शुक्रवार, 24 जून 2011

" बाप बड़ा न भैय्या, सबसे बड़ा रूपैय्या ! " ...छोटी होती, सिकुड़ती हमारी यह दुनिया...समस्या की जड़ें किसी भी अनुमान से ज्यादा गहरी हैं !

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यह मुद्दा वाकई बहुत ही गंभीर है, पर न जाने क्यों इस पर कुछ भी लिखने या कहने से पहले एक चीनी (या जापानी ?) लघुकथा जिसे बहुत पहले शायद बचपन में पढ़ा था, याद आ रही है...

कथा कुछ यों है... झेल ही लीजिये...

'एक गाँव में एक परिवार रहता था परिवार में कुल जमा चार लोग थे युवा पति-पत्नि, उनका दस साल का बेटा और पति का बुजुर्ग बाप... पति-पत्नि थोड़े खुदगर्ज किस्म के थे... बजुर्ग पिता अक्सर बीमार रहता था, और बेटे-बहू को उसकी देखभाल व इलाज में समय व पैसा खर्च करना कतई पसंद नहीं था... हाँ दस साल के उनके बेटे के लिये उसके दादा उसके सबसे अच्छे दोस्त थे... एक दिन रात को बेटा-बहू योजना बनाते हैं कि यह बुढ्ढा तो किसी काम का है नहीं, खर्चा अलग से करवाता है, इसलिये सुबह-सुबह बेटा अपने बूढ़े बाप को एक बोरे में ले जाकर पहाड़ की चोटी में एक गढ्ढे में दफन कर आयेगा... पोता इस योजना को सुन लेता है...


सुबह होती है, बेटा अपने बूढ़े बाप को लेकर चल पड़ता है पहाड़ की चोटी की ओर... चोटी पर पहुंच बोरे को एक तरफ रखता है, थोड़ा सुस्ताता है और फिर गढ्ढा खोदना शुरू करता है... कुछ ही देर में वह अनुभव करता है कि खोदने के लिये वह कुदाल तो एक बार चलाता है पर आवाजें दो बार आतीं हैं... वह हैरान-परेशान, फिर एक बार कुदाल चलाता है फिर वही होता है... वह अपने चारों तरफ देखता है तो पाता है कि थोड़ा सा नीचे एक झाड़ी के पीछे उसका दस साल का बेटा भी एक गढ्ढा खोद रहा है...


आगबबूला हो वह अपने बेटे से उस गढ्ढे को खोदने का कारण पूछता है तो दस साल का वह बच्चा कहता है कि " हे पिता, मैं तो आपका ही अनुकरण कर रहा हूँ... एक न एक दिन तो आप भी बूढ़े होंगे ही... मैंने सोचा तब के लिये गढ्ढा अभी से तैयार कर लूं "


इतना सुनते ही वह युवा अपने बुजुर्ग बाप तथा दस साल के बेटे से लिपट कर जार-जार रोता है, अपनी गल्तियों की क्षमा माँगता है...दादा-बेटा-पोता, तीनों एक दूसरे का हाथ थाम हंसते-मुस्कुराते घर लौटते हैं... और उस दिन के बाद से वह घर कभी खत्म न होने वाली खुशियों से भर जाता है...'


यह कहानी तो सुखांत रही परंतु हमारे समाज में कई परिवारों के बुजुर्ग इतने खुशकिस्मत नहीं होते... आर्थिक उदारीकरण व निजीकरण से उपजे उपभोक्तावाद, भौतिकवाद ने जन्मी पैसे और ऐशो आराम को येन केन प्रकारेण कमाने व बढ़ाने की अंधी दौड़ ने केवल भारत को भ्रष्ट ही नहीं किया, परिवार नाम की संस्था पर भी चोट की है... बहुत छोटी होती जा रही है आज हमारी दुनिया... केवल अपनी पत्नी या पति और अपने बच्चों तक सीमित... हमारे बुजुर्ग हमको एक अनावश्यक बोझ से लगने लगे हैं जिनकी देखभाल में पैसा व समय लगाना हम में से बहुतों को व्यर्थ लगने लगा है...

एक अर्सा पहले इस प्रवृत्ति पर एक सत्य घटना को आधार बनाते हुऐ एक पोस्ट " बरसी ! " भी लिखी थी मैंने, समय हो तो देखियेगा...

भारत का हमारा यह आज का समाज परिवार के बच्चों, खासकर बेटों से अपेक्षा रखता है कि वह परिवार के बुजुर्गों का ध्यान रखे... अपवादों को यदि छोड़ दें तो अधिकाँश मामलों में खुद माँ-बाप भी अपनी बेटियों से यह अपेक्षा नहीं रखते... इस अपेक्षा के पीछे कोई 'वाद' नहीं है अपितु यह ठोस तथ्य है कि विवाहित बेटी के ऊपर उसके सास-ससुर की जिम्मेदारियाँ पहले से ही हैं... कुछ मामलों में जहाँ परिवार में बेटियाँ ही हैं बेटा नहीं वहाँ पर आर्थिक रूप से समर्थ बेटियाँ यह दायित्व निभा भी रही हैं...

