शुक्रवार, 24 जून 2011

" बाप बड़ा न भैय्या, सबसे बड़ा रूपैय्या ! " ...छोटी होती, सिकुड़ती हमारी यह दुनिया...समस्या की जड़ें किसी भी अनुमान से ज्यादा गहरी हैं !

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यह मुद्दा वाकई बहुत ही गंभीर है, पर न जाने क्यों इस पर कुछ भी लिखने या कहने से पहले एक चीनी (या जापानी ?) लघुकथा जिसे बहुत पहले शायद बचपन में पढ़ा था, याद आ रही है...

कथा कुछ यों है... झेल ही लीजिये...

'एक गाँव में एक परिवार रहता था परिवार में कुल जमा चार लोग थे युवा पति-पत्नि, उनका दस साल का बेटा और पति का बुजुर्ग बाप... पति-पत्नि थोड़े खुदगर्ज किस्म के थे... बजुर्ग पिता अक्सर बीमार रहता था, और बेटे-बहू को उसकी देखभाल व इलाज में समय व पैसा खर्च करना कतई पसंद नहीं था... हाँ दस साल के उनके बेटे के लिये उसके दादा उसके सबसे अच्छे दोस्त थे... एक दिन रात को बेटा-बहू योजना बनाते हैं कि यह बुढ्ढा तो किसी काम का है नहीं, खर्चा अलग से करवाता है, इसलिये सुबह-सुबह बेटा अपने बूढ़े बाप को एक बोरे में ले जाकर पहाड़ की चोटी में एक गढ्ढे में दफन कर आयेगा... पोता इस योजना को सुन लेता है...


सुबह होती है, बेटा अपने बूढ़े बाप को लेकर चल पड़ता है पहाड़ की चोटी की ओर... चोटी पर पहुंच बोरे को एक तरफ रखता है, थोड़ा सुस्ताता है और फिर गढ्ढा खोदना शुरू करता है... कुछ ही देर में वह अनुभव करता है कि खोदने के लिये वह कुदाल तो एक बार चलाता है पर आवाजें दो बार आतीं हैं... वह हैरान-परेशान, फिर एक बार कुदाल चलाता है फिर वही होता है... वह अपने चारों तरफ देखता है तो पाता है कि थोड़ा सा नीचे एक झाड़ी के पीछे उसका दस साल का बेटा भी एक गढ्ढा खोद रहा है...


आगबबूला हो वह अपने बेटे से उस गढ्ढे को खोदने का कारण पूछता है तो दस साल का वह बच्चा कहता है कि " हे पिता, मैं तो आपका ही अनुकरण कर रहा हूँ... एक न एक दिन तो आप भी बूढ़े होंगे ही... मैंने सोचा तब के लिये गढ्ढा अभी से तैयार कर लूं "


इतना सुनते ही वह युवा अपने बुजुर्ग बाप तथा दस साल के बेटे से लिपट कर जार-जार रोता है, अपनी गल्तियों की क्षमा माँगता है...दादा-बेटा-पोता, तीनों एक दूसरे का हाथ थाम हंसते-मुस्कुराते घर लौटते हैं... और उस दिन के बाद से वह घर कभी खत्म न होने वाली खुशियों से भर जाता है...'


यह कहानी तो सुखांत रही परंतु हमारे समाज में कई परिवारों के बुजुर्ग इतने खुशकिस्मत नहीं होते... आर्थिक उदारीकरण व निजीकरण से उपजे उपभोक्तावाद, भौतिकवाद ने जन्मी पैसे और ऐशो आराम को येन केन प्रकारेण कमाने व बढ़ाने की अंधी दौड़ ने केवल भारत को भ्रष्ट ही नहीं किया, परिवार नाम की संस्था पर भी चोट की है... बहुत छोटी होती जा रही है आज हमारी दुनिया... केवल अपनी पत्नी या पति और अपने बच्चों तक सीमित... हमारे बुजुर्ग हमको एक अनावश्यक बोझ से लगने लगे हैं जिनकी देखभाल में पैसा व समय लगाना हम में से बहुतों को व्यर्थ लगने लगा है...

एक अर्सा पहले इस प्रवृत्ति पर एक सत्य घटना को आधार बनाते हुऐ एक पोस्ट " बरसी ! " भी लिखी थी मैंने, समय हो तो देखियेगा...

