सोमवार, 26 दिसंबर 2011

Ohh, Mouth Watering !!! आइये असली खेल भी देखा जाये अब...

.
.
.

बॉर्डर गावस्कर ट्रॉफी
जहाँ मैं रह रहा हूँ आजकल, वहाँ एक तो ठन्ड बहुत है ऊपर से कोहरे की मार... दोपहर बारह बजे तक भी रोशनी नहीं आ पाती पूरी... एक अजीब सी मुर्दनी छायी रहती है दिल-ओ-दिमाग पर... टी वी भी चीख-चीख कर 'लोकपाल' के अवतरण से संबंधित विवादों को ही हवा देता रहता है... ऐसे में एक बदलाव सा लेकर शुरू हो रहा है टीम इंडिया का 'टूर डाउन अंडर''... एक अरसे से आस्ट्रेलियन परंपरा रही है मेलबर्न में'बॉक्सिंग डे' के दिन विजिटिंग टीम के साथ टेस्ट मैच खेलने की... 'बॉक्सिंग डे' की परंपरा के अनुसार ही रंग बिरंगे कपड़े पहने जम कर खाने और जम कर पीने में भी मगन आस्ट्रेलियाई समर्थकों का सैलाब उमड़ पड़ता है मेलबर्न के मैदान पर... और ज्यादातर मामलों में आस्ट्रेलियाई टीम अपने समर्थकों को निराश भी नहीं करती...

इस बार 'बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी' के लिये खेले जा रहे चार मैचों की सीरिज के पहले टेस्ट की शुरूआत होगी 'बॉक्सिंग डे' के रोज... इस बार मामला कुछ अलग सा है... बहुत सालों में पहली बार आस्ट्रेलियाई टीम कमजोर मानी जा रही है अपने प्रतिद्व्न्दी के मुकाबले में... और माना जा रहा है कि भारतीय टीम इस बार जीत कर ही लौटेगी... पर... अगर क्रिकेट इतना पूर्वानुमेय व निश्चित होता तो क्या इसके इतने दीवाने होते ?... इसे ' गेम ऑफ ग्लोरियस अनसर्टेनिटीज' यों ही नहीं कहा जाता...

एक विशुद्ध क्रिकेट प्रेमी के लिये 'टेस्ट क्रिकेट' से बेहतर कुछ भी नहीं... किसी भी खिलाड़ी या टीम के लिये टेस्ट एक 'अल्टीमेट टैस्ट' की तरह है... क्रिकेट अन्य खेलों की तरह महज एक खेल नहीं है, यहाँ बहुत से कारक खेल पर असर डालते हैं... मिसाल के तौर पर आसमान में बादलों का घिरना या चटख धूप का निकलना, मैदान पर बह रही हवा की रफ्तार व दिशा, पिच पर घास का रहना या काटा जाना, पिच से बॉलर को मिलने वाली बाउंस, आउट फील्ड की तेजी या धीमापन, सीमा रेखा की पिच से दूरी, दर्शकों का समर्थन या हूटिंग, गेंद का नया या पुराना होना, पिच की मिट्टी का दरकना या बंधे रहना, बल्लेबाज की मानसिक दॄढ़ता, गेंदबाज की चतुराई, अंपायरिंग का स्तर आदि आदि बहुत सी चीजें हैं जिनके कारण इस खेल के बारे में निश्चितता से कभी कुछ नहीं कहा जा सकता... अगर यह सीरिज साथ-साथ देखते रहे आप और मैं तो काफी कुछ और बातें होंगी इसके बारे में...

अब आते हैं पहले मैच पर...

आस्ट्रेलिया ने प्लेइंग इलेवन की घोषणा कर दी है और टीम है...

1-David Warner, 2-Ed Cowan, 3-Shaun Marsh, 4-Ricky Ponting, 5-Michael Clarke (capt), 6-Michael Hussey, 7-Brad Haddin (wk), 8-Peter Siddle, 9-James Pattinson, 10-Nathan Lyon, 11-Ben Hilfenhaus. 


आस्ट्रेलिया की इस टीम में दोनों ओपनर अपेक्षाकृत नये हैं... डेविड वार्नर उन चुनिंदा खिलाड़ियों में हैं जिन्होंने २०-२० से वनडे टीम और फिर टेस्ट टीम का सफर तय किया, गेंद पर ताकत से प्रहार करते हैं पर गेंदबाज के लिये एक उम्मीद हमेशा रहती है उनकी बैटिंग के दौरान... रिकी पोंटिंग व माइकल हसी खराब फॉर्म से जूझ रहे हैं व दोनों के लिये ही अगले दो टेस्ट बहुत अहम रहेंगे... खराब प्रदर्शन दोनों का ही कैरियर खत्म कर सकता है... कुल मिलाकर आस्ट्रेलियाई बल्लेबाजी बहुत प्रभावी नजर नहीं आती... अपना स्थान बचाये रखने के लिये पड़ते दबाव का काफी असर पोंटिंग व हसी के खेल की स्वाभाविक लय पर पड़ेगा, अब यह भारतीय गेंदबाजों के ऊपर है कि वह इस कमजोरी का कैसे दोहन करते हैं... शॉन मार्श व क्लार्क दोनों ही औसत खिलाड़ियों में ही कहे जायेंगे...

गेंदबाजी में दाहिने हाथ के ऑफ स्पिनर नाथन लियोन शायद ही कुछ असर छोड़ पायें... हिलफेन्हॉस लंबे विकेट टू विकेट स्पैल डालने के लिये जाने जाते हैं यदि दूसरे छोर से विकेट निकल रहे हों तो वह अपने छोर से रन रोक कर दबाव बढ़ाने में सक्षम हैं... जेम्स पैटिन्सन और पीटर सिडल के हाथ इस बार अपनी टीम की गेंदबाजी की कमान है... पैटिन्सन तेज हैं अच्छा उछाल पाते हैं... बदन पर आती तेज गेंद भारतीय कमजोरी है और वे बहुत अच्छी 'पर्फ्यूम बॉल' फेंकते हैं... 'पर्फ्यूम' बॉल बोले तो वह बॉल जो बल्लेबाज के चेहरे के पास से इतनी तेजी से निकले कि उसे चमड़े की गंध महसूस हो बस्स, बाकी ज्यादा कुछ करने-सोचने की स्थिति न रहे उसकी...पीटर सिडल मेहनती हैं और अच्छी गति से गेंद दोनों ओर स्विंग कराते हैं... 



भारत की टीम की घोषणा टॉस से पहले ही होगी पर संभावित टीम है...

1-Virender Sehwag, 2-Gautam Gambhir, 3-Rahul Dravid, 4-Sachin Tendulkar, 5-Virat Kohli, 6-VVS Laxman, 7-MS Dhoni (capt, wk), 8-R Ashwin, 9-Zaheer Khan, 10-Ishant Sharma, 11-Umesh Yadav. 

पहले भारत की गेंदबाजी की बात कर लें... अश्विन एक्युरेट हैं, एक छोर को बाँध सकते हैं, दूसरी टीम यदि दबाव में हो तो विकेट भी निकालेंगे... पर भारतीय आक्रमण का सबसे मारक अस्त्र अश्विन अभी इस सीरिज में नहीं बन सकते... उमेश यादव तेज हैं व उन्हें तेज गेंद डालने पर ही अभी अपना ध्यान लगाना चाहिये... पुछल्ले बल्लेबाजों को उनकी तेजी सस्ते में निबटा सकती है... सबसे बड़ा प्रश्न चिन्ह है जहीर खान व इंशात शर्मा, दोनों ही चोटों के बाद वापसी कर रहे हैं व दोनों ने ही मैच फिटनेस अभी तक साबित नहीं की है... बहुत बड़ा जुआ है इन दोनों पर दाँव लगाना... घुड़दौड़ में अक्सर कहा जाता है कि ' रेस में घोड़ा ही दौड़ता और जीतता है न कि रेपुटेशन'... यही बात क्रिकेट पर भी लागू होती है, इन दोनों के पहले किये गये प्रदर्शन के आधार पर ही चयनकर्ताओं ने इन पर दाँव लगाया है... हो सकता है चयनकर्ता सही साबित हों... पर मुझे अभी भी यह लगता है कि शुरूआत की एक-दो पारियों में इन दोनों की खूब ठुकाई होगी...

बल्लेबाजी में सहवाग अच्छे फॉर्म व टच में हैं... अगर दौरे की शुरूआत की दो तीन पारियों में वे चल निकले... तो उनके द्वारा लगाई पिटाई के जख्मों से उबर नहीं पायेगा यह आस्ट्रेलियाई आक्रमण... गंभीर बड़े स्टेज का खिलाड़ी है और इस दौरे में उनके अच्छा करने की उम्मीद है... भारत को यदि अच्छा करना है तो द्रविड़ और लक्ष्मण  भारतीय पारी को बाँधे रखने का रोल निभाना होगा... लक्ष्मण की एक महारत पुछल्लो के साथ लंबी साझेदारियाँ निभाने की है, वह इस दौरे पर काम आयेगी... धोनी काफी सकारात्मक दिख व बोल रहे हैं यह खिलाड़ी अच्छा करेगा इस दौरे पर... मैं भी सभी की तरह मना रहा हूँ कि सचिन तेंदुलकर अपना 'अंतर्राष्ट्रीय सैकड़ों का सैकड़ा' जल्दी से जल्दी पूरा करें... एक फैन के नाते उनसे यह अपील भी है कि 'सैकड़ों का सैकड़ा' पूरा करते ही वह अपना बल्ला टाँग दें... मेरी इस अपील की तीन वजहें हैं... पहली तो यह कि इस रिकॉर्ड को पाने के बाद सचिन के पास पाने के लिये कुछ और नहीं रह जाता... दूसरी यह कि आजकल सचिन के खेल में वह पहले सी बात नहीं रही, अपेक्षाओं के बोझ तले दबे, रनों के लिये संघर्ष करते व दब कर खेलते सचिन को देखते हुऐ मन में हूक सी उठती है, जिसने भी अपने शिखर पर सचिन का खेल देखा होगा वह इस फर्क को समझ सकता है, मैं अपने मन में सचिन की वही छवि बरकरार रखना चाहता हूँ, सचिन अब उस स्तर पर है जहाँ पर उनके बनाये रनों की संख्या के बजाय रन बनाने का तरीका ज्यादा अहम है... तीसरी और सबसे अहम बात है कि ३८ बरस के सचिन अब मध्यक्रम की नयी पौध का रास्ता रोक रहे हैं जो उन्हें नहीं करना चाहिये... भारतीय की जगह सचिन यदि इंग्लिश या आस्ट्रेलियाई होते तो शायद काफी पहले ही सन्यास ले लिये होते...

इस बार किसके हाथ आयेगी ट्रॉफी?

अब बात आती है पहले मैच के परिणाम के बारे में कयास लगाने की... तो मेरी राय में भले ही बहुत थोड़ा सा ही सही पर आस्ट्रेलिया का पलड़ा भारी लग रहा है मुझे तो...

वैसे मुझसे ज्यादा खुश भी शायद कोई नहीं होगा अपने ही गलत होने पर ... :)

अब सोया जाये, सुबह उठना जो है मैच देखने... :)









...



रविवार, 18 दिसंबर 2011

'जोकपाल' बनकर रहेगा 'लोकपाल'...क्या भ्रष्टाचार की भी कोई जाति, वर्ग, धर्म या लिंग होता है ?... अब आप मौन क्यों हैं अन्ना ?

.
.
.


सच कहूँ तो 'लोकपाल' या 'जनलोकपाल' की माँग को लेकर अन्ना व उनकी टीम द्वारा चलाये जा रहे इस आंदोलन का फैन तो मैं कभी भी नहीं रहा... क्योंकि मेरा मानना है कि सर्वत्र व्याप्त जो भ्रष्टाचार का बोलबाला आज हम देख रहे हैं उसकी जड़ें बहुत गहरी व हमारे सामूहिक मानस से जुड़ी हैं... आज हम लोगों के बीच भ्रष्टाचार व धन कमाने व जीवन में आगे बढ़ने के नाजायज तरीकों के लिये एक तरह की सहज सामाजिक स्वीकार्यता सी विकसित हो गयी है... 'जो सफल है वही सही व अनुकरणीय है' एक पूरी की पूरी पीढ़ी का यही जीवन मंत्र हो गया है... अब ऐसे  दौर में हमें असली नायक तो मिलने से रहे... जबकि हम युगों-युगों से अवतारों-नायकों-मसीहाओं की बाट जोहता समाज रहे हैं... तो एक बहुत बड़ी डिमांड पैदा हो गयी हमारे देश में नायकों की, नायक थे नहीं, पर पब्लिक में उनकी माँग बनी हुई थी... फिर अपना हिन्दुस्तानी जुगाड़ काम आया... छोटे-छोटे व्यक्तित्वों के बड़े-बड़े कट-आउट बनाये गये बाकायदा उनके चेहरे के चारों ओर आभामंडल पेन्ट किये हुऐ, चौराहों पर लगाये गये, रात-दिन अखबारों से, टीवी चैनलों से, पंडालों से, जलसों-रैलियों से उन व्यक्तित्वों की विशालता-विराटता-महानता के बखान किये गये... और मिल गयी हमको धर्म के, अध्यात्म के, योग के, जीवन दर्शन के, समाज सेवा-सुधार के, राजनीति के, खेल के, सिनेमा के, आदि-आदि के १५१ फीट ऊँचे कट आउट नायकों-महानायकों की एक लंबी लिस्ट...

आज के समय के सबसे चर्चित नायक हैं अन्ना व उनकी टीम-अन्ना... और भ्रष्टाचार को इस महादेश से उखाड़ फेंक फिर से रामराज्य (?)  बनाने के लिये कानूनन बने जिस अवतार के अवतरण का सपना दिखाती है यह टीम... वह अवतार है 'जनलोकपाल'... इसमें कोई शक नहीं कि हमारे विशाल मध्यवर्ग का एक तबका अपनी अपनी मोमबत्तियाँ, टीशर्टें, टोपियाँ, धूप के चश्मे, लहराते तिरंगे, ट्वीट्स, फेसबुक मैसेजेज् आदि आदि के साथ इस अवतार को जमीं पर लाने के लिये, और वह भी संसद के इसी सत्र में, कृतसंकल्प भी है... प्रयोग के तौर पर इस 'जनलोकपाल-अवतार' के करतब-करिश्मे देखने में भी कोई हर्ज  भी तो नहीं है आखिर...

