रविवार, 29 मई 2011

सही लक्षित कल्याणकारी आर्थिक सहायता ( Accurately Targeted Monetary Welfare Assistance )... एक बहुत देरी से उठाया जा रहा सही कदम है यह !!!

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मेरे कल्याण-कामी मित्रों,


कभी-कभी ही ऐसा होता है कि कोई खबर एकदम से मन खुश कर देती है...


एक कल्याणकारी राज्य ( Welfare State ) का आदर्श ढोते देश हैं हम... आजाद हुऐ ६४ साल हो जायेंगे इस पंद्रह अगस्त को... ६४ साल से गरीबों का कल्याण कर रहे हैं हम... पर आश्चर्य की बात यह है कि हमारे गरीब अभी भी गरीब ही हैं... 


कल्याणकारी राज्य की बुनियाद टिकी है निर्बल या गरीब के लिये दी जा रही विभिन्न सबसिडियों पर...


सबसिडी दी जाती है मिट्टी के तेल पर... पर वह उस को नहीं मिलता जिसके लिये दिया जा रहा है, उसका इस्तेमाल हो जाता है पैट्रोल पंपों में पेट्रोलियम पदार्थों में मिलावट करने में, उद्योगों में, मिट्टी तेल से जनरेटर चलाने में...


१६.५० रूपये प्रति लीटर की अंडर रिकवरी की जाती है गरीब के हित के नाम पर डीजल में... फायदा उठाते हैं ट्रांसपोर्टर, जो कि ग्राहक से लागत लेने में सक्षम हैं... दौड़ते हैं धन-झोलाओं के SUV... रोशन रहती हैं प्रभु वर्ग की 'गेटेड कम्यनिटीज्' २४ X ७ पावर बैकअप से उसी डीजल की बदौलत...


सबसिडी दी जाती है घरेलू गैस के सिलिंडर पर ३५० रू० प्रति सिलेंडर से ज्यादा... सारे मिठाई वाले, चाट वाले, होटल वाले, केटरिंग वाले और आम लोग भी जलाते हैं उसी सिलेंडर को अपने आयोजन में... जाड़ों में गैस-गीजर चलते हैं ( बिजली से सस्ता जो पड़ता है न )... अब तो कारें भी उसी से चलाते हैं प्रैक्टिकल लोग...


हजारों हजार करोड़ हर साल खर्च होता है पीडीएस के मार्फत गरीब को सस्ता अनाज देने को... बहुत कम गरीबों को नियम से सही दर पर मिल पाता है यह... लग जाता है मुनाफाखोरों व भ्रष्टों की भूख शान्त करने को...


कुछ इसी तरह की ही है खाद ( कैमिकल फर्टिलाइजर ) सबसिडी भी... खाद करखानों को हर स्टैप पर सबसिडी मिलती है... इसका भी अधिकाँश जाता है प्रभु वर्ग की ' गरीबी ' दूर करने में...


ऐसे में कुछ सुधार की आशा जगाती है यह खबर...


देखिये यहाँ पर ( साभार हिन्दुस्तान टाइम्स )


Fuel subsidy: Govt to give Rs 400 to BPL families
As part of India’s first direct cash transfer scheme, every below poverty line family may get over Rs 400 per month from the government from April next year in lieu of fuel subsidy for kerosene and liquefied petroleum gas cylinders. The move, which is expected to be considered by the Empowered Group of Ministers (EGoM) on June 9, is aimed at checking use of kerosene for fuel adulteration and reduce financial loss to fuel companies.
New methodology, if accepted, will benefit around 40 crore poor Indians.http://www.hindustantimes.com/Images/HTEditImages/Images/28_05_pg12a.jpg
The smart cardOnce the new regime is introduced, a below poverty line (BPL) family will get approximately Rs 300 per month on a smart card to be registered in name of a household woman for kerosene and another Rs 100 for LPG cylinder.
“These smart cards will have Aadhaar numbers to prevent any leakages,” as official said.
Kerosene and LPG cylinders will be available at the market rate and the poor will get it at the existing subsidised price after the money will be deducted from their smart card.
The work for introducing the regime has already started in states such as Haryana and Andhra Pradesh.
Lessening burdenThe fuel subsidy burden on the Centre in 2010-11 was Rs 38,336 crore in the last financial year, of which about R16,000 crore was meant for providing kerosene at subsidised rates to the poor. In this budget, the total petroleum subsidy is Rs 23,640 crore.
Till now, the government had to bear a cost of Rs 28 per litre to provide kerosene at highly subsidised rate of Rs 12 per litre and over Rs 150 for a LPG cylinder.
The low cost meant incentive to sell kerosene for adulteration of petrol, whose market price is Rs 63 per litre.
“As the product will move in the entire distribution chain at full price, there will be no incentive left for diversion of kerosene,” says a proposal mooted for empowered group of ministers (EGoM) headed by Pranab Mukerjee.
The government intends to introduce the new regime from April 2012.


