बुधवार, 27 अप्रैल 2011

द साईं फिनोमिना : चमत्कार को नमस्कार... अलविदा सत्य साईं, अब आयेंगे प्रेमा साईं...


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बताया जाता है कि २३ नवंबर १९२६ को आंध्रप्रदेश के एक गुमनाम से गाँव पुट्टापर्थी में जन्मे एक बालक ने बिच्छू द्वारा काटे जाने के बाद अचानक ही अपना व्यवहार बदल सा दिया, कभी वह बालक हंसते -हंसते अचानक रोता तो कभी संस्कृत का ज्ञान न होने के बावजूद भी संस्कृत के श्लोक बोलने लगता... २३ मई १९४० को उन्होंने अपने को शिरडी के साईं बाबा का अवतार घोषित कर दिया... शिरडी के साईं बाबा जीवन भर एक आम आदमी की तरह रहे व भिक्षायापन कर जीवन निर्वाह करते रहे, उनका देहावसान १५ अक्टूबर १९१८ को हुआ था... उन्होंने कभी किसी चमत्कार का दावा नहीं किया व न ही वे संस्कृत में बोलते थे...

बहरहाल पुट्टापर्थी का वह बालक ' सत्य साईं बाबा ' के रूप में जाना जाने लगा... उन्होंने हवा में हाथ घुमाकर भभूत, स्विस घड़ियाँ, रत्न जड़ित सोने की अंगूठियाँ, सोने की चेन, देव मूर्तियाँ आदि आदि चीजें उत्पन्न कर भक्तों को देना शुरू कर दिया... भक्त की आर्थिक-सामाजिक हैसियत से यह निर्धारित सा होता था कि बाबा उसके लिये क्या चीज निकालेंगे... साधारण-सामान्य-दीन-हीन भक्त के लिये भभूत निकलती थी तो वीवीआईपी भक्तों के लिये बेशकीमती व उन द्वारा शरीर पर धारित किये जाने योग्य चीजें...

अब्राहम टी कोवूर जैसे रैशनलिस्टों, जादूगर पी सी सरकार, बासव प्रेमानन्द आदि ने इसे हाथ की सफाई बताया, जो कि वह है भी... बंगलौर विश्वविद्मालय के तत्कालीन कुलपति एच नरसिम्हैया ने बाबा को अपने चमत्कार नियंत्रित परिस्थितियों में सबके सामने करने की चुनौती दी... बाबा का जवाब था कि "    शून्य से कुछ भी नहीं पैदा किया जा सकता, यह सीमित सोच विज्ञान के लिये तो सही हो सकती है, परंतु आध्यात्म व पराविज्ञान के लिये यह नियम नहीं लागू होता "   ... बाबा ने चुनौती स्वीकार नहीं की...

नेट पर उपलब्ध तमाम वीडियो यदि आप देखेंगे तो पायेंगे कि साईं मूर्ति पर भभूत वर्षा के दौरान बाबा बार बार हाथ हिला कलश से भभूत निकाल गिरा रहे हैं... सीधा सवाल होता है कि यदि भभूत स्वयं हाथ से ही प्रकट हो रही है तो कलश की आवश्यकता ही क्या है... शिवरात्रि के दिन मुँह से स्वर्ण का अंडाकार शिवलिंग उगलने के दौरान एक मोटा सफेद तौलिया बाबा के हाथ में मौजूद है... कई कोणों से खींचा वह वीडियो भी मौजूद है जो साफ दिखा रहा है कि मुँह से थोड़ी सी लार मात्र निकली परंतु तौलिये की तहों से बाबा नें अंडाकार शिवलिंग निकाल दिखा दिया...

बाबा ने अपने इन तथाकथित चमत्कारों की आलोचना का कोई उत्तर नहीं दिया, उनका कहना था कि वे यह सब लोगों को ईश्वर की शक्ति के प्रति आकर्षित करने के लिये करते हैं... भक्तों के लिये तो वे साक्षात ईश्वर यानि किसी भी तरह के संदेह से परे व किसी भी कार्य को करने में सक्षम भी... यदि इस तरह के सवाल किसी भक्त के मन में भी आते तो शायद स्विस घड़ी की स्विटजरलैंड स्थित फैक्टरी से भक्त की कलाई तक पहुंचने की चमत्कारिक यात्रा के पड़ावों व सहयोगियों का भी खुलासा हो जाता...

