मंगलवार, 17 मई 2011

' न स्वर्ग है और न मृत्यु के बाद जीवन '... और हम ख्वामखाह ही समय गंवाये जा रहे हैं !!!

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मेरे  ' स्वर्ग-जन्नत ' की चाह रखते मित्रों,

खबर वाकई दिल तोड़ देने वाली है, मरणोपरांत स्वर्ग या जन्नत का सुख भोगने की चाह रखने वालों के लिये  ... स्टीफन हॉकिंग ने एक बार फिर दोहरा दिया है कि   " न स्वर्ग है और न मृत्यु के बाद जीवन, स्वर्ग और मृत्यु के बाद का जीवन परी कथाएं हैं, जो मौत से डरने वालों के लिए गढ़ी गई हैं।   " ...  हिन्दी में यह खबर देखें यहाँ पर...  उद्धरित करता हूँ...

न स्वर्ग है और न मृत्यु के बाद जीवन : स्टीफन हॉकिंग
लंदन, प्रेट्र : स्वर्ग और मृत्यु के बाद का जीवन परी कथाएं हैं, जो मौत से डरने वालों के लिए गढ़ी गई हैं। दुनिया के सबसे लोकप्रिय वैज्ञानिकों और विचारकों में शुमार स्टीफन हॉकिंग ने यह दावा किया है। चर्चित किताब ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम के लेखक हॉकिंग ने ब्रिटिश अखबार द गार्जियन को दिए साक्षात्कार में कहा कि जब मस्तिष्क मर जाता है, तो उसके उसके बाद कोई अस्तित्व नहीं रह जाता। हॉकिंग 21 साल की उम्र से मोटर न्यूरॉन नामक बीमारी का शिकार हैं। उन्होंने कहा, मैं पिछले 49 साल से असमय मृत्यु की आशंका के साथ जी रहा हूं। मुझे मरने से डर नहीं लगता, लेकिन मुझे मरने की कोई जल्दी भी नहीं है। मेरे पास बहुत कुछ है जो मैं मरने से पहले करके जाना चाहता हूं। उन्होंने कहा कि मैं दिमाग को एक कंप्यूटर की तरह मानता हूं, जो उसके अलग-अलग हिस्सों के फेल हो जाने पर काम करना बंद कर देता है। दिमाग के फेल होने के बाद स्वर्ग और मौत के बाद जीवन जैसी संभावना नहीं बचती। यह सिवाय परियों की कथा के और कुछ नहीं है। साक्षात्कार में उन्होंने मृत्यु के बाद के जीवन की अवधारणा को खारिज कर दिया और अपनी क्षमताओं का भरपूर इस्तेमाल करते हुए धरती पर बेहतर जीवन की आवश्यकता पर बल दिया। हॉकिंग ने लंदन में हम यहां क्यों हैं विषय पर दिए लेक्चर के बारे में कहा, विज्ञान बताता है कि इस बृह्माँड में आकाशगंगाएं हैं, जहां शून्य में से चीजें जन्म ले रही हैं। यह सिर्फ मौके की बात है कि हम इस धरती पर हैं।

विस्तार से व मूल स्रोत से यह खबर पढ़ना चाहते हैं तो यह रहा ' गार्जियन ' अखबार का लिंक ( अंग्रेजी में )...

यह तो रही खबर की बात... अब जरा सोचें कि क्या कुछ नया कह रहे हैं स्टीफन हॉकिंग... अगर हम उपलब्ध ज्ञान, तथ्य व सबूतों का प्रेक्षण करें तथा एक पूर्वाग्रह-रहित सोच के साथ निष्कर्षों तक पहुंचने का प्रयत्न करें तो क्या हम भी इन्हीं निष्कर्षों पर नहीं पहुंचेंगे ?...

In the interview, Hawking rejected the notion of life beyond death and emphasized the need to fulfill our potential on Earth by making good use of our lives. In answer to a question on how we should live, he said, simply: "We should seek the greatest value of our action.

मेरे बहुत से मित्र यहाँ पर यह तर्क अवश्य देंगे कि माना कि यह यह अवधारणायें  असत्य हैं व दिल को दिलासा दिलाने के लिये रची गई हैं फिर भी इनको मानते रहने में हर्ज क्या है, किसी का नुकसान तो नहीं हो रहा...

