मंगलवार, 5 जुलाई 2011

माननीय मंत्री जी ने तो विकसित विश्व से आयातित बीमारी कह दिया, पर क्या यह मुद्दा इतना आसान है ?

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 भारतीय स्वास्थ्य मंत्री जनाब गुलाम नबी आजाद, जो निश्चित तौर पर वर्तमान केंद्रीय सरकार के बेहतर कामकाज करने वाले मंत्रियों में गिने जाते हैं ने एच आई वी/ एड्स पर हो रही एक गोष्ठी के दौरान यह बयान (लिंक) देकर हलचल सी मचा दी है...

आईये देखते हैं कि क्या कहा माननीय मंत्री महोदय ने...


"The disease of Men Having Sex With Men (MSM), which was found more in the developed world, has now unfortunately come to our country and there is a substantial number of such people in India," Azad said at a convention on HIV/AIDS at Vigyan Bhawan in Delhi.

"Even though it (homosexuality among men) is unnatural, it exists in our country and is now fast spreading, making it tough for its detection. With relationships changing, men are having sex with men now. Though it is easy to find women sex workers and educate them on sex, it is a challenge to find MSMs," he said.



जैसा कि अपेक्षित था भारतीय LGBT समुदाय(लिंक)  जो दावा करता है कि,

Over 30 million Indians identify as lesbian, gay, bisexual, and transgender citizens. Time for more equality?

और जिसका फेसबुक पेज (लिंक)  यह है की ओर से बहुत ही तीखी प्रतिक्रिया (लिंक) आई है...

"The statement is completely outrageous. For someone who is qualified enough to be the country's health minister, it is surprising that he has not been through the World Health Organization's guidelines in which homosexuality was taken off the list of diseases a few years ago. Homosexuality is very much a part of nature and even finds references in religious texts. To call it unnatural is absurd. The case is about to open in the Supreme Court shortly and this will just add to the controversy," said Mohnish Kabir Malhotra, publicist and queer rights activist.

Malhotra added that barely 15 days ago, the United Nations had passed a bill in which discrimination on basis of gender and sexuality was a violation of human rights. "He should apologise to the community for such a frivolous statement."  

तो जैसा मुझे समझ आ रहा है वह यह है, कि भारतीय समाज के ही तीन करोड़ नागरिकों के लिये मंत्री जी का यह बयान असंवेदनशील है ... यह कुछ कुछ बाबा रामदेव जी के उस बयान सा है जिसमें उन्होंने कहा था कि समलैंगिकता एक बीमारी है तथा योग-प्राणायाम व आयुर्वेद के जरिये इस का इलाज किया जा सकता है...

जहाँ तक मेरा सवाल है इस मुद्दे पर मैंने अपनी पोस्ट-तलवारें खिंच गई हैं होमोसेक्सुअलिटी के मुद्दे पर फिर से एक बार . . . . . . किस ओर खड़े हैं आप?  पर चर्चा की थी, आज मैं मानता हूँ कि मेरी तब की समझ सही नहीं थी...

अपनी ही दूसरी पोस्ट जब उसने मोहब्बत की थी एक मर्द के साथ, तो शादी किसी औरत से क्यों करे ?.  से लिखा एक बार यहाँ दोहराना चाहूँगा...

आज मैं मानता हूँ कि LGBT समुदाय को समाज से बेहतर समझ की जरूरत है, मुझे यह मानने में कोई हिचक नहीं कि मेरा उनको Pervert लिखना गलत था और हमारे आज के समाज को इस समुदाय के लिये और ज्यादा इन्क्लुसिव होना चाहिये...


आप बताइये कि इस मुद्दे पर आज कहाँ खड़े हैं आप ? और क्या भारत के स्वास्थ्य मंत्री को ऐसा कहना चाहिये था ?



 आभार!