नौ सदस्यीय इस प्रस्तावित लोकपाल का सदस्य बनने के लिये जो योग्यतायें अनिवार्य रूप से किसी में होनी चाहिये वह है... ईमानदारी, निष्पक्षता, निर्भीकता, भ्रष्टों को उनके अंजाम तक पहुंचाने का उत्साह-संकल्प तथा हमारे तंत्र व नियमों की समझ व उसी तंत्र से भ्रष्टाचार निवारण का कार्य लेने का अनुभव... ऐसे में जब यह खबर आती है कि लोकपाल में आरक्षण की तैयारी है  और अपनी टीम अन्ना को इस पर कोई आपत्ति नहीं है ... लोकपाल में आरक्षण के पैरोकारों द्वारा नौ सदस्यीय लोकपाल पैनल में इस आरक्षण की माँग के पीछे समानता या रोजगार के अवसर जैसा कोई तर्क नहीं है... वजह सिर्फ इतनी है कि यदि नौ सदस्यीय पैनल में उनके वर्ग-जाति-धर्म के भी सदस्य होंगे तो आरोपित होने पर उनके हितों का भी ख्याल रखा जायेगा... उनको भय है कि आरक्षण न होने पर जातिगत पूर्वाग्रहों के चलते किसी जाति विशेष के आरोपियों के प्रति अन्याय हो सकता है... यहाँ पर यह भी ध्यान रहे कि भारत की उच्च न्यायपालिका में आरक्षण लागू नहीं है, व कभी भी कोई मुवक्किल यह कहता नहीं दिखता कि मेरा मुकदमा मेरी ही जाति के न्यायाधीश द्वारा सुना जाये... हमारी किसी भी अन्य संवैधानिक संस्था जैसे चुनाव आयोग, केन्द्रीय सतर्कता आयोग, महालेखाकार-नियंत्रक ( CAG ) में भी आरक्षण नहीं है...

ऐसे में जब कोई यहाँ पर यह कहता है कि...

Corruption is, ironically, the one realm where India’s caste identities, which otherwise assert themselves forcefully, vanish miraculously. The pantheon of our leaders who face grave corruption charges shows that corruption is the one area where caste and communal divisions don’t count: it is the ultimate equal-opportunity enterprise.

और यह यह पूछता भी है कि...

So, if corruption can be caste-blind, and if corruption can be truly secular, why can’t the Lokpal too be?


तो आप मौन क्यों हैं अन्ना ?

आपकी यह चुप्पी बहुत असहज करती है... क्यों नहीं आप जंतर मंतर से गर्जना करते कि लोकपाल वही बने जो चयन के समय उपलब्ध सभी उम्मीदवारों में से लोकपाल बनने के मानकों के आधार पर  सर्वाधिक योग्य हो... इससे कोई फर्क किसी को नहीं पड़ना चाहिये कि इस आधार पर चयन होने के बाद नौ के नौ सदस्य महिला ही बन जायें या मुस्लिम या ईसाई या पिछड़े या दलित या सिख या पारसी या ब्राह्मण ही...

बोलिये अन्ना, भ्रष्टाचार को खत्म करने की राह की सबसे पहली सीढ़ी है सच को कहने का साहस दिखाना...





...

रविवार, 11 दिसंबर 2011

द ग्रेट इंडियन लोकपाल तमाशा !!! एक ढोंग का फूहड़ प्रदर्शन है यह !!!

.
.
.




कल स्टार न्यूज का 'एक्सक्लूसिव' देख रहा था... किसी बड़ी गाड़ी में अन्ना हजारे ड्राइवर के साथ वाली सीट पर बैठे हुऐ थे व पीछे की सीट पर रिपोर्टर व उसके बगल में कैमरामैन... साक्षात्कार लोकपाल के मुद्दे पर चल रहे उनके आंदोलन को लेकर हो रहा था... पर एक बात जो खली वह यह कि कई कई बार अन्ना ने यह कहा कि मेरा पूरा जीवन देश व गरीब के लिये समर्पित रहा है व आगे भी रहेगा... अन्ना को बार बार इस बात को प्रमुखता से बताने की क्या जरूरत आन पड़ी यह समझ नहीं आया...

कुल मिलाकर मामला अब केवल चार बातों पर अटका पड़ा है...

पहली- ग्रुप 'सी' व 'डी' के कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में लेना... ग्रुप 'सी' के कर्मचारियों की संख्या ५७ लाख बताई जा रही है... और लोकपाल नौ सदस्यीय प्रस्तावित है... ग्रुप 'सी' के कर्मचारियों के पास फैसले लेने के अधिकार भी नहीं होते और सभी मामलों में उनका एक सुपीरियर अधिकारी उसी बिल्डिंग में उन पर नियंत्रण रखता है... अगर इनको लोकपाल के दायरे में शामिल किया गया और ' मेरा भारत महान- सौ में से निन्यानवे बेईमान' की तर्ज पर अगर इनमें से दो प्रतिशत की शिकायतें भी हर साल की गई तो एक लाख चौदह हजार शिकायतों को नौ लोग निपटाने में न जाने कितने दशक लगायेंगे... पर समझ यह नहीं आता कि सरकार क्यों अड़ी है, ले ले दायरे में... बाद की बाद देखी जायेगी... अगले साल नौ हजार सदस्यों वाले 'सर्वजनलोकपाल' के लिये आंदोलन होगा... यह कोर कमेटी बेरोजगार तो नहीं रहने वाली...

दूसरा- 'सिटिजन चार्टर' ... यह एक छोटी सी बात है हर कार्यालय के बाहर उसमें होने वाले काम, कार्यरत लोगों के नाम, पते, फोन नंबर, उनके दायित्व, उनके नियंत्रक अधिकारी के नाम, पते, फोन नंबर तथा किसी असुविधा की स्थिति में किससे शिकायत की जाये, भ्रष्टाचार की किससे शिकायत हो आदि आदि यह लिखा होता है... लोकपाल के दायरे में इसका क्रियान्वयन लाने में कोई बुराई नहीं... पर फिर वही शंका... केवल नौ लोकपाल कहाँ कहाँ देखेंगे इसे... सरकार न जाने क्यों अड़ी है इस पर...

तीसरा- 'प्रधानमंत्री का लोकपाल के दायरे में आना'... अपने आज के प्रधानमंत्री स्वयं इसके लिये राजी हैं... पर क्या इस विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र इस महादेश को अपने ही प्रधानमंत्री पर शक करना चाहिये... यह मानने का क्या आधार है कि हमें लोकपाल के नौ सदस्य तो एकदम ईमानदार मिलेंगे पर प्रधानमंत्री बेईमान... क्या ऐसा कोई प्रधानमंत्री संसद का सामना कर पायेगा जिसके खिलाफ किसी झूठी शिकायत पर ही लोकपाल की जाँच चल रही है... आपने अपनी न्यायिक सत्ता के दर्प में रेलवे स्टेशनों पर हंगामा मचाते न्यायाधीशों के किस्से तो सुने ही होंगे... अगर नौ में से कोई लोकपाल भी ऐसे ही बौरा गया तो क्या वह संसदीय लोकतंत्र को अस्थिर नहीं कर देगा ?... पर जंतर-मंतर पर लहराते तिरंगों व टोपी-बैनर-टीशर्ट धारी समर्थकों की भीड़ के बीच इस चिंता पर ध्यान देने की जहमत उठाती नहीं दिखती टीम अन्ना... भीड़ कुछ भी कहे पर संसद इस पर सोच समझ कर ही फैसला लेगी, इसका मुझे पूरा यकीन है...

चौथा- 'सीबीआई' का लोकपाल के आधीन आना... इसमें शक नहीं कि अब तक की सभी सरकारें अपने राजनीतिक सहयोगियों व विरोधियों पर दबाव डालने के लिये सीबीआई का रणनीतिक इस्तेमाल करती रही हैं... भ्रष्टाचार के जो मामले लोकपाल सीबीआई को जाँच करने को सौंपे उन मामलों में लोकपाल को मॉनिटरिंग तथा संबंधित अधिकारियों को नियंत्रित करने का अधिकार होना ही चाहिये... आशा है कि इस मसले पर सर्वसहमति हो ही जायेगी...

देर सबेर लोकपाल आ ही जायेगा... पर क्या इससे भ्रष्टाचार छूमंतर हो जायेगा... भ्रष्टाचार को, कर चोरी को, धन कमाने के नाजायज तरीकों को जो एक सहज सामाजिक स्वीकार्यता आज मिली हुई है, क्या हम लोगों के इस रूख में बदलाव आयेगा कभी...

कितना अच्छा होता कि अन्ना अपनी सभा में हर आने वालों से कहते कि घर जाते हुऐ हाथ में एक कोयले का टुकड़ा रखो... और घर जाते हुऐ रास्ते में मिलने वाले हर भ्रष्ट, करचोर, नाजायज कमाई करने वाले शख्स के मकान की बाहरी दीवार पर काले रंग का एक क्रॉस बनाते जाना... बहुत सारे मकानों की दीवारें काली होतीं... कईयों को पहला निशान अपने ही मकान की बाहरी दीवार पर भी लगाना होता... पर ईमानदारी से काली की गई यह दीवारें एक नये उजाले का आगाज होतीं... वह उजाला जो कोई भी जोकपाल-लोकपाल या जनलोकपाल नहीं ला सकता... पर क्या ७४ साल की उम्र में इस तरह की अपील करने का रिस्क उठा सकते हैं अन्ना... मुझे नहीं लगता...

इस तरह के आंदोलन कितने ही चलें... हम बदलने वाले नहीं... क्योंकि यह बदलाव हमारे दिल से नहीं उपजा है... यह केवल मुंह दिखाई-फर्जअदाई का ढोंग रचा जा रहा है... बहरहाल हर चमत्कार को नमस्कार करने वाले अपने देश की परंपरा को सम्मान देते हुऐ इस ढोंग को भी नमस्कार करिये !








...



बुधवार, 30 नवंबर 2011

आने दो एफडीआई को मल्टी ब्रान्ड रिटेल में... देख ली जायेगी...

.
.
.


यूनान-ओ- मिस्र-ओ- रोमा, सब मिट गए जहाँ से ।
अब तक मगर है बाकी, नाम-ओ-निशाँ हमारा !

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-जहाँ हमारा !


१२० करोड़ का मुल्क होने के कुछ अपने खास फायदे भी हैं... एक सबसे बड़ा फायदा यह कि बाकी दुनिया के लिये हम एक बड़ा व संभावनापूर्ण बाजार हैं... हमारे पास १२० करोड़ पेट हैं भरने को, १२० करोड़ तन हैं ढकने को...हमारा गरीबी रेखा से नीचे की आय का आंकड़ा मुख्य रूप से इस बात पर आधारित है कि एक हिन्दुस्तानी इससे कम में अपने को जिन्दा नहीं रख सकता... और यदि इससे भी कम कमाता है तो उसे सरकारी मदद की जरूरत है... यानी एक आम हिन्दुस्तानी अपने ऊपर कम से कम ३२ रूपये तो रोज खर्च करता ही है... अगर यह भी मान लिया जाये कि यह सारा पैसा केवल खाने पीने, साबुन-तेल व जरूरत भर कपड़ों में खर्च होता है तो ३२ x १२० = ३८४० करोड़ रोजाना का बाजार हैं हम और इसका तीस फीसदी वह मुनाफा है जो बिचौलियों तथा थोक व खुदरा व्यापारियों की जेब में जाता है... फिर मोटा-मोटा हिसाब करिये ३८४० का तीस फीसदी माने ११५२ करोड़ और साल के ३६५ दिन का जोड़ें तो ११५२ x ३६५ यानी ४२०४८० करोड़ सालाना के मुनाफे के पीछे की लड़ाई है यहाँ ... यह भी ध्यान में रखें कि यह चार लाख बीस हजार करोड़ सालाना की जो राशि मैंने आंकी है वह एक कंजर्वेटिव एस्टीमेट है और असली आंकड़ा इसका कई गुना हो सकता है... इस सारे मुनाफे का दो तिहाई जाता है खाना और किराना का सामान बेचने वालों के हिस्से में... बाकी दुनिया दुखी है कि चार लाख बीस हजार करोड़ रूपये के दो तिहाई यानी दो लाख अस्सी हजार करोड़ रूपया सालाना के इस मुनाफे में संगठित खुदरा व्यापार की हिस्सेदारी महज दो फीसदी ही है जबकि इसे पचीस फीसदी तक तो आसानी से बढ़ाया जा सकता है... यानी यह सारी हाय तौबा सत्तर हजार करोड़ सालाना (कम से कम) के मुनाफे को लेकर है...


इस बात पर कतई यकीन नहीं करिये कि दूर देस में बैठी कोई कंपनी केवल इसलिये इस महादेश में आना चाहती है कि वह चाहती है कि हमारे किसान को उसकी मेहनत का सही मोल मिले या हमारा खाना बेकार न हो या हमारे उपभोक्ता को सही दाम पर सामान मिले... खेल सारा का सारा मुनाफे के लिये एक नया बाजार तलाशने का ही है...

हंगामा केवल इसी फैसले पर बरपा है, इस बात पर दोनों पक्ष एक मिलीभगत वाली चुप्पी साधे हैं कि इस फैसले के साथ साथ ही सरकार ने एक और बड़ा फैसला लिया है और वह है सिंगल ब्रान्ड रिटेल में विदेशी सीधे निवेश की सीमा ५१% से बढ़ा १००% करने का...

इस फैसले के पक्ष में सरकार विरोध में विपक्षियों के अपने-अपने तर्क हैं... मैं उन्हें यहाँ दोहराना उचित नहीं समझता... आप काफी कुछ सुन चुके होंगे इस बारे में...

केवल दो उदाहरण रखूँगा आपके सामने...

पहला...