एक समाज के तौर पर हमारे देश और खास तौर से हमारे मध्यवर्ग ( जो इस ब्लॉग का पाठक भी है ) के लिये यह इतिहास का सबसे अच्छा दौर है... जब वह अच्छा कमा रहा है...अच्छे साफ-सुथरे मकानों में रहता है... उसके पास निजी परिवहन का साधन भी है... टीवी, फोन व इंटरनेट के माध्यम से वह पूरे देश-दुनिया से जुड़ा हुआ भी है... उसके बच्चों के पास ढेर सी कैरियर-च्वाइस मौजूद हैं... बहुत बड़े पैमाने पर वह देश-दुनिया में घूमने व आनंद मनाने के लिये टूरिस्ट बन जा भी रहा है... उसके परिधान, उसके सौंदर्य साधन अंतर्राष्ट्रीय स्तर के हैं... तो फिर क्या वजह है कि इस वर्ग को अपने बुजुर्ग बोझ से लगने लगे हैं...

मैं जब अपने इर्द गिर्द देखता हूँ तो पाता हूँ कि हर तीसरा शख्स अपनी पत्नी के इस दबाव का सामना कर रहा है कि वह केवल और केवल अपने बीबी-बच्चों के हितों व भविष्य के बारे में सोचे तथा अपने माता-पिता व भाई-बहिनों के बारे में एक ' लिमिट ' (?) तक ही कुछ करने की सोचे... यह भी एक नंगा सत्य है कि अधिकतर परिवारों में जब तक बेटे अविवाहित रहते हैं परिवार हंसीखुशी मिलजुल कर बड़ी से बड़ी स्थिति का सामना करता रहता है... परंतु परिवार में किसी भी बेटे के विवाह के साथ ही विखंडन की प्रक्रिया ब बुजुर्गों की बेकदरी की शुरूआत हो जाती है...

मेरे एक बेहद ही हंसमुख, खुशमिजाज व मुंहफट बुजुर्ग मुस्लिम दोस्त हैं... अक्सर मुझसे कहते हैं... " यार, किसी 'घर' में रहने वाले सौ भीम भी यदि चौबीसों घंटे गदा प्रहार करते रहें तो भी किसी 'घर' का पलस्तर भी नहीं उखड़ेगा पर यदि उसी 'घर' की कोई महिला सुई की नोंक से कुरेदना शुरू कर दे तो 'घर' को नेस्तनाबूद होते चंद दिन भी नहीं लगते ! " मैं यद्मपि उनके इस कथन को ग्रॉस जेनरलाइजेशन मान खारिज करता हूँ फिर भी यहाँ दे रहा हूँ ताकि बहस में यह भी शामिल रहे... और आप भी इस पर कुछ कहें...

एक लिंक जिसका जिक्र वाणी जी ने रचना जी को श्रेय देते हुऐ और बख्श दो इन बुजुर्गों को ! कहते हुऐ (यहाँ पर) किया है...

कहता है:-

सौ फीसदी सर्वे में भाग लेने वाले बुजुर्गों ने कहा कि उनकी ' बहुऐं ' उन्हें सबसे ज्यादा प्रताड़ित करती हैं। ( लिंक )

आइये पता लगायें कि एक समाज के तौर पर हम कहाँ गलती कर रहे हैं...
  • आप चाहे आज की फिल्में देखें या टेलीविजन सीरियल या रीएल्टी शो... हम लोग एक ऐसे जोड़े के स्टीरियो टाइप को बढ़ावा दे रहे हैं जो चिरयुवा है हमेशा युवा ही दिखना चाहता है... अपना कमाया अपने पर ही और अपने एकाध बच्चों पर ही खर्च करना चाहता है... और बुजुर्गों को अपनी मंजिल पाने की राह में एक अड़चन के तौर पर देखता है।
  • नई कार, बढ़ा घर, नये किचन एप्लायन्स, एक्जॉटिक थीम पार्टी, एक्जॉटिक फॉरेन वेकेशन्स, डिजाइनर कपडों को ही दुनिया को अपने ' अराइव ' करने की घोषणा करने का जरिया मानने वाला एक वर्ग हमारे देश में पैदा हो गया है जिसके लिये अपने बुजुर्गों की देखभाल व उनका ख्याल रखना लक्ष्य से हटने सा हो गया है।
  • अपने बेटों को तो हम में से कुछ लोग ' श्रवण कुमार ' सा बनने की आस लिये पाल रहे हैं पर हमारे अपने ही घर में बुजुर्ग उपेक्षित जिंदगी जी रहे हैं...  हम यह क्यों नहीं सोचते कि वह अनुसरण तो हमारा ही करेगा।
  • उपभोक्तावाद व भौतिकवाद ने एक पूरी की पूरी पीढ़ी की लड़कियों ( यही तो कल बहुऐं बनेंगी ) को एक ऐसे घर की कल्पना दे दी है जिसमें सिर्फ उसका पति हो और दोनों के हमउम्र दोस्त... इस सुंदर व युवा दुनिया में किसी असुंदर, बीमार व उम्रदराज के लिये जगह नहीं बची ।
  • वानप्रस्थ व सन्यास आश्रम की पुरातन जीवन व्यवस्था और माया मोह को त्याग प्रभु नाम लेने में ही मुक्ति मिलने के धर्मगुरुओं के प्रवचनों (?) के प्रभाव में आ कई बुजुर्ग तो खुद ही अपनी आर्थिक स्वतंत्रता का त्याग कर अपनी नई पीढ़ी के ऊपर निर्भर हो बेकदरी का शिकार हो जाते हैं।
  • उदारीकरण के बाद पैदा हुए नये अमीरों द्वारा अपनी दौलत के बेशर्म व नंगा प्रदर्शन से हमारे अखबार, पत्रिकायें व टीवी चैनल अटे पड़े हैं... यह लोग समाज के एक वर्ग के नायक से भी बन गये हैं... अपने इन  ' नायकों '  के लाईफ स्टाइल की नकल करने की आकाँक्षा लिये इस नई पीढ़ी का मॉटो है " बाप बड़ा न भैय्या, सबसे बड़ा रूपैय्या ! "