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अपडेट :-
चारों तरफ से पड़ते दबाव व होती आलोचना के चलते माननीय स्वास्थ्य मंत्री जनाब गुलाम नबी आजाद ने अपना स्पष्टीकरण जारी कर दिया है...

देखिये ट्रिब्यून की खबर...

हिन्दुस्तान टाइम्स में भी देखिये...



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23 टिप्‍पणियां:

  1. आप को लगता है की हमारे नेता कुछ भी सोच समझ कर बोलते है ?

    फिर "गुलाम" जी एस जीवन में इस चीज का समर्थन कभी कर नहीं सकते चाहे किसी भी पद पर चले जाये आखिर उन्हें अपने समुदाय का वोट भी चाहिए अच्छा हो वो ऐसी चीजो पर बोलने से बचे |

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  2. बडा गम्भीर मसला है ये, इसलिये केवल अपने व्यक्तिगत अनुभवों से कुछ निषकर्ष निकाले हैं।
    आम तौर पर लोगों की गे परेड अथवा ऐसे ही कुछ दृश्यों को देखकर उनके बारे में हेय राय बन जाती है।

    हयूस्टन में पिछले ६-७ वर्षों में रहते रहते मेरे कुछ ऐसे दोस्त भी हैं जो समलैंगिक हैं। यकीन मानिये कि इसका उनके एक बेहतर इंसान होने/न होने से कोई समबन्ध नहीं है। अगर वो किसी को न बतायें तो अधिकतर को पता भी नहीं चलेगा कि वो समलैंगिक हैं। समाज में समलैंगिकता के विषय में बडी कठोर राय है, चाहे भारत हो अथवा अमेरिका।

    भारत में कानून ने इस प्रकार के समबन्ध को स्वीकृति जैसा कुछ नहीं किया है, उनकी व्याख्या केवल इतनी है कि अगर आपसी मर्जी से ऐसे समबन्ध बनते हैं तो वो कोई अपराध नहीं है। ऐसा होना भी चाहिये।

    समलैंगिक समुदाय को समाज में हिस्सा मिलना चाहिये भले ही उनका व्यवहार हमारी आपकी अपेक्षा के अनुरूप हो अथवा न हो।

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  3. यह बात किसी पश्चिमी देश में कही गयी होती तो अब तक हंगामा मच गया होता। पश्चिमी देश यौनिक स्वतंत्रता के मामले में कहीं ज्यादा स्वतंत्र हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने चुनाव अभियान के दौरान एलजीबीटी के नाम एक खुला पत्र लिखकर वादा किया था कि अगर वे जीते तो समलैंगिक शादियों को मान्यता दिलाने के लिए अपने प्रभाव का इस्तेमाल करेंगे। उन्हें इस जमात का समर्थन भी मिला।
    भारत में भी अब धारा 377 खत्म कर दी गई है। जिसके तहत इसे अपराध माना जाता था। यह बात सही नहीं है कि समलैंगिकता भारत में बाहर से आयी है। खुजराहो और कामसूत्र की तसवीरों में इस बात का प्रमाण मिलता है कि समलैंगिकता हमारी संस्कृति के लिए कोई नई चीज़ नहीं है। मंत्रीजी की तरह ही बाबा रामदेव भी इसे अप्राकृतिक बताते हैं। यदि समलैंगिकता अप्राकृतिक है तो फिर ब्रह्मचर्य क्या है?

    मेरे ब्लॉग पर पढ़ें- भूत का मंत्र

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  4. नेता जी की सोच के बारे में तो नेता जी जानें लेकिन पहले आपकी सोच कुछ और थी और आज कुछ और, हम प्रतिक्षा करते हैं । शायद अभी यह बदले कुछ और ।

    लेकिन इतना ज़रूर कहेंगे कि
    हर सूराख़ बिल नहीं होता ।

    क्यों है न Proverbटाइप ?
    कैसी लगी ?

    बिना लिंक के ही
    सादर !

