बुधवार, 19 जनवरी 2011

अमाँ अब आप ही बताओ कि क्या है ये !!!

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मेरे 'स्नेही' मित्रों,

आज देख रहा था पीछे मुड़कर...

यह ब्लॉग बनाया था अप्रैल २००९ में, तब हिन्दी ब्लॉगिंग का एबीसीडी भी नहीं मालूम था... पर सही मायनों में मेरा ब्लॉग सफर शुरू हुआ १६ अगस्त २००९ से जब मैंने अपने ब्लॉग को ब्लॉगवाणी व चिट्ठाजगत पर सूचीबद्ध किया व चंद लाइनें एक - दो - तीन - चार किस्तों में छाप दी...

आज समय है नहीं मेरे पास जो कुछ नया पेश कर सकूँ... :-(...

तो एक बार फिर पेश हैं वही लाइनें ...


मजबूती से थमा गिलास, फिसल कर बिखर गया,
ऐसा सिर्फ उन्हीं निगाहों का, कमाल हो सकता है।

गौर से देखा था तूने ? मेरे मेहबूब के माथे को
सिंदूर तो नहीं ही होगा , गुलाल हो सकता है।

आज तेरे सामने, जो मिट्टी में लोट रहा।
वही कृष्ण कल,पूतना का काल हो सकता है।

न तेरा हरा है, न मेरा केसरिया होगा।
लहू का रंग तो, केवल लाल हो सकता है।

ये वो हंगामा नहीं, बदल डाले जो दुनिया को,
बासी कढ़ी में आया,नया उबाल हो सकता है।

अभी देर नहीं हुई, कद्र हमारी जान लो,
वरना इस भूल का ,तुम्हें मलाल हो सकता है।

चुप रहना सीख ले,या झूठ को दे सम्मान ,
लोक तंत्र में सच बोलने, पर बवाल हो सकता है।

बतला तुम रहे हो,पर नहीं मुझे यकीं,
इस नाचीज का उन्हें,इतना ख्याल हो सकता है।







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चित्र साभार : Google images.


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12 टिप्‍पणियां:

  1. चुप रहना सीख ले,या झूठ को दे सम्मान ,
    लोक तंत्र में सच बोलने, पर बवाल हो सकता है।
    .

    इस ब्लॉगजगत मैं भी यह देखा जा सकता है. धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  2. पेन है यार ....जो अक्सर अपनी शक्ल चमकाने के लिया ही चलता रहता है ! इसे लेखनी भी कहते है ....
    कवि बन जायेंगे आप जल्दी ही ! लगे रहें !
    शुभकामनायें !

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  3. न तेरा हरा है, न मेरा केसरिया होगा।
    लहू का रंग तो, केवल लाल हो सकता है ...

    बहुत खूब ... तीखी बात कही है आपने ... जोरदार लिखा है ....

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  4. लहू का रंग तो सिर्फ लाल हो सकता है ...
    लोक तंत्र में सच बोलने, पर बवाल हो सकता है।

    तंज और दर्द एक साथ !

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  5. क्या बतलाऍं जी, हमारे लहू का रंग तो लाल भी है और बवाल भी है। हा हा। बहुत उम्दा कविता लिखी मगर इसमें मतला तो बैठाइए जनाब।

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  6. कभी कभार स्मृतियां टटोलना भी ज़रुरी है मियां
    वर्ना जिंदगी क्या ख़ाक जिये,मलाल हो सकता है

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  7. आश्‍चर्य तो तब होता है, जब सच पर भी बवाल नहीं होता.

    उत्तर देंहटाएं
  8. @ प्रिय प्रवीण जी ! आप एक फौजी हैं इसलिए खून का रंग ठीक से पहचानते हैं .
    शारीर से आगे एक आत्मा नाम कि चीज़ भी है , कभी उसका रंग आप देखेंगे तो वहां कोई रंग मुश्किल से ही नज़र आएगा .
    वह तो सबकी एक ही है . अब आप मेरा साथ देना सीख लीजिये . एक से भले हमेशा दो हुआ करते हैं .
    आपके मतलब की एक पोस्ट आपके लिए पेश करता हूँ .
    क्या प्राकृत और संस्कृत से पहले से पंजाबी भाषा मौजूद थी ?

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  9. बहुत मजेदार कविता है....तार्किक.....सतीश जी का कमेन्ट मजेदार था...
    कहा जाता है कलम में बहुत ताकत होती है..... लेकिन अब तो भाड़े की स्याही हो गयी है इसलिए इसकी ताक़त भी किसी को पटकने में लगाई जाने लगी है.
    तस्लीम जी के ब्लॉग के माध्यम से पहुंचा यहाँ तक....वहाँ आपकी टिप्पणी पढी सो यहाँ खींचा चला आया.....वहाँ मैंने भी कुछ टिप्पणी लिखी है.....उसपर आपकी राय चाहता हूँ.....
    आप ज्योतिष के बारे में जानते हैं काफी शायद.....मैं नहीं जानता ज्यादा कुछ.....थोड़ा बहुत विज्ञान पढ़ा है....बस....

    उत्तर देंहटाएं

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