भारत का हमारा यह आज का समाज परिवार के बच्चों, खासकर बेटों से अपेक्षा रखता है कि वह परिवार के बुजुर्गों का ध्यान रखे... अपवादों को यदि छोड़ दें तो अधिकाँश मामलों में खुद माँ-बाप भी अपनी बेटियों से यह अपेक्षा नहीं रखते... इस अपेक्षा के पीछे कोई 'वाद' नहीं है अपितु यह ठोस तथ्य है कि विवाहित बेटी के ऊपर उसके सास-ससुर की जिम्मेदारियाँ पहले से ही हैं... कुछ मामलों में जहाँ परिवार में बेटियाँ ही हैं बेटा नहीं वहाँ पर आर्थिक रूप से समर्थ बेटियाँ यह दायित्व निभा भी रही हैं...

एक समाज के तौर पर हमारे देश और खास तौर से हमारे मध्यवर्ग ( जो इस ब्लॉग का पाठक भी है ) के लिये यह इतिहास का सबसे अच्छा दौर है... जब वह अच्छा कमा रहा है...अच्छे साफ-सुथरे मकानों में रहता है... उसके पास निजी परिवहन का साधन भी है... टीवी, फोन व इंटरनेट के माध्यम से वह पूरे देश-दुनिया से जुड़ा हुआ भी है... उसके बच्चों के पास ढेर सी कैरियर-च्वाइस मौजूद हैं... बहुत बड़े पैमाने पर वह देश-दुनिया में घूमने व आनंद मनाने के लिये टूरिस्ट बन जा भी रहा है... उसके परिधान, उसके सौंदर्य साधन अंतर्राष्ट्रीय स्तर के हैं... तो फिर क्या वजह है कि इस वर्ग को अपने बुजुर्ग बोझ से लगने लगे हैं...

मैं जब अपने इर्द गिर्द देखता हूँ तो पाता हूँ कि हर तीसरा शख्स अपनी पत्नी के इस दबाव का सामना कर रहा है कि वह केवल और केवल अपने बीबी-बच्चों के हितों व भविष्य के बारे में सोचे तथा अपने माता-पिता व भाई-बहिनों के बारे में एक ' लिमिट ' (?) तक ही कुछ करने की सोचे... यह भी एक नंगा सत्य है कि अधिकतर परिवारों में जब तक बेटे अविवाहित रहते हैं परिवार हंसीखुशी मिलजुल कर बड़ी से बड़ी स्थिति का सामना करता रहता है... परंतु परिवार में किसी भी बेटे के विवाह के साथ ही विखंडन की प्रक्रिया ब बुजुर्गों की बेकदरी की शुरूआत हो जाती है...

मेरे एक बेहद ही हंसमुख, खुशमिजाज व मुंहफट बुजुर्ग मुस्लिम दोस्त हैं... अक्सर मुझसे कहते हैं... " यार, किसी 'घर' में रहने वाले सौ भीम भी यदि चौबीसों घंटे गदा प्रहार करते रहें तो भी किसी 'घर' का पलस्तर भी नहीं उखड़ेगा पर यदि उसी 'घर' की कोई महिला सुई की नोंक से कुरेदना शुरू कर दे तो 'घर' को नेस्तनाबूद होते चंद दिन भी नहीं लगते ! " मैं यद्मपि उनके इस कथन को ग्रॉस जेनरलाइजेशन मान खारिज करता हूँ फिर भी यहाँ दे रहा हूँ ताकि बहस में यह भी शामिल रहे... और आप भी इस पर कुछ कहें...

एक लिंक जिसका जिक्र वाणी जी ने रचना जी को श्रेय देते हुऐ और बख्श दो इन बुजुर्गों को ! कहते हुऐ (यहाँ पर) किया है...

