रविवार, 1 मई 2011

हा हा हा हा, हा हा हा हा, हा हा हा हा !!! यह तो होना ही था, कभी न कभी ...

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हम सभी के प्रिय व मेरे लिये अत्यन्त आदरणीय  खुशदीप सहगल अत्यन्त आहत हैं आज, खुद को ठगा हुआ छला हुआ महसूस कर रहे हैं... दर्द इतना है कि वह  ब्लॉगिंग को गुड बाई  तक करने की बात कह रहे हैं...

मामला समझने के लिये यह पोस्ट पढ़िये...

आदरणीय दिनेश राय द्विवेदी  जी ने लिखा है :-

" यह आयोजन उन मुद्रकों का था जो लेखक की पुस्तक उन के ही धन से मुद्रित करते हैं और उसे बेचने की जिम्मेदारी भी उन्हीं पर डाल देते हैं। ये लोग मुफ्त में अपना नाम प्रकाशक के रुप में उन पुस्तकों पर छाप कर प्रकाशक कहाते हैं। ये लोग मुख्यमंत्री टाइप के लोगों की किताबें प्रकाशित करते हैं तो इस लिए कि उन से टेबल के नीचे से कुछ न कुछ मिलता है। सरकार द्वारा अपने पुस्तकालयों में खरीदे जाने वाली पुस्तकों की सूची में इन की किताबों का नाम शामिल किया जाना भी पर्याप्त होता है। इन्हें प्रकाशक कहना भी प्रकाशक शब्द का अपमान है। ब्लागरों के सम्मान का झमेला न होता तो शायद पचास लोगों को इस आयोजन में जुटा पाना संभव नहीं हो पाता। ब्लागरों की उपस्थिति से ये मुद्रक और निशंक जैसे लोग धन्य ही हुए हैं। "

आप मेरी पोस्ट के शीर्षक पर मत जाइये, शुरू से ही मेरा मानना रहा है कि यह रोजमर्रा होते सम्मेलन व सम्मान समारोह वह भी ब्लॉगिंग जैसे इन्डिविजुअलिस्टिक माध्यम के लिये, एक मजाक से ज्यादा कुछ नहीं...

आज भी समय है कि हम सभी ब्लॉगर समझें कि हममें से न तो कोई यह हक रखता है और न ही कोई भी हिन्दी ब्लॉगिंग का स्वयंभू इतिहासकार बनना चाहिये और न ही हमें अपने आप को मुख्यालयों में बैठे व विभिन्न सत्ता शिखरों से हिन्दी ब्लॉगिंग को बढ़ावा देने के नाम पर अपने हितसाधन करने वाले प्रोफेशनल फिक्सरों को उनकी औकात से ज्यादा महत्व देना चाहिये...

यह ठहाके लगाते हुऐ मैं भीतर से बहुत दुखी हूँ हमारे वरिष्ठ व नामचीन ब्लॉगरों की नासमझी पर, जो बार बार झाँसे में फंस जाते है खुद को जबरिया प्रमोट करते गिरोहबाजों के...

किया क्या जा सकता है  सिवाय अपनी भूलों पर दिल  खोल ठहाके लगाने के... :)

आशा है कि भविष्य में मुझे कोई ऐसी पोस्ट नहीं लिखनी होगी...

और हाँ बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय डॉ० अनवर जमाल ,  आपने जो कुछ होना था या चल रहा था उसे पहले ही भाँप सचेत करने का प्रयास  किया था... इसका श्रेय आपको मिलना चाहिये... मुख्यधारा के बड़े ब्लॉगर आपकी सही बात पर भी साथ आने से कतराते हैं... पर मेरे जैसा अदना ब्लॉगर यह अपराध नहीं कर सकता... भले ही सुज्ञ जी मुझे कुछ भी कहें इस पर... :)






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मूड खराब हुआ हो यदि तो मुस्कुराईये  काजल कुमार जी के इस कार्टून  का आनंद लेकर ...


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26 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लागर सम्मेलन में ऐसा क्या हुआ खुल कर कहें , में तो अगले वर्ष की तयारी में जुटा था आख़िर यह माजरा क्या है !!!!!!!

