गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

एक हैं श्रीमान ऐतबारी लाल, क्या आपने उनकी मचान देखी है कभी ??? ...

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मेरे ' जमीनी ' मित्रों,

आज एक किस्सा सुनाने का मन है...

हाँ तो दोस्तों, एक थे श्रीमान ऐतबारी लाल... अब जैसा उनका नाम था उसी तरह के उनके काम भी थे... मतलब जिस चीज पर वो ऐतबार कर लेते थे, उस से उनका विश्वास फिर किसी भी विपरीत तर्क या तथ्य के सामने आने पर भी डिगता नहीं था...

ऐतबारी लाल जी के घर के आंगन में एक बहुत विशाल, घना व ऊँचा पेड़ था... अब आप कहोगे कि ऐसे पेड़ तो अनेकों होते हैं इसमें क्या खास था... तो साहब, इस पेड़ के ऊपर एक विशाल मचान बनी थी... जिसे शायद बहुत पहले कभी ऐतबारी लाल जी के किसी पुरखे ने बनाया था... मचान क्यों व किसके लिये बनाई गई थी यह आज के रोज किसी को नहीं पता... पर यदि बनी है तो कभी उसका कोई मकसद रहा ही होगा, यह सब मानते थे... इतनी पुरानी होने के बावजूद भी वह मचान थी अभी भी ठीक-ठाक, एकदम पुख्ता...

अब एक दिन श्रीमान ऐतबारी लाल को न जाने क्या सूझी... चढ़ गये मचान पर... घरवालों ने सोचा कि थोड़ी देर में उतर आयेंगे... पर यह क्या... ऐतबारी लाल जी ने तो अपना रोजमर्रा का सामान भी मंगा लिया ऊपर... और कुछ ही दिनों में ऐतबारी लाल वहीं रहने लगे...

ऊपर रहते रहते एक दिन अचानक ऐतबारी लाल जी के दिमाग में विचार आया कि " असली जीवन अगर कहीं है, तो वह है मचान पर ही "... यह विचार जल्दी ही उनके विश्वास में बदल गया... और धीरे-धीरे यह विचार इतना जोर पकड़ गया कि उसने उनके पूरे किरदार, पूरे वजूद पर ही कब्जा कर लिया...

फिर वही हुआ जो होना था... ऐतबारी लाल जी के लिये दुनिया ही बदल गई... वो हर किसी आते जाते से चिल्ला-चिल्ला कर कहने लगे कि अगर असली जिंदगी जीनी है तो ' रहो मचान पर '... उन्होंने इस आशय के पर्चे छपवा लिये... एक लाउडस्पीकर भी लगवा लिया... और तो और ' मचान पर रहना ही सबसे सही है ' इस विचार के प्रचार में कोई कमी न रह जाये इसलिये उन्होंने कुछ ब्लॉग भी बना लिये इस प्रचार के लिये...

जब तब ऐतबारी लाल जी से कोई आता-जाता उलझने भी लगता था... कुछ कहते थे कि तेरे मचान पर ऐसा क्या है जो मेरे घर में नहीं... कुछ ऐसे भी होते थे जिन्होंने देखी होती थी ऐतबारी लाल जी की निगाहों से परे की वह दुनिया भी... ' जिसमें अथाह समंदर भी हैं और ऊँचे पहाड़ भी, जीवंत शहर हैं और उजाड़ रेगिस्तान भी, आबाद सुप्त ज्वालामुखी भी हैं और बर्फ से बने मकान भी... यह लोग ऐतबारी लाल को अपने उन सफरों के बारे में बताते थे, खींचे हुऐ फोटो दिखाते थे, समझाते थे... ऐतबारी लाल जी भी उन सबकी बातें बहुत सम्मान से सुनते थे, अपनी सामर्थ्य भर उनका स्वागत सत्कार भी करते थे...

पर एक बात जो हमेशा निश्चित रहती थी वह यह थी कि ऐसे हर वार्तालाप, हर बहस, हर भिडंत के बाद श्रीमान ऐतबारी लाल हाथ में माइक्रोफोन लिये मचान से भी ऊपर की डालियों पर चढ़ कर लाउड स्पीकर पर एक बार फिर जोर से हुंकारा भरते थे... " चाहे कुछ भी हो, असली जिंदगी कहीं है, तो है मचान पर ही, सब लोग अपने लिये मचान बना ही लो "


अपने इर्द गिर्द देखों दोस्तों, तो आपको बहुत से ऐतबारी लाल दिखेंगे अलग अलग किस्मों की मचान पर चढ़े हुऐ...

कुछ 'धर्म की मचान' पर चढ़े हैं तो कुछ 'आध्यात्म' की मचान पर...
कुछ 'बौद्धिक आभिजात्य' की मचान पर चढ़े हैं तो कुछ 'भाषाई शुद्धता' की मचान पर...
कुछ 'सही-आहार' की मचान पर चढ़ बैठे हैं तो कुछ 'पुरखों के ज्ञान' की मचान पर...
कुछ की मचानों पर चढ़ने में मुहुर्त देखे जायेंगे तो कुछ पर चढ़ने के लिये आपको अपनी कॉमनसेन्स को नीचे ही छोड़ना होगा...

