रविवार, 3 अप्रैल 2011

दे दिया घुमा के ! हुआ खेल खतम, और जीते हम !! बधाई ' टीम इन्डिया' और धन्यवाद भी !!!

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सच पूछिये तो मैं उन कुछेक खुशनसीबों में से हूँ जो अपनी उम्र सालों में नहीं गिनते...मैं अपनी उम्र बताता हूँ फुटबॉल व क्रिकेट के विश्वकपों की संख्या से जिनका मैंने आनंद लिया है अब तक...इस लिहाज से अब मैं आठ विश्वकप पुराना हो चुका हूँ... (याद रहे कि एशियाड १९८२ से हमारे देश में खेलों के सजीव प्रसारण की शुरूआत हुई थी)...

आस्ट्रेलिया के साथ मोटेरा, पाकिस्तान के साथ मोहाली व अब श्रीलंका के साथ वानखेड़े में हुऐ इन तीनों मैचों के बाद अगले दिन शेव करते हुऐ जब भी मैंने आईना देखा तो मुझे लगा कि कनपटी के बालों में एकाध सफेद बाल बढ़ गया है शायद...पर साथ ही साथ जब अपने दिल की थाह ली तो यह भी लगा कि यह कप मुझे कम से कम चार साल जवान कर गया... यकीन जानिये खेलों की यह ताकत व करिश्मा है ही ऐसा...

और आखिरकार वही हुआ जिसकी कामना कर रहा था हर भारतीय...चैंपियन बन गई अपनी 'टीम इन्डिया'...१९८३ में एक टीम थी कपिल देव की...विश्वकप शुरू होते समय कोई उसे दावेदार तक मानने को तैयार नहीं था...परंतु सभी अनुमानों को झुठलाते हुऐ कपिल के रणबांकुरों ने वह विश्वकप जीत दिखाया... और उस दिन के बाद विश्वक्रिकेट की सूरत भी बदल गई और हमारे देश भारत की भी...अचानक से एक पीढ़ी तहे-दिल से यह मानने लगी कि ' WE CAN ALSO DO IT !'... इस विश्वकप के पहले दिन से ही जानकार भी और आम आदमी भी ' टीम इंडिया ' को जीत का प्रबल दावेदार मान रहा था...१२१ करोड़ उम्मीदों का भारी भरकम बोझ काँधे पर उठाये हमारी टीम ने यह कर भी दिखाया... १९८३ की तरह ही २८ बरस बाद मिली यह जीत भी एक नये दौर का उद्घोष होगी... और वह उद्घोष होगा ' WE HAVE ARRIVED ON THE BIG STAGE & WE CAN DELIVER TOO ! '... यह हमारी वह पीढ़ी है जो खुद को किसी से भी कमतर नहीं आंकती... जो चीजों को जैसा देखती है वैसा ही आंकती है... यह वह पीढ़ी है जो बहुत जल्द ही मेरी पीढ़ी की आंखों में आंखें डाल यह सवाल पूछना शुरू कर देगी कि ईमानदारी-नैतिकता के नाम पर जुबानी जमा-खर्च तो बहुत किया आपने ' BUT WHY DIDN'T YOUR GENERATION WALK THE TALK ? '


अब बात करते हैं कल के मैच की... यह रहा मैच का स्कोरकार्ड ... २००३ के विश्वकप फाइनल में अतिउत्साही जहीर खान ने पहले ही ओवर में जोश में आकर हेडन को कुछ बोला और नतीजा यह हुआ कि हेडन व गिलक्रिस्ट ने जहीर के तीन शुरूआती ओवरों में ही २९ रन पीट डाले... इस मैच में शुरूआती तीन ओवर मेडन डाल जहीर ने माने २००३ की कड़वी यादों का सुखद अंत कर दिया... श्रीलंका टीम बहुत अच्छा खेली पर यह लगा कि वह यह मान कर चल रहे थे कि भारतीय बल्लेबाजी दबाव के चलते २५५-२६० के स्कोर का पीछा नहीं कर पायेगी... इसीलिये श्रीलंका का पूरा जोर २६० के मैजिक फिगर तक ही पहुंचने का रहा... महेला जयवर्धने, जिनको मैं दुनिया का सबसे अंडर-रेटेड बल्लेबाज मानता हूँ ने एक महान पारी खेली...

जयवर्धने ने दिखाया कि किस तरह बिना कोई खतरा लिये, बिना ज्यादा ताकत लगाये, गेंद को फील्डरों के बीच गैप्स में प्लेस कर के व गेंदबाज की ही ताकत को उसके विरूद्ध प्रयोग कर के तेजी से रन बनाये जा सकते हैं... ८८ गेंदों में बनाये १०३ रनों की उनकी यह पारी क्रिकेट विश्व कप इतिहास की महानतम पारियों के समकक्ष है... ४५ वें ओवर के अंत में स्कोर था २११ रन व सभी का अनुमान था कि लंका २४०-२४५ रन करेगी... तभी लंका ने बैटिंग पावर प्ले लिया व अंतिम पाँच ओवर में एक विकेट मात्र गंवाकर ६३ रन टांग दिये... अधिकाँश को टीम इन्डिया का सितारा तब डूबता सा नजर आने लगा...