कुछ इसी तरह की सही लक्षित कल्याणकारी आर्थिक सहायता ( Accurately Targeted  Monetary Welfare Assistance ) को खाद्मान्न, केमिकल फर्टीलाइजर, शिक्षा, स्वास्थ्य व सैनिटेशन के क्षेत्र में भी लागू करने की जरूरत है...


एक मुल्क के तौर पर हम कल्याणकारी योजनाओं में से हो रहे रिसाव ( Pilferage ) को अब और नहीं झेल सकते और न ही अब हमें इसे और झेलना भी चाहिये...


आपका क्या सोचना है इस बारे में...










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बुधवार, 25 मई 2011

थैंक यू मिनिस्टर, इस खरी-खरी को सुनाने के लिये... पर इससे आगे क्या ?

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अपने पर्यावरणमंत्री जयराम रमेश नये दौर के राजनीतिज्ञ हैं... जो सोचते-समझते हैं बिना किसी लाग लपेट के उसे सीधा-साफ सही मंच पर कहने में यकीन करते हैं... 

अपने अनूठी भारतीय विशिष्टता ( Peculiar Indian Characteristic ) वाले बयान के बाद अब फिर उन्होंने भारतीय अकादमिक-राजनीतिक जगत में एक भूचाल सा मचा दिया है यह कहकर कि हमारे आईआईटी व आईआईएम की फैकल्टी ( शिक्षक ) विश्व स्तरीय नहीं हैं...


विश्वस्तरीय नहीं आइआइटी आइआइएम : जयराम रमेश

नई दिल्ली: पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने देश में शोध और प्रबंधन से जुड़े शीर्ष संस्थानों आइआइटी और आइआइएम की गुणवत्ता पर सवालिया निशान लगाया है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आइआइटी) और भारतीय प्रबंध संस्थानों (आइआइएम) के शिक्षकों को आड़े हाथ लेते हुए उन्होंने कहा कि ये संस्थान विश्व स्तरीय नहीं हैं। खुद आइआइटी मुंबई के छात्र रहे रमेश के अनुसार, विद्यार्थियों के गुणवत्ता के कारण ही हमारे आइआइटी और आइआइएम संस्थान उत्कृष्ट बने हुए हैं। मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बीटेक जयराम रमेश सोमवार को एक कार्यक्रम के बाद पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे। देश के आइआइटी संस्थानों को एक तरह से आइना दिखाने हुए उनका साफ कहना था कि हमारे प्रौद्योगिकी संस्थानों से बमुश्किल कोई महत्वपूर्ण शोध हो पाता है। यह तो छात्र हैं जिनकी गुणवत्ता के चलते ये संस्थान उत्कृष्ट हैं। रमेश के मुताबिक, संस्थान नहीं, यहां के छात्र विश्व स्तरीय हैं। उन्होंने कहा कि देश के आइआइटी और आइआइएम संस्थानों को उनके शिक्षकों या शोध की गुणवत्ता के कारण नहीं बल्कि उत्कृष्ट किस्म के छात्रों की वजह से जाना जाता है। पर्यावरण मंत्री ने माना कि सरकारी तंत्र के मकड़जाल के चलते भारत विश्व स्तरीय शोध केंद्र विकसित नहीं कर पाता है। रमेश ने साफ कहा कि सरकारी तंत्र में विश्व स्तरीय शोध केंद्र विकसित नहीं हो सकते हैं। हमारा साठ वर्ष का अनुभव यही बताता है। जयराम रमेश ने गुजरात के जामनगर में रिलायंस इंडस्ट्रीज से साझा उपक्रम में विश्व स्तरीय राष्ट्रीय समुद्री जैव विविधता केंद्र की स्थापना करने के अपने मंत्रालय के फैसले को जायज ठहराया। जयराम रमेश ने कहा कि पर्यावरण मंत्री के रूप में अपने मौजूदा कार्यकाल के दौरान वह भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण (बीएसआइ) और भारतीय जीव विज्ञान सर्वेक्षण जैसे संस्थानों को सरकार से स्वतंत्र व स्वायत्त बना पाने में असमर्थ रहे हैं। इसका उन्हें बेहद अफसोस है और इस कारण वह हताश भी हैं।

यही खबर अंग्रेजी में आप यहाँ पर देख सकते हैं... 

यह खरी बात जयराम रमेश कहने की हिम्मत जुटा पाये इसके पीछे एक बड़ा कारण यह भी है कि वह स्वयं भी आईआईटी मुम्बई के विद्मार्थी रहे हैं... जिस तरह से उनके बयान का विरोध हो रहा है उससे उस स्थिति की कल्पना कीजिये जब कोई नॉन आईआईटियन मिनिस्टर इस बात को कहता... उसे तो मजाक का पात्र बना दिया गया होता...

