बुधवार, 4 मई 2011

जब उसने मोहब्बत की थी एक मर्द के साथ, तो शादी किसी औरत से क्यों करे ?

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मेरे खुला-दिमाग मित्रों,


एक गुमान सा रहा है मुझे अपने आप पर, कि, अपने इर्द-गिर्द के अधिकांश के मुकाबले मैं थोड़ा ज्यादा खुला दिल-दिमाग रखता हूँ... पर यह LGBT या GLBT ( गे, लेस्बियन, बाईसेक्सुअल व ट्रान्सजेन्डर ) समुदाय को व उनके व्यवहार को मैं आज तक नहीं समझ पाया... 

एक समय तो यहाँ तक था कि अपनी इस पोस्ट  पर मैंने इस प्रवृत्ति को Perverted Behaviour तक कह दिया था... 

सही कहूँ तो मुझे आज भी समझ नहीं आता जब कोई कहता है कि वह पुरूष के शरीर के अंदर ट्रैप एक औरत या औरत के शरीर के अंदर ट्रैप एक पुरूष है... Transvestites या Cross Dressers  की परिभाषा में आज उन महिलाओं को शामिल नहीं किया जाता जो हमेशा ही पुरूषों के वस्त्र पहनती हैं, इस पर भी मुझे आपत्ति करने का मन करता है [ यह अलग बात है कि जीन्स-शर्ट पहनने वाली महिलाओं कि ओर अधिकाँश पुरूष न चाहते हुऐ भी न जाने क्यों एक नजर देखने से खुद को रोक नहीं पाते... :) ]...

यह समझ विकसित न हो पाने के पीछे एक बड़ी वजह मेरी समझ से यह भी रही है कि अपने आस-पास मैंने इस तरह के व्यक्तित्व नहीं देखे... आठ साल पहले की बात है, मेरे एक अग्रज और प्रिय मित्र ने अचानक मुझे आदेश सा दिया कि मैं तुरंत उनके घर पहुंचूं... वहाँ जाने पर उन्होंने मुझे कहा कि उनके किशोर पुत्र  की चाल-ढाल उन्हें गड़बड़ लग रही है और मैं उसे समझाऊँ... मैंने उस किशोर को बुलाया तो पाया कि उसने बाल कंधों तक लंबे करे हुऐ थे जिनमें दो रंगों से लटें हाइलाइट की हुई थी, चेहरे को गौर से देखा तो पाया आँखों की भंवें ब्यूटी पार्लर से नुचवा कर उन्हें बाकायदा आइब्रो पेंसिल से आकार दिया हुआ था, ऊपरी पलक पर आई-शैडो लगा था, हल्की गुलाबी लिपस्टिक उस किशोर ने लगाई हुई थी, दोनों हाथों के नाखून बड़े थे और उन पर गुलाबी नेल-पेन्ट था, एक कान में इयर-रिंग पहना हुआ था... मैं यह सब देखते ही आगबबूला हो गया, और उस दिन मैं उस किशोर के बाल फौजी स्टाइल में कटवा, नाखून कटवा, चेहरा धुलवा, कान की बाली को नाली में फेंक, साबुन से रगड़-रगड़ चेहरा धुलवाने के बाद ही घर लौटा... अगले दिन मैंने उसके कुछ दोस्तों को बुलाया तो पता चला कि जनाब कुछ नशीली गोलियों के सेवन के आदी आवारा युवकों के साथ अक्सर रहते हैं... बहरहाल मैंने व उसके परिवार ने इतना दबाव बनाया कि उसने वह सोहबत छोड़ दी, तीन वर्ष पहले उसकी शादी भी हो गई, आज एक बच्चा भी है उसका... जब भी मिलता है, पूरी इज्जत देता है... मेरे विचार से वह लड़का अपनी सेक्सुएलिटि के साथ दूसरों की देखा-देखी एक प्रयोग सा कर रहा था, जो हमारे कहने पर उसने छोड़ दिया...


आज मैं मानता हूँ कि LGBT समुदाय को समाज से बेहतर समझ की जरूरत है, मुझे यह मानने में कोई हिचक नहीं कि मेरा उनको Pervert लिखना गलत था और हमारे आज के समाज को इस समुदाय के लिये और ज्यादा इन्क्लुसिव होना चाहिये...


अरे यह क्या, इतना सारा लिख गया और अभी तक पोस्ट के मुद्दे पर नहीं पहुंच पाया मैं... जबकि मेरी यह पोस्ट एक ऐसे इन्सान के बारे में है जो मेरी नजर में हालात का मारा है...


