सोमवार, 14 फ़रवरी 2011

तो 'ईश्वर' क्या आप केवल मर्दों के ही हो ?... दे ही दो आज जवाब !!!

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वैसे तो मैं आपको जानता-मानता नहीं
पर मेरे भाई लोग अक्सर बताते हैं
कि आप ही ने बनाई यह सारी दुनिया
और उसी समय ही बनाया हम सबको भी

आपके लिये कुछ असंभव नहीं बताते हैं
फिर भी आपने कभी नहीं दिया दर्शन
पु्री दुनिया के सारे इंसानों को एक बार
न ही आपने बतलाया उन्हें साफ-साफ
क्या और कैसे करना है आपकी दुनिया में
किस तरह से पूजने से होते हो प्रसन्न

इस सब को सिखलाने के लिये आपने भेजे
अवतार, सिद्ध पुरूष व अपने संदेशवाहक भी
जो न जाने किस तरह का बोल-लिख गये
कि आज तक उसका सही अर्थ निकालने में
लगे हुऐ हैं आपके हर तरह के मानने वाले

इन्हें अपना-अपना अर्थ इतना प्यारा है
कि दूसरा कोई अर्थ बताने वाले को
मार कर भी यह इठलाते फिरते हैं
कि ऐसा कर यह आप के और प्यारे होंगे

आपके हुक्म का पालन करने के दंभ में
यह सब अब पीछे पड़ गये हैं औरतों के

कैसे कपड़े वह पहने,रखे कितने लंबे बाल
कब और किसके साथ निकले घर से बाहर
क्या काम वह करे और क्या न करे कभी
क्या है उसका फर्ज, किस उम्र मे हो शादी
बच्चे कब जने, कितने जने औ पाले कैसे

बिता दे जिंदगी बेटी-बहन-माँ ही रहने में
न हो उसका अलग कोई वुजूद न विचार ही
वह केवल और केवल पुरूष की संपति मात्र है
भूल जाये एकदम वह कि वह भी लेती है साँसे
भूल जाये वह कि उसका भी एक नजरिया है

बातें तो अभी बहुत सी हैं पर मुझे पूछना है
यह सब आपने वाकई कहा है औरतों के लिये
बता दिया पुरूषों को, ताकि लागू कर दिया जाये

तो कुछ तो औरतों को भी बताया होगा ही
कि आपके ख्याल से मर्द को कैसे रहना चाहिये

अगर नहीं बताया आज तक यह आपने कभी
तो 'ईश्वर' क्या आप केवल मर्दों के ही हो ?



कब दोगे जवाब ?







...

चित्र साभार :Google images




34 टिप्‍पणियां:

  1. सही प्रश्न किया है आज तो आपने ईश्वर से…………वो भी सोच रहा होगा क्या जवाब दूँ।

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  2. इश्वर तो सबके लिए है और इन्साफ भी करता है .यह हम ही हैं जो समझ नहीं पाते उसके कानून को .
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    इश्वर जब कहता है की माँ के पैरों तले जन्नत है तो हम अनसुना कर देते हैं.
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    इश्वेर जब यह कहता है "की जब माँ और बाप एक साथ पुकारे तो माँ का जवाब पहले दो तो भी हम अनसुना कर देते हैं.
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    इश्वेर जब कहता है की किसी लड़की की शादी उसकी मर्ज़ी के बिना नहीं हो सकती तब भी हम अनसुना कर देते हैं.
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    इश्वेर जब कहता है की दहेज़ लड़का देगा लड़की को तब भी हम अनसुना कर देते हैं.
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    ज़ुल्म औरत पे करता है इंसान अपने कानून बना के और हम सवाल करते हैं इश्वर से. यह भी एक अजब गज़ब तमाशा है.

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  3. ईश्वर ने तो अपना जवाब दिया हुआ ही , धरती पर लोग उसके अपने मतलब निकलने में लगे हैं !

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  4. फिर आएंगे, शायद तब तक कोई जवाब आ जाए.

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  5. ईश्वर से सार्थक संवाद. बेहतरीन...

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  6. हाँ ...पोस्ट बेहद सुन्दर है विचारणीय भी ..........लेकिन सोचता हूँ एक पोस्ट कथित नास्तिक विचारधारा पर बना ही दूँ ...

