बुधवार, 25 मई 2011

थैंक यू मिनिस्टर, इस खरी-खरी को सुनाने के लिये... पर इससे आगे क्या ?

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अपने पर्यावरणमंत्री जयराम रमेश नये दौर के राजनीतिज्ञ हैं... जो सोचते-समझते हैं बिना किसी लाग लपेट के उसे सीधा-साफ सही मंच पर कहने में यकीन करते हैं... 

अपने अनूठी भारतीय विशिष्टता ( Peculiar Indian Characteristic ) वाले बयान के बाद अब फिर उन्होंने भारतीय अकादमिक-राजनीतिक जगत में एक भूचाल सा मचा दिया है यह कहकर कि हमारे आईआईटी व आईआईएम की फैकल्टी ( शिक्षक ) विश्व स्तरीय नहीं हैं...


विश्वस्तरीय नहीं आइआइटी आइआइएम : जयराम रमेश

नई दिल्ली: पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने देश में शोध और प्रबंधन से जुड़े शीर्ष संस्थानों आइआइटी और आइआइएम की गुणवत्ता पर सवालिया निशान लगाया है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आइआइटी) और भारतीय प्रबंध संस्थानों (आइआइएम) के शिक्षकों को आड़े हाथ लेते हुए उन्होंने कहा कि ये संस्थान विश्व स्तरीय नहीं हैं। खुद आइआइटी मुंबई के छात्र रहे रमेश के अनुसार, विद्यार्थियों के गुणवत्ता के कारण ही हमारे आइआइटी और आइआइएम संस्थान उत्कृष्ट बने हुए हैं। मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बीटेक जयराम रमेश सोमवार को एक कार्यक्रम के बाद पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे। देश के आइआइटी संस्थानों को एक तरह से आइना दिखाने हुए उनका साफ कहना था कि हमारे प्रौद्योगिकी संस्थानों से बमुश्किल कोई महत्वपूर्ण शोध हो पाता है। यह तो छात्र हैं जिनकी गुणवत्ता के चलते ये संस्थान उत्कृष्ट हैं। रमेश के मुताबिक, संस्थान नहीं, यहां के छात्र विश्व स्तरीय हैं। उन्होंने कहा कि देश के आइआइटी और आइआइएम संस्थानों को उनके शिक्षकों या शोध की गुणवत्ता के कारण नहीं बल्कि उत्कृष्ट किस्म के छात्रों की वजह से जाना जाता है। पर्यावरण मंत्री ने माना कि सरकारी तंत्र के मकड़जाल के चलते भारत विश्व स्तरीय शोध केंद्र विकसित नहीं कर पाता है। रमेश ने साफ कहा कि सरकारी तंत्र में विश्व स्तरीय शोध केंद्र विकसित नहीं हो सकते हैं। हमारा साठ वर्ष का अनुभव यही बताता है। जयराम रमेश ने गुजरात के जामनगर में रिलायंस इंडस्ट्रीज से साझा उपक्रम में विश्व स्तरीय राष्ट्रीय समुद्री जैव विविधता केंद्र की स्थापना करने के अपने मंत्रालय के फैसले को जायज ठहराया। जयराम रमेश ने कहा कि पर्यावरण मंत्री के रूप में अपने मौजूदा कार्यकाल के दौरान वह भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण (बीएसआइ) और भारतीय जीव विज्ञान सर्वेक्षण जैसे संस्थानों को सरकार से स्वतंत्र व स्वायत्त बना पाने में असमर्थ रहे हैं। इसका उन्हें बेहद अफसोस है और इस कारण वह हताश भी हैं।

यही खबर अंग्रेजी में आप यहाँ पर देख सकते हैं... 

यह खरी बात जयराम रमेश कहने की हिम्मत जुटा पाये इसके पीछे एक बड़ा कारण यह भी है कि वह स्वयं भी आईआईटी मुम्बई के विद्मार्थी रहे हैं... जिस तरह से उनके बयान का विरोध हो रहा है उससे उस स्थिति की कल्पना कीजिये जब कोई नॉन आईआईटियन मिनिस्टर इस बात को कहता... उसे तो मजाक का पात्र बना दिया गया होता...