जयराम रमेश जी के कहे के विरोधी पार्टियों तथा उनके ही दल के द्वारा भी एवं आईआईटी/आईआईएम फैकल्टी द्वारा किये जा रहे विरोध का नजारा भी देखिये :-

और

पर क्या कुछ गलत कह रहे हैं जयराम रमेश... आप खुद आंकिये...

रमेश के अनुसार, विद्यार्थियों के गुणवत्ता के कारण ही हमारे आइआइटी और आइआइएम संस्थान उत्कृष्ट बने हुए हैं। रमेश के मुताबिक, संस्थान नहीं, यहां के छात्र विश्व स्तरीय हैं। उन्होंने कहा कि देश के आइआइटी और आइआइएम संस्थानों को उनके शिक्षकों या शोध की गुणवत्ता के कारण नहीं बल्कि उत्कृष्ट किस्म के छात्रों की वजह से जाना जाता है।

क्या यह सही नहीं है इन संस्थानों में १२१ करोड़ आबादी वाले इस महादेश में उपलब्ध सर्वश्रेष्ठ छात्र जाते हैं, यह छात्र वहाँ पहुंचने से पहले ही सफलता के लिये आवश्यक सभी गुणों जैसे विषय की सही समझ, मेहनत करने की क्षमता, एकाग्रता लगन व तेजी से सही निर्णय लेने की क्षमता से पूर्ण होते हैं... 

Anil Gupta, professor at IIM-A, said, "Ramesh has shown tremendous ignorance about the intellectual capabilities of these institutions. I would not deny the fact that they need to do more. But to say that faculty is not making any contribution and it is just because of the quality of students... then people should take the CAT scores and give jobs to them."

  यहाँ पर कहना बुरा तो लगेगा कईयों को परंतु है सत्य... कि CAT  99.5 Percentile स्कोर पाने वाले छात्र को यदि सीधे भी कोई जॉब दे दिया जाये तो उसकी पर्फार्मेंस अधिकाँश औसत अन्यों की अपेक्षा बेहतर होगी...

Sebastian Morris, another professor at IIM-A, described the remarks as "simplistic". "Most of the faculty would be having same qualification as the faculty in top-class institutions, which means they have done their PhDs abroad," Morris said.
  
यहाँ पर फिर यही सवाल पूछा जा सकता है कि क्यों इतने साल बाद भी हमारे इन संस्थानों से की गई PhD उतनी मान्यता नहीं रखती...
While HRD minister Kapil Sibal agreed no Indian institution ranked among the top 150 universities globally...
  
ऐसा क्यों, दुनिया की कुल आबादी का पाँचवाँ हिस्सा हैं हम, और शीर्ष के १५० संस्थानों में हमारा कोई संस्थान नहीं...

बेहतर यही रहेगा कि ठोस जमीनी हकीकत को जाना जाये व उसे सुधारने के तरीकों को अपनाया जाये... पर यह सब करने के पहले आत्म-आकलन व आत्म-विश्लेषण जरूरी है... जो करने को हमारे उच्च शिक्षा के यह संस्थान तैयार नहीं दिखते...

आज की तारीख की ठोस हकीकत तो यही है कि अधिकाँश छात्र आईआईटी से डिग्री लेने के बाद आईआईएम या अन्य किसी टॉप के संस्थान से एमबीए करने के बाद मल्टीनेशनल कॉरपोरेशन्स की मोटी पगार वाले प्रबंधक की नौकरी ( विदेश में हो तो और भी अच्छा ) पाने को ही अपना एकमात्र जीवन लक्ष्य मान बैठे हैं...

अपना देश जो हर तरह की तकनीक के मामले में दुनिया से काफी पिछड़ा है, उसके लिये नई, कारगर व सस्ती तकनीकें विकसित करने का सपना देखना/ प्रयास करने का प्रयत्न मात्र भी नहीं करते हमारी नई पीढ़ी के यह मेधावी... और न ही इन संस्थानों की फैकल्टी उनको यह सपना देखने को प्रेरित करती है...

थैंक यू मिनिस्टर ! आप सही हैं इस बार भी... हमारे इन संस्थानों के शिक्षक या उनमें किये जा रहे शोध में विश्वस्तरीय गुणवत्ता नहीं है... कोई सुधार भी तभी हो सकता है जब हकीकत को स्वीकारा जाये... पर अभी तो ऐसा होना संभव नहीं लगता... यह संस्थान खुद के बनाये ऊँचे सिंहासनों में बैठ जीते रहेंगे... हकीकत को नकारते हुऐ... मल्टीनेशनल आकाओं के लिये ज्यादा से ज्यादा मुनाफा पैदा करने वाले सेवक ( सॉरी मैनेजर ) उनको देते हुऐ... और हमें हर चीज/ हर तकनीक खरीदनी ही पड़ेगी तकनीकी महारत रखने वाले प्रथम विश्व के सौदागरों से...





