शनिवार, 18 जून 2011

बाप रे इतने सारे नंबर ! क्या होगा बेचारे यूपी वालों का ?

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दिल्ली विश्वविद्मालय के कॉलेजों में एडमिशन के लिये पहली कट ऑफ लिस्ट जारी हुई है... हमेशा की तरह कट ऑफ काफी ऊँचा गया है... परंतु श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के नॉन कॉमर्स विद्मार्थियों के लिये १०० % के कटऑफ की इस खबर (लिंक) ने सभी को सोचने पर मजबूर सा कर दिया है यहाँ तक कि स्वयं केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री श्री कपिल सिब्बल ने इस कटऑफ को अतार्किक या नासमझी भरा (लिंक) कहा है...

अस्सी के दशक के प्रथमार्ध में मैंने तब के अविभाजित उत्तर प्रदेश के 'यूपी बोर्ड' से जब हाईस्कूल व इंटरमीडिएट (१०+२) किया था तब यदि आप किसी विषय में ७५% स्कोर करते थे तो उस विषय में डिस्टिंक्शन यानी विशेष योग्यता मानी जाती थी... कुल अंकों का ७५% पाने वाला प्रथम श्रेणी -सम्मान सहित {First Honours } उत्तीर्ण माना जाता था... और ५५% से ६०% अंक पाने वाले छात्र अपने को गुड-सेकंड डिवीजन में पास कह इतराते फिरते थे... उस दौर में खास तौर पर यूपी बोर्ड का परिणाम यदि ४०-५०% आता था तो उसे बहुत ही अच्छा कहते थे... उस दौर में भी सीबीएसई और आइसीएसई के अधिकतर अच्छे छात्रों के अंक ८०% के आसपास या उससे ज्यादा होते थे जबकि यूपीबोर्ड के स्टेट टॉपर ८०-८२ % अंक पाते थे...

आज हालत यह है कि मेरा कोई परिचित बच्चा यदि बताता है कि उसके ७५% अंक आये हैं तो मैं खुलकर बधाई भी नहीं दे पाता यह सोचकर कि वह बुरा न मान जाये क्योंकि ८५% से कम अंकों को बहुत ही खराब परफार्मेंस माना जाने लगा है... केंद्रीय व राज्यों के बोर्ड अधिक से अधिक छात्रों को पास करने व उनको अधिक से अधिक अंक प्रदान करने को अपनी सफलता का पैमाना मानने लगे हैं... फिर भी कुछ चीजें धीरे-धीरे ही बदलती हैं जैसे कि यूपी बोर्ड में ९५% एग्रीगेट अंक आज भी शायद ही कोई पा पाया होगा...

इसका सीधा सा अर्थ यह भी है कि दिल्ली विश्वविद्मालय के अधिकतर प्रतिष्ठित कॉलेजों में यूपी बोर्ड से इंटरमीडिएट पास शायद ही कोई छात्र होगा... कुछ ऐसा ही हाल अधिकतर राज्य बोर्डों से पास छात्रों का होगा... क्या इसका अर्थ यह है कि केंद्रीय बोर्डों से पास छात्र मुल्क के अन्य बोर्डों से पास छात्रों की तुलना में अधिक क्षमतावान हैं... यह परसेंटेज तो ऐसा ही बताते हैं पर हकीकत में ऐसा है नहीं...

आईये इसका सीधा-साफ हल क्या है, यह देखते हैं...

परसेंटाइल स्कोरिंग percentile scoring (link) इस समस्या का हल है, यह विभिन्न बोर्डों से पास विद्मार्थियों की तुलना करने का न्यायोचित व तर्कसंगत तरीका है, यदि कटऑफ पर्सेन्टाइल स्कोर में घोषित किया जाये तो किसी के साथ अन्याय नहीं होगा... किसी के साथ भी अच्छे कालेजों या विश्वविद्मालयों में प्रवेश के समय अन्याय न हो इसके लिये मेरिट लिस्ट परसेंटाइल स्कोर के आधार पर ही बननी चाहिये... 

एक कदम आगे जा मैं तो यह सुझाव दूँगा कि हमारे सभी बोर्डों को पास प्रतिशत भी परसेंटाइल स्कोरिंग के आधार पर ही तय करनी चाहिये... यदि शिक्षा के स्तर को बचाये रखना है तो किसी भी विषय में ९५ पर्सेंटाइल स्कोर वाले छात्र के द्वारा प्राप्त अंकों के पचास प्रतिशत अंक पास मार्क्स होना समय की माँग है... अन्यथा पढ़े लिखे डिग्री धारी पर अपने विषय की अधकचरी समझ पाये हुऐ Unemployable Unemployed की लंबी लाइनें यों ही लगती तथा और लंबी होती रहेंगी...

तुक्का लगाने व विषय से हट कर जवाब देने की प्रवृत्ति के लिये निगेटिव मार्किंग का होना एक जरूरत हो गया है आज... परीक्षक के बायस (Bias) को खत्म करने के लिये उत्तर पत्र OMR शीट में हों व कंप्यूटर द्वारा जाँचें जायें... हमारे प्रतिष्ठित भारतीय प्रबंधन संस्थानों (IIM's) के लिये होने वाली 'कैट' परीक्षा १०+२ के इम्तहान का रोल मॉडल हो सकती है...

दिल्ली राजधानी है पूरे हिन्दुस्तान की... दिल्ली विश्वविद्मालय भी पूरे देश का ही है... तो क्या यह सही नहीं कि दिल्ली विश्वविद्मालय के इन प्रतिष्ठित कालेजों में भारत के हर भाग के अच्छे विद्मार्थियों को पढ़ पाने का न्यायोचित व समान अवसर मिले ?

