गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

'चोरों' द्वारा शासित होने और लुटने को अभिशप्त एक बेईमान कौम हैं हम... बन्द करिये यह रोज रोज का घोटालों पर स्यापा करने का ढोंग...

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मेरे 'अभिशप्त' मित्रों,

मेरी पिछली पोस्ट के ऊपर आदरणीय डॉक्टर अनवर जमाल साहब ने एक पोस्ट लिखी है ALPHA MALE दोषी इंसान है , भगवान नहीं । , आप पोस्ट के हेडर पर मत जाईये, ( वह हम दोनों के बीच का एक पुराना मामला है), पर पोस्ट में जो कुछ उन्होंने लिखा है उसने मुझे बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया है...

वे लिखते हैं...

"आम आदमी चुनाव में वोट उसे डालता है जो उसे अच्छी तरह खिलाता ही नहीं बल्कि शराब भी पिलाता है। यही आम आदमी तो करप्ट है तभी तो वह अच्छे प्रतिनिधियों के बजाय गुंडे मवालियों को बेईमानों को चुनता है। यही आम आदमी जज़्बात में आपा खोकर आये दिन राष्ट्रीय संपत्ति में आग लगाता रहता है। कुली ट्रेन के जनरल कोच की बर्थ पर क़ब्ज़ा जमाकर लोगों को तब बैठने देता है जबकि वे उसे पैसे देते हैं। ईंट ढोने वाला मज़्दूर हर थोड़ी देर बाद बीड़ी सुलगाकर बैठ जाएगा। राज मिस्त्री को अगर आप चिनाई का ठेका दें तो जल्दी काम निपटा देगा और अगर आप उससे दिहाड़ी पर काम कराएं तो काम कभी ख़त्म होने वाला नहीं है। सरकारी बाबू भी आम आदमियों में ही गिने जाते हैं और रैली के नाम पर ट्रेन में बिना टिकट यात्रा करने वाले किसान भी आम आदमी ही माने जाते हैं। अपने पतियों की अंटी में से बिना बताए माल उड़ाने वाली गृहणियां भी आम आदमी ही कहलाती हैं। नक़ली मावा बेचने और नक़ली घी दूध बेचने वाले व्यापारी भी आम आदमी ही हैं और दहेज देकर मांगने वालों के हौसले बढ़ाने वाले भी आम आदमी ही हैं। आम आदमी खुद भ्रष्ट है इसका क्या मुंह है किसी को ज़लील करने का ?
आवा का आवा ही बिगड़ा हुआ है भाई साहब ।
आपने सुधार के लिए जो प्रस्ताव दिया है इस पर आम आदमी कभी अमल करने वाला नहीं है।
कुछ और उपाय सोचिए।"


जब गंभीरता से इसे सोचा तो मैंने पाया कि बिना किसी अपवाद के अपने रोजमर्रा के जीवन में कई छोटी-छोटी बेईमानियाँ तो करते ही रहते हैं हम सभी (मैं भी शामिल हूँ)...

मेरे ८२ वर्षीय पिता ने एक लम्बा जीवन-अनुभव लिया है व जब हम बात करते हैं तो वे अक्सर मुझसे तीन बाते कहते हैं, इस बारे में...

१- ईमानदारी हम हिन्दुस्तानियों का जीवन आदर्श कभी नहीं रहा... हमारे खून में ईमानदारी कभी रही ही नहीं...
२- मैंने केवल उन्हीं को अपने इतने बड़े जीवन में ईमानदार पाया है जिनको कभी बेईमानी करने का मौका या पद नहीं मिला...
३- हर इंसान की कीमत होती है कोई मार्केट रेट पर बिक जाता है... तो कोई अपनी बहुत ऊंची कीमत लगाता है, और उस कीमत के मिलने तक 'ईमानदार' कहलाता है...



अगर पूर्वाग्रहों को किनारे रख आप पूरी गंभीरता व ईमानदारी से इस बारे में सोचें तो क्या यह सही नहीं...