कहता है:-

सौ फीसदी सर्वे में भाग लेने वाले बुजुर्गों ने कहा कि उनकी ' बहुऐं ' उन्हें सबसे ज्यादा प्रताड़ित करती हैं। ( लिंक )

आइये पता लगायें कि एक समाज के तौर पर हम कहाँ गलती कर रहे हैं...
  • आप चाहे आज की फिल्में देखें या टेलीविजन सीरियल या रीएल्टी शो... हम लोग एक ऐसे जोड़े के स्टीरियो टाइप को बढ़ावा दे रहे हैं जो चिरयुवा है हमेशा युवा ही दिखना चाहता है... अपना कमाया अपने पर ही और अपने एकाध बच्चों पर ही खर्च करना चाहता है... और बुजुर्गों को अपनी मंजिल पाने की राह में एक अड़चन के तौर पर देखता है।
  • नई कार, बढ़ा घर, नये किचन एप्लायन्स, एक्जॉटिक थीम पार्टी, एक्जॉटिक फॉरेन वेकेशन्स, डिजाइनर कपडों को ही दुनिया को अपने ' अराइव ' करने की घोषणा करने का जरिया मानने वाला एक वर्ग हमारे देश में पैदा हो गया है जिसके लिये अपने बुजुर्गों की देखभाल व उनका ख्याल रखना लक्ष्य से हटने सा हो गया है।
  • अपने बेटों को तो हम में से कुछ लोग ' श्रवण कुमार ' सा बनने की आस लिये पाल रहे हैं पर हमारे अपने ही घर में बुजुर्ग उपेक्षित जिंदगी जी रहे हैं...  हम यह क्यों नहीं सोचते कि वह अनुसरण तो हमारा ही करेगा।
  • उपभोक्तावाद व भौतिकवाद ने एक पूरी की पूरी पीढ़ी की लड़कियों ( यही तो कल बहुऐं बनेंगी ) को एक ऐसे घर की कल्पना दे दी है जिसमें सिर्फ उसका पति हो और दोनों के हमउम्र दोस्त... इस सुंदर व युवा दुनिया में किसी असुंदर, बीमार व उम्रदराज के लिये जगह नहीं बची ।
  • वानप्रस्थ व सन्यास आश्रम की पुरातन जीवन व्यवस्था और माया मोह को त्याग प्रभु नाम लेने में ही मुक्ति मिलने के धर्मगुरुओं के प्रवचनों (?) के प्रभाव में आ कई बुजुर्ग तो खुद ही अपनी आर्थिक स्वतंत्रता का त्याग कर अपनी नई पीढ़ी के ऊपर निर्भर हो बेकदरी का शिकार हो जाते हैं।
  • उदारीकरण के बाद पैदा हुए नये अमीरों द्वारा अपनी दौलत के बेशर्म व नंगा प्रदर्शन से हमारे अखबार, पत्रिकायें व टीवी चैनल अटे पड़े हैं... यह लोग समाज के एक वर्ग के नायक से भी बन गये हैं... अपने इन  ' नायकों '  के लाईफ स्टाइल की नकल करने की आकाँक्षा लिये इस नई पीढ़ी का मॉटो है " बाप बड़ा न भैय्या, सबसे बड़ा रूपैय्या ! "

शायद पहली बार कोई निराशावादी बात कर रहा हूँ, बुरा न मानियेगा... पर जल्दी में ही तो इस समस्या का कोई हल मुझे दिखता नहीं... तब तक के लिये तो बाप-माँ-भैय्या-बहन को रूपैय्ये से छोटा स्थान ही मिलता नजर आ रहा है मुझे... हमीं में से कुछ के द्वारा... :(


अपनी आप बताइये...




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आलेख जो मेरी इस पोस्ट की प्रेरणा बने...

१- अनवरत : मेरा सिर शर्म से झुका हुआ है
२- नारी : संयुक्त परिवार में बुजुर्ग महिलाओं की स्थिति ...
३- ज्ञानवाणी : बख्श दो इन बुजुर्गों को .....
४- अनवरत : कैसी होगी नई आजादी ?
५- इडियन होम मेकर : बहुऐं हैं जिम्मेदार प्रताड़ना की !



जरा हट कर एक दूसरे कोण से भी देखिये मुद्दे को  :-

नारी : क्या बुजुर्गों की कोई गलती नहीं होती कभी भी ?  साभार रचना जी ...





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22 टिप्‍पणियां:

  1. http://indianwomanhasarrived.blogspot.com/2011/06/blog-post_24.html


    is link ko bhi jod lae

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    @ रचना जी,

    आपका दिया लिंक सामयिक है, मेरे पाठकों व खुद मुझे भी मुद्दे का एक दूसरा कोण दिखाता है, लगा दिया है...

