सोमवार, 10 जनवरी 2011

हाँ मैं नहीं देता कभी भी, पैगाम अमन का : मुझे झगड़े पसंद जो हैं !

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देखो आज फिर लड़ रहे हैं वो दोनों
लड़ने भी दो न खुलकर उन्हें
दे लेने दो ढेर सारी गालियाँ भी
कही-अनकही, भद्दी औ बेढंगी सी

लगा लेने दो ढेर सारे इलजाम
निकल जाने भी दो दोनों के ही
मन के अंदर का सारा गर्द-गुबार

'अभिव्यक्ति की गरिमा'
और 'शब्दों की मर्यादा'
महज दो शब्द समूह ही तो हैं
क्या करेगा इनका कोई जब
दिल में उसके पलती हो नफरत
बारंबार टीसता हो, हुआ अपमान
भुला न पाता हो वह दोनों को

हर किसी के बस की बात है नहीं
नीलकंठ हो पचा पाना गरल को

दिल दिमाग या शरीर में भी
बने चाहे कहीं पर भी मवाद
बाहर निकलना ही चाहिये उसको

रूकता है मवाद गर कहीं पर भी
रूक रूक कर टीसता है वह फोड़ा
एक आदमी का तो पूरा वजूद ही
खो जाता है उन टीसों से जूझने में

मुझे इसीलिये पसंद हैं झगड़े
अच्छा लगता है मुझे रिस जाना
गंदे, बदबूदार, सड़े मवाद का

नहीं करता हूँ कभी बीच-बचाव
होने देता हूँ मैं इन झगड़ों को
नहीं देता कभी भी, पैगाम अमन का

होते ही रहने चाहिये ढेर सारे झगड़े
धार्मिक,वैचारिक,सैद्धांतिक,व्यक्तिगत भी

यही झगड़े हैं तभी बची है दुनिया
और बचा हुआ है इंसान भी
वरना कब का जीत जाता मवाद

हाँ! मुझे बहुत पसंद हैं झगड़े !





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चित्र :साभार गूगल इमेजेज.





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51 टिप्‍पणियां:

  1. झगड़ों से ही अन्‍दर का तमस निकल जाता है। आज सबसे बड़ी समस्‍या यही है कि हम संवादहीन हो गए है, बस चुप लगा रखी है। डरते हैं कि कहीं झगड़ा ना हो जाए। बहुत अच्‍छे लगे आपके विचार।

    उत्तर देंहटाएं
  2. आज तो कुछ अलग ही रंग में नज़र आ रहे हो ...कुछ दुखी और कुछ टूटे से ??
    अच्छा है ..!

    कुछ लोगों को ध्यान से पहचान पाओगे क्योंकि झगडा और गाली गलौज करते समय इनके चेहरे पर लगे मनमोहक नकाब उतारकर कब गिर जाते हैं इन्हें पता ही नहीं चलता और यही मौका है कि बेचारी मूर्ख पब्लिक को इनका नंगपन पता चल जाता है !

    ईश्वर आपको परख और अच्छी समझ दे ...इसी कामना के साथ ...

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  3. :) :)
    सिर्फ़ एक मुस्कुराहट और कुछ नहीं…
    प्रवीण भाई अच्छी कविता भी करते हैं, पता नहीं था…

    उत्तर देंहटाएं
  4. कविता बहुत अच्छी और विचार भी | कई बार तो लोग मुह पर हसंते है और कहते है की मन में कोई मैल नहीं है पर दिल में जहर की एक बूंद जमा होने लगती है और जब वो तुरंत ना निकाले तो वो धीरे धीरे एक बूंद बूंद जमा हो कर विकराल रूप धारण करने लगती है जो कई बार ज्यादा खतरनाक हो जाता है | झगड़ो से कई बार ये भी पता चल जाता है की किसी के मन में असल में क्या भावना या दर्द छुपा हा उससे पता तो चलता है की हमें सामने वाले से अब कैसे व्यवहार करना है | अपनी बात करू तो ब्लॉग जगत में यदि ये सब सड़ांध खुल कर नहीं लिखा जाता तो पता ही नहीं चलता की लोगों के दिलो में धर्म और महिलाओ के लिए कितना कुछ गलत और सडा हुआ भरा है |

    उत्तर देंहटाएं
  5. सचमुच सबके वश की बात नहीं नीलकंठ हो पाना...