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मंगलवार, 17 मई 2011

' न स्वर्ग है और न मृत्यु के बाद जीवन '... और हम ख्वामखाह ही समय गंवाये जा रहे हैं !!!

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मेरे  ' स्वर्ग-जन्नत ' की चाह रखते मित्रों,

खबर वाकई दिल तोड़ देने वाली है, मरणोपरांत स्वर्ग या जन्नत का सुख भोगने की चाह रखने वालों के लिये  ... स्टीफन हॉकिंग ने एक बार फिर दोहरा दिया है कि   " न स्वर्ग है और न मृत्यु के बाद जीवन, स्वर्ग और मृत्यु के बाद का जीवन परी कथाएं हैं, जो मौत से डरने वालों के लिए गढ़ी गई हैं।   " ...  हिन्दी में यह खबर देखें यहाँ पर...  उद्धरित करता हूँ...

न स्वर्ग है और न मृत्यु के बाद जीवन : स्टीफन हॉकिंग
लंदन, प्रेट्र : स्वर्ग और मृत्यु के बाद का जीवन परी कथाएं हैं, जो मौत से डरने वालों के लिए गढ़ी गई हैं। दुनिया के सबसे लोकप्रिय वैज्ञानिकों और विचारकों में शुमार स्टीफन हॉकिंग ने यह दावा किया है। चर्चित किताब ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम के लेखक हॉकिंग ने ब्रिटिश अखबार द गार्जियन को दिए साक्षात्कार में कहा कि जब मस्तिष्क मर जाता है, तो उसके उसके बाद कोई अस्तित्व नहीं रह जाता। हॉकिंग 21 साल की उम्र से मोटर न्यूरॉन नामक बीमारी का शिकार हैं। उन्होंने कहा, मैं पिछले 49 साल से असमय मृत्यु की आशंका के साथ जी रहा हूं। मुझे मरने से डर नहीं लगता, लेकिन मुझे मरने की कोई जल्दी भी नहीं है। मेरे पास बहुत कुछ है जो मैं मरने से पहले करके जाना चाहता हूं। उन्होंने कहा कि मैं दिमाग को एक कंप्यूटर की तरह मानता हूं, जो उसके अलग-अलग हिस्सों के फेल हो जाने पर काम करना बंद कर देता है। दिमाग के फेल होने के बाद स्वर्ग और मौत के बाद जीवन जैसी संभावना नहीं बचती। यह सिवाय परियों की कथा के और कुछ नहीं है। साक्षात्कार में उन्होंने मृत्यु के बाद के जीवन की अवधारणा को खारिज कर दिया और अपनी क्षमताओं का भरपूर इस्तेमाल करते हुए धरती पर बेहतर जीवन की आवश्यकता पर बल दिया। हॉकिंग ने लंदन में हम यहां क्यों हैं विषय पर दिए लेक्चर के बारे में कहा, विज्ञान बताता है कि इस बृह्माँड में आकाशगंगाएं हैं, जहां शून्य में से चीजें जन्म ले रही हैं। यह सिर्फ मौके की बात है कि हम इस धरती पर हैं।

विस्तार से व मूल स्रोत से यह खबर पढ़ना चाहते हैं तो यह रहा ' गार्जियन ' अखबार का लिंक ( अंग्रेजी में )...

यह तो रही खबर की बात... अब जरा सोचें कि क्या कुछ नया कह रहे हैं स्टीफन हॉकिंग... अगर हम उपलब्ध ज्ञान, तथ्य व सबूतों का प्रेक्षण करें तथा एक पूर्वाग्रह-रहित सोच के साथ निष्कर्षों तक पहुंचने का प्रयत्न करें तो क्या हम भी इन्हीं निष्कर्षों पर नहीं पहुंचेंगे ?...

In the interview, Hawking rejected the notion of life beyond death and emphasized the need to fulfill our potential on Earth by making good use of our lives. In answer to a question on how we should live, he said, simply: "We should seek the greatest value of our action.

मेरे बहुत से मित्र यहाँ पर यह तर्क अवश्य देंगे कि माना कि यह यह अवधारणायें  असत्य हैं व दिल को दिलासा दिलाने के लिये रची गई हैं फिर भी इनको मानते रहने में हर्ज क्या है, किसी का नुकसान तो नहीं हो रहा...

उनसे मुझे मात्र दो बातें कहनी हैं...

१-  इन अवधारणाओं के कारण मानव जाति का बहुत सा समय, धन व कर्म इनको पोषित करने में लगता है जिससे इंसान की नस्ल अपने सही Potential को Fulfill नहीं कर पाती है !

