सोमवार, 24 जनवरी 2011

गाँधी जी के कई विचार आज ही नहीं ६३ साल पहले भी अत्यधिक विवादास्पद, अतर्कसंगत व अस्वीकार्य थे... हमें इस सत्य को स्वीकारना चाहिये !!!

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ईश्वर भी सत्य से बढ़कर नहीं है...
' महात्मा गाँधी '


हम सभी में ' सत्य ' को लिखने, सुनने, बोलने, देखने व कहने का हौसला हो...
हम सभी सत्य तक पहुँचने व उसे सामने लाने का ईमानदार प्रयास करें...
तभी एक देश के रूप में हमारा कोई भविष्य होगा...



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मेरे 'विवेकी' मित्रों,

मशहूर अंग्रेजी स्तंभकार करन थापर का यह आलेख पढ़ा आज के हिन्दुस्तान टाइम्स में... कुछ काफी गंभीर बातें लिखी हैं उन्होंने गाँधी जी के उनकी समग्रता में मूल्याँकन के बारे में... मैंने उचित समझा कि आपसे भी शेयर करूँ उन बातों को...

वे लिखते हैं बापू की मृत्यु के ६३ साल बाद आज हम लोगों को यह चर्चा अवश्य करनी चाहिये कि महात्मा गाँधी के कुछ अत्यधिक विवादास्पद, अतर्कसंगत व अस्वीकार्य विचारों के बारे में हमारा क्या रूख होता ?

अलेक्स वॉन तुजलमॉन की किताब 'हिस्ट्री ऑफ इन्डिपेन्डेन्स एन्ड पार्टिशन, इन्डियन समर (Alex Von Tunzelmann’s history of independence and partition, Indian Summer) से उद्धरण देते हुऐ वे लिखते हैं...

"Gandhi, as we know, was a pacifist. His commitment to non-violence was unequivocal and absolute. This lead him to advise the British not to oppose Hitler’s and Mussolini’s attempts to conquer. “Let them take possession of your beautiful island …” he said, “allow yourself, man, woman and child, to be slaughtered, but you will refuse to owe allegiance to them."

अहिंसा में विश्वास करने के चलते गाँधी जी ने हिटलर व मुसोलिनी के ब्रिटेन पर कब्जा करने के प्रयासों पर ब्रिटेन को सलाह दी " उनको अपने खूबसूरत द्वीप का कब्जा ले लेने दो... अपने आदमियों, औरतों व बच्चों का उन द्वारा वध होने दो लेकिन आप उनके राज्य के प्रति आस्था दिखाने से इन्कार कर देना "

सोचिये यदि गाँधी जी १९६२ के चीनी हमले या १९६५ के पाकिस्तानी आक्रमण या हाल ही में हुऐ कारगिल घुसपैठ पर यह कहते तो क्या होता ?

"Gandhi was not convinced of Hitler’s evil. “I do not consider Herr Hitler to be as bad as he is depicted”, he wrote in 1940. “He is showing an ability that is amazing and he seems to be gaining his victories without much bloodshed.” Gandhi felt that Germans of the future “will honour Herr Hitleras a genius, a brave man, a matchless organiser and much more.”

गाँधी जी ने १९४० में लिखा " मैं हिटलर को उतना बुरा नहीं मानता जितना उसे बताया जाता है... वह चमत्कारिक योग्यता दिखा रहे हैं व उसने अधिकतर जीतें बिना ज्यादा रक्तपात के पाई हैं... भविष्य के जर्मन हिटलर को एक बेजोड़ संगठक, अत्यंत गुणवान व बहादुर व्यक्ति के तौर पर सम्मानित करेंगे... "

कितना गलत था बापू का यह आकलन ?...


"what is truly inexplicable is Gandhi’s response to the Nazi treatment of the Jews. Von Tunzelmann, drawing upon Louis Fisher’s biography of the Mahatma, says he advised the Jews to offer passive resistance and even give up their own lives as sacrifices. He asked them to pray for Adolf Hitler. “Even if one Jew acted thus”, he wrote, “he would salve his self-respect and leave an example which, if it became infectious, would save the whole of Jewry and leave a rich heritage to mankind besides.”

नाजियों द्वारा यहूदियों के साथ किये गये व्यवहार पर गाँधी जी का रवैया समझ न आने योग्य था लुई फिशर द्वारा लिखी जीवनी के अनुसार गाँधी जी ने यहूदियों को निष्क्रिय प्रतिरोध करने व यहाँ तक कि अपना जीवन बलिदान करने को कहा, उन्होंने यहूदियों को हिटलर के लिये प्रार्थना भी करने को कहा...गाँधी ने लिखा " यदि एक भी यहूदी ऐसा करता है तो वह अपने आत्म सम्मान को बचा लेगा व यदि यह चलन फैल गया तो इससे पूरी यहूदी कौम भी बचेगी व मानव जाति को एक मूल्यवान धरोहर भी मिलेगी..."