    ये जुदा अंदाज बहुत भाया, सर!

    उत्तर देंहटाएं
  6. कुछ-कुछ असहमत होते हुए भी कविता की नीयत सहमति योग्‍य. दसरे ढंग से कहूं, तो पसंद के साथ झगड़े के लिए तैयार.

    उत्तर देंहटाएं
  7. जीवन का एक अलग पक्ष प्रस्तुत किया, अन्तर आवश्यक हैं, बिना अन्तर विकास नहीं होता।

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  8. अद्भुत !
    आप जैसे फौजी से इतनी संवेदनशीलता की उम्मीद मुझे तो न थी ।
    झगड़ों की वजह से ही इंसानियत शेष है ।
    वाक़ई !

    लाजवाब , बेमिसाल , शानदार !

    यह सच है कि आज इंसान दुखी परेशान और आतंकित है लेकिन उसे दुख देने वाला भी कोई और नहीं है बल्कि खुद इंसान ही है ।
    आज इंसान दूसरों के हिस्से की खुशियां भी महज अपने लिए समेट लेना चाहता है । यही छीना झपटी सारे फ़साद की जड़ है ।
    एक दूसरे के हक को पहचानौ और उन्हें अदा करो अमन चैन रहेगा । जो अदा न करे उसे व्यवस्था दंड दे ।
    लेकिन जब व्यवस्था संभालने वाले ज़ालिमों को दंड न देकर ख़ुद पक्षपात करें तो अमन चैन ग़ारत हो जाता है । आज के राजनेता ऐसे ही हैं । देश को आज तक किसी आतंकवादी से इतना नुक़्सान नहीं पहुंचा जितना कि इन नेताओं से पहुंच रहा है । ये नेता देश की जनता का विश्वास देश की व्यवस्था से उठा रहे हैं ।
    बचेंगे ये ख़ुद भी नहीं ।

    आप ने जो बात कही है उसे अगर ढंग से जान लिया जाए तो भारत के विभिन्न समुदायों का विरोधाभास भी मिट सकता है और अब तो अलग अलग दर्जनों चीजों की पूजा करने वाले भी कहने लगे हैं कि सब चीजों का मालिक एक है ।
    अब मैं चाहता हूं कि सही ग़लत के Standard scale को भी मान लिया जाना चाहिए ।
    देखिए

    प्यारी माँ

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  9. sach kahun to mavad nikalne ke liye jhagde ke alawaa bhi tareeke hain... aur yeh bhi maanti hoon ki jhagde rishton aur pyar ke liye zaroor bhi hain :-) bas, jab yeh jhagde mavad nikalte nikalte, ek doosre ka khoon nikalne lagte hain to inhe rokne ka dil karta hai... saadar

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  10. झगड़े न होते तो सतीश सक्सेना जैसे अमन पसन्द क्या करते?

    उत्तर देंहटाएं
  11. @ ज्ञानदत्त पाण्डेय ,
    लगता है आपने भी अनूप शुक्ल को गुरु बना लिया ...यह तो अनूप शुक्ल कहते हैं अब आप भी....
    बढ़िया है .

    उत्तर देंहटाएं
  12. हर किसी के बस की बात है नहीं
    नीलकंठ हो पचा पाना गरल को

    बिलकुल सच....सबके वश का नहीं ये...सोचने को विवश करती हुई कविता.

