रविवार, 2 जनवरी 2011

दंभी बौद्धिक आभिजात्य (Elitist Intellectual Snobbery) हिन्दी ब्लॉगिंग के लिये सबसे बड़ा खतरा बन कर उभरा है!

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मेरे ' आम ' मित्रों,

वो कहते हैं न खाना अभी ठीक से परोसा भी नहीं गया... लूटने चील-कौव्वे पहले आ गये... बीते साल के हिन्दी ब्लॉगिंग के परिदॄश्य को यदि आपने भी देखा होगा... तो मुझ जैसा ही कुछ न कुछ लगा जरूर होगा आपको...

दंभी बौद्धिक आभिजात्य (Elitist Intellectual Snobbery) हिन्दी ब्लॉगिंग के लिये सबसे बड़ा खतरा बन कर उभरा है... नाम तो नहीं लूंगा किसी का... पर एक गिरोह उतर आया है हिन्दी ब्लॉगिंग में... जो एक तरफ तो अकादमिक-साहित्यिक दुनिया के घिसे-पिटे हुए नामों को येन-केन प्रकारेण हिन्दी ब्लॉगिंग का चमकता नक्षत्र ब भाग्य विधाता स्थापित व सिद्ध करने पर तुला है... दूसरी तरफ यही गिरोह अपनी पोस्टों व टिप्पणियों के माध्यम से एक ऐसा माहौल बनाने में जुटा है कि इनका गिरोह के सदस्य तो केवल आपस ही में एक दूसरे की पीठ खुजायें ही... नया पाठक भी गिरोह से बाहर के ब्लॉगरों को पढ़ना ही एक हेय कृत्य समझ बैठे...

इनके कुछ सैट जुमले हैं...

" अमाँ तुम जाते ही क्यों हो उस _ _ _ _वादी के ब्लॉग पर, मैं तो वहाँ झाँकता तक नहीं "
" फलाना लिखता क्या खाक है, अखबारी खबरों पर ही पोस्ट बना देता है "
" सेल्फ हेल्प बुक्स व मोटिवेशनल चार्ट्स के अनुवाद को छाप देने से क्या कोई ब्लॉगर बन जाता है "
" वो तो बिना अंग्रेजी के शब्द बीच में डाले पोस्ट ही नहीं लिख सकता "
" चुटकुले और तुकबंदियाँ क्या ब्लॉगिंग कहलायेंगी "
" उस के लिखे में न लय है न छंद और न बहर "
" आलतू फालतू के ब्लॉग पर जाकर टिप्पणी देने या बहस करने के बजाय अगर अपनों तक ही सीमित रहते तो दो-चार कालजयी रचनायें(???) और ठेल दिये होते "
" अलाना-फलाना चाहे कितने भी पाठक जुटा ले या पोस्टें ठेल दे, ब्लॉगिंग के इतिहास में उसके लिये कोई जगह नहीं होगी "
" अपनी पोस्ट की तुम शुरूआत मेरी उस पोस्ट जैसी करते और अंत फलाने जैसा तो शायद मेरे पसंद करने लायक बन पाती "
" अभी आपको और परिपक्वता की जरूरत है "
" जानते नहीं हम इतने बड़े ब्लॉगर हैं, हमारी तरफ असहमति की उंगली उठाने से पहले आत्म-अवलोकन कर लो और आत्म-आकलन भी "
" उसके लिखे में बिल्कुल भी क्लास नहीं है "


मेरा आपसे सिर्फ और सिर्फ यही कहना है कि ऐसे किसी भी जुमले या गिरोह से घबराओ मत...ब्लॉगिंग को एक थोड़ा बड़े श्रोता वर्ग से वार्तालाप की तरह मानो... लिख डालो जो भी तात्कालिक तौर पर आपके मन में आये... पोस्टों में भी और टिप्पणियों में भी... एक मंच मिला है आपको बिना किसी संपादक के अप्रूवल के अभिव्यक्त होने का... उस मंच को 'सम्मान' के भूखे चील-कौव्वों के हाथ नहीं जाने देने का...


नये साल में आप सभी को ' हैप्पी ब्लॉगिंग ' की शुभकामनाओं के साथ...


जाते-जाते वह चार लाईनें भी आपकी नजर कर ही देता हूँ... जो पोस्ट लिखते लिखते और इन गिरोहों के बारे में सोचते-सोचते ही दिल से निकली हैं...


