सोमवार, 13 जून 2011

अनशन पर बाबा ,...संतों के आग्रह पर आखिरकार आज अनशन तोड़ दिया योगऋषि ने, अब क्या होगा आगे... आइये अंदाजा लगायें ( अंतिम भाग ) ...

.
.
.

रामलीला मैदान से हटा दिये जाने तथा चार्टर्ड प्लेन द्वारा पहले देहरादून व फिर सड़क मार्ग से पतंजलि योगपीठ पहुंचा दिये गये योगऋषि रामदेव जी द्वारा अपने अनशन को जारी रखने का यद्मपि कोई भी औचित्य नहीं बचा था क्योंकि हरिद्वार में अनशन जारी रखने से केन्द्र सरकार पर कोई दबाव नहीं बन सकता था फिर भी न जाने क्यों योगऋषि अपने अनशन को जारी रखे हुऐ थे...

पिछले दो-तीन दिनों से खबरें आ रहीं थी कि अनशन के कारण योगऋषि के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंच रहा है, उनका रक्तदाब नीचे जा रहा है आदि आदि... इसीलिये उनको अस्पताल में भर्ती कर इन्ट्रावेनस फ्लुइड्स भी दिये जा रहे थे... तमाम कोशिशों के बावजूद भी योगऋषि के इस तरह बीमार-अशक्त हो जाने व उनकी जान को खतरा होने की खबर भी किसी बड़े जन-उबाल या जन आक्रोश को जन्म देने में असफल रही... उत्तराखंड में अनशन होने के कारण योगऋषि के सुरक्षित रहने का दायित्व भी उत्तराखंड सरकार का ही हो गया था... रामलीला मैदान की रात की घटना के बाद केंद्र सरकार ने न तो योगॠषि से किसी किस्म की कोई बात की और न ही अनशन समाप्त करने की अपील ही... ऐसे में 'आर्ट ऑफ लिविंग' के प्रणेता श्री श्री रविशंकर, राम कथा मर्मज्ञ श्री मुरारी बापू, कृपालु महाराज, आचार्य बलदेव जी, धर्मानंद जी व अन्य संत समाज ने दखल दिया और योगऋषि रामदेव जी से अनशन तोड़ने की अपील की जिसका मान उन्होंने रखा व संतों के हाथ से फलों का रस पीकर अनशन समाप्त कर दिया... कुल मिलाकर एक सही व सम्मानजनक तरीके से अनशन तुड़वा दिया गया...

योगऋषि अभी पूरी तरह स्वस्थ नहीं हैं और पूर्ण स्वास्थ्यलाभ के लिये हो सकता है कि दो-एक दिन और अस्पताल में रहेंगे... पर काले धन के विरूद्ध उनका यह आंदोलन जारी रहेगा यह घोषणा आचार्य बालकृष्ण ने प्रेस कान्फ्रेंस में की...

कालेधन का यह मुद्दा वाकई एक असरदार मुद्दा है पर इसे विदेशों में जमा कालेधन तक ही सीमित करना सही नहीं है... काले धन की परिभाषा के अनुसार :-

(Economics, Accounting & Finance / Accounting & Book-keeping) any money that a person or organization acquires illegally, as by a means that involves tax evasion.

अगर आप अपने इर्द गिर्द गौर से देखें तो काला धन चहुं ओर है... प्रापर्टी के लगभग सारे सौदों में ब्लैक और व्हाईट का कंपोनेंट अलग अलग है, किसी भी रजिस्ट्री ऑफिस जाकर आप यह बात पता कर सकते हैं कि किस तरह मुल्क के रियल एस्टेट बाजार में काले धन का बोलबाला है... ज्यादा दूर जाने की आवश्यकता नहीं कोई व्यवसायी मित्र हो तो उससे ही पूछिये कि टैक्स निर्धारण के लिये कितना सालाना टर्नओवर  वह दिखाता है और कितना टर्नओवर वाकई में है उसका... ज्यादातर दुकानदार पक्का बिल माँगने पर आपके ऊपर आक्रामक हो जायेंगे... टैक्स सर्वे करने वाली टीमों के काम पर व्यापार मंडल दखल देते हैं और ज्यादातर मामलों में उन्हें काम ही नहीं करने देते... कितने डॉक्टर, वकील, आर्किटेक्ट आदि अपनी सही आय घोषित करते हैं...महंगी कैपिटेशन फीस व ट्यूशन फीस वाले निजी क्षेत्र के विश्वविद्मालयों व कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्रों में महज कुछ ही होंगे जो सफेद धन के बूते पढ़ रहे हैं...