    उत्तर देंहटाएं
  13. देव , झगड़े तब भी ख़त्म हो जाते हैं , ईश्वर न करे कि आदमी के भाग्य में 'रगड़े' आ जाएँ . 'रगड़े' ख़त्म नहीं होते . परेशान कर देते हैं , जीने नहीं देते . बार बार अपमान करना ही प्रतिपक्षी का हेतु बन जाता है . एक पक्ष सहता जाता है ( सहता रहा हूँ ) आसन्न स्थितियां मजबूर कर देती हैं . पर अंत कहाँ है ? शायद कफ़न ही अंतिम जगह होती है , जीवन अभिशप्त सा व मृत्यु एक आश्वासन सी , बकौल ग़ालिब :
    ढाँपा कफ़न ने दाग़े-अ़यूबे-बरहनगी
    मैं वर्ना हर लिबास में नंगे-वजूद था !
    [ कफ़न ने नग्नता के दोष का खात्मा किया , नहीं तो हर लिबास कम पड़ जाता था , धारण किये गए हर स्वरूप में अस्तित्व क्षतिग्रस्त ही रहता था . किसी की पंक्ति है 'मृत्यु एक विश्राम स्थल' ]
    कुल लब्बो-लुआब यह कि रगड़ा ( मजबूरी में झगड़ों से निकलते झगड़ों की श्रृखला ) से जीवन भर मुक्ति नहीं है , शायद !
    ==================
    अच्छी लगी आपकी कविता . बहुत देर तक चबाया इस कविता को :)
    सादर..

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  14. हम ने भी हालात देख कर टंकी की सफ़ाई वगेरा करवा ली हे, हिटर भी लगवा दिया हे

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  15. प्रवीण शाह जी शायद मैंने आप को अमन के पैग़ाम पे देखा नहीं लेकिन अनवर जमाल कि पोस्ट पे अवश्य देखा.
    हर किसी के बस की बात है नहीं
    अमन का पैग़ाम पचा पाना

    तर्क एक अच्छी बात का कुतर्क मैं कुछ मज़ा नहीं..

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  16. .
    .
    .
    @ मासूम साहब,
    आपकी अपनी सोच है, मैँ आपको दोष भी नहीँ देता, ऐसे कई हैँ जो मेरे लिखे को कभी नहीँ समझ पायेँगे... :(


    ...

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  17. @ सतीश भाई ,
    आपने शाह जी के दुःख और टूटन वाले रंग को अच्छा क्यों कहा ? :)

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  21. @ भाई अमरेंद्र जी ! आपके कहे शेर में सादर प्रूफ़ संशोधन करना चाहूंगा कि
    अयूब = उयूब
    वजूद = वुजूद
    पढ़ा जाए ।
    भाई आपके लिए हम ग़ालिब के अशआर से सजी एक पूरी पोस्ट लिए आपके मुंतज़िर हैं । अपने दीदार तो दीजिए ।

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    सभी सहॄदय पाठकगण,

    कल रात ग्यारह बजे देखा था ब्लॉग को... अली सैय्यद साहब आदरणीय सतीश सक्सेना जी से प्यार भरी चुटकी ले रहे थे तब... उसके बाद अब आया हूँ... देखा तब से अब तक बहुत कुछ हो गया था... एक बहुत बड़ी गलती जो हम लोग करते हैं वह यह है कि टिप्पणी केवल और केवल पोस्ट के विषय पर होनी चाहिये... परंतु हुआ यह कि पुरानी बातें उठाई जाने लगीं... फिर शुरू हो गया आरोप-प्रत्यारोप व कटु शब्दों कें द्वारा लोगों को उत्तेजित व अपमानित करने का कार्यक्रम...

    ब्लॉग मेरा है... इसलिये ऐसी सब टिप्पणियाँ हटा रहा हूँ... इतनी देर तक इन टिप्पणियों के बने रहने से जिस किसी ने भी आहत महसूस किया है, उनसे क्षमाप्रार्थी हूँ...