    उत्तर देंहटाएं
  7. हाँ ...पोस्ट बेहद सुन्दर है विचारणीय भी ....अपनी और से उत्तर देने की इच्छा तो है ......लेकिन सोचता हूँ एक पोस्ट कथित नास्तिक विचारधारा पर बना ही दूँ ...तो दोनों काम पूरे हो जायेंगे..नास्तिक मेंटेलिटी के उपजे प्रश्नों का उत्तर भी और इनका भी और साथ में अब मैं भी कुछ सवाल पूछने का प्रयास करूंगा ...... है ना !

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  8. और हाँ .....नास्तिकों के ब्लॉग पर भी आपका कमेट पढ़ा था ...... बढ़िया है ... पढ़ कर मजा आया ..सच्ची :)

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  9. इश्वर तो है सर्वव्यापक निर्मल निराकार ....
    उसके दिल में कोई राज नहीं होता ......
    सच कहा है किसी ने....
    वहम का कोई इलाज नहीं होता.....

    ये कमेन्ट मैंने मेरी ही एक पोस्ट पर उत्तर के रूप में दिया था शायद काम आ जाये

    ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
    [ये प्रश्न का उत्तर नहीं है, पहले स्त्री स्वभाव के एक ख़ास पहलू को देखिये ]

    ०१
    बचपन में एक कहानी सुनी थी द्रौपदी ने पूछा क्रष्ण से आप चीर हरण के समय देरी से क्यों आये ??
    कृष्ण बोले तुमने ही कहा था "द्वारकाधीश " इसिलये लेट हो गया , मुझे द्वारिका होकर आना पड़ा
    [वो तो सबके में में रहते है ऐसा ही कोई कांसेप्ट था ]
    ये वही कृष्ण हैं जिन्होंने - बलात्कार पीडि़त लड़कियों को आज भी समाज में सम्मान नहीं मिलता लेकिन कृष्ण ने 16100 ऐसी लड़कियों को अपनी पत्नी बनाया जो बलात्कार पीडि़ता थीं और उनके परिवारों ने ही उन्हें अपनाने से मना कर दिया था।
    http://religion.bhaskar.com/article/modern-1316762.html
    और आज "तुम करो तो रास लीला हम करें तो केरेक्टर ढ़ीला" जैसे वाक्यों से सम्मानित किये जाते हैं

    यहाँ द्रौपदी में प्रश्न पूछने पर मैं बड़ा चकित हूँ , चलो कोई बात नहीं ....बात जो भी हो एक कथित स्पष्टीकरण तो था है

    ०२
    द्रौपदी शर शैया पर लेटे भीष्म के युधिष्ठिर को प्रवचन दिए जाने पर हंस रही थी
    और उनसे भी सवाल पूछ डाला " आप उस वक्त [चीरहरण ] तो कुछ बोले नहीं अब ज्ञान बाँट रहे हो "
    भीष्म बोले की उनकी बुद्दी दूषित अन्न खाने से ऐसी हो गयी थी इसलिए मेरी निर्णय क्षमता कुछ गड़बड़ा गयी थी आदि आदि .. अब बाणों ने मेरा रक्त निकल दिया है .. अब सब नोर्मल है
    [नोट: महाभारत कथा के अनुसार भीष्म द्वारा अपहृता काशीराज की ज्येष्ठ पुत्री अम्बा का ही दूसरा अवतार शिखंडी के रूप में हुआ था। प्रतिशोध की भावना से उसने शंकर की घोर तपस्या की और उनसे वरदान पाकर महाराज द्रुपद के यहाँ जन्म लिया उसने महाभारत के युद्ध में अपने पिता द्रुपद और भाई धृष्टद्युम्न के साथ पाण्डवों की ओर से युद्ध किया ... अर्थात इतिहास सजा भी देता है ]

    ०३
    एक बात पर गौर करें हिरन वाले केस में सीता माता भी अपने सर्व समर्थ पति की क्षमता को लेकर आशंकित नजर आ रहीं हैं ??