किस्सा यह है कि,

कश्मीर के एक युवक के जर्मनी के क्रॉसड्रेसिंग करने वाले एक युवक से दिल्ली में मुलाकात हुई, दोनों के बीच समलैंगिक संबंध बन गये व दोनों ने विवाह करने का फैसला कर लिया... अब क्योंकि हमारे देश का कानून समलैंगिक विवाह को मान्यता नहीं देता, इसलिये अपने प्रेमी से विवाह करने के अति उत्साह के चलते जर्मन युवक ने सर्जरी के जरिये लिंग परिवर्तन करवा लिया व महिला बन गया, इस कार्य में उसके ३० लाख रूपये भी खर्च हो गये...

मामले में मोड़ तब आया जब कश्मीरी युवक ने उस 'महिला' से विवाह करने से साफ इन्कार कर दिया... जर्मन ' महिला ' ने श्रीनगर, जम्मू एंड कश्मीर की एक अदालत में कश्मीरी युवक के ऊपर बलात्कार का इलजाम लगाते हुऐ मुकदमा दायर किया है...

अदालत ने फिलहाल मामले को पेंडिंग में रखा है यह पता लगाने के लिये कि भारतीय दंड संहिता की किन धाराओं के तहत यह मामला चल सकता है ?


मेरा यहाँ सवाल यह है कि कश्मीरी युवक समलैंगिक है, वह पुरूष के साथ ही यौनिक सुख लेने में समर्थ है जब उसने मोहब्बत की थी एक मर्द के साथ, शादी का फैसला भी मर्द के साथ ही किया था,  तो  अब वह शादी किसी औरत से क्यों करे ?


आप क्या सोचते हैं ?

यह खबर  आप यहाँ पर  देख सकते हैं, क्षमा करेंगे यह अंग्रेजी में है ।










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25 टिप्‍पणियां:

  1. LGBT trends और कुछ नहीं बल्कि उपभोगवादी एवं कुसंस्कृत जीवनशैली का परिणाम है. मनोविकृति के रूप में प्राकृतिक और सामान्य ठहराकर स्वीकार्य बनाने से इसे बढ़ावा ही मिलेगा. मुझे LGBT से सहानुभूति है. इन्हें इलाज़ की ज़रुरत है.
    दुःख है की ये ट्रेंड्स अब इतने हावी और शक्तिशाली होते जा रहे हैं के इनकी आलोचना करने मात्र से व्यक्ति पर अमानवीय होने का ठप्पा लगा दिया जाता है.
    बड़े शहरों में होनेवाली गे प्राइड परेड्स ने माहौल को बहुत बिगाड़ दिया है. इसपर रोक लगनी ही चाहिए.
    बाकी, सैक्सुअल चोइस निजी विषय है. इसे खुलेपन के नामपर हर जगह उपस्थित कर देने के दुष्परिणाम होंगे.
    मैं किसी गौरवशाली सभ्यता या संस्कृति का पैरोकार या सिपहसालार नहीं हूँ. यह कहना भी ज़रूरी लग रहा है.

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  2. ...मुहब्बत तो गधे, घोड़े और कुत्ते से लेकर प्रकृति की हर चीज़ से की जा सकती है लेकिन मर्द को विवाह एक औरत से ही करना चाहिए क्योंकि विवाह का मक़सद यौनिक सुख या साथ रहना मात्र नहीं है बल्कि संतान उत्पन्न करना भी है। ठीक उसी तरीक़े से जैसे कि उसके मां-बाप ने उसे पैदा किया था। अगर उसका बाप भी किसी मर्द को ब्याह लाता तो यह कहां से पैदा होता ऐब करने के लिए ?

    http://tobeabigblogger.blogspot.com/

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  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  4. मैं उस कश्मीरी युवक से सहमत हूँ. जब उसने प्यार एक भरे पुरे लहलहाते हुए मर्द से किया तो उसे एक स्त्री में क्या सुख मिलेगा.

    आम स्त्रियों द्वारा पेंट शर्ट पहना एक सुविधा की बात हो सकती है और जो स्त्रियाँ पुरुषोचित व्यव्हार करती हैं वे चाहे सूट सलवार में हों अलग ही नज़र आ जाती हैं.



    मेरे घर के सामने ही एक व्यक्ति रहता है जो स्त्रियों की तरह व्यव्हार करता है हालाँकि उसकी एक विवाहित पत्नी और तीन धर्म-संताने भी हैं जो उसके इस बर्ताव से शर्मिंदा नज़र आते हैं और सब कुछ करके हार चुके हैं. सामान लिंगियों के प्रति यौनाकर्षण रखना और विपरीत लिंगी की तरह व्यव्हार करना एक अपवादिक स्थिति है या गन्दी आदत ये बात तो भगवान ही जाने पर मेरे मन में यह तरह तरह के प्रश्न उत्पन्न करता है.