२- दूसरी जो सबसे बड़ी बात है वह यह है कि ईश्वर, धर्म, स्वर्ग-नर्क की इन्ही अवधारणाओं के कारण ही आज का इंसान एक दूसरे से दूर है, लफड़े हैं, झगड़े हैं, फसाद हैं, विवाद हैं... धार्मिक कट्टरपंथी, दंगाई, आतंकवादी और आत्मघाती हमलावर भी... केवल और केवल ' अपने ईश्वर ' को खुश करने व मरणोपरांत स्वर्ग का शाश्वत सुख पाने की चाह में दुनिया को और बदसूरत बनाते रहते हैं !

आप क्या सोचते हैं, फैसला आपका है...

वैसे ऊपर बनी बस पर बैठने के लिये सभी आमंत्रित हैं ... :)



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रविवार, 8 मई 2011

भ्रष्टाचार मुक्त भारत का आधार बन सकता है यह !

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भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण ( Unique Identification Authority of India )  द्वारा दिया जाने वाला आधार ( AADHAAR )  जो कि बारह अंकों का रैन्डमली जेनरेटेड नंबर होगा तथा Basic demographics and biometric information – photograph, ten fingerprints and iris – of each individual से लिंकित होगा, भ्रष्टाचार के विरूद्ध लड़ाई में एक बहुत बड़ा हथियार बन सकता है...

जानिये कैसे ?

१- सबसे पहले हमें अपने सारे बैंकों को कोर बैंकिंग सिस्टम के अंदर लाना होगा तथा पूरे देश में ब्रांच-फ्री बैंकिंग लागू करनी होगी ।

२- क्योंकि भारत के हर नागरिक को एक आधार मिलेगा, एक आधार पर किसी भी नागरिक का देश में एक ही खाता खुले, आधार नंबर बैंक अकाउंट नंबर के साथ हर ट्रान्जेक्शन में लिखा जाये, कोई भी नागरिक चाहे तो विभिन्न प्रयोजनों के लिये उप खाते खोल सकता है पर वह मूल खाते के डाटा-बेस में शामिल रहेंगे हमेशा...

३- विभिन्न कंपनियों, व्यवसायों व प्रतिष्ठानों, केन्द्र व राज्य सरकारो, सरकारी विभाग व स्थानीय निकायों आदि को भी आधार जैसे ही विशिष्ट पहचान नंबर दिये जायें व उनका भी एक ही मुख्य बैंक खाता व एकाधिक उपखाते हों... एरियल फोटोग्राफी, सैटेलाईट इमेजिंग व जमीनी सर्वे की मदद से पूरे भारत देश की अचल संपत्तियों की मैपिंग हो व उसके हर टुकड़े, हर भवन को भी विशिष्ट नंबर दिया जाये, यह नंबर ऐसा हो जो भविष्य में उस संपत्ति के विभाजन और विस्तार की संभावना को ध्यान में रखते हुऐ बढ़ाया जा सके...  इसी तरह नयी कंपनी के प्रमोटर, साझीदार, शेयर-बाजार, बीमा या म्युचुअल फंड के हर इंवेस्टमेन्ट को भी संपत्ति जैसा ही माना जाये... अब इसके बाद का काम बहुत आसान है... प्रत्येक संपत्ति के मालिक के तौर पर कोई न कोई आधार नंबर दर्ज होना अनिवार्य हो... एकाधिक मालिक होने पर नंबर के आगे मालिकाना प्रतिशत भी दर्ज हो...

४- इस तरह का एक दूसरे से जुड़ा डाटाबेस हो कि किसी भी आधार नंबर को टाइप करते ही अधिकृत व्यक्ति को उस आधार नंबर के मालिकाना हक वाली सभी चल-अचल संपत्तियों व बैंक खातों की सारी जानकारी मिल जाये ।

५- पचास हजार से ज्यादा का कोई ट्रान्जेक्शन नगद में करना अपराध हो ।

६- पाँच हजार से ज्यादा का हर ट्रान्जेक्शन हाई वैल्यू माना जाये व इसके लिये लिखित बिल देना तथा दोनो पार्टियों को अपना आधार उस पर अंकित करना अनिवार्य हो... इस की मॉनिटरिंग के लिये एक समर्थ टास्कफोर्स खड़ी हो ।

७- समय समय पर पाँच सौ व हजार के नोटों का करेंसी रिकॉल हो ।


यह सब उपाय जटिल हैं, सरकार की ओर से इच्छाशक्ति की माँग करते हैं पर इनको करना असंभव कतई नहीं है... यदि लागू हो जाये तो प्रॉपर्टी-होर्डिंग व काले धन के आधार पर बना प्रॉपर्टी बबल फूट जायेगा, सभी को आवास सुलभ होगा व काले धन की अर्थव्यवस्था अपने अंत की ओर बढ़ेगी...