    आभार आपका !




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  3. सबसे पहले तो अपनी तसल्ली की बात कर लूं ..हम तो मान ही बैठे थी की आपने हमारी पोस्ट पढना ही बंद कर दिया है ....पढ़ते हैं आप , ज्ञात हुआ ....

    बहुत अच्छे निष्कर्ष निकले है आपने ... बुजुर्गों की दुर्दशा का एक बड़ा कारण भौतिकता को समर्पित हमारी जीवन शैली ही है ..

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  4. बिल्कुल सही बात कही है वाकई स्थिति चिंता जनक है|

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  5. प्रवीण
    जो लिंक मैने वाणी को दिया और जिसका उल्लेख आप ने यहाँ किया हैं उस लिंक पर चल रही बहस और हिंदी ब्लॉग जगत में होती बहस का अंतर बहुत स्पष्ट हैं वहाँ लोग खुल कर अपने विचार कहते हैं एक दूसरे पर बिना व्यकितगत टंच कैसे .
    वहाँ की महिला और हिंदी ब्लॉग जगत की महिला की सोच का अंतर भी बहुत स्पष्ट हैं और उसकी वजह से समस्या पर बहस और निदान इत्यादि का फरक भी साफ़ दिखेगा
    वहाँ भी माध्यम वर्ग हैं और काफी होम मेकर हैं वहाँ पर उनकी सोच और हिंदी ब्लॉग जगत की होम मकर की सोच में बहुत अंतर हैं
    यहाँ आप को शायद ही कोई महिला खुल कर बहस करती मिलेगी और सब इस विषय पर गलती नयी पीढ़ी की ही कहेगी क्यूंकि कहीं ना कहीं अगर वो ऐसा नहीं कहेगी तो वो दूसरो को नहीं खुद को भी गलत लगेगी .

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  6. जो लिंक नारी ब्लॉग , सुमन की पोस्ट का मैने आप को दिया हैं वैसे बहुत सी कहानियाँ समाज में बिखरी हैं . मेरी माताजी और सुमन दोनों रेकी संस्था से जुड़े हैं और उनके पास रोज एक ना एक बहू जो ससुराल में प्रतारित हैं आती हैं .

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  7. इस स्थिति का एक पक्ष और हैं
    हर बुजुर्ग असहाय होता हैं उम्र के इस मुकाम पर लेकिन समस्या इस मुकाम पर नहीं शुरू होती हैं समस्या शुरू होती है

    हमारे यहाँ माँ पिता बच्चो को जनम देने के कारण उनको अपनी जागीर की तरह मानते हैं . इस कारण से वो अपने "अधिकार " कभी छोडते ही नहीं जब तक बढ़ती उम्र की असह्यता उनसे ये नहीं करवाती हैं .

    अगर एक स्त्री का विवाह १८ वर्ष की आयु में हो जाए और १९ वर्ष में वो माँ बनजाये तो जब वो ४४ साल की होगी तो वो सास बनने की तयारी में होगी यानी उसका बेटा २५ साल का होगा और एक २३ साल के आस पास की लड़की उसके घर आ रही होगी .

    ४४ साल की सास ना तो बूढी हैं ना जवान और उसकी नज़र में २३ साल की बहू को कुछ नहीं आता . सो आज भी बहुत से परिवारों में ये सास अपने अधिकार में सब कुछ रखती हैं जबकि बहू को क्युकी अब उसकी शादी हो गयी हैं इस लिये अपना घर चाहिये अपना अधिकार चाहिये जहा वो "निर्णय " ले सके .
    ४४ साल से सास ५४ की होती हैं तो बहू ३३ की पर अभी भी बहू - बेटा "छोटे " ही रहते क्यकी अभी सास सक्षम हैं और इस वजह से बहू और बेटा या तो अलग हो जाते हैं या उसी घर में कलह का कारन बनता है
    ६४ साल की सास की बहू ४४ साल की होती हैं लेकिन फिर भी "ना समझ " रहती हैं जबकि वही सास जब ४४ साल की थी तो इतनी सक्षम थी की अपने घर में २३ साल की लड़की को बहू बना कर ले आये थी
    ७४ साल की सास की बहू ५४ साल की होती हैं और तब तक सास अशक्त होती हैं तब उसको लगता हैं अब कोई अधिकार उसके पास नहीं रह गया वही ५४ साल की बहू को लगता हैं की वो कितना करे और कब तक