" Even after the concentration camps were discovered and the full horror of the Holocaust revealed, this is what Gandhi told Louis Fisher in 1946: “Hitler killed five million Jews. It is the greatest crime of our time. But the Jews should have offered themselves to the butcher’s knife. They should have thrown themselves into the sea from cliffs …”

यहाँ तक कि जब यातना शिविरों का पता चल गया व नाजियों द्वारा किये यहूदियों के महासंहार की विभीषिका भी दुनिया के सामने जाहिर हो गई तब भी गाँधी जी ने १९४६ में लुई फिशर को बताया " हिटलर ने ५० लाख यहूदियों को मरवाया, यह हमारे दौर का सबसे बड़ा अपराध है... परंतु यहूदियों ने स्वयं को अपनी इच्छा से कसाई के चाकू के आगे प्रस्तुत करना चाहिये था... उन्हें स्वयं ही किसी खड़ी चट्टान से समु्द्र में कूद जाना चाहिये था... "

करन थापर कहते हैं कि यह जानते हुए भी कि गाँधी अहिंसा के पैरोकार थे, फिर भी यहूदियों को हिटलर का विरोध न करने, उसके लिये प्रार्थना करने व स्वयं को बलिदान के लिये प्रस्तुत करने की राय देना न केवल अजीब था अपितु यह असंवेदनशील, अपमानजनक व क्रूर भी था (to tell Jews not to resist Hitler but pray for him and offer themselves as sacrifices is more than bizarre. It’s insensitive, demeaning and cruel.)

सबसे अंत में करन थापर यह कहते हुऐ अपनी बात समाप्त करते हैं कि 'ब्रह्मचर्य के साथ उनके प्रयोगों' की तरह ही युद्ध, हिटलर व यहूदियों के महासंहार पर गाँधी जी के विचारों को मात्र उनकी व्यक्तिगत सनक या विचित्रता कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता... यदि वे सत्तासीन होते तो उनके यही विचार हमारे देश की नीतियाँ बनते... इसलिये इन विचारों की चर्चा व उन पर ध्यान देना जरूरी है... और यदि अंत में इन विचारों को स्वीकार्य रूप में समझाया नहीं जा सकता तो हमें उनकी खुल कर निंदा (आलोचना) करनी चाहिये व उन्हें नकार देना चाहिये...


दोस्तों मैं तो सहमत हूँ इस से...


आपका 'विवेक' क्या कहता है ?





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*** करन थापर का यह आलेख अपने मूल रूप में यहाँ पर है... पाठकगण यहाँ भी अपनी प्रतिक्रिया दे सकते हैं।
*** यह ब्लॉगलेखक उन सभी लेखकों व वैबसाइटों का आभार व्यक्त करता है जिनके लिंक इस आलेख में दिये गये हैं।
*** सभी चित्र साभार : Google images.





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23 टिप्‍पणियां:

  1. गांधी जैसे लोग अपने पागलपन के लिए दूसरों का खून बहा सकते है,
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    गांधी ने कहा सत्य बोलो, पर आज कितने लोग है इस देश मे जो सत्य बोलते है,
    इस देश के प्रधानमंत्री तक इस बात का खुलासा करने से कतराते है कि उन लोगो के नाम क्या है जिनहोने अपनी काली कमाई विदेशी बेंकों मे जमा कर रखी है
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    गांधी ने कहा अहिंसा का रास्ता अपनाओ, कितने लोग है यहा जो अहिंसा पर विश्वास करते है
    लोग जात के नाम पर, धर्म के नाम पर, अमीर गरीब सब आपस मे लड़ रहे है
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    एक हिंदुस्तानी

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  2. जितनी हिंसा इस देश मे है शायद ही किसी और देश मे मिले
    यहा लोग आरक्षण के लिए सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुचा सकते है, रेल्वे ट्रेक को 10-12 डीनो तक बंद रख सकते है

    क्यो नहीं अपनाते वे लोग गांधी का बताया रास्ता !
    ----------------------------------------------------------------------एक हिंदुस्तानी
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    मे यहा टिप्पणिया अपने नाम के साथ भी कर सकता हूँ, पर शायद लोग मेरा नाम जानकार मेरी टिप्पणियॉ मे काही गयी बात पर भी एक नए विवाद को जन्म दे सकते है
    लोग मेरे नाम मे मेरी जात , मेरा धर्म खोजने लंगेगे

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  3. हम कभी कभी अजीब तरीके से आचरण करते हैं. आप ने जो कहा वो सही हो सकता है. लेकिन ऐसा होने पर भी गांधी जी के चरित्र और आचरण में बहुत सी चीज़ें ऐसी हैं जिसका हमें अनुसरण करना चाहिए. तो भारत और भी बहुत सुन्दर देश बन सकता है.
    हमे किसी व्यक्तित्व को किसी tag से नहीं जोड़ना चाहिए.
    जिस किसी भी आदमी सी कुछ भी सीखने योग्य मिले सीखना चाहिए और उसका अनुशरण करना चाहिए.
    जो युवा आज film stars की देखा देखी आचरण कर रहे हैं उससे तो अच्छा ही होगा अगर हम राम या गांधी की बात सुने...

