल में हार न मानने वाली शाश्वत HUMAN WILL है और यह श्लोक उसी का उत्सव है !

क्या आप मुझसे सहमत हैं ?






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चित्र साभार : गूगल इमेजेज्



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44 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय प्रवीण जी,

    विज्ञान और जीवविज्ञान की समझ तो मुझे अधिक क्या कम भी नहीं है। लेकिन एक बात तो कह ही सकता हूँ कि हम आत्मा शब्द का अर्थ अपनी मर्जी से या कुछ लोगों की सहमति से नहीं बना सकते या निर्धारित कर सकते। आत्मा का जो प्रचलित अर्थ है, वही सभी मानते रहेंगे। आत्मा कितनी ढकोसलएबाज है, देखिए। पापात्मा, दुष्टात्मा, दुरात्मा या महात्मा जैसे शब्द आए कैसे? पहले तो ये कहते हैं कि आत्मा आत्मा है। अब वह पापी, दुष्ट आदि भी हो गई। और तो और मृतात्मा भी होती है यानि मरी हुई आत्मा। अब लोग आकर यहाँ अपना काल्पनिक और झूठा भाषाज्ञान और शब्द ज्ञान झाड़ना शुरु करें, इससे पहले मैं चलता हूँ। मैंने कहा था केंचुआ को काटने पर दो आत्मा का या फिर शुक्राणुओं की बात पर आत्मा का सिद्धान्त ढह जाता है।

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  2. आदिम मनुष्य ने शरीर विज्ञान के ज्ञान के अभाव के कारण शारीरिक चेतना को ही आत्मा मान लिया जो कहीं बाहर से आती है। उनके इस प्रकार की धारणा का एक प्रमुख कारण नींद में आने वाले सपने भी रहे होंगे। जिसमें उन्हें लगता होगा की नींद में शरीर से आत्मा निकलकर विचरण करती है। न्यूरो साइंस ने चेतना की पहेली को काफी हद तर हल कर लिया है। आने वाले समय में शायद कृत्रिम चेतना भी विकसित कर ली जाए। पर निश्चित ही आत्मा जैसी कोई चीज नहीं होती।

    यह भी पढ़ें- आत्मा का अस्तित्व और इस धारणा का प्रयोजन

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  3. ये बताइये की यदि कोई ये मान ले की आत्म आती है मौत के बाद चली जाती है अगला जन्म लेती है अगले जन्म में हमारे इस जन्म के किये काम पुन्य दिलाते है बुरे काम किये तो आत्मा हमें धिक्कारेगी अगला जन्म ठीक रखने के लिए इस जन्म में अच्छे काम करना होगा आदि आदि आदि की सोच रख कोई यदि अच्छे काम करे बुरे कामो से दूर रहे तो मुझे तो इस आत्मा वाली सोच को स्वीकार कर लेने में कोई बुराई नजर नहीं आती है और यदि ऐसा नहीं होता है तो इन फजूल की बात में सोचने में समय काहे को दे |

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  4. आपकी रचना तेताला पर भी है ज़रा इधर भी नज़र घुमाइये
    http://tetalaa.blogspot.com/

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  5. आपके दृष्टांत से पूरी तरह सहमत हूँ
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    आत्मा-परमात्मा, स्वर्ग-नरक जैसी अवधारणा मेरी समझ के बाहर है, किन्तु इस अवधारणा के माध्यम से अगर समाज अच्छाईयों की तरफ उन्मुख होता है तो इसे मानने में कोई हर्ज नहीं

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  6. आदरणीय शाहजी,
    बहुत ही बढिया विषय चुना है आपने चिन्तन के लिये। शास्त्रो (आप किताबे भी कह सकते है ) मे भी कहा गया है की, " जो आत्मा को नहीं जानते वे दुःख पाते रहते है" ......................... लेकिन मुझे आतंरिक पीड़ा हुयी है की जिनको मैं अपने आदर्शों की श्रेणी में प्रतिष्ठित रखता हूँ वे ही अपने घोष-वाक्यों अपने सिद्धांतो के उपयोग सिर्फ अपनी पूर्वाग्रही मान्यता की स्थापना में करतें है .
    आपके घोष-वाक्य का अर्धांश है ---- "मैं तो 'काले' को 'काला' ही कहूँगा और 'सफेद' को 'सफेद' भी," ----------- परन्तव इस विषय में आप आस्तिकता के क्षेत्र में जिस रंग-अन्धता के शिकार है , उससे अपने आपको बचा नहीं पायें है और काले को काला सिर्फ सुनी सुनाई व्यतुत्पत्ति\अर्थ के आधार पर ही कर दिया.
    आप स्वयं बतलाइये की आपने "आत्मा" के इन तथाकथित अर्थों को आत्मसात करने के अलावा, आत्म-तत्त्व अथवा आत्मा के विषय में कितनी गहराई से अध्यन किया ????

    अगर इन अर्थों के अलावा आपने दूसरे किसी भी प्रकार का परिश्रम नहीं किया है तो , आप महामना को मैं निवेदित करने की ध्रष्टता करता हूँ की आप --- 'काले' को 'काला' और 'सफेद' को 'सफेद' ---
    सिर्फ अपने मन की कायरता के कारण ही कहतें है, कायर और आलसी जीव ही मात्र अपने निर्वाह\पोषण के अतिरिक्त अन्य कोई उद्योग करने से डरतें है.
    यदि आप वाकई में अपने सिद्धान्तों के प्रति प्रतिबद्ध होते तो इस आत्मतत्व की गहन जाँच-पड़ताल के बाद ही अपना निष्कर्ष व्यक्त करतें ना की मात्र प्रचलित हलके स्तर की वैचारिक धारणा\शब्दावलियों को अपने मत की पुष्ठी में प्रयुक्त करते.

    आपके इस रूप ने मुझे घोर निराश किया है, ब्लोगिंग में आने के बाद अगर किसी ने मुझे सर्वाधिक पीड़ित किया है तो वह आज आपने किया है ............. मैंने तथ्य परिक्षण में आपको अपना आदर्श माना था ...................

    क्षोभ सहित
    अमित शर्मा

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  7. प्रवीण जी - पहली बार आपके ब्लॉग पर आई हूँ आज | ऊपर लिखा वाक्य "मैं तो 'काले' को 'काला' ही कहूँगा और 'सफेद' को 'सफेद' भी, आप की मर्जी आप मुझे जो कुछ भी कहो .... . ." बड़ा अच्छा लगा | लेकिन ग्रे भी होता है ना इन दोनों के अलावा - उसे अप काला कहेंगे , या सफेद , या नकार देंगे कि "ग्रे" कुछ है ही नहीं ??

    रही बात आत्मा की - तो जो मानते हैं वे मानते रहेंगे और जो नहीं मानते - वे नहीं मानेंगे - ऊपर चन्दन जी की टिप्पणी भी है - उनसे भी मेरी बातचीत हुई थी इस बारे में | चन्दन जी - दुष्टात्मा आदि बनाये गए विशेशणात्मक संज्ञा रूप भर हैं - कि यह एक दुष्ट व्यक्ति है | आत्मा से इसका कोई लेना देना नहीं |

    अब मैं सिर्फ इतना कहना चाहती हूँ कि दोनों ही ओर तर्क अनेकानेक हैं - तो इस चर्चा का कोई निष्कर्ष निकलता तो मुझे दिखता नहीं :) - मैं मानती हूँ -आप नहीं मानते - तो क्या हुआ ? यही डाईवर्सिटी हे तो दुनिया को खूबसूरत बनाती है ना ?

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  8. प्रवीण जी के ब्लाग प आ…आ…आ…आआआआआ…आक्रमण!

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  9. पूरी तरह से सहमत।
    मगर क्या यह सत्य है |

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  10. आत्मा और उसकी चेतना को असिद्ध करने की जिम्मेदारी तो विज्ञान पर है।

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  11. आत्मजा कौन होती हैं ?? क्या आत्मा से उसका कोई सम्बन्ध होता है

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  12. क्‍या कमाल का शब्‍द है, छेड़ा नहीं कि बहस चालू.

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  13. प्रवीण जी विवादास्पद मुद्दों को उठाकर झरोखे बैठ मुजरा लेते हैं ...
    मुझे उन ब्लागात्माओं की पडी है जो हुतात्मायें हैं -मेरे इतना कहने मात्र से वे समझ गयीं होंगी -आत्माएं !
    पुरुष पुल्लिंग है आत्मा स्त्रीलिंग है ...है न ?
    पहले तो मैंने समझा आप एग्रीकल्चर टेक्नीकल मैनेजमेंट एजेंसी (आत्मा ) के बारे में पोस्ट लाये हैं ..
    चलिए अब अगली पोस्ट परमात्मा पर लायें !

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    1. शब्दों का अच्छा चयन। बहुत अच्छा, मन पुलकित हो गया।

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  14. इस आर्टिकिल को जो समझ और आत्मसात कर ले वह आत्मा के साथ परमात्मा और मानव मष्तिष्क की चिंतन की विराटता से परिचित हो जायेगा !
    http://en.wikipedia.org/wiki/Solipsism

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    @ सभी टिप्पणीकार पाठक गण,

    आप में से जो मेरे आलेख की मूलभावना से सहमत हैं उनका आभार...