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  2. असल में उस कार्यक्रम में हुआ क्‍या है, स्‍पष्‍ट कुछ भी नहीं है। ये ढेर सारे सम्‍मान ही प्रश्‍न चिन्‍ह लगाते हैं।

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  3. किसी को निशंक की उपस्थिति रास नहीं आई तो हो सकता है किसी को बाटला कांड पर अंगुली उठाने वाले पुन्य प्रसून वाजपेयी की उपस्थिति रास नहीं आती !!
    आयोजक किस किस की चाहत का ध्यान रखे ?

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  4. ये अट्टाहस किस लिए प्रवीण जी , समझा नहीं ..क्या जो विवाद हुआ उसके लिए , खुशदीप भाई को ठेस पहुंची इसके लिए , ब्लॉगर आपके अनुसार ठगे गए इसके लिए , कोई भी तार्किक वजह नहीं मिल रही है मुझे । वैसे आपके पास तो होगी है कोई न कोई ...फ़िर वही सवाल कि ,क्या कल इकट्ठा हुए सारे ब्लॉगर ही हिंदी ब्लॉगर हैं ..तो फ़िर पूरी ब्लॉग बिरादरी पर प्रश्न चिन्ह क्यों ?

    सवाल वही कि उंगली उठाना इस दुनिया का सबसे सरल काम है ..असली मुश्किल तो ये है कि उस उठी हुई उंगली के उस पार खडे होना ..इस तरह के विवाद नि: संदेह ही आयोजक ( मैं सिर्फ़ ब्लॉगर्स की बात कर रहा हूं , उन प्रकाशकों या राजनीतिज्ञों की नहीं ) की भूमिका निभाने वाले भविष्य के सभी ब्लॉगर्स को हतोत्साहित करेगा ..आप कहेंगे ...तो करता रहे ..आखिर जरूरत ही क्या है इसकी ? हां ये जरूर ही बहस का विषय हो सकता है और इसके भी अपने अपने तर्क होंगे सबके पास ।

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  5. प्रवीन जी आपकी पोस्ट के जरिये मैं तो किल्लर झपटा के घर तक घूम आया. अनवर जमाल जी ने ब्लॉग संसद पर भी एक पोस्ट लगाई थी जिसका सही मतलब मैं अब जाकर समझा. क्या आपने इस समारोह में सम्मानित ब्लोग्गेर्स की सूची देखी है. मैंने यह नुक्कड़ ब्लॉग पर पढ़ी. पढ़कर मुझे वैसी ही हंसी आई जैसी आपकी इस पोस्ट के शीर्षक में है. इसमें भाई खुशदीप सहगल को नवोदित ब्लॉगर का सम्मान मिला जिसे उन्होंने ससम्मान ग्रहण भी किया (जैसा की झा साहब ने बताया ही है.) मुझे लगा की खुशदीप भाई इस वजह से नाराज है की उन्हें वरिष्ट ब्लॉगर का सम्मान नहीं मिला. बमुश्किल पांच सालों से अस्तित्व में आई इस हिंदी ब्लॉग्गिंग की दुनिया में २० महीने गुजरने के बाद तो कोई भी वरिष्ठ कहला सकता है. कोई भी खुद को इस विधा पर गुरु समझ कर दूसरों को लेक्चर पिला सकता है.

    जो भी हो सारी की सारी घटना ही मजेदार है. लोग निशंक को भ्रष्ट मानकर उनसे पुरस्कार पाने को गलत बता सकते हैं. इस घटना का विरोध कर सकते हैं पर जरा सोचें अगर कल श्रीमती सोनिया गाँधी या फिर स्वयं आपने प्रधानमंत्री महोदय इन्हें सम्मानित करें तो क्या ये लोग तब भी इसे समारोहों का बहिस्कार कर पाएंगे. १०० % की गारंटी हैं कभी नहीं. भ्रष्ट आदमी के हाथ से पुरस्कार न लेना या ऐसे समारोह का बहिष्कार करना सिर्फ उपरी दिखावा है. भीतर की बात सच में कुछ और ही है.


    सारी घटना मजेदार रही. मुझे तो बहुत आनंद आया.



    इस पर जोरदार ठहाका बनता ही है भाई.

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  6. प्रवीण
    आप ने कुछ दिन पहले एक पोस्ट लिखी थी जिसमे कमेन्ट मे , मैने कहा था ऐसे बहुत से प्रकाशक हैं जो पैसा लेकर किताब छपते हैं और आज की तारीख मे २०००० रूपए मे एक किताब छप भी जाती हैं और लेखक को ५०० प्रतियां भी मिलती हैं बेचने के लिये .