    क्रम जारी रहता
    ना जाने कितने घरो में बहू को इस लायक भी नहीं समझा जाता की वो अपने घर में मैड रख कर काम करवा सके . उसके लिये भी सास से पूछना पड़ता हैं .
    धीरे धीर बहू -बेटा घर से जुडने की जगह अलग होने का सोचने लगते हैं

    जिस समय बच्चे १८ वर्ष के हो जाए उस समय के बाद उनके निर्णय का सम्मान होना चाहिये
    शादी के बाद उनकी घर गिरहस्ती उनके निर्णय से चलनी चाहिये अगर बहू वोर्किंग हैं तो ये उस का और उसके पति का निर्णय हो की उनके बच्चे कैसे और कहां रहे .
    संयुक्त परिवार हो तो भी निर्णय लेने का अधिकार घर के बड़ो के हाथ में नहीं हर दपत्ति का अपना होना चाहिये
    और सबसे जरुरी बात हैं की हम सब को अपने बुढापे के बारे में सोचना चाहिये और अपनी संतान को उसके अधिकार सौप कर उसकी जिंदगी में दखल बंद कर देनी चाहिये

    अशक्त माता पिता को सहारा देना बच्चे तब सीखेगे जब आप उनको "निर्णय " लेने देगे . बच्चे सम्पत्ति नहीं होते हैं बच्चे को कर्तव्य और अधिकार उनको बताने पड़ते हैं सीखने पड़ते हैं लेकिन १८ वर्ष की उम्र तक ही क्युकी उसके बाद वो "बालिग " हैं अपने निर्णय लेने के लिये .
    ये कहना की नयी पीढ़ी लापरवाह गलत हैं क्युकी उसको ये थाती हमने दी हैं
    मै ओल्ड एज होम केवल उनलोगों के लिये सही मानती हूँ जिनकी अपनी कोई आय और सम्पत्ति नहीं हैं
    मेरी इस पोस्ट से सहमति हैं लेकिन निदान से नहीं , निदान के लिये हमको अपने पारिवारिक ढांचों में बदलाव लाना होगा , हम को अपनी सोच में बदलाव लाना होगा . बच्चो पर अधिकार छोड़ना होगा .
    इसके अलावा जिन लोगो के पास पैसा हैं और उनको बुढ़ापे में किसी के साथ की जरुरत हैं और उनके बच्चो के पास समय नहीं हैं तो उनको अपने लिये ऐसे लोग खोजने होगे जो पैसा लेकर उनके साथ २४ घंटे रहे .
    हम को ये सोच बदलनी होगी की क्युकी बच्चे हमारी सम्पत्ति के उत्तराधिकारी हैं तो हम उनकी "ज़िम्मेदारी " हैं .

    and i dont agree that more money is responsible for all this

    having money and still living like we used to live before we had money is cause

    having more money should solve problems and its because older people have money now they can think of different options rather than looking upto their children

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  8. ह्यूमेन वैल्यूज़ के प्रति नजरिया तेजी से बदला है। पर इतना भी तेज नहीं की एक पीढ़ी में 180 डिग्री बदल गया हो। एक पीढ़ी ने पिछली के लिये कब्र खोदनी शुरू की पर दफन नहीं किया। अगली पीढ़ी ने कब्र कुछ और गहरी और चौड़ी की। आगे की पीढ़ी दफन करने लगी।
    लिहाजा एक पीढ़ी को अपराधी नहीं मानता मैं।
    अगर मैं जवान होता तो समाधान सोचता। अब मैं ऐसी दशा में हूं कि मेरा वानप्रस्थ आश्रम कैसे ठीक कटे, उसकी फिक्र ज्यादा है बनिस्पत समाज बदलने के! :)
    मेरे माता-पिता मेरे साथ रहते हैं और मैं उनको (अपनी सीमाओं में) कम्फर्टेबल रखने की कोशिश करता रहता हूं!