आज जब आप अकल्पनीय यह सब पढ़ते हैं... आदरणीय खुशदीप सहगल जी अपनी इस पोस्ट में लिखते हैं...

"कभी मीडिया के सम्मानित माने जाने वाले चेहरों का असली सच दुनिया के सामने आ रहा है...तो कभी ये हकीकत सामने आ रही है कि कैबिनेट में मंत्री बनाने का विशेषाधिकार बेशक प्रधानमंत्री का बताया जाता हो लेकिन ए राजा को तमाम विरोध के बावजूद कॉरपोरेट-मीडिया-राजनीति का शक्तिशाली गठजोड़ दूरसंचार मंत्री बनाने की ठान ले तो वो मंत्री बन कर ही रहते हैं...मंत्री ही नहीं बनते बल्कि खुल कर अपनी मनमानी भी करते हैं..यहां तक कि प्रधानमंत्री की सलाह भी उनके लिए कोई मायने नहीं रह जाती है...यानि नीरा राडिया का सिस्टम प्रधानमंत्री के सरकारी और सोनिया गांधी के राजनीतिक सिस्टम से भी ऊपर हो जाता है...शायद यही वजह है कि अपनी साख बचाने के लिए प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी को नीरा राडिया, राजा और उनके करीबियों के ठिकानों पर ताबड़तोड़ छापे डलवाने पड़ रहे हैं...लेकिन ये साख तभी बचेगी जब जनता के लूटे गए करीब दो लाख करोड़ रुपये को सूद समेत गुनहगारों से वसूल किया जाए...साथ ही सत्ता के दलालों को ऐसी सख्त सज़ा दी जाए कि दोबारा कोई नीरा राडिया, राजा, प्रदीप बैजल, बरखा दत्त, प्रभु चावला, वीर सांघवी बनने की ज़ुर्रत न कर सके...और अगर ऐसा नहीं होता तो फिर छापों की इस पूरी कवायद को हाथी निकल जाने के बाद लकीर पीटने की कवायद ही माना जाएगा...."


तो आपको क्या यकीन नहीं है कि यह सब हाथी निकल जाने के बाद लकीर पीटने की कवायद ही हो रही है... एक 'ईमानदार' सीवीसी तक तो मिल नहीं पाता इस देश में...


यह सब स्थिति केवल और केवल इसी लिये बनी है और बनी रहेगी क्योंकि अंदर ही अंदर हम सभी 'चोर' हैं...


मित्र तारकेश्वर गिरी जी का फारमूला ही सही लग रहा है अब तो...


भ्रष्टाचार को क़ानूनी मान्यता दे देनी चाहिए...


हर अच्छी-बुरी चीज की तरह इस क्रान्तिकारी कदम के उठाने का समय भी शायद आ गया है...





आभार!









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18 टिप्‍पणियां:

  1. @प्रवीण शाह भाई,
    आप का कहना अपनी जगह ठीक है...अंगूर खट्टे वाली कहावत हम सब पर चरितार्थ होती है...अंगूर नहीं मिलते तो हम सब उनके खट्टे होने का रोना रोने लगते हैं...हम अपने बच्चों को ही बी प्रैक्टिकल, बी स्मार्ट का पाठ पढ़ाते रहते हैं...उसी का नतीजा है कि सब का समुच्चय जो़ड़ा जाए तो बनाना रिपब्लिक सामने आता है...ऐसे में घर का मुखिया ईमानदार होने के साथ कड़क भी हो तो स्थिति को काफी कुछ तक सुधारा जा सकता है....मिसाल के तौर पर मैं दिल्ली मेट्रो का नाम आपको देता हूं...ई श्रीधरन के हाथ में जब तक मेट्रो की बागडोर रहेगी, भ्रष्टाचार की संभावना कम रहेगी...सिस्टम सुचारू रूप से चलता रहेगा...जिस दिन श्रीधरन हट जाएंगे, मेट्रो की साख पर भी सवाल लग जाएगा...

    जय हिंद...

