बुधवार, 22 दिसंबर 2010

कम से कम एक बेटा तो होना ही चाहिये... वह होता तो क्या यह सब नहीं होता ?...


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मेरे 'पुत्रवान' मित्रों,

सही पूछो तो ब्लॉग है क्या... अपने मन में उमड़ते-घुमड़ते विचार, अपनी खुशियाँ, अपने गम,अपने मन के डर-संदेह, अपने मन में उठते सवाल आदि आदि सब को अपने रोजाना के जीवन के यार-दोस्तों-रिश्तेदारों से एक कदम आगे बढ़कर एक विस्तृत पाठक वर्ग के सामने पेश करने का एक कारगर जरिया ही तो है यह... कुछ इसी वजह से आज की यह पोस्ट भी है ।

अब जो मैं आपसे पूछना चाहता हूँ आज उसे समझने से पहले आप यह वाकया पढ़िये...



अभी हाल ही में हुआ क्या, कि मेरे वरिष्ठ अधिकारी अवकाश पर थे... इसलिये यह समझिये कि संस्थान के अध्यक्ष के दायित्व निर्वहन का भार मुझ पर था...

सुबह सवेरे दो बजे मेरे पास फोन आया... फोन करने वाले ने बताया कि वह हमारे कार्यालय की एक वरिष्ठ महिला लिपिक XYZ का मकान मालिक है... इसी के साथ उसने सूचित किया कि रात दस बजे XYZ के सीने में तेज दर्द सा उठा, उन्होंने मकान मालिक से मदद माँगी, किन्तु जब तक मदद आती, उनकी साँसें अचानक बन्द हो गईं, डॉक्टर बुलाया गया और उसने उन्हें मृत घोषित कर दिया है... मैंने संवेदना जताई और परिवार जनों को सूचित करने के बारे में पूछा, पता चला कि मृतका की दो बेटियाँ उसी शहर में रहती हैं और वे दोनों आ चुकी हैं... आश्वस्त हो मैं यह सोच कर सो गया कि सुबह अंतयेष्टि में शामिल होउंगा...

सुबह कार्यालय पहुंच कर मैंने निश्चय किया कि जरूरी काम निपटाने के बाद विभागीय शोकसभा की जायेगी व हममें से कुछ अंत्येष्टि में शामिल होंगे... परंतु अचानक फिर उसी मकान मालिक का फोन आया, उसकी आवाज में एक तरह का आग्रह सा था " साहब, आप जल्दी से जल्दी आइये, यहाँ पोजीशन खराब है। "... मैं तुरंत चला और कुछ ही समय में वहाँ पहुंच गया...

अब वहाँ पहुंचा तो मामला कुछ इस प्रकार था... खबर मिलते ही दोनों पुत्रियाँ-दामाद पहुंचे... मृत्यु पर शोक व्यक्त करना तो दूर, उन लोगों ने मृतका के सारे सामान को उलटना-पुलटना, विभिन्न सामानों के ताले तोड़ना व आपस में गाली गलौज करते हुऐ लड़ना शुरू कर दिया... स्थिति बिगड़ी तो लोगों ने स्थानीय पुलिस चौकी को सूचित किया... चौकी से दो सिपाही पहुंचे... उन्होंने पार्थिव शरीर को बाहर बरामदे में दरी के ऊपर लिटाया व मकान के उस भाग में ताला लगाया... और चाबी लेकर चौकी चले गये...

मृतका अपने पति की मृत्यु के बाद मृतक आश्रित के तौर पर नौकरी में लगी थीं... उनकी तीन बेटियाँ थी... सबसे बड़ी बेटी का विवाह दिल्ली में हुआ था... वह बेटी कुछ समय बाद तीन बच्चों को पीछे छोड़ चल बसी... मृतका का अपना खुद का बड़ा मकान था शहर में... पर वे अपने घर में न रह कर किराये के मकान में रह रही थी... वजह यह थी कि शहर में रहने वाली दोनों बेटी-दामादों ने घर पर कब्जा कर लिया था... लड़कियाँ हर समय माँ से इस बात को लेकर लड़ती रहती थी कि वह दूसरी को ज्यादा 'हिस्सा' देती है... मृतका दिल्ली वाली लड़की के बच्चों को कोई मदद न करे, इस बात पर दोनों बहनें एक थी... जब दोनों बेटी-दामादों द्वारा समस्त चल-अचल संपत्ति उनको देने व उन्हीं के नाम वसीयत करने का अनुचित दबाव पड़ा तो मृतका ने घर ही छोड़ दिया...