    @ प्रिय मित्र अमित शर्मा जी,

    आपका क्षोभ व्यक्त करना भी मुझे यह जताता है कि आप मुझे अपना ही मानते हैं... यकीन जानिये कि बहुत ही सुखद व आश्वस्तिपूर्ण है यह उद्घाटन मेरे लिये...

    @ आप स्वयं बतलाइये की आपने "आत्मा" के इन तथाकथित अर्थों को आत्मसात करने के अलावा, आत्म-तत्त्व अथवा आत्मा के विषय में कितनी गहराई से अध्यन किया ????
    अगर इन अर्थों के अलावा आपने दूसरे किसी भी प्रकार का परिश्रम नहीं किया है तो , आप महामना को मैं निवेदित करने की ध्रष्टता करता हूँ की आप --- 'काले' को 'काला' और 'सफेद' को 'सफेद' ---
    सिर्फ अपने मन की कायरता के कारण ही कहतें है, कायर और आलसी जीव ही मात्र अपने निर्वाह\पोषण के अतिरिक्त अन्य कोई उद्योग करने से डरतें है.
    यदि आप वाकई में अपने सिद्धान्तों के प्रति प्रतिबद्ध होते तो इस आत्मतत्व की गहन जाँच-पड़ताल के बाद ही अपना निष्कर्ष व्यक्त करतें ना की मात्र प्रचलित हलके स्तर की वैचारिक धारणा\शब्दावलियों को अपने मत की पुष्ठी में प्रयुक्त करते.


    प्रिय मित्र,

    जिसे आप " मात्र प्रचलित हलके स्तर की वैचारिक धारणा\शब्दावलियों " कह रहे हैं, उस सरल शब्दावली पर मुझे गर्व है, जटिल विषयों को जटिल भाषा व शब्दावली में लिखा या बताया जा सकता है परंतु उन विषयों पर सरल शब्दों के प्रयोग से कुछ कहना काफी अतिरिक्त प्रयास की माँग करता है...

    आप जब कहते हैं कि " आप आस्तिकता के क्षेत्र में जिस रंग-अन्धता के शिकार है ,"... तो आप अपनी इस स्थापना के समर्थन में कोई तथ्य नहीं देते... मैं किसी भी रंगीन चश्मे से दुनिया को देखने का समर्थक नहीं हूँ... जैसी दिखती है मुझे वैसा ही लिख देता हूँ...

    मुझे आत्मतत्व व आत्मा को आत्मसात कर, गहरे अध्ययन के परिणाम स्वरूप ' आत्मा ' को परिभाषित करते, समझाते आपके विचारों का इंतजार रहेगा...

    यह पोस्टें लिखने का साफ-सीधा कारण है कि मैं सत्य को जानना चाह रहा हूँ... समय की कमी से कुछ कम लिख पाता हूँ, पर मैं आलसी नहीं...

    आपके अनवरत स्नेह का आकाक्षी...



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  16. मनो विज्ञान में सबसे पहली परिभाषा मनो -विज्ञान की यह आई -मनो विज्ञान आत्माओं का विज्ञान है .वही मनो -विज्ञान अब आत्मा के नाम से नाक भोंह चढ़ाता हुआ कहता है -आत्मा है यदि है तो लाओ उसे प्रयोगशाला में .कहाँ है उसका प्राकृत आवास .
    पश्चिमकी दृष्टि एम्ब्रियो और फीटस में भेद करती है .ह्यूमेन -एग और स्पर-मेटा -ज़ूआ (स्पर्म या शुक्राणु )के परस्पर मिलन से निषेचित एग विभाजन की किस हद पर आकर जीव कहलाने लगता है इस बारे में पूरब और पश्चिम की दृष्टि में फर्क है .पूरब तो कहता है आत्मा निषेचन के बाद फ़ौरन प्रवेश ले लेती है इससे आगे निकल के यह भी जो जड़ में है वही चेतन में भी है .एक तत्व की ही प्राधानता कहो इसे जड़ या चेतन .वैसे प्रवीण जी की बात तर्क के स्तर पर गलत नहीं है .जो फलता फूलता विकसता है वही जीव है .जीवन है .जीव तत्व से ही जीवन है .

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    @ शिल्पी मेहता,

    "मैं मानती हूँ -आप नहीं मानते - तो क्या हुआ ? यही डाईवर्सिटी हे तो दुनिया को खूबसूरत बनाती है ना ?"

    हाँ, यही डायवर्सिटी दुनिया को खूबसूरत बनाती है, बहुत खूब कहा आपने !


    @ आदरणीय अरविन्द मिश्र जी,

    देव,

    आपके दिये लिंक का अध्ययन कर रहा हूँ, हो सकता है कुछ पोस्टें निकल आयें इस से ... :)

    @ "पुरुष पुल्लिंग है आत्मा स्त्रीलिंग है ...है न ? "

    अब फंसायेंगे क्या मुझे भी ?... वैसे ही बहुत्ते कन्फ्यूजन है...



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    @ आत्मजा कौन होती हैं ?? क्या आत्मा से उसका कोई सम्बन्ध होता है

    रचना जी,

    महज दो लाइनों मे बहुत-बहुत गहरी बात कह दी आपने...आत्मजा = पुत्री, Daughter ... इस अर्थ में 'आत्मा' शब्द के प्रयोग पर शायद ही कोई विवाद हो... देखा जाये तो हम हैं क्या... लाखों सालों से अनवरत चल रही अपने माता पिता की आनुवांशिक श्रंखलाबद्ध वंशबेल का नवीनतम हरा पत्ता मात्र... वह पत्ता जो उस वंशबेल को जीवित रखता है, पोषित करता है व आगे आने वाले हरे पत्तों के लिये आधार तैयार करता है... अपने रंग-रूप-अकल-शकल-व्यवहार-सनक-पसंद-नापसंद में हम कितने मिलते हैं अपने माता-पिता से... मेरी नौ महीने की बच्ची नाराज होने पर हूबहू मेरे जैसा ही चेहरा बनाती है, यह किसी ने नहीं सिखाया उसे... वह है ही मेरी व पत्नी की 'आत्मा से जन्मी' हमारी 'आत्मजा'... हम दोनों की आनुवांशिक श्रंखला का नवीनतम संस्करण... निश्चित तौर पर 'आत्मा' का यह स्वरूप-यह परिभाषा स्वीकार्य भी है व समझ भी आती है मुझे...

    आभार आपका इस कोण को दिखाने के लिये !



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  19. सबसे पहले तो जो आत्मा के नाम पर शब्दों की जुगाली की गई है उसे साफ-साफ कर दें

    १- आत्मा = जीवन,यहाँ पर आत्मा का अभिप्राय जीवित होने से है...

    यह वही चौथे नम्बर वाली ही आत्मा है, जिसके शरीर में होने का अभिप्राय जीवन है, जीवित होना है।

    २- आत्मा = व्यक्ति या व्यक्तित्व," यह ब्लॉग लेखक एक दुखी आत्मा है"

    हां यह भी उसी आत्मा को लक्ष करके कहा जाता है। भाग्याहीन आत्मा धारी व्यक्ति या व्यक्तित्व को दुखी आत्मा कहा ही जाता है। आशय उसी आत्मा से होता है।

    ३- आत्मा= किसी व्यक्ति की बुद्धि," एक झटके में लाखों कमाने का मौका था मेरे पास, पर मेरी आत्मा ने यह गवारा नहीं किया "

    यह भी वही आत्मा है, स्वस्फूर्त जागती है और अनाचार से इन्कार करती है उसपर छाए आवरण के कारण कभी उसकी आवाज सुनी जाती है और कभी अनसुनी कर दी जाती है।

    ४-…यह वही अजर अमर अविनाशी आत्मा होती है जो शरीर के लिए प्राण धारण करती है। शरीर का क्षय होता है उस शरीर को तज देती है।

    अमित जी ने इसी शब्द क्रिडा को इन शब्दों में व्यक्त किया-"ना कि मात्र प्रचलित हलके स्तर की वैचारिक धारणा\शब्दावलियों को अपने मत की पुष्ठी में प्रयुक्त करते."

    आत्मा के न होने की कमसे कम आपकी भ्रांति तो मैं तोड़ना भी नहीं चाहता। कितना आश्चर्य है कि अपने अस्तित्व का संशय भी आत्मा स्वयं कर रही है। ज्ञानी कहते है जब आत्मा अपने ही बारे में प्रश्न उपस्थित करती है वह स्वयं को समझने का पहला प्रयास होता है।

    स्वयं के लिए 'मै' उदघोष कौन करता है? मैं कहने वाला क्या शरीर है? या शरीर से भिन्न कोई और? इसी मैं के अभिप्राय में भी आत्म शब्द प्रयुक्त होता है। मेरी-कथा = आत्मकथा। मेरा मनोमंथन = आत्ममंथन। मेरा पुत्र = आत्मज। मेरी पुत्री = आत्मजा आदि आदि

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  20. वीरुभाई,

    मनोविज्ञान का जन्म दर्शन से हुआ था जहाँ वास्तविक जीवन को छोड़कर बस अदृश्य का ही अध्ययन किया जाता था। अभी बिजली की समस्या है। बाद में आता हूँ।

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    @ आदरणीय सुज्ञ जी,

    चार अलग अलग तरीके से आत्मा शब्द का प्रयोग जो मैंने बताया है उसे जानने के लिये पोस्ट में ही दिया शब्दकोश लिंक खोलें... आत्मा= Soul और Soul माने :-

    प्रेतात्मा (m)
    बुद्धि (f)
    मन (m)
    व्यक्ति (m)
    हृदय (m)
    आत्मा (f)
    जीव (m)
    जीवन (m)
    प्राण (m)

    उपरोक्त नौ अर्थ दिये गये हैं वहाँ पर... मैं फिर कहूँगा कि मेरे द्वारा दिये गये चारों उदाहरण Self Explanatory हैं... आपका शाब्दिक जुगाली कहने का मैं विरोध करता हूँ...

