सोमवार, 17 जनवरी 2011

सपनों का उड़ान लेने से पहले टूटना, प्रतिभा की बेबसी और पनपना हीनता व असंतोष का... क्या होगा आगे अब ?

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मेरे 'दूरदर्शी' मित्रों,

एक चीज जिसे शुरूआत से ही मैं कभी भी ठीक से समझ नहीं पाया वह है आर्थिक उदारीकरण व भूमंडलीकरण के इस दौर में देश में हुऐ उच्च व व्यवसायिक शिक्षा में हुए तथाकथित सुधार व उनका निजीकरण, उदारीकरण व व्यवसायीकरण...

आज आप किसी भी सड़क पर निकलिये, किसी भी राज्य में... हर तरफ कुकुरमुत्तों की तरह उगे हुऐ दिखेंगे तमाम इंस्टीट्यूट...अगर कोई थोड़ी बड़ी जगह होगी तो वहाँ पर एकाध निजी या डीम्ड विश्वविद्मालय का भी होना तय है... इसी तरह लगभग रोजाना ही खुल रहे हैं नये नये मेडिकल कालेज भी...

एकाध अपवाद को यदि छोड़ दें तो यह तमाम इंस्टीट्यूट व विश्वविद्मालय खोले गये हैं तथाकथित एजुकेशन माफिया के द्वारा... या तो इनके पीछे स्थानीय नेता हैं या बिल्डर या रिटायर ब्यूरोक्रेट अथवा धनकुबेर... कुछ ने अपने काले धन को यहाँ पार्क कर सफेद किया है तो कुछ इस आस से इस क्षेत्र में आये हैं कि अब आगे कई पुश्तों तक बिना ज्यादा कुछ किये धरे नोट छपते रहेंगे...

जब उद्देश्य इतने 'महान' हों तो इन प्रमोटर्स का एक मात्र उद्देश्य रह जाता है इन्वेस्टमेंट पर अधिकाधिक रिटर्न प्राप्त करना...फैकल्टी पूरी हो न हो... मानक भले ही अधूरे रहें...कम तन्ख्वाहें देने व मनमानी के कारण अधिकाँश के पास फैकल्टी का अभाव होता है... पर थैलियों के बल पर यह संचालक यह जरूर सुनिश्चित कर लेते हैं कि नियंत्रक निकाय की ओर से जब उनका निरीक्षण हो तो ग्रेड सही मिले... रिजल्ट भी इसी तरह मैनेज किये जाते हैं... यह सब खेल इसलिये होता है ताकि काउंसलिंग के समय अधिक से अधिक मुर्गियाँ इनके जाल में फंसें... एडमिशन सीजन में तो बाकायदा प्रिन्ट व इलेक्ट्रानिक मीडिया में कैंपेन चलाते हैं यह...

हाल ही में आल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन ने यह कहा कि इंजीनियरिंग कोर्स में वही प्रवेश ले जिसने १०+२ में कम से कम ५०% अंक हासिल किये हों तो गुजरात राज्य ने यह कह कर विरोध किया कि यदि इस नियम को मानें तो राज्य की २९००० सीटों में से १९००० खाली रह जायेंगी... अब आप हालात का अंदाजा खुद लगा सकते हैं...विद्मार्थी के पास योग्यता भले न हो यदि उसके पिता के पास धन की कमी न हो तो उसका कैरियर भी डिजाइन किया जा सकता है... ऊपर से तुर्रा यह है कि फर्जी आंकड़ेबाजी कर इन सीटों की संख्या व उनमें ली जाने वाली फीस हर साल बढ़ाने की कवायद बदस्तूर हर साल करती हैं हमारी सरकारें...

एक उदाहरण देता हूँ मेडिकल शिक्षा का... बच्चा काबिल नहीं, कंपिटीशन से डरता है... आप मत डरिये...जेब भरी हो, सब हो जायेगा... मिलिये किसी कालेज के प्रबंधक से... सारे रास्ते बता देगा वह... १५-२० लाख शुरू का डोनेशन...५ लाख सालाना फीस... १ लाख सालाना होस्टल खर्चा... १ लाख सालाना किताबों का...पास होने की गारंटी...मतलब कुल ५० लाख में तैयार एक 'होनहार' डॉक्टर... स्पेशियलाइजेशन चाहिये तो निकालो फिर २५ लाख 'सीट' के... अब आप सोचिये कि ७० लाख के इन्वेस्टमेन्ट से तैयार हुआ 'होनहार' क्या जायेगा गाँव में २७००० रूपल्ली महीना की नौकरी में सेवा करने...