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  4. गांधीवादियों से इस पर टिप्‍पणी जरूरी होगा. प्रथम दृष्टि में तो वही लगता है, जो आपको लगा और जो लगना चाहिए.

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  5. अति सर्वत्र वर्जयेत...अत्याचार, अपमान करने या सहने दोनों के ही लिए ..

    मुन्ना का गाँधीवादी दृष्टिकोण ज्यादा प्रभावी और उपयुक्त लगता है मुझे !

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  6. गांधी और कुछ हद तक नेहरु भी सहज सरल ह्रदय के आदर्शवादी लोग थे-धूर्त मक्कार लुच्चे नहीं इसलिए उनकी कई बातें गलत भी हो सकती हैं -दोनों का मोहभंग हुआ!एक तो मार ही डाले गए !

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  7. आप ने जो बताई वो तो विदेशियों के लिए उनके विचार थे पर बहुत से विचार जो भारत और भारतीयों के लिए थे वो भी अजीब थे विवादित थे उन्हें सब जानते है | कोई भी मानव यदि अपने आप में ईमानदार है और वो ईमानदारी से अपने विचार रखता है तो बहुत कुछ ऐसा कह सकता है जब दूसरो के समझ से बाहर हो और बेकार विवादित हो किन्तु इससे उनके अच्छे विचार बेकार नहीं हो जाते है | उनके कई विचारो की पहले भी और आज भी काफी लोग आलोचना करते है उसमे कोई नई बात नहीं है | मै भी उनकी अति अहिंसावादी विचारो से सहमत नहीं रही हूँ |

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  8. गांधी एक व्‍यक्ति थे, जरूरी नहीं कि उनकी हर बात सही साबित हो और हर विचार लोगों द्वारा पसंद किये जाएं। पर वे भारतीय इतिहास के इकलौते ऐसे व्‍यक्ति थे, जिन्‍होंने न सिर्फ अपनी बातों वरन अपनी करनी के द्वारा दिखाया कि उनमें कितना दम है।

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    सचमुच मुकर्रर है कयामत?
    कमेंट करें, आशातीत लाभ पाएं।

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  9. maine apne kishora awashta me ek upnyas gurudatt ka padha tha naam sayad 'bharat gandhi-nehru ki chawon me'...... karan thapar ka ye riport
    us upanyas ko sahi sabit kar raha hai.....

    aftar all 'o hamare bapu the/hain/rahenge'

    pranam.

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  10. गांधी नें कभी नहीं कहा कि उनके विचार पत्थर की लक़ीर की तरह स्वीकार किये जाने चाहिए।

    उनकी किन्ही बातों से असंगति उभर आती है तो उसका अर्थ यह नहीं हुआ कि उनके तर्कसंगत और सफल विचारों को भी तिलांजलि दी जाय।

    आश्चर्य तो इस बात का है कि जो गांधीजी के अतर्कसंगत विचार करण थापर ढूंढ लाए है ,और जिसका पूरजोर समर्थन आप कर रहे है, वे विचार क्या आज हमारे लिए परेशानी का सबब है?
    क्या उन कथित धटनाओं का प्रभाव इस वर्तमान पर है? क्या हामारी सोच बाधित हो रही है?

    फ़िर क्या है जो आप आह्वान कर रहे है,"इस सत्य को हमें स्वीकार कर लेना चाहिए"???

    अशांति चाहने वाले सदैव अहिंसा के विचार पर प्रतिघात करते रहेंगे। क्योंकि वे मात्र प्रतिशोधवादी है।(प्रस्तुत गांधी के कथित अतर्कसंगत मुद्दे,सभी अहिंसा को टार्गेट करने के हेतु है, जिसमें गांधी नें प्रतिशोध रहित उपचार दिये है।)

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  11. Gandhi was a larger than life character .
    Its difficult to understand GANDHI in parts .
    We may like some of him and dislike other of him but can we deny that "there is none like him "

    Peoples likes or dislikes does not make or break a person its the persons own strength , his belief in what he says and does and most important does he practice what he preaches .

    I read your post and when I reached here "This lead him to advise the British not to oppose Hitler’s" I smiled and wished Britishers had listened to him at least we would have got rid of Britishers sooner then we did
    Destruction of Britishers was that on Gandhi Ji's mind ?? My God What a visionary then he was . !!