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  5. यह बीमारी नहीं तो एक अप्राकृतिक व्यवहार अवश्य है ...
    मैं ऐसे कई लोगों के संपर्क में आया हूँ और वे मुझे हमेशा अस्वाभाविक हमेशा लगे ..
    बचपन और टीनेज में ऐसी प्रवृत्तियाँ मनुष्य के एक्स्प्लोरैटरी व्यवहार की उपज होती हैं .
    मगर समय के साथ ये ठीक हो जाती हैं ...
    ये एक तरह की अनुपयुक्त कंडीशनिंग से स्थायी बनती होंगीं जैसे असहज मां का बेटे के प्रति हमेशा दुत्कार का भाव ..आदि ..
    हाँ इनके साथ थोड़ी सहानुभूति जरुरी है ! और इनके मनोवैज्ञानिक उपचार की ज्यादा जरुरत है ...
    ऐसे समलैंगिक उपचार केंद्र होने चाहियें जहाँ सुन्दर युवतियां भी नर्स हों :)
    ऐसे पुरुषों के आग्रहों को सामान्य पुरुषों द्वारा दुत्कारते रहना चाहिए ....जो इनके मस्तिष्क में इस प्रवृत्ति को डिमिनिस करने में कारगर होगा !

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  6. विज्ञान और विज्ञान का शोर मचाने वाले भाई लोग,

    मनोविज्ञान और मनोचिकित्सा तो इसे मनोविकृति ही मानते हैं और यह है भी। हाँ, इस बात के चलते कोई घृणा का पात्र तो बिलकुल नहीं है लेकिन ऐसे लोगों को मानसिक चिकित्सा की जरूरत तो है ही। यह मैं उसी यूरोप के मनोवैज्ञानिक कहते हैं। फ्रायड भी यही कहते हैं। http://santsameer.blogspot.com/2008/12/blog-post_9205.html पर एक नजर डालें।

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  7. समलैंगिकता अमीरों का मानसिक रोग है, गरीब में तो बिरले ही इसके दर्शन होते हैं। कहने का मतलब तो यह कि दिख तो कहीं सकता है ये व्यवहार लेकिन इस हद तक कि शादी और अदालत बीच में आ जाएँ, यह सिर्फ़ और सिर्फ़ अमीरों में दिख सकता है।
    http://praveenshah.blogspot.com/2011/05/blog-post_04.html
    यह आपकी ही पोस्ट है और यहाँ आपने बताया है कि 30 लाख खर्च किए गए हैं। यह 30 लाख आप और हम दे सकते हैं क्या वह भी इस बात के लिए?

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  8. समलैंगिकता एक टेढा विषय है, जिसपर कोई भी कुछ भी बोल देता है। हमारी दिक्‍कत यह है कि हम जिसे पसंद नहीं करते, उसके लिए अपमानजनक शब्‍दावली का प्रयोग करने से नहीं हिचकते। यह बीमार भी समलैंगिता के समकक्ष ही रखी जानी चाहिए।

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    जादुई चिकित्‍सा !
    इश्‍क के जितने थे कीड़े बिलबिला कर आ गये...।

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  9. भाई चंदन कुमार मिश्र जी ने लिखा है 'समलैंगिकता अमीरों का मानसिक रोग है, गरीब में तो बिरले ही इसके दर्शन होते हैं।'

    इस वाक्‍य को पढकर मुझे बचपन का एक वाकया याद आ रहा है। मेरे गांव में एक हट्टा कट्टा व्‍यक्ति रहता था, जो अक्‍सर छोटे लडकों को टिटिहरी के अंडे दिखाने के लिए ले जाया करता था। और बाद में वे लडके उससे दूर भागा करते थे। ..काफी बाद में समझ आई उन अंडों की हकीकत।

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    @ अरविन्द मिश्र जी,

    देव,

    आप जैसे योग्य जीव विज्ञानी व जैव व्यवहार विशेषज्ञ से इस व्यवहार की अप्राकृतिकता पर कुछ और विस्तार से टिप्पणी अपेक्षित है...

