रविवार, 27 फ़रवरी 2011

दिल थाम के बैठे हैं हम... क्या होगा आज ???

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मेरे 'क्रिकेट-धर्मा' मित्रों,

आशंकायें थी कि २०-२० क्रिकेट के आगाज के साथ एकदिवसीय क्रिकेट अपना आकर्षण खो देगा... पर आज के इस मैच के टिकटों के लिये जिस तरह भीड़ उमड़ी व लाठियाँ खा कर भी क्रिकेट प्रेमी टिकट की लाईन में डटे रहे... उस से यह आशंका निर्मूल साबित हुई... जब तक अपनी टीम ठीकठाक खेलेगी उसे सपोर्ट की कमी नहीं रहेगी यह पक्का है!
बेंगालुरू के चिन्नास्वामी स्टेडियम में होने वाला इस मैच में संभावना जताई जा रही है कि प्रैक्टिस मैच की तरह ही ग्रुप मैच में भी पिच स्पिनरों की मददगार रहेगी... पहले मैच में श्रीसंथ की पिटाई लगी है और नेहरा शायद अभी तक पूरी तरह फिट नहीं हैं... जिस तरह की खबरें आ रही हैं लगता है कि भारत दो स्पिनर लेकर उतरेगा मैदान पर... दाहिने हाथ के लेग स्पिनर पीयूष चावला को मौका मिलने की संभावना है... एक तरह का जुआ सा भी होगा यह... पिच से यदि लिफ्ट व टर्न नहीं मिला तो हमारे दोनों स्पिनर हरभजन व चावला निष्प्रभावी दिखेंगे... पाँचवा बॉलिंग स्लॉट भी युसुफ पठान व युवराज जैसे पार्ट टाइम स्पिनर भरते हैं... अगर सपाट पिच है तो मुनाफ भी पिट सकते हैं... कुल मिलाकर लब्बोलुबाब यह है कि यदि ग्राउंड्समैन ने स्पिनर फ्रेंडली पिच नहीं दी तो गेंदबाजी कुछ खास नहीं कर पायेगी... और यदि पिच स्पिनर फ्रेंडली है तो भी इंग्लैंड के पास भी Graeme Swann जैसा स्पिनर भी है... जो वर्तमान फॉर्म के आधार पर दुनिया का सर्वश्रेष्ठ ऑफ स्पिनर कहा जाता है...

मतलब सीधा सादा है कि आज अगर जीतना है तो बल्लेबाजों को हर हाल में चलना होगा...
बैटिंग पहले मिलती है और पिच सपाट है तो कम से कम सवा तीन सौ से ऊपर रन टांगने होंगे यदि इंग्लैंड को दबाव में लेना है तो...
और यदि इंग्लैंड पहले बैट करता है तो भी कप्तान Andrew Strauss , Kevin Pietersen , Matt Prior , Ian BellPaul Collingwood सब से सब शानदार फॉर्म में चल रहे हैं... निचले क्रम में आज की इंग्लैंड टीम के पास ऐसे बल्लेबाज भी हैं जो 'लाँग हैंडल' भी इस्तेमाल कर सकते हैं... यानी इंग्लैंड टीम हर स्थिति में चैलेंजिंग टोटल स्कोर करेगी... यानी हमें मैच अपनी बल्लेबाजी से ही जीतना होगा...

अगर तेज गेंदबाजी की बात करें तो इंग्लैंड के James Anderson , Tim Bresnan और Stuart Broad तीनों अच्छी गेंदबाजी कर रहे हैं... हमारी तेज गेंदबाजी उनके मुकाबले काफी कमजोर नजर आती है... कागज पर भी और मैदान पर भी...

इस विश्व कप में इंग्लैंड भी केविन पीटरसन को ओपनर के तौर पर खिला कर एक नया प्रयोग कर रहा है... पीटरसन अच्छे फिनिशर के तौर पर जाने जाते हैं व उनके मध्यक्रम की रीढ़ कहे जाते हैं... यह प्रयोग मुझे तो सही नहीं लगता... ठीक इसी तरह मुझे सचिन का गंभीर की जगह सहवाग के साथ ओपन करने उतरना भी सही नहीं लग रहा... मुझे लगता है कि गंभीर सहवाग के ओपनिंग साथी के तौर पर ज्यादा बेहतर है क्योंकि उसके होने से दोनों छोरों से तेजी से रन मिलते हैं और इस समय वह आत्मविश्वास से भरा व सहज खेल रहा है... सचिन अभी भी सहज नहीं लग रहे, वह अपने अंतिम विश्वकप में अच्छा परफॉर्म करने के बोझ तले दबे से नजर आ रहे हैं...

युवराज के लिये यह मैच अहम रहेगा... उनके आगे के कैरियर की दशा-दिशा तय हो सकती है इससे... यह भी देखना रोचक रहेगा कि स्टुवर्ट ब्रोड को युवराज कैसा खेलते हैं... जिन्हें इस प्रतिद्वंदिता के बारे में नहीं पता वह ब्रोड के एक ओवर में युवराज द्वारा मारे गये छह छक्कों का यह वीडियो अवश्य देखें...

