रविवार, 31 जुलाई 2011

लड़कियाँ-लड़कियाँ-लड़कियाँ... स्लट वॉक पर विशेष...

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लड़कियाँ
मैं देखता ही रह जाता हूँ उन्हें
हमेशा ही विस्मित करती हैं मुझे
जब भी देखता हूँ मैं उनको
मिलती हैं हरदम चहचहाती हुई
बिना किसी भी खास बात के
खुलकर हंसती-मुस्कुराती भी

लड़कियाँ
कभी नहीं दिखती वो बेतरतीब
घर से बाहर निकलती हैं सजी-संवरी
हमेशा पहने होती है रंगीन वस्त्र
समेटी चलती हैं खुशियों को हरदम
लगता है छिपा लेती हैं बड़ी खूबी से
हर असुंदरता हर काले पन को

लड़कियाँ
झेलती हैं दुनिया भर के दबाव
अकेले नहीं निकलना बाहर
कॉलोनी में चलो सर नीचा किये
ज्यादा हंसी मजाक शोभा नहीं देता
यह कपड़े शरीफों के लायक  नहीं
खबरदार किसी बाहरी से बात की तो

लड़कियाँ
हमेशा ही मानी जाती हैं दोयम
अपने कम लायक भाइयों के सामने
जाने अनजाने कोई न कोई
दिलाता रहता है यह अहसास
तुम इस घर में पल रही जरूर हो
पर हो किसी दूसरे की अमानत ही

लड़कियाँ
ज्यादातर तो नहीं देती दखल कहीं भी
फिर भी होती हैं कुछ दूसरी मिट्टी की
नहीं मानती जो खुद को दोयम
बोलती है खुल कर हर अन्याय पर
लगा देतें हैं लोग लेबल माथे पर उनके
बेहया, कुलटा, घर-उजाड़ू आदि आदि

लड़कियाँ
कहता है हमारा यह समाज
रहना चाहिये हमेशा उन्हें संरक्षा में ही
उनके बचपन में पिता-भाई की
जवानी में यह काम करेगा पति
और बुढ़ापे में बेटों पर होगा दायित्व
कभी नहीं रह पाती हैं वो आजाद 

लड़कियाँ
देती हैं अपना पूरा जीवन गुजार
पिता भाईयों पति और बेटों की
उपलब्धियों को ही अपना मान
शायद ही कभी होती है उनके पास
जमीन मकान या कोई संस्थान
जिसे कह सकती हों केवल अपना

लड़कियाँ
उनसे उम्मीद की जाती है हमेशा
दबी जबान में ही बातें करने की
नहीं कर सकती गुस्सा, लगा सकती ठहाके
एक ही भाव उचित माना जाता है उनका
हर छोटे दुख, विपदा तकलीफ पर
किसी पु्रूष के कंधे पर आंसू बहाना

लड़कियाँ
नहीं मानता हमारा यह समाज अभी भी
कि है उन्हें यह अधिकार विरोध जताने का 
लड़की होने के, घर से बाहर निकलने के
होटल जाकर खाने के, पसंदीदा कपड़े पहनने के
दिल की बात कहने के, पुरूष का प्रतियोगी होने के
कारण होते दैहिक छेड़छाड़ व अनाचार का

लड़कियाँ
बहुत ही मुश्किल है लड़की होना
आखिर तुम पैदा ही क्यों हुई लड़की
क्या जरूरत थी तुम्हें आवाज उठाने की
तुम भी तो चुप रह ही सकती हो
संस्कृतिवादियों की हाँ में हाँ मिलाती
शर्म-हया से आभूषित औरों की तरह


बस एक ही नुकसान होता तुमको
यह कविता कभी नहीं लिखी जाती... 
तुम पर... 
मेरे द्वारा...
कभी भी...






