सोमवार, 31 जनवरी 2011

' ताकि सनद रहे ' !!! गत्यात्मक होती भविष्यवाणियाँ...

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मेरे 'ज्योतिष-विश्वासी' मित्रो़,

यह पोस्ट मात्र इसलिये है 'ताकि सनद रहे'...
आदरणीय संगीता पुरी जी का सभी अन्य ब्लॉगरजनों की तरह ही मैं भी बहुत सम्मान करता हूँ...
परंतु मेरा यह भी मानना है कि आकाश में विद्ममान या घूमते ग्रहों, उपग्रहों, तारामंडलों व तारों की पृथ्वी के सापेक्ष स्थिति की चार्टिंग करना व उसके आधार पर किसी व्यक्ति, समाज, बाजार, मौसम व अन्य भूगर्भीय घटनाओं के बारे में कयास लगाना किसी भी तरह से वैज्ञानिक नहीं है...

इसीलिये यह पोस्ट है आज की...

आप पढ़िये...सभी लिंकों को खोलिये... मेरी टिप्पणियाँ जो वहाँ हैं उनको भी पढ़िये... आखिर में क्या हुआ यह भी आप सब के सामने है... तब बताईये कि आपके क्या विचार हैं...

१- दलाल स्‍ट्रीट में अगले सप्‍ताह रौनक बने रहने की संभावना है !!

और यह रही रौनक...

२१/१ - १९००७
२४/१ - १९१५१
२५/१ - १८९६९
२७/१ - १८६८४
२८/१ - १८३९५


२- हैती के बाद नवंबर 2010 के मध्‍य में एक और बडे भूकम्‍प की आशंकाभूकम्‍प का ग्रह योग 16 नवंबर 2010 को सर्वाधिक प्रभावी होगा !!

कहाँ आये यह भूकंप ?
औसतन हर तीन दिनों में आते हैं छोटे मोटे भूकंप तो...
क्या होता अगर खाली करा दिये जाते शहर के शहर या देश तक...



३- 2010 में किन तिथियों को प्राकृतिक या मानवकृत दुर्घटनाओं या अन्‍य आपदाओं की संभावनाएं बनेंगी ??

अब इनका आप ही हिसाब लगायें... वैसे मैं यह पोस्ट पहले ही लिख चुका हूँ इस मामले में...


मैंने तो अपनी कह ली... पर एक भविष्यवाणी आप मेरी भी सुनते जाइये... यह मानव व्यवहार पर आधारित है, वह ये कि मेरे ऐसा लिखने से लेशमात्र भी फर्क नहीं पड़ने वाला... ज्योतिषियों, अंकशास्त्रियों, रत्न बेचने-बताने वालों व तंत्र-मंत्र करने कराने वालों के ऊपर लोगों का विश्वास बढ़ता ही जायेगा...

और जारी रहेगा ज्योतिषियों का अपनी विद्मा को विज्ञान के समकक्ष खड़ा करने/ठहराने का महाअभियान भी...

२१ वीं सदी ज्योतिष की ही है शायद...



आभार!



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चित्र साभार :गूगल चित्र




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गुरुवार, 27 जनवरी 2011

एक बार देख ही लीजिये कि क्या आप भी अपनी नाक को अपनी जीभ से छू सकते हैं ?

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मेरे लम्बी-जिव्हा-धारी मित्रों,


एक दौर था जब मैं तमाम तरह के तंत्र-मंत्र, साधना आदि आदि के अनुभवों को सिरे से खारिज कर देता था... पर आजकल उम्र बढ़ने के साथ थोड़ी मैच्योरिटी आ रही है शायद { :) }... इसलिये 'बेनिफिट आफ डाउट' देने लगा हूँ सबको...सोचता हूँ सभी के अनुभवों का फायदा ले लिया जाये ... यह बात दीगर है कि आज तक भी कोई काम की बात नहीं पा पाया मैं अभागा... :(
'सत्य की खोज' मुझे काफी कुछ अपना जीवन-दायित्व लगता है... इसलिये इसी क्रम में जैसे ही देखा एक ब्लॉग सत्यकीखोज@आत्मग्यान SEARCH OF TRUTH@KNOW YOUR SOUL जो है बाबा राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ जी का... तो हम भी वहाँ पहुँच गये... उनकी एक पोस्ट में वे जो लिखते हैं वह अक्षरश: यहाँ उतार रहा हूँ...

"इसी कृम में एक मिलती जुलती साधारण बात आपको बता रहा हूँ । जिसका किसी पूजा किसी साधना से कोई सम्बन्ध न होकर शरीर के रहस्यों से सम्बन्ध है । वो ये कि आप अपनी जीभ को निकालकर नाक की तरफ़ लाने का अभ्यास करें । यह काफ़ी कठिन अभ्यास है । पर निरंतर प्रयास से जीभ बङने लगेगी । जिस दिन आपकी जीभ नाक की नोक को छूने लगेगी । उस दिन आप पर किसी भी प्रकार के विष का असर नहीं होगा । जिनकी जीभ सामान्य से बङी होती है । लचकीली होती है । उनके लिये तो ये अभ्यास करना बेहद सरल होता है ।"


अब बचपन में एक दोस्त तो होता था मेरा जो नाक छूकर दिखाता था जीभ से... पर आज दुर्भाग्यवश उस से संपर्क नहीं है... परंतु आप में से कोई न कोई ऐसे किसी व्यक्ति को शायद जानता हो...