फाइनल विश्वकप का और पीछा करना २७५ रन का... दबाव के चलते बहुत मुश्किल लग रहा था यह... पर अंतिम लीग मैच के दौरान टीम के खुद पर भरोसे, उनकी बॉडी लेन्ग्वेज व केयर फ्री एटीट्यूड को देख मैं यह लिख चुका था कि कप अब हमारा है !!!... उसके बाद के अपने आलेखों व विभिन्न जगहों पर की गई अपनी टिप्पणियों में मैंने अपनी इस मान्यता को बस दोहराया ही...

३१ रन पर सचिन का विकेट गिरते ही वानखेड़े में सन्नाटा सा छा गया... साढ़े पाँच साल की मेरी बिटिया ने तभी मुझसे पूछा " पापा, बताओ कौन जीतेगा ?"... मैं बोला " तुम बताओ "... वह बचपन से ही बहुत धार्मिक है... ननिहाल में कॉलोनी के मंदिर में जब भी कुछ आयोजन हो रहा होता है वह पूरी तन्मयता से वहाँ बैठी मिलती है... बिटिया बोली " मैं गॉड से पूछ कर बताती हूँ "... आंखें बंद कर वह मानो ध्यानस्थ हो गयी... तकरीबन पाँच मिनट बाद आँखें खोल बोली " इंडिया जीतेगा "... " क्या गॉड ने बताया ?" पूछा मैंने... " नहीं, मेरे दिमाग में आया अपने आप कि धोनी को कप मिल रहा है " बोली वह... आश्वस्त सा हुआ मैं क्योंकि २२ मार्च के बाद से जब भी मैं आँखें बन्द कर विश्वकप के बारे में सोचता था, मुझे शान से कप उठाये भारतीय कप्तान ही दिखते थे...

बहरहाल ३१ के स्कोर पर सचिन को खोने के बाद गंभीर व विराट ने संभल कर खेलते हुऐ व पाँच के आसपास का रन रेट बनाये रखते हुऐ स्कोर को ११४ तक पहुँचाया... भारतीय क्रिकेट की यह नई पौध एकदम तनावरहित व आश्वस्तिपूर्वक खेली... अपनी ही गेंद पर एक शानदार कैच ले दिलशान ने विराट को विदा किया... १६१ रन और चाहिये थे...
कैप्टन कूल माही ने बैटिंग क्रम में खुद को प्रमोट किया... इस पूरे विश्वकप में माही कभी भी किसी भी गेंदबाजी आक्रमण के विरूद्ध यद्मपि असहज नहीं दिखे परंतु वे कोई बड़ा स्कोर नहीं कर पाये थे... लगता है कि अपनी परफार्मेंस उन्होंने बड़े स्टेज व टूर्नामेंट के सबसे अहम मैच के लिये रख छोड़ी थी... और क्या खेले वह !... गंभीर के साथ भाग-भाग कर तेजी से एक-दो रन चुराते धोनी पूरी तरह से शांत, आश्वस्त व स्थिति को नियंत्रण में रखे खेले...

ऐसा कहीं लग ही नहीं रहा था कि आप विश्वकप के फाइनल में एक खतरनाक गेंदबाजी आक्रमण के विरूद्ध एक मुश्किल लक्ष्य का पीछा करते भारतीय कप्तान को देख रहे हैं... लग रहा था कि शांत रमणीक वन में मानो कोई साधक तपस्या सी कर रहा हो... खेल की भाषा में यदि कहें तो He was playing in The zone or Flow ( A mental state attained by a person fully immersed in some activity )... ऐसी स्थिति में जब खिलाड़ी आ जाता है तो नतीजे के बारे में ज्यादा संशय नहीं रह जाता...

बेहतरीन खेल रहे गंभीर जोश में आ अचानक एक खराब शॉट खेल शतक बनाने का मौका गंवा जब पैवेलियन की ओर लौटे तब भी ५२ रन और चाहिये थे और ५२ ही गेंदें बचीं थीं...

ऐसे में आगमन हुआ युव्वी का... वह पहली ही गेद से आश्वस्त दिखे... धीरे-धीरे दोनों रन बनाते रहे व जैसे ही दोनों ने तय किया कि अब मामला ज्यादा नजदीकी नहीं छोड़ना चाहिये, दोनों के बल्ले का मुंह खुला व पावर प्ले की बीस गेंदों में बत्तीस रन ठोंक दिये गये... कुलशेखरा द्वारा डाले ४८ वें ओवर की दूसरी गेंद पर मिड आफ के ऊपर धोनी ने छक्का मार कप भारत के नाम कर दिया... २०-२० में विश्व विजेता, टेस्ट में नंबर एक रैंकिंग, वन डे में नंबर एक रैंकिंग, आईपीएल में चेन्नई सुपर किंग्स को कप व अब विश्वकप जीत धोनी ने अपने आपको सर्वकालिक महान कप्तान साबित कर दिया है...