    अलग अलग जगहों पर अलग अलग मुद्दों पर स्टैंड लेने का एक साइड इफैक्ट तो है ही कि विरोध से खिसियाये हुऐ भाई लोग अवसर की तलाश में रहते हैं प्रहार करने को... मुझ पर भी कुछ ऐसा ही प्रहार एक बेनामी ने तथा एक दूसरे बेनामी ने जिसने Samhita Saxena नाम से तीन व Samhita नाम से छह टिप्पणियाँ कर किया है... दोस्त तुम जो भी हो, नर या नारी, मेरी यह कामना हमेशा रहेगी कि ऐसा दिन जरूर तुम्हारी जिंदगी में आये जब तुम्हें बेनामी रह कर न टीपना पड़े... और हाँ यदि महिला हो तो कोई बात नहीं पर यदि पुरूष हो तो जिंदगी भर यह याद रखना कि अपनी पहचान जाहिर करने के बाद कभी मेरे करीब न आना... क्योंकि तुम्हारी हरकतों के लिये तुम्हारी 'नाक पर एक पंच' का उपहार तो मेरी ओर से तुम्हारे लिये बनता ही है !



    ...

    उत्तर देंहटाएं
  41. Bujhdil

    Tippani ko hataanaa kaayartaa ki nishaani hain

    Apne chaapluso ko khush rakho



    Samhita Saxena

    उत्तर देंहटाएं
  42. Shrimaan Pravin



    Suniye Meri Bhi....

    Blogsthal mein pranaaligat yehi dekhaa gayaa hain ki jab taarkik dalile shesh ho jaati hain to haathaa-paai kaa rukh ikhtiyaar kiyaa jaataa hain.

    Aapki khokli dhamki mein bhi aapke dohrepan ki bu aa rahi hain. Yadi nar hoon to haathaa-paai karoge aur yadi naari huee to kyaa gale lagaane kaa iraadaa hain?

    Ab jo 'jee-huzoor' aapne paal rakhe hain unki vichaarsarni se to yehi nishkarsh nikaltaa hain.

    Waise blogsthal mein ek anokhe avlokan se avgat huee hoon --

    Kitnaa bhi ghatiyaa aalekh likh lo, phir bhi apne jee-huzooro se 'badhiya abhivyakti', 'achchhe vichaar', 'muskuraahat', 'achchhi kavita', 'jivan kaa alaag paksh', 'bhow....arre.... wow', 'ati sundar' ityaadi to mil hi jaayegaa.

    Aakhir kyon naa mile? Unhe bhi to apne blog par aise hi farebi prashanshako ki fauj jo banaaye rakhni hain!

    Main tumhaare nimn-stariy lekh ko achchhaa kahungaa / kahungi tabhi to tum mere lekh par yehi aakar likhoge. Hain naa? Ek haath de, ek haath le.

    Blogsthal kaa ek hi usool

    Haami bharoge to tippani rahegi chhapi

    Warnaa moderation se patang kati

    Visay ki koi mahattaa nahi hain. Sirf sansanikhej baato ko uchhaalo aur tamaashaa karte raho.


    Samhita Saxena

    उत्तर देंहटाएं
  43. .
    .
    .
    My feedjiit counter says that SAMHITA SAXENA is arriving at my blog from Rayong. So, I know your identity now... :)


    ...

    उत्तर देंहटाएं
  44. प्रवीण जी , आज देख रहा हूँ तो अपनी टीप को भी मिटा पा रहा हूँ , पर अफ़सोस नहीं क्योंकि वह तो पूर्व की टीपों पर थी और वे टीपें नहीं तो मेरी टीप का न होना युक्तियुक्त ही है ! पोस्ट पर तो वही टीप है जो मेरी यहाँ पहले की टीप है !

    जमाल जी के सुधार का शुक्रिया कहा था , इसके साथ कि शेर कविता कोष से लिया हूँ और अ के पहले का नुक्ता उ का द्योतक होता है और स्वरभेद भी अलग अलग होते हैं !

    व्यक्ति विशेष के 'पहचान' के जिस निष्कर्ष पर आज आप पहुंचे उसपर मैं कल ही पहुँच गया था , पर सीखने को खूब मिल रहा है :)

    सादर ..