सन १९७७ में जनता पार्टी सरकार के तत्कालीन मंत्री (अब दिवंगत) जॉर्ज फर्नांडीज ने शीतल पेय बनाने वाली कंपनी कोकाकोला को बाहर का रास्ता दिखा दिया... भारतीय बाजार में कैम्पा कोला, डबल सेवन व थम्स अप जैसे बहुत से शीतल पेय ब्रांड उभर कर आ गये... फिर बाद की किसी सरकार ने कोका-पेप्सी को दोबारा न्यौता दिया... उस समय बहुत सी उम्मीद भी दिखाई गई कि कैसे इनके आने से व इनके बनाये पोटेटो चिप्स बिकने से भारत के आलू किसान को फायदा होगा... ऐसा कुछ हुआ नहीं... आज भी हर साल बेचारे किसान का आलू सही भाव न मिल पाने के कारण सड़ता है... अपनी गहरी जेबों की बदौलत इन कंपनियों ने भारतीय शीतल पेय के लगभग पूरे बाजार पर कब्जा कर लिया... और सबसे बड़ी बात तो यह कि आम हिन्दुस्तानी की मानसिकता ही बदल दी... गर्मी के मौसम में खासकर अगर आप देहात में भी जायेंगे तो पेप्सी-कोक ही मंगाये जायेंगे आपकी कायदे से खातिर के लिये... पेप्सी-कोक को चाव से पीते और उसी दुकान के बगल बिक रहे जूस (जो कि सस्ता भी है) की ओर झाँक कर भी न देखते अपने बच्चों को देख आत्मा को कष्ट पहुंचता है मेरी... यह हमारी भी नाकामी ही है कि हम अपनी जूस की दुकान चलाने वालों को ' फूड सेनिटेशन व हाइजीन' के बारे में जागरूक नहीं कर पाये... और कई ग्राहक इसीलिये मजबूरी में भी कोक-पेप्सी पीते हैं...

दूसरा...

केन्चुकी फ्राइड चिकन, मैक डोनाल्ड, कैफे कॉफी डे, बरिस्ता, डोमिनो, पिजा हट जैसे ब्रांड जब भारत में अपनी दुकानें खोले थे... तो इसी तरह की आशंकाओं के चलते विरोध हुआ था... पर आज क्या हाल है... बाकी की दुनिया में इनका ग्राहक वहाँ का आम आदमी है... पर भारत में केवल उच्च वर्ग व उच्च मध्य वर्ग ही इनका ग्राहक बन पाया है अभी तक... यह और बात है कि इनकी आड़ में भारत के परंपरागत स्नैक, फास्ट-फूड बेचने वालों ने भी अपने दाम काफी बड़ा दिये और शर्माशर्मी अपने ग्राहक के बैठने और आराम के लिये बेहतर सुविधायें भी दी... यानी इनके आने से भारतीय दुकानदार का फायदा भी बढ़ा व प्रोफाइल भी...

कुछ इसीलिये मैं अपने को इस कदम के समर्थन या विरोध में खड़ा नहीं पाता... अभी भारत के दस लाख से ज्यादा की आबादी वाले केवल ५३ शहरों के लिये इसे खोला गया है... ट्रायल के तौर पर आजमाने के लिये बुरा नहीं है यह आइडिया... चार पाँच साल बाद इसकी समीक्षा हो... और अगर यह कंपनियाँ उपभोक्ता को कम कीमत पर सामान देने, उत्पादक को उसकी जायज कीमत देने तथा बिचौलियों के नाजायज मुनाफे पर रोक लगाने के अपने दावे पर खरी न उतरें तो किसने कह दिया कि अब आगे और जॉर्ज फर्नांडीज नहीं पैदा होंगे इस देश में... :)

बाई द वे, मुझे यह जरूर बताइयेगा कि सिंगल ब्रांड रिटेल में विदेशी निवेश की सीमा ५१% से बढ़ा १००% करने का भी कोई विरोध कर रहा है क्या कोई इस देश में... जबकि यह फैसला सीधे-सीधे ज्यादा दूरगामी व हमारी अर्थव्यवस्था पर खराब असर डालने वाला है... यह पब्लिक को दिखाने के लिये राजनीतिक दलों द्वारा किये जा रहे जुबानी जमाखर्च, धरनों, बंद व विरोध प्रदर्शन से प्रभावित नहीं होइये... अंदरखाने सब मिले हुऐ हैं... बस केवल भावनाओं पर मरहम लगाया जा रहा है... दिख नहीं रहा कि किस तरह बेशर्म होकर प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक दोनों मीडिया इस फैसले में हमारे फायदे को रेखांकित कर रहे हैं...

गोलमाल है भई सब गोलमाल है इस मुल्क में...

इसलिये मेरे साथ साथ पोस्ट की शुरूआत में लिखी चार लाइनें एक बार फिर पढ़िये...

सीना चार इंच फूला कि नहीं ?


... :))







...



गुरुवार, 17 नवंबर 2011

कॉरपोरेट भ्रष्टाचार, यहाँ है काले धन का मूल स्रोत, उठाओ आवाज !!! पर यह आवाज क्या कभी उठेगी भी ?

.
.
.


अपनी पिछली पोस्ट में मैंने इस बात की ओर ईशारा भी किया था, और इत्तेफाक देखिये कि वह बात आज ही जाहिर भी हो गई...
देखिये...
यह लिंक
और
यह...
और
यह भी...
उद्धृत करता हूँ...


NEW DELHI: The Central Information Commission has asked RBI to make public the names and other details of top 100 industrialists of the country who have defaulted on loans from public sector banks.

The commission also directed the central bank to post on its website complete information on all such industrialists as part of suo motu disclosure mandated under section 4 of the
RTI Act before December 31 and update it every year. RBI had objected to making this information public saying it was held by it in fiduciary capacity and disclosing it would adversely affect economic interests of the state.

Information commissioner Shailesh Gandhi
agreed that information was fiduciary in nature but said such exemption did not stand when there was larger public interest in the disclosure. The order was in response to an RTI application filed by Haryana-based P P Kapoor, who had sought details of default in loans taken from PSU banks by various industrialists besides list of defaulters, top 100 defaulters, name of the businessman, address, firm name, principal amount, interest amount, date of default and date of availing loan.

During the hearing, Gandhi asked RBI if the information about loan defaulters was held by it as part of statutory requirements. The PIO admitted that banks were providing information in fulfillment of statutory requirements. tnn


Gandhi in his order said, "In fact, information about industrialists who are loan defaulters of the country may put pressure on such persons to pay their dues. This would have the impact of alerting citizens about those who are defaulting in payments and could also have some impact in shaming them."


He said there was no doubt that details of top industrialists who had defaulted in repayment of loans must be brought to the citizens' knowledge and there was certainly a larger public interest that would be served on disclosure of the same, hence clause of fiduciary information did not stand.


"This (disclosure) could lead to safeguarding the economic and moral interests of the nation. The commission is convinced that the benefits accruing to the economic and moral fibre of the country far outweigh any damage to the fiduciary relationship of bankers and their customers if the details of the top defaulters are disclosed,"
he said. 


यह एक बहुत पुराना बिजनेस फंडा है हमारे बिजनेस घरानों का, आठ कंपनी खोलो, सात का लोन पचा जाओ और आठवीं को चमका कर रातों रात बिजनेसजगत का सितारा बन जाओ... १२० करोड़ के देश में महज १०० ऐसों के नाम जाहिर करने से कुछ नहीं होगा... कम से कम १२०० के नाम जाहिर हों और यह भी जाहिर हो कि उनकी कौन कौन सी कंपनियाँ सफलतापूर्वक चल रही हैं... काले धन का असली स्रोत यहीं पर है... पर क्या इनके खिलाफ आवाज उठेगी... शायद कभी नहीं... क्योंकि एनजीओ को, धार्मिक ट्रस्टों को, योग व आयुर्वेद के ट्रस्टों को अनाप-शनाप चंदे का पैसा देने में भी यही आगे हैं... और जबानी लफ्फाजी छोड़ कोई अपने पैरों पर कुल्हाड़ी नहीं मारने वाला !...अपने आकाओं के खिलाफ कैसे बोलेगा कोई ?

सुन रहे हो न भाई लोग !




...



रविवार, 13 नवंबर 2011

क्या इनकी भी आर०सी० कटेगी कभी ? जनता के पैसे से ' प्रभुओं ' की हवाई उड़ानें क्यों ?

.
.
.

हमारे हिन्दुस्तान का गाँव-देहात का आदमी जिस एक चीज से शायद सबसे ज्यादा घबराता है वह है उसके नाम की आर०सी० का कटना... आर०सी० बोले तो रिकवरी चालान... किसी भी सरकारी देय या बैंक से लिये किसी कर्ज के मामले में एक आम हिन्दुस्तानी ने जरा सा डिफाल्ट किया नहीं कि तड़ से कटी आर०सी०... फिर क्या होगा... रेवेन्यू विभाग का कोई भी अधिकारी, एस०डी०एम०, तहसीलदार, नायब तहसीलदार, कानूनगो, लेखपाल या कई मामलों में तो इनके ड्राईवर भी एक या दो खाकी वर्दी वालों के साथ उसे उसके घर से उठा ले जायेंगे व उसे तहसील की हवालात में बंद कर देंगे... उसे छोड़ा तभी जाता है जब उसके घरवाले कुल देय का आधा-तिहाई जमा कर दें।

आज कुछ इसी तरह की बात हो रही है, निजी क्षेत्र की भारतीय विमान कंपनियाँ पिछले कुछ समय से घाटे में हैं... 'बेलआउट' की माँग कुछ इस तरह से की जा रही है मानो इन कंपनियों को जिन्दा रखने से गुरूतर कोई दायित्व सरकार का नहीं है... हमेशा की तरह हमारे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के हजारों-हजार करोड़ रूपयों के इन कंपनियों में एक्सपोजर का हवाला दिया जा रहा है... आइये देखते हैं कि हुआ क्या है...

पारदर्शिता के इस जमाने में कुछ अगर पूर्णत: अपारदर्शी है तो वह है हमारा कॉरपोरेट जगत... खास तौर पर हमारे कॉरपोरेट घराने... पीढ़ियों से यह घराने सरकारी यानी जनता के पैसे पर पलते आये हैं... इनके काम करने का तरीका सीधा-सादा है... महज चार-पाँच करोड़ की सीड कैपिटल से यह किसी भी नये बिजनेस वेन्चर के प्रमोटर-सर्वेसर्वा बन जाते हैं... एक आम हिन्दुस्तानी को भले ही महज पचास हजार के कर्ज के लिये हमारे बैंक जूते घिसवा दें... परंतु इन घरानों के नाम पर हमारे सरकारी बैंक बिना कुछ आगा-पीछा सोचे सैकड़ों करोड़ रूपये निवेश कर देते हैं... रातों रात एक बड़ी कंपनी खड़ी हो जाती है... फिर IPO ( इनीशियल पब्लिक आफरिंग) लाया जाता है, दूर-दराज बैठे निवेशक अपना पैसा लगाते हैं... और प्रमोटर ६०-७०% की हिस्सेदारी अपने पास रखे हुऐ उन शेयरों के मार्केट कैपिटलाइजेशन के आधार पर हजारों हजार करोड़ का मालिक बन बैठता है... कंपनी चली तो प्रमोटर के बल्ले-बल्ले... और नहीं चली तो सरकारी बैंकों के एनपीऐ की लंबी चौड़ी लिस्ट में एक नाम और जुड़ जाता है... प्रमोटर तब तक सैकड़ो करोड़ कमा-खपा-पचा होता है... फिर किसी नये बिजनेस में मौके तलाशे जाते हैं...

आज पूरी दुनिया की इकॉनामी में मंदी का दौर है... पर तीन-चार साल पहले जब अर्थव्यवस्था उछाल पर थी तो अतिशयोक्ति पूर्ण  Future Projections  का अंदाज लगाते हुऐ हमारी विमानन कंपनियों ने विमान निर्माता कंपनियों को बड़े-बड़े ऑर्डर दे दिये... इन आर्डरों के पीछे निहित स्वार्थ रहे... हवाई अड्डों में इतना महंगा निजी निवेश हो गया कि आज विमान कंपनियों को एअरपोर्ट के टैक्स देने में आफत आ रही है... कॉरपोरेट टॉप ब्रास को इन तमाम डील मेकिंग व काम के पदों पर बैठे लोगों को वाइन-डाइन कराने के मेहनत भरे (?) काम के लिये करोड़ों की तनख्वाहें दी गईं... एयरलाइन के पायलटों को इतने ज्यादा वेतन भत्ते दिये गये जिसके वे हकदार नहीं थे... जरा सोचिये, उदारीकरण के इस दौर में पायलट बनने के लिये केवल १०+२ पास होना ही तो जरूरी है... पिता के पास यदि पैसा हो तो बिना कोई प्रतियोगिता दिये आस्ट्रेलिया, सिंगापुर या अमेरिकी-लैटिन अमेरिकी फ्लाईंग स्कूलों से साल-छह महीने में पायलट बन कर तैयार हो जाते हैं... खर्चा भी हर हाल में डोनेशन मेडिकल कालेज से एम०बी०बी०एस० करवाने से कम ही होगा... वह दिन दूर नहीं जब हमारे महानगरों में कोई बड़ा पत्थर हिलाने पर उसके नीचे से दो-तीन पाइलट टहलते निकलेंगे... कुछ इसी तरह केबिन-क्रू को भी ग्लैमराइज व ओवर-पेड बना दिया गया... खास तौर से पायलट तो इतने अड़ियल हो गये हैं कि एयर इंडिया के पायलटों का एक धड़ा महज इसीलिये हड़ताल पर जाने की धमकी देता है क्योंकि वह नहीं चाहता कि दूसरे धड़े के पायलटों को बोईंग के नये प्लेन ' ड्रीमलाईनर' को चलाने का मौका मिले...

कुल मिलाकर पूरी तरह से आश्वस्त होते हुऐ कि यदि पैसा डूबेगा तो सरकारी ही (जो बेचारी जनता का ही है)... एक आर्थिक रूप से अक्षम मॉडल के आधार पर हमारे विमानन क्षेत्र के लिये सपने गढ़े गये... किराया जो तेल के खर्चे, एयरपोर्ट के खर्चे, विमान के लीज के किराये, स्टाफ की तन्खवाह व लोड फैक्टर आदि के आधार पर निर्धारित होना था... असामान्य रूप से घटा दिया गया, कई मामलों में तो हवाईजहाज का सफर ट्रेन के सफर से भी सस्ता कर दिया... इतना सस्ता किराया देख पब्लिक हवाई जहाजों की ओर दौड़ी... तो हवाई उड़ान भरने वालों की दिनोंदिन बढ़ती संख्या दिखाकर सार्वजनिक बैंकों को भविष्य में मोटे लाभ के सपने दिखा उनका और पैसा कंपनियों में फंसा दिया गया...

