रविवार, 12 दिसंबर 2010

' अंकल ' जी, कहीं आपके कारण सड़ने न लगें एक दिन हम सारे के सारे... आज ही से सफाई करिये इस सडांध की...!!!

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मेरे 'तरोताजा' मित्रों,

क्या कहूँ इस आलेख को लिखते हुऐ मेरे हाथ की-बोर्ड पर सध कर नहीं चल रहे... काँप सा रहा हूँ मैं भावनाओं के ज्वार मैं...

बचपन से ही खबरों पर नजर रखता रहा मैं... एक छोटे हाल में पैदा हुऐ बच्चे को देखा होगा आपने... कितना भरोसा होता है उसको अपने माँ-बाप पर... आप हवा में ऊंचा उछालें फिर भी न रोता है, न घबराता है बल्कि किलकिलाकर हंसता है... क्योंकि उसे भरोसा है कि आप उसे नुकसान नहीं होने देंगे... लपक लेंगे गिरने से पहले ही...

कुछ ऐसा ही भरोसा रहा है मुझे दो संस्थाओं पर, पहली हमारी फौज और दूसरी हमारी न्यायपालिका... बेदाग होना चाहिये था इन दोनों को... अब फौज के ऊपर भी आदर्श हाउसिंग घोटाला जैसे दाग लग रहे हैं... देखना यह है कि वह कितनी सफाई कर पाती है... सफाई करती भी है या नहीं... या फिर इस सारे मामले को जाँचों व फाईलों में दबा दिया जाता है...

पर आज मैं बात करूंगा कुछ खबरों की... २६ नवंबर को माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने जो कहा उसे आप यहाँ पढ़िये...

" कुछ सड़ा हुआ है इलाहाबाद हाईकोर्ट में "

"The faith of the common man in the country is shaken to the core by such shocking and outrageous orders," said justices Katju and Mishra.

"We are sorry to say but a lot of complaints are coming against certain judges of the Allahabad High Court relating to their integrity," said the bench, without disclosing the contents of complaints.

( शिकायतें धड़ल्ले से अब नेट पर तक खुले आम लिखी जा रही हैं...यदि झूठी हैं तो शिकायतकर्ता को हिमाकत की कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिये जो दूसरों के लिये उदाहरण बन सके, अन्यथा न्याय...)

Referring to the rampant 'uncle judge' syndrome allegedly plaguing the high court, the apex court bench said, "Some judges have their kith and kin practising in the same court.

"And within a few years of starting practice, the sons or relations of the judge become multi-millionaires, have huge bank balances, luxurious cars, huge houses and are enjoying a luxurious life. This is a far cry from the days when the sons and other relatives of judges could derive no benefit from their relationship and had to struggle at the bar like any other lawyer," the bench added."

अब इसी बात पर हाईकोर्ट ने इन टिप्पणियों पर स्पष्टीकरण व इनको वापस लेने हेतु एक प्रार्थनापत्र दायर किया... जिस पर माननीय सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा...

आप देखिये यहाँ पर...

"The remarks are unfortunate and uncalled for and has brought down the image of the Allahabad High Court judges in the eyes of the general public. The observations have made it difficult for the judges to function," the application had stated.

Maintaining its 'there is something rotten in Allahabad HC' remark, the Supreme Court has virtually declined any relief to Allahabad High Court. The HC had asked for clarification for this comment of the Supreme Court.

At the same time, a bench of justices Markandey Katju and Gyan Sudha Mishra, while dismissing the Allahabad High Court's application for expunging the remarks, clarified that there were "excellent and good judges too" in the court.

Rejecting the arguments of senior counsel P P Rao that even a clarification that some are excellent and good judges would still cause suspicion on the integrity of the judges, the bench remarked, "It is not just time to react but also to introspect."