तेज सर्दी का मौसम यह है नहीं

गुनगुनी धूप भी निकली है आज

कपड़े भी पूरे ही पहना हुआ है

बतला सकते हो आप कि फिर भी

मेरे सामने से निकलता यह शख्स

इतना अकड़ा हुआ सा क्यों है ?





आभार!



चित्र साभार : गूगल इमेजेस... http://images.google.com/

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35 टिप्‍पणियां:

  1. हम तो कभी गिरोहबंद नही रहे .ना ऎसा कोई रिकार्ड है किसी थाने में .
    हम बैद्धिक भी नही जो मन मे आता है छाप देते है .किसी पुरुस्कार की आस नही रखते है ब्लागर है नक्कारखाने में तूती बजाते है

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  2. आपकी बात समझने के लिये लोगों में धैर्य कहां है मित्र।

    चाहे लोगों के कान के पास ही बम क्यों न फोड़ दो, लोग समझना ही नहीं चाहते। उन्हे पसंद है गोलबंदी, उन्हें पसंद है एक तरह का कम्फर्ट जोन जिससे कि उनके प्रति कोई प्रश्नवाचक निगाहों से न देखे। कोई आलोचना न करे। सब लोग गुडी गुडी ही कहें।

    पता नहीं लोग अपने आप को अभिव्यक्त करते हुए भी क्यों इतना डरे डरे से रहते हैं कि किसी अलुआ ठलुआ के आशीर्वाद की दरकार रखते हैं। जबकि अलुआ ठलुआ टाइप के लोगों की औकात इन्ही ब्लॉगर गणो के द्वारा दिये गये चाहे अनचाहे मान के कारण ही है।

    हो सकता है समय के साथ साथ इस तरह की ग्रुपिंग या लॉबींग कम हो। लेकिन फिलहाल तो लोगों को अपने विचारों को खुले तौर पर निष्पक्ष ढंग से कहने के पहले सोचते हुए पाता हूं कि फलाने क्या कहेंगे, ढेकाने क्या सोचेंगे।

    जिस दिन लोग अपने मन की बातें खुलकर कहना सीख जायेंगे उस दिन यह गिरोहबंदी समाप्त हो शायद।

    बढ़िया झकझोरन पोस्ट है. एकदम मस्त।

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  3. गुटों का अनुमान तो नहीं है मुझे, लेकिन अगर ऐसा है तो वे अपनी सीमा खुद निर्धारित कर रहे हैं, ऐसे मण्‍डूकों को उनके शाश्‍वत कूप और बाकी को नये साल का उन्‍मुक्‍त आकाश मुबारक.

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  4. जिन्‍दगी में बहुत बड़ी कमजोरी है और इससे बहुत नुकसान भी उठाया है कि स्‍वयं को कभी गुटों में जकड़बन्‍द नहीं किया। जो देश और समाज हित में है बस वहीं चिंतन प्रमुख है। इसलिए जब पहले ही नहीं डिगे तो अब क्‍या डिगेंगे?

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  5. आप के इस आलेख के लिये आप बधाई के पात्र हैं । ना जाने कितनी बार ये बात मै खुद कह चुकी हूँ लेकिन मुझे नकारात्मक कहा जाता हैं । इतना दंभ हैं यहाँ कुछ हिंदी लेखको

    [ महिला और पुरुष दोनों } मे की वो बार बार दूसरो को समझाते हैं हम साहित्यकार हैं और आप हमारे लेवल पर नहीं हैं । एक दो को तो इतना घमंड हैं की वो ब्लॉगर को ही निमन समझते हैं और कहते हैं हम यहाँ साहित्य रचना करने आये हैं ।

    ब्लॉग मंच केवल साहित्य रचने के लिये हैं ऐसा वो सोचते हैं । हिंदी मे ना जाने कितने लेखक हैं जो छपास की पीड़ा से पीड़ित हैं । हिंदी की एक किताब महज १५००० रूपए मे छप जाती हैं और लोग छापा रहे हैं । वो ज़माने जा चुके जब रोयल्टी पर किताब छपती थी ।
    कभी बहुत लिखती थी यहाँ अब नहीं फिर भी आप की बात का अनुमोदन करती हूँ

    rachna

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  6. मैं आत्ममंथन कर रहा हूँ। वैसे पन्द्रह बीस हजार में अंतर्राष्ट्रीय गुणवत्ता की हिन्दी पुस्तक छापने वाला कोई आप की जान पहचान का हो तो बताइएगा। हमें भी एक दो छपवानी है। जान पहचान का होना जरूरी है, समझा कीजिए।