उनसे मुझे मात्र दो बातें कहनी हैं...

१-  इन अवधारणाओं के कारण मानव जाति का बहुत सा समय, धन व कर्म इनको पोषित करने में लगता है जिससे इंसान की नस्ल अपने सही Potential को Fulfill नहीं कर पाती है !

२- दूसरी जो सबसे बड़ी बात है वह यह है कि ईश्वर, धर्म, स्वर्ग-नर्क की इन्ही अवधारणाओं के कारण ही आज का इंसान एक दूसरे से दूर है, लफड़े हैं, झगड़े हैं, फसाद हैं, विवाद हैं... धार्मिक कट्टरपंथी, दंगाई, आतंकवादी और आत्मघाती हमलावर भी... केवल और केवल ' अपने ईश्वर ' को खुश करने व मरणोपरांत स्वर्ग का शाश्वत सुख पाने की चाह में दुनिया को और बदसूरत बनाते रहते हैं !

आप क्या सोचते हैं, फैसला आपका है...

वैसे ऊपर बनी बस पर बैठने के लिये सभी आमंत्रित हैं ... :)



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36 टिप्‍पणियां:

  1. इस धरती पर हम शान्ति पूर्वक जीवन व्‍यतीत करें, बस यही उद्देश्‍य हैं। इन धारणाओं पर तो अनादि काल से चिंतन होता रहा है और होता रहेगा। सभी के अपने मत है लेकिन अपने मत को ही केवल सत्‍य मानना हिंसा को जन्‍म देता है इसलिए इसके लिए दुराग्रह नहीं होना चाहिए।

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  2. धरती पर बेहतर जीवन की आवश्यकता...

    यही महत्त्वपूर्ण बात है...

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  3. आदमी की आंख जितना देख सकती है चीज़ें सिर्फ़ उतनी ही नहीं होतीं। आदमी की आंख बहुत सीमित दायरे में ही देख पाती है और यही बात उसकी बुद्धि के बारे में भी कही जा सकती है। अभी तो मनुष्य अपनी पूरी बुद्धि के उपयोग करने तक भी नहीं पहुंचा है।
    अगर आदमी में शाश्वत जीवन की इच्छा है तो कहीं उसकी प्राप्ति भी है। अगर आदमी कोई नेक-बद कर्म करता है तो कहीं उसका प्रतिफल भी है। दुनिया में तो नेक लोगों को सिवाय अपमान और दुख के कुछ हाथ आता नहीं और मौक़ापरस्त हमेशा से राज करते ही आ रहे हैं। स्वर्ग-नर्क के नाम पर जनता का शोषण हुआ है तो इसका यह मतलब नहीं है कि ये हैं ही नहीं। अगर कुछ जाली करेंसी पकड़ी जाती है तो इसका यह मतलब नहीं है कि असली करेंसी होती ही नहीं है।
    जो भी आदमी स्वर्ग-नर्क से इंकार करता है, वह लोगों को नेकी का बदला मिलने से मायूस करता है। गुंडे-बदमाश यही सोचते हैं और बेफ़िक्र होकर अय्याशियां करके मर जाते हैं। उनका कहीं कुछ बिगड़ने वाला नहीं है। अगर यह धारणा पश्चिम की यहां भी आम हो जाएगी तो हालात बदतरीन हो जाएंगे। इसमें कोई शुब्हा नहीं है।

    http://ruhani-amaliyat.blogspot.com/

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    @ डॉ० अनवर जमाल साहब,

    अगर कुछ जाली करेंसी पकड़ी जाती है तो इसका यह मतलब नहीं है कि असली करेंसी होती ही नहीं है।

    आपके इस तर्क में एक कमी है वह यह कि असली और नकली करेंसी, दोनों हमारे सामने हैं हमें दिखाई देती हैं, हम उनमें तुलना कर सकते हैं... जबकि आलेख में वर्णित दुरूह अवधारणायें दिखाती कुछ नहीं केवल सुख का लालच, कष्ट का डर और सर्वशक्तिमान का वजूद वाकई होने के झांसे के सिवा...