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चित्र साभार : गूगल इमेजे्ज


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शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

लाइट लो यार ... :)

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बड़ी अजीब चीज है यह सावन का महीना भी... जब तक मेघ बरसता है तो ठंडा-ठंडा कूल-कूल लगता है... पर जैसे ही बरसना रूका और धूप निकली तो... बाप रे बाप... कभी देखा है कि कितनी तेज होती है सावन की धूप... हवा बारिश से धुली हुई होती है, वातावरण में लेश मात्र भी धूल नहीं होती... कोई रूकावट या ठहराव नहीं धूप के रास्ते में... देहात में कहते हैं कि सावन की यही धूप तो हिरन के बच्चे तक को काला कर देती है... पर अपनी दिक्कत कुछ और ही है... एकाध घंटे इस धूप में गये नहीं कि पूरे सिर पर अनेकों छोटे छोटे खुजली करते दाने हो जाते हैं... और पिछले कई साल से इलाज भी सीधा सादा है वह है सर घुटवा देना... आज छुट्टी मिली थी मुझे, सिर घुटवा और चंपी करवा आया हूँ... खाना लगने वाला है मेज पर... बहुत दिनों से कुछ लिखा भी नहीं है ब्लॉग पर... सोच रहा हूँ कि कुछ तो लिख टाँग ही देता हूँ अपने भी जिंदा होने की सनद देते हुए...

आजकल टीवी बहुत देखता हूँ... ध्यान देकर कुछ नहीं देखता बस सुबह होते ही ऑन कर देता हूँ उसे... जितना समय घर में बिताता हूँ वह चलता ही रहता है...

बहुत कुछ घट रहा है दुनिया में, या फिर सब कुछ वैसा ही है पहले जैसा ही... कई दिन से चैनल वाले परेशान हैं सचिन की सौंवी सेंचुरी के लिये... एंकर ऐसे बिहेव करते हैं मानो दुनिया का भविष्य उसी पर टिका हो... सुबह सुबह ' जीवन का आधार ' चैनल पर बाबा युवक और युवतियों से देश सेवा के लिये जीवनदान देने की अपील करते हैं... वही बाबा, जो गिरफ्तारी देने पर गीदड़ की मौत मरने के भय से स्त्री वेश धारण कर बाहर जाने की फिराक में थे... आज सोचता हूँ कि यदि वे उस दिन बाहर जाने में कामयाब हो जाते और तीन चार दिन तक उनका पता ठिकाना न मिल पाता तो क्या कुछ घट जाता देश में... गाँधी टोपी धारी दूसरे नागरिक समाज के प्रतिनिधि अपनी बताई तारीख पर आमरण अनशन करने पर दॄढ़ हैं फिर से... पर ऐसा करने से पहले सुप्रीम कोर्ट से यह आश्वासन भी ले लेना चाह रहे हैं कि उनके खिलाफ कोई कारवायी न हो...

एक बंदा पकड़ा गया है अमेरिका में... जो आईएसआई से पैसे लेकर कश्मीरी अलगाववादियों के लिये लाबिईंग करता था... अपने यहाँ ऐसे न जाने कितने होंगे, हरदम गाल बजाते हुए... पर उनके खिलाफ कुछ नहीं होगा... इंग्लैंड में फोन हैकिंग के मामले में 'न्यूज ऑफ द वर्ल्ड ' अखबार बंद हो गया है, रूपर्ट मरडोक ने माफी माँगी है, कई कैरियर खत्म हुऐ हैं,  कई इस्तीफे हुऐ हैं... पर अपने यहाँ नीरा राडिया के टेपों में उजागर मीडिया के दलाल बदस्तूर अपने ऊँचे पायदानों पर टिके हुऐ हैं... मुंबई बम धमाकों के मास्टर माईंड की तलाश जारी है... कभी कभी तो लगता है कि ' वाईटल-क्लू ' देने का काम अपने चैनल वाले और दिग्विजय सिंह जैसे राजनीतिज्ञ कर रहे हैं...

आदर्श घोटाले के सारे कागज गायब हैं सभी जगहों से और जमीन को राज्य सरकार की बताया जा रहा है... लग रहा है इमारत फिर से खुलेगी और कोई रिटायर्ड सर्विस चीफ फीता काट कैमरों के सामने उद्घाटन करेगा उसका... नौएडा एक्सटेंशन के जमीन अधिग्रहण पर फैसले-दर-फैसले आते जा रहे हैं... किसान सरकार को कसूरवार बताते हैं... बिल्डर किसान को... सरकार कानूनों को... अपने को लगता है कि तीनों में से कोई कसूरवार नहीं है... कसूर तो जमीन का है... यह मगरूर जमीन दिल्ली के इतना नजदीक क्यों है ?

