शुक्रवार, 14 जनवरी 2011

सत्य वचन !

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.
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देखो...


छत पर चढ़ा

छाती पीटता

दहाड़ें मारता

दुनिया को दिखाता

रो रहा है वो

दफना कर मुझे

मेरी मौत पर...



कितना नासमझ है

शायद

नहीं जानता बेचारा

जब

आज तलक

नहीं कभी कोई

दफना पाया मुझे


फिर...

बिसात उसकी क्या


वैसे भी...

उसके तो

पैर ही नहीं हैं।







...




चित्र साभार : गूगल इमेजेज्




...

10 टिप्‍पणियां:


  1. यह कविता कहाँ से ...???
    प्रेरणा कौन है सत्यवीर ?????
    झूठ ..
    my foot !

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  2. सत्‍य को कोई दफना नहीं सकता और आप कवि है इसके कोई झुठला नहीं सकता।

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  3. वो सत्य किसी काम का नहीं जो समय गुजरने के बाद सामने आये |

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  4. ऊंह ...आज भाभी जी से कुछ कहा सुनी हुई क्या ? बड़े ही फिलासॉफिकल अंदाज़ में हैं :)

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  5. सत्य मरेगा नहीं, छिप भले ही जाये।

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  6. मिज़ाज मैं तबदीली दिख रही है? देखता हूँ कब तक आप को समझ पता हूँ..?

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  7. कविता अच्छी लगी धन्यवाद|

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