    @ " स्वयं के लिए 'मैं' उदघोष कौन करता है? मैं कहने वाला क्या शरीर है ? या शरीर से भिन्न कोई और ? "

    स्वयं के लिये 'मैं' का उद्घोष मानव का ध्वनि उत्पादक तंत्र करता है ध्वनि के जरिये, हाथ करते हैं कागज पर कलम के जरिये या की बोर्ड पर टाइप करके, भाव भंगिमायें करती हैं इशारे की भाषा में... यह उद्घोष करने का आदेश मानव का मस्तिष्क इन अंगों को देता है... मस्तिष्क, ध्वनि तंत्र, हाथ, चेहरा व तंत्रिकायें भी, शरीर के ही हिस्से हैं, सभी अंग-अवयव मिलकर ही समग्र शरीर-व्यक्तित्व बनाते हैं... 'शरीर से भिन्न कोई और' क्या और कहाँ है यहाँ पर...


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  22. प्रिय सज्जन सिंह के ब्लॉग पर प्रस्तुत आलेख जस का तस यहाँ उतारे दे रहा हूँ... इसमें सोचने के लिये बहुत कुछ है यदि चाहें तो...

    आत्मा का अस्तित्व और इस धारणा का प्रयोजन


    लेखक- यशपाल

    भगवान के अस्तित्व की तरह आत्मा का अस्तित्व भी विज्ञान या तर्क द्वारा प्रमाणित नहीं है यह केवल विश्वास की वस्तु है । भगवान से किसी आत्मा के साक्षात्कार का कोई निर्विवाद भौतिक प्रमाण सर्व-साधारण नहीं पा सकते। अधिकांश सम्प्रदाय मनुष्य के भगवान से साक्षात्कार का समय मृत्यु के बाद निश्चित करते हैं। मृत्यु के बाद मनुष्य की आत्मा भगवान से साक्षात्कार कर पती है या नहीं, इसकी कोई प्रामाणिक खोज नहीं की जा सकती। जीवों के भौतिक शरीर से भिन्न किसी 'चेतन' और 'अमर' वस्तु का विश्वास किसी भौतिक अनुभव और परखे जा सकने वाले तर्क की कसौटी पर खरा नहीं उतरता।
    आत्मा के अस्तित्व में विश्वास करने वाले सभी लोगों की आत्मा के सम्बन्ध में धारणाएँ एक सी नहीं हैं । आत्मवादी लोग, आत्मा की एक-दूसरे से भिन्न परिभाषाएँ बताते हैं । आत्मा के सम्बन्ध में इस मतभेद का कारण यह है कि आत्मा भौतिक जगत के जाने और परखे जा सकने वाले पदार्थों की तरह परीक्षित या परीक्षा के योग्य वस्तु नहीं है । वह कल्पना की ही वस्तु है इसलिए आत्मा के सम्बन्ध में परिस्थितियों के अनुसार धारणाएँ बना ली जती रही है ।
    कुछ आत्मवादी, उदाहरणतः अद्वैतवादी आत्मा को ईश्वर का ही अंश बताते हैं। इस परिभाषा के अनुसार आत्मा के भी वही गुण होंगे जो ईश्वर के हैं अर्थात् आत्मा भी अजर, अमर और सदा एक रूप, रस रहने वाला और ज्ञान स्वरूप माना जायेगा। कुछ आत्मवादी लोग आत्मा का अस्तित्व ईश्वर से पृथक मानते हैं। यह लोग आत्मा को अजर, अमर तो मानते हैं परन्तु ईश्वर के समान पूर्ण ज्ञान स्वरूप नहीं मानते। कुछ आत्मवादी आत्मा को 'अणु' मानते हैं और दूसरे 'विभु' कहते हैं। आत्मा को अणु बताने वाले लोग संसार के सब जीवों में पृथक-पृथक आत्मा होने का विश्वास करते हैं। आत्मा को विभु मानने वाले आत्मवादियों का विश्वास है कि संसार भर के जीवों में एक ही आत्मा व्याप्त है।
    आत्मा के सम्बन्ध में इन विभिन्न धारणाओं में से कौनसी धारणा ठीक है, इस सम्बन्ध में भौतिक ज्ञान की अथवा सर्व-साधारण मनुष्यों के अनुभव से परखे जा सकने वाले तर्क की कोई कसौटी नहीं है। आत्मा के अस्तित्व के सम्बन्ध में प्रमाण और तर्क केवल ज्ञानी समझे जाने वाले व्यक्तियों की कही हुई बातें ही हैं। आत्मा के सम्बन्ध में उपरोक्त धारणाओं या विश्वासों में से यदि कोई सत्य है तो केवल एक ही सत्य हो सकती है। एक ही धारणा को सत्य मानने पर अन्य धारणाओं को अवश्य गलत मानना होगा। अर्थात् आत्मा सम्बन्धी प्रत्येक धारणा के ठीक होने की जितनी सम्भावना है उससे दुगनी सम्भावना उसके गलत होने की है।

    जारी...

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  23. आगे पढ़िये...
    बिना किसी भौतिक प्रमाण के केवल विश्वास के आधार पर ईश्वर और आत्मा का अस्तित्व स्वीकार कर लेने से तर्क का तरीका इस प्रकार होता है- ईसाईयत में विश्वास रखने वाले सर्व-साधारण लोग जब अपने सांसारिक अनुभव से सन्देह करते हैं कि पुरुष के संग के बिना कुमारी के गर्भ से मसीह का जन्म कैसे हो सकता था तो पादरियों का एक ही 'अकाट्य' उत्तर होता है- "तुम भगवान में विश्वास करते हो?"
    अनिवार्य उत्तर मिलता है- "अवश्य ।"
    "मानते हो भगवान सर्वशक्तिमान है?"
    "अवश्य"
    "भगवान सर्वशक्तिमान है तो उसकी इच्छा से कुमारी के गर्भ में भी सन्तान उत्पन्न हो सकती है।" यह उत्तर पा कर भगवान की सर्वशक्तिमत्ता में विश्वास रखने वाले लोगों का समाधान हो जाता है परन्तु इस समाधान का आधार पहले भौतिक प्रमाण और तर्क के बिना भगवान के अस्तित्व में विश्वास कर लेना है। एक मिथ्या विश्वास दूसरे मिथ्या विश्वास का आधार बनता चला जाता है।
    आत्मा के अस्तित्व में विश्वास करने वाले लोगों का कहना है कि मनुष्य की चेतना और उसके सम्पूर्ण ज्ञान का स्त्रोत उसकी आत्मा ही है। उनका तर्क है- जीवों का शरीर जड़ प्रकृति से बना है। जड़ प्रकृति में चेतना नहीं होती इसलिए आत्मा के अभाव में जीवों को अचेतन ही रहना चाहिए था। जीवों की चेतना ही स्वयं आत्मा के अस्तित्व का प्रमाण हैं।
    जीवों में चेतना का होना निर्विवाद भौतिक सत्य और अनुभव है परन्तु जीवों की चेतना का स्त्रोत या कारण आत्मा है इस बात के लिए कोई भौतिक प्रमाण या संगत तर्क हमें नहीं मिलता।
    यदि मनुष्य की चेतना और ज्ञान किसी स्वयं चेतन और अजर-अमर आत्मा का परिणाम है, यदि आत्मा ईश्वर का अंश होने के कारण सब जीवों में समान है, यदि जीवों की आत्मा सांसारिक और भौतिक प्रभावों से स्वतन्त्र है तो मनुष्य को सदा से ही उतना ज्ञानी होना चाहिए था जैसा कि वह आज के समाज में है। सभी जीवों और मनुष्यों की आत्मा एक ही ईश्वर का अंश होने के कारण सभी जीवों और मनुष्यों को समान रूप से सचेत होना चाहिए परन्तु ऐसा नहीं है। मनुष्यों अथवा जीवों के जीवन और चेतना में हम भौतिक प्रभावों से भिन्न किसी स्वतन्त्र अभौतिक शक्ति के अस्तित्व या 'अमर' और 'चेतन' ज्ञान के स्त्रोत आत्मा का प्रमाण नहीं पाते।
    अनेक जीवों और मनुष्यों में चेतन के भिन्न-भिन्न स्तर दिखाई देते हैं। अनेक मनुष्य समाजों की परस्पर तुलना करने पर और एक समाज के व्यक्तियों की परस्पर तुलना करने पर भी चेतना के अनेक स्तर दिखाई देते हैं। मनुष्यों और जीवों की चेतना के यह स्तर उनकी भौतिक परिस्थितियों से उनके शरीर, मस्तिष्क और स्नायुओं के विकास से निश्चित होते हैं। जीवों और मनुष्यों की चेतना का इतिहास विकास और परिवर्तन की परम्परा का साक्षी है, एक रूप रस रहने वाले, पूर्ण ज्ञान स्वरूप ईश्वर के अंश आत्मा के अस्तित्व का साक्षी नहीं है। हम अपने देश की अनेक आदिवासी जातियों में पीढ़ी-दो पीढ़ी में ही चेतना का अदभुत् विकास देखते हैं। जिन देशों या समाजों में चेतना के विकास में सहायता देने वाली भौतिक परिस्थितियाँ पैदा नहीं होतीं, वहाँ मनुष्यों की चेतना में किसी, अभौतिक, पूर्ण ज्ञान स्वरूप, एक मात्र चेतन, अपरिवर्तनशील ईश्वर के अंश आत्मा से चेतना पाने का कोई प्रमाण नहीं मिलता।

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  24. आगे पढ़िये...

