शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

आखिर क्यों मारा गया बेचारा हेमराज... क्या इस मामले में कोई कुसूरवार था ही नहीं, या बड़े लोगों के लिये खून माफ है ?

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आखिर हार मान ली सीबीआई ने, रहस्य ही रहेगा आरूषि-हेमराज की हत्या का यह मामला, नहीं मिलेगी गुनहगारों को सजा...


कौन सी वह मजबूरी या दबाव था, जिसके चलते सीबीआई का यह वरिष्ठ अफसर तक केस को सही तरह हैंडल नहीं कर पाया।


किस के असर या दबाव के चलते ऐसा हुआ, कि सीबीआई तक ने माना कि आरूषि के वैजाइनल स्वाब सैम्पल किसी दूसरी अज्ञात महिला से बदल दिये गये !


विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि टच डीएनए टैस्ट से भी कोई लाभ नहीं होगा इस मामले में...


क्या नौएडा के सरकारी अस्पताल की पैथोलॉजिस्ट ने सैंपलों में हेराफेरी की ?


या फिर इज्जत बचाने के लिये यह कहा जा रहा है, कि शायद पोस्टमॉर्टम करने वाले डॉक्टरों ने लापरवाहीवश वैजाइनल स्वाब लिये ही नहीं!


पूरे केस में शुरू से जाहिर है कि सबूतों को मिटाया गया, सबूतों को बदला गया... क्या हमारी प्रीमियर जाँच एजेंसी यह भी पता नहीं लगा सकी कि किसने ऐसा किया या किसके इशारे पर ऐसा किया गया... क्या परिस्थिति जन्य साक्ष्यों की कानून की नजर में कोई अहमियत नहीं... क्या इस दोहरे हत्याकांड के उद्धेश्य का पता लगाना वाकई इतना मुश्किल था...


क्या यह सच नहीं कि अगर इलेक्ट्रानिक मीडिया ने हर पल इतना दबाव न बनाया होता, टीआरपी की होड़ में इतनी कांव-कांव न की होती... तो न कातिलों का हौसला बढ़ता, और पुलिस सभी संदिग्धों से थाने में ले जाकर की 'सामान्य पूछताछ' करने को आजाद होती... तो कत्ल के सारे सबूत आसानी से मिल जाते... और कातिल भी आज सजा काट रहे होते...


क्या यह सच नहीं कि ब्रेन मैपिंग व नारको एनालिसिस क्राइम इन्वेस्टिगेशन के नाम पर एक महंगा मजाक है...


केस आज भले ही बन्द हो जाये...पर मैं उम्मीद का दामन नहीं छोड़ूंगा... हर एक हत्यारा कभी न कभी अपने करमों के बारे में 'गाता' जरूर है...


देर से ही सही यह केस सोल्व होगा जरूर, मेरे जीवनकाल में ही...


क्या आप भी मेरी ही तरह आशावान हैं ?


बताईये अवश्य...









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अरे हाँ, नया साल आपको मुबारक इस उम्मीद के साथ कि इस साल मेरे देश में सभी को न्याय मिलेगा... हेमराज जैसों को भी !


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बुधवार, 29 दिसंबर 2010

माँ तुझे सलाम !...

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वह जब बहुत कम उम्र की थीं तो पोलियो की शिकार हो गईं...बड़ी हुई तो ब्याह दी गई...पति खेत-मजदूर थे, कभी कभी ईंट भट्टों में भी काम करते थे... पाँच लड़के-पाँच लड़कियाँ... मिट्टी की झोपड़ी...उस के नीचे बारह जन... ऊँची जात वालों के गाँव में रहता दलित परिवार... वह कहती हैं " गाँव के उस तालाब में जहाँ भैंसों तक को नहाने की आजादी थी वहाँ मेरे बच्चों को नहाने नहीं दिया जाता था"... पर इस बात को लेकर आज भी कोई कड़वाहट नहीं है उनके मन में... वह कहती हैं कि "ऊँची जात के गाँव वाले यह सब हमें प्रताड़ित करने के लिये नहीं करते थे, वे तो बस सदियों पुरानी परंपराओं का निर्वाह कर रहे थे"... भारी पानी होने के कारण गाँव की जमीन से उपज भी बहुत कम होती थी... कुल मिला कर बोलें तो स्थितियाँ बड़ी विषम... पर उस माँ को एक ही लगन थी... 'मुझे अपने बच्चों को पढ़ाना है।'... उसने कभी हिम्मत नहीं हारी... हाड़तोड़ मेहनत की... यहाँ तक कि फसल के खेत से काट लिये जाने के बाद खेतों में बिखरे सरसों के दाने तक बटोरे...अपने बच्चों की स्कूल की फीस देने के लिये... और आखिरकार वह माँ कामयाब हुई अपने लक्ष्य में... आज उनके सारे बच्चे कामयाब हैं जीवन में...


 


नई दिल्ली में आयोजित एक समारोह में केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री मुकुल वासनिक ने मिश्री देवी को 'नेशनल अवार्ड फार बैस्ट मदर' से सम्मानित किया...


'माँ' मेरा भी तुझे सलाम !