भक्तों के दिमाग में यह सवाल भी शायद ही कभी आता था कि किसी भक्त की अवरूद्ध कॉरोनरी धमनियाँ तो बाबा सपने में जाकर दिल की तस्वीर पर एक क्रॉस लगाकर खोल देते हैं और किसी बेचारे को बाबा के बनाये अस्पताल में जा कॉरोनरी बाईपास ग्राफ्टिंग करवानी पड़ती है, ऐसा क्यों...

अस्सी के दशक में फिल्म आई 'अमर-अकबर-एन्थोनी ', उसमें गाया रफी का गाना था " जमाने ने कहा टूटी हुई तस्वीर बनती है, तेरे दरबार में बिगड़ी हुई तकदीर बनती है "... इस गाने ने शिरडी साईं के प्रति उत्सुकता बढ़ा दी और लाभ उनके स्वघोषित अवतार को भी मिला... नब्बे के दशक में बाबा के भक्त नरसिंहराव प्रधानमंत्री, चव्हाण ग्रह मंत्री व शिवराज पाटिल लोकसभाध्यक्ष रहे, इस दौरान बाबा की प्रसिद्धि में भी काफी इजाफा हुआ... बाबा साक्षात भगवान माने जाने लगे... और उसी तरह दर्शन सत्र भी आयोजित होने लगे...

बाबा के भक्तों में खाये-पीये-अघाये शहरी उच्च वर्ग व शहरी उच्च मध्य वर्ग की बहुत बड़ी संख्या है... न्यायाधीश, राजनेता, नौकरशाह, उद्मोगपति, खिलाड़ी, फैशन-फिल्म-टीवी-मीडिया जगत की हस्तियाँ, वैज्ञानिक, शिक्षाविद आदि आदि उनके भक्त थे... यह लोग सत्य साईं ट्रस्ट द्वारा शिक्षा, चिकित्सा व पेयजल उपलब्धता के कार्यों से प्रभावित थे... उनके राजनीतिक व नौकरशाह भक्त बड़ी ही सहजता व से यह तथ्य भूल जाते थे कि यह सब चीजे आम आदमी तक उपलब्ध करवाने का प्राथमिक दायित्व स्वयं उन्हीं का था, इसे भूल वह ट्रस्ट का गुणगान करते थे...

कथित रूप से ४५००० करोड़ से लेकर डेढ़ लाख करोड़ रू० की चल व अचल संपत्ति वाले इस ट्रस्ट ने पिछले कई सालों से अपनी आय-व्यय का ब्यौरा सार्वजनिक नहीं किया... सही भी है भगवान से हिसाब कैसा ?... वैसे भी दान, सेवा, खैरात आदि देकर पुण्य कमाने के लिये सबसे बड़ी व जरूरी चीज है दीन-हीन, दुखियारे, असहाय व मदद को हाथ फैलाते इंसान का वजूद... धर्म को यथास्थितिवाद की सबसे बड़ी ताकत इसीलिये कहा जाता है क्योंकि वह इस दीन-हीन, दुखियारे, लाचार व हाथ फैलाये इंसान के वजूद को बचाये रखता है व उसे यह भी कहता है कि इसी में उसका कल्याण है... ताकि प्रभुवर्ग पुण्य अर्जन कर सके...

दया/भीख/खैरात नहीं काम दो
किये काम का वाजिब दाम दो

है ऐसा कोई धर्म, धर्मगुरू, आध्यात्मिक गुरू, बाबा, योग गुरू ? जो यह कहता हो और ऐसा न करने वाले को अपना भक्त न मानते हुऐ धर्मस्थल व पंडाल से बाहर निकलने को कहता हो...

२००६ से सत्य साईं बाबा शरीर के एक हिस्से के काम न करने के कारण व्हील चेयर पर ही सीमित थे... भगवान के अवतार की यह दशा सभी को बहुत दुखी करती थी पर सत्य साईं भक्तों के अनुसार बाबा यह सब दुख भक्तों के कल्याण के लिये उठा रहे थे... बाबा ने भविष्यवाणी की थी कि वह ९६ वर्ष की आयु अर्थात २०२२ तक जीयेंगे व उनके देहावसान के आठ वर्ष बाद अगले साँई अवतार 'प्रेमा साईं बाबा' अवतरित होंगे कर्नाटक के माँड्या जिले में जो १४ वर्ष की आयु में २०४४ में अपने को अवतार घोषित करेंगे...

परंतु अवतारों की यह लीला अवतार ही जानें... सत्य साईं ११ वर्ष पहले ही सबको छोड़ गये... हो सकता है कि प्रेमा साईं भी जल्दी ही प्रकट हो जायें भक्तो के सम्मुख...