यह भी हो सकता है कि आप में सी ही कोई स्वयं भी यह कारनामा आसानी से कर लेते हों... ;))
मेरा सवाल सिर्फ एक ही है कि क्या...

जिसकी जीभ नाक को छू लेती है उस पर वाकई किसी प्रकार के विष का असर नहीं होता या होगा ?


आप क्या सोचते हैं इस बारे में...




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डिस्क्लेमर:- मेरी इस पोस्ट को पढ़कर यदि अपनी जीभ से नाक छू लेने वाला कोई भी शख्स अपने ऊपर विष का कोई प्रभाव न होने संबंधी कोई प्रयोगादि करता है व उसे किसी भी प्रकार की कोई क्षति होती है तो यह ब्लॉगलेखक कतई जिम्मेदार न होगा, जो भी करें अपने रिस्क पर करें।




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सोमवार, 24 जनवरी 2011

गाँधी जी के कई विचार आज ही नहीं ६३ साल पहले भी अत्यधिक विवादास्पद, अतर्कसंगत व अस्वीकार्य थे... हमें इस सत्य को स्वीकारना चाहिये !!!

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ईश्वर भी सत्य से बढ़कर नहीं है...
' महात्मा गाँधी '


हम सभी में ' सत्य ' को लिखने, सुनने, बोलने, देखने व कहने का हौसला हो...
हम सभी सत्य तक पहुँचने व उसे सामने लाने का ईमानदार प्रयास करें...
तभी एक देश के रूप में हमारा कोई भविष्य होगा...



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मेरे 'विवेकी' मित्रों,

मशहूर अंग्रेजी स्तंभकार करन थापर का यह आलेख पढ़ा आज के हिन्दुस्तान टाइम्स में... कुछ काफी गंभीर बातें लिखी हैं उन्होंने गाँधी जी के उनकी समग्रता में मूल्याँकन के बारे में... मैंने उचित समझा कि आपसे भी शेयर करूँ उन बातों को...

वे लिखते हैं बापू की मृत्यु के ६३ साल बाद आज हम लोगों को यह चर्चा अवश्य करनी चाहिये कि महात्मा गाँधी के कुछ अत्यधिक विवादास्पद, अतर्कसंगत व अस्वीकार्य विचारों के बारे में हमारा क्या रूख होता ?

अलेक्स वॉन तुजलमॉन की किताब 'हिस्ट्री ऑफ इन्डिपेन्डेन्स एन्ड पार्टिशन, इन्डियन समर (Alex Von Tunzelmann’s history of independence and partition, Indian Summer) से उद्धरण देते हुऐ वे लिखते हैं...

"Gandhi, as we know, was a pacifist. His commitment to non-violence was unequivocal and absolute. This lead him to advise the British not to oppose Hitler’s and Mussolini’s attempts to conquer. “Let them take possession of your beautiful island …” he said, “allow yourself, man, woman and child, to be slaughtered, but you will refuse to owe allegiance to them."

अहिंसा में विश्वास करने के चलते गाँधी जी ने हिटलर व मुसोलिनी के ब्रिटेन पर कब्जा करने के प्रयासों पर ब्रिटेन को सलाह दी " उनको अपने खूबसूरत द्वीप का कब्जा ले लेने दो... अपने आदमियों, औरतों व बच्चों का उन द्वारा वध होने दो लेकिन आप उनके राज्य के प्रति आस्था दिखाने से इन्कार कर देना "

सोचिये यदि गाँधी जी १९६२ के चीनी हमले या १९६५ के पाकिस्तानी आक्रमण या हाल ही में हुऐ कारगिल घुसपैठ पर यह कहते तो क्या होता ?

"Gandhi was not convinced of Hitler’s evil. “I do not consider Herr Hitler to be as bad as he is depicted”, he wrote in 1940. “He is showing an ability that is amazing and he seems to be gaining his victories without much bloodshed.” Gandhi felt that Germans of the future “will honour Herr Hitleras a genius, a brave man, a matchless organiser and much more.”

गाँधी जी ने १९४० में लिखा " मैं हिटलर को उतना बुरा नहीं मानता जितना उसे बताया जाता है... वह चमत्कारिक योग्यता दिखा रहे हैं व उसने अधिकतर जीतें बिना ज्यादा रक्तपात के पाई हैं... भविष्य के जर्मन हिटलर को एक बेजोड़ संगठक, अत्यंत गुणवान व बहादुर व्यक्ति के तौर पर सम्मानित करेंगे... "

कितना गलत था बापू का यह आकलन ?...


"what is truly inexplicable is Gandhi’s response to the Nazi treatment of the Jews. Von Tunzelmann, drawing upon Louis Fisher’s biography of the Mahatma, says he advised the Jews to offer passive resistance and even give up their own lives as sacrifices. He asked them to pray for Adolf Hitler. “Even if one Jew acted thus”, he wrote, “he would salve his self-respect and leave an example which, if it became infectious, would save the whole of Jewry and leave a rich heritage to mankind besides.”