अपना दिल तो चाहता है कि आज भारत ही जीते... पर दिमाग बार-बार यह कह रहा है कि थोड़ा पलड़ा इंग्लैंड का ही भारी है...

चलिये देखते हैं क्या होता है...


क्रिकेट मसाला:-

आज बात करेंगे लेग स्पिन की... पर पहले यह बताइये कि क्या आपने बॉल ऑफ द सेंचुरी देखी है...

यदि नहीं तो नीचे दिये यूट्यूब लिंकों पर जाकर अवश्य देख लीजिये ...

हर किसी को एक बार जरूर देखना चाहिये इसे...

यू-ट्यूब लिंक- १

यू-ट्यूब लिंक- २

यू-ट्यूब लिंक- ३

दाहिने हाथ के गेंदबाज व दाहिने ही हाथ के बल्लेबाज के लिये लेगस्पिन वह गेंद कहलायेगी जिसने ठप्पा लेग स्टंप या मिडिल स्टंप पर खाया हो तथा टर्न होकर ऑफ स्टंप या ऑफ स्टंप के बाहर की ओर आये... इसके लिये बॉलर गेंद को डिलीवर करते समय उसे एन्टीक्लॉक वाइज घूर्णन (spin) देता है... लेकिन यदि लेगस्पिनर द्वारा फेंकी गई गेंद ऑफ स्टंप से लेग की ओर टर्न ले तो वह गुगली (googly) या 'रॉंग वन" (wrong'un) कहलायेगी... जो लेगस्पिनर का प्रमुख हथियार है...

देखिये महान लेगस्पिनर अब्दुल कादिर द्वारा डाली यह बेहतरीन गुगली गेंद !

वैसे यह भी बता दूँ कि स्पिनरों की गेंदों को मिलने वाले टर्न व लिफ्ट (उछाल) के पीछे भौतिकी के जो दो सिद्धान्त काम करते हैं वे हैं Law of conservation of momentum Law of conservation of energy ...


आभार!





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रविवार, 20 फ़रवरी 2011

सामने रनों का पहाड़ था, और शेर दहाड़ा ही नहीं !!!

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मेरे ' नीले (Blue)' मित्रों,

भारत के बांग्ला शेरों के साथ हुऐ पहले मैच का स्कोरकार्ड आपके सामने है... न जाने क्या सोच बांग्ला कप्तान ने टॉस जीत पहले फील्डिंग करी... परंतु अगर उन्होंने यह सोच कर ऐसा किया कि भारत के स्कोर को चेज करना आसान रहेगा तो यह साफ दिखलाता है कि कितना कमजोर गेंदबाजी आक्रमण लेकर उतरे हैं हम...

बहरहाल सहवाग चले और क्या खूब चले... वैसे उनका बड़े मैचों में चलना ज्यादा जरूरी है... मनाईये कि Law of averages उनको किसी बड़े मैच में न पकड़े...

विराट उम्मीदों पर खरे उतरे और सैकड़ा जड़ दिया... वह आश्वस्त करती बैटिंग करते नजर आये... यह खिलाड़ी इस कप में काफी कुछ और करेगा...

सचिन और गंभीर भी जितने समय विकेट पर रहे, रन-ए-बॉल की गति से स्कोर किया... परंतु मुझे यह समझ नहीं आया कि पंद्रह बॉल बाकी रहते और अच्छा स्कोर टंगने के बाद भी युसुफ पठान युवराज से ऊपर क्यों भेजे गये... युसुफ ने दस गेंदो में आठ रन किये और बाउन्ड्री एक भी नहीं की... धोनी की तरह ही उनको भी कुटाई शुरू करने से पहले दस पंद्रह गेंदें खेलने की जरूरत होती है... जबकि युवराज आते ही पहली गेंद पर शॉट खेल सकता है... यदि बल्लेबाजी क्रम का यह परिवर्तन इस बात का संकेत है कि टीम प्रबंधन को ही युव्वी पर भरोसा नहीं रहा तो बहुत गंभीर मामला है यह...

चेज के दौरान बाँग्ला खिलाड़ी कभी भी जीत का प्रयास करते नहीं दिखे... बाँग्लादेश ने भारत के खिलाफ कभी भी ३०० का आंकड़ा नहीं छुआ है... शायद यह बात उनको दबाये रही... इमरूल केयस काफी क्लीनहिटर व आत्मविश्वास से भरा लगा...

श्रीसंथ की बहुत पिटाई हुई, उनको जल्दी से जल्दी इससे उबरना होगा... जहीर धारदार दिखे व हरभजन भी ठीकठाक गेंद डाल ले गये... मुनाफ को विकेट तो मिले पर उसमें बल्लेबाजों द्वारा खुद की गई गल्तियों का ज्यादा योगदान रहा...

हमारी फील्डिंग कमजोर रही और हमेशा की तरह १०-१२ अतिरिक्त रन विरोधी को भेंट किये गये...