इसलिये कालेधन के विरूद्ध यह लड़ाई दोनों मोर्चों पर लड़नी होगी... केवल विदेश में जमा ही नहीं भारत में मौजूद व एक तरह की समानांतर अर्थव्यवस्था चला रहे कालेधन को भी राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर उसे जब्त करने की माँग की जानी चाहिये... कोई जरूरी नहीं कि राष्ट्रीय स्तर पर ही यह लड़ाई लड़ी जाये, सूचना के अधिकार का प्रयोग कर इसे गांव-गांव गली-गली भी लड़ा जा सकता है...

यदि कालेधन के विरूद्ध यह आंदोलन आगे भी योगऋषि के नेतृत्व में चलता है तो क्या यह किसी मुकाम पर पहुंच पायेगा, यह पता करने के लिये जरूरी होगा कि इसका SWOT analysis कर लिया जाये...


STRENGTHS (ताकत)... 
  • इस आंदोलन को धन की कोई कमी कभी नहीं होगी।
  • योगऋषि के पास अपना स्वयं का आस्था चैनल है जिसमें उन्हें रोजाना चार घंटे का एयरटाईम मिलता है जिस कारण प्रचार की कमी नहीं है।
  • मीडिया को योगऋषि साध चुके हैं व अपने प्रयोजन के लिये इस्तेमाल करना जानते हैं।
  • पतंजलि योगपीठ के योग शिक्षकों व पतंजलि आयुर्वेद के डीलरो-सब डीलरों के रूप में एक समर्पित कैडर आंदोलन के पास है।
  • संत समाज का साथ मिला है, और मिलेगा भी ।
  • विपक्षी दलों का सहयोग बिना मांगे मिलेगा।

WEAKNESSES  (कमजोरियाँ)
  • सबसे पहले तो उनको निर्विवाद रूप से यह साबित करना होगा कि उनके ट्रस्टों व कंपनियों में एक भी काला पैसा नहीं लगा है, यह एक मुश्किल काम है ।
  • एक बड़ी कमजोरी यह है कि योगऋषि का अपने समर्थकों की संख्या का अनुमान गलत था, वह कहते रहे कि पूरे देश में कम से कम एक करोड़ लोग उनके साथ अनशन पर बैठेंगे, पर ऐसा नहीं हुआ।
  • योगऋषि योग को बीमारी हटा शरीर को निरोग करने के एक तरीके के तौर पर सिखाते हैं इसीलिये उनके योगशिविर में उन रोगियों की तादाद ज्यादा होती है जो अपनी बीमारियों का हल ढूंढने वहाँ जाते हैं यह लोग भले ही हर बात पर दोनों हाथ भले ही उठा देते हों पर उनसे आंदोलन में जा संघर्ष करने की उम्मीद नहीं की जा सकती।
  • पारदर्शिता का अभाव एक बड़ी कमजोरी है।
  • आंदोलन के पास द्वितीय पंक्ति का नेतृत्व नहीं है।
  • आंदोलन के रणनीतिकारों व सलाहकारों ने अभी तक के अपने निर्णयों में परिपक्वता नहीं दिखाई है।
  • खुद भगवा वस्त्र धारण करने, धार्मिक मंत्र-भजन आदि गाने, यज्ञ आदि को कार्यक्रम में रखने से यह पूरा आंदोलन एक हिन्दू-आर्य समाजी धार्मिक कार्यक्रम सा लगता है, सभी को जोड़ने के विशेष प्रयास नहीं किये जाते।
  • यह आंदोलन योग, धर्म, आयुर्वेद और सामाजिक मुद्दों का अजीब सा घालमेल नजर आता है जहाँ कुछ भी स्पष्ट नहीं है।
  • जनतंत्र का 'जन' इस आंदोलन में ज्यादा तादाद में नजर नहीं आता।
  • सांप्रदायिक तत्व इस आंदोलन की साख को गिरा सरकार को उस पर हमला करने का मौका दे सकते हैं।