नाजियों द्वारा यहूदियों के साथ किये गये व्यवहार पर गाँधी जी का रवैया समझ न आने योग्य था लुई फिशर द्वारा लिखी जीवनी के अनुसार गाँधी जी ने यहूदियों को निष्क्रिय प्रतिरोध करने व यहाँ तक कि अपना जीवन बलिदान करने को कहा, उन्होंने यहूदियों को हिटलर के लिये प्रार्थना भी करने को कहा...गाँधी ने लिखा " यदि एक भी यहूदी ऐसा करता है तो वह अपने आत्म सम्मान को बचा लेगा व यदि यह चलन फैल गया तो इससे पूरी यहूदी कौम भी बचेगी व मानव जाति को एक मूल्यवान धरोहर भी मिलेगी..."

" Even after the concentration camps were discovered and the full horror of the Holocaust revealed, this is what Gandhi told Louis Fisher in 1946: “Hitler killed five million Jews. It is the greatest crime of our time. But the Jews should have offered themselves to the butcher’s knife. They should have thrown themselves into the sea from cliffs …”

यहाँ तक कि जब यातना शिविरों का पता चल गया व नाजियों द्वारा किये यहूदियों के महासंहार की विभीषिका भी दुनिया के सामने जाहिर हो गई तब भी गाँधी जी ने १९४६ में लुई फिशर को बताया " हिटलर ने ५० लाख यहूदियों को मरवाया, यह हमारे दौर का सबसे बड़ा अपराध है... परंतु यहूदियों ने स्वयं को अपनी इच्छा से कसाई के चाकू के आगे प्रस्तुत करना चाहिये था... उन्हें स्वयं ही किसी खड़ी चट्टान से समु्द्र में कूद जाना चाहिये था... "

करन थापर कहते हैं कि यह जानते हुए भी कि गाँधी अहिंसा के पैरोकार थे, फिर भी यहूदियों को हिटलर का विरोध न करने, उसके लिये प्रार्थना करने व स्वयं को बलिदान के लिये प्रस्तुत करने की राय देना न केवल अजीब था अपितु यह असंवेदनशील, अपमानजनक व क्रूर भी था (to tell Jews not to resist Hitler but pray for him and offer themselves as sacrifices is more than bizarre. It’s insensitive, demeaning and cruel.)

सबसे अंत में करन थापर यह कहते हुऐ अपनी बात समाप्त करते हैं कि 'ब्रह्मचर्य के साथ उनके प्रयोगों' की तरह ही युद्ध, हिटलर व यहूदियों के महासंहार पर गाँधी जी के विचारों को मात्र उनकी व्यक्तिगत सनक या विचित्रता कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता... यदि वे सत्तासीन होते तो उनके यही विचार हमारे देश की नीतियाँ बनते... इसलिये इन विचारों की चर्चा व उन पर ध्यान देना जरूरी है... और यदि अंत में इन विचारों को स्वीकार्य रूप में समझाया नहीं जा सकता तो हमें उनकी खुल कर निंदा (आलोचना) करनी चाहिये व उन्हें नकार देना चाहिये...


दोस्तों मैं तो सहमत हूँ इस से...


आपका 'विवेक' क्या कहता है ?





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*** करन थापर का यह आलेख अपने मूल रूप में यहाँ पर है... पाठकगण यहाँ भी अपनी प्रतिक्रिया दे सकते हैं।
*** यह ब्लॉगलेखक उन सभी लेखकों व वैबसाइटों का आभार व्यक्त करता है जिनके लिंक इस आलेख में दिये गये हैं।
*** सभी चित्र साभार : Google images.





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शुक्रवार, 21 जनवरी 2011

पपीते में अंडे दे कर भाग गई मुर्गी...पर कहाँ गई वो... इसी बहाने वर्चुअल थॉट स्पेस पर एक चिंतन भी...

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मेरे 'महा-वीर' मित्रों,
शायद ही कोई ऐसा ब्लॉगर हो जो भड़ास के बारे में न जानता हो, 'जय जय भड़ास' का उद्घोष करने वाला, किसी भी मुद्दे पर किसी को भी जनता की जुबान में खरी-खरी कहने का दम रखने वाला यह ब्लॉग ब्लॉगवुड के प्रमुख आकर्षणों में से एक है... अभी हाल ही में एक दुखद बात यह हुई कि इसके संचालकों में से एक डॉ० रूपेश श्रीवास्तव जी की पुज्य माता जी की असमय मृत्यु हो गई, दिवंगत आत्मा को मेरी श्रद्धाँजलि... माता जी को कुछ ऐसा बुखार हुआ जिसके कारण का अंत तक नहीं पता चल पाया...
अब भड़ास पर ही अकसर पोस्ट लिखता है 'अनूप मंडल', बकौल डॉ० रूपेश श्रीवास्तव यह 'अनूप मंडल' तकरीबन ३००० लोगों का एक समूह है जिसमें कई ख्यात प्रतिष्ठित वैज्ञानिक तक शामिल है इनकी वैबसाइट है जगतहितकारिणी... यह सभी लोग जैन समुदाय से खास नफरत करते हैं व उन्हें राक्षस तक कहते हैं... 'जय नकलंक देव' का नारा देने वाल यह समूह तंत्र-मंत्र में भी यकीन करता है...

अब इन्हें अच्छा मौका मिल गया व इन्होंने 'डॉ० रूपेश जी की माता जी मृत्यु नैसर्गिक नहीं अपितु एक क्रूर हत्या थी' नाम से एक ___दो___तीन ___ चारपाँच भागों में एक पूरी सीरिज ही छाप दी इस पर... जो इन्होंने लिखा उसका लब्बो लुबाब यह है कि बाजार से खरीद कर लाये अनछुऐ पपीतों से तांत्रिक ने कुछ सामान निकाला... इन्हीं के शब्दों में...