    यह धारणा कि प्रकृति से उत्पन्न शरीर में ईश्वर या आत्मा के अस्तित्व के बिना स्वयं चेतना नहीं हो सकती, भौतिक ज्ञान की कमी है। जीवों की उत्पत्ति और जीवों में चेतना के विकास का इतिहास हमारे सामने है। सृष्टि के इतिहास और जीव विज्ञान के अध्ययन से हम जड़ समझी जाने वाली प्रकृति से जीव की उत्पत्ति और जीवों में चेतना के विकास के क्रम को भी समझ सकते हैं।
    अपने अज्ञान से प्रकृति को जड़ मान लेना भूल है। जड़ जान पड़ने वाली प्रकृति के अणुओं और परमाणुओं में गति विधमान है। गति भौतिक प्रकृति का अंग और गुण है। प्रकृति में सदा विधमान गति ही भौतिक और रासायनिक प्रक्रियाओं से जीव का रूप ले लेती है। अपने शरीर में प्रकृति से अंश ग्रहण करके अपने अस्तित्व या शरीर को बढ़ाना, शरीर पुष्ट हो जाने पर प्रजनन द्वारा अपनी जाति को बढ़ाना ही जीव का गुण और पहचान है।
    जब जीव प्रयोजन से गति या क्रिया करने लगता है तो उसे हम चेतना कहते हैं। जीवों के मस्तिष्क की गति या क्रिया ही उनकी चेतना है। मस्तिष्क के भौतिक विकास और शक्ति पर ही चेतना का विकास निर्भर करता है। सजीव शरीर के अभाव में चेतना की संभावना नहीं हो सकती। सृष्टि में जीवों की उत्पत्ति और विनाश प्राकृतिक भौतिक जगत से भिन्न किसी दूसरी शक्ति के कारण नहीं होता। जीवों और मनुष्यों की चेतना का विकास क्रम उनकी भौतिक परिस्थितियों द्वारा हुए परिवर्तनों की परम्परा में देखा जा सकता है। जीवों में अपरिवर्तनशील, स्वतः पूर्ण चेतना के अस्तित्व का कोई प्रमाण नहीं।

    सृष्टि और मनुष्य शाश्वत नहीं परिवर्तनशील
    मनुष्य के शरीर से भिन्न आत्मा के विश्वास का आधार मनुष्य के जन्म और मृत्यु से पूर्व और पश्चात् भी जीवन की कल्पना जोड़ने का प्रयत्न है।
    यधपि ईश्वर का अस्तित्व हमारे मन, वाणी और ज्ञान से परे बतलाया जाता है परन्तु ईश्वरवादी हमें यह भी समझाते हैं कि हमारा जीवन और यह संसार भी ईश्वर के अस्तित्व का प्रमाण है। हम ईश्वर के सूक्ष्म, रूप रहित अस्तित्व को नहीं देख सकते परन्तु उसके बनाये स्थूल जगत को देखते हैं। इतने बड़े संसार को देख कर इसे बनाने वाले की शक्ति और सामर्थ्य का अनुमान किया जाना चाहिए। यह संसार है तो इसे बनाने वाला भी कोई होगा। बनाने वाले के बिना कोई वस्तु बन नहीं सकती परन्तु ऐसा तर्क भगवान के सम्बन्ध में भी लागू हो सकता है। यदि भगवान कोई वस्तु या शक्ति है तो उसे किसने बनाया है?
    भगवान के सम्बन्ध में बाताया जाता है कि वह 'स्वयम्भू' अर्थात् स्वयं ही पैदा हो जाने वाली शक्ति है। भगवान या किसी भी शक्ति या वस्तु को स्वयं मान लेना इस तर्क के विरूद्ध है कि प्रत्येक वस्तु को बनाने वाली कोई दूसरी शक्ति या वस्तु होनी चाहिए। हमें कोई एक ऐसी चीज, उसे चाहे जो नाम दिया जाये, माननी पड़ेगी जिसे बनाने वाले की कल्पना हम नहीं कर सकेंगे। जब किसी एक ऐसी चीज की कल्पना करना आवश्यक है जिसे किसी ने नहीं बनाया, जो स्वयं उत्पन्न हुआ क्यों न मान लें? हम एक ऐसी अज्ञात चीज की कल्पना क्यों करें जिसे हम देख, सुन, समझ नहीं सकते।

    जारी है अभी...

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  25. और पढ़िये...

    इस सृष्टि का अस्तित्व अज्ञात काल से चला आ रहा है। विज्ञान इसमें होने वाले कुछ परिवर्तनों के समय की गणना कर सकता है। मनुष्य इन परिवर्तनों के क्रम का भरोसे योग्य ज्ञान पा चुका है और उन्हें जानता जा रहा है। यह एक विचित्र बात है कि जिन चीजों के अस्तित्व को हम देख-सुन और परख सकते हैं, उन पर भरोसा न करें, उन्हें भ्रम और माया समझें और जिसे अपने मन और वाणी से परे मानते हैं, उनकी बेसिर पैर की कल्पना करते जायें।
    इस सृष्टि, सृष्टि के जीवों और मनुष्यों का वैज्ञानिक इतिहास हमें किस परिणाम और अनुमान पर पहुँचाता है? इस सृष्टि के जीवों का इतिहास बताता है कि सृष्टि और जीवों को हम जिस रूप में आज देखते हैं, वे सदा इस रूप में नहीं थे अर्थात् इन्हें ऐसा ही नहीं बनाया गया। वर्तमान सृष्टि और मनुष्यों के दिखाई देने वाले रूप असंख्य परिवर्तनों से होकर इस अवस्था में पहुँचे हैं। विज्ञान इस बात की खोज करके विश्वस्त रूप से इस परिणाम पर पहुँचा है कि न तो यह पृथ्वी ही पहले ऐसी थी और न पृथ्वी और सूर्य-चन्द्र के सम्बन्ध ही सदा ऐसे थे। पृथ्वी के अनेक भाग जो आज पहाड़ हैं, किसी समय समुद्र के अंश थे। हिमालय और दूसरे पहाड़ों पर जल-जन्तुओं के शरीरों की ठठरियाँ मिलना इस बात का प्रमाण है कि वह स्थान किसी समय गहरा समुद्र था। इस पृथ्वी पर जीवों और मनुष्य का जैसा अस्तित्व आज दिखाई दे रहा है उसे किसी ने ऐसा ही नहीं बना दिया न वह सदा से है। मनुष्य की वर्तमान अवस्था परिवर्तनों के एक क्रम का परिणाम है।
    यह भी नहीं कहा जा सकता कि सृष्टि, जीवों और मनुष्यों का इतिहास, किसी पूर्ण चेतन, ज्ञानस्वरूप, कभी भूल-चूक न करने वाली शक्ति की योजना का परिणाम है क्योंकि यह क्रम निरन्तर विकास का ही नहीं रहा है। इस क्रम में हृास और विकास दोनों के प्रमाण मिलते हैं। जीव-विज्ञान की खोज से इस बात के अकाट्य प्रमाण मिलते हैं कि एक समय पृथ्वी पर जीवों की हजारों ऐसी जातियाँ थीं जो आज लोप हो चुकी हैं। आज उनके लाखों वर्ष पुराने ठठ्ठर ही मिलते हैं। इनमें से 'टिसेराटेप' 'डिनोसेशस' 'टिटानोयेरियम' के ठठ्ठर अजायब घरों में देखे जा सकते हैं परन्तु आज यह जीवित अवस्था में कहीं नहीं है। आज वे इस पृथ्वी पर इसलिए नहीं हैं क्योंकि पृथ्वी की अवस्था में परिवर्तनों के कारण उनके जीवन निर्वाह योग्य परिस्थितियाँ नहीं रही हैं। जीव विज्ञान बताता है कि गेंड़ा, व्हेल मछली और बब्बर शेर भी शनैः शनैः पृथ्वी से मिटते जा रहे हैं क्योंकि पृथ्वी पर उनके बढ़ने लायक परिस्थितियाँ समाप्त होती जा रही हैं। सृष्टि में होने वाले इन परिवर्तनों के पीछे किसी पूर्व चेतन और ज्ञानस्वरूप उद्देश्यमय शक्ति का प्रयोजन नहीं जान पड़ता, उसमें प्रयोजन और उद्देश्य की श्रृंखला कहीं दिखाई नहीं पड़ती। सृष्टि के इतिहास में केवल यही नियम शाश्वत और निरन्तर रूप से दिखाई देता है कि जीवों में परिस्थितियों के अनुसार जीवित रह सकने के प्रयत्न में शारीरिक विकास और परिवर्तन होता रहता है। उसके भौतिक और शारीरिक विकास का ही अंग उनकी चेतना भी है।

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  26. अंतिम भाग...