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  5. मुझे मौत से डर नहीं लगता क्योंकि मैं तो अपने जन्म से पूर्व करोड़ों-अरबों सालों से मरा हुआ था और जिससे मुझे तनिक भी कष्ट नहीं हुआ । अपनी मौत के बाद फिर मैं दोबारा उसी स्थिति में पहुँच जाऊँगा । फिर मौत से डर कैसा ।

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  6. काश ये बात उन जेहादियों की समझ में भी आ पाती जो जन्नत के फेर में खुद के साथ हजारों लोगों को भी मौत के घाट उतार देते हैं ।
    मेरे ब्लॉग पर भी पधारें - संशयवादी विचारक

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  7. काश ये बात उन जेहादियों की समझ में भी आ पाती जो जन्नत के फेर में खुद के साथ हजारों लोगों को भी मौत के घाट उतार देते हैं ।
    मेरे ब्लॉग पर भी पधारें - संशयवादी विचारक

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  8. काश ये बात उन जेहादियों की समझ में भी आ पाती जो जन्नत के फेर में खुद के साथ हजारों लोगों को भी मौत के घाट उतार देते हैं । आदिम काल से चले आ रहे इन विश्वासों ने जन-मानस में इस कदर पैठ बना ली है कि इतनी आसानी से इन्हें मिटा पाना संभव नहीं है ।
    मेरे ब्लॉग पर भी पधारें - संशयवादी विचारक

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  9. @ प्रिय प्रवीण जी ! तर्क में कमी नहीं है, कृप्या इसे समग्र रूप से समझने का कष्ट करें ।
    इंसान इंटेलिजेंट है , वह देखता है और सीखता है। इंसान ने जितनी भी चीज़ें बनाई हैं , आस-पास की चीजें देखकर ही बनाई हैं । इंसान की बनाई चीजों में एक डिज़ायन मौजूद मिलता है और उसने जिस चीज़ को देखकर यह चीज़ बनाई होती है उसमें भी एक डिज़ायन मिलता है और हरेक डिज़ायन एक बुद्धि का पता देता है, यह विज्ञान का नियम है ।
    हमारे आसपास मौजूद हरेक चीज़ में मौजूद डिज़ायन यह बता रहा है कि उसकी रचना किसी बुद्धि से हुई है। इसी के साथ हम देखते हैं कि हरेक चीज़ अपने फ़ाइनल मॉडल पर है । किसी भी चीज़ का उससे बेहतर मॉडल मुमकिन नहीं है जबकि इंसान की बनाई चीज़ें हमेशा नाक़िस रहती हैं ।
    प्रकृति की हरेक चीज़ अपने बनाने वाले के बुद्धि और बल आदि गुणों का पता दे रही हैं , जिनसे इंकार की कोई जायज़ वजह मौजूद नहीं है ।
    ईश्वरकृत और मनुष्यकृत दोनों ही चीज़ें आपकी नज़र के सामने मौजूद हैं , आप ख़ूब देख-परख सकते हैं ।

    दूसरी बात यह है कि
    ईश्वर का नाम और स्वर्ग-नर्क की अवधारणा का इंकार कर दिया जाए तो ज़ुल्म का ख़ात्मा हो जाएगा , यह सोचना नादानी महज़ है।
    रूस , चीन और अमेरिका आदि देश ईश्वर को न मानकर आज देशी-विदेशी नागरिकों पर जो क़हर बरपा रहे हैं , वह आपके सामने ही है ।
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    शुक्रिया !

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    1. बीसियों साल से यही बातें घुमा फिरा कर सुनता आ रहा हूँ,इतने आत्मविश्वास के साथ बोली गयी, जैसे कोई मौलिक खोज हो.
      इस तर्क पद्धति का दोष यह है कि हरेक चीज़ की रचना किसी बुद्धि से हुई है.बुद्धि का कोई थूर ठिकाना होता है, वाह इंसान के दिमाग से बाहर नहीं होता, इतनी बात समझ जाएँ,जिसके लिए बहुत बड़ा खोजी होने की डरकर नहीं, तो उन सरे भूल भुलाईये से बाहर आजायें.
      भगवान को अब हमें फुर्सत दे देनी चाहिए.