    What do you think Praveen ??

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  12. वागर्थ में उनकी किताब पर लम्बी चर्चा हुई है ......भारतीयों को व्यक्ति पूजन की आदत है...खास तौर से .म्रत्यु के बाद वह आलोचना से ऊपर उठ जाता है ...गांधी जी एक चतुर राजनेता थे...उस समय के ज्यादातर नेता आदर्श वादी ओर मजबूत चरित्र के लोग थे ...तब राजनीति में केवल चरित्रवान लोग ही जाते थे ......उनके भीतर बहुत अच्छाई थी....
    पर . ...उनकी सभी बातो से सहमति हो ऐसा आवश्यक नहीं है ......

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  13. भारत मे विचारो की पुजा नहीं होती , यहा पुजा होती है व्यक्ति की , गांधी जी को महात्मा बना कर पेश किया गया॥ पर लोग ये भूल गए की ये वही गांधी थे जिन्होंने भगत सिंह की फासी पर अंग्रेज़ सरकार से बात करने से इंकार कर दिया था ....
    ऐसा नहीं है की गांधी जी ने अच्छी बाते नहीं कही पर उनकी कही सभी बातो का इसलिए समर्थन करना क्योकि लोगो ने उन्हे महात्मा बना दिया है सही नहीं है

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  14. "यदि वे सत्तासीन होते तो उनके यही विचार हमारे देश की नीतियाँ बनते... इसलिये इन विचारों की चर्चा व उन पर ध्यान देना जरूरी है..."

    - जब सत्तासीन हुए बिना ही वे नेहरु को हम पर थोप गये, तो और दस साल जीवित रह जाते तो पता नहीं क्या-क्या खटकरम कर जाते… :)

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  15. गॉधी एक नाम ही नही अपने आप में एक संपूर्ण आधार है। वो भी एक इंसान थे और कोई भी इंसान पूर्ण नही होता। सभी में कुछ गुण तो कुछ खामियॉ होती है। वो उनमें भी थी। पर इससे उनकी महानता पर कोई फर्क नही पड़ता।

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  16. मन कोमल हो सहृदय के लिये, शठ के लिये नहीं।

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  17. गांधी यह भी है और वह भी . गान्धी भी गलत थे बहुत से विषय में . लेकिन उनकी यह तारीफ़ करनी पडेगी उन्होने अपनी जीवनी मे वह तथ्य उजागर किये जो वह चाहते तो छुपा सकते थे . कितने लोग है जो अपने बारे मे १०० % सच लिख सकते है

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  18. मुझे रचना और डाक्टर अनुराग की टिप्पणियां काफी संतुलित लगी !

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  19. गाँधी जी के विचार विरोधाभासी ज्यादा थे.यहाँ ब्रिटेन और यहुदियों को कुछ और सलाह दे रहे है जबकि उनका ये भी मानना था कि अत्याचार के प्रति अहिंसक समर्पण के बजाय मैं हिंसक होना पसंद करूँगा.कई मौकों पर उन्होने हिटलर की आलोचना भी की तो जैसा आप बता रहे है प्रशंसा भी.वैसे कई कारणों से गाँधी जी की आलोचना होती रही है.पर चाहे जो हो भारत और दक्षिण अफ्रीका में किया गया उनका संघर्ष सभी के सामने था.उनके अच्छे विचारों का महत्तव फिर भी बना रहेगा.हमें यह भी नहीं भूलना चाहिये कि गाँधी जी ने ये बात बार बार कही थी कि वे भी एक सधारण व्यक्ति है और उनकी भी कई बातें गलत हो सकती है.अत: हमें उनका प्रशंसक ही होना चाहिये भक्त नहीं.

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  20. सुरेश जी का कहना सही है कि नेहरू को देश पर थोपना एक गलत फैसला था.लेकिन हो सकता है पटेल को लेकर गाँधीजी के मन में ये बात रही हो कि आने वाली पीढियाँ ये न कहें कि कैसे एक गुजराती ने दूसरे गुजराती को प्रधानमंत्री पद के लिये चुन लिया(हो सकता हैं).

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  21. सिर्फ यही नहीं गांधीजी के बहुत से विचार अवैज्ञानिक और भ्रांतिपूर्ण थे । इस लिंक पर देखिये गांधीवाद का पोस्टमार्टम

    http://books.google.co.in/books?id=oN3mnroHRgYC&printsec=frontcover#v=onepage&q&f=true

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  22. गाँधी गए भाइयों, अब शोर किसलिए? बोलना तो था अपने को भी लेकिन अब नहीं।

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  23. गांधी जी की अहिंसा से जुडी विचारधारा एक ताकतवर विचारधरा थी,जिसमे की संदेह नहीं....
    गाँधी जी के जीवन से जुड़े कुछ लेख यहाँ भी पड़े..
    www.k-positive.in

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