शायद पहली बार कोई निराशावादी बात कर रहा हूँ, बुरा न मानियेगा... पर जल्दी में ही तो इस समस्या का कोई हल मुझे दिखता नहीं... तब तक के लिये तो बाप-माँ-भैय्या-बहन को रूपैय्ये से छोटा स्थान ही मिलता नजर आ रहा है मुझे... हमीं में से कुछ के द्वारा... :(


अपनी आप बताइये...




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आलेख जो मेरी इस पोस्ट की प्रेरणा बने...

१- अनवरत : मेरा सिर शर्म से झुका हुआ है
२- नारी : संयुक्त परिवार में बुजुर्ग महिलाओं की स्थिति ...
३- ज्ञानवाणी : बख्श दो इन बुजुर्गों को .....
४- अनवरत : कैसी होगी नई आजादी ?
५- इडियन होम मेकर : बहुऐं हैं जिम्मेदार प्रताड़ना की !



जरा हट कर एक दूसरे कोण से भी देखिये मुद्दे को  :-

नारी : क्या बुजुर्गों की कोई गलती नहीं होती कभी भी ?  साभार रचना जी ...





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शनिवार, 18 जून 2011

बाप रे इतने सारे नंबर ! क्या होगा बेचारे यूपी वालों का ?

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दिल्ली विश्वविद्मालय के कॉलेजों में एडमिशन के लिये पहली कट ऑफ लिस्ट जारी हुई है... हमेशा की तरह कट ऑफ काफी ऊँचा गया है... परंतु श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के नॉन कॉमर्स विद्मार्थियों के लिये १०० % के कटऑफ की इस खबर (लिंक) ने सभी को सोचने पर मजबूर सा कर दिया है यहाँ तक कि स्वयं केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री श्री कपिल सिब्बल ने इस कटऑफ को अतार्किक या नासमझी भरा (लिंक) कहा है...

अस्सी के दशक के प्रथमार्ध में मैंने तब के अविभाजित उत्तर प्रदेश के 'यूपी बोर्ड' से जब हाईस्कूल व इंटरमीडिएट (१०+२) किया था तब यदि आप किसी विषय में ७५% स्कोर करते थे तो उस विषय में डिस्टिंक्शन यानी विशेष योग्यता मानी जाती थी... कुल अंकों का ७५% पाने वाला प्रथम श्रेणी -सम्मान सहित {First Honours } उत्तीर्ण माना जाता था... और ५५% से ६०% अंक पाने वाले छात्र अपने को गुड-सेकंड डिवीजन में पास कह इतराते फिरते थे... उस दौर में खास तौर पर यूपी बोर्ड का परिणाम यदि ४०-५०% आता था तो उसे बहुत ही अच्छा कहते थे... उस दौर में भी सीबीएसई और आइसीएसई के अधिकतर अच्छे छात्रों के अंक ८०% के आसपास या उससे ज्यादा होते थे जबकि यूपीबोर्ड के स्टेट टॉपर ८०-८२ % अंक पाते थे...

आज हालत यह है कि मेरा कोई परिचित बच्चा यदि बताता है कि उसके ७५% अंक आये हैं तो मैं खुलकर बधाई भी नहीं दे पाता यह सोचकर कि वह बुरा न मान जाये क्योंकि ८५% से कम अंकों को बहुत ही खराब परफार्मेंस माना जाने लगा है... केंद्रीय व राज्यों के बोर्ड अधिक से अधिक छात्रों को पास करने व उनको अधिक से अधिक अंक प्रदान करने को अपनी सफलता का पैमाना मानने लगे हैं... फिर भी कुछ चीजें धीरे-धीरे ही बदलती हैं जैसे कि यूपी बोर्ड में ९५% एग्रीगेट अंक आज भी शायद ही कोई पा पाया होगा...

इसका सीधा सा अर्थ यह भी है कि दिल्ली विश्वविद्मालय के अधिकतर प्रतिष्ठित कॉलेजों में यूपी बोर्ड से इंटरमीडिएट पास शायद ही कोई छात्र होगा... कुछ ऐसा ही हाल अधिकतर राज्य बोर्डों से पास छात्रों का होगा... क्या इसका अर्थ यह है कि केंद्रीय बोर्डों से पास छात्र मुल्क के अन्य बोर्डों से पास छात्रों की तुलना में अधिक क्षमतावान हैं... यह परसेंटेज तो ऐसा ही बताते हैं पर हकीकत में ऐसा है नहीं...