सरकार बचाने के लिये आर्थिक रूप से कमजोर विरोधी सांसदों को पैसे का लालच दे वोटिंग से बाहर रखने के मामले में संजय सक्सेना और सोहेल हिंदुस्तानी अंदर हैं... अमर सिंह जी से पूछताछ होगी... यह सब कोर्ट के कहने पर किया जा रहा है... पर एक बार फिर किसी का कोई कसूर नहीं है... कसूर तो उन नोटों के बंडलों का है जो गलत जगह खुदबखुद चले गये, और कैमरों से अपनी फोटो खिंचा ली...

टूजी घोटाले और कॉमनवेल्थ घोटाले के आरोपियों के दिन भी अच्छे ही कट रहे हैं तिहाड़ में... बेचारे जेलर साहब को खालीपीली अंडमान जाना पड़ गया... अब जल्दी ही उनकी पहले जमानत और फिर ससम्मान बरी होने का रास्ता भी खुल ही जायेगा... टॉप के लीगल ब्रेन लगे हैं इस काम में... वैसे भी उनका कसूर तो कोई है नहीं... कसूर तो खेलों का है... भाई जब खेल होंगे तो खेल होगा ही... इसी तरह कसूर स्पेक्ट्रम का भी है ही... गरीब देश का स्पैक्ट्रम गरीबों में से ही कुछ की गरीबी मिटाने के काम आ गया तो क्या गलत हो गया...

देखा आपने... लिखने को इतना सब कुछ है... पर नहीं लिखूंगा कुछ भी... खाना अच्छा बना है... हल्की हल्की नींद की खुमारी छा रही है मुझ पर... सोने जा रहा हूँ मैं...



कितना सही कहा गया है न  ?

किस-किस को याद कीजिए, किस-किसको रोइए 
आराम बड़ी चीज है, मुंह ढककर सोइए।


लाइट लो यार !!!
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बुधवार, 13 जुलाई 2011

क्या होती है आत्मा ?

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आध्यात्म, धर्म, कर्मफल, पुनर्जन्म, इहलोक-परलोक आदि आदि विषयों पर आपसी तर्क वितर्क के दौरान एक शब्द जो बार बार प्रयोग होता है वह है  ' आत्मा '....

आइये आज देखते हैं कि क्या है यह...

मोटे तौर पर देखें तो अमूमन हम लोग कई अलग अलग प्रयोजनों के लिये इसे प्रयोग करते हैं देखें यहाँ...

१- आत्मा = जीवन ,...
 यहाँ पर जीवित और मृत शरीर के बीच फर्क करने के लिये इस शब्द का प्रयोग किया जाता है यानि यदि प्राणी जीवित है तो उसके पास शरीर व आत्मा दोनों मौजूद हैं और यदि मृत है तो मात्र शरीर है... यहाँ पर आत्मा का अभिप्राय जीवित होने से है...

२- आत्मा = व्यक्ति या व्यक्तित्व,...
यहाँ पर किसी व्यक्ति को परिभाषित करने के लिये यह शब्द प्रयोग होता है... जैसे कि आप यह कह सकते हैं कि " यह ब्लॉग लेखक एक दुखी आत्मा है "... :)

३- आत्मा= किसी व्यक्ति की बुद्धि, अर्जित ज्ञान, विवेक, अनुभव, दया-करूणा-ईर्ष्या-ममता आदि भावनायें, जीवन मूल्य, जीवन लक्ष्य, धार्मिक-आध्यात्मिक विश्वास आदि आदि का निचोड़ व इस निचोड़ पर आधारित उस व्यक्ति की प्रतिक्रियायें...
यहाँ पर इस शब्द का प्रयोग कुछ इस तरह होता है... " एक झटके में लाखों कमाने का मौका था मेरे पास, पर मेरी आत्मा ने यह गवारा नहीं किया "

४- चौथा व सबसे जटिल व विवादास्पद प्रयोग है ' आत्मा ' के तौर पर किसी ऐसी चीज की कल्पना का जो यह कहें कि कथित रूप से वातावरण में मौजूद रहती हैं गर्भावस्था के दौरान शरीर में प्रवेश कर जाती हैं और मृत्यु के साथ शरीर से निकल जाती है दोबारा से जन्म, तुरंत फैसले, परमात्मा से मिलन या प्रलय के दिन होने वाले फैसले का इंतजार करने के लिये ( आपके धार्मिक विश्वासों के अनुसार )...