    उत्तर देंहटाएं
  45. Shrimaan Pravin:

    Purvagrah ke chalte manushya sadaa raaste se bhatak jaataa hain.

    Bewakoofi aur bachpane ki hade paar kar rahe ho aap apni dushmani se.

    Aapkaa is post par ek maatr uddesh kisi ek mahilaa ke viruddh likhnaa thaa jo ek behad hi giri huee harkat hain.

    Benaqaab hone par tippani to aap mitaa sakoge par satya shaaswat hotaa hain.

    Ab har koi jo aapki is chaalbaazi ko ujaagar karegaa woh aapke liye kisi ek kshetra se hi honge. Murkhtaa ki misaal bane ho aap, apne hi blog par.

    Aapkaa 'feedjiit' bhi aap hi ki taraah maarg kho chukaa hain. Takniki maamle mein itne maahir hain to bujhiye meraa sthal.

    Main Bhaarat mein hi hoon. Chintaa mat kariye. Main har do-chaar ghante mein ek baar phir tippani karungi taaki aap mere sthaan ko thik taraah se bhaanp sake.

    Aur aap to jaante hi honge [chuki aap itni takniki samajh-bujh rakhte hain] ki aapke mobile par incoming call agar Bhaarat mein se hain to +91 se hi shuru hogaa.

    Karu aapko call, bujhdil insaan?


    Samhita Saxena

    उत्तर देंहटाएं
  46. Pravin:

    Your prejudiced mind is giving you delusions about my being someone else whom you are determined to malign.

    For a change, I thought, I will write in English. May be that shall help you correct your notions.

    By the way, did you snoop on my loation using your high-tech gadget called 'Feedjiit'?

    I guess you are going to pretend that since last night, it is just today night-time that you have been here - a lame excuse to allow the comments to be on your site for all to see and read and then be conveniently delted by you.

    Will you again write a apologetic comment tonight?

    Come soon, waiting for you to come with your sword of moderation.


    Samhita Saxena

    उत्तर देंहटाएं
  47. Pravin:

    Sword of moderation, be rather read as 'sword of cowardice'.

    One needs to be quite precise in expression, ain't so?

    Wonder if this post / blog is an assembly point for third-rate terrorists like Amrendra?

    Like minds stay together, I guess.

    As such you have made it apparent that decent people are not welcome on your blog and their comments are to be deleted.


    Samhita Saxena

    P. S. : Amrendra - Need a Hindi Translation?

    उत्तर देंहटाएं
  48. Pravin:

    Your prejudiced mind is giving you delusions about my being someone else whom you are determined to malign.

    For a change, I thought, I will write in English. May be that shall help you correct your notions.

    By the way, did you snoop on my loation using your high-tech gadget called 'Feedjiit'?

    I guess you are going to pretend that since last night, it is just today night-time that you have been here - a lame excuse to allow the comments to be on your site for all to see and read and then be conveniently delted by you.

    Will you again write a apologetic comment tonight?

    Come soon, waiting for you to come with your sword of moderation.


    Samhita Saxena

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  49. for a change

    यह पोस्ट पढ़ते हुए यह गीत सुन रहा हूँ:

    ये बातें झूठी बातें हैं ये लोगों ने फैलाई हैं
    तुम इंशा जी का नाम न लो क्या इंशा जी सौदाई हैं ।
    हैं लाखों रोग जमाने में क्यूँ इश्क है रुसवा बेचारा
    हैं और भी वजहें वहशत की, इंसान को रखतीं दुखियारा
    हाँ बेकल बेकल रहता है वो प्रीत में जिसने दिल हारा
    पर शाम से लेकर सुबह तलक यूँ कौन फिरे है आवारा?
    ये बातें झूठी बातें हैं ये लोगों ने फैलाई हैं।
    ....
    पूरा गीत सुनने लायक है। अगर आप के पास ऑडियो न हो तो बताइए, मेल कर देता हूँ :)

    उत्तर देंहटाएं

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