ज्यादा चिंता की बात यह सही कि बांग्लादेश जैसी कमजोर माने वाली टीम भी चेज करते समय हमारे खिलाफ २८३ रन कर गई... अब हर मैच में ३०० से ज्यादा रन तो मिलने नहीं हमको... तो बहुत ही जल्दी अपनी गेंदबाजी ब फील्डिंग को सुधारना होगा टीम इंडिया को ...

अगला मैच २७ फरवरी को होगा बेंगालुरू में इंग्लैंड के साथ... बहुत थोड़ा सा पलड़ा इंग्लैंड का भारी नजर आता है मुझे गेंदबाजी के कारण...

अपनी आप बताइये...




क्रिकेट मसाला :-

फास्ट या मीडियम पेसर द्वारा हवा में फेंकी गई गेंद का टप्पा खाने के पहले मूवमेंट स्विंग कहलाता है... जिन्होंने कभी क्रिकेट नहीं खेला उनके लिये बता दूँ कि यदि दाहिने हाथ के बल्लेबाज को आती हुई गेंद देख यह लगता है कि गेंद ऑफस्टंप के बाहर पहली स्लिप की ओर जायेगी तथा वह इसी हिसाब से उसे खेलता है परंतु गेंद अंदर आकर उसका मिडिल स्टंप उखाड़ देती है या वह ठीक विकेट के सामने पगबाधा आउट हो जाता है तो यह हुआ इनस्विंग... और यदि दाहिने हाथ के बल्लेबाज को लगता है कि गेंद उसके मिडिल या ऑफ स्टंप पर आ रही है वह डिफेंड करता है परंतु गेंद उसके बल्ले का बाहरी किनारा ले विकेट कीपर या स्लिप के हाथों में समा जाती है तो यह हुआ आउटस्विंग...

स्विंग के लिये जरूरी है कि गेंद का आधा हिस्सा चिकना रहे व आधा खुरदुरा... आपने देखा भी होगा कि टीमें गेंद के एक हिस्से को बारबार कपड़े से रगड़कर, थूक व पसीना लगाकर एक हिस्से को चिकना रखने का प्रयास करती हैं... यही चिकना हिस्सा जिस दिशा की ओर रहेगा गेंद हवा में उसी ओर मूव होगी...

स्विंग के पीछे Bernoulli's theoremCoandă effect काम करते हैं... हवा से भारी हवाई जहाज भी इन्हीं प्रभावों के कारण उड़ पाते हैं...

हिन्दी में भी यह जानकारी आप यहाँ देख सकते हैं।






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चित्र साभार : Google images


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शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

दे घुमा के !

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मेरे 'क्रिकेट-दीवाने' मित्रों,

तो कल शुरू हो गया क्रिकेट का यह महाकुंभ ढाका में... अच्छा समारोह था... परंतु सच कहूँ तो चौदह कप्तानों की मानव चालित सजे हुऐ रिक्शों में एंट्री खली... एक ऐसा समारोह जिसे पूरी दुनिया देख रही थी उसमें आदमी द्वारा आदमी को खींचे जाते रिक्शों को दिखा बांग्लादेश क्या दिखाना चाह रहा था, मेरी समझ से बाहर है... भारतीय उपमहाद्वीप के बारे में पश्चिम की एक पुष्ट धारणा है कि हम भूख-गरीबी-साँप-संपेरों-जहालत-असमानता-विरोधाभासों-पाखंड से भरे देश हैं... और इस प्रदर्शन ने उस धारणा को और पुष्ट किया...

दे घुमा के !
दे घुमा के !!-(यू-ट्यूब लिंक)
दे घुमा के !!!(MP3 डाउनलोड लिंक)

उत्तरप्रदेश के आजमगढ़ के मनोज यादव का लिखा व शंकर-एहसान-लॉय द्वारा गाया संगीतबद्ध यह गाना अच्छा बन पड़ा है... पर क्रिकेट केवल 'दे घुमा के' नहीं है... यह आगे आपको बताउंगा...


कल की पोस्ट में मैंने आठ खिलाड़ियों की चर्चा की थी...

अब आगे...

युसुफ पठान : बड़ौदा का यह खिलाड़ी खेल का रूख एकदम बदल सकता है... अगर चल निकला तो मैदान के हर हिस्से में शॉट मार सकता है बस उसे थोड़ी विड्थ (Width) चाहिये... बदन के ऊपर आती तेज गेंदें उसकी कमजोरी हैं विरोधी टीमें इसका फायदा उठा सकती हैं पर शरीर पर चोट खाकर भी टिके रहने का माद्दा है उसमें... स्लिप पर उम्दा कैचर है व पाँचवे बॉलर के तौर पर चार-पाँच ओवर भी मिलेंगे युसुफ को...

आर अश्विन : आईपीएल व घरेलू सत्र में इस खिलाड़ी ने उम्दा प्रदर्शन किया है... बॉलिंग पर बेहतर नियंत्रण है... निचले क्रम पर कुछ रनों की उम्मीद भी है उनसे... दूसरे स्पिनर के तौर पर पीयूष चावला के मुकाबले वह बेहतर ऑप्शन हैं...