***तांत्रिक ने पूजा आदि का विग्रह सजा कर हल्दी के चूर्ण से एक वृत्ताकार मंडल बनाया जिसमें रख कर उसने पपीतों पर बंधा लाल कपड़ा खोला और एक एक करके उन्हें घर के चाकू से ही काटा। पपीते काटने पर बीजों के अलावा क्या निकलेगा ये तो उम्मीद ही न थी लेकिन जब पहले पपीते में से साड़ी का एक तिहाई टुकड़ा, करीब दो सौ ग्राम सूखी लाल मिर्चें आदि जैसी सामग्री निकली तो सभी लोग भौचक्के रह गये

***दूसरा पपीता तांत्रिक ने काटा तो उसमें से बकरे की घुटनों से काटी हुई चार टांगें, दो अंडे, दो शंख जिनके मुंह बालों के गुच्छे से बंद करे गए थे,ब्लाउज की दो काटी हुई आस्तीनें, अगरबत्तियां आदि सामग्री निकली।

***तीसरा पपीता काटने पर उसमें से कुछ हड्डियां, दो लाल कपड़े और लकड़ी से बनाई गुडियानुमा आकृतियां, दो नींबू जिनमें कि पचास साठ आलपिनें चुभोई हुई थी आदि निकली।


अब यह साधारण समझ की बात है कि अंडा तो मुर्गी ही दे सकती है इसी तरह बकरे की कटी टाँगें होने के लिये बकरे का पैदा होना व किसी के द्वारा उसे काटना भी जरूरी है, साड़ी को कोई बुनेगा भी...शंख समंदर से लाने होंगे... पर 'अनूप मंडल' के अनुसार यह सब सामान पपीतों के अंदर बिना उनको काटे तंत्र से पहुंच गया... और यही माताजी की बीमारी का कारण भी था... है न मजेदार बात...

क्योंकि यह अनूप मंडल जैनों को गाली देता है इसलिये प्रतिवाद करते हैं अमित जैन (जोक्पीडिया )... पर एक खूबी है कि तमाम बेसिरपैर की बातों व अपने पूरे धर्म को दी जा रही अपमानजनक गालियों के बावजूद वे कभी भी अदालत या कानून की धमकी नहीं देते...

ऐसे में मुझे दिखाई देती हैं ब्लॉगवुड में दी जा रही कानूनी कार्यवाही की धमकी व एक दूसरे सज्जन द्वारा अपने प्रभाव का प्रयोग कर कार्यवाही करने की परोक्ष धमकी भी... तो मुझे लगता है कि यह कहाँ आ गया मैं ?...

मित्रों, यहाँ आप किसी को कुछ भी लिखने से रोक नहीं सकते... जिसे लिखना होगा वह टोर के जरिये लिख देगा... फिर क्या बिगाड़ लोगे उसका ?

इस वर्चुअल थॉट स्पेस की यही तो खूबी है यारों कि यहाँ सब कुछ जो किसी आदमी के दिमाग में चलता या चल सकता है...छपा मिलेगा... यह नये दौर का वैचारिक विश्व है दोस्तों...अगर कोई बात चुभे तो जवाब दो, मुकाबला करो, या मैदान छोड़ भाग जाओ... पर किसी को संकलकों से ही बाहर कर दो, किसी का बहिष्कार कर दो, किसी को जेल भिजवा दो... यह सब नहीं चलने वाला...

हम सभी समझें कि ब्लॉगिंग क्या है... इसी उम्मीद के साथ कि कोई अन्यथा नहीं लेगा...

आभार!




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चित्र साभार : Google images.

बुधवार, 19 जनवरी 2011

अमाँ अब आप ही बताओ कि क्या है ये !!!

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मेरे 'स्नेही' मित्रों,

आज देख रहा था पीछे मुड़कर...

यह ब्लॉग बनाया था अप्रैल २००९ में, तब हिन्दी ब्लॉगिंग का एबीसीडी भी नहीं मालूम था... पर सही मायनों में मेरा ब्लॉग सफर शुरू हुआ १६ अगस्त २००९ से जब मैंने अपने ब्लॉग को ब्लॉगवाणी व चिट्ठाजगत पर सूचीबद्ध किया व चंद लाइनें एक - दो - तीन - चार किस्तों में छाप दी...

आज समय है नहीं मेरे पास जो कुछ नया पेश कर सकूँ... :-(...

तो एक बार फिर पेश हैं वही लाइनें ...


मजबूती से थमा गिलास, फिसल कर बिखर गया,
ऐसा सिर्फ उन्हीं निगाहों का, कमाल हो सकता है।

गौर से देखा था तूने ? मेरे मेहबूब के माथे को
सिंदूर तो नहीं ही होगा , गुलाल हो सकता है।

आज तेरे सामने, जो मिट्टी में लोट रहा।
वही कृष्ण कल,पूतना का काल हो सकता है।

न तेरा हरा है, न मेरा केसरिया होगा।
लहू का रंग तो, केवल लाल हो सकता है।

ये वो हंगामा नहीं, बदल डाले जो दुनिया को,
बासी कढ़ी में आया,नया उबाल हो सकता है।

अभी देर नहीं हुई, कद्र हमारी जान लो,
वरना इस भूल का ,तुम्हें मलाल हो सकता है।

चुप रहना सीख ले,या झूठ को दे सम्मान ,
लोक तंत्र में सच बोलने, पर बवाल हो सकता है।

बतला तुम रहे हो,पर नहीं मुझे यकीं,
इस नाचीज का उन्हें,इतना ख्याल हो सकता है।







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चित्र साभार : Google images.