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  2. http://indianwomanhasarrived.blogspot.com/2010/12/blog-post_16.html

    नीरा यादव और नीरा राडिया मे किसको ज्यादा और कितने जूते मारने का मन करता हैं ?

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  3. दुर्भाग्य है हमारा कि प्रधानमन्त्री और जनता दोनो चाहते हैं कि इमानदारी आये पर बीच में अराजकतत्वों की भीड़ अपना ही शासन करने में आमादा है।

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  4. अभी भी भारत के भोले लोगों को मुगालता है कि लोकतन्त्र में इसका हल है…। बाकियों की मैं नहीं जानता, लेकिन मैं भारत में कम से कम 5 साल "एक देशभक्त हिटलर" का शासन चाहता हूँ… जो नीचे से लेकर ऊपर तक सभी के पिछवाड़े पर लगातार हंटर बरसाता रहे…।

    ऐसा भी नहीं है कि पश्चिमी देशों या साम्यवादी देशों में सभी लोग ईमानदार ही हैं, कमीनापन उधर भी है, लेकिन उन लोगों ने एक "सिस्टम" बनाया है, न्याय व्यवस्था दुरुस्त रखी है और राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण किया है इसलिये वे हमसे अनुशासन और भ्रष्टाचार के मसलों पर थोड़ा ऊपर नज़र आते हैं…

    भारत के लोग भी कानून और नियमों का पालन करेंगे, बशर्ते डण्डे का भय बना रहे… और यह डण्डा करने वाला व्यक्ति लोकतांत्रिक पद्धति से तो मिलने से रहा…

    इसलिये देशभक्तों का कोई सशक्त गुट बने, जो सत्ता पर जबरिया कब्जा करे… सबसे पहले भ्रष्ट नेताओं और बड़े अफ़सरों को (पार्टी पोलिटिक्स से ऊपर उठकर) बीच चौराहे पर लाकर गोली मारना शुरु करे… देखिये कैसे आम आदमी की रीढ़ की हड्डी में कंपकंपी दौड़ती है कि नहीं…

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  5. ऐसा भी नहीं है प्रवीण भाई,
    अभी भी काफ़ी लोग इस देश में "जेनुइन" ईमानदार बचे हैं… वे तो जूते मार ही सकते हैं…

    साथ ही "मजबूरी में चोर" बन चुके लोग भी "डाकुओं" को जूते मारने का अधिकार रखते हैं…

    साथ ही जो चोर सही व्यवस्था मिलने पर सुधरने को तैयार हों वे भी "आदतन लुटेरों" को जूते लगाने का हक रखते हैं…

    यह तो हमें तय करना है कि हम किस कैटेगरी में आते हैं…।

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  6. एकतरफा और अतिरंजनापूर्ण, थोड़ी उत्‍तेजना भी है, जो पोस्‍ट के तथ्‍यों से भटका दे रही है.

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  7. सही कहा प्रवीण जी, अब तो ये घोटाले बिलकुल भी नहीं चौंकाते, क्‍योंकि इनमें होता हवाता कुछ भी नहीं है।

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    प्रेत साधने वाले।
    रेसट्रेक मेमोरी रखना चाहेंगे क्‍या?

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  8. मेरे तो ब्लॉग का टैग लाइन ही यही है कि "मेरा भारत महान सौ में से निन्यानबे बेईमान" , स्थित कैसे बदलेगी जब हम सभी आम आदमी भी बड़ी बेशर्मी से इस बात को स्वीकारने लगे है की हम सभी बेईमान है | खुल कर ये स्विकार करना कोई हिम्मत का काम नहीं है बल्कि ये हमारे बेईमानी को ससम्मान स्वीकृति दे देने की हमारी सोच को दर्शाता है | आज भ्रष्टाचार हमारी बात का हॉट टॉपिक है और हम सभी लगे है कुछ दिन बाद टॉपिक बदलेगा और हम सभी ये सब भूल कर किसी और बात पर बात करेंगे | क्रांति करने की अब हममे ना इच्छा है ना शक्ति |