ऐसे न जाने कितने उदाहरण और फील्ड्स के भी दे सकता हूँ आपको... पैसा पास हो तो कोई भी 'काबिल होनहार' बन सकता है... परंतु यदि किसी बच्चे के माँ-बाप के पास अथाह पैसा नहीं है तो उसके सपनों को केवल बहुत ही कम सरकारी कालेजों की उपलब्ध सीटों के बीच ही सिमटना होगा... पेड सीटों की तो सोच भी नहीं सकता वह...

एक युवा जब अपनी खुली आंखों से यह देखता है कि उससे बहुत कम योग्यता रखने के बावजूद दूसरा कैरियर की इस दौड़ में मीलों आगे सिर्फ इसलिये निकल गया क्योंकि उसके बाप के पास काली कमाई की 'थैली' है... तो यह बेबसी, सपनों का उड़ान भरने से पहले यों चकनाचूर होना, यह हीनता की भावना आगे के जीवन में उस से क्या करा दे, यह कल्पना ही भयावह है...

इस दौर में अपनी औलाद के कैरियर को सुनिश्चित करने की 'शाश्वत मध्यवर्गीय चाह' सीधे-सीधे तौर पर कईयों को उनके न चाहते हुऐ भी भ्रष्टाचार की ओर भी धकेल रही है...

यह राज्य, यह सरकारें जो ७५००० हजार करोड़ के कर्ज एक झटके में माफ कर देते हैं... लाखों करोड़ की सबसिडी खाद, खाद्म, डीजल, एलपीजी और न जाने किन किन चीजों पर दे सकते हैं... लाखों करोड़ रूपयों के घोटालों को खपा सकते हैं... लाखों करोड़ रूपये केवल चुनावी नतीजों को प्रभावित करने के लिेये बंदरबाँट की योजनाओं में लगा सकती हैं... वह उच्च तथा व्यवसायिक शिक्षा को सर्वसुलभ, सहज व एक सामान्य आदमी की पहुंच में रखने के अपने दायित्व से क्यों इतनी निर्ममता से पल्ला झाड़ चुकी हैं... मुझे तो समझ नहीं आता...

आपको समझ आता हो तो समझायें...

सभी के विचारों का इंतजार रहेगा...




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चित्र साभार : Google images.



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14 टिप्‍पणियां:

  1. एक युवा जब अपनी खुली आंखों से यह देखता है कि उससे बहुत कम योग्यता रखने के बावजूद दूसरा कैरियर की इस दौड़ में मीलों आगे सिर्फ इसलिये निकल गया क्योंकि उसके बाप के पास काली कमाई की 'थैली' है... तो यह बेबसी, सपनों का उड़ान भरने से पहले यों चकनाचूर होना, यह हीनता की भावना आगे के जीवन में उस से क्या करा दे, यह कल्पना ही भयावह है...


    this is an truth but now a days people who dont have black money also make arrangements . its becoming a norm to"buy" degrees for children .

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  2. सबसे पहले बधाई आप को इस नाउम्मीदी के साथ की ये जमीनी रूप से होगा नहीं फिर भी कहने के लिए ही केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने आप की आदर्श सोसायटी गिराने की अपील सुन ली है और उसे गिराने का आदेश दे दिया है |

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  3. प्रवीण जी

    इसका एक नुकसान और भी है कई कालेज ऐसे भी है मान्यता प्राप्त जो इंजीनियरिंग और की कई बड़े व्यावसायिक कोर्स के लिए जो बच्चो को सीधे प्रवेश दे रहे है ओए उनकी फ़ीस भी बहुत ज्यादा नहीं है और वो बच्चे जो इच्छा होने के बाद भी सही मार्ग दर्शन या कम योग्यता के कारण प्रतियोगिता परीक्षा पास नहीं कर पा रहे है वो इन जगहों पर चले जाते है लेकिन यहाँ ना तो ढंग के शिक्षक होते है ना ही ढंग की पढाई इनके साथ हुए धोखे का पता इन्हें तब चलता है जब बेचारे नौकरियों के लिए ढंग के संस्थानों से पढ़ कर आये बच्चो से सामना होता है और अच्छी डिग्री लेने के बाद भी ये बेरोजगारी की मार झेलते है | सबसे पड़ी दोषी सरकार है जो धड़ धड ऐसे कालेजो को मान्यता देती जा रही है |

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  4. काश ! इतना समझ पाते ……………हम तो आम जनता है यूँ ही पिसते रहेंगे किसी ने कुछ नही करना……………जब तक जनता खुद जागृत नही होती।