अब जब यह विमानन कंपनियाँ घाटे में डूब रही हैं तो गुहार लगाई जा रही है सरकार से 'बेलआउट' की... जबकि सरकार को इन सबकी आर०सी० काटनी चाहिये... बैंको ने यह जो एक्सपोजर लिया है इन कंपनियों में उसकी जमानत के तौर पर जो भी चल या अचल संपत्ति रखी गई थी वह भी जब्त हो... सरकारी पैसा 'प्रभु-वर्ग' को हवाई यात्रा करवाने के काम में तो हरगिज-हरगिज नहीं इस्तेमाल होना चाहिये...

क्या इन सब प्रमोटर-मालिकों भी आर०सी० कटेगी कभी ? लोकपाल के दायरे में आयेगा क्या कभी कॉरपोरेट भ्रष्टाचार ? सुन रहे हो क्या India Against Corruption ?



...

शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

धन्यवाद, धन्यवाद, धन्यवाद, Oh God, If there is a God !!!

.
.
.

जब भी हम साथ खरीदारी करने जाते हैं तो कपड़े की दुकान पर यह अक्सर होता है कि श्रीमती जी किसी किसी कपड़े को दुकानदार को दिखाने के लिये खोलने ही नहीं देती... एक नजर में ही उसे नापसंद कर बस मुँह बिचका कर कुछ और दिखाने को कहती हैं... मैं मन ही मन मुस्कुराता हूँ उस समय... दुकानदार भी कुछ नहीं कहता... हम दोनों ही इस बात को जानते हैं कि जिस कपड़े को एक ग्राहक ने देखने से ही इन्कार कर दिया उसे भी कोई दूसरा पसंद कर ले जायेगा... पहन कर इठलायेगा और शौक से पहनता रहेगा काफी समय तक... अच्छी दुकान चलने के लिये जरूरी है कि वहाँ हर पसंद, हर रंग, हर किस्म और हर बजट के कपड़े हों...

अपनी यह दुनिया भी कुछ ऐसीइच है ना... सोचिये कितनी बेरंग, कितनी उबाऊ, कितनी अझेल हो जाती यह दुनिया, अगर सारे के सारे एक ही तरह से सोचने लगते, सबकी आस्था एक ही होती, सबका धर्म एक ही होता, सबका ईश्वर भी एक ही होता, सबका आहार भी एक सा ही होता... सारे सारे के सारे शाकाहारी ही होते या फिर सारे के सारे माँसाहारी ही होते... फिर कहाँ होता अपने आहार, अपने कर्मकान्ड, अपनी पूजा पद्धति, अपने त्यौहार को मनाने का तरीका, अपने लाश को निपटाने का तरीका, अपने धर्म-अपने ईश्वर, अपने निष्कर्ष, अपने नजरिये को दूसरे पर लादने-दूसरे के मुकाबले बेहतर बताने की होड़... कहाँ जरूरत होती सवाल-जवाब की, आरोप-प्रत्यारोप की, स्पष्टीकरण की, जिद पर अड़ने की, दूसरे को जिद्दी बताने की... सारी दुनिया एक ही रंग की सी हो जाती... क्या ऐसी दुनिया में जीने में कोई मजा आता, आनंद मिलता... हम सबके सोचने के तरीके, नजरिये, आस्था, धार्मिक विश्वास/अविश्वास व जो हमें दिख रहा है उसके आधार पर निकाले गये हमारे निष्कर्षों का यह अंतर ही हमारी इस दुनिया को रंगीन, दिलचस्प, रहने लायक व दिनोंदिन इंसान के लिये और बेहतर बनाता है... सबसे बड़ी बात यह है कि यही अंतर हमें रात को चैन की नींद देता है क्योंकि अगले दिन फिर एक लड़ाई जो लड़नी होती है हमें... अपने विश्वासों को सही ठहराने की !

संशयवादी हूँ मैं, और संशयवादी की प्रार्थना तो आपको पता ही है...

Oh God, If there is a God, Save my Soul, If there is a Soul !

आज उसी प्रार्थना में कुछ और जोड़ने का मन कर रहा है, बस ऐसे ही...

Oh God (If there is a God), Thanks (If you understand it) for creating such a diverse world (If you really created it) !



...

रविवार, 6 नवंबर 2011

भारत महादेश के 'नागरिक समाज' की जबरिया प्रतिनिधि बनी एक 'चौकड़ी' और उसके चंगुल में अन्ना !

.
.
.



Very soon, I am thinking on the lines of restructuring the Core Committee. I am hereby informing all the members of Team Anna. The reason being I have received letters from all over the country and states in favor of this agitation saying, ‘I am ready to pledge my life for this noble cause.’ The letters are written by retired Supreme Court Judges, retired High Court Judges, Brigadiers and Colonels from Army, Professors and Principals and educated people with idealism. Soon, these people will be categorized taking in to consideration the type of work they are willing to do. I have decided to put to use such people from all over the country and states who are willing to do voluntary service to the society.
The applicants have no expectations whatsoever and have applied with the aim of serving the nation and the society at large. Now we need to ensure these people and expand the members of Team Anna. Also we need to have able people and form a working committee. All members from every state will be given preference when forming a Core Committee. For effective communication they will be linked on-line.
The expenses of food and shelter for say 100 volunteers will be fulfilled by donations from people having clean character. It will enable us to build an effective agitation throughout the country. We have a long battle to fight ahead. In order to have a corruption-free India we can put all this to use.The people who have been alienated from this agitation…. I believe that not only India but for other countries too this will serve as a good example to rid their country off corruption. We do not want to form organizations but create volunteers on District and State level.
When there is an agitation happening at national level you will see people rising for the occasion from every state. In this struggle there won’t be a President, a Secretary or a treasurer. People will only work in the capacity of volunteers. Naturally we will need financial aid. No cash will be accepted. Donations in form of cheque or draft are welcome. But it should come from people having belief in lakhs of martyrs like Bhagat Singh, Rajguru and Sukhdev.
K.B Hazare
23.10.2011



ऐसा चाहा था अन्ना ने !

आंदोलन की 'कोर कमेटी' को और व्यापक व विस्तारित करने की इस इच्छा में कुछ भी गलत नहीं है...


अब इस बात का पुख्ता सबूत भी पेश कर दिया गया है कि वाकई अन्ना हजारे ने ही ऐसा चाहा था, फिर भी ऐसा लिखने पर राजू पारूलेकर को निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा टारगेट कर बदनाम व अपमानित किया जा रहा है... 

फिर भी मौन हैं अन्ना...

यद्मपि मैं इस आंदोलन के तौरतरीकों को सही नहीं मानता और परिणामों को लेकर भी अन्ना जितना आशावान नहीं, परंतु एक व्यक्ति के तौर पर अन्ना का प्रशंसक हूँ... इसलिये इस प्रकरण पर उनका रवैया खलता है... क्या यह आशा नावाजिब है कि एक ऐसा शख्स जिसकी ओर देश एक आशा से देख रहा हो, और कुछ नहीं भी तो कम-से-कम सत्य को कहने-स्वीकारने का साहस दिखाये...

मैं आपके लिये दिल से चिंतित हूँ अन्ना... 

आप कुछ कुपात्रों के चंगुल में फंसे दिखते हैं अब...

मेरी शुभकामनायें आपके साथ हैं !

 










...




शुक्रवार, 28 अक्तूबर 2011

दीपावली के अगले दिन भी वह गया क्यों नहीं ?

.
.
.


हफ्ते में तीन चार बार सुबह-सवेरे बस यों ही अपने शहर की सड़कों पर एकाध घन्टा तेज-तेज चलने या फिर दौड़ने की आदत सी बन गई है ...

बहुत कुछ दिखता है इस सुबह की सैर के दौरान...

इस बार दीवाली के अगले दिन जो दिखा, उसी से जनमी है यह पोस्ट...





वह गया क्यों नहीं ?

सुबह साढ़े पाँच बजे
बड़े चौराहे पर
बिखरे पड़े हैं
रात के जश्न के निशान
चिथड़ा-चिथड़ा कागज के टुकड़े
जो कभी थे बम की झालर
कुछ फुंके हुऐ अनार
आसमानी आतिशबाजी के खोल
और खूब सारे खाली डिब्बे

उन्ही सब के बीच है 
कूड़ा बीनता वह परिवार
टाट के हाथ सिले
बड़े बड़े थैले हाथ में लिये
बटोर रहे हैं वे
पटाखों के खाली डब्बे
माँ बाप को जल्दी है
अगले चौराहे पर जाने की
वह कह रहे हैं बच्चों को
जल्दी से डब्बे बटोरने को

पर बच्चे तो बच्चे हैं
वह कर रहे हैं नजरअंदाज
हर झिड़की हर गाली को
और ढूंढ रहे हैं कुछ
बिना फूटे बमों को
जलने से बच गये पटाखों को
अधजली फुलझड़ियों को भी
मानो कर रहे हों खोज
थोड़ी सी रोशनी की
उजाले की, उत्सव की
अपने लिये भी

दीप जले, उत्सव मना
चले पटाखे, हुई रोशनी
पर अंधेरा गया क्या ?

यह जाता क्यों नहीं ?



...




किस्मत

अगले चौराहे पर दिखता है
एक ढेर सा किनारे पर
पास जाकर देखता हूँ
हैं बहुत सी मूर्तियाँ
लक्ष्मी-गणेश की
छोटे बड़े हर साईज की
जिन्हें फेंक गया है बेचने वाला
होगा इनमें शायद कोई नुक्स
पेंट उखड़ा होगा किसी का
या होगा कोई किनारा टूटा
नहीं होगा किसी का जोड़ा
नहीं होगा किसी का कोई ग्राहक

सोच में पड़ जाता हूँ 
इन्हीं में कुछ मूर्तियाँ
होंगी आज विराजमान
पूजास्थलों पर
वे पूजी जाती रहेंगी
अगले साल तक या जीवन भर
और कुछ का यह हाल है

बड़े अजीब हो भगवान 
आप भी ना
महज आपका बनाया इंसान ही नहीं
इंसान के हाथ बनाई गई
आपकी मूर्तियाँ भी
आती हैं इस दुनिया में
अलग-अलग किस्मत
जुदा-जुदा हश्र के साथ!




 


...

रविवार, 23 अक्तूबर 2011

कॉरपोरेट इंडिया, यह तुम्हारी आँखों की जगह डॉलर क्यों उग आये हैं ?

.
.
.

मारूति के मानेसर प्लाँट में मजदूरों की हड़ताल खत्म हो गई, मारूति का साल २००९-१० का शुद्ध मुनाफा था २४९८ करोड़ और २०१०-११ में मुनाफा रहा २२८९ करोड़... कंपनी के ही शब्दों में The company's profit was impacted by adverse currency movement, particularly on exports, higher commodity prices and new model launches... यानी मुनाफे की इस कमी के पीछे मजदूर कतई नहीं थे... कंपनी ने कुछ इस तरह अपना मुनाफा बांटा... The Board of Directors recommended a dividend of 150 per cent (Rs 7.50 per share of face value Rs. 5/-). The dividend in 2009-10 was 120 per cent.

ऐसा क्यों और कैसे हुआ कि यह हड़ताल हुई उस सोनू गुज्जर के नेतृत्व में जो मारूति के मानेसर प्लांट में पाँच साल से काम कर रहा है और इन पाँच सालों में एक बार ' बैस्ट वैल्डर ' और तीन बार ' बैस्ट ऑपरेटर ' रह चुका है... जानना चाहते हैं तो पढ़िये ' तहलका ' की यह रिपोर्ट ...

यह हैं काम की शर्तें :-

Here is what a Maruti Suzuki worker says his average day at the Manesar plant is like. You catch a bus at 5 am for the factory. Arriving a second late to punch in your card means a pay cut, but you can’t leave the premises once you’ve entered. At 6.30 am, you exercise and supervisors give you feedback on your previous output. Start work at 7 sharp. Everyone does his one task — assembling, welding, fixing — for a minimum of 8 continuous hours. A car rolls off the line every 38 seconds, which means you can’t budge from your position, ever. You get two breathless breaks during the day. At 9 am, a 7-minute break to drink tea or go to the loo, or both. After a while you might, like many of your friends here, end up taking your hot tea and kachori to the bathroom with you. Then a lunch break of 30 minutes, in which you walk about a half kilometre to the canteen, wait in line with everyone, eat and walk back. Returning even a minute late from any break, or leaving the assembly line for any reason even for a minute, means half a day’s pay cut. Older systems used to include an overseer for every small group of workers who could step in if someone needed to take a breather. But, the cost logic of production is perennially at odds with workers’ rights.

श्रम सुधारों के नाम पर कंपनियाँ ठेकेदारों के जरिये कामगार ले रही हैं, कामगार को उसकी मेहनत का बहुत कम मोल देती हैं और उस में से भी काफी बड़ा हिस्सा ठेकेदार ले लेता है... और हमारी सरकारें श्रमिकों के पक्ष में अपनी मंशा पर गाल बजाई करती रहती हैं... बाजार के नाम पर बड़ी निर्ममता से कामगार का हक लूटा जा रहा है...

अगर सोनू यह सब कहता है तो इसमें गलत क्या है ?

Going over the blandishments and threats that have come their way since the young workers first began their fight for representation, he has a way of making them sound ridiculous. When told that the workers can come back to work if they agree that several others stay terminated, he suggests “Haan theek hai”, perhaps the management can arbitrarily fire some executives as well. Just to level the playing ground. Whenever a politician or Maruti Suzuki executive tries to claim to be ‘like his grandfather’, he smilingly welcomes the epithet. He says when it was suggested that good conduct means workers should not talk to each other, he replied “Bhai theek hai” — he’s game if his superiors agree not to talk to each other too. Just to keep things on par.

यह एक बड़ा खेल है एक तरफ प्रबंधन संस्थानों के छात्रों को कैंपस प्लेसमेन्ट में ही करोड़ रूपये सालाना की तन्खवाह मिलने के नाम पर ' शाइनिंग इंडिया' का सपना दिखाया जाता है पब्लिक को और दूसरी तरफ राजनीतिज्ञ-नौकरशाहों-उद्मोगपतियों का यह गठजोड़ मजदूर-कामगार का हक चूस कर अपना मुनाफा बढ़ाने और पूंजीवाद के निर्लज्ज अखाड़े यानी 'शेयर बाजार' को खुशहाल रखने के नाम पर मजदूर-कामगार के हक, उसके हितों, सेहत, भविष्य व सबसे बढ़कर औरों की तरह ही एक इंसान होने के कारण इंसान की तरह ही काम करने  के उसके अधिकार को दिनदहाड़े लूटे ले रहे हैं...