 मैं यहाँ पर उपरोक्त चौथे प्रयोग में वर्णित 'आत्मा' के शरीर से बाहर रहने व गर्भावस्था के दौरान बाहर से प्रवेश करने के बारे में कह रहा हूँ इसके कारण भी हैं मेरे पास... 
  • embryology  के हमारे ज्ञान के परिणाम स्वरूप हमें आज यह पता है कि गर्भधारण अण्डाणु के शुक्राण द्वारा निषेचन का परिणाम है।
  • मानव स्त्री अपने अंडाशयों में चालीस हजार से भी ज्यादा अंडाणुओं के साथ जन्म लेती है निश्चित तौर पर इतनी ' सुप्त आत्मायें ' नारी शरीर में पहले से मौजूद नहीं हो सकती।
  • रही बात पुरूष की, तो वीर्य में स्पर्म काउंट होती है अमूमन ८० से १२० मिलियन प्रति क्यूबिक मिमी०... एक मिली० में एक हजार क्यूबिक मिमी० होते हैं... और पुरूष के एक बार के वीर्यपात में मात्रा होती है तकरीबन ३ से ५ मिली०... कैलकुलेटर निकालिये और हिसाब लगाइये... निश्चित तौर पर इतने सारे शुक्राणुओं में भी ' सुप्त आत्मायें ' कपड़ों पर सूख जाने, वाशिंग मशीन में धुलने, नालियों में बह जाने या कूड़ेदान में फेंक दिये जाने मात्र के लिये मौजूद नहीं हो सकती...
उपरोक्त लिखे से यह जाहिर है कि नवजात के लिये आत्मा उसके पिता या माता के शरीर में से तो आती नहीं... अब मानने वाले यह तर्क देंगे कि वह बाहर से आती है... उसका स्वरूप कोई भी ठीक से नहीं बताता पर जो कुछ गोल मोल भाषा में बताया जाता है या पता चलता है वह है कि वह उर्जा या विचार स्वरूप सी है...

निशेचन से पहले अंडाणु या शुक्राणु भी लंबा जीवन जीने की क्षमता नहीं रखते, आदर्श परिस्थितियों में भी उनका जीवन काल कुछ ही दिनों का होता है पर दोनों के संयोग से बना भ्रूण गर्भाशय के अंदर खुद को बढ़ाने, पोषण माता से लेने व एक पूर्ण मानव शरीर में बदल जाने की क्षमता रखता है... इस क्षमता को यदि ' आत्मा ' कहा जाये तो शायद ही कोई विवाद होगा... मरने के बाद परिवेश से भोजन जल ग्रहण कर स्वयं को चलायमान-गतिमान-स्वस्थ रखने की इस क्षमता का अंत भी हो जाता है और शरीर सड़ने लग जाता है ।

परंतु विवाद तब पैदा होता है जब यह कहा जाने लगता है कि किसी व्यक्ति की बुद्धि, अर्जित ज्ञान, विवेक, अनुभव, दया-करूणा-ईर्ष्या-ममता आदि भावनायें, जीवन मूल्य, जीवन लक्ष्य, धार्मिक-आध्यात्मिक विश्वास, तथ्य और तर्कों के आधार पर निकाले उसके निष्कर्ष आदि सब बेकार हैं... वह तो किसी परमसत्ता की योजना का हिस्सा मात्र है... वह एक ऐसी आत्मा है जो अजर-अमर है... जो जीवन आज वह जी रहा है वह उसके पहले के किये का प्रतिफल है और जो इस जीवन में वह ' आत्मा' कर रही है उसके आधार पर भविष्य की उसकी यात्रा का निर्धारण होगा...

क्या यह संभव है...  बुद्धि, अर्जित ज्ञान, विवेक, अनुभव, दया-करूणा-ईर्ष्या-ममता आदि भावनायें, जीवन मूल्य, जीवन लक्ष्य, धार्मिक-आध्यात्मिक विश्वास, तथ्य और तर्कों के आधार पर निकाले उसके निष्कर्ष क्या ट्रान्सफर हो सकते हैं... वह भी कई जीवनकाल व विभिन्न प्राणि योनियों में लिये जन्मों के दौरान... मुझे इस पर यकीन नहीं...

मैं तो मानता हूँ कि गीता के श्लोक " नैनम् छिन्दन्ति शस्त्राणि, नैनम् दहति पावका ... में वर्णित आत्मा भी उपरोक्त वर्णित अजर अमर व केवल और केवल आवागमन के चक्र से पार पाने  के प्रयास में रत ' आत्मा ' न होकर ... किसी भी हाल में हार न मानने वाली शाश्वत HUMAN WILL है और यह श्लोक उसी का उत्सव है !