पीयूष चावला : मुरादाबाद का यह लेग स्पिनर खिलाड़ी स्पिनर फ्रेंडली पिचों पर बेहद मारक है... पर उसका छोटा कद उसके खिलाफ भी जाता है... सपाट पिच जिस पर न उछाल हो न टर्न उस पर चावला की गेंद कम ऊँचाई से डिलीवर होने के कारण अन्य की अपेक्षा नीची रहेगी और पिटाई भी खूब होगी... पर अच्छी बात यह है कि वह बॉल को फ्लाईट देने से नहीं डरता... मेरे विचार में केवल टीम के लिये 'टेलरमेड' पिचों पर मौका मिलेगा उसे...

हरभजन सिंह : अगर टीम को कप जीतना है तो हरभजन का चलना जरूरी है... वह हर स्थिति में विकेट दिला सकता है... हाल के कुछ समय में उसने अपनी बल्लेबाजी बहुत सुधारी है और काफी रन भी करेगा वह इस बार... भारत के स्पिन गेंदबाजी आक्रमण की कमान होगी हरभजन पर इस बार...

एस श्रीसंथ : इसे Blessing in Disguise ही कहूँगा कि प्रवीण कुमार को चोट लगी और श्रीसंथ टीम में आये... उसमें जोश है जुनून है और सबसे बड़ी बात जो है वह है १४०-१४५ किमी० के आसपास गति से बॉल फेंकने की क्षमता... १२५ किमी०/घंटा की गति से गेंद फेंकने वाले प्रवीण कुमार को यद्मपि धोनी चेन्नई सुपर किंग्स के जोगेंदर शर्मा की तरह अपना लकी मैस्कट मानते हैं पर उपमहाद्वीप की पिचों पर जहाँ न गेंद ज्यादा सीम होती है, न स्विंग और न ही ज्यादा उछाल मिलता है वहाँ प्रवीण कुमार की खूब पिटाई होती !

आशीष नेहरा : चोट रहित रहे तो आशीष नेहरा अच्छा बॉलर है, उसके पास गेंद को दोनों तरफ स्विंग कराने की कला है... पर यदि टीम ने दो ही पेसर खिलाये तो उसकी जगह नहीं बनेगी... नेहरा की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि यदि शुरूआत में उसे विकेट मिल गया तो पूरा स्पैल अच्छा रहेगा... पर यदि शुरूआत में ही किसी बल्लेबाज ने पिटाई कर दी तो नेहरा की गेंदबाजी एकदम बिखर जाती है...

मुनाफ पटेल : मुनाफ का आगाज हुआ था एक्सप्रेस फास्ट बॉलर के रूप में... पर समय के साथ उन्होंने अपनी रफ्तार खो दी... आजकल १३० किमी०/घंटा के आसपास की रफ्तार से गेंद फेंकते हैं वे... विकेट टू विकेट बालिंग करते हैं... फील्डिंग बहुत ही कमजोर है, धोनी को उन्हें फील्ड में छुपाने के लिये काफी दिमाग लगाना पड़ेगा... सपाट पिचों पर जमे हुऐ बल्लेबाजों के लिये मुनाफ को खेलने में कोई मुश्किल नहीं आने वाली...

जहीर खान : इस भारतीय गेंदबाजी आक्रमण का 'स्पीयरहेड' है यह खिलाड़ी... समय के साथ जहीर की रफ्तार कम हुई है पर बहुत बढ़ गया है उसका ' ट्रिक्स ऑफ द ट्रेड ' का खजाना... मनाइये कि वह २००३ के फाइनल जैसी गलती दुबारा न करे जहाँ उसके ओवर-अग्रेसन के कारण आस्ट्रेलियाई इतने चार्ज हुऐ कि उन्होंने इतने रन टांग दिये कि चेज करने वाली कोई भी टीम न बना पाये...

कुल मिलाकर हमारी बल्लेबाजी ठीकठाक है पर गेंदबाजी कोई ज्यादा विश्वास नहीं जगाती...

मेरे विचार से पहले मैच की प्लेईंग इलेवन होगी...

वीरू
गंभीर
सचिन
युवराज
विराट
माही
युसुफ
अश्विन
हरभजन
श्रीसंथ
जहीर

बल्लेबाजी क्रम भी कमोबेश यही रहेगा...

देखते हैं आगे क्या होता है...



क्रिकेट मसाला

यह खेल जितना मैदान पर खेला जाता है उससे ज्यादा दिमाग में भी... एक मैच की बात बता रहा हूँ लिमिटेड ओवर मैच था... मैं अंपायर था... बॉलिंग करने वाली टीम के सब अच्छे बॉलर अपना कोटा खत्म कर चुके थे... पार्ट टाइम बॉलर गेंद डाल रहा था महज दो रन और बनाने थे... आखिरी जोड़ी थी मैदान पर... बल्लेबाज अभी तक बहुत सेसिबली टुक-टुक कर एक एक रन जुटा रहे थे... अचानक विकेटकीपर स्लिप पर खड़े फील्डर से जोर-जोर से कहने लगा (अपने ही बॉलर के बारे में)... " इस _ _ या की बॉल पर तो मेरी भाभी भी छक्का मार देगी, पर आज देखो कितने भाव मिल रहे हैं "... और फिर वही हुआ जो ऐसे में अक्सर होता है... अगली ही गेंद पर बल्लेबाज पूरी ताकत से बल्ला घुमाते क्रीज से बाहर निकला... और स्टंप आउट !