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    @ गिरिजेश राव जी,

    'अंतर्राष्ट्रीय गुणवत्ता' अनंत संभावनापूर्ण शब्द है... मैं तो कुछ नहीं कह पाउंगा इस बारे में... १५००० में किताब छप जाने की बात क्योंकि रचना जी ने कही है...तकनीक ने चीजें आसान कर दी हैं... अत: उनको अवश्य कहूँगा कि आपकी हर संभव सहायता करें इस मामले में...



    ...

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  9. http://in.jagran.yahoo.com/news/national/general/5_1_4142273/

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  10. हाय, क्या तीर हैं! निशाने वाले कलेजों के एक आध लिंक दिये होते! :)

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  11. कमेन्ट मे कुछ मिस हुआ हैं पता नहीं कैसे सो दुबारा दे रही हूँ क्षमा

    अनुभव प्रकाशन गाजियाबाद मे हैं संपर्क सूत्र आप के ईमेल पर दे सकती हूँ । मेरा उनसे कोई नाता नहीं है । हां किसी भी पुस्तक मेले मे कोई भी प्रकाशक से बात कर ले और अगर मेरी बात गलत हो { पैसा १५००० जो मे कह रही हूँ अनुमान से हैं और हार्ड कवर का नहीं हैं } तो कहे । पहले उनके यहाँ आजीवन सदस्यता थी १२०० रूपए मे जिस मे वो किताबे भेजते थे और हम पढते थे लेकिन वो आजीवन सदस्यता केवल १० वर्ष चली फिर महगाई बढ़ गयी ।

    हिंदी ब्लोगिंग मे आने के बाद से ये बतया जाना की स्पेल्लिंग मिस्टेक हैं हमेशा हंसी लाता हैं क्युकी क्या कोई यहाँ हिंदी सीखने आया हैं ??? अरे भाई आप हिंदी के ज्ञाता हैं ये माना पर क्या आप को ये शोभा देता हैं की आप दूसरे को हिंदी सिखाये ।

    और प्रवीण जो आप को किसी ब्लॉग पर जाने को मना करते हैं उनको कैसे पता की आप वहाँ जाते हैं

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  12. मेरा आपसे सिर्फ और सिर्फ यही कहना है कि ऐसे किसी भी जुमले या गिरोह से घबराओ मत...ब्लॉगिंग को एक थोड़ा बड़े श्रोता वर्ग से वार्तालाप की तरह मानो... लिख डालो जो भी तात्कालिक तौर पर आपके मन में आये... पोस्टों में भी और टिप्पणियों में भी...

    बहुत अच्छी सलाह है ...हम तो यही करते आये हैं ...कोई फालतू माने , मुर्ख माने अपनी बला से ...
    अच्छी पोस्ट !

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  13. बहुत ही कुशलता से बिना अधिक कहे बहुत कह भी दिया इस पोस्ट में .

    @सतीश जी समय के साथ लगता है यहाँ कुछ बदलने वाला नहीं है..''हिंदी कठपुतली ..''रचना जी की लगभग तीन साल पहले लिखी कविता आज की बात कह रही है .मार्च २००८ से अब तक कुछ भी तो बदला नहीं है.बल्कि उन दिनो फिर भी स्थिति बेहतर हुआ करती थी इतनी गुटबाजी नहीं दिखती थी.
    ..
    दूसरा आप के इस बात से सहमत : -
    ''लेकिन फिलहाल तो लोगों को अपने विचारों को खुले तौर पर निष्पक्ष ढंग से कहने के पहले सोचते हुए पाता हूं कि फलाने क्या कहेंगे, ढेकाने क्या सोचेंगे''
    ऐसी ही बात प्रवीण पाण्डेय जी ने भी कुछ दिन पहले अपनी पोस्ट में कही थी..

    ****और सच भी है सीधा सीधा सच कहना- सुनना हमेशा अच्छा नहीं लगता.
    वैसे भी अधिकतर ब्लोगर यहाँ अपने अपने क्षेत्र के जाने माने दिग्गज हैं,ज्ञानवान हैं.
    **मैं ने तो यही सीखा है ...सीखते ,समझते चलते चलो बस..