पर क्या आप सोचते हैं कि एक समाज के तौर पर हम लोग अपने छुद्र हितों की कुरबानी दे अपनी सरकार से यह सब करवा पायेंगे ?

सोचिये, यह हमारी अगली पीढ़ी के भविष्य का मामला है !

आप चाहें तो इन उपायों में कुछ जोड़ या सुधार भी सकते हैं !





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बुधवार, 4 मई 2011

जब उसने मोहब्बत की थी एक मर्द के साथ, तो शादी किसी औरत से क्यों करे ?

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मेरे खुला-दिमाग मित्रों,


एक गुमान सा रहा है मुझे अपने आप पर, कि, अपने इर्द-गिर्द के अधिकांश के मुकाबले मैं थोड़ा ज्यादा खुला दिल-दिमाग रखता हूँ... पर यह LGBT या GLBT ( गे, लेस्बियन, बाईसेक्सुअल व ट्रान्सजेन्डर ) समुदाय को व उनके व्यवहार को मैं आज तक नहीं समझ पाया... 

एक समय तो यहाँ तक था कि अपनी इस पोस्ट  पर मैंने इस प्रवृत्ति को Perverted Behaviour तक कह दिया था... 

सही कहूँ तो मुझे आज भी समझ नहीं आता जब कोई कहता है कि वह पुरूष के शरीर के अंदर ट्रैप एक औरत या औरत के शरीर के अंदर ट्रैप एक पुरूष है... Transvestites या Cross Dressers  की परिभाषा में आज उन महिलाओं को शामिल नहीं किया जाता जो हमेशा ही पुरूषों के वस्त्र पहनती हैं, इस पर भी मुझे आपत्ति करने का मन करता है [ यह अलग बात है कि जीन्स-शर्ट पहनने वाली महिलाओं कि ओर अधिकाँश पुरूष न चाहते हुऐ भी न जाने क्यों एक नजर देखने से खुद को रोक नहीं पाते... :) ]...

यह समझ विकसित न हो पाने के पीछे एक बड़ी वजह मेरी समझ से यह भी रही है कि अपने आस-पास मैंने इस तरह के व्यक्तित्व नहीं देखे... आठ साल पहले की बात है, मेरे एक अग्रज और प्रिय मित्र ने अचानक मुझे आदेश सा दिया कि मैं तुरंत उनके घर पहुंचूं... वहाँ जाने पर उन्होंने मुझे कहा कि उनके किशोर पुत्र  की चाल-ढाल उन्हें गड़बड़ लग रही है और मैं उसे समझाऊँ... मैंने उस किशोर को बुलाया तो पाया कि उसने बाल कंधों तक लंबे करे हुऐ थे जिनमें दो रंगों से लटें हाइलाइट की हुई थी, चेहरे को गौर से देखा तो पाया आँखों की भंवें ब्यूटी पार्लर से नुचवा कर उन्हें बाकायदा आइब्रो पेंसिल से आकार दिया हुआ था, ऊपरी पलक पर आई-शैडो लगा था, हल्की गुलाबी लिपस्टिक उस किशोर ने लगाई हुई थी, दोनों हाथों के नाखून बड़े थे और उन पर गुलाबी नेल-पेन्ट था, एक कान में इयर-रिंग पहना हुआ था... मैं यह सब देखते ही आगबबूला हो गया, और उस दिन मैं उस किशोर के बाल फौजी स्टाइल में कटवा, नाखून कटवा, चेहरा धुलवा, कान की बाली को नाली में फेंक, साबुन से रगड़-रगड़ चेहरा धुलवाने के बाद ही घर लौटा... अगले दिन मैंने उसके कुछ दोस्तों को बुलाया तो पता चला कि जनाब कुछ नशीली गोलियों के सेवन के आदी आवारा युवकों के साथ अक्सर रहते हैं... बहरहाल मैंने व उसके परिवार ने इतना दबाव बनाया कि उसने वह सोहबत छोड़ दी, तीन वर्ष पहले उसकी शादी भी हो गई, आज एक बच्चा भी है उसका... जब भी मिलता है, पूरी इज्जत देता है... मेरे विचार से वह लड़का अपनी सेक्सुएलिटि के साथ दूसरों की देखा-देखी एक प्रयोग सा कर रहा था, जो हमारे कहने पर उसने छोड़ दिया...


आज मैं मानता हूँ कि LGBT समुदाय को समाज से बेहतर समझ की जरूरत है, मुझे यह मानने में कोई हिचक नहीं कि मेरा उनको Pervert लिखना गलत था और हमारे आज के समाज को इस समुदाय के लिये और ज्यादा इन्क्लुसिव होना चाहिये...