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  9. अपने भारत में १०० मे से सिर्फ़ १० बेईमान है यही सच है . यह आकडा इससे भी कम हो सकता है . १२५ करोड मे सिर्फ़ ५४५ को आधार मान सकते है .
    मेरे पिता सांसद रहे और एक कमेटी में थे जिसे एक टेन्डर पर चर्चा करनी थी . और विट लगाने वाले सिर्फ़ तीन थे और उन तीनो की नीरा राडिया जैसे लाईज्नर थे . और कमेटी के सभी सदस्यो को एक बहुत अच्छी रकम का प्रस्ताव था तीनो की तरफ़ से . जब मेरे पिता ने इसका विरोध किया तो उनसे कहा गया आपको रुपया काटता है क्या . बाद मे मेरे पिता पर संसद में विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव भी आया इसपर बोलने के लिये

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  10. इस विषय पर मेरा व्यक्तिगत अनुभव मैं यहाँ लिख रहा हूँ.

    इस नवम्बर माह के मध्य एक सेवानिवृत हो रहे प्रधानाचार्य महोदय ने मेरे मित्र के जरिये मुझ से संपर्क साधा. गुरूजी अपने पेंशन, ग्रेच्युटी तथा सेवानिवृत्ति पर मिलने वाले दुसरे भत्तों का समय पर यानि की ३० नवम्बर को भुगतान चाहते थे और उनके अनुसार वेतन एवं लेखा कार्यालय में बिना रिश्वत दिए बिना उनके भविष्य निधि और ग्रेच्युटी आदी का पैसा समय पर नहीं मिल सकता था. वे रिश्वत देने के सख्त खिलाफ थे पर स्वस्थ्य ठीक ना होने की वजह से खुद भाग दौड़ नहीं कर सकते थे अतः चूँकि मैं लेखा कार्यालय में कार्यरत हूँ इसलिए मेरी सहायता चाहते थे. नियमानुसार पेंशन केस सेवानिवृत्ति से २ महीने पहले ही लेखा कार्यालय में भेज दिया जाना चाहिए और यहाँ उनके रिटायर्मेंट में सिर्फ पंद्रह दिन ही बाकी थे पर फिर भी मैंने तीन चार दिनों में ही जनाब की पेंशन के कागजात बनवाये और भविष्यनिधि और ग्रेच्युटी के चेक भी बनवा दिए. इस सब में उन्हें रिश्वत का एक पैसा भी नहीं देना पड़ा. अब उन्हें सिर्फ उनके खाते में जामा छुट्टियों के पैसे मिलने बाकी रह गए थे क्योंकि उनका छुट्टियों का खाता पूरा नहीं हुआ था.

    तीन चार दिन पहले उनका छुट्टियों के नकदीकरण का बिल हमारे कार्यालय में लगा. जब उनका छुट्टी खाता देखा गया तो उसमे १० दिन की ऐसी छुट्टी भी थी जिनका नकदीकरण नहीं हो सकता था अतः मैंने प्रधानाचार्य महोदय को सन्देश भिजवा दिया की वो दुबारा से १० दिनों की छुट्टी कम करके अपना बिल बनवा ले क्योंकि उन १० छुट्टियों के पैसे उन्हें नहीं मिल सकते. १० दिनों की छुट्टी कम करने के पश्चात् उनके बिल की राशी जो की करीब पौने दो लाख थी में मात्र ९-१० हजार रुपये की राशी की कमी होनी थी.

    मैंने सोचा की प्रधानाचार्य महोदय अपने बिल की राशी में कटौती करके दुबारा बिल लगा देंगे पर उन्होंने ऐसा करने के बजाय मुझ से पूछा की क्या कुछ ले दे कर पूरा बिल पास नहीं हो सकता.

    ये है आम आदमी की मानसिकता. जरा सा फायदा दिखा नहीं फ़ौरन से लेन देन पर उतार आते हैं वर्ना देश के भ्रष्टाचारियों पर हाय तौबा मचाते रहते हैं.