मेरे पहुंचने के समय तक न तो कोई शोक हो रहा था न ही अंत्येष्टि की कोई तैयारी... दोंनों बेटी-दामाद केवल चाबियाँ पाने व सामान खुलने की बेकरारी में आपस में लड़ते-झगड़ते बैठे थे... मैंने मकान-मालिक व पड़ोसियों को खर्चा देकर अंत्येष्टि की तैयारी शुरू करने को कहा... इसके बाद पुलिस चौकी में आदमी भेजकर चाबियाँ मंगवाई... चौकी के एक दीवान, स्थानीय पार्षद व खुद मेरी मौजूदगी में सारे ताले खोले गये... सारे जेवर, नकदी, कपड़ों व अन्य सभी सामान की एक लिस्ट बनाई गई... सभी गवाहों की मौजूदगी में लिस्ट की कई प्रतियाँ बनाई गई व बड़ी बेटी की सुपुर्दगी में सारा सामान व चाबियाँ दी गईं... मृतका की अंत्येष्टि व उस से जुड़े अन्य संस्कार करने में बेटियों-दामादों की अरूचि देखते हुऐ मैंने मिले हुए नकद रूपयों में से ग्यारह हजार रूपये सभी उपस्थितों की सहमति से बड़ी लड़की को यह कहकर दिये कि वह अपनी मृतक माता की तेरहवीं तक के सभी संस्कार इन पैसों से अच्छी तरह से करवायेंगी...

मृत्यु की गरिमा बनी रहे और मृत देह का और निरादर न हो इस लिये अपने सहकर्मियों के साथ मैं तब तक वहाँ रहा जब तक शमशान ले जाकर चिता प्रज्जवलित नहीं हो गई ।

इस पूरे घटनाक्रम के दौरान सैकड़ों लोग उस घर में आये और जो वाक्य मैंने सबसे ज्यादा सुना या यों कहिये कि लगभग हर कोई जिसे दोहरा दे रहा था... वह यह था... " बेचारी के एक भी बेटा नहीं था, कम से कम एक बेटा तो होना ही चाहिये, एक भी बेटा होता तो 'मिट्टी' की इतनी बेकदरी नहीं होती! "




इत्तफाक देखिये आपके इस ब्लॉग लेखक की भी अभी तक दो बेटियाँ ही हैं...


तो मैं आपकी ओर समाज का कहा यह कथन सवाल के तौर पर उछाल रहा हूँ...


" कम से कम एक बेटा तो होना ही चाहिये "...



वह होता तो क्या यह सब नहीं होता ?...



जवाब देंगे न !




आभार!






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प्रिय पाठक,

आदरणीय राहुल सिंह जी की पोस्ट बिटिया... इस सारे मुद्दे को बेहद खूबसूरती से पेश करती है, अवश्य पढ़ें।


23 टिप्‍पणियां:

  1. कम से कम सौ पचास उदाहरन दे दुँगी उन माँ पिता का जो जीते जी बेटो की बेकदरी के कारण हर पल मरते रहे है | खुद कई बार देखा और सुना है की कैसे पिता की लाश आँगन में पड़ी है और भाई आपस में संपत्ति के लिए लड़ रहे है | यदि बेटियों को माँ के पैसे का लालच है तो वो बेटा होने पर बेटे से भी ऐसी ही संम्पति ले लिए लड़ती और बेटा भी इसी तरह बेकदरी करता | यहाँ बात बेटा या बेटी का नहीं इंसानी लालच का है पैसे के आगे ख़त्म होते रिश्तो का है | बेटियों द्वारा इस तरह का काम कुछ अपवाद में ही मानिये (और मान कर चलिये की इसमे दामादो का बड़ा हाथ है ) वरना अक्सर बेटिया घर से विदा हो कर भी माँ बाप का जितना ख्याल रखती है उनसे दिल से दूर नहीं होती अपने घर से जुडी रहती है उतना बेटे अक्सर साथ हो कर भी साथ नहीं होते है |