आईये इसका सीधा-साफ हल क्या है, यह देखते हैं...

परसेंटाइल स्कोरिंग percentile scoring (link) इस समस्या का हल है, यह विभिन्न बोर्डों से पास विद्मार्थियों की तुलना करने का न्यायोचित व तर्कसंगत तरीका है, यदि कटऑफ पर्सेन्टाइल स्कोर में घोषित किया जाये तो किसी के साथ अन्याय नहीं होगा... किसी के साथ भी अच्छे कालेजों या विश्वविद्मालयों में प्रवेश के समय अन्याय न हो इसके लिये मेरिट लिस्ट परसेंटाइल स्कोर के आधार पर ही बननी चाहिये... 

एक कदम आगे जा मैं तो यह सुझाव दूँगा कि हमारे सभी बोर्डों को पास प्रतिशत भी परसेंटाइल स्कोरिंग के आधार पर ही तय करनी चाहिये... यदि शिक्षा के स्तर को बचाये रखना है तो किसी भी विषय में ९५ पर्सेंटाइल स्कोर वाले छात्र के द्वारा प्राप्त अंकों के पचास प्रतिशत अंक पास मार्क्स होना समय की माँग है... अन्यथा पढ़े लिखे डिग्री धारी पर अपने विषय की अधकचरी समझ पाये हुऐ Unemployable Unemployed की लंबी लाइनें यों ही लगती तथा और लंबी होती रहेंगी...

तुक्का लगाने व विषय से हट कर जवाब देने की प्रवृत्ति के लिये निगेटिव मार्किंग का होना एक जरूरत हो गया है आज... परीक्षक के बायस (Bias) को खत्म करने के लिये उत्तर पत्र OMR शीट में हों व कंप्यूटर द्वारा जाँचें जायें... हमारे प्रतिष्ठित भारतीय प्रबंधन संस्थानों (IIM's) के लिये होने वाली 'कैट' परीक्षा १०+२ के इम्तहान का रोल मॉडल हो सकती है...

दिल्ली राजधानी है पूरे हिन्दुस्तान की... दिल्ली विश्वविद्मालय भी पूरे देश का ही है... तो क्या यह सही नहीं कि दिल्ली विश्वविद्मालय के इन प्रतिष्ठित कालेजों में भारत के हर भाग के अच्छे विद्मार्थियों को पढ़ पाने का न्यायोचित व समान अवसर मिले ?

मैंने अपनी तो कह दी, आप बताइये क्या सोचते हैं इस बारे मे ?




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सोमवार, 13 जून 2011

अनशन पर बाबा ,...संतों के आग्रह पर आखिरकार आज अनशन तोड़ दिया योगऋषि ने, अब क्या होगा आगे... आइये अंदाजा लगायें ( अंतिम भाग ) ...

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रामलीला मैदान से हटा दिये जाने तथा चार्टर्ड प्लेन द्वारा पहले देहरादून व फिर सड़क मार्ग से पतंजलि योगपीठ पहुंचा दिये गये योगऋषि रामदेव जी द्वारा अपने अनशन को जारी रखने का यद्मपि कोई भी औचित्य नहीं बचा था क्योंकि हरिद्वार में अनशन जारी रखने से केन्द्र सरकार पर कोई दबाव नहीं बन सकता था फिर भी न जाने क्यों योगऋषि अपने अनशन को जारी रखे हुऐ थे...

पिछले दो-तीन दिनों से खबरें आ रहीं थी कि अनशन के कारण योगऋषि के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंच रहा है, उनका रक्तदाब नीचे जा रहा है आदि आदि... इसीलिये उनको अस्पताल में भर्ती कर इन्ट्रावेनस फ्लुइड्स भी दिये जा रहे थे... तमाम कोशिशों के बावजूद भी योगऋषि के इस तरह बीमार-अशक्त हो जाने व उनकी जान को खतरा होने की खबर भी किसी बड़े जन-उबाल या जन आक्रोश को जन्म देने में असफल रही... उत्तराखंड में अनशन होने के कारण योगऋषि के सुरक्षित रहने का दायित्व भी उत्तराखंड सरकार का ही हो गया था... रामलीला मैदान की रात की घटना के बाद केंद्र सरकार ने न तो योगॠषि से किसी किस्म की कोई बात की और न ही अनशन समाप्त करने की अपील ही... ऐसे में 'आर्ट ऑफ लिविंग' के प्रणेता श्री श्री रविशंकर, राम कथा मर्मज्ञ श्री मुरारी बापू, कृपालु महाराज, आचार्य बलदेव जी, धर्मानंद जी व अन्य संत समाज ने दखल दिया और योगऋषि रामदेव जी से अनशन तोड़ने की अपील की जिसका मान उन्होंने रखा व संतों के हाथ से फलों का रस पीकर अनशन समाप्त कर दिया... कुल मिलाकर एक सही व सम्मानजनक तरीके से अनशन तुड़वा दिया गया...

योगऋषि अभी पूरी तरह स्वस्थ नहीं हैं और पूर्ण स्वास्थ्यलाभ के लिये हो सकता है कि दो-एक दिन और अस्पताल में रहेंगे... पर काले धन के विरूद्ध उनका यह आंदोलन जारी रहेगा यह घोषणा आचार्य बालकृष्ण ने प्रेस कान्फ्रेंस में की...