    मनुष्य के विकास का इतिहास किसी अनादि, अनन्त, पूर्ण ज्ञानस्वरूप और सोद्देश्यमय शक्ति द्वारा मनुष्य के बनाये जाने के विश्वास में शंका पैदा कर देता है। सृष्टि के इतिहास के अनुसार मनुष्य के पूर्वज-जीव करोड़ों वर्ष तक मनुष्य के रूप में नहीं थे। मनुष्य के पूर्वज-जीवों की उस अवस्था में उनके मस्तिष्क या चेतना का ही उतना विकास नहीं हुआ था कि वे ईश्वर की कल्पना और अपने जीवन का उद्देश्य ईश्वर से साक्षात्कार करने की कल्पना कर सकते। यदि लाखों वर्ष पूर्व के इतिहास को छोड़ कर वर्तमान संसार के भिन्न-भिन्न भागों में पाये जाने वाले मनुष्य-समाजों के ज्ञान और चेतना की परस्पर तुलना करें तो विस्मय होगा और उन्हें एक ही भगवान की रचना मान लेने पर उस भगवान को न तो हम न्यायकारी, दयालु और न ज्ञान-स्वरूप ही मान सकेंगे।
    यदि मनुष्य भगवान का ही अंश है, उसी का बनाया खिलौना है, मनुष्य भगवान से ही ज्ञान पाता है तो मनुष्य के लाखों वर्ष तक अज्ञान की अवस्था में रह कर सृष्टि की शक्तियों से दुख पाते रहने और नष्ट होते रहने का उत्तरदायित्व किस शक्ति पर है? मनुष्य-जीवन का उद्देश्य निश्चित करते समय मनुष्य के सामर्थ्य को भी ध्यान में रखना उचित है। जिस समय मनुष्य की चेतना और सामर्थ्य हमारे वर्तमान समाज के मनुष्यों जैसी नहीं थी, उनके जीवन का उद्देश्य भी हमारी कल्पना के अनुसार नहीं हो सकता था इसलिए गाँधीवाद द्वारा बताये गये मनुष्य जीवन के उद्देश्य को मनुष्य-जीवन का सदा से चला आया उद्देश्य नहीं माना जा सकता। यह उद्देश्य गाँधीवाद द्वारा अपनी श्रेणी के अधिकारों की रक्षा और सर्व-साधारण को भटकाने के लिये ही सुझाया गया है।
    सृष्टि के इतिहास की वैज्ञानिक खोज और जाँच से हम इस परिणाम पर पहुँचते हैं कि जीवों के जीवित रह सकने के संघर्ष से ही मनुष्य विकास द्वारा अपनी आधुनिक अवस्था तक पहुँच गया है। मनुष्यों ने अपने विकास तथा ज्ञान के अनुसार समय-समय पर भगवान के रूपों और आदेशों को स्वयं निश्चित किया है। यह सिद्धान्त कि आदि, अनन्त, पूर्ण चेतन और ज्ञान स्वरूप भगवान ने किसी विशेष उद्देश्य और प्रयोजन से अर्थात् स्वयं उससे साक्षात्कार करने के लिये ही मनुष्य को बनाया है, सृष्टि के इतिहास की वास्तविकता को ठीक उल्टे रूप में पेश करना है। यह गढ़न्त उन चतुर लोगों की है जो स्वयं ईश्वर की प्रेरणा और न्याय के कारिन्दे बनकर, सर्वसाधारण को भगवान के नाम पर अपने शासन में बाँध कर, अपने स्वार्थ की सिद्धि का साधन बनाते रहे हैं और भविष्य में भी बनाये रखना चाहते हैं। (पुस्तकः 'यशपाल रचनावली' से साभार)

    साभार सज्जन सिंह जी जिनके ब्लॉग 'संशयवादी विचारक' पर यह आलेख 'आत्मा का अस्तित्व और इस धारणा का प्रयोजन' यहाँ पर है।

    ...

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  27. आत्मा क्या हैं , हैं या नहीं हैं इस मुद्दे पर बहस हमेशा "आस्था " से हट कर ही होनी चाहिये .
    आत्मा को अजर अमर इस लिये ही शायद माना जाता हैं क्युकी वो पीढ़ी दर पीढ़ी अपने एक ही स्वरुप में रहती हैं जिसे विज्ञान डी ऍन ऐ कह कर भी परिभाषित कर देता हैं .
    विज्ञान और आध्यात्म शायद एक ही सिक्के के दो पहलु हैं .
    शायद हेड और टेल भी एक दूसरे के पूरक ही हैं


    आप का दूसरा जनम हैं आप की आत्मजा में . आप के बुरे कर्म यानी क्रोध को आप अपनी आँख से देख रहे हैं . आप के अच्छे कर्म भी दिख ही रहे होगे . कर्म की परिभाषा बहुत विस्तृत हैं और दूसरे जनम की भी . हर नयी पीढ़ी पुरानी पीढ़ी का नया जनम हैं तो हर नयी पीढ़ी का पिछला जनम उसकी पुरानी पीढ़ी हैं पुनह शायद

    आत्मा अजर अमर इसीलिये हैं क्युकी उसका स्वरुप वैसा ही रहता हैं
    अब आप डॉ मिश्र को ही ले इनके कर्म में हर न्यूट्रल शब्द का पुल्लिंग स्त्रीलिंग बनाना निहित हैं फिर चाहे वो ब्लोगर हो या आत्मा यानी सोल . हम सब अपने कर्मो से बंधे हैं इस लिये उसको बदलना हमारे हाथ में नहीं होता हैं विज्ञान की दृष्टि से कहे तो जेनिटिक डिफेक्ट हैं या प्रॉब्लम और जींस की समस्या का सुधार विज्ञान में नहीं आध्यत्म में जरुर होता हैं .

    आत्म मंथन की प्रक्रिया से परमात्मा का मिलना संभव हैं

    अब आप कहेगे जिन लोगो का विवाह नहीं होता या जिनके बच्चे नहीं होते उनकी आत्मा का क्या होता हैं ऐसी आत्माए अपना चक्र पूरा कर लेती हैं और विलीन हो जाती हैं हो सकता हैं वो दुष्ट आत्माए हो जो विलीन हो जाए तो ही अच्छा हैं जैसे जिन्न को बोतल में कैद कर दिया जाता हैं या हो सकता हैं वो पुण्य आत्मा हो जो महज इस लिये विलीन हो गयी क्युकी उसका काम / कर्म ख़तम होगया .

    विलीन वही हो सकता हैं जो हर काम निस्वार्थ रूप से करता है , निस्वार्थ यानी जहां आप अपने लिये कोई भी कामना ना रखते हो . न सुख न दुःख , न अच्छा ना बुरा .

    प्रवीन
    एक बात बताये
    आप महज एक व्यक्ति को यहाँ देव कह रहे हैं क्या इसलिये की वो औरो से क्षेष्ठ हैं या इसलिये की आप उसको ये कहना चाहते हैं की क्षेष्ठ बनो ??
    और आप चक्रव्यूह से बाहर आ गए या नहीं ???

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  28. .
    .
    .
    रचना जी,

    मेरी यह पोस्ट उसी चक्रव्यूह से बाहर आने का प्रयास है... :)

    मैं आदरणीय अरविन्द मिश्र जी को 'देव' कह संबोधित करता हूँ क्योंकि वह 'देव' हैं, वाकई... समग्र व सम्पूर्ण... जैसे हैं वैसे ही दिखते-लिखते हैं... कोई दुराव-छिपाव नहीं उनमें... आप तो 'आदरणीया' लिखा भी अच्छा नहीं समझती इसलिये आपके लिये केवल 'जी' है... वैसे तो मेरा मन आपको भी 'देवि' संबोधित करने का होता है हमेशा ही...


    ...

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  29. इस पोस्ट में और भी बहुत टिप्पणीकार हैं मेरे अलावा केवल एक को देव ?? बाकी सब को पहचाना नहीं या वो नगण्य हैं . मैने तो अपनी पसंद जग जाहिर कर रखी हैं क्युकी देवी नहीं इंसान रहना चाहती हूँ

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  30. आदरणीय शाहजी,
    मेरी वेदना को आपने समझा, आभारी हूँ ............. कुछ कटु शब्दावली भी प्रयुक्त हुयी है मेरे द्वारा, उनके लिए क्षमा नहीं मांगूंगा क्योंकि वे उस क्षण की अभिव्यक्ति थी..............और उनके कारण आपको हुए सुखद व आश्वस्तिपूर्ण उद्घाटन से अपने प्रति उपजे आपके वात्सल्य को नहीं खोना चाहता.
    ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~`
    @ "... तो आप अपनी इस स्थापना के समर्थन में कोई तथ्य नहीं देते...
    # मेरे कथन का प्रमाण स्वयमेव आप ही है :) जैसा की मैंने अभी तक समझा है संसार भर में दो ही तरह के लोग हैं एक जो आस्तिक हैं और दूसरे जो नास्तिक है . और दोनों की आँखों पर अपनी अपनी मान्यता का चश्मा चढ़ा है (अब यह काला,सफ़ेद,ग्रे,या और कोई रंग जो भी हो :D ) ................ खैर यह बात फिर कभी.........