    मैने हमेशा हिंदी ब्लोगिंग को संगठन मे बांधने का विरोध ही किया हैं . तक़रीबन शायद २ साल पहले जब परिकल्पना पर पहली पोस्ट आयी थी की हिंदी ब्लॉग कौन से बेस्ट हैं या ऐसा ही कुछ मैने वहाँ यही कहा था ये आप की पसंद की लिस्ट हैं

    ब्लॉग का माध्यम अभिव्यक्ति का माध्यम हैं और यहाँ बहुत से लोग हैं जो हिंदी से नहीं हैं और जो साहित्यकार भी नहीं हैं और ना ही बनना चाहते हैं . लेकिन कुछ लोगो ने ब्लॉग के माध्यम से अपने को साहित्यकार घोषित करने का बीड़ा उठा ही लिया हैं .

    मै नहीं जानती विवाद क्या था और खुशदीप क्यूँ इतने आहात हुए लेकिन
    एक प्राइवेट फुन्क्शन था यानी एक निजी पार्टी जहां आप पैसा देकर अपना नाम ब्लोगिंग में दर्ज करवा सकते हैं जो करवाना चाहते थे उन्होने किया .

    अब अगर सहारा श्री अपने नाम का टिकेट छपवा कर वो भी इन्टरनेट से रोयल मेल की वेब साईट से ये कह सकते हैं उनको सम्मान दिया गया तो फिर ये तो मामूली बात हैं

    हिंदी लेखको को सम्मान खरीदना आगया हैं ये एक फक्र की बात होनी चाहिये , पहले ये प्रथा केवल विदेशो तक सिमित थी . हाँ हिंदी साहित्य में भी सम्मान की खरीद फरोक्त होती ही रहती हैं .

    लेकिन एक निजी पार्टी के लिये ऊँगली उठाना ,कोई अच्छी बात नहीं हैं . ये उनका अधिकार हैं वो कितना खिलाना पिलाना चाहे , बांटना चाहे , उसके जरिये आपने अपने कार्य क्षत्रो में आगे बढ़ कर अपने विभाग से इसके जरिये तरक्की लेना चाहे इत्यादि उनका अपना नज़रिया हैं .

    ब्लॉग पर चर्चा करने के लिये वो लोग क्यूँ बुलाये जाते हैं जिनको ब्लॉग लिखना ही नहीं आता ?? क्युकी उनके जरिये वहाँ तक पहुचा जा सकता हैं जहां किताबे छपने के लिये ग्रांट मिलती हैं
    वर्धा में भी लोग अपनी किताबे ले जाते हैं वहाँ के वी सी को दिखाते हैं , ये सब चलता हैं और चलता रहेगा .

    ब्लॉग से इस सब का कोई लेना देना नहीं नहीं हैं उनकी निज की पार्टी थी , जिस की जितनी हसियत थी उसने उतना खर्च किया इसमे गलत कुछ नहीं हैं .

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  7. बाप रे ! इतना बवाल...आखिर मामला सम्मान और पुरस्कार का है भाई....

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  8. so fisadi sahi khaa jnaab ne .. akhtar khan akela kota rajsthan

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  9. so fisadi sahi khaa jnaab ne .. akhtar khan akela kota rajsthan

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  10. so fisadi sahi khaa jnaab ne .. akhtar khan akela kota rajsthan

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  11. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (2-5-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  12. Yeh to hona hi tha.
    Hua bhi.aage hota rahega.Ek ne fayda dekha ,dusre ne bhi yahi trend follow karna hai.

    @Vichar shuny se agree.


    @Vandna,Yah comment post karte samy aap ne kya post padh kar yeh likha hai ki -
    'आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है'
    Aap logon dwara yahi shbd sabhi tarah kee post ke liye har baar paste kar diye jaate hain.

    Hadd nahin to kya hai?