मुझ से हाथ मिलाते हुऐ विकेटकीपर ने आँख मारी और बोला " देखा ! पहना दी ना टोपी, _ ले _ _ या को "





आभार!






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चित्र साभार : Google images




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गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

आह क्रिकेट ! वाह क्रिकेट !! इक बार फिर से हम सभी को लुभा क्रिकेट !!!

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मेरे ' क्रिकेटप्रेमी ' मित्रों,

टेलीविजन से अपना बस इतना ही नाता है कि उसे स्वयं स्विच ऑन केवल पाँच वजहों से ही करता हूँ मैं...

सबसे पहली वजह है खबरें... दूसरी क्रिकेट... तीसरी फुटबाल... चौथी बॉक्सिंग... और आजकल कुछ समय से Zee TV का कार्यक्रम DID Doubles...

और आज से तो शुरू हो रहा है क्रिकेट का महाकुंभ ही...

एक ऐसा देश जहाँ अक्सर मिलने वाली खबरें होती हैं घोटालों की, सरकारें बचाने-चलाने को समझौते करते, जनता की संपत्ति की लूट की अनुमति देते साफ-सुथरों की, खेल कराने के नाम पर हजारों करोड़ के वारे न्यारे करते खेल प्रशासकों की,राष्ट्रहित को ताक पर रख केवल और केवल अंतर्राष्ट्रीय आडियेन्स के लिये मुँह खोल राष्ट्रद्रोही बातें करते मानवाधिकारवादियों व अभिव्यक्ति स्वतंत्रतावादियों की...

वहाँ पर आज केवल यही खेल है जो हम सबको देता है हंसने-मुस्कुराने-खुशियाँ मनाने के कुछ लम्हे...


अब कप खेलना है तो टीम भी होगी ही... आज चर्चा करते हैं अपनी टीम इंडिया के बारे में...




वीरेन्द्र सहवाग : वीरू अगर पचास फीसदी दिन भी चल निकले और पंद्रह ओवर तक भी खेल गये तो पैसा वसूल ! मनाइये कि वह बड़े मैचों में चले ...

गौतम गंभीर : इस विश्व कप में मैं अपना दाँव गंभीर पर लगाना चाहूँगा... उनकी बॉडी लेंग्वेज और आँखें यह बताती हैं कि कुछ करने की ठाने है यह खिलाड़ी इस बार...

सचिन तेंदुलकर : सचिन को देख अब यह नहीं लगता कि अपने खेल को पूरी तरह इन्जॉय कर खेल रहा है यह खिलाड़ी... अक्सर वह अपनी और देश की उम्मीदों के नीचे डूबे नजर आते हैं... यदि एक आखिरी बार फिर से पूरा आनंद ले खेलना शुरू कर दे तो एक नई इबारत लिख देंगे वे... अन्यथा औसत ही रहेगा यह कप उनके लिये...

युवराज सिंह : युवराज में इस समय आत्मविश्वास की कमी साफ झलक रही है... क्रिकेट के खेल में बाजार बहुत अहम है औेर शायद इसीलिये युवराज भी टीम में है...

विराट कोहली : न जाने मुझे क्यों लगता है कि विराट इस विश्व कप का सितारा होगा... मैदान पर उसकी मौजूदगी ही बार बार आपको आश्वस्त करती है कि वह हार नहीं मानेगा आखिर तक... अच्छे फिनिशर के तौर पर भी विकसित हो रहा है यह खिलाड़ी...

सुरेश रैना : रैना के पास ताकत है बॉल यदि बल्ले से कनेक्ट होती है तो मिस्टाइम्ड शॉट भी सीमारेखा से बाहर होता है... पर छोटी और तेज बॉल ( फास्ट बाउंसर ) उसकी बहुत बड़ी कमजोरी है... दूसरा एक सवाल यह भी है कि प्लेइंग इलेवन में उनको जगह मिलती है या युसुफ पठान को...

महेंद्र सिंह धोनी : माही मेरी कमजोरी है इसलिये कि भले ही झारखंड में पला-बढ़ा हो पर यह खिलाड़ी कुमाँउनी मूल का है, मेरी ही तरह.... उसके पास शॉट हैं, टेम्परामेंट है, स्ट्रीट स्मार्ट है, अच्छा क्रिकेटीय-दिमाग है, सबसे बड़ी बात वह स्वयं ही कप्तान भी है... पूरी उम्मीद है कि अच्छा खेलेगा यह खिलाड़ी...

अभी इतना ही...

बाकी के आठ खिलाड़ियों के बारे में कल...

मिलेंगे न!