मैंने अपनी तो कह दी, आप बताइये क्या सोचते हैं इस बारे मे ?




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11 टिप्‍पणियां:

  1. आप ने हम यूपी बोर्ड वाला का दर्द लिखा दिया आज अपने नंबर तो बताने में भी शर्म आती है तब भले उस पर इतरा लेते थे | एक उपाय ये है की पुरे देश में एक शिक्षा बोर्ड कर देना चाहिए ताकि सभी बच्चे देश का एक ही इतिहास भूगोल और विज्ञानं पढ़ सके और सभी बच्चो का सामान रूप से परखा जा सके वरना आज की यूपी बोर्ड के बच्चे अपने कम नम्बरों को ये कह कर सही साबित करते है की हमारा सेलेबस सबसे कठिन है वास्तव में क्या है पता नही | दुसरे हमारे यहाँ बी एच यु में किसी भी कोर्स में एडमिशन के लिए आप को उनकी प्रवेश परीक्षा देनी होती है उसमे आये नम्बरों पर ही वो अपने यहाँ प्रवेश देते है इससे आप किसी भी बोर्ड या जगह से पढ़ा कर आये वो खुद अपने से आप को परखा कर अपने यहाँ प्रवेश देते है | हा फार्म भरने के लिए वो १२ वी में ४५ % होना जरुरी करते है और आरक्षण भी केवल केन्द्रीय सरकार का मानते है | वैसे मै केवल विकल्प दे कर पूछे गए सवालों के पक्ष में नहीं है इस तरीके से बच्चो में लेखन प्रतिभा का अभाव हो जाता है और लेखन क्षमता को परखना शायद किसी कंप्यूटर के बस की बात नहीं है | वैसे कई बार टीवी पर देखा की यु पी में परीक्षा की कापी बच्चो का जांचते हुए जो लिखावट की सुन्दरता और लम्बाई चौड़ाई देख कर नंबर दे रहे थे |

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  2. SRCC is a commerce college
    they dont have science and humanities

    so for last 20 years

    they admit only students from commerce stream
    the cut off is higher as the number of commerce students who want to study in commerce college is higher and number of seats are less

    but is a student from science stream or humanities stream wants to study there then they have to have 100% in their stream to migrate to commerce


    media has hyped this 100% cutoff without really understanding

    since we have a long assocition of almost 45 years with delhi university we can understand what the cut off really means when they say 100%

    they dont want to use their commerce seats for other stream students who may latter go to some other college and SRCC may loose a better percentage commerce student

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  3. पूरे देश में एक ही सलेबस होना चाहिए|

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  4. अब सब दक्षिण दिशा में सोचने लगें।

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  5. लेख बहुत अच्छा है.. बट एग्रीड विद सेकण्ड कमेन्ट...

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  6. बिलकुल सहमत जी -असहमत होने की गुंजाईश ही नहीं-अब हम भी युपियेवाले ही हैं -क्या बताएं -लाज मोहि लागे !

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    @ रचना जी,

    दो बातें अवश्य कहना चाहूँगा यहाँ पर...

    १- श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स का नॉन कॉमर्स विद्मार्थियों के लिये १०० % का कटऑफ तो केवल उदाहरण के लिये यहाँ लिखा है मैंने... असली सवाल तो लगभग ९५ % के इतने ऊँचे कटऑफ से अन्य राज्य बोर्डों के विद्मार्थियों के साथ हो रहे अन्याय का है, जिनके राज्य बोर्ड नंबर देने के मामले में इतने दरियादिल नहीं हैं... कटऑफ यदि Percentile स्कोर में घोषित की जाये तथा हरेक Examining Body मार्कशीट में ही विषयवार व एग्रीगेट परसेन्टाइल स्कोर भी छापे तो किसी के साथ भी अन्याय नहीं होगा... बस यही कहना है यहाँ पर...

    २- कॉमर्स स्ट्रीम में भी यदि हर बैकग्राऊंड के विद्मार्थी आयें तो उनसे यह विषय समृद्ध ही होगा... कभी कभी कोई होनहार विद्मार्थी भी किसी विषय में थोड़ा देर से रूचि विकसित करता है... सौ फीसदी कटऑफ रख उन के लिये SRCC में कॉमर्स पढ़ने के सारे रास्ते ही बंद कर देना उचित नहीं...

    आभार!


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  8. मैं तो हमेशा आपकी बातों का समर्थक रहा हूं।
    सो इस बार कैसे विरोध कर सकता हूं। बहुत ही उपयोगी सुझाव दिये हैं आपने। इनपर विचार किया जाना चाहिए।

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    ब्‍लॉग समीक्षा की 20वीं कड़ी...
    2 दिन में अखबारों में 3 पोस्‍टें...

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  9. praveen
    the students coming from universities other then delhi have to give up 5% marks ie if they have 50% its considered to be 45%
    these anomolies have to be removed to make them at par

    delhi believes that it produces the cream and we have a state and centre division


    also praveen the teachers in university of delhi have more advantage then state versities there working hours are very less in comparison to state versities where teachers are required to sit till 4 pm in the college to be available to students

    many du colleges are taking student on basis of cat result and KM is one of them where my late father taught for more than 4 decades

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  10. yes personally i would say that we need disparity and equality and above all we need more colleges

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  11. बढ़िया जानकारी और सुझाव के लिए शुक्रिया प्रवीण भाई !!

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