जीत के बाद खुशी व गर्व से फूट-फूट रोये हरभजन, कोहनी से मुंह छिपाते व साथियों की जर्सी पर आंखें पोंछते युव्वी, खुशी के आंसूं बहाते सचिन, आंसू रोकने की असफल कोशिश करते माही, सुबकते श्रीसंथ व अन्य को देख न जाने क्या हुआ मुझे भी... बगल में बैठी बिटिया ने पकड़ ही लिया... " क्या हुआ पापा ? आप रो क्यों रहे हो ? "... " नहीं बेटा, मैं रो नहीं रहा, यह तो खुशी व गर्व के आंसू हैं ! "... 'खुशी' का अर्थ तो बिटिया जानती है और 'गर्व' क्या होता है यह भी जल्दी ही सिखा देगी जिंदगी उसे...



गुरू गैरी कर्सटन का यह आखिरी मैच था बतौर टीम इन्डिया के कोच के...

बहुत बहुत धन्यवाद व भविष्य के लिये शुभकामनायें गैरी...

बहुत-बहुत बधाई टीम इन्डिया तुमको भी...
और धन्यवाद भी मेरा व मेरे जैसे करोड़ों का...
हमें खुशी व गर्व के इन आंसुओं को बहाने का यह मौका देने के लिये...
इसी तरह हमारी आंखें भिगोते रहना भविष्य में भी...





एक जुनुन खत्म हुआ, जीत की खुमारी भी उतर ही जायेगी जल्दी ही...

चलिये कल से फिर जिंदगी की वही भागमभाग शुरू करते हैं...



आप साथ रहेंगे न ?






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क्रिकेट मसाला :-


आइये जीत के उन अविस्मरणीय खुशगवार पलों को एक बार फिर अनुभव करते हैं... साथ-साथ...

यह क्या देखते देखते आप की आंखें भी नम हो आयीं...







आभार !




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12 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बहुत बधाइयाँ... ख्वाब पूरा हो गया!

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  2. बहुत बहुत बधाई मेरे ब्लॉग- क्रिकेट सरताज!
    इस जीत ने भारत को बहुत कुछ दिया है -समीक्षायें होती रहेगीं !

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  3. सभी को बधाइयां। एक बात बताएं, कि कप लेने के बाद जहाँ सारे खिलाड़ी मैदान पर थे लेकिन धोनी कहीं नजर नहीं आए। उन ऐतिहासिक क्षणों के फोटोज में भी वे कहीं नहीं है। बस उन्‍हें कप लेते हुए और शैम्‍पेन से भीगकर परेशान होते देखा गया और फिर गायब। आप बता सकेंगे कि धोनी कहाँ थे?

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  4. बहुत बहुत बधाइयाँ आपको विश्वकप विजेता बनने की भी और नव संवत्सर की भी

    @ अजीतजी धोनी की बॉडी लैंग्वेज से मुझे हमेशा ऐसा आभास होता है की वह सचिन को पचा नहीं पाता है, और जिस समय सचिन का जुलूस निकल रहा था तब वह क्यों ना गायब होता :)
    बाकी तो प्रवीणजी ही ज्यादा अच्छे समझा पायेंगे हमें

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  5. आपके विश्‍लेषण से सहमत हूं।
    सचमुच धोनी मैच में अपने धमाल के बाद मैदान में धमाल मचाते खिलाडि़यों के बीच नहीं दिखाई दिए।
    क्‍यों। जवाब यह है कि खेल के दौरान उनकी पसलियों में खिचांव आ गया था। बाद की कुछ तस्‍वीरों में आप मैदान में पेट के बल लेटे उन्‍हें देख सकते हैं। और उनके डाक्‍टर उन्‍हें चिकित्‍सा दे रहे हैं। मैन आफ द मैच पुरस्‍कार लेते समय और रविशास्‍त्री से बात करते समय भी वे बार बार अपनी पसली को हाथ लगा रहे थे।
    इसलिए यह आसानी से समझा जा सकता है जब उनके साथी धमाल मचा रहे थे वे डे्‍रंसिग रूम में शायद अपने दर्द से जूझ रहे थे। और यह कहना तो उचित नहीं है कि धोनी सचिन को पचा नहीं पाते हैं। दोनों ही खिलाड़ी अपनी काबलियत के दम पर टीम में हैं।

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  6. विश्वकप जीतने की बहुत बहुत बहुत बधाई ! पहले तो विश्वास करने में ही कुछ समय लग गया था |

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  7. जीत गए जी जीत गए....:)
    वैसे मेरी उम्र ५ वर्ल्ड कप की है... मैंने भी उस दिन खूब बहाए आंसू....२००७ की दुर्गति के बाद वर्ल्ड कप की उम्मीदों को गहरा झटका लगा था था... कर्स्टन ने भी ग्रेग चैपल को सिखाया कि परदे के पीछे रह कर शांत तरीकों से अपना काम कैसे किये जाता है.... न कि भीड़ को अपनी लम्बी ऊँगली दिखाकर....
    अब शायद उनकी आखें खुल गयी होंगी....
    खैर अब सीना चौड़ा करके चलने की बारी है... हम विश्वा विजेता जो हैं....

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