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चित्र साभार: गूगल इमेजेज

सोमवार, 14 फ़रवरी 2011

तो 'ईश्वर' क्या आप केवल मर्दों के ही हो ?... दे ही दो आज जवाब !!!

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वैसे तो मैं आपको जानता-मानता नहीं
पर मेरे भाई लोग अक्सर बताते हैं
कि आप ही ने बनाई यह सारी दुनिया
और उसी समय ही बनाया हम सबको भी

आपके लिये कुछ असंभव नहीं बताते हैं
फिर भी आपने कभी नहीं दिया दर्शन
पु्री दुनिया के सारे इंसानों को एक बार
न ही आपने बतलाया उन्हें साफ-साफ
क्या और कैसे करना है आपकी दुनिया में
किस तरह से पूजने से होते हो प्रसन्न

इस सब को सिखलाने के लिये आपने भेजे
अवतार, सिद्ध पुरूष व अपने संदेशवाहक भी
जो न जाने किस तरह का बोल-लिख गये
कि आज तक उसका सही अर्थ निकालने में
लगे हुऐ हैं आपके हर तरह के मानने वाले

इन्हें अपना-अपना अर्थ इतना प्यारा है
कि दूसरा कोई अर्थ बताने वाले को
मार कर भी यह इठलाते फिरते हैं
कि ऐसा कर यह आप के और प्यारे होंगे

आपके हुक्म का पालन करने के दंभ में
यह सब अब पीछे पड़ गये हैं औरतों के

कैसे कपड़े वह पहने,रखे कितने लंबे बाल
कब और किसके साथ निकले घर से बाहर
क्या काम वह करे और क्या न करे कभी
क्या है उसका फर्ज, किस उम्र मे हो शादी
बच्चे कब जने, कितने जने औ पाले कैसे

बिता दे जिंदगी बेटी-बहन-माँ ही रहने में
न हो उसका अलग कोई वुजूद न विचार ही
वह केवल और केवल पुरूष की संपति मात्र है
भूल जाये एकदम वह कि वह भी लेती है साँसे
भूल जाये वह कि उसका भी एक नजरिया है

बातें तो अभी बहुत सी हैं पर मुझे पूछना है
यह सब आपने वाकई कहा है औरतों के लिये
बता दिया पुरूषों को, ताकि लागू कर दिया जाये

तो कुछ तो औरतों को भी बताया होगा ही
कि आपके ख्याल से मर्द को कैसे रहना चाहिये

अगर नहीं बताया आज तक यह आपने कभी
तो 'ईश्वर' क्या आप केवल मर्दों के ही हो ?



कब दोगे जवाब ?







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चित्र साभार :Google images




बुधवार, 9 फ़रवरी 2011

ओऊर फुतुरे इस भैरी-भैरी दार्क !!!

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मेरे ' ब्राईट ' मित्रों,

एक मेरा सुना हुआ परंतु एकदम सच किस्सा सुनिये पहले तो...

डिग्री के इम्तहान की मौखिक परीक्षा चल रही है... बाहरी परीक्षक एक परीक्षार्थी की नाकाबलियत से परेशान हो चुका है और नाराज हो कहता है कि तुम्हें अपने विषय का ज्ञान तो है ही नहीं ऊपर से आप तुक्काबाजी भी कर रही हो... " नहीं नहीं सर जी, मैंने पढ़ा है सब पर क्या करूँ मेरा नटूरे ही ऐसा है कि मैं आपके सामने कुछ बोल नहीं पा रही हूँ... यह नटूरे क्या है ? परीक्षक दहाड़ा... वो सर N-A-T-U-R-E = नटूरे, शर्माते हुऐ बोली वह लड़की...

अब परीक्षक के गुस्से का कोई ठिकाना ही नहीं... तुम पास होने के एकदम लायक नहीं... वह बेचारी सुबकते हुऐ अपने Internal Examiner को बुला लाई... आते ही उन्होंने External Examiner को कहा... " यह क्या कह रहे हैं सर, ऐसा करेंगे तो बेचारी का तो फुतुरे ही बरबाद हो जायेगा...

फुतुरे = F-U-T-U-R-E

यदि अतिशयोक्ति लग रही हो तो आपको बता दूँ कि रिटायरमेंट के करीब पहुँचे अपने एक प्रोफेसर साहब को Muscle को अपने हर लेक्चर के दौरान मुसुल्ल कहते हुऐ तो मैंने भी सुना है इन्हीं कानों से

शाहजहाँ पुर में भेड़ बकरियों की मानिंद ट्रेनों की छतों पर लदे लड़कों के साथ हुआ हादसा जिसमें कईयों की जान गई व कईयों को जिंदगी भर के लिये लाचार होना पड़ा तो याद ही होगा आपको... मात्र ४०० पद थे... वह भी ट्रेडमैनों के...
यानी कुक, सफाईकर्मी, नाई, धोबी, मसालची, बढ़ई, मोची आदि आदि के... पर उमड़ पढ़ी लाखों की भीड़ सिर्फ यह सोचकर कि यहाँ चयन आसान होगा... पहले ऐसा होता भी था, ट्रेडमैन के पद के लिये बहुत कम लोग आते थे... इसी उम्मीद में थे यह लड़के भी...