    ०४
    और लक्ष्मण जैसे [पुत्र सामान ] पुरुष पर भी आरोप लगाने से नहीं चुकी हैं [चाहे दिमाग में कोई ही रही हो जैसे भय आदि ]

    ऐसा लगता है स्त्री हमेशा अपने रक्षकों पर ही संदेह करती रही है [अहिल्या वाली बात स्वार्थी लोगों की और अनावश्यक झुकाव भी दर्शाता है ]

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  10. एक बात और बोलूं ......मुझे फिर से याद आ गयी आपकी वो पोस्ट जब आपने व्रत उपवास आदि [वैज्ञानिक फायदों वाली बातों ] से बचने के लिए सिक्ख धर्म का रेफरेंस लिया था .. इस से एक बात साबित हो रही है की मानव सब चीजें अपने मन की ही ढूंढता है .. जहां थोड़ी मन के विपरीत बात आये वहीं उसके कथित लोजिक का स्विच ऑन हो जाता है ..लेकिन तब भी सही लाईट तभी जलती दिखती है जब पूर्वाग्रह का उजाला दिमाग के कमरे में पहले से मौजूद ना हो

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  11. अरे...... कित्ते सारे कमेन्ट कर डाले ये मैंने ?:)
    पोस्ट पर कमेन्ट करना तो भूल ही गया मैं

    कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा .....
    मित्र ने मेरे
    ये है किस दिशा में है तीर छोड़ा ?

    :))))))

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  12. @ प्रिय प्रवीण जी ! आपने ईश्वर को पुकारा ,
    आपने ईश्वर से कुछ पूछा ।
    इससे पता चला कि आपने ईश्वर को मानना तो शुरू कर ही दिया है ।
    आप देखिए कि ईश्वर की पूजा औरतें ज़्यादा करती हैं । इसका मतलब यह है कि वे ईश्वर को केवल मर्दों का नहीं मानतीं बल्कि अपना भी मानती हैं ।
    अब जब आपने ईश्वर को मान ही लिया है तो क्यों न वुज़ू करना और नमाज़ पढ़ना भी सीख लीजिए क्योंकि चोटी रखकर यज्ञ हवन करना आपके बस का नहीं है और गणेश जी को दूध आप पिलाएंगे नहीं ।

    उत्तर देंहटाएं
  13. @ यह सब अब पीछे पड़ गये हैं औरतों के

    तो आपके कहने का मतलब ये है कि बेचारा ईश्वर इस काम के लिए जिम्मेदार है :)

    अगर ईश्वर ना भी होता तो क्या वे औरतों के पीछे नहीं पड़ते :)

    उत्तर देंहटाएं
  14. .
    .
    .
    @ मित्र गौरव,

    आगमन पर आभार, कहाँ व्यस्त थे दोस्त ?... सच कहूँ तो आप जैसे युवा से बातें करना बहुत ही अच्छा लगता है मुझे... बहुत कुछ सीखता भी हूँ...

    @ "कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा .....
    मित्र ने मेरे
    ये है किस दिशा में है तीर छोड़ा ?"


    मेरे मित्र हो, इसीलिये आप मेरे मंतव्य को भाँप गये हो... ;)


    "पहले स्त्री स्वभाव के एक ख़ास पहलू को देखिये...
    ऐसा लगता है स्त्री हमेशा अपने रक्षकों पर ही संदेह करती रही है..."


    अब यही खाँचे में डालना ही तो खलता है...इतिहास व मिथकों के पुरूष पात्रों ने भी अनेकों बार ऐसी बातें की हैं... पर उनके बहाने कोई यह नहीं कहता कि ' पुरूष स्वभाव का यह खास पहलू है'



    ...

    उत्तर देंहटाएं
  15. .
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    @ मेरे प्रिय व आदरणीय डॉ० अनवर जमाल साहब,

    मेरी कल्पना का आदर्श ईश्वर जो है... उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई उसे पूजता या याद करता है कि नहीं... और इस पूजने से पहले वह नहाता, हाथ धोता या कुल्ला करता है कि नहीं... अगर वह है और सच्चा व न्यायप्रिय है तो मेरी इस पोस्ट से भी प्रसन्न ही होगा...

    बाई द वे...
    कैसे कपड़े वह पहने,रखे कितने लंबे बाल
    कब और किसके साथ निकले घर से बाहर
    क्या काम वह करे और क्या न करे कभी
    क्या है उसका फर्ज, किस उम्र मे हो शादी
    बच्चे कब जने, कितने जने औ पाले कैसे

    बिता दे जिंदगी बेटी-बहन-माँ ही रहने में
    न हो उसका अलग कोई वुजूद न विचार ही
    वह केवल और केवल पुरूष की संपति मात्र है
    भूल जाये एकदम वह कि वह भी लेती है साँसे
    भूल जाये वह कि उसका भी एक नजरिया है


    यह सब तो आप भी बहुत बतलाते-सिखलाते रहते हो नारियों को... वह भी मालिक के नाम पर... तो आप ही सवाल का जवाब दे दीजिये न...