क्या आप मुझसे सहमत हैं ?






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चित्र साभार : गूगल इमेजेज्



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मंगलवार, 5 जुलाई 2011

माननीय मंत्री जी ने तो विकसित विश्व से आयातित बीमारी कह दिया, पर क्या यह मुद्दा इतना आसान है ?

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 भारतीय स्वास्थ्य मंत्री जनाब गुलाम नबी आजाद, जो निश्चित तौर पर वर्तमान केंद्रीय सरकार के बेहतर कामकाज करने वाले मंत्रियों में गिने जाते हैं ने एच आई वी/ एड्स पर हो रही एक गोष्ठी के दौरान यह बयान (लिंक) देकर हलचल सी मचा दी है...

आईये देखते हैं कि क्या कहा माननीय मंत्री महोदय ने...


"The disease of Men Having Sex With Men (MSM), which was found more in the developed world, has now unfortunately come to our country and there is a substantial number of such people in India," Azad said at a convention on HIV/AIDS at Vigyan Bhawan in Delhi.

"Even though it (homosexuality among men) is unnatural, it exists in our country and is now fast spreading, making it tough for its detection. With relationships changing, men are having sex with men now. Though it is easy to find women sex workers and educate them on sex, it is a challenge to find MSMs," he said.



जैसा कि अपेक्षित था भारतीय LGBT समुदाय(लिंक)  जो दावा करता है कि,

Over 30 million Indians identify as lesbian, gay, bisexual, and transgender citizens. Time for more equality?

और जिसका फेसबुक पेज (लिंक)  यह है की ओर से बहुत ही तीखी प्रतिक्रिया (लिंक) आई है...

"The statement is completely outrageous. For someone who is qualified enough to be the country's health minister, it is surprising that he has not been through the World Health Organization's guidelines in which homosexuality was taken off the list of diseases a few years ago. Homosexuality is very much a part of nature and even finds references in religious texts. To call it unnatural is absurd. The case is about to open in the Supreme Court shortly and this will just add to the controversy," said Mohnish Kabir Malhotra, publicist and queer rights activist.

Malhotra added that barely 15 days ago, the United Nations had passed a bill in which discrimination on basis of gender and sexuality was a violation of human rights. "He should apologise to the community for such a frivolous statement."  

तो जैसा मुझे समझ आ रहा है वह यह है, कि भारतीय समाज के ही तीन करोड़ नागरिकों के लिये मंत्री जी का यह बयान असंवेदनशील है ... यह कुछ कुछ बाबा रामदेव जी के उस बयान सा है जिसमें उन्होंने कहा था कि समलैंगिकता एक बीमारी है तथा योग-प्राणायाम व आयुर्वेद के जरिये इस का इलाज किया जा सकता है...

जहाँ तक मेरा सवाल है इस मुद्दे पर मैंने अपनी पोस्ट-तलवारें खिंच गई हैं होमोसेक्सुअलिटी के मुद्दे पर फिर से एक बार . . . . . . किस ओर खड़े हैं आप?  पर चर्चा की थी, आज मैं मानता हूँ कि मेरी तब की समझ सही नहीं थी...

अपनी ही दूसरी पोस्ट जब उसने मोहब्बत की थी एक मर्द के साथ, तो शादी किसी औरत से क्यों करे ?.  से लिखा एक बार यहाँ दोहराना चाहूँगा...

आज मैं मानता हूँ कि LGBT समुदाय को समाज से बेहतर समझ की जरूरत है, मुझे यह मानने में कोई हिचक नहीं कि मेरा उनको Pervert लिखना गलत था और हमारे आज के समाज को इस समुदाय के लिये और ज्यादा इन्क्लुसिव होना चाहिये...


आप बताइये कि इस मुद्दे पर आज कहाँ खड़े हैं आप ? और क्या भारत के स्वास्थ्य मंत्री को ऐसा कहना चाहिये था ?



 आभार!



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अपडेट :-
चारों तरफ से पड़ते दबाव व होती आलोचना के चलते माननीय स्वास्थ्य मंत्री जनाब गुलाम नबी आजाद ने अपना स्पष्टीकरण जारी कर दिया है...

देखिये ट्रिब्यून की खबर...

हिन्दुस्तान टाइम्स में भी देखिये...



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