OPPORTUNITIES (  मौके )
  • सबसे बड़ा मौका तो यही है कि आज का राजनीतिक विपक्ष एकदम बेदम है इसीलिये इस तरह के आंदोलनों को समर्थन मिल रहा है।
  • सूचना की क्रांति के कारण व विकीलीक्स जैसी साइटों से छन कर आती सूचनायें व खबरें आंदोलन में नई जान भर सकती हैं।
  • विपक्षी राजनीतिक दल भी अपने स्वार्थ के चलते आंदोलन को सहयोग देंगे।
  • जनमानस यथास्थिति से खुश नहीं है और किसी भी उस चीज की ओर, जो बदलाव की आस जगाती हो, एक उम्मीद से देखता है।
  • यदि भविष्य में कोई बड़ा घोटाला उजागर होता है तो वह तुरंत आंदोलन को नव-प्राणित कर देगा।

THREATS  ( खतरे )
  • सबसे बड़ा खतरा तो यही है कि यह आंदोलन विपक्षी राजनीतिक दलों का मोहरा मात्र बन कर न रह जाये।
  •  योगऋषि को इस आरोप का जवाब देना होगा कि वह किसी के मुखौटे नहीं हैं।
  • दोबारा कभी भी रामलीला मैदान जैसा जनसमूह जुट पायेगा, इस में भी संदेह है।
  • अपने ट्रस्टों, दसियों विभिन्न कंपनियों के वित्तीय, टैक्स संबंधी मसलों, उनके मालिकाना हक, आचार्य बालकृष्ण व योगऋषि के छोटे भाई रामभरत की भूमिका आदि पर कुछ तीखे सवालों का उनको सामना करना होगा।
  • जिन व्यापारियों-भक्तों ने योगऋषि से जुड़ी विभिन्न कंपनियों में  लाभ कमाने के लिये धन लगाया है वह अपने निवेश की सुरक्षा के लिये चाहेंगे कि सरकार को परेशान करने वाली कोई भी हरकत न की जाये।
  • अब सुबह के प्रसारण के समय योग के द्वारा चामत्कारिक लाभ होने के उनके दावे भी सवालों के घेरे में आयेंगे।
  • लाइमलाइट में बने रहने की बाबा की महत्वाकांक्षा भी एक बड़ा खतरा है।
  • किसी भी आंदोलन को अपना लक्ष्य संसदीय लोकतंत्र के फ्रेमवर्क के अंदर ही ढूंढना चाहिये, अभी तक के जो लक्षण हैं उनसे यह आंदोलन संसदीय लोकतंत्र का मखौल सा उड़ाता दिखता है जो एक बड़ा खतरा है इस आंदोलन के स्वास्थ्य के लिये।

कुल मिलाकर मैं बहुत ज्यादा आशावान नहीं अब...

आपको क्या लगता है, यदि मुझसे भिन्न राय रखते हों इस बारे में, तो अपनी इस राय को रखने की वजह अवश्य बताइये मुझे और पाठकों को भी...



आभार!



...

30 टिप्‍पणियां:

  1. जहाँ जन गायब हो वहाँ सारी कमियाँ हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  2. कमियों को दूर करना और खोया विश्वास लौटाना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। जहां समाज धर्म और जातियों में बटा हो वहां किसी भी आंदोलन को आरोपित करके, निर्ममता पूर्वक कुचलना आसान होता है। अपने को ईमानदार व निष्पक्ष सिद्ध करना हमेशा उसी की आवश्यकता होती है जो मुद्दा उठाता है।
    इस आंदोलन ने आत्मचिंतन का अवसर दिया और सबको थोड़ा बहुत समझने का अवसर दिया। इसे मैं बड़े लाभ के रूप में लेता हूँ। आशान्वित हूँ कि राष्ट्र, ऐसे ही विमर्श से, अपनी कमियाँ दूर कर और मजबूत होगा।

    उत्तर देंहटाएं
  3. लोंग खुल कर भ्रष्टाचार और कालेधन पर बात कर रहे हैं , इन आंदोलनों ने गूंगों को जबान तो दी !

    उत्तर देंहटाएं
  4. आपका विश्लेषण बड़ा दमदार है, पैटेन्ट करवा लें।

    उत्तर देंहटाएं
  5. उर्जा वान लेख, और काफी हद सहमत भी हूँ आपके साथ. स्वामी राम देव जी को सभी धर्मो को साथ लेकर के चलना चाहिए. और साथ ही साथ ईस आन्दोलन को और तेज रफ़्तार से आगे बढ़ाना चाहिए.