कालेधन का यह मुद्दा वाकई एक असरदार मुद्दा है पर इसे विदेशों में जमा कालेधन तक ही सीमित करना सही नहीं है... काले धन की परिभाषा के अनुसार :-

(Economics, Accounting & Finance / Accounting & Book-keeping) any money that a person or organization acquires illegally, as by a means that involves tax evasion.

अगर आप अपने इर्द गिर्द गौर से देखें तो काला धन चहुं ओर है... प्रापर्टी के लगभग सारे सौदों में ब्लैक और व्हाईट का कंपोनेंट अलग अलग है, किसी भी रजिस्ट्री ऑफिस जाकर आप यह बात पता कर सकते हैं कि किस तरह मुल्क के रियल एस्टेट बाजार में काले धन का बोलबाला है... ज्यादा दूर जाने की आवश्यकता नहीं कोई व्यवसायी मित्र हो तो उससे ही पूछिये कि टैक्स निर्धारण के लिये कितना सालाना टर्नओवर  वह दिखाता है और कितना टर्नओवर वाकई में है उसका... ज्यादातर दुकानदार पक्का बिल माँगने पर आपके ऊपर आक्रामक हो जायेंगे... टैक्स सर्वे करने वाली टीमों के काम पर व्यापार मंडल दखल देते हैं और ज्यादातर मामलों में उन्हें काम ही नहीं करने देते... कितने डॉक्टर, वकील, आर्किटेक्ट आदि अपनी सही आय घोषित करते हैं...महंगी कैपिटेशन फीस व ट्यूशन फीस वाले निजी क्षेत्र के विश्वविद्मालयों व कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्रों में महज कुछ ही होंगे जो सफेद धन के बूते पढ़ रहे हैं...

इसलिये कालेधन के विरूद्ध यह लड़ाई दोनों मोर्चों पर लड़नी होगी... केवल विदेश में जमा ही नहीं भारत में मौजूद व एक तरह की समानांतर अर्थव्यवस्था चला रहे कालेधन को भी राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर उसे जब्त करने की माँग की जानी चाहिये... कोई जरूरी नहीं कि राष्ट्रीय स्तर पर ही यह लड़ाई लड़ी जाये, सूचना के अधिकार का प्रयोग कर इसे गांव-गांव गली-गली भी लड़ा जा सकता है...

यदि कालेधन के विरूद्ध यह आंदोलन आगे भी योगऋषि के नेतृत्व में चलता है तो क्या यह किसी मुकाम पर पहुंच पायेगा, यह पता करने के लिये जरूरी होगा कि इसका SWOT analysis कर लिया जाये...


STRENGTHS (ताकत)... 
  • इस आंदोलन को धन की कोई कमी कभी नहीं होगी।
  • योगऋषि के पास अपना स्वयं का आस्था चैनल है जिसमें उन्हें रोजाना चार घंटे का एयरटाईम मिलता है जिस कारण प्रचार की कमी नहीं है।
  • मीडिया को योगऋषि साध चुके हैं व अपने प्रयोजन के लिये इस्तेमाल करना जानते हैं।
  • पतंजलि योगपीठ के योग शिक्षकों व पतंजलि आयुर्वेद के डीलरो-सब डीलरों के रूप में एक समर्पित कैडर आंदोलन के पास है।
  • संत समाज का साथ मिला है, और मिलेगा भी ।
  • विपक्षी दलों का सहयोग बिना मांगे मिलेगा।

WEAKNESSES  (कमजोरियाँ)
  • सबसे पहले तो उनको निर्विवाद रूप से यह साबित करना होगा कि उनके ट्रस्टों व कंपनियों में एक भी काला पैसा नहीं लगा है, यह एक मुश्किल काम है ।
  • एक बड़ी कमजोरी यह है कि योगऋषि का अपने समर्थकों की संख्या का अनुमान गलत था, वह कहते रहे कि पूरे देश में कम से कम एक करोड़ लोग उनके साथ अनशन पर बैठेंगे, पर ऐसा नहीं हुआ।
  • योगऋषि योग को बीमारी हटा शरीर को निरोग करने के एक तरीके के तौर पर सिखाते हैं इसीलिये उनके योगशिविर में उन रोगियों की तादाद ज्यादा होती है जो अपनी बीमारियों का हल ढूंढने वहाँ जाते हैं यह लोग भले ही हर बात पर दोनों हाथ भले ही उठा देते हों पर उनसे आंदोलन में जा संघर्ष करने की उम्मीद नहीं की जा सकती।
  • पारदर्शिता का अभाव एक बड़ी कमजोरी है।
  • आंदोलन के पास द्वितीय पंक्ति का नेतृत्व नहीं है।
  • आंदोलन के रणनीतिकारों व सलाहकारों ने अभी तक के अपने निर्णयों में परिपक्वता नहीं दिखाई है।
  • खुद भगवा वस्त्र धारण करने, धार्मिक मंत्र-भजन आदि गाने, यज्ञ आदि को कार्यक्रम में रखने से यह पूरा आंदोलन एक हिन्दू-आर्य समाजी धार्मिक कार्यक्रम सा लगता है, सभी को जोड़ने के विशेष प्रयास नहीं किये जाते।
  • यह आंदोलन योग, धर्म, आयुर्वेद और सामाजिक मुद्दों का अजीब सा घालमेल नजर आता है जहाँ कुछ भी स्पष्ट नहीं है।
  • जनतंत्र का 'जन' इस आंदोलन में ज्यादा तादाद में नजर नहीं आता।
  • सांप्रदायिक तत्व इस आंदोलन की साख को गिरा सरकार को उस पर हमला करने का मौका दे सकते हैं।