चेत जाओ कॉरपोरेट इंडिया... तुम्हारी आँखों में डॉलर उग आये हैं... जिस दिन मेहनतकश कामगार मजदूर जाग गया तो खींच लेगा वह इन डॉलरों को... तब यह आँखें तो नहीं ही बचेंगी, साथ में और भी बहुत कुछ खो दोगे तुम... 


तब तक के लिये पढ़िये... फैज का यह अमर गीत... और सुनिये भी...

हम मेहनतकश जग वालों से जब अपना हिस्सा मांगेंगे,
एक खेत नहीं, एक देश नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे।

यहां पर्वत पर्वत हीरे हैं, यहां सागर सागर मोती हैं,

ये सारा माल हमारा है, हम सारा खजाना मांगेंगे।
हम मेहनतकश जग वालों से जब.........

जो खून बहे, जो बाग उजड़े, जो गीत दिलों में कत्ल हुए,

हर कतरे का, हर गूंचे का, हर ईंट का बदला मांगेगे।
हम मेहनतकश जग वालों से जब.........

जब सब सीधा हो जाएगा, जब सब झगड़े मिट जाएंगे,

हम मेहनत से उपजाएंगे, हम बांट बराबर खाएंगे।
हम मेहनतकश जग वालों से जब.........

हम मेहनतकश जग वालों से जब अपना हिस्सा मांगेंगे,

एक खेत नहीं,एक देश नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे।



आदरणीय दिनेश राय द्विवेदी जी को विशेष आभार सहित, गीत को उनकी इस पोस्ट से लिया है  वहाँ ऑडियो भी है, इम्बेड नहीं कर पा रहा इसलिये वहीं जाकर सुनें ...





... 

सोमवार, 17 अक्तूबर 2011

वैलकम बैक !

.
.
.




वैलकम बैक, हमारीवाणी !


स्वस्थ बने रहना और अब न जाना छोड़कर... 

मेरे जैसों की तो पचास फीसदी तक की दुकानदारी तुम्हारी ही वजह से जम पाती है ... :)


कोई सहयोग चाहिये तो कमेंट में लिखें पर अपने इस अच्छे काम को जारी रखें ...


आभार !








...


बुधवार, 12 अक्तूबर 2011

अब कोई ना-नुकर नहीं चलेगी आपकी, आँखें मूंद पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ अंगीकार कीजिये इस 'शाश्वत सत्य' को !

.
.
.

व्यस्तता कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है आजकल, सोने के लिये छह घंटे भी निकाल पाना मुश्किल हो जाता है ज्यादातर, ऐसे में ब्लॉग को जिंदा रखना भी मुश्किल होता जा रहा है... फिर कभी सोचता हूँ कि कुछ ही दिनों की तो बात है, फिर काम भर की फुर्सत मिल ही जायेगी... आज इसीलिये अपनी एक पुरानी पोस्ट फिर से लगा रहा हूँ, यह पोस्ट मेरे दिल के थोड़ा ज्यादा करीब है...

.
.
.


जिज्ञासु मित्रों,

आज कथा सुना रहा हूँ आपको "शाश्वत सत्य" की...उसी के शब्दों में...

मैं कब से ऐसा ही हूँ, मुझे खुद भी नहीं पता...शायद अनादिकाल से किसी दूसरे रूप में रहा ही नहीं मैं... जो आज मैं सुना रहा हूँ वो तो मेरी कहानी का एक छोटा सा हिस्सा मात्र है...

चलिये शुरू करते हैं...

एक सेब के अन्दर था मैं, अफगानिस्तान की खूबसूरत वादियों में... पकने पर बागबान ने सेब तोड़ा, पैक किया और बाजार भेज दिया...बाजार में सबसे पहले बिकी वो रसीले सेबों की पेटी...और उतारी गई एक कैम्प में... जहां सुबह की नमाज के बाद लम्बी दाढ़ी वाले एक शख्स ने मिशन पर जाने से पहले मेरे वाले सेब का नाश्ता किया और सेब के साथ साथ मैं भी पहुँच गया उसके पेट के भीतर...वक्त ने मेरा अगला पढ़ाव तय करना था कि अचानक... दुनिया ने एक जोर का धमाका सुना... एक बार फिर अफगान सेना पर 'फिदायीन सुसाइड बॉम्बर' ने हमला किया था...५ सैनिक और १० बेकसूर नागरिक, जिनमें ४ बच्चे थे, 'जेहाद' की भूख का पेट भरने के काम आ गये... धमाके की गर्मी इतनी थी कि मैं भी भाप बन कर उड़ चला...

अगला ठिकाना था बादलों की गोद में...मौसम बदले...कुदरत ने खेल खेले... तेज हवायें चली... बादल उड़े... अचानक लो प्रेशर जोन बना... बरसात हुई और मैं भी पहुँच गया 'जम-जम' के चारों ओर की पहाड़ियों पर... मिट्टी, रेत और चट्टानों के बीच सफर करते हुऐ न जाने कब और कैसे मैने अपने को पाया 'जम-जम' के भीतर...

आमिर आया था अपनी दादी के साथ हज करने... 'जम-जम' का पवित्र जल भर अपने वतन ले आया वो... वतन था हिन्दुस्तान... मैं भी था उस बर्तन के भीतर...

बहुत सारे लोग आये हाजी आमिर और उसकी दादी के स्वागत को... एक बड़े से बाग में इकठ्ठा थे लोग... सब गले मिले आमिर से... फिर आमिर ने 'जम-जम' का पवित्र जल बांटना शुरु किया... एक बूंद छिटकी... और मोती सी दमकती उस बूंद के भीतर मैं भी पड़ा रहा रात भर दूब घास पर... दूसरे दिन सूरज की तपिश बर्दाश्त नहीं हुई... और फिर मैं उड़ चला...

इस बार बादल उड़े उत्तर की ओर...और बर्फ बन कर आये जमीन पर...उसी बर्फ के बीच पड़ा रहा मैं गर्मी आने तक...गर्मी में गोमुख ग्लेशियर की बर्फ पिघली...और मैं भी आजाद हुआ...बहता रहा गंगा में...'हर की पैड़ी' पर अमर ने गंगाजली भरी... और मैं गंगाजली के भीतर...

बड़े ही दुख का माहौल था जब अमर घर पहुंचा... "अरे कोई सोने का टुकड़ा और गंगाजल डालो दादाजी के मुँह में"...मुझे तो कुछ समझ नहीं आया मेरे मुंह में जाते ही क्यों और कैसे दादाजी के प्राण-पखेरू उड़ गये तुरंत इहलोक को...

फिर चंदन की चिता सजी...मुखाग्नि दी गई...और पंचतत्व का शरीर पंचतत्व में मिल गया...और मैं एक बार फिर से बादलों के बीच...

एक बार फिर बरसे बादल...बारिश की बूंदों के बीच मैं पहुंचा एक बड़े से तालाब में... वक्त ने फिर करवट ली और मैं बन गया हिस्सा एक मछली के शरीर का...

पीटर रोज नियम से आता था मछली पकड़ने...और एक दिन मेरी वाली पूरे डेढ़ किलो की मछली फंस ही गई उसके कांटे में... शाम को पीटर के घर दावत हुई...और उसी मछली के एक टुकड़े के जरिये मैं पीटर का हिस्सा बन गया... और बना रहा उसकी आखिरी सांस तक...

बुढ़ापे से लड़ते लड़ते एक दिन पीटर ने भी हार मान ली...पूरा मोहल्ला आया उसकी अंतयेष्टि में...मैं भी दफन हो गया छह फुट नीचे पीटर के 'मोर्टल रिमेन्स' के साथ...

दिन साल में बदले...और कुछ साल बाद ही मैं हिस्सा बन गया माटी का...जहां से एक पेड़ की जड़ ने मुझे अंदर खींचा और पहुंचा दिया अपने फूल तक... उन सफेद सुगंधित फूलों का गजरा बना... बाजार में बिका...एक चुलबुली शरारती लड़की ने दिन भर बालों को सजाया उससे और रात को फेंक दिया पार्क के एक कोने में...

मेरा फूल भी मुरझाया... फिर धूप की मार लगी...उष्मा मुझसे सहन नहीं हुई और मैं एक बार फिर आसमान में बादलों की गोद में...

इस बार बादल बरसे हैं आपके शहर के करीब... खेत खेत, गांव गांव, नाली नाली बहता हुआ पहुंचा मैं उस नदी में... जहां से पानी पम्प किया जाता है वाटर ट्रीटमेंट प्लान्ट के लिये... ट्रीटमेंट फिर क्लोरीनेशन और सप्लाई...

अरे हाँ चौंकिये नहीं... इसी तरह मैं यानी "शाश्वत सत्य" आज आपके सामने हूँ... आपके चाय, कॉफी, सूप, जूस, शरबत, सोडा या पानी के गिलास में...

इस पोस्ट को पढ़ने के बाद जब आप अगली 'चुस्की' लेंगे... तो मैं आपका भी हिस्सा बन ही जाउंगा... आप चाहो या न भी चाहो...



विशेष टिप्पणी:-

जल यानी पानी यानी Water के एक अणु (Molecule) की सच्ची कहानी है यह, वर्णन को सरल बनाये रखने के लिये मैंने यानी ब्लॉगलेखक ने इस अणु (Molecule) का नाम रखा है "शाश्वत सत्य"...

तो मित्रों, अब देर किस बात की है ? घूंट भरिये और शाश्वत सत्य को अंगीकार करिये, पूरी श्रद्धा व आस्था के साथ ...






...

गुरुवार, 25 अगस्त 2011

आमरण अनशन पर अन्ना हजारे : अवतार के अवतरण की प्रतीक्षा में नतमस्तक हमारे बीच के चंद लोग !!!

.
.
.

युग-युगों से हम अवतारों की छांव में जीते, अवतारों को पूजते और एक नये अवतार की प्रतीक्षा करते देश रहे हैं... हमारा विश्वास रहा है कि चाहे कितनी भी गंदगी हो, चाहे उसे फैलाने में हम सब भी बराबर के साझीदार रहे हों, फिर भी कभी न कभी एक अवतार जन्मेगा और एक झटके में सब कुछ उजला साफ कर देगा... आज की 'स्वयंभू नागरिक समाज की प्रतिनिधि' यह 'टीम अन्ना' जनलोकपाल के रूप में एक ऐसे ही अवतार के अवतरण का सपना दिखा रही है ( जो ६५% भ्रष्टाचार को शर्तिया खत्म कर देगा, न जाने कहाँ से आया यह आंकड़ा )... और इसी कारण कुछ के लिये अन्ना मसीहा-उद्धारक समान हो गये हैं... जिसे देखो कह रहा है ' मैं हूँ अन्ना '...

यह खास तौर पर शहरी मध्य और उच्च मध्यवर्ग का आंदोलन है, आप गौर से यदि देखेंगे तो समाज के दलित वर्ग, मेहनतकश-मजदूर, छोटे किसान, रोज कुआं खोदने-रोज पानी पीने वाले वर्ग की कोई हिस्सेदारी इसमें है ही नहीं... यह सभी के लिये गंगा नहाने का मौका भी है... मरीज की अंटी की आखिरी पाई भी खींच लेने वाले डॉक्टर, मुवक्किल को जोंक की तरह चूसने वाले और फिर दूसरी पार्टी से मिल जाने वाले वकील, नेताओं और धंधेबाजों के बीच दलाली करते, पेड न्यूज निकालते प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के छोटे-बड़े नाम, शिक्षा के नाम पर मुनाफे की दुकानें खोले शिक्षाविद , हिंसा और सेक्स को दिखा अपनी तिजोरियाँ भरते फिल्मकार, बिना सुविधा शुल्क लिये कभी कोई काम न करने की कसम खाये सरकारी कर्मचारी, देश के संसाधनों का अंधाधुंध मुनाफा कमाने के लिये बेलगाम दोहन करते कॉरपोरेट हाउस... जिंदगी भर घूस की कमाई खा अपनी सात पीढ़ियों का इंतजाम कर चुके रिटायर नौकरशाह... किस किस का नाम लिया जाये... सभी तो 'इन्डिया अगेन्स्ट करप्शन' की टीशर्ट पहने और 'मैं अन्ना हूँ' लिखी गाँधी टोपी पहने गंगा नहा रहे हैं...

इस आंदोलन के नेता कहते हैं कि वे जीवन में कभी चुनाव नहीं लड़ेंगे... वह बार बार मंच से सभी राजनीतिज्ञों के चोर और भ्रष्ट होने की बात भी कहते हैं और भीड़ तालियाँ बजाती है... यह आंदोलन राजनीति को हेय और राजनीतिज्ञों को गिरा हुआ बनाकर पेश कर रहा है... यह संसदीय लोकतंत्र का अनशन नाम के अस्त्र से गला दबा चार या पाँच लोगों का सोचा हुआ 'भस्मासुर' को जन्म देता एक बिल उसी संसद से पारित करवाने का भी मंसूबा रखता है... इसके कर्ता-धर्ताओं को इतनी जल्दी है कि वे संसद की स्थाई समिति के सामने तक जनलोकपाल बिल को नहीं जाने देना चाहते... क्या सारी बुद्धि, ज्ञान व देश के प्रति ईमानदारी का ठेका सिर्फ और सिर्फ 'टीम अन्ना' के पास ही है/ रहना चाहिये...

जैसे अंदाजे लगाये जा रहे हैं कि यह आंदोलन बड़े मीडिया हाउसों व कार्पोरेट ग्रुपों द्वारा समर्थित पोषित है... संसदीय लोकतंत्र को कमजोर करने व समस्त राजनीतिज्ञों को कालिख पुता दिखाने के पीछे उनके अपने निहित स्वार्थ हैं... ऐसा होने पर वे देश के सभी संसाधनों का बेरोकटोक निजी लाभ के लिये दोहन कर सकेंगे... जनलोकपाल के दायरे में निजी कॉरपोरेट घरानों, मीडिया हाउसों व एनजीओ को भी शामिल होना चाहिये... पर यह माँग कोई उठा रहा है क्या ?... एक बार यह माँग तो उठाईये फिर देखिये मीडिया कैसे आपको अछूत बना देता है...