    उत्तर देंहटाएं
  6. आपका आलेख बहुत सधा हुआ विश्लेषण है..
    पर रामदेव यादव पर अब कुछ बोलने लिखने की इच्छा नहीं है ।
    उन्हें पहले ही बहुत भाव दिया चुका है, हाँ लोकपाल की बहाली और कालेधन के उन्मूलन प्रति हमारी प्रतिबद्धता कम न पड़ने पाये यह ध्यान रखना होगा । कुल मिला कर योगाटीचर के लुजलुजे चरित्र ने निराश ही किया है ।

    उत्तर देंहटाएं
  7. डा. अमर कुमार जी से सहमत हूँ आदरणीया निर्मला कपिला जी और रचना जी से भी , जो कि थोड़ी बहुत देर में आ ही जाएंगी ।
    http://aryabhojan.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  8. आपसे सहमत हूँ... जनांदोलन के लिए समाज के सभी तबकों को साथ लेकर चलना होगा... इसके लिए हर एक विचारधारा से समर्थन लेना चाहिए... अगर कोई विशेष विचारधारा अथवा संगठन समर्थन करता है तो इसमें किसी को भी एतराज़ नहीं होना चाहिए... लेकिन ऐसा आन्दोलन पूरे समाज का अन्दोनल नहीं बन सकता है जिसमें जानबूझ कर माहौल को ऐसा बनाया जाए कि वह किसी धर्म विशेष का आन्दोलन दिखाई दे... साथ ही साथ लोकतान्त्रिक ढांचे को तहस-नहस करके अपनी मनमानी और स्वत: गुडगान के प्रयासों से भी दूरी बनाई जानी चाहिए... अन्ना के आन्दोलन में बहुत सी कमियों के बावजूद बहुत सारी खूबियाँ थी... हालाँकि उनके साथियों का मकसद भी अपनी मनमानी चलाना अधिक दिखाई दे रहा है...

    किसी कानून को बनाने के लिए तो आन्दोलन हो सकता है, लेकिन यह कैसे तर्कपूर्ण है कि आन्दोलनकर्ता ही कानून बनाएं? जनता से चुने हुए लोग ही जनता के प्रति जवाबदेह हैं, इसलिए कानून बनाने का कार्य भी उन्ही का होना चाहिए और वह भी संसदीय मर्यादाओं का निर्वाहन करते हुए होना चाहिए. हालाँकि कानून बनाने के लिए कानून अथवा समाज के जानकारों की राय ली जा सकती है. लेकिन कानून बनाने वाली कमिटी में भीड़ का डर दिखा कर ज़बरदस्ती शामिल होना सरकार को ब्लैक मेल करना ही कहलाएगा.



    प्रेमरस

    उत्तर देंहटाएं
  9. सीधा-सच्चा, तर्कपूर्ण विश्लेषण । आभार सहित...

    उत्तर देंहटाएं
  10. वो सारे धर्मो को तो साथ लेकर चल ही रहे थे.
    सारे धर्म के लोग उनके मंच पर थे.
    सारे धर्म के लोगो ने उनके मंच से भाषण दिया.
    चीख चीख कर वो कहते रहे कि हमारा कोई सांप्रदायिक एजेँडा नही है.
    अब इससे ज्यादा वो क्या करे.
    क्या जब तक वो हिँदु को आतंकवादी और लादेन को लादेन जी न कहे.
    तब तक उन्हे सेकुलर नही माना जायेगा.

    भाई लोगो
    अपनी सेकुलर की परिभाषा को दुरस्त करो.

    सेकुलर का मतलब ये है कि जो सभी धर्मो का सम्मान करे .
    सेकुलर का मतलब ये नही है कि आदमी अपने धर्म को नीचा दिखा कर दूसरे धर्म को ऊँचा करे.