    जरा सोचें जब दो पुरुष संयोग करते हैं तो उनमे से एक पोसिटिव होता है तो दूसरा नेगेटिव. यानि की दोनों में से एक स्त्री की तरह से व्यव्हार करता है तो दूसरा पुरुष पुरुष होता है . जो पुरुष है उसे दुसरे पुरुष के भीतर की स्त्री क्या नज़र नहीं आती और अगर आती है तो उसे स्त्रियों के भीतर की स्त्री क्यों नहीं नज़र आती.

    क्या मेरी बात समझ आ रही है. अगर हैं तो इस पर विचार करें और नहीं तो बताये विस्तार से अपने ब्लॉग पर लिख डालूँगा.

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    @ प्रिय दीप पान्डेय (V४०) जी,

    यार मैंने तो पोस्ट में ही लिख दिया है कि इस LGBT मामले में मेरी समझ कम है, अब आपने यह पोजीटिव-नेगेटिव और जोड़ दिया... आप निश्चित तौर पर इस बारे में लिखो, जब भी लिखो तो एक लिंक अवश्य लगा देना यहाँ भी...


    @ सभी पाठकगण,

    कोई LGBT समुदाय का पाठक नाम से या बेनामी भी अपना नजरिया, अपने अनुभव अगर बाँटे यहाँ पर, तो मैं समझता हूँ कि इस जटिल मुद्दे पर हम सभी की समझ बेहतर होगी...

    सभी से यह भी अनुरोध है कि इस मुद्दे पर मर्यादा को बनाये-निभाये रखें...



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  6. ये सच है की कई बार कुछ युवा कन्फ्यूजन में दूसरो की देखा देखी गलत संगत में और कुछ नया के चक्कर में भी खुद की सेक्स लाइफ को समझ नहीं पाते है | पहली बार इस बारे में सुना था तो अजीब लगा था पर अब नहीं लगता |

    और आप को बता दू की ऐसे रिस्तो में भी लोग एक दुसरे को धोखा देते है इस्तेमाल करते है बार बार साथी बदलने जैसी वो तमाम बेवफाईया की जाती है जो विपरीत लिंग वाले एक दुसरे के साथ करते है |

    और हमारी संस्कृति में ये सब नहीं है ये सोच मेरी तब बदल गई जब खुद अपनी आँखों से खजुराहू के मंदिरों में समलैंगिक मूर्ति बने देखी |

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  7. पेंडिंग ही रह जाते हैं ऐसे मामले.

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  8. निश्चय ही मनुष्य के संदर्भ में ऐसे व्यवहार प्राकृतिक परिहास के परिणाम है -
    कुदरत की प्रयोगशाला के ऐसे उभय उत्पाद उत्पन्न होते रहते हैं और
    कमोबेश ऐसी प्रवृत्तियाँ स्वस्थ लोगों के जीवन में कभी कभार मुखरित होती हैं ...
    कृष्ण का राधा का रूप ले ले लेना लोक मानस द्वारा स्वीकृत लीला है .
    अब ऐसा न कहें कि आपमें अभी तक कभी ऐसी कोई रुझान उत्पन्न ही नहीं हुयी ..
    बच्चों में तो यह एक्स्प्लोरैटरी व्यवहार के रूप में शुरू होती है ...
    "तुम जरा अपना तो दिखाओ .."! फिर कुछ बाल लीलाएं भी -यह मनुष्य के शरीर के आत्म निरीक्षण
    की शुरुआत है ....
    बस कुछ लोगों में यह प्रवृत्ति थोडा और तीव्र हो कई रूप लेती नजर आती है ...
    विचार शून्य के सवाल पर इतने भोले मत बनिए -
    ट्राम झरोखे बैठ के सबका मुजरा लेत ....मैं सब देखता रहा हूँ !
    चलिए हम विचार शून्य के साथ एक नया कम्युनिती ब्लॉग बनाते हैं और ऐसे आर्त लोगों की मादड करते हैं
    उन्हें समझने की जरुरत है -मैं ऐसे बहुत से लोगों का त्राण करने की गहरी संतुष्टि लिए हुए हूँ -अभी कुछ दिनों पहले फेसबुक
    पर भी एक व्यग्र आत्मा को राहत पहुंचाई है ...अब ज्यादा लम्बी टिप्पणी होगी तो साझे ब्लॉग पर क्या लिखूंगा !
    बस ये सब कुदरत के मारे हमारे दया के पात्र है !