सत्य साईं बाबा की लोकप्रियता के साथ साथ पिछले दशक में शिरडी के साईं बाबा की भी अवतारी पुरूष से ऊपर उठ साक्षात भगवान के रूप में स्थापना हुई है समाज में... बड़े शहर ही नहीं छोटे कस्बों यहाँ तक कि गाँवों में भी साईं मंदिर, साईं धाम, साईं संकीर्तन मंडल खुल चुके हैं... नियमित साईं भजन संध्या आयोजित होती हैं... शिरडी साईं मंदिर का एकमात्र असली फ्रेंचाइजी होने का दावा करते 'साईं सेवक' अक्सर 'साईं दरबार' लगाते हैं...

अगला दौर सत्य साईं मंदिरो का अब आने ही वाला है...

विश्व का प्राचीनतम सनातन धर्म जिसे आज हिन्दू धर्म भी कहा जाता है, ने कई दौर देखे हैं... और इन्हीं अनुभवों से विकसित की है बृह्मा-विष्णु-महेश की त्रिमूर्ति... अर्थात उत्पत्ति-विस्तार-अंत अथवा सृजन-विकास-विनाश का कभी न रूकने वाला सिलसिला... वास्तव में यही सृष्टि का एकमात्र उद्देश्य  है और यही है जीवन सत्य भी... व्यक्तित्वों, राज्य व्यवस्थाओं, मजहबों, पंथों, सभ्यताओं, संस्थाओं और यहाँ तक कि  ' फिनोमिनाओं ' को भी इसी सिलसिले से गुजरना होता है... कोई इस चक्र से पार नहीं पा सकता...

साईं फिनोमिना भी अपने पूरे उठान पर है आज ,और आगे और भी बढ़ सकता है... इस चमत्कार को मेरे साथ-साथ आप भी नमस्कार करिये !

सत्य साईं बाबा ने एक बार यह कहा था :-

"  मैं भगवान हूँ, आप भी भगवान हैं, मुझमें और आपमें अंतर सिर्फ इतना है कि मैं इस बात को जानता हूँ और आप इससे पूर्णतया अनजान हैं। "

निश्चित तौर पर मेरे कुछ स्नेही पाठक मेरे इस आलेख के उद्देश्य पर सवाल उठायेंगे... उनके लिये यह मैं भी कहना चाहूँगा :-

"  आप भगवान नहीं हैं, मैं भी भगवान नहीं हूँ, कोई भी भगवान नहीं हो सकता, शायद कहीं कोई भगवान है ही नहीं... मुझमें और आपमें फर्क सिर्फ इतना है कि मैं अपने इस संशय को जगजाहिर कर देता हूँ और आप सब कुछ देखते-जानते-समझते हुऐ भी अपने मस्तिष्क में उठते इन संशयों को भगवान के ही भय से दबा देते हो और ऊपरी तौर पर अपने मन में ऐसे संशयों का वजूद ही न होने का दिखावा करते हो "

आभार!





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सोमवार, 11 अप्रैल 2011

भारतीय प्रबंधन संस्थानों ( IIM's ) को धन-झोलाओं ( Money Bags ) के कब्जे में डालने की तैयारी... वह भी स्वायत्तता, सशक्तीकरण व उदारीकरण के नाम पर...

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मेरे अशक्त मित्रों,


अभी-अभी अंग्रेजी साप्ताहिक 'आउटलुक' की यह खबर पढ़ी... आप भी पढ़िये...


आज भारत यदि वैश्विक परिदॄश्य में एक उभरती ताकत के तौर पर जाना-माना जाता है तो इसके पीछे हमारे IIT's व IIM's का एक अहम योगदान है... परंतु हमारी सरकारें स्वायत्तता की दुहाई देकर पिछले दरवाजे से IIM's के निजीकरण की तैयारी कर रही हैं... 


Key structural changes proposed by the R.C. Bhargava and Ajit
Balakrishnan committees set up by the HRD ministry

IIM Societies
  • A substantial donation should be made to become a member. 
  • Society to be trimmed to 20 members.
  • Investment to be treated as equivalent to having an equity.
  • Society will ratify appointment of board members and directors


सीधा साफ है कि सौ-पचास करोड़ दान में देकर कोई भी धन्ना सेठ सोसायटी का
सदस्य बन जायेगा... 

धीरे-धीरे यही लोग सोसायटी पर कब्जा कर लेंगे...


और हिन्दुस्तान के काबिल (पर गरीब) बच्चे का IIM में पढ़ने का सपना गया
पानी में...