अनशन को २०० से ज्यादा घंटे हो चुके हैं... समय दोनों पक्षों के पास कम बचा है... टीम अन्ना के पास इसलिये क्योंकि अब ज्यादा समय तक अनशन जारी रखने से अन्ना के शरीर के विभिन्न अंगों को अपूरणीय क्षति हो सकती है... सरकार के पास इसलिये क्योंकि अन्ना के जीवन या स्वास्थ्य को कोई नुकसान होने की स्थिति में उसके सामने बड़ी मुश्किल खड़ी हो जायेगी... इसलिये अब इस आंदोलन ने ज्यादा नहीं चलना है...

मेरे कुछ मित्र कहते हैं कि इस आंदोलन के नाम पर सरकार और टीम अन्ना के बीच 'नूरा-कुश्ती' हो रही है... 'टीम अन्ना' को नायक होने का मौका मिल रहा है और सरकार को घोटालों के कारण दागदार हो गई अपनी छवि को अगले साल होने वाले महत्वपूर्ण चुनावों से पहले फिर से चमकाने का... हो सकता है कि मेरे मित्र गलत हों, फिर भी एक संभावना तो है ही...

और यदि यह नूरा कुश्ती नहीं है तो आज रात या कल में ही सरकार को अन्ना को अपनी अभिरक्षा में ले उनके अनशन को चिकित्सकीय कारणों से तुड़वाना होगा... और फिर से हम वहीं खड़े होंगे जहाँ अप्रैल में खड़े थे...

अवतार शायद अभी नहीं उतरेगा... क्या किया जाये... वैसे घोर कलियुग भी तो नहीं आया है अब तक... अवतार ने आना तो तभी ही है न ?





...

रविवार, 14 अगस्त 2011

आमरण अनशन पर अन्ना हजारे : आजादी की दूसरी लड़ाई तो नहीं ही है यह !!!

.
.
.

अचानक मुझे आज वीपी सिंह की बहुत याद आ रही है... वीपी यानी दिवंगत भूतपूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह जी की... वे राजीव गाँधी जी की सरकार में मंत्री थे... तभी बोफोर्स घोटाले का खुलासा हुआ... इस भ्रष्टाचार के विरोध में वीपी ने सरकार व पार्टी दोनों को छोड़ दिया... देश में घूमे, जनता के बीच अलख जगाई, अपनी बात लोगों को समझाई... और १९८९ के चुनाव में कांग्रेस पार्टी को सत्ता से हटाने में कामयाबी हासिल की...

शायद सन १९९० में ही वीपी ने बरसों से धूल खाती जस्टिस बी० पी० मंडल आयोग की संस्तुतियों को भी लागू करने का फैसला किया... बहुत विरोध हुआ उनका... मैं क्योंकि समाज के उस वर्ग से आता हूँ जो जाति के कॉलम में 'सामान्य' लिखता है तथा मेरा परिवेश भी शहरी था, तो उस विरोध में मैं भी पूरे जोर शोर से शामिल था... बहुत बाद में जब मैंने हमारे गाँवों में फैली असमानता देखी तब समझ में आया कि मंडल रिपोर्ट को लागू करना कितना दूरगामी व सही कदम था... बहरहाल तमाम विरोध के बावजूद वीपी नहीं डिगे और नतीजे के तौर पर देश का सामाजिक-राजनीतिक परिदॄश्य ही बदल गया...हाशिये पर रह रहा हमारे समाज का ही एक वर्ग राजनीति के सेंटर स्टेज पर आ गया और कालांतर में उसी वर्ग से बहुत सी कद्दावर राजनीतिक शख्सियतों का उदय हुआ...

यह बातें यहाँ लिखने का मकसद सिर्फ यही है कि अगर किसी को भी लगता है कि सरकार किसी मुद्दे पर गंभीर नहीं है तो अपनी बात को जनता के दरबार में ले जाना ही लोकतांत्रिक तरीका है... लोकतंत्र की विसंगतियों, विद्रूपों, विरोधाभासों व अन्यायों का हल भी हमेशा लोकतंत्र ने ही दिया है, आगे भी देगा और देता रहेगा...

' अनशन पर बाबा रामदेव ' लेखमाला के पहले ही आलेख में मैंने लिखा था कि पहले के इसी तरह के आंदोलनों की तरह ही यह अनशन भी कुछेक दिन में अपनी तार्किक परिणति को प्राप्त होगा... आज फिर वही लिखना चाहूँगा... मेरे पास ठोस वजहें भी हैं इसके लिये...
  • अन्ना के आमरण अनशन के मामले में सरकार को घेरती, गाल बजाती विपक्षी पार्टियों में से भी क्या कोई टीम अन्ना द्वारा सुझाये संशोधनों को संसद में बहस के दौरान लोकपाल बिल में शामिल करवाने को तैयार है... जवाब है नहीं... पर बड़े ही सुविधाजनक तरीके से इस तथ्य को छिपाया जा रहा है।
  • यह बार बार सभी संवैधानिक पदों-संस्थाओं के ऊपर एकक्षत्र राज करने वाले, किसी के भी खिलाफ करवाई करने की क्षमता रखने वाले भस्मासुर जैसे लोकपाल की माँग के पीछे के क्या निहितार्थ हैं।
  • अन्ना अपनी टीम के बुजुर्ग हैं...आमरण अनशन ही करना है तो उनकी टीम के अपेक्षाकृत युवा क्यों नहीं आगे आते...जिनका शरीर भूख-प्यास को ज्यादा लंबे समय तक सह सकता है...
  • किसी भी लोकतंत्र में विधायिका यानी संसद ही नये कानून बनाने का काम करती है... यह काम उसी का है भी... क्या इलेक्ट्रानिक मीडिया द्वारा पोषित-समर्थित, और फेसबुक-एसएमएस-मिस्ड कॉल-रंगीन टीशर्टों-डिजाइनर पोस्टरों-टोपियों-नारों-साउन्ड बाइट्स-विजुअल्स के जरिये चलते  डिजाइनर आंदोलन के जरिये स्वयं को ही सिविल सोसाइटी कहता-मानता एक छोटा सा समूह आमरण अनशन की धमकी दे संसद का यह काम छीन सकता है।
  • कल सुबह झंडा फहराने के बाद अपने आस-पास दिखते जनतंत्र की रीढ़  ' आम-जन ' को पकड़ पूछियेगा कि क्या विचार है उसका लोकपाल के बारे में... नब्बे फीसदी से ज्यादा मामलों में आप यही पायेंगे कि उसे पता तक नहीं होगा कि क्या बला है यह...
  • प्रधान मंत्री को लिखे पत्र में जिस तरह की भाषा व शब्दों का प्रयोग हुआ है वह टीम अन्ना के प्रति आश्वस्त नहीं करता... यह कभी नहीं भूलना चाहिये कि प्रधानमंत्री हमारे लोकतंत्र के मुखिया हैं व उनको पत्र लिखते हुऐ मर्यादा का उल्लंघन नहीं होना चाहिये था... 

यह तो हुई मेरे दिल की बात... अब जरा सरकार पर अलोकतांत्रिक और अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंटने के आरोपों पर भी बात कर ली जाये...

सबसे पहले तो कानूनी स्थिति जानी जाये... देश के वर्तमान कानून के मुताबिक आत्महत्या करना, आत्महत्या के लिये उकसाना, आत्महत्या करने में किसी की मदद करना, आत्महत्या की प्रक्रिया को प्रचारित-प्रसारित करना व उसका महिमामंडन करना सभी संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आते हैं... एक उदाहरण से तुलना कीजिये... मानिये कोई शख्स यह कहता है कि उसके सुझाये संशोधन सहित लोकपाल बिल यदि १५ अगस्त तक पारित नहीं हुआ तो सोलह अगस्त को वह जयप्रकाश पार्क में हजारों लोगों की भीड़ व मीडिया की मौजूदगी में आत्मदाह कर या जहर पीकर आत्महत्या कर लेगा... तो ऐसी स्थिति में सरकार को क्या मूकदर्शक बनी रहेगी या उसे मूकदर्शक बने रहना चाहिये... नहीं, बिल्कुल नहीं... अब इसी स्थिति की तुलना अपनी माँगें पूरी न होने की स्थिति में आमरण अनशन करने की घोषणा से करिये... आमरण अनशन भी एक तरह से आत्महत्या का प्रयास ही है... अन्ना की जान को अनशन के कारण खतरा होने की स्थिति में उनके अनशन को समाप्त करवा कर उनकी प्राण रक्षा करना सरकार का संवैधानिक दायित्व है... मुझे पूरी उम्मीद है कि वह इसे निभायेगी भी... और इस काम के लिये सरकार की निंदा करने से बड़ा दोगलापन नहीं है मेरी नजर में...

क्षमा करेंगे अन्ना... १६ अगस्त सुबह दस बजे से शुरू होने वाला आपका आमरण अनशन किसी भी कोण से देखने पर भी आजादी की दूसरी लड़ाई नहीं कहा जा सकता... मेरे जैसे अनेकों को आप केवल और केवल निराश ही कर रहे हैं...

बहरहाल, जो भी हो, इस पूरे प्रसंग से हम सभी में लोकतंत्र की एक बेहतर समझ विकसित हो...

इसी आशा के साथ...






...


चित्र साभार: गूगल इमेजे्ज


...

रविवार, 31 जुलाई 2011

लड़कियाँ-लड़कियाँ-लड़कियाँ... स्लट वॉक पर विशेष...

.
.
.

लड़कियाँ
मैं देखता ही रह जाता हूँ उन्हें
हमेशा ही विस्मित करती हैं मुझे
जब भी देखता हूँ मैं उनको
मिलती हैं हरदम चहचहाती हुई
बिना किसी भी खास बात के
खुलकर हंसती-मुस्कुराती भी

लड़कियाँ
कभी नहीं दिखती वो बेतरतीब
घर से बाहर निकलती हैं सजी-संवरी
हमेशा पहने होती है रंगीन वस्त्र
समेटी चलती हैं खुशियों को हरदम
लगता है छिपा लेती हैं बड़ी खूबी से
हर असुंदरता हर काले पन को

लड़कियाँ
झेलती हैं दुनिया भर के दबाव
अकेले नहीं निकलना बाहर
कॉलोनी में चलो सर नीचा किये
ज्यादा हंसी मजाक शोभा नहीं देता
यह कपड़े शरीफों के लायक  नहीं
खबरदार किसी बाहरी से बात की तो

लड़कियाँ
हमेशा ही मानी जाती हैं दोयम
अपने कम लायक भाइयों के सामने
जाने अनजाने कोई न कोई
दिलाता रहता है यह अहसास
तुम इस घर में पल रही जरूर हो
पर हो किसी दूसरे की अमानत ही

लड़कियाँ
ज्यादातर तो नहीं देती दखल कहीं भी
फिर भी होती हैं कुछ दूसरी मिट्टी की
नहीं मानती जो खुद को दोयम
बोलती है खुल कर हर अन्याय पर
लगा देतें हैं लोग लेबल माथे पर उनके
बेहया, कुलटा, घर-उजाड़ू आदि आदि

लड़कियाँ
कहता है हमारा यह समाज
रहना चाहिये हमेशा उन्हें संरक्षा में ही
उनके बचपन में पिता-भाई की
जवानी में यह काम करेगा पति
और बुढ़ापे में बेटों पर होगा दायित्व
कभी नहीं रह पाती हैं वो आजाद 

लड़कियाँ
देती हैं अपना पूरा जीवन गुजार
पिता भाईयों पति और बेटों की
उपलब्धियों को ही अपना मान
शायद ही कभी होती है उनके पास
जमीन मकान या कोई संस्थान
जिसे कह सकती हों केवल अपना

लड़कियाँ
उनसे उम्मीद की जाती है हमेशा
दबी जबान में ही बातें करने की
नहीं कर सकती गुस्सा, लगा सकती ठहाके
एक ही भाव उचित माना जाता है उनका
हर छोटे दुख, विपदा तकलीफ पर
किसी पु्रूष के कंधे पर आंसू बहाना

लड़कियाँ
नहीं मानता हमारा यह समाज अभी भी
कि है उन्हें यह अधिकार विरोध जताने का 
लड़की होने के, घर से बाहर निकलने के
होटल जाकर खाने के, पसंदीदा कपड़े पहनने के
दिल की बात कहने के, पुरूष का प्रतियोगी होने के
कारण होते दैहिक छेड़छाड़ व अनाचार का

लड़कियाँ
बहुत ही मुश्किल है लड़की होना
आखिर तुम पैदा ही क्यों हुई लड़की
क्या जरूरत थी तुम्हें आवाज उठाने की
तुम भी तो चुप रह ही सकती हो
संस्कृतिवादियों की हाँ में हाँ मिलाती
शर्म-हया से आभूषित औरों की तरह


बस एक ही नुकसान होता तुमको
यह कविता कभी नहीं लिखी जाती... 
तुम पर... 
मेरे द्वारा...
कभी भी...






...

चित्र साभार : गूगल इमेजे्ज


...

शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

लाइट लो यार ... :)

.
.
.

बड़ी अजीब चीज है यह सावन का महीना भी... जब तक मेघ बरसता है तो ठंडा-ठंडा कूल-कूल लगता है... पर जैसे ही बरसना रूका और धूप निकली तो... बाप रे बाप... कभी देखा है कि कितनी तेज होती है सावन की धूप... हवा बारिश से धुली हुई होती है, वातावरण में लेश मात्र भी धूल नहीं होती... कोई रूकावट या ठहराव नहीं धूप के रास्ते में... देहात में कहते हैं कि सावन की यही धूप तो हिरन के बच्चे तक को काला कर देती है... पर अपनी दिक्कत कुछ और ही है... एकाध घंटे इस धूप में गये नहीं कि पूरे सिर पर अनेकों छोटे छोटे खुजली करते दाने हो जाते हैं... और पिछले कई साल से इलाज भी सीधा सादा है वह है सर घुटवा देना... आज छुट्टी मिली थी मुझे, सिर घुटवा और चंपी करवा आया हूँ... खाना लगने वाला है मेज पर... बहुत दिनों से कुछ लिखा भी नहीं है ब्लॉग पर... सोच रहा हूँ कि कुछ तो लिख टाँग ही देता हूँ अपने भी जिंदा होने की सनद देते हुए...