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  13. मैं वंदना जी से पुर्णतः सहमत हूँ. इस पोस्ट के शीर्षक की हा हा हा वाली हंसीं वास्तव में रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी है अतः इस पोस्ट का चर्चा मंच में स्थान बनता है :-))

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  14. इस विषय पर मैं तो केवल इतना ही कहूँगा... की खुशदीप भाई का गुस्सा जायज़ है... व्यवस्था में बहुत सी गड़बड़ियाँ रही, समय प्रबंधन नहीं हो पाया, इसके बावजूद मैं परिकल्पना सम्मान समारोह को कई मायनों में भव्य तथा सफल मानता हूँ. मैंने अविनाश जी और रविन्द्र जी से वादा किया था कि समारोह कि देखभाल और किर्याकलापों में सक्रीय योगदान दूंगा, एक ब्लोगर के नाते आयोजन को सफल बनाने में अपने योगदान को अपना कर्तव्य मानता हूँ. इसके साथ-साथ दिल्ली निवासी होने के कारण स्वत: मेज़बान भी था. लेकिन अपनी कमजोरी और दिन में ब्लोगर्स बंधुओं से मुलाक़ात के सिलसिले के कारण शाम तक थक गया था. इसलिए जो भी कमियां रही उसके लिए मैं अपना योगदान ना देने के कारण खुद को भी उसका कारण मानता हूँ.

    श्री पुन्य प्रसून वाजपयी जी दुसरे सत्र के मुख्य अतिथि थे, इसलिए उन्हें पूर्ण सम्मान मिलना चाहिए था. आयोजन समिति पूरी तरह व्यस्त रही, शायद इसी कारण ध्यान नहीं रख पाएं. हालाँकि पुन्य प्रसून वाजपयी जी का वापस जाना तथा प्रायोजकों द्वारा अत्यधिक समय ले लेना हमेशा कटोचता रहेगा. परन्तु हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि ऐसा आयोजन ब्लॉग जगत में पहली बार हुआ था, इसलिए इतनी अनियमितता होना स्वाभाविक भी था. फिर आयोजन में अविनाश जी और रविन्द्र जी ने अपनी हिम्मत से अधिक मेहनत की थी और इसके लिए हमें इन दोनों का आभारी होना चाहिए.

    इस बहाने ही सही, देश के कोने-कोने से आये ब्लोगर बंधुओं की आपस में मुलाक़ात और विचारों का आदान-प्रदान इस आयोजन की सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि रही.

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  15. आपसे लगभग पूरी तरह सहमत.

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  16. पार्टीबाज़ी तो चली है कुछ को बाद में जोड़ा गया
    हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हां हा हा आहा ...........

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  17. ये क्या हुआ ? कब हुआ ,जब हुआ तब हुआ ..कुछ तो बोलो ....
    किसी फिल्म का ऐसा ही कोई गाना था न ?
    प्रवीण जी पहले तो मैं मैं आपकी इस लचर पोस्ट की लानत मलामत करता हूँ :)
    आपकी याचिका खारिज -आप किस तरह बिरीव्द पार्टी हुए ?
    बस दूर दूर से राम झरोखे बैठे सबका मुजरा लेते रहते हैं ...
    यह दुनिया एक अर्थ तंत्र पर चल रही है -
    ब्लागरों की कौड़ी पर पूछ तो है नहीं कहीं ? (उनकी आदतों के चलते )
    अब किसी ने सारस्वत सम्मान भी किया तो बुरा हो गया ?
    यह तो परले दर्जे की कृतघ्नता है ....अब आपका इंटरेस्ट क्लैश हो गया तो आप पैजामें से बहार हो लिए ...
    खुशदीप जी की पहले से ही पुरस्कारों /सामानों के प्रति क्रिटीकल दृष्टि रही है और मैं इसलिए मुस्कुरा कर उन्हें असहमति पुरस्कार
    देने की बात करता रहा हूँ -
    वहां तो उन्हें जाना ही नहीं था -वे भी अर्थतंत्र के झांसे में क्यों आ गए ?
    दिनेश जी ने बड़ी वाजिब बात कही है मगर वे भी वहां मौजूद थे ..
    गर मुझे यह पता होता के एक मुख्य मंत्री सम्मान देने वाला है (जो बताया नहीं गया था ) तो सारा काम धाम छोड़ मैं भी पहुँच ही लेता .लिस्ट में तीसरे नम्बर पर था ...फोटो सोतो खिंचवा कर ड्राईंग रूम में लगाता बच्चों आगे की पीढियां देखती >>...
    क्या इससे ज्यादा औकात समझते हैं आप ब्लागरों की ....:) क्या यहाँ आत्म सम्मान सरीखी कोई बात दिखी कभी आपको -अपवादों को छोड़ दीजिये ..ब्लागरी उनसे है वे ब्लागरी से नहीं ...पर कितने हैं ऐसे ? हम आप और वे बस चंद नाम :) (थोडा सेल्फ प्रमोशन हो जाय ,मुख्य मंत्री के हाथ सम्मान से वंचित जो हुए कुछ भरपाई कर लूं !)