OPPORTUNITIES (  मौके )
  • सबसे बड़ा मौका तो यही है कि आज का राजनीतिक विपक्ष एकदम बेदम है इसीलिये इस तरह के आंदोलनों को समर्थन मिल रहा है।
  • सूचना की क्रांति के कारण व विकीलीक्स जैसी साइटों से छन कर आती सूचनायें व खबरें आंदोलन में नई जान भर सकती हैं।
  • विपक्षी राजनीतिक दल भी अपने स्वार्थ के चलते आंदोलन को सहयोग देंगे।
  • जनमानस यथास्थिति से खुश नहीं है और किसी भी उस चीज की ओर, जो बदलाव की आस जगाती हो, एक उम्मीद से देखता है।
  • यदि भविष्य में कोई बड़ा घोटाला उजागर होता है तो वह तुरंत आंदोलन को नव-प्राणित कर देगा।

THREATS  ( खतरे )
  • सबसे बड़ा खतरा तो यही है कि यह आंदोलन विपक्षी राजनीतिक दलों का मोहरा मात्र बन कर न रह जाये।
  •  योगऋषि को इस आरोप का जवाब देना होगा कि वह किसी के मुखौटे नहीं हैं।
  • दोबारा कभी भी रामलीला मैदान जैसा जनसमूह जुट पायेगा, इस में भी संदेह है।
  • अपने ट्रस्टों, दसियों विभिन्न कंपनियों के वित्तीय, टैक्स संबंधी मसलों, उनके मालिकाना हक, आचार्य बालकृष्ण व योगऋषि के छोटे भाई रामभरत की भूमिका आदि पर कुछ तीखे सवालों का उनको सामना करना होगा।
  • जिन व्यापारियों-भक्तों ने योगऋषि से जुड़ी विभिन्न कंपनियों में  लाभ कमाने के लिये धन लगाया है वह अपने निवेश की सुरक्षा के लिये चाहेंगे कि सरकार को परेशान करने वाली कोई भी हरकत न की जाये।
  • अब सुबह के प्रसारण के समय योग के द्वारा चामत्कारिक लाभ होने के उनके दावे भी सवालों के घेरे में आयेंगे।
  • लाइमलाइट में बने रहने की बाबा की महत्वाकांक्षा भी एक बड़ा खतरा है।
  • किसी भी आंदोलन को अपना लक्ष्य संसदीय लोकतंत्र के फ्रेमवर्क के अंदर ही ढूंढना चाहिये, अभी तक के जो लक्षण हैं उनसे यह आंदोलन संसदीय लोकतंत्र का मखौल सा उड़ाता दिखता है जो एक बड़ा खतरा है इस आंदोलन के स्वास्थ्य के लिये।

कुल मिलाकर मैं बहुत ज्यादा आशावान नहीं अब...

आपको क्या लगता है, यदि मुझसे भिन्न राय रखते हों इस बारे में, तो अपनी इस राय को रखने की वजह अवश्य बताइये मुझे और पाठकों को भी...



आभार!



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रविवार, 5 जून 2011

अनशन पर बाबा, सिस्टम का पलटवार और इस बार तो निराश ही किया योगऋषि ने... (भाग-२)

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४ जून की सुबह से चल रही यह लीला अब बेहद अप्रिय दौर पर पहुंच चुकी है...

भ्रष्टाचार और काले धन के विरूद्ध चल रहा यह आंदोलन एक  'आवासीय योग विज्ञान प्रशिक्षण एवं अष्टांग योग व्याख्यानमाला शिविर' के बैनर तले चल रहा था... साध्य के लिये प्रयुक्त साधनों की शुचिता को भी उतना ही महत्व देने के परंपरा वाले हम लोगों में से कईयों को यह बात बहुत ही असहज कर रही थी, मैं भी उनमें से एक हूँ... अपने पिछले आलेख में इसीलिये मैंने इस बात को लिखा भी था... जब इस अनशन की योजना व प्रचार महीनों पहले से चल रहा था तो क्यों नहीं इस बात के लिये निर्धारित जगह की ही अनुमति ली गई... सरकार यदि मना करती तो यह बात जनता के सामने रखी जा सकती थी और अनुमति पाने के लिये उपलब्ध अन्य तरीकों का प्रयोग किया जा सकता था... विडंबना तो देखिये कि रामलीला मैदान को खाली करवाने के लिये प्रशासन ने ठीक इसी तर्क का प्रयोग किया...