आजकल टीवी बहुत देखता हूँ... ध्यान देकर कुछ नहीं देखता बस सुबह होते ही ऑन कर देता हूँ उसे... जितना समय घर में बिताता हूँ वह चलता ही रहता है...

बहुत कुछ घट रहा है दुनिया में, या फिर सब कुछ वैसा ही है पहले जैसा ही... कई दिन से चैनल वाले परेशान हैं सचिन की सौंवी सेंचुरी के लिये... एंकर ऐसे बिहेव करते हैं मानो दुनिया का भविष्य उसी पर टिका हो... सुबह सुबह ' जीवन का आधार ' चैनल पर बाबा युवक और युवतियों से देश सेवा के लिये जीवनदान देने की अपील करते हैं... वही बाबा, जो गिरफ्तारी देने पर गीदड़ की मौत मरने के भय से स्त्री वेश धारण कर बाहर जाने की फिराक में थे... आज सोचता हूँ कि यदि वे उस दिन बाहर जाने में कामयाब हो जाते और तीन चार दिन तक उनका पता ठिकाना न मिल पाता तो क्या कुछ घट जाता देश में... गाँधी टोपी धारी दूसरे नागरिक समाज के प्रतिनिधि अपनी बताई तारीख पर आमरण अनशन करने पर दॄढ़ हैं फिर से... पर ऐसा करने से पहले सुप्रीम कोर्ट से यह आश्वासन भी ले लेना चाह रहे हैं कि उनके खिलाफ कोई कारवायी न हो...

एक बंदा पकड़ा गया है अमेरिका में... जो आईएसआई से पैसे लेकर कश्मीरी अलगाववादियों के लिये लाबिईंग करता था... अपने यहाँ ऐसे न जाने कितने होंगे, हरदम गाल बजाते हुए... पर उनके खिलाफ कुछ नहीं होगा... इंग्लैंड में फोन हैकिंग के मामले में 'न्यूज ऑफ द वर्ल्ड ' अखबार बंद हो गया है, रूपर्ट मरडोक ने माफी माँगी है, कई कैरियर खत्म हुऐ हैं,  कई इस्तीफे हुऐ हैं... पर अपने यहाँ नीरा राडिया के टेपों में उजागर मीडिया के दलाल बदस्तूर अपने ऊँचे पायदानों पर टिके हुऐ हैं... मुंबई बम धमाकों के मास्टर माईंड की तलाश जारी है... कभी कभी तो लगता है कि ' वाईटल-क्लू ' देने का काम अपने चैनल वाले और दिग्विजय सिंह जैसे राजनीतिज्ञ कर रहे हैं...

आदर्श घोटाले के सारे कागज गायब हैं सभी जगहों से और जमीन को राज्य सरकार की बताया जा रहा है... लग रहा है इमारत फिर से खुलेगी और कोई रिटायर्ड सर्विस चीफ फीता काट कैमरों के सामने उद्घाटन करेगा उसका... नौएडा एक्सटेंशन के जमीन अधिग्रहण पर फैसले-दर-फैसले आते जा रहे हैं... किसान सरकार को कसूरवार बताते हैं... बिल्डर किसान को... सरकार कानूनों को... अपने को लगता है कि तीनों में से कोई कसूरवार नहीं है... कसूर तो जमीन का है... यह मगरूर जमीन दिल्ली के इतना नजदीक क्यों है ?

सरकार बचाने के लिये आर्थिक रूप से कमजोर विरोधी सांसदों को पैसे का लालच दे वोटिंग से बाहर रखने के मामले में संजय सक्सेना और सोहेल हिंदुस्तानी अंदर हैं... अमर सिंह जी से पूछताछ होगी... यह सब कोर्ट के कहने पर किया जा रहा है... पर एक बार फिर किसी का कोई कसूर नहीं है... कसूर तो उन नोटों के बंडलों का है जो गलत जगह खुदबखुद चले गये, और कैमरों से अपनी फोटो खिंचा ली...

टूजी घोटाले और कॉमनवेल्थ घोटाले के आरोपियों के दिन भी अच्छे ही कट रहे हैं तिहाड़ में... बेचारे जेलर साहब को खालीपीली अंडमान जाना पड़ गया... अब जल्दी ही उनकी पहले जमानत और फिर ससम्मान बरी होने का रास्ता भी खुल ही जायेगा... टॉप के लीगल ब्रेन लगे हैं इस काम में... वैसे भी उनका कसूर तो कोई है नहीं... कसूर तो खेलों का है... भाई जब खेल होंगे तो खेल होगा ही... इसी तरह कसूर स्पेक्ट्रम का भी है ही... गरीब देश का स्पैक्ट्रम गरीबों में से ही कुछ की गरीबी मिटाने के काम आ गया तो क्या गलत हो गया...

देखा आपने... लिखने को इतना सब कुछ है... पर नहीं लिखूंगा कुछ भी... खाना अच्छा बना है... हल्की हल्की नींद की खुमारी छा रही है मुझ पर... सोने जा रहा हूँ मैं...



कितना सही कहा गया है न  ?

किस-किस को याद कीजिए, किस-किसको रोइए 
आराम बड़ी चीज है, मुंह ढककर सोइए।


लाइट लो यार !!!
...

बुधवार, 13 जुलाई 2011

क्या होती है आत्मा ?

.
.
.

आध्यात्म, धर्म, कर्मफल, पुनर्जन्म, इहलोक-परलोक आदि आदि विषयों पर आपसी तर्क वितर्क के दौरान एक शब्द जो बार बार प्रयोग होता है वह है  ' आत्मा '....

आइये आज देखते हैं कि क्या है यह...

मोटे तौर पर देखें तो अमूमन हम लोग कई अलग अलग प्रयोजनों के लिये इसे प्रयोग करते हैं देखें यहाँ...

१- आत्मा = जीवन ,...
 यहाँ पर जीवित और मृत शरीर के बीच फर्क करने के लिये इस शब्द का प्रयोग किया जाता है यानि यदि प्राणी जीवित है तो उसके पास शरीर व आत्मा दोनों मौजूद हैं और यदि मृत है तो मात्र शरीर है... यहाँ पर आत्मा का अभिप्राय जीवित होने से है...

२- आत्मा = व्यक्ति या व्यक्तित्व,...
यहाँ पर किसी व्यक्ति को परिभाषित करने के लिये यह शब्द प्रयोग होता है... जैसे कि आप यह कह सकते हैं कि " यह ब्लॉग लेखक एक दुखी आत्मा है "... :)

३- आत्मा= किसी व्यक्ति की बुद्धि, अर्जित ज्ञान, विवेक, अनुभव, दया-करूणा-ईर्ष्या-ममता आदि भावनायें, जीवन मूल्य, जीवन लक्ष्य, धार्मिक-आध्यात्मिक विश्वास आदि आदि का निचोड़ व इस निचोड़ पर आधारित उस व्यक्ति की प्रतिक्रियायें...
यहाँ पर इस शब्द का प्रयोग कुछ इस तरह होता है... " एक झटके में लाखों कमाने का मौका था मेरे पास, पर मेरी आत्मा ने यह गवारा नहीं किया "

४- चौथा व सबसे जटिल व विवादास्पद प्रयोग है ' आत्मा ' के तौर पर किसी ऐसी चीज की कल्पना का जो यह कहें कि कथित रूप से वातावरण में मौजूद रहती हैं गर्भावस्था के दौरान शरीर में प्रवेश कर जाती हैं और मृत्यु के साथ शरीर से निकल जाती है दोबारा से जन्म, तुरंत फैसले, परमात्मा से मिलन या प्रलय के दिन होने वाले फैसले का इंतजार करने के लिये ( आपके धार्मिक विश्वासों के अनुसार )...

 मैं यहाँ पर उपरोक्त चौथे प्रयोग में वर्णित 'आत्मा' के शरीर से बाहर रहने व गर्भावस्था के दौरान बाहर से प्रवेश करने के बारे में कह रहा हूँ इसके कारण भी हैं मेरे पास... 
  • embryology  के हमारे ज्ञान के परिणाम स्वरूप हमें आज यह पता है कि गर्भधारण अण्डाणु के शुक्राण द्वारा निषेचन का परिणाम है।
  • मानव स्त्री अपने अंडाशयों में चालीस हजार से भी ज्यादा अंडाणुओं के साथ जन्म लेती है निश्चित तौर पर इतनी ' सुप्त आत्मायें ' नारी शरीर में पहले से मौजूद नहीं हो सकती।
  • रही बात पुरूष की, तो वीर्य में स्पर्म काउंट होती है अमूमन ८० से १२० मिलियन प्रति क्यूबिक मिमी०... एक मिली० में एक हजार क्यूबिक मिमी० होते हैं... और पुरूष के एक बार के वीर्यपात में मात्रा होती है तकरीबन ३ से ५ मिली०... कैलकुलेटर निकालिये और हिसाब लगाइये... निश्चित तौर पर इतने सारे शुक्राणुओं में भी ' सुप्त आत्मायें ' कपड़ों पर सूख जाने, वाशिंग मशीन में धुलने, नालियों में बह जाने या कूड़ेदान में फेंक दिये जाने मात्र के लिये मौजूद नहीं हो सकती...
उपरोक्त लिखे से यह जाहिर है कि नवजात के लिये आत्मा उसके पिता या माता के शरीर में से तो आती नहीं... अब मानने वाले यह तर्क देंगे कि वह बाहर से आती है... उसका स्वरूप कोई भी ठीक से नहीं बताता पर जो कुछ गोल मोल भाषा में बताया जाता है या पता चलता है वह है कि वह उर्जा या विचार स्वरूप सी है...

निशेचन से पहले अंडाणु या शुक्राणु भी लंबा जीवन जीने की क्षमता नहीं रखते, आदर्श परिस्थितियों में भी उनका जीवन काल कुछ ही दिनों का होता है पर दोनों के संयोग से बना भ्रूण गर्भाशय के अंदर खुद को बढ़ाने, पोषण माता से लेने व एक पूर्ण मानव शरीर में बदल जाने की क्षमता रखता है... इस क्षमता को यदि ' आत्मा ' कहा जाये तो शायद ही कोई विवाद होगा... मरने के बाद परिवेश से भोजन जल ग्रहण कर स्वयं को चलायमान-गतिमान-स्वस्थ रखने की इस क्षमता का अंत भी हो जाता है और शरीर सड़ने लग जाता है ।

परंतु विवाद तब पैदा होता है जब यह कहा जाने लगता है कि किसी व्यक्ति की बुद्धि, अर्जित ज्ञान, विवेक, अनुभव, दया-करूणा-ईर्ष्या-ममता आदि भावनायें, जीवन मूल्य, जीवन लक्ष्य, धार्मिक-आध्यात्मिक विश्वास, तथ्य और तर्कों के आधार पर निकाले उसके निष्कर्ष आदि सब बेकार हैं... वह तो किसी परमसत्ता की योजना का हिस्सा मात्र है... वह एक ऐसी आत्मा है जो अजर-अमर है... जो जीवन आज वह जी रहा है वह उसके पहले के किये का प्रतिफल है और जो इस जीवन में वह ' आत्मा' कर रही है उसके आधार पर भविष्य की उसकी यात्रा का निर्धारण होगा...

क्या यह संभव है...  बुद्धि, अर्जित ज्ञान, विवेक, अनुभव, दया-करूणा-ईर्ष्या-ममता आदि भावनायें, जीवन मूल्य, जीवन लक्ष्य, धार्मिक-आध्यात्मिक विश्वास, तथ्य और तर्कों के आधार पर निकाले उसके निष्कर्ष क्या ट्रान्सफर हो सकते हैं... वह भी कई जीवनकाल व विभिन्न प्राणि योनियों में लिये जन्मों के दौरान... मुझे इस पर यकीन नहीं...

मैं तो मानता हूँ कि गीता के श्लोक " नैनम् छिन्दन्ति शस्त्राणि, नैनम् दहति पावका ... में वर्णित आत्मा भी उपरोक्त वर्णित अजर अमर व केवल और केवल आवागमन के चक्र से पार पाने  के प्रयास में रत ' आत्मा ' न होकर ... किसी भी हाल में हार न मानने वाली शाश्वत HUMAN WILL है और यह श्लोक उसी का उत्सव है !

क्या आप मुझसे सहमत हैं ?






...


चित्र साभार : गूगल इमेजेज्



...

मंगलवार, 5 जुलाई 2011

माननीय मंत्री जी ने तो विकसित विश्व से आयातित बीमारी कह दिया, पर क्या यह मुद्दा इतना आसान है ?

.
.
.
 भारतीय स्वास्थ्य मंत्री जनाब गुलाम नबी आजाद, जो निश्चित तौर पर वर्तमान केंद्रीय सरकार के बेहतर कामकाज करने वाले मंत्रियों में गिने जाते हैं ने एच आई वी/ एड्स पर हो रही एक गोष्ठी के दौरान यह बयान (लिंक) देकर हलचल सी मचा दी है...

आईये देखते हैं कि क्या कहा माननीय मंत्री महोदय ने...


"The disease of Men Having Sex With Men (MSM), which was found more in the developed world, has now unfortunately come to our country and there is a substantial number of such people in India," Azad said at a convention on HIV/AIDS at Vigyan Bhawan in Delhi.

"Even though it (homosexuality among men) is unnatural, it exists in our country and is now fast spreading, making it tough for its detection. With relationships changing, men are having sex with men now. Though it is easy to find women sex workers and educate them on sex, it is a challenge to find MSMs," he said.



जैसा कि अपेक्षित था भारतीय LGBT समुदाय(लिंक)  जो दावा करता है कि,

Over 30 million Indians identify as lesbian, gay, bisexual, and transgender citizens. Time for more equality?

और जिसका फेसबुक पेज (लिंक)  यह है की ओर से बहुत ही तीखी प्रतिक्रिया (लिंक) आई है...

"The statement is completely outrageous. For someone who is qualified enough to be the country's health minister, it is surprising that he has not been through the World Health Organization's guidelines in which homosexuality was taken off the list of diseases a few years ago. Homosexuality is very much a part of nature and even finds references in religious texts. To call it unnatural is absurd. The case is about to open in the Supreme Court shortly and this will just add to the controversy," said Mohnish Kabir Malhotra, publicist and queer rights activist.