मुझे यह अचानक 2G की क्यों याद आ रही है ???...




अन्ना को भी यह बता देना कोई...










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गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

पुरूष, पुरूषार्थ, नारियाँ भी... और IF ( यदि/अगर )...



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मित्र गौरव की इस पोस्ट पर प्रस्तुत इस आलेख को पढ़ा... एक वाक्य पर नजर अटक सी गई... " व्यक्ति को किसी भी विषय पर सिर्फ सांसारिक लोकाचार (जो असल में मायाजाल है) के अनुसार नहीं सोचना चाहिए। बल्कि वेदों में वर्णित पुरुषार्थ की व्याख्या के आधार पर अपने कर्मों को सुधारना चाहिए।"  



सोच में पढ़ गया मैं... क्या होता है पुरूषार्थ ?... अंग्रेजी में इसका समानार्थी शब्द ढूँढने में नाकामयाब रहा मैं... आप को ज्ञात हो तो बताईयेगा...

तभी याद आया बचपन में खरीदा वह अंग्रेजी कविता पोस्टर जो जीवन भर साथ रहा है मेरे... जो बतलाता है कि कौन कहलायेगा संपूर्ण या आदर्श पुरूष... यहाँ पुरूष शब्द का लैंगिक प्रयोग नहीं है... नारियों पर भी यह लागू होता है... संपूर्ण या आदर्श नारी भी ऐसी ही होगी, यह मेरा मानना है... सोचता था कभी हिन्दी में अपने तरीके से अपने शब्दों में अनुवाद करूँगा इसका...  ब्लॉगर ने मौका व प्लेटफार्म दोनों उपलब्ध कराये हैं... अत: आपके सामने पेश है यह...





अगर


अगर तुम रख सकते हो अपने होशोहवास व क्रोध  को नियंत्रण में

जब गुस्से से पागल हों  सारे और ठहराते हों तुम ही को इसका कसूरवार

भरोसा रख सकते हो खुद पर जब सभी तुम पर कर रहे हों शक

लेकिन उनके इस अविश्वास को भी तुम जायज ही कहते हो

अगर कर सकते हो तुम इंतजार, बिना इंतजार से थके
 
 शिकार बन जाने के बावजूद गर तुम दूर रहते हो झूठ से

न तुम देवता से दिखते हो न ही बहुत बुद्धिमान नजर आते हो



देखते हो सपने जरूर पर नहीं बनते उनके गुलाम कभी

सोच सकते हो पर  विचार मात्र करना नहीं रहता मकसद कभी

अगर तुम गले लग कर मिल सकते हो जीत और हार से

और इन दोनों से ही बिल्कुल एक सा बर्ताव रहता है तुम्हारा

अगर तुममें हिम्मत है अपने ही कहे उस सत्य को सुनने की

जिसे मूर्खों को फंसाने के लिये दिया गया हो तोड़-मरोड़

अगर तुम देख सकते हो खुद की बनाई चीजों को टूटते

और एक बार फिर बना लेते हो उनको उन्हीं पुराने औजारों से



अगर अपनी सारी जीतों का लगा सकते हो एक बड़ा सा ढेर

और दाँव पर लगा सकते हो इसको सिक्के की एक उछाल पर

और हारने पर फिर से कर सकते हो शुरूआत प्रारम्भ से

बिना अपने इस नुकसान के बारे में एक लफ्ज भी किसीको कहे

अगर तुम अपने दिल, दिमाग और जज्बे को कर सकते हो मजबूर

अपनी बारी निकल जाने के बाद भी दौड़ में बने रहने को

अगर खड़े रह सकते हो जिंदगी की जंग में बिना कुछ साथ लिये

सिवाय अपनी इच्छा शक्ति के जो न मानती हो कभी हार



गर तुम संवाद कर सकते हो भीड़ से, बिना सिद्धांतों पर समझौता किये

या साथ चल सकते हो राजाओं के, अपना देहातीपन रखे बरकरार 

अगर न तो दुश्मन तुम्हें आहत कर सकें न दोस्त ही

वैसे सब हैं तुम्हारे पर नहीं है कोई भी एकदम अहम-अनिवार्य


अगर तुम भर सकते हो प्रत्येक मिनट रूपी क्रूर काल को

साठ सेकेंड की लंबी अनवरत व फलदाई दौड़ से



तुम्हारी ही यह दुनिया है और इसकी सब चीजें भी तुम्हारी हैं

और सबसे बड़ी बात यह कि तुम एक पुरूष कहलाने के लायक हो, मेरे पुत्र !