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  11. जब तक हमारे मानसिक और सामाजिक मूल्य ऎसे नहीं हो जायेंगें कि आदमी का लाभालाभ ही मनुष्यता के पैमाने में नापा जाए, अर्थात जब तक आदमी पैसे से नापा जाएगा मन से नहीं, तब तक हमारी लज्जा और ग्लानि के दृश्य हमारी आँखों के सामने आते ही रहेंगें..दिन-प्रतिदिन....इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं.चाहे लाख प्रयत्न कर लिए जाएं....

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  12. प्रवीण जी!
    आपका यह कहना कि ..बन्द करिये यह रोज़ रोज़ का घोटालों पर स्यापा करने का ढ़ोंग....आपके भीतर के आक्रोश को ही दिखता है।

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  13. यदि आप अच्छे चिट्ठों की नवीनतम प्रविष्टियों की सूचना पाना चाहते हैं तो हिंदीब्लॉगजगत पर क्लिक करें. वहां हिंदी के लगभग 200 अच्छे ब्लौग देखने को मिलेंगे. यह अपनी तरह का एकमात्र ऐग्रीगेटर है.

    आपका अच्छा ब्लौग भी वहां शामिल है.

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    @ हिन्दी ब्लॉगजगत,
    आपका यह प्रयास सराहनीय है...मेरे ब्लॉग को शामिल करने के लिये आभार!



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  15. आप ने बहुत मार्के की बात कही है मगर फिर भी प्रत्यक्ष हुए चेहरों पर कालिख पोतने और चार जूते लगाने से सन्देश ठीक जाता है !

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  16. एक कड़वी सच्चाई बयान की है-आपने।
    सद्भावी-डॉ० डंडा लखनवी
    =========================

    वर्तमान व्यवस्था पर एक टिप्पणी-
    =========================

    मौज-मस्ती में जुटे थे जो वतन को लूट के।
    रख दिया कुछ नौजवानों ने उन्हें कल कूट के।।

    सिर छिपाने की जगह सच्चाई को मिलती नहीं,
    सैकडों शार्गिद पीछे दौड़ते हैं झूट के।।

    हाजमा उनका दिनो -दिन और भी बढता गया,
    एक दल से दूसरे में जब गए वे टूट के।।

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  17. प्रवीण पाण्डेय @ बीच में अराजकतत्वों की भीड़ भी खुद से नहीं आ जाती, जनता ही लाती है..यह भेडचाल समाज है

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  18. Alpha male उर्फ़ महानर प्रिय प्रवीण जी ! आपने बंदे के ख़याल पर तवज्जो दी ,
    शुक्रिया
    लेकिन जिस पोस्ट का ज़िक्र आपने किया है उससे पिछली पोस्ट भी आपको ही संबोधित / लक्षित करके लिखी गई है और बिल्कुल ताज़ा पोस्ट में भी आपको पुकार कर कुछ पूछा गया है।
    Please have a look on

    Snowfall in Srinagar,

    my latest post.

    जहाँ चाह वहाँ राह
    सबसे अच्छी बात यह है कि भारतीय जनमानस में सुधार की चाह मौजूद है और अनुशासन की भट्टी में तपे हुए लाखों फ़ौजी भी । छोटी मोटी ग़लतियों को दरगुज़र किया जाए तो नागरिकों में भी करोड़ों लोग ठीक ठाक से निकल आएंगे और कुछ तो बिल्कुल आदर्श ही हैं । आने वाले समय मेँ जब प्राकृतिक आपदाएं आएंगी तब पापी लोग भी जान के लाले पड़े देखकर नेक से हो जाएंगे ।
    तमाम ख़राबियों के बावजूद हमारे पास अच्छाई का बीज सुरक्षित है । यह एक अच्छी बात है ।
    रूस आदि जिन मुल्कों सुधार के लिए डिक्टेटर आ गए थे उन्होंने सुधार कितना किया और बिगाड़ कितना ?
    यह जानना आसान है।

    उपाय कुछ और ही है।
    मार्ग कुछ और ही है ।

    उत्तर देंहटाएं

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