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सोमवार, 17 जनवरी 2011

सपनों का उड़ान लेने से पहले टूटना, प्रतिभा की बेबसी और पनपना हीनता व असंतोष का... क्या होगा आगे अब ?

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मेरे 'दूरदर्शी' मित्रों,

एक चीज जिसे शुरूआत से ही मैं कभी भी ठीक से समझ नहीं पाया वह है आर्थिक उदारीकरण व भूमंडलीकरण के इस दौर में देश में हुऐ उच्च व व्यवसायिक शिक्षा में हुए तथाकथित सुधार व उनका निजीकरण, उदारीकरण व व्यवसायीकरण...

आज आप किसी भी सड़क पर निकलिये, किसी भी राज्य में... हर तरफ कुकुरमुत्तों की तरह उगे हुऐ दिखेंगे तमाम इंस्टीट्यूट...अगर कोई थोड़ी बड़ी जगह होगी तो वहाँ पर एकाध निजी या डीम्ड विश्वविद्मालय का भी होना तय है... इसी तरह लगभग रोजाना ही खुल रहे हैं नये नये मेडिकल कालेज भी...

एकाध अपवाद को यदि छोड़ दें तो यह तमाम इंस्टीट्यूट व विश्वविद्मालय खोले गये हैं तथाकथित एजुकेशन माफिया के द्वारा... या तो इनके पीछे स्थानीय नेता हैं या बिल्डर या रिटायर ब्यूरोक्रेट अथवा धनकुबेर... कुछ ने अपने काले धन को यहाँ पार्क कर सफेद किया है तो कुछ इस आस से इस क्षेत्र में आये हैं कि अब आगे कई पुश्तों तक बिना ज्यादा कुछ किये धरे नोट छपते रहेंगे...

जब उद्देश्य इतने 'महान' हों तो इन प्रमोटर्स का एक मात्र उद्देश्य रह जाता है इन्वेस्टमेंट पर अधिकाधिक रिटर्न प्राप्त करना...फैकल्टी पूरी हो न हो... मानक भले ही अधूरे रहें...कम तन्ख्वाहें देने व मनमानी के कारण अधिकाँश के पास फैकल्टी का अभाव होता है... पर थैलियों के बल पर यह संचालक यह जरूर सुनिश्चित कर लेते हैं कि नियंत्रक निकाय की ओर से जब उनका निरीक्षण हो तो ग्रेड सही मिले... रिजल्ट भी इसी तरह मैनेज किये जाते हैं... यह सब खेल इसलिये होता है ताकि काउंसलिंग के समय अधिक से अधिक मुर्गियाँ इनके जाल में फंसें... एडमिशन सीजन में तो बाकायदा प्रिन्ट व इलेक्ट्रानिक मीडिया में कैंपेन चलाते हैं यह...

हाल ही में आल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन ने यह कहा कि इंजीनियरिंग कोर्स में वही प्रवेश ले जिसने १०+२ में कम से कम ५०% अंक हासिल किये हों तो गुजरात राज्य ने यह कह कर विरोध किया कि यदि इस नियम को मानें तो राज्य की २९००० सीटों में से १९००० खाली रह जायेंगी... अब आप हालात का अंदाजा खुद लगा सकते हैं...विद्मार्थी के पास योग्यता भले न हो यदि उसके पिता के पास धन की कमी न हो तो उसका कैरियर भी डिजाइन किया जा सकता है... ऊपर से तुर्रा यह है कि फर्जी आंकड़ेबाजी कर इन सीटों की संख्या व उनमें ली जाने वाली फीस हर साल बढ़ाने की कवायद बदस्तूर हर साल करती हैं हमारी सरकारें...

एक उदाहरण देता हूँ मेडिकल शिक्षा का... बच्चा काबिल नहीं, कंपिटीशन से डरता है... आप मत डरिये...जेब भरी हो, सब हो जायेगा... मिलिये किसी कालेज के प्रबंधक से... सारे रास्ते बता देगा वह... १५-२० लाख शुरू का डोनेशन...५ लाख सालाना फीस... १ लाख सालाना होस्टल खर्चा... १ लाख सालाना किताबों का...पास होने की गारंटी...मतलब कुल ५० लाख में तैयार एक 'होनहार' डॉक्टर... स्पेशियलाइजेशन चाहिये तो निकालो फिर २५ लाख 'सीट' के... अब आप सोचिये कि ७० लाख के इन्वेस्टमेन्ट से तैयार हुआ 'होनहार' क्या जायेगा गाँव में २७००० रूपल्ली महीना की नौकरी में सेवा करने...

ऐसे न जाने कितने उदाहरण और फील्ड्स के भी दे सकता हूँ आपको... पैसा पास हो तो कोई भी 'काबिल होनहार' बन सकता है... परंतु यदि किसी बच्चे के माँ-बाप के पास अथाह पैसा नहीं है तो उसके सपनों को केवल बहुत ही कम सरकारी कालेजों की उपलब्ध सीटों के बीच ही सिमटना होगा... पेड सीटों की तो सोच भी नहीं सकता वह...