तभी तुम पुरूषार्थी कहलाओगे, हे मानव !
साभार  ' सुज्ञ  ' जी ...



यह कालजयी कविता है Rudyard Kipling ... रूडयार्ड किपलिंग की ... IF...








मूल रूप में भी इसका आनंद लीजिये...


IF you can keep your head when all about you
Are losing theirs and blaming it on you,
If you can trust yourself when all men doubt you,
But make allowance for their doubting too;
If you can wait and not be tired by waiting,
Or being lied about, don't deal in lies,
Or being hated, don't give way to hating,
And yet don't look too good, nor talk too wise:

If you can dream - and not make dreams your master;
If you can think - and not make thoughts your aim;
If you can meet with Triumph and Disaster
And treat those two impostors just the same;
If you can bear to hear the truth you've spoken
Twisted by knaves to make a trap for fools,
Or watch the things you gave your life to, broken,
And stoop and build 'em up with worn-out tools:

If you can make one heap of all your winnings
And risk it on one turn of pitch-and-toss,
And lose, and start again at your beginnings
And never breathe a word about your loss;
If you can force your heart and nerve and sinew
To serve your turn long after they are gone,
And so hold on when there is nothing in you
Except the Will which says to them: 'Hold on!'

If you can talk with crowds and keep your virtue,
' Or walk with Kings - nor lose the common touch,
if neither foes nor loving friends can hurt you,
If all men count with you, but none too much;
If you can fill the unforgiving minute
With sixty seconds' worth of distance run,
 
Yours is the Earth and everything that's in it,
And - which is more - you'll be a Man, my son!
आभार !
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मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

सलीम खान से डरते हो आप, आपके दिल में भी कोई जगह तक नहीं उसके लिये... इतने छोटे दिल के साथ कैसे ' हमारी वाणी ' कहला सकते हो आप ?

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सच कहूँ तो मेरे लिये यह पोस्ट लिखना बहुत ही दुखदायी है... परंतु जब ब्लॉगवुड के अपने वरिष्ठजनों को इस मुद्दे पर धृतराष्ट्र की तरह आँखें बंद किये... भीष्म की तरह निगाहें फेरते... या विदुर की तरह गोलमोल बातें करते देखता हूँ तो यह पोस्ट लिखना मेरे लिये बहुत जरूरी, लगभग अनिवार्य सा हो जाता है ताकि मैं बिना किसी शर्म के आईने में कल अपना चेहरा देख सकूँ...


संकलक का सौंदर्य बिगड़ने को आधार बना कर कुछ ब्लॉग हमारी वाणी से हटा दिये गये हैं या ब्लॉग मालिक को उनको हटा लेने को बाध्य कर दिया गया है... आज तक वैसे ब्लॉगवुड को यह नहीं बताया गया है कि हमारी वाणी का असली मालिक कौन है ? ...


व्यथित हो सलीम खान ने पोस्ट डाली है कैसे और क्यों बिगड़ता है संकलक का सौन्दर्य , सलीम लिखते हैं कि ऐसा केवल और केवल पूर्वाग्रहों से ग्रसित   होकर किया गया है। एक अन्य ब्लॉग ने भी अपनी आपत्ति कुछ ऐसे जताई है...  


खुशदीप जी लिखते हैं कि "हमारी वाणी सभी ब्लॉगरों को लेवल प्लेइंग फील्ड देने में विश्वास रखता है...इसलिए सभी ब्लॉगरों को भी इसकी शुचिता और गुणवत्ता बनाए रखने के लिए सहयोग देना चाहिए...आशा है जो ब्लॉगर एक ही पोस्ट को अलग-अलग ब्लॉग पर लगाते हैं, वो दूसरे ब्लॉगरों को समान मौका देने के सिद्धांत को चोट पहुंचाते हैं...हमारी वाणी का बिना किसी भेदभाव तत्काल कार्रवाई करना सराहनीय है"... 

मैं सलीम खान की तरह घुमा फिरा कर यह नहीं कहूँगा कि "क्रिकेट के इस मौसम में ब्लॉग एग्रीगेटर पर स्लॉग ओवर इतनी बार खेलें कि कैप्टन (एग्रीगेटर मालिक) का नाम ओ निशान तक नज़र न आये" ...  


मैं तो सीधा सवाल करता हूँ  कि चुटकुले तो गजेन्द्र सिंह और अमित जैन (जोक्पीडिया) भी बेहतरीन लिखते हैं तो संकलक के मुखपृष्ठ पर स्लॉग ओवर शीर्षक के नीचे एक ही ब्लॉगर के नाम से लगाये २५ लिंक क्या संकलक के सभी को लेवल प्लेयिंग फील्ड देने के दावे का मजाक नहीं उड़ा रहे ???