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    2. भाई चाहे जितना समझा लो, कुछ लोगों को अपने ही दायरे में रहने की आदत पड़ जाती है। उनको अपने ही तर्क सही लगते हैं। उन्हीं में से एक प्राणी का नाम 'अनवर जमाल' भी है। 'डॉ' लिखने से कुछ नहीं होता, सोच भी तो होनी चाहिए।

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    3. @ D.K.Google जी ! आपकी यह बात सही है कि
      कुछ लोगों को अपने ही दायरे में रहने की आदत पड़ जाती है। उनको अपने ही तर्क सही लगते हैं।
      कृपया आप यह लेख पढ़ें और अपने दायरे से निकलें-
      जन्नत की हक़ीक़त और उसकी ज़रूरत पार्ट 1 Jannat

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  10. आप से किसने कहा की लोग स्वर्ग नरक जैसी चीजो को मानते है मैंने तो आज तक किसी को भी इस डर से अच्छा काम करते या बुरे काम से दूर भागते नहीं देखा है की ये करने के बाद स्वर्ग नसीब होगा या नरक मिलेगा | हा लोगो को उन जेहादियों पर हसते देखा है जो जन्नत पाने के नाम पर आतंकवादी बन जाते है ये सब देख कर तो कभी नहीं लगा की लोग इन चीजो पर विस्वास करते है ये वाकई बस पारी कथा ही है |

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  11. परवीण साहब,

    @अपनी क्षमताओं का भरपूर इस्तेमाल करते हुए धरती पर बेहतर जीवन की आवश्यकता पर बल दिया।"

    परवीण साहब, यह 'बेहतर जीवन' क्या है? मात्र अपने जीवन को आरामदायक बनाना? हमारी तो लालसा है 'अच्छा खाना पीना मज़े करना और सोना' इसी आशय को अगर 'बेहतर जीवन' कहते है तो हर व्यक्ति दूसरे से बेहतर बनने के स्वार्थ में आपस में लड़ मरेगा। और दूसरे के जीवन को बेहतर बनाने की नेकी क्यों करेगा?

    @"१- इन अवधारणाओं के कारण मानव जाति का बहुत सा समय, धन व कर्म इनको पोषित करने में लगता है जिससे इंसान की नस्ल अपने सही Potential को Fulfill नहीं कर पाती है !"

    यदि समय, धन व कर्म इन अवधारणाओ पर खर्च हुआ भी है तो बताईए वह इस संसाधनो को कहाँ लगाता? मात्र अपने पर? और अपमे वर्तमान पर। जो कि और भी विसंगतियां पैदा करता। और बड़ी बात यह समय, धन व कर्म का स्वभाव ही व्यय होना ही है, और फायदा कही न कही मानव को ही पहुँचना है। स्वार्थ में या परमार्थ में।

    @जिससे इंसान की नस्ल अपने सही Potential को Fulfill नहीं कर पाती है !"

    यह इंसानी नस्ल का सही "Potential" है क्या? वह कौनसा Potential है जिसे Fulfill करना है?
    "Eat, Drink and be merry"?
    क्योंकि परस्पर सहयोग, सहायता, निति और जीवन-मूल्यों की उपयोगिता तो स्वार्थ के सामने व्यर्थ हो जाएगी।

    और फिर आपको तो उन जीवन-मूल्यों के पोषण पर समय, धन व कर्म लगाना ही नहीं है।

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  12. उत्तर
    1. बगल वाली सीट मेरे लिए ही रखिएगा, देखिएगा कोई और न बैठ जाए। आपका साथ मेरे लिए किसी जन्नत से बेहतर होगा। आमीन !

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  13. आप ने अच्छी बहस छेड़ी है, बस का सफर अच्छे से कटेगा।

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  14. @all...महोदयो ! जनाब स्टीफन हफ्किंग्स क्या अपने इस जीवन में स्वर्ग भोग रहे हैं ? क्या स्वर्ग-नर्क सब इसी जीवन में और केवल मनुष्य योनी में ही प्रभावी नहीं होता ? क्या कोई सभी प्रकार के भौतिक सुख साधनों को रख कर भी नारकीय जीवन नहीं जीता | ऐसा कोई अलग से स्थलीय भूभाग या अन्तरिक्षीय पटल के रूप में स्वर्ग-नर्क की कल्पना तो फिल्मों या सीरियलों में ही दिखाई देती है | संसार में केवल एक प्राणी मनुष्य ही है जो अपनी इच्छा से पाप और पुण्य कर सकता है और उसका फल भोगता है अन्य सब प्राणी तो केवल जैसा जीवन मिला है वैसा भोगने के लिए मजबूर हैं |

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  15. कई बार ऐसा लिख देते हो की समझने के लिए टैम नहीं होता .....क्या करें ?
    हम तो बाद में फिर पढेंगे !:-)
    शुभकामनायें !