    ...

    उत्तर देंहटाएं
  16. .
    .
    .
    @ अली सैयद साहब,

    आपकी बात सही है... पर यह भी उतना ही सच है कि आज औरत के कपड़े, उसकी कैरियर च्वायस, रहन सहन, सोच व आजाद वजूद को लेकर उसके पीछे पड़ने वाले अधिकतर यह काम करते धर्म व ईश्वर के नाम पर ही हैं !


    ...

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  17. हम तो माँ है हमें तो कहा गया है कि संसार को संस्‍कारित करो।

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  18. @इतिहास व मिथकों के पुरूष पात्रों ने भी अनेकों बार ऐसी बातें की हैं... पर उनके बहाने कोई यह नहीं कहता कि ' पुरूष स्वभाव का यह खास पहलू है'

    मित्र प्रवीण
    इसकी पहलु को दिखाने की शुरुआत मैंने नहीं की थी ..मुझे खुद ये रूढ़िवादिता लगती है [स्त्री पुरुष विभाजन की बात कर रहा हूँ ] .और सच कहूँ ये उत्तर देते हुए मुझे बुरा भी लगता है .क्योंकि अनजाने मैं भी विभाजन करने वाला ही बन जाता हूँ .. वही विभाजन जिससे मुझे सख्त चिढ है और रहेगी . मैंने जो व्यू बताया था वो एक डेराइव्ड [derived] व्यू है जो रिसेन्ट ही जेनरेट किया था :) वजह आपको इस लेख के हेडिंग में मिल जाएगी [मैं इस हेडिंग मजबूरी में ही बता रहा हूँ ]
    सीता माँ की बेटियों को आवाज [कवयित्रिओं को समर्पित जो रचना के नाम पर "राम पर आरोप" लगाती हैं]
    ये रही पोस्ट
    http://my2010ideas.blogspot.com/2010/09/blog-post_26.html

    क्या करूँ दशरथ, राम और सीता [सभी अच्छे और सभ्य पात्र ] की आवाज की भी तो कोई कीमत होगी ना

    मुझे एक बात समझ में आयी ... इसे भी फ़िल्मी एक्जाम्पल से समझा देता हूँ ..

    ‘माई नेम इज खान’ में बरसों पुरानी सीधी और सादी बात कही गई है। ‘दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं अच्छे या बुरे।‘ इस लाइन के इर्दगिर्द निर्देशक करण जौहर और लेखिका शिबानी बाठिजा ने कहानी का तानाबाना बुना है।
    http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/1002/12/1100212071_1.htm

    उत्तर देंहटाएं
  19. कुछ स्नेही और उम्र में बड़े लोग मुझे अक्सर हर बात को सिर्फ अच्छे और बुरे में विभाजन करने से इसलिए टोकते हैं कि उन्हें लगता है दुनिया में सिर्फ सफ़ेद और काले कलर से आगे भी बहुत कुछ कलर है .. फिर मुझे सलाह देने के बाद खुद अपने हिसाब के वही दो रंग [स्त्री और पुरुष वाला लोजिक से कोसों दूर वाला विभाजन] ले कर हंसा देने वाली बच्चों जैसी पेंटिंग बनाते हैं और कहते हैं ..ये दुनिया लेटेस्ट कलर ट्रेंड है :))
    ~~~~~~ [कुछ दिन समय पहले सुज्ञ जी के ब्लॉग पर पढ़े एक कमेन्ट के आधार पर]