कोई पोस्ट एक बार लगाई जाये या पचास बार... सामूहिक ब्लॉग में ब्लॉग प्रवर्तक का चित्र दिखते रहे या ब्लॉग का लोगो ही... यह मान कर चलना कि हमारा पाठक इतना भी दिमाग नहीं रखता कि वह उस चीज को भी पढ़ने पहुंच जाता है जिसे शुचितावादियों के अनुसार नहीं पढ़ना चाहिये... या यह मानना कि इससे संकलक का सौंदर्य घट रहा है... तंगदिली की पराकाष्ठा है यह... 


अपना दिल बड़ा रखिये हमारीवाणी... निश्चित रूप से इसमें सलीम खान व अन्य मुस्लिम ब्लॉगर्स के लिये जगह होनी ही चाहिये... अतिवाद यदि कहीं नजर आता हो तो संवाद करें, नजर अंदाज करें... परंतु किसी की मौजूदगी मात्र से डरना या उसे उलजलूल तर्कों के बहाने बाहर कर देना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिये सही नहीं...


मेरा विरोध दर्ज किया जाये !






आभार !








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लाल रंग से जो कुछ आपको लिखा दिख रहा है वह लिंक हैं... आप उन्हें खोल-पढ़ ही इस आलेख का मूल्याँकन करें, यह प्रार्थना व अपेक्षा रहेगी ।




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रविवार, 3 अप्रैल 2011

दे दिया घुमा के ! हुआ खेल खतम, और जीते हम !! बधाई ' टीम इन्डिया' और धन्यवाद भी !!!

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सच पूछिये तो मैं उन कुछेक खुशनसीबों में से हूँ जो अपनी उम्र सालों में नहीं गिनते...मैं अपनी उम्र बताता हूँ फुटबॉल व क्रिकेट के विश्वकपों की संख्या से जिनका मैंने आनंद लिया है अब तक...इस लिहाज से अब मैं आठ विश्वकप पुराना हो चुका हूँ... (याद रहे कि एशियाड १९८२ से हमारे देश में खेलों के सजीव प्रसारण की शुरूआत हुई थी)...

आस्ट्रेलिया के साथ मोटेरा, पाकिस्तान के साथ मोहाली व अब श्रीलंका के साथ वानखेड़े में हुऐ इन तीनों मैचों के बाद अगले दिन शेव करते हुऐ जब भी मैंने आईना देखा तो मुझे लगा कि कनपटी के बालों में एकाध सफेद बाल बढ़ गया है शायद...पर साथ ही साथ जब अपने दिल की थाह ली तो यह भी लगा कि यह कप मुझे कम से कम चार साल जवान कर गया... यकीन जानिये खेलों की यह ताकत व करिश्मा है ही ऐसा...

और आखिरकार वही हुआ जिसकी कामना कर रहा था हर भारतीय...चैंपियन बन गई अपनी 'टीम इन्डिया'...१९८३ में एक टीम थी कपिल देव की...विश्वकप शुरू होते समय कोई उसे दावेदार तक मानने को तैयार नहीं था...परंतु सभी अनुमानों को झुठलाते हुऐ कपिल के रणबांकुरों ने वह विश्वकप जीत दिखाया... और उस दिन के बाद विश्वक्रिकेट की सूरत भी बदल गई और हमारे देश भारत की भी...अचानक से एक पीढ़ी तहे-दिल से यह मानने लगी कि ' WE CAN ALSO DO IT !'... इस विश्वकप के पहले दिन से ही जानकार भी और आम आदमी भी ' टीम इंडिया ' को जीत का प्रबल दावेदार मान रहा था...१२१ करोड़ उम्मीदों का भारी भरकम बोझ काँधे पर उठाये हमारी टीम ने यह कर भी दिखाया... १९८३ की तरह ही २८ बरस बाद मिली यह जीत भी एक नये दौर का उद्घोष होगी... और वह उद्घोष होगा ' WE HAVE ARRIVED ON THE BIG STAGE & WE CAN DELIVER TOO ! '... यह हमारी वह पीढ़ी है जो खुद को किसी से भी कमतर नहीं आंकती... जो चीजों को जैसा देखती है वैसा ही आंकती है... यह वह पीढ़ी है जो बहुत जल्द ही मेरी पीढ़ी की आंखों में आंखें डाल यह सवाल पूछना शुरू कर देगी कि ईमानदारी-नैतिकता के नाम पर जुबानी जमा-खर्च तो बहुत किया आपने ' BUT WHY DIDN'T YOUR GENERATION WALK THE TALK ? '