अरे यह क्या, इतना सारा लिख गया और अभी तक पोस्ट के मुद्दे पर नहीं पहुंच पाया मैं... जबकि मेरी यह पोस्ट एक ऐसे इन्सान के बारे में है जो मेरी नजर में हालात का मारा है...


किस्सा यह है कि,

कश्मीर के एक युवक के जर्मनी के क्रॉसड्रेसिंग करने वाले एक युवक से दिल्ली में मुलाकात हुई, दोनों के बीच समलैंगिक संबंध बन गये व दोनों ने विवाह करने का फैसला कर लिया... अब क्योंकि हमारे देश का कानून समलैंगिक विवाह को मान्यता नहीं देता, इसलिये अपने प्रेमी से विवाह करने के अति उत्साह के चलते जर्मन युवक ने सर्जरी के जरिये लिंग परिवर्तन करवा लिया व महिला बन गया, इस कार्य में उसके ३० लाख रूपये भी खर्च हो गये...

मामले में मोड़ तब आया जब कश्मीरी युवक ने उस 'महिला' से विवाह करने से साफ इन्कार कर दिया... जर्मन ' महिला ' ने श्रीनगर, जम्मू एंड कश्मीर की एक अदालत में कश्मीरी युवक के ऊपर बलात्कार का इलजाम लगाते हुऐ मुकदमा दायर किया है...

अदालत ने फिलहाल मामले को पेंडिंग में रखा है यह पता लगाने के लिये कि भारतीय दंड संहिता की किन धाराओं के तहत यह मामला चल सकता है ?


मेरा यहाँ सवाल यह है कि कश्मीरी युवक समलैंगिक है, वह पुरूष के साथ ही यौनिक सुख लेने में समर्थ है जब उसने मोहब्बत की थी एक मर्द के साथ, शादी का फैसला भी मर्द के साथ ही किया था,  तो  अब वह शादी किसी औरत से क्यों करे ?


आप क्या सोचते हैं ?

यह खबर  आप यहाँ पर  देख सकते हैं, क्षमा करेंगे यह अंग्रेजी में है ।










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मंगलवार, 3 मई 2011

मारा गया एक ओसामा, सर उठाये जिंदा खड़े हैं अभी भी अनेक सवाल !!!

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आखिरकार मारा ही गया ओसामा बिन लादेन...

क्या हुआ और कैसे हुआ यह विस्तार से जानने के लिये देखें बीबीसी के यह तीन लिंक...




आतंकवाद के विरूद्ध लड़ाई में अपने दुश्मन नंबर एक को मार गिराना व समंदर में उसकी कब्र बना देना अमेरिका की उपलब्धि तो कहा जा सकता है पर ओसामा की यह किलिंग खासतौर पर भारत के लिये कुछ बड़े सवाल खड़े करती है...

१- क्या पाकिस्तान मिलिटरी एकेडमी से महज कुछ सौ मीटर दूर एक विला में शायद सालों से रह रहे ओसामा के बारे में पाकिस्तान सरकार को नहीं पता था ?...  हकीकत में यह मकान गेस्ट हाउस था और वह पाकिस्तान सेना का अतिथि !

२- क्या अमेरिका को भी वाकई इस बारे में नहीं पता था ? अमेरिका और पाकिस्तान को इस बारे में सब पता था, अफगानिस्तान में सेना बनाये रखने पर होने वाली मानवीय व आर्थिक क्षति रिसेशन के इस दौर में अमेरिका की बरदाश्त से बाहर है, इसलिये पाकिस्तान ने प्लेट पर रख ओसामा को अमेरिका को दे दिया, आओ, मारो और साथ ले जाओ... अब ओसामा तो रहा नहीं, इसलिये जल्द ही अमेरिका भी अफगानिस्तान से बाहर निकलेगा !

३- भारत के विरूद्ध होती हर आतंकवादी हरकत के बाद पुख्ता सबूतों की मांग करने वाले पाकिस्तानियों व अमेरिकियों को पाकिस्तान के एक आतंकवादी देश होने के बारे में अब क्या सबूत चाहियें ?

४- बहुत जल्द ही अमेरिका अफगानिस्तान को उसके हाल पर छोड़ बाहर होगा, पर पूरी दुनिया पर अपनी हुकुमत करने का सपना देखते तालिबानी व अल-कायदा के दरिन्दे वहाँ फिर भी मौजूद रहेंगे, साथ ही उनके हथियार व उनको सैद्धान्तिक व आर्थिक मदद देने वाला सउदी अरब व अन्य पेट्रो देशों का तंत्र भी... गरीब मुल्कों में मजहबी शिक्षण संस्थाओं की बदौलत जन्नत जाने के नाम पर खुद को उड़ा देने वाले जेहादियों की भी कोई कमी नहीं होगी... साथ में पाकिस्तान जैसी आतंक की नर्सरी व अभयारण्य भी... कल्पना भयावह तो है पर है हकीकत के करीब... और वह यह कि आने वाले सालों में इस्लामी आतंक की सबसे ज्यादा मार भारत को झेलनी होगी क्योंकि हमीं इन जेहादियों के सबसे नजदीक व आसानी से वार करने योग्य टारगेट होंगे...
यह जो रायता फैला दिया गया है हमारे इर्दगिर्द, क्या हम इसका हिसाब मांगेंगे कभी ?