    @ मुझे आत्मतत्व व आत्मा को आत्मसात कर, गहरे अध्ययन के परिणाम स्वरूप ' आत्मा ' को परिभाषित करते, समझाते आपके विचारों का इंतजार रहेगा...
    # मैं भी अभी जिज्ञासु ही हूँ तत्व-ज्ञानी नहीं जो निष्कर्ष प्रस्तुत कर पाऊं :) ...................... फिर भी अभी तक जितना अध्यन,मनन,स्थिर किया है उसे काफी समय से व्यवस्थित लेख द्वारा अभिव्यक्त करना चाह रहा हूँ , परन्तव वही आप वाली ही समस्या "समय की कमी " खैर यहाँ आत्म-तत्व की चर्चा मुख्य ना होकर शायद आत्मा के शब्दार्थ पे ज्यादा केन्द्रित सी लगी, अभी भी पढ़े सुने समझे में से कुछ लिखने का मन हो रहा था लेकिन आपने मेरा काम आसान कर दिया है ..................... आप ही का अनुसरण करते हुए मैं राजस्थान-पत्रिका समूह के मालिक उद्भट विद्वान श्री गुलाब कोठारीजी के लेख को अक्षरश: दे रहा हूँ इसमें संपूर्ण रूप से तो नहीं पर कुछ जानने की और अग्रसर होने में सहायक तत्व जरूर मिलेंगे आत्मा के साथ साथ कुछ कुछ समाधान स्त्री-पुरुष (जीव पुरुष है या आत्मा स्त्री है जैसे कई प्रश्नों के अन्दर घुसने लायक सामग्री तो मिलेगी )

    शेष-विशेष समयानुसार

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  31. हमारे देश में पौराणिक देवियों को षोडशी माना जाता है। कहा जाता है कि इनकी आयु सदा सोलह साल की ही रहती है। इस प्रकार की चर्चा देवताओं के बारे में कहीं सुनने को नहीं मिलती। वास्तविकता यह है कि षोडशी शब्द के साथ ब्राह् के विस्तार में ‘पुरूष’ शब्द का अनिवार्य प्रयोग होता है। सोलह कलाओं से युक्त पुरूष भाव को षोडशी पुरूष कहा जाता है। उसके अन्तर्गत सम्पूर्ण स्थूल और सूक्ष्म सृष्टि समाहित रहती है। इसमें ब्राह् और माया, दोनों की कलाएं साथ-साथ रहती हैं। ब्राह् अकेला तो कहीं होता ही नहीं है। माया स्वयं बल रूप में ब्राह् की शक्ति होती है। ब्राह् के साथ एकाकार रहती है। जब ब्राह् षोडशी है, तब माया भी निश्चित ही षोडशी है। सृष्टि के आरंभ में केवल आकाश है। जो कुछ पदार्थ आकाश (व्योम) में व्याप्त है, वही ब्राह् है। चारों ओर अंधकार है। कोई गतिविघि नहीं दिखाई पडती। ब्राह् की शक्ति सुप्त अवस्था में है। ब्राह् की स्वतंत्रता ही उसका आनन्द भाव है। ऋषि प्राण वहां ज्ञान अगिA रूप हैं। ब्राह् को सृष्टि का बीज कहते हैं। उसमें सृष्टि का पूरा नक्शा रहता है। जैसे किसी बीज में पेड, पत्ते, फल-फूल आदि रहते हैं। यह ज्ञान ही इच्छा पैदा करता है। बिना ज्ञान के कर्म नहीं होता। ज्ञान के विकास को हम कर्म कहते हैं। सम्पूर्ण सृष्टि ब्राह् के ज्ञान का कर्म रूप विकास है, विवर्त है। पुन: अपने मूल स्वरूप में लौटने की क्षमता रखता है। यह इच्छा ब्राह् की शक्ति के जागरण से पैदा होती है। यह शक्ति ‘स्पन्दन शक्ति’ के नाम से शैव साहित्य में कही गई है। वेद में इसे ‘बल’ कहा गया है। इच्छा में क्रिया नहीं होती। इच्छापूर्ति की दिशा में बल या स्पन्दन शक्ति की क्रिया शुरू होती है। जिस बल से क्रिया शुरू होती है, उसे माया कहते हैं। इच्छा को ही मन रूप या मन का बीज कहा जाता है। मन पर क्रिया रूप में प्राणों की क्रिया होती है, तब कर्म होता है। इसी को वाक् कहते हैं। इस वाक् में प्राण, मन, ज्ञान (विज्ञान रूप) और आनन्द समाहित रहते हैं। यह मन अव्यय मन होता है। चूंकि स्पन्दन शक्ति पूर्ण स्वतंत्र चेतना शक्ति है, वह अपने सामथ्र्य से अपने को ही स्थूल क्रिया में विकसित कर लेती है। प्रत्येक क्रिया का मूल इच्छा रूप स्पन्दन ही है। जब तब इच्छा मन में रहती है, कोई क्रिया नहीं होती। जैसे ही स्थूल क्रिया से जुडती है, इस पर देश-काल का प्रभाव चढ जाता है। सृष्टि में प्रथम वाक् रूप अव्यय पुरूष बनता है। विष्णु की नाभि से सर्व प्रथम ब्राह् पैदा हुए। ये प्राण रूप थे। अति सूक्ष्म तत्व के रूप में पैदा हुए थे। इन्हीं के मन में इच्छा पैदा हुई-एकोहं बहुस्याम्। जिस प्रकार ब्राह् की सर्वज्ञता, पूर्णता आदि विशेषताएं अव्यय में सीमित हुईं, वैसे ही माया की शक्तियां भी यहां आकर सीमित हो जाती हैं। माया यहां पर कला, विद्या, राग, नियति और काल तत्व रूप में परिणत हो जाती है। यही ब्राह् के मूल स्वरूप का प्रथम आवरण कहलाता है। कला से सीमित आदान-प्रदान, विद्या से कर्म की विवेचना, राग से आसक्ति, काल से समय गणना और नियति से कार्य कारण भाव की सुदृढता तय होती है।

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  32. षोडशी पुरूष की व्याख्या परा विद्या में विस्तार से मिलती है। यहां अव्यय, अक्षर और क्षर पुरूष की पांच-पांच कलाएं-आनन्द, विज्ञान, मन, प्राण, वाक्- ब्राह्ा, विष्णु, इन्द्र, अगिA, सोम तथा प्राण, आप, वाक्, अन्न, अन्नाद के साथ परात्पर मिलकर षोडशी पुरूष रूप आत्मा बनता है। अपरा विद्या अथवा शब्द ब्राह् में अव्यय, अक्षर और क्षर पुरूष को ही स्फोट, अक्षर और वर्ण कहा है। अक्षर और वर्ण ही स्वर और व्यंजन हैं। शैव शास्त्रों में जहां स्पन्दन रूप माया का विस्तार मिलता है, वहां माया, महामाया और प्रकृति रूप स्पन्दन ही अव्यय, अक्षर और क्षर पुरूष का शक्ति रूप विवेचन है। चूंकि सृष्टि का विकास मूलत: दो धाराओं में होता है-एक अर्थ सृष्टि, दूसरी शब्द सृष्टि अत: किसी एक धारा के ज्ञान से दूसरी का ज्ञान सहजता से हो जाता है। अर्थ सृष्टि तो लक्ष्मी का क्षेत्र है। अर्थ का निर्माण सोम की आहुति से ही होता है। विष्णु ही सोम अथवा परमेष्ठि लोक के अघिपति हैं। शब्द वाक् की अघिष्ठात्री सरस्वती है। परमेष्ठी लोक का ही दूसरा नाम सरस्वान समुद्र है। दोनों ही प्रकार की सृष्टियां वहीं से शुरू होती हैं। वहां वाक् का स्वरूप परावाक् होता है। लोक व्यवहार में देखा जाता है कि शब्द वाक् ही अर्थवाक् में परिवर्तित होता है। हमारा सारा जीवन व्यवहार शब्दों के अर्थ पर ही टिका होता है। जो विश्व हमें दिखाई देता है, वह भी अर्थ सृष्टि ही है। अर्थ के धन का पर्यायवाची नहीं है। प्राण रूप, स्थूल-सूक्ष्म-सृष्टि का वाचक है। हमारी उपासना-अनुष्ठान सभी शब्द वाक् पर आधारित हंै। मंत्रों के उच्चारण पर टिके हैं। सारे यज्ञ मंत्रों के माध्यम से पूर्ण होते हैं। फलरूप हम किसी न किसी अर्थ की कामना करते हैं। कोई धन मांगता है, कोई संतान, कोई साçन्नध्य चाहता है। सरस्वती ही लक्ष्मी रूप में बदलती है और सम्पूर्ण वाक् षोडशी रूप है। अत: देवियां सदा षोडशी रूप कहलाती हैं। सच तो यह है कि सम्पूर्ण सृष्टि, जिसमें ऋषि, पितर और देव कारक बनते हैं, षोडशी स्वरूपा ही रहती है। हर देवी स्वयं में स्वतंत्र न होकर किसी न किसी देव की शक्ति ही तो है। बिना विष्णु के लक्ष्मी कहां रह सकती है। अर्थ रूपता के कारण विष्णु ही इस सृष्टि के निर्माता और पोषक हैं। ब्राह् है तो माया है। ब्राह्ा है तो सरस्वती है। हम केवल देवियों को पूजते हैं। उनके पति कभी साथ नहीं होते। इस तरह की पूजा में सामान्य लोक व्यवहार भी दिखाई नहीं पडता। षोडशी पुरूष में अव्यय की पांच कलाओं से हमारे पांच कोश बनते हैं। इसी से हमारा कारण शरीर + मन बनता है। अक्षर पुरूष हमारा सूक्ष्म शरीर और प्राण रूप आवरण बनता है। यह अव्यय पुरूष या कारण शरीर के साथ चिपका होता है। क्षर सृष्टि हमारा स्थूल शरीर है। स्थूल अन्त:करण और पंच महाभूत हैं। स्थूल पुर्यष्टक कहलाता है। यही मन-प्राण-वाक् का स्वरूप है। यही अव्यय-अक्षर-क्षर है। इसी में स्फोट, अक्षर-वर्ण का रूप समाहित रहता है। हमें षोडशी पुरूष का स्वरूप समझकर कारण शरीर के आवरणों से मुक्त होना है। अत: इसका ज्ञान हमारी प्रथम आवश्यकता है। क्योंकि हम सभी षोडशी हैं।