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  9. तभी तो कहते हैं कि दुनिया अजीबोगरीब है। बस इसे देखने और समझने के लिए जितना अन्‍दर घुसेंगे उतनी ही नयी कहानियां मिलती जाएंगी।

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  10. कोई कितने भी खुले दिमाग़ का पाखण्ड़ करे, कथित प्रगतिशील भी अपने घर में सांस्कृतिक विकार बरदास्त नहीं कर पाता।

    अक्सर हड्डी के टुकडे के प्रलोभन में ही स्वेच्छाचार को प्रगतिशीलता के नाम समर्थन दिया जाता है। यह विकृति जब अपनों में दिखाई दे तो छद्म भेष उजागर हो जाता है। फिर बचाव के नए शब्द गढे जाते है।

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    @ आदरणीय अरविन्द मिश्र जी,

    ट्राम झरोखे बैठ के सबका मुजरा लेत ....मैं सब देखता रहा हूँ !

    देव, कम से कम आप तो ऐसा न कहें, निराधार आरोप है यह मुझ पर ... :)

    कृष्ण का राधा का रूप ले ले लेना लोक मानस द्वारा स्वीकृत लीला है .
    अब ऐसा न कहें कि आपमें अभी तक कभी ऐसी कोई रुझान उत्पन्न ही नहीं हुयी ...


    हुम्म, एक बार शायद सोचा तो था यह पता लगाने का कि क्रॉस-ड्रेसर कैसे महिलाओं के कपड़े पहन अपने को आइने में निहारते हैं व बेहतर महसूस करते हैं... पर श्रीमती से अपना एक फुट ज्यादा लंबा होना व वजन में लगभग दुगुना होना इस प्रयोग में आड़े आ गया...


    ...

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  12. यौन जीवन में प्राकृतिक विरुद्ध अप्राकृतिक की बहस पुरानी है ! इसी तरह से इन संबंधों पर निज पसंद की स्वतंत्रता बनाम समाज प्रदत्त स्वतंत्रता की बहस भी उतनी ही पुरानी है ! कानूनों का निर्धारण अमूमन सामाजिकता के आलोक में होता है अतः निज पसंद की स्वतंत्रता जैसे मसले इसके दायरे से बाहर हो जाते हैं !

    बहरहाल मेरा मानना यह है कि समाज सम्मत हो या ना हो यौन जीवन का पुरुष बनाम पुरुष वाला आयाम हमेशा से ही समाज की अंतर्धारा में मौजूद रहा है और आगे भी रहेगा फिर चाहे इसके पक्ष और विपक्ष में कितने ही तर्क किये जायें !

    आपकी पोस्ट में उल्लिखित प्रेम कथा में , सबसे पहले एक जोड़ा है जो एक खास फार्मेट में एक दूसरे को चाहने से उपजा है तो फिर जोड़े में शामिल किसी एक पक्ष को उत्साह अतिरेक में ही सही एकल निर्णय का अधिकार शेष नहीं रह जाता ! आशय यह कि जोड़े की प्रथम दृष्टया चाहत वाली फार्मेटिंग में बाद के परिवर्तन द्विपक्षीय सहमति पर आधारित होना चाहिए थे ! एकल निर्णय की स्वीकार्यता तभी संभव है जबकि दोनों बंदे एक दूसरे की व्यक्तिगत अपेक्षाओं के जानकार भी हों और निर्णय के समय इसका ख्याल भी रखे !

    लिंग परिवर्तन के बाद भी यदि किंचित समागम और प्रेमालाप हुआ हो तो फिर जर्मन युवक / युवती को न्याय ज़रूर मिलना चाहिए वर्ना जोड़े की प्रथम दृष्टया चाहत वाली अपेक्षाओं का बांड उसने स्वयं तोड़ा है !