    @ "ऐसे समलैंगिक उपचार केंद्र होने चाहियें जहाँ सुन्दर युवतियां भी नर्स हों :)"

    यह आप कभी भी देख सकते हैं कि सुन्दर युवतियाँ समलैंगिक पुरूष के सानिध्य मे खुद को ज्यादा सहज अनुभव करती हैं... फैशन वर्ल्ड इस बात का साक्ष्य है...


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    @ चंदन कुमार मिश्र,

    मुझे इस मुद्दे पर आपसे एक बेहतर समझ की अपेक्षा थी... एक सुझाव दूँगा... कुछ समलैंगिक पुरूषों व महिलाओं को करीब से देखिये-जानिये... चाहे इसमें कुछ महीने लग जायें... फिर दोबारा से इस आलेख पर दी गई अपनी टीपों का आकलन करें... :)



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  12. विषय और भी हैं, स्वास्थ्य संबंधी।

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  13. आदरणीय प्रवीण जी,

    मैंने अपनी बात नहीं कही है, बस मनोविज्ञान में थोड़ी रुचि है इसलिए मनोविज्ञान की बात कह दी है।

    हाँ आपके सुझाव का स्वागत है। मैं किसी समलैंगिक से परिचित हूँ ही नहीं लेकिन्। लैंगिक विकृतियाँ असामान्य मानी जाती हैं। इतना ही नहीं मनोविज्ञान के असामान्य मनोविज्ञान खंड में इनका अध्ययन भी किया जाता है। यही सोचकर मैंने जवाब दिया था।

    मैं किसी समलैंगिक के सम्पर्क में रहा तो जरूर ध्यान दूंगा। वैसे मुझे लगता है कि इस बात का किसी के सामाजिक व्यवहार पर असर नहीं ही होता होगा। क्योंकि कोई समलैंगिक रहे या न रहे समाजिक जीवन में इसका महत्व अधिक नहीं है।

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  14. अभी हमारे यहाँ इसे सामाजिक स्वीकृति मिलने में समय लगेगा.अभी तो यूरोप में भी ऐसा नहीं हो पाया.बस वहाँ पर इस विषय पर खुली चर्चा जरूर होती रही है.फिर हमारी तो आदत है दोगलेपन की जैसे किन्नरों के आशिर्वाद को हम शुभ मानते है लेकिन समाज से उन्हे बहिष्कृत कर देते है. समलैंगिकता को जब चिकित्सा विज्ञान और मनोविज्ञान एक प्रकार का यौन व्यवहार ही मानते है और कानून ने भी इसे अपराध के दायरे से बाहर कर दिया है तो हमें भी अपना नजरिया बदलना होगा.जहाँ तक बात है प्राचीन संस्कृति की तो पहले भी इसे लेकर मतभेद रहे होंगे कई जगह इसे सामान्य माना गया है तो कई जगह विरोध भी किया गया है जैसे मनु स्मृति में समलैंगिकों के लिये कठोर दण्ड का प्रावधान है खासकर महिलाओं के लिये.

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  15. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  16. भारत के स्वास्थ्य मंत्री बनने के लिए किसी अतिरिक्त योग्यता की जरूरत तो होती नहीं....इसलिए उनके ऐसे कथन पर कोई आश्चर्य नहीं हुआ...इस तरह की बेवकूफी भरी बातें....हमेशा से हमारे नेता-मंत्री करते आए हैं.बस विदेश में ,किसी अंतर्राष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस में ऐसी बात कह कर एम्बैरेस नहीं किया....यही गनीमत रही.

    समलैंगिकता हमेशा से हमारे समाज में थी....फर्क सिर्फ ये आया है कि अब इस पर खुलकर बात होने लगी है....धीरे-धीरे उन्हें स्वीकृति भी मिलने लगेगी...और मुझे नहीं लगता इन्हें किसी उपचार की जरूरत है...जो लोग अपनी प्रवृत्ति जाहिर नहीं करना चाहते और समाज में अपनी स्थिति बताने से झिझकते हैं..वे यूँ भी समझौता कर अपनी जिंदगी गुजार देते हैं.