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  9. http://mansooralihashmi.blogspot.com/2011/06/reincarnation.html

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  10. यह केवल बुजुर्गों का ही मुद्द्आ नहीं। संपूर्ण परिवार का मामला है। इस पर गंभीरता से विचार आवश्यक है।

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  11. आप और रचना और वाणी ने तो सभी कुछ कह ही दिया -सिक्के के दोनों पहलुओं पर -
    अब हमारे लिए बचा क्या मान्यवर?
    हाँ यही सही है -सबसे बड़ा रुपैया !

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  12. यकीनन आपकी अब तक की सबसे बेहतरीन पोस्ट है ये.......बधाई स्वीकार करें !

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  13. आखिर अपना गड्ढा किसी को क्यों नहीं दिखता है।

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  14. वास्तव में यह ऐसी समस्या है जिसके लिये कहा जा सकता है कि घर-घर मिट्टी के यही चुल्हे हैं । इसी मुद्दे पर मेरी भी एक पोस्ट यदि आप चाहें तो मेरे ब्लाग जिन्दगी के रंग पर अपनी-अपनी बारी पोस्ट भी अवश्य देखें-

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  15. काफी कुछ कहा जा चुका है यहाँ....दिए गए लिंक पर भी बढ़िया विमर्श हुआ...
    पर जैसा कि शीर्षक है...आर्थिक स्थिति भी बहुत अहमियत रखती है....

    "नई कार, बढ़ा घर, नये किचन एप्लायन्स, एक्जॉटिक थीम पार्टी, एक्जॉटिक फॉरेन वेकेशन्स, डिजाइनर कपडों को ही दुनिया को अपने ' अराइव ' करने की घोषणा करने का जरिया मानने वाला एक वर्ग हमारे देश में पैदा हो गया है जिसके लिये अपने बुजुर्गों की देखभाल व उनका ख्याल रखना लक्ष्य से हटने सा हो गया है।"

    इस वर्ग के लोग बुजुर्गों को स्नेह-प्यार-आदर ना दें.....पर उनकी सुख-सुविधा का ख्याल रखते हैं...क्यूंकि नौकर-चाकर हते हैं...बड़ा सा घर होता है...एक बुजुर्ग की मौजूदगी...उनकी जीवन-शैली में कोई खलल नहीं डालती.

    मुश्किल मध्यम वर्ग के लिए है...जहाँ...छोटे से घर में..सीमित बजट में बूढ़े,माता-पिता को एडजस्ट करना होता है...ये लोग ये जरूर भूल जाते हैं कि माता-पिता ने अपनी किन-किन खुशियों का त्याग कर उन्हें बड़ा किया...या एक दिन यही हालात उनके साथ ही होनेवाला है...

    बुजुर्गों को अपने पैसे पर अपना अधिकार कभी नहीं त्यागना चाहिए. जहाँ तक हो ,सके किसी पर निर्भर ना रहें...और ये उम्मीद भी ना रखें कि पहले की तरह..पोते-पोतियाँ कहानी सुनेंगे या बहू-बेटे हर निर्णय में उनका मशवरा लेंगे ....एडजस्टमेंट दोनों तरफ से होनी चाहिए.

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  16. बुजुर्गों की दुर्दशा का एक बड़ा कारण भौतिकता को समर्पित हमारी जीवन शैली ही है|

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  17. मुझे लगता है की घर के बुजुर्गो की यह दशा किसी के पक्ष के कारण नहीं है जिम्मेदार दोनों ही पक्ष है और कारण आज अचानक उभर के सामने नहीं आये है बल्कि पिछले २५-३० साल से यह पटकथा लिखी जा रही है अब तो उस उसका परिणाम सामने आ रहा है | पिछली पीढ़ी ने अपने बच्चो को साथ रहने के संस्कार नहीं दिया, बच्चो ने माँ बाप को अपने जीवन में आगे बढ़ने के बाधा के रूप में देखा , लड़कियों के मन में बचपन से ही सास ससुर ससुराल वालो के नाम पर खूब खौफ भर दिया गया इसमे हमारे बचपने से हो रही दहेज हत्याए भी एक बड़ा कारण थी , आज के बुजुर्ग जिन्होंने संयुक्त परिवार की जगह एकल परिवारों का निर्माण कारण शुरू किया किन्तु कही न कही वो खुद आज संयुक्त परिवार बनाये रखने की जिद्द पर अड़े रहते है , तो कही पर खुद को समय के अनुसार ढालते नहीं है , जैसे कई कारण है | पर सभी विचार विमर्स करने वालो बस इतना ही कहना है की समय के साथ समाज में काफी बदलाव आता है हम समय को पकड़ कर रोक नहीं सकते है अच्छा होगा की सभी को समय के अनुसार बदलते रहना चाहिए तभी वो समाज के साथ अपने बच्चो के साथ तारतम्यता बना सकते है और हमारा जमाना ही बेहतर था आज की युवा पीढ़ी बेकार है जैसे जुमले से समस्या का हल कभी नहीं निकलेगा |