    उत्तर देंहटाएं
  11. वह बहुत अच्छी रचना है !मेरे ब्लॉग पर अपना सहयोग दे !
    Latest Music
    Latest Movies

    उत्तर देंहटाएं
  12. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  13. इसे कहते हैं आर्म चेयर एनालिसिस!
    इस देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई जेहाद चल नहीं सकता है ..
    आप ,दिनेश राय द्विवदी जी ,जगदीश्वर चतुर्वदी जी उसमें इतने मीन मेख निकाल देगें कि वह भहरा के बैठ जाएगा .. :(
    आपके हिसाब से बाबा को क्या करना चाहिए था यह भी लिख डालिए ...
    आपसे या हमसे भी कोई जनांदोलन तो चलाया जा नहीं सकेगा कम्फर्ट जोंन में बैठ कर ..बस बौद्धिक जुगाली करते रह सकते हैं
    जो करते रहेगें ही ....

    उत्तर देंहटाएं
  14. बहुत सटीक आकलन किया है।

    उत्तर देंहटाएं
  15. आप की इस सिरीज की पहली पोस्ट पर जो कमेन्ट दिया हैं वही यहाँ देने का मन हैं
    खुद को हम सब सुधारे सब सही होगा
    समस्या जन आन्दोलन को चलाने की नहीं हैं समस्या हैं मुखोटो से बाहर आने की . समस्या हैं परिवार वाद से बाहर आने की हैं . समस्या लोकतंत्र को परिवाद से उबारने की हैं
    समस्या भ्रष्टाचार होती तो निपटा सकते थे लेकिन समस्या हैं की हम भ्रष्टाचार विरोधी ना हो कर अब लोकतंत्र , संविधान और संसद विरोधी हो गए हैं
    पता नहीं क्यूँ लगता हैं अगर बात निर्वाचन आयोग की सबसे पहले हो और वहाँ संसद में प्रवेश के कानूनों मै कुछ बदलाव की बात हो तो शायाद नेता जो बनते हैं उन में कोई बदलाव हो .
    कोई भी सरकार ना तो अच्छी होती हैं ना बुरी वो केवल हमे र्रेप्रेसेंत करती हैं . हम चुनते हैं और अपनी तरफ से सब काबिल को ही चुनते हैं पर चुनना उपलब्ध विकल्पों से ही हो सकता हैं .
    पोलिटिक्स मै सुधार लाना जरुरी हैं और वो तभी संभव हैं जब हम संविधान और संसद को मान दे गे
    कोई भी सरकार अगर हर कानून को लागू कर देगी और जोर से मनवाएगी तो यकीं मानिये emergency जैसी स्थिती होगी देश मे

    उत्तर देंहटाएं
  16. अरविन्द मिश्रा जी से सहमत…

    बाबा के साथ सबसे बड़ी समस्या उनके "भगवा" वस्त्र और किसी शातिर-कमीने किस्म के नेता या सलाहकार का साथ न होना भी है… (इस मामले में अण्णा धनी और लकी हैं, उनके कपड़े भी सफ़ेद हैं, टोपी भी गाँधीवादी है और शातिरों का साथ तो है ही)।

    बाकी तो हम सभी अपने-अपने काम (यानी पैसा कमाने) में लगे ही हैं। 1100 करोड़ की सम्पत्ति का मालिक बड़ा ही मूर्ख है जो इस आंदोलन में कूदा… चाहता तो विजय माल्या की तरह "ऐश" का जीवन बिता सकता था… लौकी का जूस पीने और उबली सब्जियाँ खाने की क्या जरुरत है उसे? शायद रामदेव बाबा को "भारतीय केकडों" की कथा मालूम नहीं थी… :) :)

    उत्तर देंहटाएं
  17. सुरेश जी ने समर्थन कर दिया अरविन्द जी का यानी दो वोट हो गये !!!
    ख़ैर सुरेश के कमेन्ट के बाद एक बात दिमाग मे जरुर आई हैं क्या
    कोई भी अगर भगवा वस्त्र पहन लेगा तो वो सही हो जायेगा
    अगर सारे नेता भगवा पहन ले तो क्या ये जन आन्दोलन ख़तम हो सकता हैं
    अगर सारे बड़े बड़े पैसे वाले व्यवसाई जैसे मुकेश अम्बानी इत्यादि भगवा वस्त्र पहन ले तो उन पर टंच कसना बंद हो जाएगा

    ये "भगवा वस्त्र " क्या कोई टिकेट है की कटवा लो और अपने को "निष्पाप " सिद्ध कर लो
    कम से कम जो लोग निरंतर हिन्दू होने में गर्व महसूस करते हैं उनको तो "भगवा वस्त्र " का मान रखना चाहिये .
    भगवा रंग पहन कर जनता को बेवकूफ बनाने वाले भी कम नहीं हैं और हिन्दू होने का मतलब भगवा पाखण्ड का मान मंडन करना तो कभी नहीं हो सकता .

