शनिवार, 15 जनवरी 2011

हाँ मैं एक गुटबाज तो हूँ ही !!!


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रहना साथ अपने हमख्यालों के
दिमाग को अपने रखना खुला


होना खड़ा अन्याय की खिलाफत में
बेकसूर के हक में उठाना आवाज


सुनना केवल अपने दिल की कही
लगाये मुखौटों को फेंकना उतार


रखना जिंदा अपने जमीर को सदा
हर छल-छद्म को करना अनावृत


बचना स्वयंभू महानों के स्तुतिगान से
अजूबी-अनूठी-जुदा बात कहना कोई


करना अलग-अलग दूध को पानी से
बार-बार मूर्ख बनने से कर देना इंकार


बिठाना तुच्छ जाहिलों को उनकी जगह पर
अपने जीवन मूल्यों को हरदम रखना ऊपर


देखना पतन-गहराईयों को हिकारत से
और ऊँचाईयों को समुचित देना सम्मान



तेरी निगाह में अगर यह गुटबाजी है...
तो मेरे अजीज, मगर 'बौने' दोस्त



यह अपराध तो मैं अकसर किया करता हूँ...

हाँ, मैं एक पहले दर्जे का 'गुटबाज' हूँ !



तुझे तेरा यह शब्दकोश मुबारक !







...

37 टिप्‍पणियां:

  1. गुट बन जाना, गुट बनाना और गुटबाजी में थोड़ा फर्क तो होता ही है. किसी संदर्भ को लक्षित रचना जान पड़ती है.

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  2. मैं भी प्रवीण शाह के साथ हूँ ...

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  3. आज से मैं भी घोषित गुटबाज...

    अति सर्वत्र वर्जयते ....
    कई बार अति असहनीय हो जाती है .....

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  4. मैं भी गुटबाज हूँ जी
    मुझे भी अपने गुट में शामिल कर लो

    प्रणाम

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  5. wow...simply great sir. we all are "gutbaaj" in our own one or the other way...

    sir, one request...could you plz remove "colonel" from my name that is there on your side-bar? it makes me feel a bit uncomfirtable :-)

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  6. यह एक निर्गुट गुट है और मुझे प्रवीण शाह के साथ रहने में फख्र हैं,मगर ये मुआमला क्या है !

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  7. .
    .
    .
    @ प्रिय गौतम,

    आपका अनुरोध सर-माथे पर...
    समझ सकता हूँ आपकी असहजता को...
    कर दिया है।


    ...

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  8. hum apne nastik blogger bhai ke 'gut'
    me apni astha pragat karte hain.....

    pranam.

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  9. किस गुट में अधिक शान्ति और आनन्द है?

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  10. ये भी मजेदार रहा प्रवीण जी की जिस बात का आप बार बार विरोध करते रहे आज आप पर ही उसका इल्जाम लग गया |:)

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  11. मै देती रही साथ उनका
    क्युकी थी वो नारी
    ना जाने कितनी नारियों
    कि सही मैने इसीलिये
    प्रतारणा भारी


    मुझ से कहती हैं
    नारी "गुट " कि नारियां
    ह्रदय आप का हैं कोमल
    बड़ी जल्दी पिघल जाता हैं
    हर नारी के लिये
    ये सही नहीं हैं



    पर



    हे प्रवीण सहोदर
    तुमको किस गुनाह कि मिली है सजा
    समझ मुझको नहीं आया हैं


    पर अपने गुट मै मुझको भी रखो
    यही कहने को आयी हूँ
    तुम जैसे गुट बाजों कि
    बहुत जरुरत हैं
    मुझ जैसे गुट बाजो को



    मै इस मुद्दे पर प्रवीण शाह के साथ हूँ

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  12. गुट-निर्गुट का तो पता नहीं।

    पर प्रवीण जी आपके कविता में प्रकट भावों का निश्छल मन से समर्थन करता हूँ।
    शुभ भावों में सदा आप हमें साथ पाओगे, फ़िर चाहे लोग कोई भी गुट समझे।

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  13. बालेसर के गीत एक पंक्ति है :
    '' मूरख मिले , बालेसर पढ़ा लिखा गद्दार न मिले ! ''
    पढ़े लिखे अपनी गलतियों को छुपाने में माहिर होते हैं , सामने पर आरोप जड़ने में , ठीक ऐसे ही किसी को 'गुटबाज' कहकर उसके सवाल को खारिज करते हैं और अपना छद्म ज्ञान-काण्ड सिखाते हैं , हाँ उन्हें बहुमत मिल सकता है पर सत्य-मत नहीं , धरती पर गैलीलियो का सत्यमत अकेला था , एतदर्थ भीड़ जाए भाड़ में , सो उन्हें कहने दीजिये/बहने दीजिये , इस विश्वास के साथ कि सत्य एक दिन झूठ को अनावृत कर देगा ! सत्य परेशान हो सकता है , पराजित नहीं !
    ------------------------------
    मैं आपसे सहमत हूँ !
    सादर..