Malhotra added that barely 15 days ago, the United Nations had passed a bill in which discrimination on basis of gender and sexuality was a violation of human rights. "He should apologise to the community for such a frivolous statement."  

तो जैसा मुझे समझ आ रहा है वह यह है, कि भारतीय समाज के ही तीन करोड़ नागरिकों के लिये मंत्री जी का यह बयान असंवेदनशील है ... यह कुछ कुछ बाबा रामदेव जी के उस बयान सा है जिसमें उन्होंने कहा था कि समलैंगिकता एक बीमारी है तथा योग-प्राणायाम व आयुर्वेद के जरिये इस का इलाज किया जा सकता है...

जहाँ तक मेरा सवाल है इस मुद्दे पर मैंने अपनी पोस्ट-तलवारें खिंच गई हैं होमोसेक्सुअलिटी के मुद्दे पर फिर से एक बार . . . . . . किस ओर खड़े हैं आप?  पर चर्चा की थी, आज मैं मानता हूँ कि मेरी तब की समझ सही नहीं थी...

अपनी ही दूसरी पोस्ट जब उसने मोहब्बत की थी एक मर्द के साथ, तो शादी किसी औरत से क्यों करे ?.  से लिखा एक बार यहाँ दोहराना चाहूँगा...

आज मैं मानता हूँ कि LGBT समुदाय को समाज से बेहतर समझ की जरूरत है, मुझे यह मानने में कोई हिचक नहीं कि मेरा उनको Pervert लिखना गलत था और हमारे आज के समाज को इस समुदाय के लिये और ज्यादा इन्क्लुसिव होना चाहिये...


आप बताइये कि इस मुद्दे पर आज कहाँ खड़े हैं आप ? और क्या भारत के स्वास्थ्य मंत्री को ऐसा कहना चाहिये था ?



 आभार!



...

अपडेट :-
चारों तरफ से पड़ते दबाव व होती आलोचना के चलते माननीय स्वास्थ्य मंत्री जनाब गुलाम नबी आजाद ने अपना स्पष्टीकरण जारी कर दिया है...

देखिये ट्रिब्यून की खबर...

हिन्दुस्तान टाइम्स में भी देखिये...



...

शुक्रवार, 24 जून 2011

" बाप बड़ा न भैय्या, सबसे बड़ा रूपैय्या ! " ...छोटी होती, सिकुड़ती हमारी यह दुनिया...समस्या की जड़ें किसी भी अनुमान से ज्यादा गहरी हैं !

.
.
.


यह मुद्दा वाकई बहुत ही गंभीर है, पर न जाने क्यों इस पर कुछ भी लिखने या कहने से पहले एक चीनी (या जापानी ?) लघुकथा जिसे बहुत पहले शायद बचपन में पढ़ा था, याद आ रही है...

कथा कुछ यों है... झेल ही लीजिये...

'एक गाँव में एक परिवार रहता था परिवार में कुल जमा चार लोग थे युवा पति-पत्नि, उनका दस साल का बेटा और पति का बुजुर्ग बाप... पति-पत्नि थोड़े खुदगर्ज किस्म के थे... बजुर्ग पिता अक्सर बीमार रहता था, और बेटे-बहू को उसकी देखभाल व इलाज में समय व पैसा खर्च करना कतई पसंद नहीं था... हाँ दस साल के उनके बेटे के लिये उसके दादा उसके सबसे अच्छे दोस्त थे... एक दिन रात को बेटा-बहू योजना बनाते हैं कि यह बुढ्ढा तो किसी काम का है नहीं, खर्चा अलग से करवाता है, इसलिये सुबह-सुबह बेटा अपने बूढ़े बाप को एक बोरे में ले जाकर पहाड़ की चोटी में एक गढ्ढे में दफन कर आयेगा... पोता इस योजना को सुन लेता है...


सुबह होती है, बेटा अपने बूढ़े बाप को लेकर चल पड़ता है पहाड़ की चोटी की ओर... चोटी पर पहुंच बोरे को एक तरफ रखता है, थोड़ा सुस्ताता है और फिर गढ्ढा खोदना शुरू करता है... कुछ ही देर में वह अनुभव करता है कि खोदने के लिये वह कुदाल तो एक बार चलाता है पर आवाजें दो बार आतीं हैं... वह हैरान-परेशान, फिर एक बार कुदाल चलाता है फिर वही होता है... वह अपने चारों तरफ देखता है तो पाता है कि थोड़ा सा नीचे एक झाड़ी के पीछे उसका दस साल का बेटा भी एक गढ्ढा खोद रहा है...


आगबबूला हो वह अपने बेटे से उस गढ्ढे को खोदने का कारण पूछता है तो दस साल का वह बच्चा कहता है कि " हे पिता, मैं तो आपका ही अनुकरण कर रहा हूँ... एक न एक दिन तो आप भी बूढ़े होंगे ही... मैंने सोचा तब के लिये गढ्ढा अभी से तैयार कर लूं "


इतना सुनते ही वह युवा अपने बुजुर्ग बाप तथा दस साल के बेटे से लिपट कर जार-जार रोता है, अपनी गल्तियों की क्षमा माँगता है...दादा-बेटा-पोता, तीनों एक दूसरे का हाथ थाम हंसते-मुस्कुराते घर लौटते हैं... और उस दिन के बाद से वह घर कभी खत्म न होने वाली खुशियों से भर जाता है...'


यह कहानी तो सुखांत रही परंतु हमारे समाज में कई परिवारों के बुजुर्ग इतने खुशकिस्मत नहीं होते... आर्थिक उदारीकरण व निजीकरण से उपजे उपभोक्तावाद, भौतिकवाद ने जन्मी पैसे और ऐशो आराम को येन केन प्रकारेण कमाने व बढ़ाने की अंधी दौड़ ने केवल भारत को भ्रष्ट ही नहीं किया, परिवार नाम की संस्था पर भी चोट की है... बहुत छोटी होती जा रही है आज हमारी दुनिया... केवल अपनी पत्नी या पति और अपने बच्चों तक सीमित... हमारे बुजुर्ग हमको एक अनावश्यक बोझ से लगने लगे हैं जिनकी देखभाल में पैसा व समय लगाना हम में से बहुतों को व्यर्थ लगने लगा है...

एक अर्सा पहले इस प्रवृत्ति पर एक सत्य घटना को आधार बनाते हुऐ एक पोस्ट " बरसी ! " भी लिखी थी मैंने, समय हो तो देखियेगा...

भारत का हमारा यह आज का समाज परिवार के बच्चों, खासकर बेटों से अपेक्षा रखता है कि वह परिवार के बुजुर्गों का ध्यान रखे... अपवादों को यदि छोड़ दें तो अधिकाँश मामलों में खुद माँ-बाप भी अपनी बेटियों से यह अपेक्षा नहीं रखते... इस अपेक्षा के पीछे कोई 'वाद' नहीं है अपितु यह ठोस तथ्य है कि विवाहित बेटी के ऊपर उसके सास-ससुर की जिम्मेदारियाँ पहले से ही हैं... कुछ मामलों में जहाँ परिवार में बेटियाँ ही हैं बेटा नहीं वहाँ पर आर्थिक रूप से समर्थ बेटियाँ यह दायित्व निभा भी रही हैं...

एक समाज के तौर पर हमारे देश और खास तौर से हमारे मध्यवर्ग ( जो इस ब्लॉग का पाठक भी है ) के लिये यह इतिहास का सबसे अच्छा दौर है... जब वह अच्छा कमा रहा है...अच्छे साफ-सुथरे मकानों में रहता है... उसके पास निजी परिवहन का साधन भी है... टीवी, फोन व इंटरनेट के माध्यम से वह पूरे देश-दुनिया से जुड़ा हुआ भी है... उसके बच्चों के पास ढेर सी कैरियर-च्वाइस मौजूद हैं... बहुत बड़े पैमाने पर वह देश-दुनिया में घूमने व आनंद मनाने के लिये टूरिस्ट बन जा भी रहा है... उसके परिधान, उसके सौंदर्य साधन अंतर्राष्ट्रीय स्तर के हैं... तो फिर क्या वजह है कि इस वर्ग को अपने बुजुर्ग बोझ से लगने लगे हैं...

मैं जब अपने इर्द गिर्द देखता हूँ तो पाता हूँ कि हर तीसरा शख्स अपनी पत्नी के इस दबाव का सामना कर रहा है कि वह केवल और केवल अपने बीबी-बच्चों के हितों व भविष्य के बारे में सोचे तथा अपने माता-पिता व भाई-बहिनों के बारे में एक ' लिमिट ' (?) तक ही कुछ करने की सोचे... यह भी एक नंगा सत्य है कि अधिकतर परिवारों में जब तक बेटे अविवाहित रहते हैं परिवार हंसीखुशी मिलजुल कर बड़ी से बड़ी स्थिति का सामना करता रहता है... परंतु परिवार में किसी भी बेटे के विवाह के साथ ही विखंडन की प्रक्रिया ब बुजुर्गों की बेकदरी की शुरूआत हो जाती है...

मेरे एक बेहद ही हंसमुख, खुशमिजाज व मुंहफट बुजुर्ग मुस्लिम दोस्त हैं... अक्सर मुझसे कहते हैं... " यार, किसी 'घर' में रहने वाले सौ भीम भी यदि चौबीसों घंटे गदा प्रहार करते रहें तो भी किसी 'घर' का पलस्तर भी नहीं उखड़ेगा पर यदि उसी 'घर' की कोई महिला सुई की नोंक से कुरेदना शुरू कर दे तो 'घर' को नेस्तनाबूद होते चंद दिन भी नहीं लगते ! " मैं यद्मपि उनके इस कथन को ग्रॉस जेनरलाइजेशन मान खारिज करता हूँ फिर भी यहाँ दे रहा हूँ ताकि बहस में यह भी शामिल रहे... और आप भी इस पर कुछ कहें...

एक लिंक जिसका जिक्र वाणी जी ने रचना जी को श्रेय देते हुऐ और बख्श दो इन बुजुर्गों को ! कहते हुऐ (यहाँ पर) किया है...

कहता है:-

सौ फीसदी सर्वे में भाग लेने वाले बुजुर्गों ने कहा कि उनकी ' बहुऐं ' उन्हें सबसे ज्यादा प्रताड़ित करती हैं। ( लिंक )

आइये पता लगायें कि एक समाज के तौर पर हम कहाँ गलती कर रहे हैं...
  • आप चाहे आज की फिल्में देखें या टेलीविजन सीरियल या रीएल्टी शो... हम लोग एक ऐसे जोड़े के स्टीरियो टाइप को बढ़ावा दे रहे हैं जो चिरयुवा है हमेशा युवा ही दिखना चाहता है... अपना कमाया अपने पर ही और अपने एकाध बच्चों पर ही खर्च करना चाहता है... और बुजुर्गों को अपनी मंजिल पाने की राह में एक अड़चन के तौर पर देखता है।
  • नई कार, बढ़ा घर, नये किचन एप्लायन्स, एक्जॉटिक थीम पार्टी, एक्जॉटिक फॉरेन वेकेशन्स, डिजाइनर कपडों को ही दुनिया को अपने ' अराइव ' करने की घोषणा करने का जरिया मानने वाला एक वर्ग हमारे देश में पैदा हो गया है जिसके लिये अपने बुजुर्गों की देखभाल व उनका ख्याल रखना लक्ष्य से हटने सा हो गया है।
  • अपने बेटों को तो हम में से कुछ लोग ' श्रवण कुमार ' सा बनने की आस लिये पाल रहे हैं पर हमारे अपने ही घर में बुजुर्ग उपेक्षित जिंदगी जी रहे हैं...  हम यह क्यों नहीं सोचते कि वह अनुसरण तो हमारा ही करेगा।
  • उपभोक्तावाद व भौतिकवाद ने एक पूरी की पूरी पीढ़ी की लड़कियों ( यही तो कल बहुऐं बनेंगी ) को एक ऐसे घर की कल्पना दे दी है जिसमें सिर्फ उसका पति हो और दोनों के हमउम्र दोस्त... इस सुंदर व युवा दुनिया में किसी असुंदर, बीमार व उम्रदराज के लिये जगह नहीं बची ।
  • वानप्रस्थ व सन्यास आश्रम की पुरातन जीवन व्यवस्था और माया मोह को त्याग प्रभु नाम लेने में ही मुक्ति मिलने के धर्मगुरुओं के प्रवचनों (?) के प्रभाव में आ कई बुजुर्ग तो खुद ही अपनी आर्थिक स्वतंत्रता का त्याग कर अपनी नई पीढ़ी के ऊपर निर्भर हो बेकदरी का शिकार हो जाते हैं।
  • उदारीकरण के बाद पैदा हुए नये अमीरों द्वारा अपनी दौलत के बेशर्म व नंगा प्रदर्शन से हमारे अखबार, पत्रिकायें व टीवी चैनल अटे पड़े हैं... यह लोग समाज के एक वर्ग के नायक से भी बन गये हैं... अपने इन  ' नायकों '  के लाईफ स्टाइल की नकल करने की आकाँक्षा लिये इस नई पीढ़ी का मॉटो है " बाप बड़ा न भैय्या, सबसे बड़ा रूपैय्या ! "

शायद पहली बार कोई निराशावादी बात कर रहा हूँ, बुरा न मानियेगा... पर जल्दी में ही तो इस समस्या का कोई हल मुझे दिखता नहीं... तब तक के लिये तो बाप-माँ-भैय्या-बहन को रूपैय्ये से छोटा स्थान ही मिलता नजर आ रहा है मुझे... हमीं में से कुछ के द्वारा... :(


अपनी आप बताइये...




...


आलेख जो मेरी इस पोस्ट की प्रेरणा बने...

१- अनवरत : मेरा सिर शर्म से झुका हुआ है
२- नारी : संयुक्त परिवार में बुजुर्ग महिलाओं की स्थिति ...
३- ज्ञानवाणी : बख्श दो इन बुजुर्गों को .....
४- अनवरत : कैसी होगी नई आजादी ?
५- इडियन होम मेकर : बहुऐं हैं जिम्मेदार प्रताड़ना की !



जरा हट कर एक दूसरे कोण से भी देखिये मुद्दे को  :-

नारी : क्या बुजुर्गों की कोई गलती नहीं होती कभी भी ?  साभार रचना जी ...





...