    उत्तर देंहटाएं
  20. महाभारत और रामायण इन्हें एक बार निष्पक्षता से अगर आप पढेंगे तो आप पाएंगे की ये सबसे बेहतरीन "विज्ञान गल्प" [थोड़ी देर के लिए मान लेता हूँ ] है ...... इसमें हर पात्र की चरित्र के हर पहलू को भी एक दम पारदर्शक तरह से दिखाया है ....बिलकुल पारदर्शी ..... कोई पूर्वाग्रह नहीं ....... आजकल के फ़ोकट सर्वे या दैनिक धारावाहिकों से कही गुना बेहतर और साइड इफेक्ट रहित है .. कभी कभी सोचता हूँ ये "अलग वजूद" क्या होता है ? :)
    आपने ऐसी परिस्थितियाँ देखी होंगी की एक पारिवारिक फिल्म देखने गए दो लोग उसमें जो सीख दी गयी है उसे समझने के अलावा उसके हर पहलु पर चर्चा करते हैं ...और कईं बार तो उसी बात पर लड़ पड़ते हैं जिस पर ना लड़ने की फिल्म में सीख दी गयी हो :))

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  21. सार बात है की जो सभ्य है संस्कारी है .. अब वो स्त्री हो या पुरुष ...... फिलहाल दुखी चला रहा/रही हो सकता / सकती है (आप अपने आसपास चेक कीजियेगा .... प्रत्यक्ष को प्रमाण की क्या आवश्यकता.. कहीं भी देख लीजियेगा ) और आपने इश्वर से सवाल पूछा वो तो आपको एक बार उस निराकार का चिंतन तो करवा ही देता है :)) .. लेकिन आपका सवाल होना चाहिए था .. संस्कारी लोग क्यों दुखी होते हैं ?? ..... मतलब नास्तिकों के ब्लॉग पर मौजूद लेख इस लेख से ज्यादा तार्किक और सही दिशा में जाता प्रतीत होता है .. उत्तर तो खैर मैं अपने अनुसार दूंगा ही कभी पोस्ट से (सन्दर्भ ढूंढ रहा हूँ )

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  22. @सच कहूँ तो आप जैसे युवा से बातें करना बहुत ही अच्छा लगता है मुझे... बहुत कुछ सीखता भी हूँ...

    अरे गुरु जी ... कहीं आप आसान आसान सवाल पूछ पूछ कर या लेख लिख कर मेरे जैसे मासूमों का टेस्ट तो नहीं लेते रहते :))
    सच कहूँ ...ये शायद पहले भी कहा है और फिर से कहा रहा हूँ .. आप सही मायनों में "ब्रोड माइंडेड ब्लोगर" हैं .... वर्ना लोग तो थोडा सा भी लेख के विपरीत बोलते ही व्यक्तिगत स्तर पर नाराज होने लगते हैं ..आप ही का स्नेह है जो हमें आपके ब्लॉग पर खींच लाता है