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  14. @प्रवीण शाह साहब,

    अब वक्त आ गया है उस 'बौने'का नकाब उतर जाना चाहिए। वह दूसरो को दोषी ठहराकर, तुष्टिकरण का लाभ लेकर अपने एब छुपाना चाहता है।

    आपने स्ट्रांग बात कही।

    @रचना जी,

    क्या यह सच है, आपने लिखा "हे प्रवीण सहोदर"
    सहोदर का मतलब सगा भाई होता है। (जिसने उसी उदर से जन्म लिया) और फ़िर आप तो रिश्ते बनाने के खिलाफ हैं?

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  15. ये लोग कबूतर के भेष में बाज़ है। साथ ही जानवर कमाल है। भलमनसाई का बे-फायदा उठाते है। इन्हें पता है एकता के नाम पर कोई कुछ नही बोलेगा। इस लिये ब्लेकमेल में अमन की दुहाई देते है। अब नकाब उतर जाना चाहिए।

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  16. satees saxena aur sohil to paidayishi chamche hain. puri jindagi sirf chamchagiri hi ki hai.
    sawaal ye hai ki aapne zeal ka comment kyun delete kiya ?
    poem baaji karke bewkufana hamdardi kyun batori ja rahi hai.

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  17. अरे भाई प्रवीण शाह जी अब आपको गुटबंदी के लिए किसने उकसा दिया ?

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  18. यदि आपका संकेत सही समझ पाया हूं तो 'सुनिये मेरी भी':-

    तर्क-वानों को पता है कि पानी बहता रहे तो अति उत्तम और ठहर जाये तो दलदली झील :)

    फिर आप वहां से गुजरे ही क्यों ?

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  19. आपकी रचना पढकर कुछ पंक्तियां याद आ गईं।
    गुलसितां पर हर्फ़ आता देखकर
    खार जितने भी थे मैंने चुन लिए
    फिर भी जब फीका रहा रंगे चमन
    मैंने अपने खून के छींटे दिये।
    .. और अगर तब भी चमन न बचे तो उसे बचाने के लिए लाला जगदलपुरी की कुछ पंक्तियां बदल कर जो गुट बनता है हम उसके गुटबाज बन जाएं,
    किस किस की बोलें बतियाएँ, सब अच्छे हैं,
    आगे पीछे, दाएँ बाएँ सब अच्छे हैं।
    सबको खुश रखने की धुन में सबके हो लें,
    मिल बैठें सब, और टिपियाएं सब अच्छे हैं।

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  20. ऐं ! आपको कोसने गुटबाज कह दिया ?
    चलिए, अब कह भी दिया, तो दिल पर मत लीजिए. कौन कैसा है, सभी जानते हैं.

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  21. त्रुटि सुधार - 'कोसने' को 'किसने' पढ़ा जाए

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  22. या इलाही ये माजरा क्या है ...
    आप कैसे हो गए गुटबाज़ ...पूरा प्रकरण पता नहीं चला ..

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  23. सहोदर का मतलब सगा भाई होता है। (जिसने उसी उदर से जन्म लिया)



    शब्दकोश मे एक शब्द के अनेक अर्थ होते हैं । वो शब्द वाक्य मे कहा और किस तरह से लिखा गया हैं इस से उसके अर्थ बहुत से होते हैं

    सहोदर यानी एक धरती माँ के बेटे
    प्रवीण यानी विशिष्ट


    अब आप कि बात माने तो ये बताये कि आज के समय मे अगर सरोगेसी से एक उदर से तीन विभिन्न जोड़ो के बेटे जनम ले तो क्या आप उनको सहोदर कहेगे

    अब सगा सहोदर पर आते हैं
    सगा यानी एक ही पिता और माता से उत्पन्न संतान
    सहोदर एक ही उदर से उत्पन्न संतान

    अब अगर किसी महिला जिसके एक बच्चा हैं उसकी की दूसरी शादी होती हैं और उसके बाद वो दूसरे बेटे को संतान के रूप मे जनम देती हैं तो

    अनाम जी { जिन्होने मुझे संबोधित किया हैं }क्या वो सगा सहोदर होगये ।

    शब्द कि परिभाषाये समय के साथ बदलती ही हैं हमको अपने ज्ञान मे उसी अनुसार बदलाव लाना होगा ।