आजकल उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में विकास विभाग के अंतर्गत ग्रामसभाओं में सफाईकर्मियों कि नियुक्ति के विज्ञापन निकले हैं... और खबरे हैं कि महज कुछ सौ पदों के लिये लाखों की तादाद में प्रार्थनापत्र आ रहे हैं... पोस्टग्रेजुएट यहाँ तक कि उससे भी बड़ी डिग्रियाँ लिये अभ्यर्थियों के भी...

लगभग यही हाल रेलवे में गैंगमैन की परीक्षा तक का होता है, कई अभ्यर्थी ईंजीनियरिंग में डिग्री या डिप्लोमा होल्डर तक थे... प्राइमरी मास्टर की नौकरी के लिये डेंटल सर्जन तक अप्लाई कर रहे हैं...

हुआ क्या है कि शिक्षा के निजीकरण व उदारीकरण की इस अंधी दौड़ में गुणवत्ता का कोई ध्यान नहीं रखा जा रहा... पढ़ाने वाले पढ़ाने काबिल नहीं... पढ़ने वाले पढ़ने की जरूरत नहीं समझते... परीक्षायें मैनेज की जाती हैं संस्थानों द्वारा... सेवारत जज तक नकल कर रहे हैं...


आज हमारी डिग्रियों की कीमत उनमें लगे कागज जितनी भी नहीं रही है...

ओऊर फुतुरे इस भैरी भैरी दार्क !!!

आप क्या कहते हैं ?







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रविवार, 6 फ़रवरी 2011

क्यों इस लड़ाई को हार रही हैं भारतीय महिलायें... आखिर क्यों ???

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मेरे ' खाते-पीते ' मित्रों,

खास आपके लिये एक खासमखास खबर है एक दम ताजा ...

वह यह कि भारतीय महिलायें हार रही हैं इस महान युद्ध में ... विश्वास नहीं आता तो खुद दिये लिंक को चटकायें और पढ़ लें...

अब ऐसा हो रहा है यह तो बिल्कुल पक्का है...

हार्वर्ड व इम्पीरियल कॉलेज, लंदन की यह स्टडी गलत तो नहीं ही कहेगी... पर क्या यह सब ऐसा होने के पीछे कुछ आर्थिक, सामाजिक, समाजशास्त्रीय, पारिवारिक, नारीअधिकारवादी, व्यवहारशास्त्रीय, चिकित्सकीय, हॉरमोनल, ज्योतिषिय, वास्तुशास्त्रीय, फेंग-शुयीय, रत्न शास्त्रीय, भूमंडलीकरण आदि आदि वजहें हैं...

या मेरा यह सोचना ही सही है कि आज का भारतीय पुरूष अब अपने जीवन में आने वाली स्त्रियों के प्रति भारतीय इतिहास के किसी भी अन्य दौर के बजाय ज्यादा संवेदन शील है...
( आदरणीय अरविन्द मिश्र जी भले ही विपरीत बात कहें )...

सच कहूँ तो अपने जीवन में आने वाली स्त्रियों को लाड़-दुलार कर, पैम्पर कर व इसी प्रक्रिया में जाने अनजाने जबरिया ज्यादा व 'रिच' खिलाकर इस लड़ाई में हरवा रहा है भारतीय पुरूष... मैं भी... कहीं रेस्त्राँ में जाते हैं तो मेरा आर्डर होता है केवल 'ब्लैक टी' अपने लिये तथा रेस्त्राँ स्पेशल पिज्जा, कोक व आईसक्रीम बिटिया व पत्नी के लिये... चॉकलेट मैं कभी नहीं खाता पर महिलाओं को देने के लिये रहती हमेशा हैं मेरी कार में...

यदि आप स्वयं एक पुरूष हैं...

तो सोचिये कहीं आप भी तो ऐसा ही नहीं करते...

और यदि आप स्वयं एक महिला हो...

तो क्या बताने की जरूरत है मुझे ?

कि क्या करना है अगली बार... ;))


हा हा हा हा...





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डिस्क्लेमर : यह पोस्ट एक निर्मल हास्य है व इसे उसी तरह लिया भी जाये !

चित्र साभार :गूगल चित्र

गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

एक हैं श्रीमान ऐतबारी लाल, क्या आपने उनकी मचान देखी है कभी ??? ...

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मेरे ' जमीनी ' मित्रों,

आज एक किस्सा सुनाने का मन है...

हाँ तो दोस्तों, एक थे श्रीमान ऐतबारी लाल... अब जैसा उनका नाम था उसी तरह के उनके काम भी थे... मतलब जिस चीज पर वो ऐतबार कर लेते थे, उस से उनका विश्वास फिर किसी भी विपरीत तर्क या तथ्य के सामने आने पर भी डिगता नहीं था...