बस एक बात जो हर जगह समान होगी वह है कि आपको सभी यह कहेंगे कि जिंदगी अगर है तो मेरी जैसी मचान पर ही..

मैं तो अक्सर टटोलता हूँ, सतर्क रहता हूँ आप भी आज देख ही लीजिये... बहुत दिनों से एक जगह बैठे-बैठे कहीं कोई मचान तो नहीं उग आई आपके पैरों के नीचे भी... जमीन मत छोड़िये अभी से, अभी तो हमने दुनिया में देखा ही क्या है...

अपनी जमीन को जानने-नापने के इस सफर में आप साथ तो रहोगे न ?





आभार!





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चित्र साभार :गूगल चित्र

14 टिप्‍पणियां:

  1. क्या गिराया है मचान पर चढ़ाने के बाद।

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  2. अपनी पोस्ट की एक पंक्ति ही लिख देती हूँ ...

    " जो लोंग किसी एक ही विचारधारा का आँख मूंदकर समर्थन नहीं कर सकते , उनकी गुणग्राहकता कई बार उन्हें अकेला कर देती है
    http://vanigyan.blogspot.com/2011/01/blog-post_27.हटमल

    यही भय अलग -अलग मचान बनाने को विवश करता है ...

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  3. मैं भी एक मचान बनाने की सोच रहा था मगर अब मचान नहीं ....दालान बनाऊंगा और बहुतों को साथ ले के आऊँगा ताकि जन समर्थन साथ रहे.....
    हा हा हा हा....
    मजेदार.....समझने वालों के लिए इशारा ही काफी है....

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  4. हा कुए के मेढक की तरह | ये सही है की हम जिस विचारधारा को मनाते है और उसके विपरीत बातो को गलत मान बैठते है | ये जरुरी नहीं जो बात हमारी विचारधारा से अलग है वो गलत ही हो और हमारी सोच की हर बात सही हो | हर जगह कुछ ना कुछ अच्छाई होती है उसे ग्रहण करना चाहिए |

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  5. यह अपना दिमाग भी मचान पर ही बैठा है, सब से ऊपर। दिल उसे बार-बार कहता है कि भाई थोड़ा नीचे उतर आओ और देखो लोगों के साथ-साथ रहकर, लेकिन दिमाग है कि मानता ही नहीं। अच्‍छा आलेख है।

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  6. हर एक 'मचान' को एक ही नज़रिए से देखना और तोलना भी अपनी 'मचान' बना लेना जैसा ही होगा.
    कुछ बातों में संसार के साथ या लोगों के साथ समझौता करे बिना अपनी 'मचान' पर बने रहना ही सही और लाभदायक होता है.
    यदि गांधी जी 'सत्याग्रह' की 'मचान' से निचे उतर आते और देश की आज़ादी के विचार से समझौता करा लिया होता तो...?
    आवश्यकता सब को प्रसन्न रखने के प्रयास की नहीं है वरन सत्य को पहचान कर सत्य को विदित करने तथा उसके अनुसरण करने की है, फिर चाहे लोग उसे कुछ भी कहें.

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  7. ऐसे ही एतबारी लाल के, जमीनी मनमौजी लाल बडे अन्दरुनी प्रशंसक है, जब कोई देख नहीं रहा होता एतबारी को साधन सामग्री मनमौजी ही उपलब्ध करवाते है। और थोडे आदरणीय आदि शब्दों का मान भी मचान पर जाकर ठोक आते है। यह सब इसलिये कि यह मनमौजी लाल कुछ खाऊभगत किस्म के है। चुंकि मचान पर वह एतबारी लाल के लिये चिडियों का शिकार बडा आसान है, घायल चिडियाएं जमीन पर ही गिरती है, इसलिये उसके बाद के कार्य में मनमौजी लाल दक्ष है। शिकार से बचे-खुचे से मनमौजी के जलसे हो जाते है। खा पी कर अघाने के बाद, उस मचान वाले पेड की रोज थोडी थोडी जडें काटते है।

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  8. ..और इन सभी से भी ऊपर जो मचानों का भी मचान है उस पर अब एक शख्स खड़ा होकर यह ब्लॉग पोस्ट लिख रहा है :)
    आप कैसे छूट जायेगें :)

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  9. ज़मीन पर चलते हुए ऊपर देखने की आदत नहीं रही क्या आप उन मचानों के लिंक दे पाइएगा :)

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  10. बहुत एतबार करने का मन हो रहा है, कोई मचान तो दिखाओ यारों! :)

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  11. ये है हमारे न्यायालयो मे बैठे ऐतबारीलालो के निर्णय और फील प्लेट द्वारा खींचाई :

    http://blogs.discovermagazine.com/badastronomy/2011/02/03/america-and-india-love-their-antiscience/

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  12. फ्लैट की चौथी मंजिल पर वास करने से काम चलेगा...

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  13. क्या बात है जनाब...

    यह मचानों का चक्कर...ज़मीन से काटता है...जहां सारी मचानें टिकी रहती हैं...

    बेहतर...

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