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  14. कुछ अंतर्जाल पर पढ़ा था-[शायद यह निशांत द्वारा अनुवादित था]-:
    “मैं वह झूठ हूँ जो हमेशा सच बोलता है” – ज़्यां कॉक्त्यू
    ~ कवि तुमसे प्रशंसा के शब्द नहीं सुनना चाहता. वह चाहता है कि तुम उसपर यकीन करो.
    ~ मनुष्य मिथकों की तरफ भागता है. वहां पलायन करने के लिए उसने कई रास्तों की ईजाद की है.उसके झूठ और गलतियाँ उसे राहत के चंद लम्हे मुहैया कराते हैं.

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  15. किसी "वादी" का तो पता नहीं, लेकिन मैं अपने मिलने वालों से कहता हूं कि प्रवीण शाह की पोस्ट अवश्य पढ़ें…
    =======

    इससे यह होगा कि, शायद आप मेरे गुट में शामिल हो जायें या मैं आपके गुट में… :) :) :)
    सतीश जी का "झकझोरन" शब्द मेरी टिप्पणी में भी शामिल समझा जाये… :)

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  16. प्रवीण जी,

    पहले तो मैं यह स्पष्ठ करते हुए कि न मैं बौद्धिक अभिजात्य हूं, न साहित्य वर्ग से और न ही मेरा अभी कोई गुट बन पाया है। और मात्र ब्लॉग उत्थान के प्रयोजन से गिरोहबाज़ी को पसंद भी नहीं करता।

    लेखक अथवा ब्लॉग को नहिं देखता,कोई भी कृति-रचना-लेख पहले तो समझ आए तो पढता हूं, सराहनीय लगे तो सराहना करता हूं,विरोधाभास लगे तो विपरित विचार भी रखता हूं। विवादित लगे तो बचकर निकल भी लेता हूं। मात्र विचारधारा पर ही द्यान देता हूं और समर्थन या विरोध करता हूं। और मेरी नजर में सामान्य लगे तो सामान्य सी टिप्पणी कर आगे बढ जाता हूं।
    इस स्वीकारोक्ति के बाद आपके लेख के मुद्दे पर…।

    यदि ब्लॉगलेखन, जो जी में आए, अपनी रुचि अनुसार लिखो अभिव्यक्त करो,आजादी है तो…
    यह अभिव्यक्ति की आजादी बौद्धिक अभिजात्य और साहित्यकार वर्ग को भी है,वे उत्तम साहित्यिक लिखें और यह अपेक्षा भी रखे कि उनकी रचनाओं पर साहित्यक समझ वाले सार्थ टिप्पणियां भी करे। इस अभिजात्य वर्ग को भी तो अभिव्यक्ति की आजादी है।
    और इसमें भी क्या दोष है यदि लोग समान विचार-धाराओं से मेल-जोल रखें, एक दूसरे के यहां ही अधिक आएं-जाएं, उनकी टिप्पणियां सुहाए और कभी विपरित विचारो पर मित्र को कहें कि आपकी यह विचारधारा तो न थी? प्राकृतिक रूप से समान विचारधारा में मेल बैठता है और दल का रूप ग्रहण कर लेता है।
    अभिव्यक्ति की आज़ादी और अपने आप को अभिव्यक्त करने(जिस भी तरह)की सभी को है।
    इस को हिन्दी ब्लॉग-जगत के लिये बडा खतरा कहना कुछ अतिवादिता नहीं है?

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  17. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  18. रचना जी,

    यदि गिरिजेश जी विनम्रता से हिन्दी के शब्दों के सही हिज्जे सूचित करते है तो इसमें बुरा क्या हैं?