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  33. षोडषी अथवा स्वीट सिक्सटीन की अवधारणा इसलिए महत्वपूर्ण है कि जन्म के बाद प्रतिवर्ष एक-एक कला का पूर्ण विकास होता है। सोलह वर्ष में सभी सोलह कलाएं पूर्ण विकास को प्राप्त कर लेती हैं। एक और तथ्य महžवपूर्ण है कि इस षोडषी पुरूष में तीन पुरूष रहते हैं- अव्यय, अक्षर और क्षर। इसमें अव्यय आलम्बन है, किसी कार्य-कारण भाव में नहीं आता। अक्षर निमित्त कारण है। अक्षर पुरूष स्वयं समष्टि रू प है। उसमें से व्यष्टि भाव में जीव और जड प्रादुर्भूत होते हैं। अत: अक्षर पुरूष ईश्वर कहलाता है। स्वयं अव्यक्त है, अदृश्य रहता है। ये अतिसूक्ष्म तत्व जब घनभाव में आता है तब यही व्यक्त होकर क्षर पुरूष कहलाता है। विश्व क्षर रू प है। इसको ये अक्षर गतिमान रखता है। क्षर पदार्थ के स्वरू प से जुडा हुआ समवायी कारण है।

    जगत की सत्तारू प प्रतिष्ठा के प्रतिष्ठाता ब्रम्हा हैं। यज्ञादिष्ठाता विष्णु हैं। अग्नि स्थानीय ईंधन इन्द्र हैं। अग्नि का कार्य वस्तु को पैना करके उसके अवयवों को तोडकर तीखा बना देना है। सोम पदार्थ को स्निग्ध करता है। विरल अवयवों को संकोचन करके घन बनाता है। अव्यय की पांच कलाएं आनन्द-विज्ञान-मन-प्राण और वाक् आमोद, प्रमोद, ज्ञान, विज्ञान, चेतना, शक्ति, प्राणों एवं वाणी के नियामक पंचकोश के रू प में स्थित रहती हैं।
    पिप्पलाद ऋषि ने आत्मा को षोडषी कहा है यानी यह सोलह कलाओं वाली है। ये कलाएं हैं- प्राण, श्रद्धा, पृथ्वी, आप, अग्नि, वायु, आकाश, इन्द्रिय, मन, अन्न, अन्न से उत्पन्न वीर्य, तप, मंत्र, लोक, नाम और कर्म। जैसे रथ के चक्र की नाभि में चारों ओर अरे जुडी रहती हैं वैसे ही इस पुरूष में ये 16 कलाएं चारों ओर ठहरी हुई हैं। ये कलाएं आत्मा में उत्पन्न होकर उसी के चारों ओर फैली हुई, उसी आत्मा में लीन हो जाती हैं। जैसे कई नदियां समुद्र में लीन होकर अपना नाम-रू प खो देती हैं वैसे ही पुरूष में लीन होने पर इन सोलह कलाओं के नाम-रू प भी नष्ट हो जाते हैं। केवल यह शुद्ध आत्मा ही रह जाता है।

    आधुनिक पश्चिमी वैज्ञानिक भी मानते हैं कि शरीर में भी प्रमुखत: सोलह तत्व हैं- आक्सीजन, हाइड्रोजन (यद्रुजन यानी बहती हुई), नाइट्रोजन (नक्तद्रुजन या स्याही), कार्बन (अंगार या कोयला), सल्फर (गंधक), फास्फोरस (पस्पर्श), सोडियम, पोटेशियम, कैलशियम, मैग्नीशियम, लीथियम, फ्लोरीन, क्लोरीन, आयोडीन, सिलीकॉन (शिलाकण) और आयरन यानी लौह तत्व। शरीर में अस्थि, मांस, मज्जा, रक्त, त्वचा, वसा, शुक्र आदि पदार्थ इन्हीं 16 तत्वों के आवाप (कुछ मिलाना) और उद्वाप (कुछ निकालना) से बनते हैं।

    आत्मा के दो भेद हैं- ईश्वर प्रजापति रू प और जीव प्रजापति रू प। षोडष कला युक्त जीव प्रजापति रू प आत्मा में 18 व्यावहारिक आत्मा होती हैं। इनमें तीन वर्ग अमृतात्मा, ब्रम्हात्मा और शुक्रात्मा हैं। अमृत वर्ग की चार, ब्ा्रह्म वर्ग की पांच और शुक्रवर्ग की 9 आत्मा समझनी चाहिए। अमृतात्मा में परात्पर विवर्त का भाव अभयात्मा कहलाता है। अव्यय का आलम्बनात्मा, अक्षर का नियन्तात्मा और क्षर का भाव परिणाम्यात्मा कहलाता है। ये पुरूष आत्मा अमृतमय हैं।

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  34. इसके आगे ब्रम्हा के विकास में आत्मा का विवर्त प्राण, आप, वाक्, अन्न और अन्नाद के रू प में होता है। आत्मा के भाव प्राण का शांतात्मा, आप का महानात्मा, वाक् का विज्ञानात्मा, अन्न का प्रज्ञानात्मा और अन्नाद का आत्म भाव प्राणात्मा कहलाता है।

    तीसरे वर्ग शुक्रात्मा में शरीरात्मा साधारण अग्नि रू प में है। हंसात्मा वायुरू प में है। दिव्यात्मा इन्द्र है जो वैश्वानर कहलाता है, अग्नि है। चौथा दिव्यात्मा ही, इन्द्र ही तैजसात्मा वायुरू प में है। पांचवां प्राज्ञ इन्द्र कर्मात्मा के रू प में है। छठा चिदाभास ज्योतिर्मय है। सातवां चिदात्मा साक्षात है। यही इष्टदेव कहलाता है। यह चेतना ज्ञानमय तत्व है, उसी को विभूति कहते हैं, ब्ा्रह्म भाव में है। फिर आठ और नवां शुक्रात्मा है- श्री और ऊर्क यानी ऊर्जा। श्री विड् भाव में और उर्जा क्षत्र भाव है।

    कर्मरू प आत्मा वासनामय है। इस 16 कलाओं वाले कर्म पुरूष के 16 गुण सुश्रुत शारारीक में बताए गए हैं। ये सोलह गुण हैं-सुख, दु:ख, इच्छा, द्वेष, प्राण, अपान, उन्मेष, निमेष, बुद्धि, मन, संकल्प, विचारणा, स्मृति, विज्ञान, अध्यवसाय और विषय की उपलब्धि।

    एक ही तत्व का 16 स्वरूप में बदलने का कार्य माया के द्वारा निष्पन्न होता है। माया का यह योग तीन प्रकार का होता है। इन्हें योग, बन्ध और विभूति कहते हैं। जहां भी रस (ब्रम्हा) अथवा अमृत की प्रधानता होती है, उसे विभूति संसर्ग कहते हैं। कर्म की प्रधानता होने पर यह बन्ध माना जाता है। विभूति और बन्ध की समता को योग कहते हैं। जहां दो के संयोग से तीसरा नया पैदा होता है और दोनों पुराने नहीं रहते, इसी का नाम बन्ध है। जल और वायु के संयोग होने पर न जल रहता है, न ही वायु। फेन बन जाता है।