    बाकी रह गयी बात मेरे ऊपर आक्षेप करने कि आप को अधिकार हैं क्युकी कमेन्ट मे अनाम का ऑप्शन खुला हैं

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  24. सहोदर पर इतना समय अच्छा नहीं लगा !
    सहोदर का उपयोग करते समय रचना का मतलब प्रवीण शाह के प्रति अपना स्नेह प्रदर्शन करना मात्र था ! क्या फर्क पड़ता है की अर्थ क्या है ! हाँ खुद रचना ऐसे चीजों के लिए टोंकने की आदि हैं यह अवश्य याद आ गया ! इस घटना से सबक उन्हें भी मिलना चाहिए :-))
    आशा है वे मेरी बात का बुरा बही मानेंगी !
    सस्नेह

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  25. उपरोक्त कमेन्ट में आदि की आदी पढ़ा जाये !

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  26. भईया प्रवीण जी सादर प्रणाम
    हम भी आपके साथ हैं और सहमत भी हैं ।

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  27. रखना जिंदा अपने जमीर को सदा
    हर छल-छद्म को करना अनावृत


    बचना स्वयंभू महानों के स्तुतिगान से
    अजूबी-अनूठी-जुदा बात कहना कोई
    .
    प्रवीण शाह जी जिस गुटबाजी का ज़िक्र आपने किया है यह समाज के फैदे के लिए की जाने वाले गुटबाजी का ज़िक्र है और यह मनुष्य के लिए अबश्यक है.
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    लोग कितने बेशर्म हैं की समाज मैं नफरत फैलाने के लिए गुटबाजी करते हैं और यहाँ आप की बताई गुटबाजी ही हिमायत भी करते हैं.
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    समाज मैं अशांति इन्ही दो मुह वाले गुटबाजी करने वालों से फैलती है.

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  28. हाँ खुद रचना ऐसे चीजों के लिए टोंकने की आदि हैं यह अवश्य याद आ गया ! इस घटना से सबक उन्हें भी मिलना चाहिए :-))

    mr satish saxena
    i have stopped commenting on your blog because you say things in a satire but when that same is retured to you dont accept it and say its negativity . u have said the same to me on your post in one of my comments and also have asked me not to answer to your comments

    this is praveens blog and i hope i am allowed to reply to comments addressed to me from anaam or you

    why is it necessary to put your comment in defence or against 2 people when they can have a dialog of their own

    let that person come and justify his knowledge

    please dont try to act as a custodion . I dont appreciate it

    If you cant accept humor then dont put in similes and creat misunderstandings

    i am sorry praveen for diverting the issue

    उत्तर देंहटाएं
  29. http://satish-saxena.blogspot.com/2010/12/blog-post_29.html?showComment=1293614159725#c8142594722356959376

    http://satish-saxena.blogspot.com/2010/12/blog-post_29.html?showComment=1293630319773#c1702391058626619057

    refrence for mr satish saxena

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  30. (वही बेनामी सम्बोधित कर रहा है)
    @रचना जी,
    मैने वह प्रश्न आक्षेप के लिये नहीं पुछा था, मेरा यह संशय तो दूर हो गया कि प्रवीण जी आपके सहोदर भ्राता नहीं है।
    अब आप इस प्रश्न को बेशक आक्षेप की तरह ले सकती है, क्योंकि ब्लॉगवुड में आप एक दृढ मनोबल की महिला के रूप में जानी जाती है, आपका कहा आपका सैद्दान्तिक परम वाक्य होता है। आप ब्लॉगवुड में रिश्ते बनाने के कार्य का तीव्र प्रतिकार करती है। यहां चाहे किसी भी अर्थ में लें, आपने प्रवीण को भाई सम्बोधित तो किया ही है।
    आक्षेप लगाना तो अनिवार्य है, क्योंकि आपसे अपनी बात पर अडिग रहने की अपेक्षा की जाती है। और ऐसे आक्षेपों में आपको दृढ मानने का भाव छुपा होता है।
    और हाँ, सहोदर के आपके दिये सारे अर्थ किन्तु परन्तु है। सरोगेसी या अलग-अलग पिता किन्तु माँ एक और ऐसी हर दशा में एक मां के उदर से उत्पन्न सन्तान, सहोदर ही कहलायेगी। अब एक धरती में उत्पन्न को सहोदर कहे जाते न सुना न पढा।

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  31. जय हो! गुट्टक खेलना तो बचपन से देखता आया हूं!

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  32. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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