    यह तो हमारी भाषा सुधार में सहयोग ही है, इस कार्य की सराहना होनी चाहिए। शुद्धता तो सभी को स्वीकार्य होनी चाहिए।

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  19. हमे तो कोई गिरोह का सरदार नही मिला जो अपने गिरोह मे आने का निमन्त्रण दे। कुछ स्पष्ट तो कीजिये? आपको सपरिवार नये साल की हार्दिक शुभकामनायें।

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  20. यदि गिरिजेश जी विनम्रता से हिन्दी के शब्दों के सही हिज्जे सूचित करते है तो इसमें बुरा क्या हैं?
    kuchh bura nahin haen lekin tankand ki galtiyaan nikal kar dusro ki aalochana karna galat haen aur yae kewal गिरिजेश जी nahin kartey haen

    2007 sae ab tak tamam naam haen jo apnae ko elite samhtey haen hindi ki tankand ki galti nikal kar

    galti nikalna galat kehaa haen lekin dusrae ki galti nikal kar apnae ko hindi kaa gyata mannaa snobbery hee haen

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  21. @ प्रवीण जी, रचना जी - धन्यवाद। प्रयास करता हूँ।
    @ सुज्ञ जी,
    आप ने करीने से अपनी बात कही। बहुत अच्छा लगा।
    आप की दूसरी टिप्पणी के कारण कहीं आप को मेरे गिरोह का न मान लिया जाय! ;)
    मान भी लिया जाय तो अच्छा ही होगा। खूब जमेगी जब मिल बैठेंगे शुद्धतावादी दो :)
    वैसे आप की टिप्पणियों में भी कुछ शब्द...समझ रहे हैं न? हा, हा ,हा।
    'वादी' प्रयोग के लिए सबसे क्षमा।

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  22. नए वर्ष की आपको भी बधाई।
    गरम जेब हो और मुंह में मिठाई॥

    रहें आप ही टाप लंबोदरों में-
    चले आपकी यूँ खिलाई - पिलाई॥

    हनक आपकी होवे एस०पी० सिटी सी-
    करें खूब फायर हवा में हवाई॥

    बढ़ें प्याज के दाम लेकिन न इतने-
    लगे छूटने आदमी को रुलाई॥

    मियाँ कमसिनों को न कनसिन समझना-
    इसी में है इज्जत इसी में भलाई॥

    मिले कामियाबी तो बदनामी अच्छी-
    सलामत रहो मुन्निओ - मुन्ना भाई॥

    सद्भावी-डॉ० डंडा लखनवी

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  23. उस मंच को 'सम्मान' के भूखे चील-कौव्वों के हाथ नहीं जाने देने का...

    पक्की बात ...ब्लागिंग निजी डायरी लेखन है जी ....जो अकडा हुआ है उसे तनिक आग दिखाईये जी, लचक जाएगा !

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  24. कोई भी गिरोह उतर आए पर ब्लाॅगिंग में यह ज़्यादा दिन चल नहीं सकता। यह अलग बात है कि कोई हैकिंग जैसे हथकंडों पर उतर आए वरना तो ब्लाॅगिंग से जुड़ी तकनीक ने इसे इतना लोकतांत्रिक और सर्वसुलभ बना दिया है कि गिरोह एक हद तक ही मनमानी कर सकते हैं।

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  25. सुज्ञ जी की टिप्पणी से लेख को परिपूर्णता मिली है ! गिरिजेश राव की यह मेहरवानी बहुत कम लोगों पर ही होती ...काश कभी गिरिजेश राव हमारी गलतियाँ भी सुधरने का प्रयत्न करें ...:-(
    हम तो कब का इंतज़ार कर रहे हैं !

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  26. मुझे नहीं लगता है की किसी भी आम ब्लोगर को जो अपने मन की कहने यहाँ आया है उसे किसी अभिजात्य वर्ग की आलोचना से फर्क पड़ने वाला है सब अपने काम में लगे रहेंगे | तकलीफ उन्हें ही होगी जो टिप्पणियों के लिए टिप्पणिया करते है और कुछ खास लोगों से टिप्पणियों की चाह रखते है | ना मै बौद्धिकता टाईप लिखती हु और ना ही उन जगहों पर जाती हु जहा अति बौद्धिक पोस्टे लिखी जाती है वो मेरे समझ में ही नहीं आता है हा मेरी पोस्ट पर सभी का स्वागत है | यदि कोई हमें हेय दृष्टि से देख रहा है तो देखता रहे जब हम उनकी परवाह करे ही नहीं तो फर्क क्या पड़ेगा | वैसे सुज्ञ जी की बात भी काफी हद तक सही है और आप की बात साबित भी करता है की हा एक गुट और अभिजात्य वर्ग हिंदी ब्लोगिंग में है तो जरुर |

    नया साल आप को और आप के परिवार के लिए शुभ हो |

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  27. गिरोह या ग़ुट उसी को चाहिये होता है जो स्वम को असुरक्षित महसूस करता है!