    तृण रूप घास खाने से गाय के शरीर में दूध बनता है। तृण दूध के भाव में बन्ध जाते हैं। गाय के शरीर की जठरागिA ने उन तृणों को दूध रूप में परिणत कर दिया। यह अगिA का विभूति सम्बन्ध है। इसी प्रकार आत्मा भिन्न-भिन्न विधाओं में भोक्ता बनता है। जो भोग्य पदार्थ आत्मा के लिए उपलब्ध होते हैं, वे वृत्तिता संसर्ग से होते हैं। ये भी अमृत एवं मृत्यु रूप तीन प्रकार के आसक्ति, उदार और समवाय रूप होते हैं। ये एक-दूसरे में परिवर्तित होते रहते हैं। परिवर्तन भी स्वाभाविक ही होता है। ब्रह्म के साथ जुडते ही बल/माया में असाधारणता आ जाती है। वायु की भिन्न-भिन्न गतिभाव के बाद भी आकाश तो निर्लेप ही रहता है। तीनों वृत्तिता संसर्ग कर्म सम्बद्ध आत्मा में कर्म रूप माया बल के कारण प्रवृत्त होते हैं।

    अपने निज रूपेण रस रूप आत्मा और बल रूप शक्ति का एक रूप ही है। उन दोनों में भेद व्यवहार, रस के विभूति, बंध, योग सम्बन्ध से तथा बल के उदार, समवाय, आसक्ति संसर्ग से होता है। इसी कारण समस्त पदार्थो में भेद पैदा होता है। यह कैसे पैदा होता है और अन्त में कहां चला जाता है, यह नहीं जाना जा सकता। जो दिखाई पडे और जाना न जा सके उसी को संसार में माया कहते हैं। कार्य रूप में अचानक दिखाई पडे और उसका कारण समझ में नहीं आए। माया भी माया, महामाया और योग माया रूप में कार्य करती है।

    रस और बल के परस्पर सम्बन्ध में जहां रस की प्रधानता हो, वहां तीन पुरूष (अव्यय, अक्षर, क्षर) का प्रादुर्भाव होता है। जहां बल या शक्ति की प्रधानता हो, वहां प्रकृति का प्रादुर्भाव होता है। पुरूष में मन-प्राण-वाक् मुख्य तत्व होते हैं। शक्ति स्वरूप में सत-रज-तम मुख्य तत्व रहते हैं। इनसे ही महत्, अहंकार और तन्मात्राएं पैदा होती हैं। इनमें एक-एक पुरूष का एक-एक शक्ति से सम्बन्ध रहता है। रस के व्यापक धर्म ज्योति, विधृति (धारण करना) और प्रतिष्ठा हैं। बल प्रधान शक्ति के तीन रूप हैं-अशनाया (भूख), विक्षेप और आवरण। प्रवाह रूप बल जब स्थिर-सा बन जाए, तब वह आवरण हो जाता है।

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  35. शैव शास्त्रों में जो माया का वर्णन है वह भी समान संकेत ही करता है। परमेश्वर की शक्ति को यहां स्वातं˜य शक्ति कहा है। इसके स्पन्दन पांच रूपों में होते रहते हैं। चित्, आनन्द, इच्छा, ज्ञान और क्रिया। ये ही परम ईश्वर के सर्वकतृüत्व, सर्वज्ञत्व, पूर्णत्व, नित्यत्व, और व्यापकत्व कहलाते हैं। परमेश्वर (अनुत्तर तत्व) इसी शक्ति पंचक के सहारे सृष्टि, स्थिति, संहार पिधान और अनुग्रह रूप कार्य हर क्षण करता रहता है। यही शक्ति पंचक आगे चलकर विद्या, कला, राग, काल और नियति रूप में बदल जाता है। माया तत्व के साथ मिलकर आत्मा का षट् कंचुक रूप आन्तरिक आवरण बनाता है। मोक्ष होने तक यह भी जन्म-जन्मान्तरों में आत्मा का अंग बना ही रहता है। देह, प्राण, पांच ज्ञानेन्द्रियों, पांच कर्मेन्द्रियो को बहिरंग आवरण या स्थूल शरीर कहते हैं। इस शरीर की आकृति, प्रकृति और अहंकृति षोडशी पुरूष के स्वरूप पर निर्भर करती है। सम्पूर्ण जगत यूं तो षोडशी है, किन्तु कर्म भेद के कारण भिन्नता लिए रहता है।

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  36. कुछ ज्यादा तो नहीं हो गया ??? पर क्या करूँ यह आत्मा जीव ............ या फिर कोई भी तत्व एक दो शब्दों में कहा तो जा सकता है पर उनके अस्तित्व सम्बन्धी अवधारणा या उनकी परिभाषा तो ऐसे विस्तार से ही व्यक्त की जाती है ना !!!! पर यह तो नाकुछ है विस्तार तो बाकी है ......................यह लेख कोठारीजी के ब्लॉग http://gulabkothari.wordpress.com से साभार लिया गया है .

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  37. आत्मार्थी जनाब परवीन साहब,

    आत्म-तत्व पर विवेचन को मैं विषय नहीं बनाना चाहता,मेरी चर्चा का उद्देश्य सीमित रहेगा, आपकी पोस्ट का पूर्वार्ध जिसमें भिन्न कथनों से आत्मा का भिन्न अर्थ करके, आत्म-तत्व के खण्ड़न का प्रयास किया गया है।

    @ मेरे द्वारा दिये गये चारों उदाहरण Self Explanatory हैं... आपका शाब्दिक जुगाली कहने का मैं विरोध करता हूँ...

    बेशक आपके मंतव्यों के विरुद्ध जाते वाक्यांशो का विरोध करने का आपको पूरा अधिकार है।

    @ शब्दकोश………उपरोक्त नौ अर्थ दिये गये हैं वहाँ पर…।

    परवीन जी, मै यह तो कह नहीं सकता कि आप जैसे विचारक को शब्दकोश का अध्ययन करना नहीं आता। किन्तु शब्दकोश का प्रयोग प्राय: शब्द के समानार्थी व पर्यायवाची अर्थ प्राप्त करने के लिए किया जाता है। पर्याय को भिन्न अर्थ-वाची के लिए नहीं। वैसे शब्दकोष में भिन्न अर्थ भी प्राप्त होते है,पर अध्ययन करना आवश्यक है कि यह अर्थ मात्र पर्याय है भिन्न-अर्थ। किसी भी शब्द की अलग अलग पर्याय हो सकती है पर्याय सापेक्ष होती है। जैसे इन्द्र के अर्थों में देवराज, पुरंदर आदि…देवताओं का राजा होने की अपेक्षा से देवराज,नगरों का ध्वंश करने की अपेक्षा से पुरन्दर्। किन्तु अर्थ बोध से सभी का अर्थ इन्द्र ही होगा। उसी तरह प्रस्तुत आत्मा के नौ शब्दार्थ पर्याय से विशेषण युक्त होते हुए भी अर्थवत्ता से उसी एक ही आत्मा के अर्थ में है। एक शब्द भी विपरितार्थ नहीं है।

    पर्यायों की भिन्नता से विरोधाभास दर्शाना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है।

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  38. सुधार्…… वाक्यांश्……
    अध्ययन करना आवश्यक है कि यह अर्थ मात्र पर्याय है भिन्न-अर्थ।

    को

    अध्ययन करना आवश्यक है कि यह अर्थ मात्र पर्याय है अथवा भिन्न-अर्थ।

    पढें

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  39. @ सभी अंग-अवयव मिलकर ही समग्र शरीर-व्यक्तित्व बनाते हैं... 'शरीर से भिन्न कोई और' क्या और कहाँ है यहाँ पर...

    आत्मार्थी जनाब परवीन साहब,

    आपनें शरीर के साथ व्यक्तित्व शब्द क्यों जोडा। व्यक्तित्व तो मात्र शरीर से नहीं बनता।
    यदि शरीर ही 'मैं' है तो वह शरीर अपने लिए ही कैसे बोलता है "मेरा शरीर" (my body)मेरा कंठ, मेरा वाक् यंत्र। स्वयं के लिए 'मेरा' लगाने का क्या प्रयोजन है? यह मेरा कहने वाला शरीर मालिक कोई अन्य है। अव्यव तो सारे उपकरण है, इनका उपयोग कौन करता है?

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  40. @प्रवीण जी,
    मेरे, आप में कोई तात्विक भेद नहीं है,चेतना स्तर पर हम एक सतह पर जो हैं -इसलिए आपका कहा देव भी प्रकारांतर से आपको ही विभूषित करता है -बाकी रचना मेरे लिए भी देवि हैं ..लीजिये सार्वजनिक उद्घोषणा भी कर दिया!
    भारतीय लोक जीवन की अनेक आराध्य देवियों की ही परम्परा में ही एक देवि ...जिन्हें मानव मन श्रद्धा ,विस्मय ,भय ,रोमांच आदि के मिले जुले भावों से देखता है !

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  41. धन्यवाद इस पोस्ट के लिए.चंदन जी का केंचुए वाला उदाहरण अच्छा है.वैसे अंशुमाला जी की टिप्पणी को ही मेरी भी माना जाए.

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  42. आत्मा के बहाने बड़ी सिलसिलेवार चर्चा हुई है.हमने तो अभी इस ओर ध्यान नहीं दिया है.बस,आपको जो अच्छा लगे,करते चले जाओ...आत्मा-परमात्मा के झगडे में पड़े बगैर !
    यदि कोई व्यक्ति अंतर्मन की आवाज़(शायद आत्मा इसी को कहते हैं) पर चला जाता है अपने जीवन-पथ पर तो यही परमात्मा का रास्ता भी है !

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