    अब वाकई बहुत अफ़सोस हो रहा है वहां न पहुँच कर .... :)
    अब खुशदीप जी इतने आहत हो गए कि हिन्दी ब्लागरी छोड़ने की भभकी दे रहे हैं -क्या फर्क पड़ेगा अगर छोड़ ही देगें तो ...हिन्दी बलागरी बंद हो जायेगी ?
    पूरे मुद्दे को इतना भाव ही नहीं देना है मित्र !

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  18. कुछ लिपिगत त्रुटियों को मित्रगन सुधर कर पढ़ेगें..

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  19. परवीन साहब,

    अब हमें कहां कुछ कहना है? सब कुछ तो आपने कह दिया।

    सूचि और आमंत्रण में नाम न देखकर,एवं सम्मान न मिलने से तिलमिलाए लोग अब जाग्रत भविष्य वक्ता का कसीदा सम्मान पा रहे है।

    अदने ब्लॉगर का कार्य ही है, खुशामद-गीत गाना। और बिगडी बातों पर अट्टहास करना।

    HIPOCRISY का मीटर अपने सर्वोच्छ बिन्दु को छू गया। अब बाक़ी क्या रह जाता है?

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  20. सुधार्……
    HIPOCRISY को HYPOCRISY (पाखण्ड) पढें

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  21. मुझे नहीं लगता कि ऐसा कोई बड़ा विवाद हुआ ...जहाँ मुख्य मंत्री को बुलाया जायेगा वहाँ समय पर आयोजकों का वश नहीं रहता ... हाँ यह बड़ी गल्ती हुई जो दूसरे सत्र के मुख्य अतिथि के आगमन पर उनका स्वागत नहीं हो पाया ....खुशदीप भाई को ठेस भी इस लिए ज्यादा लगी कि मुख्य अतिथि पुण्य प्रसून जी को उनके द्वारा निमंत्रित किया गया था ..खुशदीप जी का नाराज़ होना जायज़ है ...लेकिन जब माहौल ऐसा था तो एक ब्लोगर होने के नाते खुशदीप जी भी उनकी आवभगत कर सकते थे ...और इस स्थिति से उबार सकते थे ...इतने बड़े आयोजन में सबका सहयोग होना चाहिए ... खामियों पर टीका टिप्पणी से बेहतर है कि उनसे सीख लें ... जिनको सम्मान मिला ..उन्होंने नहीं कहा था कि हमें सम्मान दो या उन्होंने कोई खरीद फरोख्त नहीं कि थी ..जैसा कि लोग समझ रहे हैं ...यदि किसी को ऐसा लग रहा था तो उसी समय कहना चाहिए था जब परिकल्पना पर यह सब सूचित किया जा रहा था ...बात वही है कि किसी के द्वारा किये गए कामों पर बहुत सरल है उंगली उठाना ... जो काम करते हैं उनसे गलतियाँ भी होती हैं जो कुछ नहीं करते वो गल्ती भी कैसे करेंगे ?

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  22. लीजिये अब हो गया बंटाधार हमारे ब्लॉग पढ़ने का, एक तो लिखने का और पढ़ने का समय नहीं मिल रहा था जो थोडा मिल रहा था तो सोचा कुछ अच्छा अच्छा पढेंगे पर यहाँ तो अलग ही महाभारत छिड़ी है अब हफ्तों तक इसी विषय पर ब्लॉग झेलने पड़ेंगे | जरा जल्दी निपटिये ये सब और जिसका इस विषय का कोटा हो गया हो वो कुछ और लिखे |
    और क्या कहे कुछ भी कहे तो किसी एक गुट के बना दिए जायेंगे कह दिया जायेगा की लो जी ब्लोगिंग में कोई इन्हें पहचानता नहीं पुरुष्कार मिला नहीं तो कुछ भी कहे जा रही है | एक ब्लॉग पर नहीं उपाधि मिल गई हम जैसे ब्लोगरो को, उसी के अनरूप कुछ कह देते है म्याऊ म्याऊ या भौ भौ !!! मतलब आप ही निकल ले :))

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  23. पोस्ट में उल्लिखित ब्लागर्स सम्मान सम्मिलन की जानकारी नहीं है इसलिए उसपर मेरी टिप्पणी अनुचित होगी !



    मुझे लगता है कि निर्विवाद रह पाना सर्वाधिक दुष्कर कार्य है :)

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