एक युवा जब अपनी खुली आंखों से यह देखता है कि उससे बहुत कम योग्यता रखने के बावजूद दूसरा कैरियर की इस दौड़ में मीलों आगे सिर्फ इसलिये निकल गया क्योंकि उसके बाप के पास काली कमाई की 'थैली' है... तो यह बेबसी, सपनों का उड़ान भरने से पहले यों चकनाचूर होना, यह हीनता की भावना आगे के जीवन में उस से क्या करा दे, यह कल्पना ही भयावह है...

इस दौर में अपनी औलाद के कैरियर को सुनिश्चित करने की 'शाश्वत मध्यवर्गीय चाह' सीधे-सीधे तौर पर कईयों को उनके न चाहते हुऐ भी भ्रष्टाचार की ओर भी धकेल रही है...

यह राज्य, यह सरकारें जो ७५००० हजार करोड़ के कर्ज एक झटके में माफ कर देते हैं... लाखों करोड़ की सबसिडी खाद, खाद्म, डीजल, एलपीजी और न जाने किन किन चीजों पर दे सकते हैं... लाखों करोड़ रूपयों के घोटालों को खपा सकते हैं... लाखों करोड़ रूपये केवल चुनावी नतीजों को प्रभावित करने के लिेये बंदरबाँट की योजनाओं में लगा सकती हैं... वह उच्च तथा व्यवसायिक शिक्षा को सर्वसुलभ, सहज व एक सामान्य आदमी की पहुंच में रखने के अपने दायित्व से क्यों इतनी निर्ममता से पल्ला झाड़ चुकी हैं... मुझे तो समझ नहीं आता...

आपको समझ आता हो तो समझायें...

सभी के विचारों का इंतजार रहेगा...




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चित्र साभार : Google images.



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शनिवार, 15 जनवरी 2011

हाँ मैं एक गुटबाज तो हूँ ही !!!


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रहना साथ अपने हमख्यालों के
दिमाग को अपने रखना खुला


होना खड़ा अन्याय की खिलाफत में
बेकसूर के हक में उठाना आवाज


सुनना केवल अपने दिल की कही
लगाये मुखौटों को फेंकना उतार


रखना जिंदा अपने जमीर को सदा
हर छल-छद्म को करना अनावृत


बचना स्वयंभू महानों के स्तुतिगान से
अजूबी-अनूठी-जुदा बात कहना कोई


करना अलग-अलग दूध को पानी से
बार-बार मूर्ख बनने से कर देना इंकार


बिठाना तुच्छ जाहिलों को उनकी जगह पर
अपने जीवन मूल्यों को हरदम रखना ऊपर


देखना पतन-गहराईयों को हिकारत से
और ऊँचाईयों को समुचित देना सम्मान



तेरी निगाह में अगर यह गुटबाजी है...
तो मेरे अजीज, मगर 'बौने' दोस्त



यह अपराध तो मैं अकसर किया करता हूँ...

हाँ, मैं एक पहले दर्जे का 'गुटबाज' हूँ !



तुझे तेरा यह शब्दकोश मुबारक !







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शुक्रवार, 14 जनवरी 2011

सत्य वचन !

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देखो...


छत पर चढ़ा

छाती पीटता

दहाड़ें मारता

दुनिया को दिखाता

रो रहा है वो

दफना कर मुझे

मेरी मौत पर...



कितना नासमझ है

शायद

नहीं जानता बेचारा

जब

आज तलक

नहीं कभी कोई

दफना पाया मुझे


फिर...

बिसात उसकी क्या


वैसे भी...

उसके तो

पैर ही नहीं हैं।







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चित्र साभार : गूगल इमेजेज्




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सोमवार, 10 जनवरी 2011

हाँ मैं नहीं देता कभी भी, पैगाम अमन का : मुझे झगड़े पसंद जो हैं !

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देखो आज फिर लड़ रहे हैं वो दोनों
लड़ने भी दो न खुलकर उन्हें
दे लेने दो ढेर सारी गालियाँ भी
कही-अनकही, भद्दी औ बेढंगी सी

लगा लेने दो ढेर सारे इलजाम
निकल जाने भी दो दोनों के ही
मन के अंदर का सारा गर्द-गुबार

'अभिव्यक्ति की गरिमा'
और 'शब्दों की मर्यादा'
महज दो शब्द समूह ही तो हैं
क्या करेगा इनका कोई जब
दिल में उसके पलती हो नफरत
बारंबार टीसता हो, हुआ अपमान
भुला न पाता हो वह दोनों को

हर किसी के बस की बात है नहीं
नीलकंठ हो पचा पाना गरल को

दिल दिमाग या शरीर में भी
बने चाहे कहीं पर भी मवाद
बाहर निकलना ही चाहिये उसको

रूकता है मवाद गर कहीं पर भी
रूक रूक कर टीसता है वह फोड़ा
एक आदमी का तो पूरा वजूद ही
खो जाता है उन टीसों से जूझने में

मुझे इसीलिये पसंद हैं झगड़े
अच्छा लगता है मुझे रिस जाना
गंदे, बदबूदार, सड़े मवाद का

नहीं करता हूँ कभी बीच-बचाव
होने देता हूँ मैं इन झगड़ों को
नहीं देता कभी भी, पैगाम अमन का

होते ही रहने चाहिये ढेर सारे झगड़े
धार्मिक,वैचारिक,सैद्धांतिक,व्यक्तिगत भी

यही झगड़े हैं तभी बची है दुनिया
और बचा हुआ है इंसान भी
वरना कब का जीत जाता मवाद

हाँ! मुझे बहुत पसंद हैं झगड़े !