    विषय पर विचार शून्य महोदय द्वारा ब्लाग पोस्ट लिखने की धमकी के चलते अपनी टिप्पणी फिलहाल यहीं समेट रहा हूं :)

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  13. मानसिक जिद को नियम बनाने की चाह। दुनियों नियमों से ठसाठस भर जायेगी तब पर कोई स्थायित्व नबीं आयेगा।

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  14. अनुरोध है ...... खजुराहो और कोणार्क की मूर्तियों से इतना कन्वेन्स ना हुआ करें , वे भारत में वाम मार्ग के उभार के समय की रचनाएं हैं , उनका भारतीय संस्कृति की मूल भावना से कोई लेना देना नहीं है , ऐसा कुछ एक्सपर्ट कहते हैं , कहने का मतलब है संस्कृति में बहुत कुछ है खजुराहो के अलावा ......ये बात अलग है की प्रसिद्द नहीं है और उसे पढने के लिए थोड़ी मेहनत भी करनी पड़ती है :)

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  15. सुज्ञ जी की टिपण्णी पढ़ कर मुझे "बेंड इट लाइक बेकहेम" फिल्म का एक दृश्य याद आ गया, इसमें एक माँ को जब ये गलत फ़हमी होती है की उसकी बेटी लेस्बियन है , तब उसका सोच जो पहले "खुली सोच" थी , अपने आप "नोर्मल सोच" बन जाती है और परेशान हो जाती है , रोने लगती है

    और फिर जब जब गलत फ़हमी दूर होती है तो वो फिर से इसको सामान्य बताने लगती है :))

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  16. वाह!!

    ग्लोबल उदय!! :))

    वही बात है।

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  17. @भैया ट्राम नहीं राम ....वर्तनी दोष

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  18. व्यक्तिगत रूप से मुझे ये मानसिक विकृति लगती हैं । सबसे पहले इसके बारे मे जाना था जब लेडी डायना के मित्र एल्टन जोन के बारे मे पढ़ा था । उन्होने ना केवल उस युवक से विवाह किया था अपितु अपनी संपत्ति का वारिस भी बनाया था । इस से पहले उन्होंने एक महिला से भी विवाह किया था ।

    अब मेरा मानना हैं ये मानसिक नहीं शारीरिक विकृति हैं और इस लिये कोर्ट ने इसको हमारे यहाँ भी अब मान्यता दे दी हैं क्युकी शायद इस का इलाज संभव नहीं हैं
    इस विषय मे ज्यादा रूचि नहीं हैं बस कानून की जानकारिया रखती हूँ तो उस नज़रिये से जो कानून सही हैं मुझे मंजूर हैं


    हां ये मर्द और औरत केवल शब्द हैं जो हमारे दिमाग की उपज हैं । आप ईश्वर को नहीं मानते फिर किसी भी molecule को औरत या मर्द कह सकते हैं और प्रकृति ने किसी भी molecule को कोई नाम तो दिया नहीं हैं nomenclature हमारी देन हैं हो सकता हैं विषय भटक जाए सो क्षमा

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  19. बडा गम्भीर मसला है ये, इसलिये केवल अपने व्यक्तिगत अनुभवों से कुछ निषकर्ष निकाले हैं।
    आम तौर पर लोगों की गे परेड अथवा ऐसे ही कुछ दृश्यों को देखकर उनके बारे में हेय राय बन जाती है।

    हयूस्टन में पिछले ६-७ वर्षों में रहते रहते मेरे कुछ ऐसे दोस्त भी हैं जो समलैंगिक हैं। यकीन मानिये कि इसका उनके एक बेहतर इंसान होने/न होने से कोई समबन्ध नहीं है। अगर वो किसी को न बतायें तो अधिकतर को पता भी नहीं चलेगा कि वो समलैंगिक हैं। समाज में समलैंगिकता के विषय में बडी कठोर राय है, चाहे भारत हो अथवा अमेरिका।

    भारत में कानून ने इस प्रकार के समबन्ध को स्वीकृति जैसा कुछ नहीं किया है, उनकी व्याख्या केवल इतनी है कि अगर आपसी मर्जी से ऐसे समबन्ध बनते हैं तो वो कोई अपराध नहीं है। ऐसा होना भी चाहिये।

    समलैंगिक समुदाय को समाज में हिस्सा मिलना चाहिये भले ही उनका व्यवहार हमारी आपकी अपेक्षा के अनुरूप हो अथवा न हो।

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    1. मैं समलैंगिक हूँ यकीन मानिए कभी लड़कियों के प्रति आकर्षित नहीं हुआ सुरू से ही मर्दों मे दिलचस्पी रही

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    पाठकों से...

    समलैंगिकता एक बहुत ही जटिल विषय है इसे समझने का एक प्रयास यहाँ पर भी है...

    http://vichaarshoonya.blogspot.in/2013/05/blog-post.html



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    1. muje maardon ke lig dekhana achchha lagata hai

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  21. ek auratki tarah sochatahu koi mard mujhe baho me lekar pyar kare mere sath soye jabaki me ek mard hu meri aavaj ladkiyon jaisi hai kuje kya karana chahiye

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