जयराम रमेश जी के कहे के विरोधी पार्टियों तथा उनके ही दल के द्वारा भी एवं आईआईटी/आईआईएम फैकल्टी द्वारा किये जा रहे विरोध का नजारा भी देखिये :-

और

पर क्या कुछ गलत कह रहे हैं जयराम रमेश... आप खुद आंकिये...

रमेश के अनुसार, विद्यार्थियों के गुणवत्ता के कारण ही हमारे आइआइटी और आइआइएम संस्थान उत्कृष्ट बने हुए हैं। रमेश के मुताबिक, संस्थान नहीं, यहां के छात्र विश्व स्तरीय हैं। उन्होंने कहा कि देश के आइआइटी और आइआइएम संस्थानों को उनके शिक्षकों या शोध की गुणवत्ता के कारण नहीं बल्कि उत्कृष्ट किस्म के छात्रों की वजह से जाना जाता है।

क्या यह सही नहीं है इन संस्थानों में १२१ करोड़ आबादी वाले इस महादेश में उपलब्ध सर्वश्रेष्ठ छात्र जाते हैं, यह छात्र वहाँ पहुंचने से पहले ही सफलता के लिये आवश्यक सभी गुणों जैसे विषय की सही समझ, मेहनत करने की क्षमता, एकाग्रता लगन व तेजी से सही निर्णय लेने की क्षमता से पूर्ण होते हैं... 

Anil Gupta, professor at IIM-A, said, "Ramesh has shown tremendous ignorance about the intellectual capabilities of these institutions. I would not deny the fact that they need to do more. But to say that faculty is not making any contribution and it is just because of the quality of students... then people should take the CAT scores and give jobs to them."

  यहाँ पर कहना बुरा तो लगेगा कईयों को परंतु है सत्य... कि CAT  99.5 Percentile स्कोर पाने वाले छात्र को यदि सीधे भी कोई जॉब दे दिया जाये तो उसकी पर्फार्मेंस अधिकाँश औसत अन्यों की अपेक्षा बेहतर होगी...

Sebastian Morris, another professor at IIM-A, described the remarks as "simplistic". "Most of the faculty would be having same qualification as the faculty in top-class institutions, which means they have done their PhDs abroad," Morris said.
  
यहाँ पर फिर यही सवाल पूछा जा सकता है कि क्यों इतने साल बाद भी हमारे इन संस्थानों से की गई PhD उतनी मान्यता नहीं रखती...
While HRD minister Kapil Sibal agreed no Indian institution ranked among the top 150 universities globally...
  
ऐसा क्यों, दुनिया की कुल आबादी का पाँचवाँ हिस्सा हैं हम, और शीर्ष के १५० संस्थानों में हमारा कोई संस्थान नहीं...

बेहतर यही रहेगा कि ठोस जमीनी हकीकत को जाना जाये व उसे सुधारने के तरीकों को अपनाया जाये... पर यह सब करने के पहले आत्म-आकलन व आत्म-विश्लेषण जरूरी है... जो करने को हमारे उच्च शिक्षा के यह संस्थान तैयार नहीं दिखते...

आज की तारीख की ठोस हकीकत तो यही है कि अधिकाँश छात्र आईआईटी से डिग्री लेने के बाद आईआईएम या अन्य किसी टॉप के संस्थान से एमबीए करने के बाद मल्टीनेशनल कॉरपोरेशन्स की मोटी पगार वाले प्रबंधक की नौकरी ( विदेश में हो तो और भी अच्छा ) पाने को ही अपना एकमात्र जीवन लक्ष्य मान बैठे हैं...

अपना देश जो हर तरह की तकनीक के मामले में दुनिया से काफी पिछड़ा है, उसके लिये नई, कारगर व सस्ती तकनीकें विकसित करने का सपना देखना/ प्रयास करने का प्रयत्न मात्र भी नहीं करते हमारी नई पीढ़ी के यह मेधावी... और न ही इन संस्थानों की फैकल्टी उनको यह सपना देखने को प्रेरित करती है...