Reacting to the persistent plea of Rao that the clarification would not be sufficient, Justice Katju angrily retorted, "Do not tell all those things. I and my family have more than 100 years of association with the Allahabad High Court. People know who is corrupt and who is honest. So do not tell me all this."

Justice Katju further observed, "Tomorrow, if Markandey Katju starts taking bribe, then the entire country will know about it. So do not tell me as to who is honest and who is corrupt."

Rao submitted that the earlier observations had tarnished the image of the entire High Court judiciary and the rustic would not be able to distinguish between a honest and a corrupt judge.

"Do not tell me all those things about the rustic. They are much more enlightened. Do not think people of India are fools," the bench observed while dismissing the application.


अब आप बताइये क्यों हमारे माननीय सर्वोच्च न्यायालय को ऐसा कहना पड़ रहा है... यदि कुछ सड़ रहा है न्याय के मंदिरों में... तो क्या यह सड़ता-सड़ाता ही रहेगा... या सफाई होगी ?... क्या आप सफाई के हक में हैं ?... क्या आप सफाई के लायक हैं ?... यह कैसा सड़ा हुआ समाज बनते जा रहे हैं हम लोग ?...

पिछले आलेख में कुछ पाठकों ने पूछा है कि सफाई होगी कैसे, सर्जरी करेगा कौन... हमें अपने घर से शुरू करना होगा इसे... देखिये पहले अपने अंदर फिर अपने घर में फिर रिश्तेदारों में, दोस्तों में, गली में, कालोनी-मोहल्ले में, पूरे समाज में... न्यायमूर्ति ने सही कहा है कि हिन्दुस्तान का 'आम आदमी' बेवकूफ नहीं है उसे सब पता है कि कौन ईमानदार है और कौन बेईमान... 'आम आदमी' होने के नाते आपको भी पता ही होगा कि किसकी शानो-शौकत, ऐश्वर्य भ्रष्टाचार की काली कमाई से पाये गये हैं... बार-बार उन को जताओ कि कितना ही तुम पा जाओ, है तो यह चोरी के पैसे से पाया हुआ ही... अत: हमारी नजर में इसकी कोई कीमत नहीं... इस 'तुच्छता' को हर वक्त जताओ उनके सामने...आंखों में आंखें डाल कर... हो सकता है कि यह सब आपको अपने ही परिजन के साथ करना पड़े... या कुछ मामलों में खुद को ही अपनी नजर में गिरा हुआ देखना पड़े... पर यह सब करने से ही 'चोरी' आउट ऑफ फैशन होगी... और यह सड़ना रूकेगा... नहीं तो हम सारे के सारे एक दिन सड़ जायेंगे... अभी देर नहीं हुई, इस सड़न को रोका जा सकता है...


क्या आप में है यह इच्छा शक्ति ?








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@ सभी पाठकगण,

यदि इस नैतिक पतन को वाकई रोका नहीं जा सकता तो क्या यह सही नहीं रहेगा, कि...भ्रष्टाचार को क़ानूनी मान्यता दे देनी चाहिए... कम से कम अपराधबोध से तो बचे रहें सब के सब...

मित्र तारकेश्वर गिरी जी को आभार सहित...




14 टिप्‍पणियां:

  1. जब तक आत्मा न धिक्कारे तब तक कुछ नहीं होना प्रवीण भाई !बड़े गहरे मन से निकली है यह लेख ...शुभकामनायें आपको