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  23. क्या मां-बाप, गुरू और राजा केवल मर्दों का होता है ?
    अगर वाक़ई वे न्याय के गुण से युक्त हैं, वे अपने पद के अनुरूप ही अपनी संतान, अपने शिष्यों और अपनी प्रजा के प्रति वत्सल भाव रखते हैं तो यक़ीनन वे केवल मर्दों के ही नहीं हो सकते बल्कि वे सबके होंगे। मां-बाप अपनी औलाद का, गुरू अपने शिष्यों का और एक अच्छा राजा अपनी प्रजा का भला चाहता है। उनकी भलाई के लिए ही ये सभी अपने अपने स्तर पर कुछ नियम और अनुशासन बनाते हैं और उनका अनिवार्य रूप से पालन कराते हैं। इनमें से कोई भी यह छूट नहीं देता कि कोई भी जो चाहे वह करे।
    प्रिय प्रवीण जी ! आप भी एक बाप हैं, एक शिक्षक हैं और एक फ़ौजी भी हैं। इसक बावजूद आप अनुशासन की अहमियत को नहीं समझ पा रहे हैं। इंसान के लिए अनुशासन अनिवार्य है। परमेश्वर भी मनुष्यों का कल्याण चाहता है और इंसान का कल्याण तभी संभव है जबकि वह ईश्वरीय अनुशासन का पालन करे। ईश्वरीय अनुशासन के नाम पर हुड़दंग काटने वाले ईश्वर के द्रोही और मानवता के अपराधी हैं। उनके अत्याचार के कारण आप ईश्वर के न्याय और कल्याण भाव के प्रति प्रश्न चिन्ह नहीं लगा सकते।
    क्या आप अपनी लड़कियों को नंगी घूमने दे सकते हैं ?
    आप तो उनकी इतनी परवाह करते हैं कि उन्हें स्कूल के समय स्कूल की ड्रेस पहनाते हैं और घर लौटने पर दूसरी और शादी विवाह आदि में जाने पर दूसरी। उन्हें अलग अलग मौक़ों पर अलग अलग ड्रेस पहनना किसने सिखाया ?
    यक़ीनन आपने !
    जब आपकी शादी हुई या आपकी बहनों की शादी हुई तो उनके बाल कैसे हों ?
    उनके हाथ कैसे हों ?
    उनका लिबास कैसा हो ?
    उनका मेकअप कैसा हो?
    यह सब उस दुल्हन ने तय नहीं किया था बल्कि उसके गार्जियन्स ने ही तय किया था। क्या तब भी आपने कहा था कि आपको क्या अधिकार है इस लड़की के लिए इतना कुछ तय करने का ?
    आपके लिए आपके माता-पिता और गुरू सदा से नियम अनुशासन तय करते आए हैं और आप उन्हें मानते आए हैं। आप सेना में थे तो आपने कभी नहीं कहा कि आज तो गर्मी है, मैं तो तहबंद और बनियान पहनकर ही ड्यूटी दूंगा।
    आपने नहीं कहा। आपने भारी भरकम वर्दी भी पहनी और बुलेट प्रूफ़ भी और तमाम दिक्कतों के बावजूद आपने विश्वास किया कि आपके ऊपर वाला अफ़सर आपके हित में ही ये पाबंदिया आयद कर रहा है। ऐसा ही आप उस ऊपर वाले के बारे में विश्वास क्यों नहीं रखते ?
    ये मामूली सवाल हैं, जिन्हें आप जैसा बुद्धिजीवी स्वयं हल करने में सक्षम है।
    अब जल्दी कीजिए वुज़ू सीखिए और नमाज़ अदा कीजिए और कोई सवाल भी मत कीजिए क्योंकि जब आप ड्रिल करते थे तो आपने कभी ऐतराज़ नहीं किया और अगर किसी ने किया भी तो उसके ऐतराज़ की वजह से सेना के अनुशासन को , उसके नियम को नहीं बदला गया बल्कि उस ऐतराज़ करने वाले को ही दंड दिया गया। जहां न्याय है , वहां सीमा और संतुलन भी है और अनुशासन भी और फिर उसके उल्लंघन करने वाले के लिए दंड भी है। आप सेना में सब कुछ देख चुके हैं।
    आपसे अनुशासन के पालन की पूरी आशा मुझे है।
    अब आपको अपने स्वभाव को और मेरी आशा को पूरा करना है।
    जय हिंद !

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  24. शायद भगवान भी भगवान नहीं बस पुरुष है या उसके भक्तो ने उसे पुरुष के अलावा भगवान कभी बनने ही नहीं दिया या सन्देश वाहक और दूत बस पुरुष ही बने रह गये कभी भगवान के सच्चे बन्दे बने ही नहीं |

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  25. गौरव जी

    :)

    तो आप ब्लॉग पढ़ते है

    और गृहस्थ जीवन कैसा चल रहा है :))

    उत्तर देंहटाएं
  26. @ .... तो आप ब्लॉग पढ़ते है

    यही तो एक अवगुण है मुझ में :)) [पूरा ] पढ़ कर कमेन्ट करना :))

    @.... और गृहस्थ जीवन कैसा चल रहा है :))

    गृहस्थ जीवन ? :)

    उत्तर देंहटाएं
  27. एक बात और बोलूं ? :)
    ऊपर वाला कमेन्ट भी ...

    @"शायद भगवान भी भगवान नहीं बस पुरुष है या उसके भक्तो ने उसे पुरुष के अलावा भगवान कभी बनने ही नहीं दिया या सन्देश वाहक और दूत बस पुरुष ही बने रह गये"

    थोडा कम ही समझ में आया :) कृपया सन्दर्भ उदाहरण से स्पष्ट करें तो पता चल सकेगा की सिर्फ भावना में बहाकर लिखी बात नहीं है ......(उत्तर देना आवश्यक नहीं है ...अनुत्तरित छोड़ा जा सकता है )

    उत्तर देंहटाएं
  28. [सुधार ]
    पिछली टिपण्णी में
    "सिर्फ भावना में बहाकर लिखी बात नहीं है"
    को
    "सिर्फ भावना में बहकर लिखी बात नहीं है"
    पढ़ें

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