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  18. इस विषय पर मैं दिमाग से नहीं दिल से ही प्रतिक्रिया देता हूँ. बहुत से बढ़िया लिंक देखे और ताजा स्थिति का पता चला. इस विषय पर अपनी बेहतरीन कलम चलाने के लिए आपका धन्यवाद.

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  19. बहुत कुछ मिल गया पढने को अब इतना कुछ पढता है, पढ़ कर आता हूँ apni राय देने ...वैसे अभी तक जितना पढ़ा है उससे तो यही पता है की
    money is everything,
    but everything is not money....

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  20. प्रवीण जी,
    समसामयिक विषय है और मेरा मानना है कि हम सबकी मानसिकता के पीछे परिवेश के अलावा अपने या अपनों के अनुभव होते हैं। ऐसे मामलों में कोई थम्बरूल नहीं हो सकता। बैंक में काम करता हूँ, चाहे अनचाहे ग्राहकों की आर्थिक स्थिति का पता चल जाता है और हर वर्ग में हर तरह के केस मालूम चलते रहते हैं। यही वजह है कि सभी सुधीजनों के कमेंट सही लग रहे हैं। ऐसी ही मौखिक बातचीत के दौरान एक व्यक्ति ने कहा, "जिसकी गाड़ी उलट जाये, वही अनाड़ी कहलाता है।" अपने को उसकी बात भी सही लगी।
    निर्भरता वाला फ़ैक्टर कम महत्वपूर्ण नहीं है। हमारे एक अधीनस्थ कर्मचारी रिटायर होने के दो तीन महीने बाद ही परलोकगमन कर गये। पेंशन रूल्स नये नये बने थे और पेंशन सैंक्शन होकर आई नहीं थी। जिन स्टाफ़ सदस्यों ने पेंशन नहीं ऑप्ट की थी, उन्होंने मृतक की पत्नी को काफ़ी कुछ भड़काया कि यूनियन वालों ने बहकावे में आकर पेंशन अप्लाई करवा दी, इससे तो डबल पी.एफ़. अच्छा था। इस बीच मेरा ट्रांसफ़र दूसरी जगह हो गया। छह साल के बाद फ़िर उसी ब्रांच में पहुँचा और सिर झुकाये काम कर रहा था तो उन स्टाफ़ की धर्मपत्नी आईं, उन्होंने मुझे पहचान लिया और बात करने लगीं। एक ही बेटा था, जो तब तक सरकारी नौकरी लग चुका था। जाते समय अपने अप्ति के बारे में कह गईं, "वो जाते जाते ये काम बहुत अच्छा कर गये कि पेंशन चुन ली, मुझे किसी की तरफ़ हाथ नहीं पसारना पड़ता।"
    सहमति हो या असहमति, संतुलित विविध विचार देखना अच्छा लग रहा है।

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  21. आज इस कृतघ्न संसार में अगर मानवता को जीवित रखना है तो हमें सीखना होगा कि जो व्यवहार हमें खराब लगता है वह दूसरों से न करें !

    ऐसे आलेख बहुत आवश्यक हैं इन नमकहरामों की आँखें खोलने के लिए ....
    शुभकामनायें प्रवीण भाई !

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  22. ये कहानी मैंने भी कई बार सुनी है। पर अफसोस लोग भौतिकता में इस तरह उलझे हुए हैं कि वे इस तरह की बातों को बेमतलब का मानते हैं।

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    तांत्रिक शल्‍य चिकित्‍सा!
    …ये ब्‍लॉगिंग की ताकत है...।

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