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  2. पिछले आलेख में कुछ पाठकों ने पूछा है कि सफाई होगी कैसे, सर्जरी करेगा कौन... हमें अपने घर से शुरू करना होगा इसे... देखिये पहले अपने अंदर फिर अपने घर में फिर रिश्तेदारों में, दोस्तों में, गली में, कालोनी-मोहल्ले में, पूरे समाज में... न्यायमूर्ति ने सही कहा है कि हिन्दुस्तान का 'आम आदमी' बेवकूफ नहीं है उसे सब पता है कि कौन ईमानदार है और कौन बेईमान... 'आम आदमी' होने के नाते आपको भी पता ही होगा कि किसकी शानो-शौकत, ऐश्वर्य भ्रष्टाचार की काली कमाई से पाये गये हैं... बार-बार उन को जताओ कि कितना ही तुम पा जाओ, है तो यह चोरी के पैसे से पाया हुआ ही... अत: हमारी नजर में इसकी कोई कीमत नहीं... इस 'तुच्छता' को हर वक्त जताओ उनके सामने...आंखों में आंखें डाल कर... हो सकता है कि यह सब आपको अपने ही परिजन के साथ करना पड़े... या कुछ मामलों में खुद को ही अपनी नजर में गिरा हुआ देखना पड़े... पर यह सब करने से ही 'चोरी' आउट ऑफ फैशन होगी... और यह सड़ना रूकेगा... नहीं तो हम सारे के सारे एक दिन सड़ जायेंगे... अभी देर नहीं हुई, इस सड़न को रोका जा सकता है...


    क्या आप में है यह इच्छा शक्ति ?


    aap ne sab kuchh kehdiyaa .

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  3. बड़ी ही सार्थक पोस्ट है
    अंतरात्मा को जगाने वाली
    लेकिन किसकी अंतरात्मा?
    कितनों के पास है ये आत्मा?
    हम हमेशा दूसरों को साफ-सुथरा देखना चाहते हैं
    दुसरे को नीचा दिखाना हमारी मूल प्रवृत्ति है
    सब निकम्मे हैं
    सब हरामखोर हैं
    सब भ्रष्टाचारी हैं
    अच्छा कौन???
    बस मैं अच्छा
    मेरे मां-बाप अच्छे
    मेरे बच्चे अच्छे
    ----------
    सबसे बड़ी खामी है
    गलत बात के खिलाफ हमारा चुप रहना
    गलत के खिलाफ कोई नहीं खड़ा होना चाहता
    यह गुण कहीं सिखाया भी नहीं जाता
    न घर में, न स्कूल-कालेज में
    अभी कुछ दिन पहले ही मैंने नारी ब्लॉग पर हंगामा देखा था
    वहां इकलौता आपका कमेन्ट मर्दाना था
    बाकी लोग मिमिया भर रहे थे
    आपकी जान-पहचान का कोई शख्स अथवा आपका कोई अपना जब गलत करता है तो ऐसी ही मिमियाहट निकलती है
    जिस दिन भी गलत के खिलाफ हम बोलना सीख जायेंगे उस दिन ऐसी पोस्ट लिखने की आवश्यकता नहीं रह जायेगी .. जय हिंद

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  4. देख तेरे इस देश की हालत क्या हो गयी भगवान।

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  5. सब अंकल सिंड्रॉम से ग्रस्त हैं। यहां तक की अंकल कॉमन-मैन सिंड्रॉम भी है शायद।
    आम आदमी चरित्र की मांग नहीं करता। सो उसे सड़ांध मिलती है।

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  6. आपके पहले पैरा पर-
    छत पर से बेटे ने नीचे खड़े पिता से पूछा, कूद जाउं, कूद जाउं, लपक लोगे...पिता ने कहा, हां कूद जा, और बेटा कूद पड़ा, पिता ज्‍यों के त्‍यों खड़े रहे, बेटा गिर पड़ा, चोट लगी, पूछा आपने तो कहा था लपक लेंगे, पिता ने कहा ''जमाना खराब है, बाप की बात का भी भरोसा मत करना''

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    @ सभी पाठकगण,

    यदि इस नैतिक पतन को रोका नहीं जा सकता तो क्या यह सही नहीं रहेगा, कि...भ्रष्टाचार को क़ानूनी मान्यता दे देनी चाहिए...

    मित्र तारकेश्वर गिरी जी को आभार सहित...