    " बेटा होता तो ये नहीं होता" जैसे समाज के जुमले खीज पैदा करते है जैसे की सारे बेटे तो श्रवन कुमार ही पैदा होते है और बेटियों तो ..........बस जाने ही दीजिये |

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  2. आप एक बेटे की बात कर रहे हैं मैं आपको चार बेटों के खुशकिस्मत पिता की सच्ची कथा सुनाता हूँ. हमारे एक पहाड़ी पारिवारिक परिचित चार पुत्रों के खुशकिस्मत पिता थे. उनकी पत्नी युवावस्था में ही उनका साथ छोड़ गयीं थी पर उन्होंने बड़े जतन से अपने पुत्रों को पाला पोसा पढाया लिखाया. युवा होकर सभी पुत्र एक एक करके दिल्ली आ गए और यहीं विवाह कर अपनी गृहस्थी बसा ली पर पिता के लिए किसी भी पुत्र के घर में जगह नहीं बन पाई और पिता अकेले ही पहाड़ के अपने पुश्तेनी घर में रहे. जब उन चार पुत्रों वाले पिता की मृत्यु हुई तो उनका शव १५-२० दिन घर में पड़ा सड़ता रहा और किसी को पता भी ना चला. अब इसमे मिटटी की बेकदरी हुई या नहीं ये मैं नहीं कह सकता.

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  3. हाँ उन परिचित की एक बात याद आ गयी. वे जब जीवित थे तो अपने पुत्रों से कहते थे की मैं जब मर जाऊ तो बेशक मेरे शव को एक बोरे में बंद कर पहाड़ की किसी खाई में धकेल देना मुझे कोई फर्क नहीं पड़ेगा पर मेरे जीते जी तो मुझे पूछ लो पर..............

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  4. बेकदरी कोई किसी की भी कर सकता है. कितनी ही बार पैसों के लालच में माँ बाप बेटे / बेटी की बेकदरी करते हैं. जब रिश्तों में स्वार्थ और लोभ का वर्चस्व होता है तो ऐसी बातें भी होती हैं.

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  5. मेरा ख्याल है की बेटो और बेटिओं की बात करना छोड़ बच्चों की बात करनी चाहिए ..बच्चे लायक हों तो माता पिता सुखी होते हैं , नालायक हों तो दुखी ....अब ये बच्चे चाहे बेटे हों या बेटियां ..

    अन्शुमालाजी से सहमत हूँ की यहाँ बात बेटे/बेटी की नहीं , लालच की है ...

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  6. हे पुत्रीवान महाबाहु प्रिय प्रवीण जी ! जब समाज के सदस्य किसी आदर्श का अनुसरण नहीं और इस लोक के सुख साधनों को जमा करना ही अपना मक़सद बना लेते हैं तो बेटा हो या बेटी मिट्टी की नाक़द्री होना तय है और उसमें बसने वाली आत्मा की भी।
    ऐसे कई माँ बाप की दुर्गति का मैँ गवाह हूँ ।
    मामचंद बलबीर सिंह एंड संस के मालिक को बुढ़ापे में अपने इकलौते बेटे के कारण आत्महत्या करनी पड़ गई । बस एक दिन वे चले गए और गंगा के किनारे से आख़िरी फ़ोन अपने बेटे को किया । जब तक लोग वहाँ पहुंचे तब तक शरीर की मिट्टी गंगा में बह चुकी थी और कपड़े वहीं पड़े थे । बेटे को कफ़न भी न देना पड़ा । आलीशान शोरूम पर अब वह अकेला बैठता है । उसके पिता जी हमारे वालिद साहब के क्लासमेट और दोस्त थे ।