पुलिस व प्रशासन अब यह कहता है कि उन्हें योगऋषि रामदेव व उनके एक अन्य सहयोगी की जान के ऊपर खतरे की स्पेसिफिक सूचना मिली थी इसीलिये वह देर रात को उन दोनों लोगों को सुरक्षित स्थान पर ले जाने के लिये वहाँ गये थे... यह मान भी लिया जाये कि यह प्रशासन की एक चाल थी फिर भी ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर पद के अधिकारी के रामलीला मैदान पर जा बाबा को यह बताने के बाद जो हुआ वह टीवी कैमरों ने दुनिया को दिखाया... बाबा योगऋषि रामदेव ने झटके से हाथ छुड़ाया, स्टेज के एक कोने तक गये जहाँ से उनके अति उत्साही समर्थकों ने उनको मंच से नीचे समर्थकों की भीड़ के बीचों-बीच कुदवा दिया... योगऋषि एक भक्त के कंधों पर बैठ जन-समूह को संबोधित करने लगे... उनकी महिला समर्थकों ने उनके चारों ओर घेरा सा बना लिया... इसके बाद योगऋषि के कथन के अनुसार ही भयातुर हो वह स्टेज के नीचे या पीछे कहीं काफी देर छुपे रहे व महिला के वस्त्रों में चेहरे व बालों को ढके हुऐ रामलीला मैदान से बाहर निकल जाने के प्रयत्न में पुलिस के कब्जे में आ गये...


शाम को प्रेसवार्ता में योगॠषि ने कहा कि उन्होंने यह सब इसलिये किया कि उनको यह अंदेशा था कि सरकार-पुलिस या तो उनको गायब कर देती या उनका एनकाउंटर कर देती... उनका यह भी कहना था कि जिस पुलिस ने उनको एयरपोर्ट पहुंचाया वह तो अच्छी थी परंतु जो पंडाल के अंदर उनको लेने आई थी वह कतई दुष्ट थी... सवाल यह है कि क्या पल-पल की खबर को लाईव प्रसारित करते हुऐ इलेक्ट्रानिक मीडिया की मौजूदगी में ऐसा संभव था ?... क्या इतने उच्च पुलिस अधिकारी की बात पर विश्वास नहीं किया जाना था... योगऋषि के जिन रणनीतिकारों, सलाहकारों व खबर देने वालों ने उनके मस्तिष्क में इस तरह का भय पैदा किया या इन  विचारों के बीज बोये वह आंदोलन के बहुत बड़े दुश्मन थे...


इस पूरे आंदोलन में दूसरी पंक्ति के नेतृत्व का अभाव है... योगऋषि के यों मंच छोड़ छिप जाने से नेतृत्वहीन हो चुकी भीड़ ने भी आपा खोया और मौके पर मौजूद पुलिस बल ने वही किया जिसके लिये वह कुख्यात है... सभी को शुक्र मनाना चाहिये इस बात का कि पचास हजार से अधिक की इस भीड़ के बीच मची भगदड़, दोनों ओर से चल रही ईंट-पत्थरबाजी, फूटते आंसू गैस के गोलों व पंडाल के एक हिस्से में लगी आग के बीच कोई बड़ी जन-हानि नहीं हुई... पुलिस बल ने जो कुछ किया कैमरों ने लाइव दिखाया... जिस किसी भी अधिकारी या जवान ने किसी भी महिला-पुरूष-बच्चे  पर अनावश्यक व अनुचित बल प्रयोग किया हो तो न्याय का तकाजा है कि उसे चिन्हित कर कड़ी से कड़ी सजा मिले... योगऋषि ने ठीक ही कहा है कि वह इस पूरे मामले को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ले जायेंगे... उम्मीद कीजिये कि आयोग से सभी को न्याय व दोनों पक्षों के दोषियों को सजा मिलेगी...


यह तो थी रात की बात... शाम को हुआ यह कि योगऋषि ने सभी की उपस्थिति में घोषणा की कि सरकार ने उनकी सारी बातें मांग ली हैं... लगभग ठीक उसी समय केन्द्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने आचार्य बालक़ृष्ण द्वारा हस्ताक्षरित एक कागज मीडिया को दिखाया जिसमें उन्होंने चार तारीख शाम को अनशन खत्म करने व छह तारीख तक तप करने के बारे में लिखा था... मीडिया तुरंत पूरे मामले को पहले से फिक्स कह योगऋषि की आलोचना करते हुऐ चीखने सा लगा... इसका पता चलते ही योगऋषि ने मंत्री कपिल सिब्बल व सरकार पर विश्वासघात का आरोप लगाते हुऐ अनशन को जारी रखने का निर्णय ले लिया...


अब पतंजलि योगपीठ, हरिद्वार पहुंच योगऋषि ने अपने अनशन को जारी रखने व शीघ्र ही दिल्ली या दिल्ली के आसपास किसी जगह जा अनशन जारी रखने संबंधी बयान दिया है... पर इसबार का यह अनशन क्या पहले सा प्रभाव रखेगा इसमें संदेह है...


कांग्रेस के कुछ पदाधिकारियों ने योगऋषि की आलोचना व उन पर हमले करते हुऐ मर्यादा का उल्लंघन किया है उन्हें यह याद रखना चाहिये कि यह देश एक सन्यासी के प्रति ऐसी भाषा के प्रयोग को कभी माफ नहीं करेगा...