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  8. भ्रस्टाचार को क़ानूनी मान्यता दे देनी चाहिए.-तारकेश्वर गिरी.
    और नहीं तो क्या , ऐसा ही होना चाहिए, कम से कम भ्रस्टाचारी को तो थोड़ी आसानी होगी. जनता को भी कम से कम रेट तो तय हो जायेंगे. भ्रष्टाचारियों को पकडे जाने और सजा का डर तो हैं नहीं, उन्हें ये अच्छी तरह से पता हैं कि उन्हें कब और कैसे बचना हैं.


    अब मीडिया को ही देख लीजिये. एक भ्रस्टाचार का मुद्दा मिला नहीं कि शोर-शराबा चालू, विरोधी दल भी अपना हिस्सा मांगने के लिए धरने पर बैठ जाता हैं, धरने पर तो फिर भी ठीक हैं, मगर संसद न चलने देना, रोड जाम और रैली कि तो बात ही अलग हो जाती हैं.


    अब आप ही बताइए कि अगर जंतर -मंतर पर रोज -रोज हंगामा और रैली होगी तो हिस्सा तो चाहिए न. और रैली में भाग लेने वाली जनता का क्या वो तो बेचारी मुफ्त सफ़र करके दिल्ली आ जाती हैं. कुछ तो दिल्ली घूम कर के चले जाते हैं और कुछ बेचारे रेलवे स्टेशन से ही रोजी -रोटी के जुगाड़ में दिल्ली में खो जाते हैं.

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    @ आदरणीय सतीश सक्सेना जी,

    आपको भी शुभकामनायें सर जी !

    @ रचना जी,

    आभार आपका!

    @ बेनामी जी,

    जय हिंद व आभार!


    @ आदरणीय प्रवीण पान्डेय जी,

    'भगवान' को इस सब से क्या... उसके रहने के 'ठिकाने' तो और बड़े, विशाल व भव्य बनते जा ही रहे हैं... और इन सब को बनाने में लगी काली कमाई से परहेज भी नहीं उसको... वह तो फैसला भी केवल यह देख कर करता है कि रातदिन कितना 'इगो मसाज' करते हैं आप उस का... 'भगवान' न नैतिक है और न ईमानदार ही... वह यथास्थिति का पोषक है... क्या फायदा उस से अपील करने का ?


    ...

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    @ आदरणीय ज्ञानदत्त पान्डेय जी,

    "सब अंकल सिंड्रॉम से ग्रस्त हैं। यहां तक की अंकल कॉमन-मैन सिंड्रॉम भी है शायद।
    आम आदमी चरित्र की मांग नहीं करता। सो उसे सड़ांध मिलती है।"


    सर कभी-कभी मैं भी यही सोचने लगता हूँ...जब यार लोग बताते हैं कि पत्नी कहती है "या तो दुनियादारी सीख लो, या लोटा पकड़ हिमालय चले जाओ"... एक पूरी की पूरी पीढ़ी जो आज 'पोस्टलिबरलाइजेशन हायर एजुकेशन' की 'पेड' सीटों पर पढ़ाई व पदों को खरीद रही है, ईमानदारी और नैतिकता नाम के शब्द तक नहीं हैं उनके शब्दकोश में...

    फिर भी... कबहुं न छोड़िये आस... मैं तो आशावान रहूँगा ताजिंदगी... :)


    @ आदरणीय राहुल सिंह जी,

    वाकई जमाना खराब है... पर गुनहगार कौन है... यही सोचना है अभी...

    @ प्रिय तारकेश्वर गिरी जी,

    आपने नस सही जगह पर दबाई है, पुन: आभार आपका!


    ...