    इस विषय से सम्बंधित एक पोस्ट मैने भी लिखी थी...

    http://rashmiravija.blogspot.com/2010/12/blog-post_12.html

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  17. @ आप बताइये कि इस मुद्दे पर आज कहाँ खड़े हैं आप ? और क्या भारत के स्वास्थ्य मंत्री को ऐसा कहना चाहिये था ?
    यह एक अप्राकृतिक व्यवहार है। और जो प्रकृति के विरुद्ध कर रहा है वह मानसिक रूप से रुग्न ही तो है।
    कुछ लोग तो पशु से भी ...
    छोड़िए ऐसी बातें लिखना भी अशोभनीय लगता है।
    एक कीड़े मकोड़े भी प्रजनन के लिए विपरीत लिंग के प्रति ही आकर्षण रखते हैं। प्रजनन प्रकृति का नियम है।
    किसी जगह की मूर्ति तस्वीर का उदाहरण देकर इसे सही साबित करना उचित प्रतीत नहीं लगता। कोई मूर्ति अगर हड़प्पा के अवशेष में किसी की हत्या करता दिख जाए, मिल जाए तो क्या वह भी सही ही कहा जाएगा?
    मंत्री महोदय सही थे।

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  18. जिस तरह दुनिया में समलैंगिक गिने-चुने है उसी तरह हिन्दी ब्लागरों में समलैंगिकता का मुद्दा उठाने वाले ब्लागर भी| इस पोस्ट के लेखक द्वारा इस मुद्दे को बार-बार उठाना यह बताता है कि समलैंगिकता की ओर उनका झुकाव है| जब वे चन्दन और मिश्र जी की टिप्पणी पर बिफर जाते है तो यह लगने लगता है कि वे समलैंगिक भी हो सकते हैं| यदि ऐसा है तो हिन्दी ब्लॉग जगत के पहले समलैंगिक (पर विवाहित) ब्लागर प्रवीन शाह जी का स्वागत हैं| अब हम खुलकर उनसे सीधे संवाद करके समलैंगिकता को अच्छे से जान पायेंगे|

    देव, सच को स्वीकारें और काले को काला कहे जैसा आपका हेडर है| स्वीकारे जो आप हैं ताकि सार्थक चर्चा आगे बढाई जा सके|

    प्रणाम

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    @ ऊपर वाले anonymous (बेनामी) महोदय,

    देव,

    इतना स्मार्ट तो कमेंट है आपका, पर बेनामी क्यों... हिम्मत करिये और खुल कर अपने नाम के साथ टीप देना सीखिये... समलैंगिकता बीमारी है या नहीं, इस पर तो बहस की जा सकती है पर वैचारिक कायरता निश्चित तौर पर एक घृणित बीमारी है !

    आपका कमेंट इस मामले में स्मार्ट है कि यदि मैं आवेश में आ आपको कुछ बुरा भला कहूँ तो आप कहोगे " देखा सच बात बोली तो कितनी मिर्ची लगी " और यदि नजरअंदाज कर दूँ तो आप कहोगे " देखा, कैसा चुप हो गया "... इसके साथ ही मेरे आवेश में आने पर आप यह भी कहते फिरेंगे कि "लिखने की बात और है पर स्वयं को ऐसा कहने पर गाली सी मान बैठा "...

    मैं उपरोक्त में से कुछ भी नहीं करूंगा... :)

    वैसे आप यह सवाल निश्चित ही नहीं उठाते यदि आपने मेरी पोस्ट और उसमें दिये सभी लिंकों को गौर देकर पढ़ा होता...



    ...