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  5. जाहिर है जिसने भी इनवेस्ट किया है वो तो कमाने के लिये ही तो किया है। अब वह कमाई चाहे डीजल वाले दें या बारूद वाले उन्होंने तो बोट को रास्ता देना है। आखिर ऊपर बैठे नेताओं, अफसरों ने तो अपना इनवेस्टमंट नौकरी देते वक्त एक ही झटके में निकाल लिया था।

    प्रणाम स्वीकार करें

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  6. मुझे भी आश्चर्य होता है की अयोग्यों की इतनी बड़ी और बढ़ती तादाद के होते भारत कैसे विकसित देश का स्वप्न देख रहा है !

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  7. प्रवीण्‍ा जी, एक मुद्दे के कई पहलू होते हैं, एक पहलू आपने रखा लेकिन जब आपने विचार मांगे हैं तो एक बात इससे अलग मैं भी रखना चाहूंगी। इस देश में डिग्रियों से ही व्‍यक्ति का आकलन किया जाता है, एक अशिक्षित व्‍यक्ति को भूलकर भी ज्ञानवान नहीं माना जाता। यही कारण है कि हर कोई डिग्री खरीदने और बेचने का कार्य कर रहा है। मेरा यह मानना है कि शिक्षा देना सरकार का कार्य होना ही नहीं चाहिए और डिग्री के पैमाने बदलने चाहिए। वर्तमान में 55 प्रतिशत के लगभग व्‍यक्ति शिक्षित हैं यदि हमें शत प्रतिशत शिक्षा चाहिए तो अभी तो ढेरों स्‍कूल और कॉलेज चा‍हिएं।
    एक बात पर और गौर कीजिए कि इंजीनियर बनने के लिए आप कह रहे हैं कि ऐसे ही डिग्रियां बंट रही हैं और फिर भी इनको कम्‍पनियां ले रही हैं तो मामला केवल डिग्री और व्‍यक्ति की बुद्धिमत्ता का ही है। स्‍कूल और कॉलेज व्‍यक्ति की बुद्धिमत्ता को ही बढाते हैं। सीखता तो नौकरनी के बाद ही है।
    आपकी बात का यह दूसरा पहलू है इसका अर्थ यह नहीं है कि आपकी बात ठीक नहीं है, वह भी ठीक है लेकिन अन्‍य पहलू भी हैं।

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  8. आज का यथार्थ यही है.... आम जनता किस से शिकायत करे!! क्या करें! यही यक्ष प्रश्न है!
    चिंतनशील सार्थक प्रस्तुति के लिए आभार

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  9. बहुत ही दुखद है,यह सब.....अपने बच्चों को डॉक्टर,इंजिनियर बनाने की होड़ में लोग अपना, घर-जमीन सब बेच रहे हैं...और उन्हें सचमुच नहीं पता कि ऐसी डिग्री के बाद भी नौकरी मिलेगी या नहीं. कई बार बच्चे भी पैरेंट्स के इतने पैसे खर्चा करवाने के बाद भी पढ़ाई नहीं निभा पाते और बीच में ही छोड़ देते हैं. जबकि योग्य बच्चे पैसे के अभाव में वंचित रह जाते हैं,शिक्षा से

    ऐसी कॉलेज का औचित्य क्या है....और १५,२० लाख तो कम ही कहा आपने...तीस लाख तो सिर्फ डेंटिस्ट की पढाई के लिए हैं.
    येन-केन प्रकरण डॉक्टर -इंजिनियर बनना ही है.

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  10. डिग्रियां थोक में बांटी जा रही हैं ... कुटीर उद्योग की तरह जगह-जगह संस्थान खुले हुए हैं. हर माँ-बाप अपने बेटे को डाक्टर, इंजीनियर और एमबीए किये हुए देखना चाहते हैं... इसी कमजोर नस को पकड़ा है कोचिंग कराने वालों और संस्थानों ने ....गुणवत्ता पीछे छूट गयी ....क्या भविष्य होगा आगे ... भगवान् जाने.

    बहुत सामयिक और विचारपूर्ण पोस्ट
    आभार

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  11. कुकुरमुत्तों की तरह पनपे संस्थानों से कुकुरमुत्ते ही पैदा होंगे।

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  12. बच्चा काबिल नहीं, कंपिटीशन से डरता है... आप मत डरिये...जेब भरी हो, सब हो जायेगा..
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    सुंदर लेख़

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  13. साधनहीन सुयोग्य छात्रों को अपने लक्ष्यों से समझौते करना होंगे । बस...

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