अब बात करते हैं कल के मैच की... यह रहा मैच का स्कोरकार्ड ... २००३ के विश्वकप फाइनल में अतिउत्साही जहीर खान ने पहले ही ओवर में जोश में आकर हेडन को कुछ बोला और नतीजा यह हुआ कि हेडन व गिलक्रिस्ट ने जहीर के तीन शुरूआती ओवरों में ही २९ रन पीट डाले... इस मैच में शुरूआती तीन ओवर मेडन डाल जहीर ने माने २००३ की कड़वी यादों का सुखद अंत कर दिया... श्रीलंका टीम बहुत अच्छा खेली पर यह लगा कि वह यह मान कर चल रहे थे कि भारतीय बल्लेबाजी दबाव के चलते २५५-२६० के स्कोर का पीछा नहीं कर पायेगी... इसीलिये श्रीलंका का पूरा जोर २६० के मैजिक फिगर तक ही पहुंचने का रहा... महेला जयवर्धने, जिनको मैं दुनिया का सबसे अंडर-रेटेड बल्लेबाज मानता हूँ ने एक महान पारी खेली...

जयवर्धने ने दिखाया कि किस तरह बिना कोई खतरा लिये, बिना ज्यादा ताकत लगाये, गेंद को फील्डरों के बीच गैप्स में प्लेस कर के व गेंदबाज की ही ताकत को उसके विरूद्ध प्रयोग कर के तेजी से रन बनाये जा सकते हैं... ८८ गेंदों में बनाये १०३ रनों की उनकी यह पारी क्रिकेट विश्व कप इतिहास की महानतम पारियों के समकक्ष है... ४५ वें ओवर के अंत में स्कोर था २११ रन व सभी का अनुमान था कि लंका २४०-२४५ रन करेगी... तभी लंका ने बैटिंग पावर प्ले लिया व अंतिम पाँच ओवर में एक विकेट मात्र गंवाकर ६३ रन टांग दिये... अधिकाँश को टीम इन्डिया का सितारा तब डूबता सा नजर आने लगा...

फाइनल विश्वकप का और पीछा करना २७५ रन का... दबाव के चलते बहुत मुश्किल लग रहा था यह... पर अंतिम लीग मैच के दौरान टीम के खुद पर भरोसे, उनकी बॉडी लेन्ग्वेज व केयर फ्री एटीट्यूड को देख मैं यह लिख चुका था कि कप अब हमारा है !!!... उसके बाद के अपने आलेखों व विभिन्न जगहों पर की गई अपनी टिप्पणियों में मैंने अपनी इस मान्यता को बस दोहराया ही...

३१ रन पर सचिन का विकेट गिरते ही वानखेड़े में सन्नाटा सा छा गया... साढ़े पाँच साल की मेरी बिटिया ने तभी मुझसे पूछा " पापा, बताओ कौन जीतेगा ?"... मैं बोला " तुम बताओ "... वह बचपन से ही बहुत धार्मिक है... ननिहाल में कॉलोनी के मंदिर में जब भी कुछ आयोजन हो रहा होता है वह पूरी तन्मयता से वहाँ बैठी मिलती है... बिटिया बोली " मैं गॉड से पूछ कर बताती हूँ "... आंखें बंद कर वह मानो ध्यानस्थ हो गयी... तकरीबन पाँच मिनट बाद आँखें खोल बोली " इंडिया जीतेगा "... " क्या गॉड ने बताया ?" पूछा मैंने... " नहीं, मेरे दिमाग में आया अपने आप कि धोनी को कप मिल रहा है " बोली वह... आश्वस्त सा हुआ मैं क्योंकि २२ मार्च के बाद से जब भी मैं आँखें बन्द कर विश्वकप के बारे में सोचता था, मुझे शान से कप उठाये भारतीय कप्तान ही दिखते थे...