    उत्तर देंहटाएं
  18. http://pyptdonation.divyayoga.com/index.php?cPath=21&osCsid=3073b41552e33769dd4261a9a81aea9b


    Donations


    Donation Type Amount- Donate Now
    CORPORATE MEMBER OF PYPT Rs.1,100,000/--
    FOUNDER MEMBER OF PYPT Rs.500,000/--
    PATRON MEMBER OF PYPT Rs.250,000/--
    LIFE MEMBER OF PYPT Rs.100,000/--
    DIGNIFIED MEMBER OF PYPT Rs.51,000/--
    RESPECTED MEMBER OF PYPT Rs.21,000/--
    GENERAL MEMBER OF PYPT Rs.11,000/--

    just for information praveen

    उत्तर देंहटाएं
  19. रचना जी
    कोई भी ट्रस्ट डोनेशन से ही चलता है.
    दुनिया मे ऐसा कोई ट्रस्ट नही है जो बिना डोनेशन से चलता हो.

    अब दूसरी बात
    आपने जो दिव्य योग ट्रस्ट की लिस्ट दी है.
    उसमे ये कहाँ लिखा है कि भारत के 121 करोड़ लोगो को उसका मेँबर बनना आवश्यक है.

    सीधी बात है उन्होने अपनी लिस्ट बनायी .
    अब जिसको मेँबर बनना हो बने.
    जिसको न बनना हो वो न बने.

    क्या वो किसी के घर मे घुसकर जबरदस्ती कर रहे है कि मेरे ट्रस्ट का मेँबर बनो.

    उत्तर देंहटाएं
  20. वैसे तो बाबा रामदेव ने दान के पैसो से बहुत जन उपयोगी काम किये लेकिन अगर अभी की बात करे तो अभी उन्होने हरिद्धार मे एक धर्मशाला खोली है जिसमे 10000 लोगो के खाने पीने रहने की मुफ्त व्यवस्था है.
    तो ये व्यवस्था कैसे हुयी.
    जो उनको दान मिलता है वो उसको वापस गरीबो मे लगाते है.

    दान मे मिले पैसे से वे कोई अय्याशी नही कर रहे है.

    उत्तर देंहटाएं
  21. Baba Ramdev is the Hasan Ali of Haridwar’

    Swami Hathyogi, spokesperson, Akhara Parishad and All India Sant Samaj, tells Brijesh Pandey that the yoga guru is no sanyasi
    Swami Hathyogi

    What do you think of Baba Ramdev’s fight against black money?
    What about the black money of Baba Ramdev and his aide Acharya Balkrishna? He is making a fool out of the public and is not at all interested in bringing back black money in Swiss banks. The kind of deal he tried to strike with the government behind closed doors shows his real character.

    What kind of differences do you have with Ramdev?
    I have no personal enmity against Ramdev but I’m always against those who try to do business under the garb of being a sadhu. He is definitely not a sanyasi.

    Why is that?
    It is not the job of a sadhu to sell oil, soap, biscuit and yoga. I’m a sanyasi. I know about medicinal plants but do I go around selling them? When someone comes to me, I help them without taking money. Sanyasis should be living on daan (charity), not on laabh (profit) from business. That’s why I don’t consider him a sanyasi.

    What do you have to say about the allegations levelled against Baba Ramdev?
    He knows that he will be exposed soon and that is why he is threatening the government. Nobody supports him. He only has the backing of the BJP, Vishwa Hindu Parishad (VHP) and RSS. When ND Tiwari was the chief minister of Uttarakhand, he became a Congressman. When the BJP is in power, he becomes a BJP supporter. There is no consistency in his character and soon he will be exposed. The kind of land-grab he has done makes him the Hasan Ali of Haridwar.

    What do you mean by that?
    He claims he is only worth Rs 1,100 crore but in reality, he is worth tens of thousands of crores.