५-  अन्य सब बातों से जरूरी क्या यह नहीं कि भारत भी अपनी ' राष्ट्र रक्षा नीति '  शीघ्र बनाये और सिंगल माइंडेड फोकस के साथ उसको लागू करने की ओर बढ़े ?


सोचिये ?






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रविवार, 1 मई 2011

हा हा हा हा, हा हा हा हा, हा हा हा हा !!! यह तो होना ही था, कभी न कभी ...

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हम सभी के प्रिय व मेरे लिये अत्यन्त आदरणीय  खुशदीप सहगल अत्यन्त आहत हैं आज, खुद को ठगा हुआ छला हुआ महसूस कर रहे हैं... दर्द इतना है कि वह  ब्लॉगिंग को गुड बाई  तक करने की बात कह रहे हैं...

मामला समझने के लिये यह पोस्ट पढ़िये...

आदरणीय दिनेश राय द्विवेदी  जी ने लिखा है :-

" यह आयोजन उन मुद्रकों का था जो लेखक की पुस्तक उन के ही धन से मुद्रित करते हैं और उसे बेचने की जिम्मेदारी भी उन्हीं पर डाल देते हैं। ये लोग मुफ्त में अपना नाम प्रकाशक के रुप में उन पुस्तकों पर छाप कर प्रकाशक कहाते हैं। ये लोग मुख्यमंत्री टाइप के लोगों की किताबें प्रकाशित करते हैं तो इस लिए कि उन से टेबल के नीचे से कुछ न कुछ मिलता है। सरकार द्वारा अपने पुस्तकालयों में खरीदे जाने वाली पुस्तकों की सूची में इन की किताबों का नाम शामिल किया जाना भी पर्याप्त होता है। इन्हें प्रकाशक कहना भी प्रकाशक शब्द का अपमान है। ब्लागरों के सम्मान का झमेला न होता तो शायद पचास लोगों को इस आयोजन में जुटा पाना संभव नहीं हो पाता। ब्लागरों की उपस्थिति से ये मुद्रक और निशंक जैसे लोग धन्य ही हुए हैं। "

आप मेरी पोस्ट के शीर्षक पर मत जाइये, शुरू से ही मेरा मानना रहा है कि यह रोजमर्रा होते सम्मेलन व सम्मान समारोह वह भी ब्लॉगिंग जैसे इन्डिविजुअलिस्टिक माध्यम के लिये, एक मजाक से ज्यादा कुछ नहीं...

आज भी समय है कि हम सभी ब्लॉगर समझें कि हममें से न तो कोई यह हक रखता है और न ही कोई भी हिन्दी ब्लॉगिंग का स्वयंभू इतिहासकार बनना चाहिये और न ही हमें अपने आप को मुख्यालयों में बैठे व विभिन्न सत्ता शिखरों से हिन्दी ब्लॉगिंग को बढ़ावा देने के नाम पर अपने हितसाधन करने वाले प्रोफेशनल फिक्सरों को उनकी औकात से ज्यादा महत्व देना चाहिये...

यह ठहाके लगाते हुऐ मैं भीतर से बहुत दुखी हूँ हमारे वरिष्ठ व नामचीन ब्लॉगरों की नासमझी पर, जो बार बार झाँसे में फंस जाते है खुद को जबरिया प्रमोट करते गिरोहबाजों के...

किया क्या जा सकता है  सिवाय अपनी भूलों पर दिल  खोल ठहाके लगाने के... :)

आशा है कि भविष्य में मुझे कोई ऐसी पोस्ट नहीं लिखनी होगी...

और हाँ बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय डॉ० अनवर जमाल ,  आपने जो कुछ होना था या चल रहा था उसे पहले ही भाँप सचेत करने का प्रयास  किया था... इसका श्रेय आपको मिलना चाहिये... मुख्यधारा के बड़े ब्लॉगर आपकी सही बात पर भी साथ आने से कतराते हैं... पर मेरे जैसा अदना ब्लॉगर यह अपराध नहीं कर सकता... भले ही सुज्ञ जी मुझे कुछ भी कहें इस पर... :)






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मूड खराब हुआ हो यदि तो मुस्कुराईये  काजल कुमार जी के इस कार्टून  का आनंद लेकर ...


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