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  16. उनको खुदा मिले, है खुदा की जिन्हे तलाश...

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  17. हम तो बस में अटक गए. कहां जा रही है, टिकट कितना है, जेब टटोल रहे हैं... यह किस कंपनी का विज्ञापन आ गया...

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  18. वे कहें तो गार्जियन में छपे -प्रवीण शाह और अरविन्द मिश्र कहें तो बात ब्लॉग जगत में भी न सुनी जाय ...
    कोई नयी बात नहीं कही स्टीफेन ने -हाँ बात बिना लाग लपेट और बौद्धिक द्वैधता के साफ़ साफ़ कही -मैं कायल हूँ उनका -पहले से भी हूँ ...
    ये संस्कृत का श्लोक पढ़िए -अर्थ खुद समझ जायेगें -बहुत सरल है -
    ना त्वहम कामये राज्यं न स्वर्गम न पुनर्भवं
    कामये दुःख तप्तानाम प्राणिनाम आर्त नाशनं ...
    मुझे स्वर्ग और पुनर्जन्म वैसे भी नहीं चाहिए -होता तो भी नहीं !
    यह कितनी बाडी बात है इसे अप्रिशियेट नहीं करेगें ?

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  19. २- दूसरी जो सबसे बड़ी बात है वह यह है कि ईश्वर, धर्म, स्वर्ग-नर्क की इन्ही अवधारणाओं के कारण ही आज का इंसान एक दूसरे से दूर है, लफड़े हैं, झगड़े हैं, फसाद हैं, विवाद हैं... धार्मिक कट्टरपंथी, दंगाई, आतंकवादी और आत्मघाती हमलावर भी... केवल और केवल ' अपने ईश्वर ' को खुश करने व मरणोपरांत स्वर्ग का शाश्वत सुख पाने की चाह में दुनिया को और बदसूरत बनाते रहते हैं !

    परवीण साहब,

    किसको अपना ईश्वर अपना धर्म अपने स्वर्ग-नरक थोपने है,कौन लोग है जो धार्मिक कट्टरपंथी, दंगाई, आतंकवादी और आत्मघाती हमलावर है? सीधे सीधे अंगुली निर्देश क्यों नहीं करते? धर्म नहीं धर्म के अनुयायी मानव!! इनके कुकृत्यों को समग्र धर्मों पर डालना दुष्कृत्य है। सभी धर्मों को कटघरे में खडा करना कुटिल चाल है। धर्मो को बदनाम करने का सुनियोजित षड्यंत्र हैं। बदमाश तो वही मानव है जिसके लाभ के बहाने यह सब कहा जा रहा है। और धर्म को बदनाम किया जा रहा है। जो कुकृत्य दिखाई दे रहे है उसमें दोष धर्म का नहीं, मानव के खुद के अभिमान अहंकार का है। ऐसे मानवों की विचारधारा और आपकी विचारधारा अपने अपने स्वार्थों के लिए, नैतिक उत्थान देने वाले धर्मो को बदनाम करती है।

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  20. @खबर वाकई दिल तोड़ देने वाली है, मरणोपरांत स्वर्ग या जन्नत का सुख भोगने की चाह रखने वालों के लिये ...

    चलो भाई, ये खबर हमारे हमारे लिए तो नहीं है :)

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  21. *ये खबर हमारे लिए तो नहीं है :)

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  22. वे कहें तो गार्जियन में छपे -प्रवीण शाह और अरविन्द मिश्र कहें तो बात ब्लॉग जगत में भी न सुनी जाय ...

    हम सहमत है!