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चित्र :साभार गूगल इमेजेज.





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बुधवार, 5 जनवरी 2011

उफ्फ़ यह ठंड तो आइडियाज् तक को जमा देती है... टैंट के भीतर से एक पोस्ट खास आपके लिये !

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मेरे 'उष्ण (Warm)' मित्रों,

छुट्टी है आज अपन की... ऊपर से सोने पर सुहागा यह कि श्रीमती भी मायके गई हैं... दो तारीख को जब ठंड ज्यादा पड़ने लगी तो जिला प्रशासन ने स्कूल बंद कर दिया बिटिया का दस दिन के लिये... सुनहरा अवसर जान श्रीमती ने भी मायके जाने की बात चलाई... 'मन मन भावे, मूंड हिलावे' की तर्ज पर हमने भी तमाम एतराज करते हुऐ (यह ध्यान रखते हुऐ कि इतना फोर्सफुल एतराज न हो कि वे जाने का इरादा ही छोड़ दें) उनको जाने की इजाजत { ;-)} दे दी... अब आज के लिये सोचा तो था कि सुबह-सुबह उठ कर एक ठो पोस्ट ठेल ही देंगे...


मगर...

उफ्फ यह ठंड...

कौन नामाकूल कह रहा है कि गर्म हो रही है दुनिया ?... अब ग्लोबल वार्मिंग न हो इसके लिये अपना भी फर्ज कुछ बनता है न... इसलिये मैं कमरे में रूम हीटर या ब्लोअर जैसी कोई चीज नहीं चलाता... अब छुट्टी और अपन घर में अकेले... उठे ठीक सात बजे...चाय बनाई और चाय हाथ में लेकर लैपटॉप गोद में रख फिर रजाई के अन्दर... जब तक चाय चलती रही तो तमाम आइडिया थे दिमाग में... पर जैसे ही चाय खतम... अचानक ही दिमाग से विचार भी गायब... अजब-गजब चीज है यह ठंड भी... आदमी तो आदमी यह तो आइडिया तक को जमा देती है...

अब आप पूछोगे कि और दिन ऐसा क्यों नहीं होता...

बताता हूँ तफसील से...

जब भी मैं घर पर होता हूँ तो मेरी श्रीमती जी को मेरी चन्द बातों से एलर्जी है... वे हैं अखबार पढ़ना, दूसरा लैपटॉप पर नैटसर्फिंग करना, तीसरा किसी भी तरह की कोई किताब पढ़ना, चौथा टेलीविजन पर खेल देखना, पाँचवाँ जब वे बात कर रहीं हों तो उनके चेहरे के अलावा किसी और देखना, छठा एक जगह पर नजर गड़ाये विचार मग्न बैठना (जिसे वे अपनी भाषा में दीवार तोड़ना कहती हैं), सातवाँ... :-(... अब क्या क्या गिनाऊँ... 'वह' अनंत उनकी कथा अनंता...

अब होता यह है कि जब भी मैं लैपटॉप पर बैठा होता हूँ हर थोड़ी-थोड़ी देर में वे अपने कीमती समय से थोड़ा वक्त निकालकर मेरे पास आती हैं और एकाध व्यंग्य बाण दाग जाती हैं...या फिर उन नजरों से घूर कर देखती हैं जो सियाचिन ग्लेशियर तक को पिघला दें... अब इन सब से बचने, तोड़ खोजने व जवाब ढूंढने में जो मेहनत लगती है वह मेरे पोस्ट आइडियाज् को भी जमने से बचा लेती है...एक डर यह भी होता है कि अगर सब्र खोकर मेरे लैपटॉप का पावर बटन दबा दिया गया तो सारी मेहनत मटियामेट हो जायेगी... इन सब वजहों से आइडियाज् भी फ्लो में होते हैं और की बोर्ड पर उंगलियाँ भी...

आज यह सब कुछ नहीं हैं...

दूसरी बार की चाय देने वाला भी कोई नहीं... :-(

टीवी पर एशेज का आखिरी टेस्ट चल रहा है और इंग्लैंड एक समय अजेय और आज भी उसी अकड़ में रहने वाली कंगारू टीम का मान-मर्दन जारी रखे है... ऐसे में रजाई से बाहर कौन निकले... कम से कम मैं तो नहीं...

ठान कर बैठा हूँ कि चाहे जो हो पोस्ट तो आज ठेली ही जायेगी... आईडियाज् भी जमने नहीं चाहिये ठंड से... तो मैंने हल भी बहुत ही आसान निकाला है... गया लैपटॉप भी रजाई के अंदर... टैंट जैसा बना लिया है रजाई का... केवल एक झिरी सी छोड़ी है मैच देखने को... ठीक ठाक काम चल रहा है, आइडियाज् भी गर्मी पा तरल हो गये हैं... नतीजा है यह पोस्ट...

कैसी लगी आप बताओगे ही... नहीं भी बतायेंगे तो अपने को क्या फर्क पड़ना है... अभी अपना पैक्ड लंच आता ही होगा... उसके बाद ?... हा हा हा, फिर से रजाई के आगोश में जाने वाला हूँ मैं...