    विक्की लीक्स और राडिया लीक्स के इस दौर में हर ब्लोग एक प्रकाशन संस्था या मीडिया हाउस है।

    हम मानते हैं कि लोकतंत्र का पांचवा खम्बा बन कर उभरा है ब्लोग जगत, जहाँ खबरों और विचारों का एक अनूठा समाजवाद अब स्थापित हो चला है!

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  28. कौन हैं ये लोग ?
    ज़रा हमें भी आगाह कर दीजियेगा !
    खैर नव वर्ष की शुभकामनाएं

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  29. जहां लोग हैं, वहां गुट तो बन ही जाएंगे। मेरी समझ से इसे रोकना भी संभव नहीं। इसलिए मेरे विचार में आप अपना काम करते रहें, समय सबकी पहचान कर लेगा।

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    मिल गया खुशियों का ठिकाना।

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  30. हमने कभी बताया है ऐसे लिखा जाता है ब्लॉग
    तो भैया लब्बो-लुआब यह कि अच्छा और धांसू च फ़ांसू लिखने का मोह ब्लागिंग की राह का सबसे बड़ा रोड़ा है। ये साजिश है उन लोगों द्वारा फ़ैलाई हुयी जो ब्लाग का विकास होते देख जलते हैं और बात-बात पर कहते हैं ब्लाग में स्तरीय लेखन नहीं हो रहा है। इस साजिश से बचने के लिये चौकन्ना रहना होगा। जैसा मन में आये वैसा ठेल दीजिये। लेख लिखें तो ठेल दें, कविता लिखें तो पेल दें।

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  31. 'आम' मित्रों को संबोधित यह अभिव्यक्ति खास लोगों को भी पसंद आ गई यह क्या कम है? :-)

    हमारे पास तो गिरिजेश जी ना विनम्रता से, ना ही उद्दंडता से गलतियाँ बताने आए। अब कैसे पता चले कि हिन्दी में कुछ लिखते हैं अपन?

    हिंदी के ज्ञाता दूसरे को हिंदी सिखाये तो गलत!
    लेखन का अनुभवी व्यक्ति अशुद्धियाँ बताए तो गुनाह!
    इंजीनियर गलती बताए तो शुक्रिया!
    डॉक्टर सलाह दे तो भगवान!
    गायक शिक्षा दे तो खुदा!

    अब कोई आह करे कि वाह?

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  32. .

    भाषा पर बहुत अच्छी पकड़ तो नहीं मेरी , अंग्रेजी के एक दो शब्द जिसकी हिंदी नहीं आती , उसका बेमन से प्रयोग करती हूँ । अफ़सोस होता है अपनी कमतरी का, लेकिन अपनी विवशता मैं ही समझ सकती हूँ।

    कभी कभी पाठकों की टिपण्णी हतोत्साहित करती है , लेकिन लेखन जारी है।

    .

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  33. ढाई महीने देर से ही सही, नये साल की बधाई। सभी गुट यहाँ आकर नहीं बने हैं। कई गुट पहले से मौजूद थे और अब एक साथ ब्लॉगिंग के शोषण को उतरे हैं। टिप्पणियों ने पोस्ट का भाव (dearness) और भी चढा दिया। गिरिजेश के टिप्पणी-लेन-देन-सन्न्यास का सम्भावित कारण भी यहीं दिखा।

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  34. कुछ ताकतवर और सकारात्मक लेख यहाँ भी पड़े.. www.k-positive.in

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असहमति को इस ब्लॉग पर पूरा सम्मान दिया जाता है, आप मेरे किसी भी विचार का खुल कर विरोध या समर्थन कर सकते हैं, परंतु अशिष्ट या अश्लील भाषा यु्क्त अथवा किसी के भी ऊपर व्यक्तिगत आक्षेपयुक्त टिप्पणियाँ कृपया यहाँ न दें... आप अपनी टिप्पणियाँ English, हिन्दी, रोमन में लिखी हिन्दी, हिंग्लिश आदि किसी भी तरीके से लिख सकते हैं... नहीं कुछ लिखना चाहते हैं तो भी चलेगा... आपके आने का शुक्रिया... आते रहियेगा भविष्य में भी... आभार!