कुल मिलाकर यही कह पाउंगा कि इस पूरे प्रकरण ने योगऋषि के कद व उनके प्रभाव को कम किया है, अब उनकी हर बात में पहले सा वजन शायद ही आ पायेगा ...

इस बार तो सभी के सम्मुख दिखलाये अपने नेतृत्व से आपने निराश ही किया है हर किसी को योगऋषि रामदेव जी...


पर न तो यह लड़ाई आखिरी है और न ही यह आकलन ही ...






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शनिवार, 4 जून 2011

अनशन पर बाबा, ठेंगे पर लोकतंत्र और सकते में देश... (भाग-१)

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यह एक विद्रूप नहीं तो और क्या है कि अनशन पर बैठे बाबा योगऋषि रामदेव के पीछे लिखा बैनर बता रहा है कि यह एक आवासीय योग विज्ञान प्रशिक्षण एवं अष्टांग योग व्याख्यानमाला शिविर है... हर चीज को मॉडरेशन में करने-बरतने की शिक्षा देने वाले योग प्रशिक्षणार्थियों के लिये यह अनशन भी कुछेक दिन मात्र नींबू-पानी पीकर डिटॉक्सीफिकेशन का मौका देता हो शायद...

जंतर-मंतर पर जनलोकपाल बिल के लिये अन्ना के अनशन के बाद यह दूसरा मौका है कि 'राष्ट्र-हित' के मुद्दों पर मनमाफिक कानून बनाने के लिये सरकार को मजबूर करने के लिये जनसमूह रामलीला मैदान पर बैठा है... चौबीसों घंटे खबरिया चैनल चलाने वालों के लिये तो एक तरह का स्वर्णिम अवसर सा है यह, बिना कुछ किये-धरे दिन भर दिखाने के लिये मसाले व विजुअल्स व साउंड बाईट्स की कमी नहीं रहेगी...

पहले के इसी तरह के आंदोलनों की तरह ही यह अनशन भी कुछेक दिन में अपनी तार्किक परिणति को प्राप्त होगा... आखिर  आडियन्स फटीग ( Audience Fatigue ) भी कोई चीज होती है... मैं तो इससे एक कदम आगे की सोचने जा रहा हूँ कि अब आगे कौन-कौन बैठने जा रहा है बोट क्लब, रामलीला मैदान या जंतर-मंतर पर...

१- तैंतीस फीसदी आरक्षण के लिये महिलायें ।
२- आरक्षण के लिये संघर्षरत राजस्थान के गुज्जर आंदोलनकारी ।
३- आरक्षण के लिये संघर्षरत जाट समूह ।
४- निजी क्षेत्र में भी आरक्षण की माँग करने वाले जन-समूह ।
५- आत्मनिर्णय (???) की माँग करने वाले कश्मीरी विखंडनकारी जो निश्चित तौर पर अरूंधती व स्वामी अग्निवेश जैसे अपने रहनुमाओं की अगवाई में होंगे...
६- मुल्क में कोई भी बाँध-बिजलीघर न बनने देने को कृतसंकल्प पर्यावरणवादी, जिनके लिये इंसान की परेशानियों का कोई मोल नहीं...

लिस्ट और लंबी हो सकती है पर मैं सब कुछ खुद ही क्यों जोड़ूं, कुछ आप भी जोड़िये न...

पर इस सब के पीछे जो सबसे अहम बात छूट जाती है और जिसका भुला दिया जाना मुझे असहज कर देता है वह है कि हम एक लोकतंत्र हैं... २७३ लोकसभा सांसदों को यदि आप अपनी बातों-मांगों से सहमत कर सकते हैं तो आप जो चाहे वह बिल पास करवा सकते हैं... हजारों-लाखों या फिर आयोजकों के मुताबिक करोड़ों का यह हुजूम महज कालेधन ही नहीं देश की हर समस्या का निदान करते कानूनों का एक ड्राफ्ट बनाये और फिर अपने अपने लोकसभा क्षेत्र के सांसदों को पकड़ें व उनको लोकसभा में उन बिलों का समर्थन करने को मजबूर कर दें... कौन रोकता है इससे...

पर यह सब करने से न तो चैनलों पर २४ X ७ लाइव कवरेज मिलेगी... न ही एसएमएस का विश्व रिकार्ड बनेगा... न ही एक खाई-पीयी-अघाई भीड़ (यह मैं जानबूझ कर लिख रहा हूँ, क्योंकि मेरी नजर में यही सत्य है )  को धार्मिक भजनों व गीतों पर झूम-झूम ताली बजा गाने का मौका मिलेगा... न ही भुला से दिये गये हर रंग के कपड़े पहने धर्मगुरूओं को चैनलों को ताकती भीड़ के सामने अपनी वाक-क्षमता प्रदर्शित करने का सुअवसर मिलेगा... न ही लोगों को खुद की तुलना गाँधी व सुभाष जैसे महानायकों से करने-करवाने का सुख मिलेगा...

इसीलिये बाबा आज अनशन पर हैं...

लोकतंत्र ठेंगे पर है...

और मुझ जैसे लोग एक किसिम के सकते में भी हैं...



हमें कहाँ जाना-पहुंचना था और यह कहाँ आ गये हम ?






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