    But it seems that the general public is supporting Ramdev.
    The public that he is talking about is a paid crowd. When he was at Ramlila Maidan in New Delhi, he claimed that lakhs and lakhs of people have come but where are the people when he is sitting for dharna in Haridwar? Has even 1,000 people turned up? The public that come to visit him is mostly paid or belong to the BJP and the RSS.

    http://tehelka.com/story_main49.asp?filename=Ne180611Coverstory2.asp

    उत्तर देंहटाएं
  22. सब कुछ तो आपने कह दिया, अब बचा ही क्‍या है कहने को।
    इस शानदार पोस्‍ट के लिए आपकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है।

    ---------
    हॉट मॉडल केली ब्रुक...
    नदी : एक चिंतन यात्रा।

    उत्तर देंहटाएं
  23. गंभीर चिंतन और विश्‍लेषण.

    उत्तर देंहटाएं
  24. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  25. बेचारे संत निगमानंद की सुध किसीने नहीं ली जो पिछले सत्तर दिनों से गंगा में अवैध उत्खनन के खिलाफ अनशन पर थे और तबीयत बिगड जाने के बाद उसी हिमालयन अस्पताल में भर्ती थे जहाँ बाबा रामदेव को ले जाया गया था.सोमवार को ही उनकी मृत्यु हुई.चिकित्सकों पर आरोप है कि सरकार के इशारे पर उन्होने संत को जहर देकर मार डाला है.वे 2008 में भी इसी बात को लेकर इतना ही लंबा अनशन कर चुके थे और सरकार पर दबाव बनाने में भी सफल रहे थे लेकिन तभी से वे न सिर्फ गंभीर बिमारियों से ग्रसित हो गये थे बल्कि सरकार और खनन माफिया की आँखों का काँटा भी बने हुए थे.निस्संदेह बाबा रामदेव के आगे लक्ष्य के प्रति उनकी प्रतिबद्दता कहीं अधिक थी.जिसे मीडिया ने कोई जगह नहीं दी.

    उत्तर देंहटाएं
  26. इस आन्दोलन ? की विफलता का पूर्व आकलन हमने भी कर रखा था पर उत्साही मित्रों की प्रतिक्रियाओं :) और कार्यगत व्यस्तता के चलते समय का संकट ऐसा बना कि कुछ लिखने का मौक़ा ही नहीं मिला !

    आपके विश्लेषण और उस पर आई अनेकों टिप्पणियों से उम्मीद जागती है कि मुद्दे पर वस्तुपरक चिंतन करने वाली मेधा अब भी सलामत है !

    उत्तर देंहटाएं
  27. ऊंट किस करवट बैठेगा ...आने वाले समय की प्रतीक्षा है..सहमत हूँ

    उत्तर देंहटाएं

मेरे इस आलेख को पढ़ कर ही यदि आपके मन में कोई विचार उत्पन्न हुऐ हैं तो कृपया उन्हें 'नेकी कर दरिया में डाल' की तर्ज पर ही यहाँ टिप्पणी रूप में दर्ज करें... इस टिप्पणी के पीछे कोई अन्य छिपा हुआ मंतव्य न रखें, आप इसे उधार में मुझे दी गयी टिप्पणी न समझें, प्रतिउत्तर में आपके ब्लॉग पर टिप्पणी करने की किसी बाध्यता को मैं नहीं मानता व मुझसे या किसी अन्य ब्लॉगर से भी ऐसी अपेक्षा रखना न तो नैतिक है न उचित ही !... मैं किसी अन्य के लिखे आलेखों पर भी इसी नियम व भावना के तहत टिपियाता हूँ !

असहमति को इस ब्लॉग पर पूरा सम्मान दिया जाता है, आप मेरे किसी भी विचार का खुल कर विरोध या समर्थन कर सकते हैं, परंतु अशिष्ट या अश्लील भाषा यु्क्त अथवा किसी के भी ऊपर व्यक्तिगत आक्षेपयुक्त टिप्पणियाँ कृपया यहाँ न दें... आप अपनी टिप्पणियाँ English, हिन्दी, रोमन में लिखी हिन्दी, हिंग्लिश आदि किसी भी तरीके से लिख सकते हैं... नहीं कुछ लिखना चाहते हैं तो भी चलेगा... आपके आने का शुक्रिया... आते रहियेगा भविष्य में भी... आभार!