ऐतबारी लाल जी के घर के आंगन में एक बहुत विशाल, घना व ऊँचा पेड़ था... अब आप कहोगे कि ऐसे पेड़ तो अनेकों होते हैं इसमें क्या खास था... तो साहब, इस पेड़ के ऊपर एक विशाल मचान बनी थी... जिसे शायद बहुत पहले कभी ऐतबारी लाल जी के किसी पुरखे ने बनाया था... मचान क्यों व किसके लिये बनाई गई थी यह आज के रोज किसी को नहीं पता... पर यदि बनी है तो कभी उसका कोई मकसद रहा ही होगा, यह सब मानते थे... इतनी पुरानी होने के बावजूद भी वह मचान थी अभी भी ठीक-ठाक, एकदम पुख्ता...

अब एक दिन श्रीमान ऐतबारी लाल को न जाने क्या सूझी... चढ़ गये मचान पर... घरवालों ने सोचा कि थोड़ी देर में उतर आयेंगे... पर यह क्या... ऐतबारी लाल जी ने तो अपना रोजमर्रा का सामान भी मंगा लिया ऊपर... और कुछ ही दिनों में ऐतबारी लाल वहीं रहने लगे...

ऊपर रहते रहते एक दिन अचानक ऐतबारी लाल जी के दिमाग में विचार आया कि " असली जीवन अगर कहीं है, तो वह है मचान पर ही "... यह विचार जल्दी ही उनके विश्वास में बदल गया... और धीरे-धीरे यह विचार इतना जोर पकड़ गया कि उसने उनके पूरे किरदार, पूरे वजूद पर ही कब्जा कर लिया...

फिर वही हुआ जो होना था... ऐतबारी लाल जी के लिये दुनिया ही बदल गई... वो हर किसी आते जाते से चिल्ला-चिल्ला कर कहने लगे कि अगर असली जिंदगी जीनी है तो ' रहो मचान पर '... उन्होंने इस आशय के पर्चे छपवा लिये... एक लाउडस्पीकर भी लगवा लिया... और तो और ' मचान पर रहना ही सबसे सही है ' इस विचार के प्रचार में कोई कमी न रह जाये इसलिये उन्होंने कुछ ब्लॉग भी बना लिये इस प्रचार के लिये...

जब तब ऐतबारी लाल जी से कोई आता-जाता उलझने भी लगता था... कुछ कहते थे कि तेरे मचान पर ऐसा क्या है जो मेरे घर में नहीं... कुछ ऐसे भी होते थे जिन्होंने देखी होती थी ऐतबारी लाल जी की निगाहों से परे की वह दुनिया भी... ' जिसमें अथाह समंदर भी हैं और ऊँचे पहाड़ भी, जीवंत शहर हैं और उजाड़ रेगिस्तान भी, आबाद सुप्त ज्वालामुखी भी हैं और बर्फ से बने मकान भी... यह लोग ऐतबारी लाल को अपने उन सफरों के बारे में बताते थे, खींचे हुऐ फोटो दिखाते थे, समझाते थे... ऐतबारी लाल जी भी उन सबकी बातें बहुत सम्मान से सुनते थे, अपनी सामर्थ्य भर उनका स्वागत सत्कार भी करते थे...

पर एक बात जो हमेशा निश्चित रहती थी वह यह थी कि ऐसे हर वार्तालाप, हर बहस, हर भिडंत के बाद श्रीमान ऐतबारी लाल हाथ में माइक्रोफोन लिये मचान से भी ऊपर की डालियों पर चढ़ कर लाउड स्पीकर पर एक बार फिर जोर से हुंकारा भरते थे... " चाहे कुछ भी हो, असली जिंदगी कहीं है, तो है मचान पर ही, सब लोग अपने लिये मचान बना ही लो "


अपने इर्द गिर्द देखों दोस्तों, तो आपको बहुत से ऐतबारी लाल दिखेंगे अलग अलग किस्मों की मचान पर चढ़े हुऐ...

कुछ 'धर्म की मचान' पर चढ़े हैं तो कुछ 'आध्यात्म' की मचान पर...
कुछ 'बौद्धिक आभिजात्य' की मचान पर चढ़े हैं तो कुछ 'भाषाई शुद्धता' की मचान पर...
कुछ 'सही-आहार' की मचान पर चढ़ बैठे हैं तो कुछ 'पुरखों के ज्ञान' की मचान पर...
कुछ की मचानों पर चढ़ने में मुहुर्त देखे जायेंगे तो कुछ पर चढ़ने के लिये आपको अपनी कॉमनसेन्स को नीचे ही छोड़ना होगा...

बस एक बात जो हर जगह समान होगी वह है कि आपको सभी यह कहेंगे कि जिंदगी अगर है तो मेरी जैसी मचान पर ही..

मैं तो अक्सर टटोलता हूँ, सतर्क रहता हूँ आप भी आज देख ही लीजिये... बहुत दिनों से एक जगह बैठे-बैठे कहीं कोई मचान तो नहीं उग आई आपके पैरों के नीचे भी... जमीन मत छोड़िये अभी से, अभी तो हमने दुनिया में देखा ही क्या है...

अपनी जमीन को जानने-नापने के इस सफर में आप साथ तो रहोगे न ?





आभार!





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चित्र साभार :गूगल चित्र