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  11. आम आदमी के पास हथियार नहीं हैं. भ्रष्टाचार ऊपर से नीचे की ओर होता है. हमेशा.. ऊपर का एक आदमी ठीक होगा नीचे हजार अपने आप हो जायेंगे.. आखिर क्यों बनाये गये हैं हजारों कानून, क्यों दिया जा रहा है करोड़ों अरबों रुपये का वेतन.. यदि सब कुछ आम आदमी ही करने में समर्थ होता तो क्या जरूरत थी कानून की... व्यवस्था की.. इन्हें चलाने के लिये संस्थाओं की...

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  12. जी नहीं कम से कम मुझ जैसे आम आदमी में ना तो इतनी इच्छा शक्ति है और ना ही हिम्मत

    पहली बात की दूसरे को कुछ कहने से पहले अपना दामन साफ होना चाहिए | चलिए सरकारी नोकरी में नहीं हु तो रिश्वत नहीं लेती हु पर क्या टैक्स ईमानदारी से पूरा भरती हु क्या देश के सारे नियम कानून मानती हु शायद नहीं |

    दूसरे हमें इस बात की समझ भी है की ऐसा करने से सामने वाला तो नहीं बदलेगा पर मेरा उससे और उससे जुड़े सभी से रिश्ता दोस्ती जानपहचान सब पहली बार ही ऐसा करते है ख़त्म हो जायेगा ( उनके द्वारा ऐसा कर दिया जायेगा ) फिर बार बार की नौबत ही नहीं आएगी | फिर मेरे ऊपर उनके और उनके आस पास के लोगों द्वारा एक टैग लगा दिया जायेगा की मै जलती हु ईमानदारी तो बस बहाना है असल में तो ये उनकी प्रगति संम्पन्नता से जलन के कारण किया जायेगा | जहा जाउंगी लोगों के ताने की शिकर हो जाउंगी | उसको एक बार कहूँगी मुझे सारे जीवन सुनना पड़ेगा और कई रिश्तो दोस्तों पहचान वालो का साथ छुट जायेगा अलग |

    ज्यादा से ज्यादा खुद को बेईमान होने से बचाने के प्रयास करुँगी |

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  13. jis tathya par 'satya' ki parakh hoti
    rahi hai...agar oospar amal karen to
    jindgi achhi ya buri..kya bach payegi


    pranam.

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  14. दोषी कौन ?
    इंसान या भगवान
    जब इंसान अपने मजे को मकसद बना लेता है तब मज़े के लिए सेक्स और नशे की बाढ़ समाज में आ जाती है । जिसका कारोबार दुनिया में हर साल खरबों-खरब डॉलर का होता है। जो संभोग में समाधि के गुर सिखाते हैं ऐसे गुरू मार्ग दिखाते हैं। नशा सौ बुराईयों की माँ है लेकिन समाज को सुधारने का , उसकी सर्जरी का बीड़ा वे 'जवान' उठाते हैं जो खुद नशेड़ी हैं।
    अनैतिक खुद हैं लेकिन ये भगवान को अनैतिक बताते हैं , जैसे ख़ुद हैं भगवान को भी वैसा ही मान बैठते हैं , लेकिन अभी भगवान के ऐसे भक्त ज़िंदा हैं जो नशा नहीं करते और नैतिक नियमों का पालन करते हैं । ऐसे सभी भक्तों को भगवान नैतिकता का स्रोत और आदर्श नज़र आता है ।
    जो खुद ही न पहचान पाया हो वह खुदा को क्या पहचानेगा ?
    भगवान ने तो तुम्हें रूप बल बुद्धि सब कुछ दिया। तुम्हें शिक्षण और प्रशिक्षण दिया। तुम्हें रक्षक, पालक और न्यायपालक जैसे वे सम्मानित पद दिए जिन पर वह खुद आसीन है। अब तुम ही योग्यता अर्जित न करो, अपने फ़र्ज़ अदा न करो और दुनिया को तबाह कर डालो तो इसमें दोषी भगवान है या इंसान ?

    भगवान यथास्थिति का पोषक नहीं है । जो यथास्थिति का पोषक हो वह न भगवान है और न इंसान ।

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