वो एक जुमला है न ' ब्वायज विल आलवेज बी ब्वायज '... चालीस पार का ही सही... अपनी माँ का तो आज भी ' ब्वाय ' ही हूँ मैं भी...

कड़ाके की ठंड... उस पर छुट्टी... उस पर टोकाटाकी करने को बीबी भी न हो घर में... कुछ भी खाने-पीने की आजादी... धरा पर यदि कहीं स्वर्ग है तो यहीं है, यहीं है, यहीं है... मेरी रजाई के भीतर...


बस श्रीमती जी को बता न देना कोई... :)








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रविवार, 2 जनवरी 2011

दंभी बौद्धिक आभिजात्य (Elitist Intellectual Snobbery) हिन्दी ब्लॉगिंग के लिये सबसे बड़ा खतरा बन कर उभरा है!

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मेरे ' आम ' मित्रों,

वो कहते हैं न खाना अभी ठीक से परोसा भी नहीं गया... लूटने चील-कौव्वे पहले आ गये... बीते साल के हिन्दी ब्लॉगिंग के परिदॄश्य को यदि आपने भी देखा होगा... तो मुझ जैसा ही कुछ न कुछ लगा जरूर होगा आपको...

दंभी बौद्धिक आभिजात्य (Elitist Intellectual Snobbery) हिन्दी ब्लॉगिंग के लिये सबसे बड़ा खतरा बन कर उभरा है... नाम तो नहीं लूंगा किसी का... पर एक गिरोह उतर आया है हिन्दी ब्लॉगिंग में... जो एक तरफ तो अकादमिक-साहित्यिक दुनिया के घिसे-पिटे हुए नामों को येन-केन प्रकारेण हिन्दी ब्लॉगिंग का चमकता नक्षत्र ब भाग्य विधाता स्थापित व सिद्ध करने पर तुला है... दूसरी तरफ यही गिरोह अपनी पोस्टों व टिप्पणियों के माध्यम से एक ऐसा माहौल बनाने में जुटा है कि इनका गिरोह के सदस्य तो केवल आपस ही में एक दूसरे की पीठ खुजायें ही... नया पाठक भी गिरोह से बाहर के ब्लॉगरों को पढ़ना ही एक हेय कृत्य समझ बैठे...

इनके कुछ सैट जुमले हैं...

" अमाँ तुम जाते ही क्यों हो उस _ _ _ _वादी के ब्लॉग पर, मैं तो वहाँ झाँकता तक नहीं "
" फलाना लिखता क्या खाक है, अखबारी खबरों पर ही पोस्ट बना देता है "
" सेल्फ हेल्प बुक्स व मोटिवेशनल चार्ट्स के अनुवाद को छाप देने से क्या कोई ब्लॉगर बन जाता है "
" वो तो बिना अंग्रेजी के शब्द बीच में डाले पोस्ट ही नहीं लिख सकता "
" चुटकुले और तुकबंदियाँ क्या ब्लॉगिंग कहलायेंगी "
" उस के लिखे में न लय है न छंद और न बहर "
" आलतू फालतू के ब्लॉग पर जाकर टिप्पणी देने या बहस करने के बजाय अगर अपनों तक ही सीमित रहते तो दो-चार कालजयी रचनायें(???) और ठेल दिये होते "
" अलाना-फलाना चाहे कितने भी पाठक जुटा ले या पोस्टें ठेल दे, ब्लॉगिंग के इतिहास में उसके लिये कोई जगह नहीं होगी "
" अपनी पोस्ट की तुम शुरूआत मेरी उस पोस्ट जैसी करते और अंत फलाने जैसा तो शायद मेरे पसंद करने लायक बन पाती "
" अभी आपको और परिपक्वता की जरूरत है "
" जानते नहीं हम इतने बड़े ब्लॉगर हैं, हमारी तरफ असहमति की उंगली उठाने से पहले आत्म-अवलोकन कर लो और आत्म-आकलन भी "
" उसके लिखे में बिल्कुल भी क्लास नहीं है "


मेरा आपसे सिर्फ और सिर्फ यही कहना है कि ऐसे किसी भी जुमले या गिरोह से घबराओ मत...ब्लॉगिंग को एक थोड़ा बड़े श्रोता वर्ग से वार्तालाप की तरह मानो... लिख डालो जो भी तात्कालिक तौर पर आपके मन में आये... पोस्टों में भी और टिप्पणियों में भी... एक मंच मिला है आपको बिना किसी संपादक के अप्रूवल के अभिव्यक्त होने का... उस मंच को 'सम्मान' के भूखे चील-कौव्वों के हाथ नहीं जाने देने का...


नये साल में आप सभी को ' हैप्पी ब्लॉगिंग ' की शुभकामनाओं के साथ...


जाते-जाते वह चार लाईनें भी आपकी नजर कर ही देता हूँ... जो पोस्ट लिखते लिखते और इन गिरोहों के बारे में सोचते-सोचते ही दिल से निकली हैं...


तेज सर्दी का मौसम यह है नहीं

गुनगुनी धूप भी निकली है आज

कपड़े भी पूरे ही पहना हुआ है

बतला सकते हो आप कि फिर भी

मेरे सामने से निकलता यह शख्स

इतना अकड़ा हुआ सा क्यों है ?





आभार!



चित्र साभार : गूगल इमेजेस... http://images.google.com/

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