    2- अपने ब्लाग की ताजा दो पोस्ट्स देखने के मैं आपको आमंत्रित करता हूँ -
    http://ahsaskiparten.blogspot.com

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  7. धर्म और अध्यात्म
    'अध्यात्म' शब्द 'अधि' और 'आत्म' दो शब्दों से मिलकर बना है । अधि का अर्थ है ऊपर और आत्म का अर्थ है ख़ुद । इस प्रकार अध्यात्म का अर्थ है ख़ुद को ऊपर उठाना । ख़ुद को ऊपर उठाना ही मनुष्य का कर्तव्य है। ख़ुद को ऊपर उठाने के लिए प्रत्येक मनुष्य को कुछ गुण धारण करना अनिवार्य है जैसे कि सत्य, विद्या, अक्रोध, धैर्य, क्षमा और इंद्रिय निग्रह आदि । जो धारणीय है वही धर्म है । कर्तव्य को भी धर्म कहा जाता है। जब कोई राजा शुभ गुणों से युक्त होकर अपने कर्तव्य का पालन करता तभी वह ऊपर उठ पाता है । इसे राजधर्म कह दिया जाता है । पिता के कर्तव्य पालन को पितृधर्म की संज्ञा दे दी जाती है और पुत्र द्वारा कर्तव्य पालन को पुत्रधर्म कहा जाता है। पत्नी का धर्म, पति का धर्म, भाई का धर्म, बहिन का धर्म, चिकित्सक का धर्म आदि सैकड़ों नाम बन जाते हैं । ये सभी नाम नर नारियों की स्थिति और ज़िम्मेदारियों को विस्तार से व्यक्त करने के उद्देश्य से दिए गए हैं। सैकड़ों नामों का मतलब यह नहीं है कि धर्म भी सैकड़ों हैं । सबका धर्म एक ही है 'शुभ गुणों से युक्त होकर अपने स्वाभाविक कर्तव्य का पालन करना ।'

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  8. आपकी बात का जवाब तो नहीं लेकिन अपनी बात मैंने अपनी पोस्‍ट बिटिया में कही है.

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  9. old age is a problem and all children irrespective of the fact whether girl or boy think that what ever their parents have should come to them

    i want to write a long comment but then decided to put in post with back link to this post

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    @ राहुल सिंह जी,

    धन्यवाद, आपकी बेहद खूबसूरत व सामयिक पोस्ट बिटिया का लिंक भी जोड़ रहा हूँ पोस्ट में, अग्रिम आभार...


    ...

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  11. http://indianwomanhasarrived.blogspot.com/2010/12/blog-post_23.html

    aap ki suvidha kae liyae praveen

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  12. अंशुमाला जी की बात से सहमत
    क्या गारंटी है कि भाई होता तो उससे बहनों की लडाई नहीं होती

    यहाँ बात बेटा या बेटी का नहीं इंसानी लालच का है पैसे के आगे ख़त्म होते रिश्तो का है |

    प्रणाम

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  13. उफ, ऐसे लोभियों को बेटियाँ दे दीं।

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  14. "

    इस तह की बेटियों से आज तक मुलाक़ात नहीं हुई। वैसे समाज में रिश्तों के घटते मूल्यों को देखते हुए कुछ भी संभव है। आजकल माँ- बाप ही सही संस्कार नहीं दे पा रहे बच्चों को तो , संतानों से क्या अपेक्षा रखी जाए।

    बेटियों ने तो मरने के बाद शर्मसार किया। बेटे तो ज्यादातर जीते-जी माँ-बाप को आठ-आठ आंसू रुलाने में कोई कसर नहीं रखते।

    एक व्यक्तिगत अनुभव मेरा भी - मेरी माँ जब ICU में भर्ती थीं तो बहुत लोग थे करने वाले। बेटा भी बेटियां भी । लेकिन जिसने सबसे ज्यादा किया था वो हैं बड़ी बहन के पति अर्थात मेरे जीजाजी या यूँ कहिये मेरी माँ के बड़े दामाद ने।

    माँ बाप जब अपनी बेटियों का कन्यादान एक लायक पुरुष के हाथ में करते तो यही समझते हैं की एक अच्छे कुल और संस्कार वाला बेटा मिल गया।

    "अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो । "

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  15. क्या गारंटी है कि लडका होता तो यह ना होता .
    मेरे तो एक ही बेटी है और मुझे ऎसा नही लगता की मुझे दूसरी कोई भी संतान की आव्श्यकता है .