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  23. कुछ नास्तिक जिनको इश्वेर के होने का यकीन नहीं होता ,धर्म के नाम पे झगडे फसाद करवाते हैं वरना धर्म सभी इमानदारी, भाईचारे और इंसानियत पे ज़ोर देता है. इश्वेर के होने और उसपे विश्वास का मतलब ही यही है कि दुनिया मैं इन्साफ करो, ज़ुल्म ना करो वरना इश्वेर को हिसाब देना होगा. नास्तिक को ना हिसाब देना है और इसी कारण धर्म के नाम पे झगडे करवा कर धर्म को बदनाम करता है.
    इश्वेर पे यकीन करने के लिए ना धन कि अवश्यक्य\ता है और ना समय कि. धिन्गिऊन का काम है धर्म के नाम पे पैसे देना लेना.
    पहले इश्वेर को समझो, उसकी नसीहतों को देखो और फिर फैसला करो. इश्वेर है या नहीं. इश्वेर को ना माँ ना समाज मैं भी अशांति का कारण होगा और ज़िंदगी के बाद यदि इश्वेर हुआ तो ऐसा नुकसान उठाना होगा जो कभी पूरा ना किया जा सकेगा.

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    1. नास्तिकों ने अबतक दुनिया में "धर्म के नाम पे झगडे फसाद" कहाँ करवाए? यह काम तो धर्मों के अखाड़ों के हैं.दंगे फसाद ही नहीं, धर्म-युद्ध भी.

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  24. चलो ठीक अगर कोई खुदा नहीं, तो मैंने क्या खोया? जैसे तुम पेड़ पौधों की तरह ख़त्म हो जाओगे, मैं भी ख़त्म हो जाऊंगा, और तुमने क्या पाया ? यही ज़रा सी दुनिया की लज्ज़त जो बहुत मायने नहीं रखती।
    और अगर इस संसार का एक रचयिता है, मरने के बाद एक अन्य लोक है जहाँ कर्मों का हिसाब किताब होगा और अच्छे कार्य करने वालों को स्वर्ग और बुरे कार्य करने वालों को नरक में भेजा जाएगा। तो तुम इसका हिसाब किताब भी कर लो की तुमने क्या खोया ?
    http://www.amankapaigham.com/2010/09/blog-post_09.html

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  25. http://shayari10000.blogspot.com

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  26. बीसियों साल से यही बातें घुमा फिरा कर सुनता आ रहा हूँ, इतने आत्मविश्वास के साथ बोली गयी, जैसे कोई मौलिक खोज हो.
    इस तर्क पद्धति का दोष यह है कि इस बात को स्वयं सिद्ध मान लिया जाता है कि हरेक चीज़ की रचना किसी बुद्धि से हुई है.लेकिन बुद्धि का भी तो कोई ठौर-ठिकाना होता है, वह इंसान के दिमाग से बाहर नहीं होता, इतनी बात समझ जाएँ,जिसके लिए बहुत बड़ा खोजी होने की दरकार नहीं, तो उन सारे भूल-भुलईये से बाहर आजायें.
    भगवान को अब हमें फुर्सत दे देनी चाहिए.अपने दिमाग पर जोर डालने के बजाय उसके भरोसे कब तक काम चलाएँगे आस्थावान?

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    1. बास्तव में भगवान को अब हमें फुर्सत दे देनी चाहिए!

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  27. Mai praveen shaha ji se purna sahmat hoo.yeh duniya kisi ne nahi banai hai yeh apne aap hi bana hai.aor ise sundar manushya appni buddhi aour prayaso se banaraha hai naki koi kalpanic ishswar.

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  28. मै प्रवीण शाह जी से पूर्ण सहमत हु की यह दुनिया किसी ने नहीं बनाई है न ही इसका कोई रचीयेता है यह अपने आप ही बना है ओर इसे सुन्दर मनुष्य अपपनी बुद्धि ओउर प्रयासों से बानरहा है नाकि कोई काल्पनिक इश्स्वर जो सिर्फ किस्से में ही होता है हकीक़त नहीं अब समय आ गया है सच्चाई जानने
    का सत्य कभी अपने आप को नहीं बदलता

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असहमति को इस ब्लॉग पर पूरा सम्मान दिया जाता है, आप मेरे किसी भी विचार का खुल कर विरोध या समर्थन कर सकते हैं, परंतु अशिष्ट या अश्लील भाषा यु्क्त अथवा किसी के भी ऊपर व्यक्तिगत आक्षेपयुक्त टिप्पणियाँ कृपया यहाँ न दें... आप अपनी टिप्पणियाँ English, हिन्दी, रोमन में लिखी हिन्दी, हिंग्लिश आदि किसी भी तरीके से लिख सकते हैं... नहीं कुछ लिखना चाहते हैं तो भी चलेगा... आपके आने का शुक्रिया... आते रहियेगा भविष्य में भी... आभार!