थैंक यू मिनिस्टर ! आप सही हैं इस बार भी... हमारे इन संस्थानों के शिक्षक या उनमें किये जा रहे शोध में विश्वस्तरीय गुणवत्ता नहीं है... कोई सुधार भी तभी हो सकता है जब हकीकत को स्वीकारा जाये... पर अभी तो ऐसा होना संभव नहीं लगता... यह संस्थान खुद के बनाये ऊँचे सिंहासनों में बैठ जीते रहेंगे... हकीकत को नकारते हुऐ... मल्टीनेशनल आकाओं के लिये ज्यादा से ज्यादा मुनाफा पैदा करने वाले सेवक ( सॉरी मैनेजर ) उनको देते हुऐ... और हमें हर चीज/ हर तकनीक खरीदनी ही पड़ेगी तकनीकी महारत रखने वाले प्रथम विश्व के सौदागरों से...





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16 टिप्‍पणियां:

  1. मिनिस्‍टर का बिल्‍कुल सटीक और सत्‍य कथन, श्रेष्‍ठ आलेख और श्रेष्‍ठ विचार। हमारे छात्र न जाने कितने सपने लेकर उच्‍च संस्‍थानों में अध्‍ययन करने जाते हैं और वहाँ का आचरण और कार्य से उनकी शिक्षा का विकास नहीं होता अपितु वे जितना आता है उतना भी भूल जाते हैं। यह भी सत्‍य है कि केट परीक्षा के विद्यार्थी को सीधी नौकरी दे दी जाए तो वे इन डिग्री-धारियों से अधिक योग्‍य सिद्ध होंगे। आज के शोध कार्य के स्‍तर को तो सभी जानते हैं।

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  2. मैं हर तरह के कॉलेज/स्कूल से शिक्षा प्राप्त कर चुका हूँ,

    गांव के सरकारी स्कूल, शहरों में गली-गली खुलने बाले प्राइवेट स्कूल, एक मध्यवर्गीय प्राइवेट कॉलेज, एक उच्चस्तरीय अर्ध-सरकारी कॉलेज तथा आई.आई.टी. सभी जगह और आई.आई.टी. मैं एक अंतर जो मुझे दिखाई दिया है वो ये कि रात के बारह बजे भी यदि आप प्रोफ़ेसर को मेल करते हैं तो भी आपके प्रश्न का उत्तर आपको आधे घंटे के अंदर मिल जायेगा|

    छुट्टी बाले दिन भी उनको परिवार के साथ घूमने की जगह क्लास लेना भाता है,

    उनके बारे में उल्टा सीधा बोल कौन रहा है? अभी मैंने इन पर्यावरण मंत्री का भूतकाल टटोला नहीं है, टटोल कर ही इनके बारे में कुछ लिखूंगा|

    आज यदि आई.आई.टी. जैसे संस्थानो में कुछ कमी है तो वह है रिसर्च को उद्यमिता में बदलने का अभाव हालांकि SINE खुलने के बाद इसमें थोडा सा बदलाब आया है पर अभी बहुत कार्य होना बाकी है,

    इन मंत्री को यदि वाकई शिक्षा की इतनी चिंता है तो अनर्गल बयानबाजी करने की जगह उसको दूर करने का प्रयत्न करें तो बेहतर होगा|

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  3. मेरे विचार से उनका इशारा उन छात्रों की और है जो पढ़ लिखकर अच्छी नौकरी करना चाहते हैं, लेकिन ऐसे संस्थान का शिक्षक बनना नहीं... शायद इसका कारण उचित वेतन ना मिलना भी हो सकता है...

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  4. योगेन्द्र जी,

    अभी इन खासियतों को और ऊपर ले जाने का समय आ गया है. जिस तरह से छात्रों का स्तर दिन-बा-दिन बढ़ रहा है, उसी तरह शिक्षकों का स्तर भी दिन-बा-दिन बढ़ना चाहिए...

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  5. काश ऐसे ही और लोग मिल जाएँ इस देश को प्रवीण भाई ! शुभकामनायें !

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  6. मंत्री जी ने विदेशी इंस्टीच्यूट भी देखे हैं , इसलिए वे सही कह रहे होंगे।
    अब उन्हें यह भी देखना चाहिए कि क्या हमारे नेता विश्वस्तरीय हैं ?