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  16. मुझे मृत्यु पश्चात के अनुभवों का अधिक भान नहीं पर रोज ही अखबारों मे पिता को मौत के घाट उतारने वाले या सुपारी देने वाले सपूतों के बारे मे पढता हूँ, अब आप ही बताईए, जीतेजी मरने की कामना/योजना करने वाला पुत्र बेहतर है क्या?

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  17. मेरी पोस्‍ट बिटिया के मूल्‍यांकन और इसका लिंक देने के लिए आपका आभार.

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  18. यह तो एकदम नवीन मामला है। आजतक ऐसी बेटियां तो हमने नहीं देखी। लेकिन यह दुनिया है यहाँ तरह-तरह के लोग हैं इसलिए कुछ भी असम्‍भव नहीं है। यह घटना बहुत ही कम प्रतिशत में होती है लेकिन यदि उनके बेटा होता तो प्रतिशत बढ़ जाता।

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  19. us samy agr bete ye kartut kar rahe hote to vahan upsthit log kahte "kash aik beti hoti "

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  20. andrew Carnegie ने कहा था | की आदमी को अपनी सारी संपत्ति का इस्तेमाल अपने जिन्दा रहते हुए कर लेना चाहिए |
    और मृत्यु के बाद किर्या कर्म का चेक bounce होना चाहिए, ताकि वो बच्चों को देना पडे |
    जब आप अपने जिन्दा रहते हुए पैसों को सद्कर्मों में लगायेंगे तो बच्चे भी शायद वही सीखेंगे |
    जैसे की कई लोग करते हैं (bill gates etc.) |
    यदि आप अपनी सारी जिम्मेदारी पूरी करने के बाद पैसे को अपने मन पसंद काम में लगायेंगे तो जरूर मरते समय संतुष्टि होगी |
    मैं महाराष्ट्र के एक बूढे दम्पति को जानता हूँ , उन्होने दोनों लडको को पढाया, वो बच्चे अपना कमाते हैं, और अपनी गृहस्थी चलाते हैं |
    और ये वृद्ध दम्पति अब अपने समय और पैसे का इस्तेमाल दुनिया घूमने में कर रहे हैं |
    तो आप पैसा को अपने जीवन में कैसे treat करते हैं इस पर बहुत कुछ निर्भर करता है |
    यदि आप आखिरी समय तक उसे संग्रह ही करते रहेंगे तो फिर ......

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  21. पोस्ट पढ़ तो मन क्षुब्ध हो गया पर टिप्पणियाँ पढ़ लगा,सबने मेरी मन की बात अलग-अलग शब्दों में कह दी है....बचपन में ही और वो भी एक गाँव में सात पुत्रों के माता-पिता को वृद्धावस्था में अकेले जीवन ढोते और कष्ट भोगते देख चुकी हूँ...
    बेटियों ने जो भी किया वह बहुत ही निंदनीय है...पर सच ये भी है...ऐसी बेटियों की संख्या बहुत कम

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  22. पोस्ट सभी कमेंट्स के साथ पढ़ा.. जहाँ पोस्ट मन को क्षुब्ध कर गया वहीं कमेंट में लोगों को यह प्रूफ करते देख, कि देखो लड़कियों से अधिक लड़के ये काम कर रहे हैं, ने एक मुस्कान ला दी..

    मेरे ख्याल से बात यहाँ लड़के या लड़की की नहीं है.. बात लालच की है.. और कहीं भी ये नहीं लिखा है कि किसी खास जेंडर के लोग ही लालची होंगे.. यह सब कुछ आस-पास के घर-समाज पर निर्भर करता है.. आप अपनी बेटियों को अच्छी शिक्षा एवं संस्कार दें और निश्चिन्त रहें..

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