बहरहाल ३१ के स्कोर पर सचिन को खोने के बाद गंभीर व विराट ने संभल कर खेलते हुऐ व पाँच के आसपास का रन रेट बनाये रखते हुऐ स्कोर को ११४ तक पहुँचाया... भारतीय क्रिकेट की यह नई पौध एकदम तनावरहित व आश्वस्तिपूर्वक खेली... अपनी ही गेंद पर एक शानदार कैच ले दिलशान ने विराट को विदा किया... १६१ रन और चाहिये थे...
कैप्टन कूल माही ने बैटिंग क्रम में खुद को प्रमोट किया... इस पूरे विश्वकप में माही कभी भी किसी भी गेंदबाजी आक्रमण के विरूद्ध यद्मपि असहज नहीं दिखे परंतु वे कोई बड़ा स्कोर नहीं कर पाये थे... लगता है कि अपनी परफार्मेंस उन्होंने बड़े स्टेज व टूर्नामेंट के सबसे अहम मैच के लिये रख छोड़ी थी... और क्या खेले वह !... गंभीर के साथ भाग-भाग कर तेजी से एक-दो रन चुराते धोनी पूरी तरह से शांत, आश्वस्त व स्थिति को नियंत्रण में रखे खेले...

ऐसा कहीं लग ही नहीं रहा था कि आप विश्वकप के फाइनल में एक खतरनाक गेंदबाजी आक्रमण के विरूद्ध एक मुश्किल लक्ष्य का पीछा करते भारतीय कप्तान को देख रहे हैं... लग रहा था कि शांत रमणीक वन में मानो कोई साधक तपस्या सी कर रहा हो... खेल की भाषा में यदि कहें तो He was playing in The zone or Flow ( A mental state attained by a person fully immersed in some activity )... ऐसी स्थिति में जब खिलाड़ी आ जाता है तो नतीजे के बारे में ज्यादा संशय नहीं रह जाता...

बेहतरीन खेल रहे गंभीर जोश में आ अचानक एक खराब शॉट खेल शतक बनाने का मौका गंवा जब पैवेलियन की ओर लौटे तब भी ५२ रन और चाहिये थे और ५२ ही गेंदें बचीं थीं...

ऐसे में आगमन हुआ युव्वी का... वह पहली ही गेद से आश्वस्त दिखे... धीरे-धीरे दोनों रन बनाते रहे व जैसे ही दोनों ने तय किया कि अब मामला ज्यादा नजदीकी नहीं छोड़ना चाहिये, दोनों के बल्ले का मुंह खुला व पावर प्ले की बीस गेंदों में बत्तीस रन ठोंक दिये गये... कुलशेखरा द्वारा डाले ४८ वें ओवर की दूसरी गेंद पर मिड आफ के ऊपर धोनी ने छक्का मार कप भारत के नाम कर दिया... २०-२० में विश्व विजेता, टेस्ट में नंबर एक रैंकिंग, वन डे में नंबर एक रैंकिंग, आईपीएल में चेन्नई सुपर किंग्स को कप व अब विश्वकप जीत धोनी ने अपने आपको सर्वकालिक महान कप्तान साबित कर दिया है...

जीत के बाद खुशी व गर्व से फूट-फूट रोये हरभजन, कोहनी से मुंह छिपाते व साथियों की जर्सी पर आंखें पोंछते युव्वी, खुशी के आंसूं बहाते सचिन, आंसू रोकने की असफल कोशिश करते माही, सुबकते श्रीसंथ व अन्य को देख न जाने क्या हुआ मुझे भी... बगल में बैठी बिटिया ने पकड़ ही लिया... " क्या हुआ पापा ? आप रो क्यों रहे हो ? "... " नहीं बेटा, मैं रो नहीं रहा, यह तो खुशी व गर्व के आंसू हैं ! "... 'खुशी' का अर्थ तो बिटिया जानती है और 'गर्व' क्या होता है यह भी जल्दी ही सिखा देगी जिंदगी उसे...



गुरू गैरी कर्सटन का यह आखिरी मैच था बतौर टीम इन्डिया के कोच के...

बहुत बहुत धन्यवाद व भविष्य के लिये शुभकामनायें गैरी...

बहुत-बहुत बधाई टीम इन्डिया तुमको भी...
और धन्यवाद भी मेरा व मेरे जैसे करोड़ों का...
हमें खुशी व गर्व के इन आंसुओं को बहाने का यह मौका देने के लिये...
इसी तरह हमारी आंखें भिगोते रहना भविष्य में भी...





एक जुनुन खत्म हुआ, जीत की खुमारी भी उतर ही जायेगी जल्दी ही...

चलिये कल से फिर जिंदगी की वही भागमभाग शुरू करते हैं...



आप साथ रहेंगे न ?






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क्रिकेट मसाला :-


आइये जीत के उन अविस्मरणीय खुशगवार पलों को एक बार फिर अनुभव करते हैं... साथ-साथ...

यह क्या देखते देखते आप की आंखें भी नम हो आयीं...







आभार !




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