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  7. गहन चर्चा है पर आगे क्या? सही प्रश्न।

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  8. मंत्री ने महत्वपूर्ण बात की है -ये हट कर हैं ..
    इस देश में आप कुछ भी ठोस करना चाहें तो बड़ी मुश्किलें हैं
    दोयम दर्जे के लोग वहां हैं जहाँ उन्हें नहीं होना चाहिए !

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  9. @शाह नवाज जी: क्या आपने आई.आई.टी. मैं पढ़ा है?

    एक मंत्री के बोलने से आप सभी लोग उसके साथ हो गए, उनके साथ पढ़े हुए सभी विद्यार्थी उनकी इस बात का विरोध कर रहे हैं वो आप लोगों को नहीं सुनाई दे रहा?

    @सतीश सक्सेना जी: कैसे लोग? सिर्फ बोलने बाले? क्या ये मिनिस्टर कुछ करता है? कीचड तो कोई भी उछाल सकता है| ऐसे लोग तो पहले से ही बहुत हैं| और कितने चाहिए?

    @अनवर: मंत्री ने यदि विदेशी इंस्टीट्यूट देखे हैं तो उसने पढाई के प्रति विदेशी सोच तथा विदेशी सरकारी सहयोग भी देखा होगा, वहाँ तो उसको कोई कमी नहीं दिखाई दी|

    मुझे लगता है कि हम भारतीयों को आदत है साफ़ दामन वाले व्यक्ति पर ही कीचड फेंकने की, जब बाबा रामदेव ने कुछ करना चाहा तो सारे ब्लोगर उनके खिलाफ हो गए, जब ये मिनिस्टर आई.आई.टी. के खिलाफ कुछ बोल रहा है तो आप उसके साथ हो गए| समस्या हम भारतीयों के दिमाग में है उसका इलाज जरूरी है और वो शायद तभी संभव हो जायेगा जब हम दुबारा गुलाम बन जायेंगे|

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  10. अब यही देखिये न, मेरे पास बिट्स में व्याख्याता बनने का अवसर था, पर मैने सिविल/इंजीनियरिंग सेवा चुनी।
    आज ही नहीं, तीस साल पहले भी पढ़ाने के पेशे के बारे में बहुत क्रेज नहीं था।

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  11. योगेन्द्र भाई,

    मैंने तो अपनी टिप्पणी में कहीं भी उस मंत्री को अच्छा या बुरा नहीं कहा... बल्कि मैंने तो मंत्री के बारे में कोई बात ही नहीं की.

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    @ योगेन्द्र पाल जी,

    १- जब आप मित्र शाहनवाज को कह रहे हैं :-

    "@शाह नवाज जी: क्या आपने आई.आई.टी. मैं पढ़ा है?"

    तब मेरी यह बात साबित हो रही है कि यदि जयराम रमेश जी की जगह किसी और ने यह कहा होता तो उसे सीधे-सीधे फ्रस्ट्रेटेड-मूर्ख-सरफिरा कह मजाक बनाया गया होता... :)


    २- आप अपने आईआईटी के शिक्षकों के बारे में जो बता रहे हैं उससे विद्मार्थियों के लिये हमेशा उपलब्ध रहने वाले, छुट्टी के दिन भी काम करने वाले, मेहनती व मेहनत करवाने वाले शिक्षकों की छवि उभरती है... पर यहाँ पर mind को ignite कर एक Brilliant Spark ( जो दुनिया की सूरत बदलने में सक्षम हो ) को पहचानने-पोषित करने या पैदा करने की क्षमता व Vision रखने वाले शिक्षकों की बात हम कर रहे हैं!



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  13. http://blog.eduployment.in/2011/05/blog-post_29.html

    ये लिंक आपके काम आएगा

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  14. क्या हमारे राजनीतिज्ञ विश्वस्तरीय हैं ?

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  15. किर्पया ईसको भी देखें:-

    http://epaper.hindustantimes.com/PUBLICATIONS/HT/HD/2011/05/29/PagePrint/29_05_2011_013.pdf

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