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  20. ये बेनामी महाशय कौन हैं, जरा अपना नाम लिखें भाई। मैं भी जानना चाहता हूँ कि ये कौन हैं?

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  21. देश में ३ करोड़ एल जी बी टी लोग हैं . लेकिन इनमे से केवल ट्रांसजेंड़ेर्स ही ऐसे हैं जिन्हें प्रकृति ने धोखा दिया है . शेष सभी स्वेच्छा से असामान्य यौन व्यवहार में लिप्त होते हैं . आजकल समलैंगिक होना भी एक फैशन सा बन गया है .
    प्रकृति द्वारा मानवीय शरीर की संरचना एक बेजोड़ कलाकारी है . मानवीय शरीर के हर एक अंग , टिस्यू यहाँ तक की कोशिका का विशेष कार्य है . उसमे छेड़ छाड़ करना निश्चित ही मानव के लिए सर्वनाश का कारण बन सकता है . इसीलिए एड्स जैसी भयंकर बीमारियाँ फ़ैल रही है . एड्स सबसे ज्यादा होमोसेक्सुअल्स में ही होती है .
    वैसे भी प्रकृति के विरुद्ध जाकर ही ग्लोबल वार्मिंग , ग्लेसियर्स का पिघलना , ओजोन होल आदि परिवर्तन आ रहे हैं .
    प्रकृति से मनुष्य कभी जीत नहीं सकता . सुनामी , वोल्केनोज , चक्रवात आदि विध्वंश का कारण बनते हैं जिनपर आदमी का कोई वश नहीं .

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  22. प्रवीण जी ,
    अब क्या विस्तार दिया जाय ...
    मेरा भी प्रेक्षण यह है कि समलैंगिक असामान्य है ..
    मगर इसे रोग की श्रेणी में रखने के पहले 'रोग' को ठीक से परिभाषित करना होगा !
    यह संभवतः जेनेटिक नहीं है ......हाँ हार्मोन लोचा है ....
    जल्दी ही विस्तृत विश्लेषण कर सकूंगा !

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  23. पहले ही यहाँ ज्ञान के बघार की बहुतेरी खूशबू फैली हुई है..
    मैं केवल इतना कहना चाहूँगा कि यह एक यौन मनोविकार है ।
    यौनेच्छा के शमन के अलग अलग तरीको की तलाश में सदियों पहले कतिपय धुरँधरों ने ऎसे अजीबो-गरीब तरीकों की ईज़ाद भले कर लिया हो, किन्तु समाज ने इस अप्राकृतिक मैथुन को कभी मान्यता नहीं दी.... इसे जीवन शैली के रूप में अपनाने की बात तो कल्पनातीत रही है । ’ऑफ़-बीट’ चीजों को ही हॉट हैपेनिंग थिंग मानने वाले पाश्चात्य युवाओं नें इसे अपनाया और समाज में शर्मसार होने की नौबत आने पर व्यक्तिगत स्वतँत्रता और मानवाधिकार की दुहाई देते हुये लड़ झगड़ कर इसे कानूनी मान्यता दिलाने में सफल रहे । विकासशील देश की श्रेणी से जल्द से जल्द ऊपर उठ कर विकसित देशों की पत्तल में खाने की चाह में भारतीय सुप्रीमकोर्ट ने इसकी पैरवी करके प्रगतिशीलता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता सिद्ध करनी चाही ।
    मानों यह मुद्दा दाल, रोटी, बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं के भी ऊपर हो । मैं स्पष्ट कह सकता हूँ कि इस यौन मनोविकार को इतनी जल्दबाजी में वैधानिक जामा पहना देना भारतीय मनीषा का दिमागी दिवालिया बुखार है... वह भी तब, जबकि होमोसेक्सुअलिटी एक दँडनीय धारा की शक्ल में IPC में बैठा मुस्कुरा रहा है... है न ताज़्ज़ुब की बात... इट हैपॅन्स ओनली इन इंडिया !

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