अफसोस कि कोई मिश्री देवी पर फिल्म नहीं बनायेगा... फिल्में बनती रहेंगी गरीबी और लाचारी पर...लाचारी से, हालात से बिना लड़े, हार को ही अपनी नियति माने हुऐ इंसानों पर... नेशनल अवार्ड ऐसी ही फिल्मों को मिलता है...और ऑस्कर में भी ऐसी ही फिल्मों की पूछ जो है ।
भूख-गरीबी का महिमामंडन व गौरवगान बिकाऊ भी है और सहानूभूति बटेरू भी...



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भारत की इस श्रेष्ठ माता के बारे में और जानने के लिये कृपया यह भी पढ़ें...

दैनिक जागरण का समाचार...

जज्बे को मिला सम्मान:दैनिक ट्रिब्यून...

84-Year-Old wins Best Mother Award

MOTHER COURAGE:Times of India...

She battled polio and poverty to shape her children’s life: The Tribune







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शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

अब उल्टे उस्तरे से हमें मूंडना बन्द करो यार... २६ जनवरी आने ही वाली है, हो जाये कुछ ईनाम-शिनाम !!!

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मेरे 'सम्मानित' मित्रों,

अगर कभी गाँव-देहात में रहे हों तो वहाँ का नाई याद होगा... जिसके पास कोई ब्लेड नहीं, बल्कि उस्तरा रहता था जिसे वह पत्थर पर आपके सामने ही घिस कर आपकी हजामत बनाता था... कभी कभी ग्राहक यदि सीधा-सादा हो तो नाई बिना धार लगाये भी हजामत बना देता था... नतीजा कई जगह से छिला हुआ चेहरा... सोचिये क्या होगा अगर वही नाई उस तरफ से आपकी हजामत बनाये जिस तरफ धार ही नहीं होती...

यानी उल्टे उस्तरे से हजामत बनवाना !!!

कुछ ऐसा ही महसूस कर रहा हूँ मैं...

देखिये...

हाल ही में कामयाब कॉमनवेल्थ खेलों के बारे में...

कुछ दिलजले कह रहे थे कि... मच्छरों को बेचे गये हैं शायद टिकट...

अनजान थे बेचारे, राज तो अब खुला है... कहाँ गये थे वो सारे टिकट...???

अब देखिये न सीबीआई को कितनी सारी काम करने की आजादी ??? दी गई है... जिनके खिलाफ जाँच चल रही है ऑफिस अभी भी उनके ईशारे पर चलता है।

अहम गवाहों की सुरक्षा के भी पुख्ता इंतजामात ??? किये गये हैं ।

इसीलिये कहता हूँ कि थक गये हैं अब हम सरकार... दया कीजिये, मत मूंडिये उल्टे उस्तरे से हमको... बंद कीजिये यह सब जाँच-वाँच का नाटक... २६ जनवरी आने ही वाली है... सही मौका है इस महा-लूट-आयोजन से जुड़े हर किसी को... नेता-प्रशासक-खेल प्रशासक-इंजीनियर-सप्लायर-ठेकेदार-दलाल सभी को... चुन-चुन कर ढूंढ निकालिये... और थमा ही दीजिये एकाध सम्मान !


कम से कम हमारे रहे सहे गाल तो छिलने से बच जायेंगे ।


क्यों मित्रों,

आप साथ हैं इस अपील में ?...

गाल तो आपके भी छिल ही रहे हैं!



आभार!




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बुधवार, 22 दिसंबर 2010

कम से कम एक बेटा तो होना ही चाहिये... वह होता तो क्या यह सब नहीं होता ?...


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मेरे 'पुत्रवान' मित्रों,

सही पूछो तो ब्लॉग है क्या... अपने मन में उमड़ते-घुमड़ते विचार, अपनी खुशियाँ, अपने गम,अपने मन के डर-संदेह, अपने मन में उठते सवाल आदि आदि सब को अपने रोजाना के जीवन के यार-दोस्तों-रिश्तेदारों से एक कदम आगे बढ़कर एक विस्तृत पाठक वर्ग के सामने पेश करने का एक कारगर जरिया ही तो है यह... कुछ इसी वजह से आज की यह पोस्ट भी है ।

अब जो मैं आपसे पूछना चाहता हूँ आज उसे समझने से पहले आप यह वाकया पढ़िये...



अभी हाल ही में हुआ क्या, कि मेरे वरिष्ठ अधिकारी अवकाश पर थे... इसलिये यह समझिये कि संस्थान के अध्यक्ष के दायित्व निर्वहन का भार मुझ पर था...

सुबह सवेरे दो बजे मेरे पास फोन आया... फोन करने वाले ने बताया कि वह हमारे कार्यालय की एक वरिष्ठ महिला लिपिक XYZ का मकान मालिक है... इसी के साथ उसने सूचित किया कि रात दस बजे XYZ के सीने में तेज दर्द सा उठा, उन्होंने मकान मालिक से मदद माँगी, किन्तु जब तक मदद आती, उनकी साँसें अचानक बन्द हो गईं, डॉक्टर बुलाया गया और उसने उन्हें मृत घोषित कर दिया है... मैंने संवेदना जताई और परिवार जनों को सूचित करने के बारे में पूछा, पता चला कि मृतका की दो बेटियाँ उसी शहर में रहती हैं और वे दोनों आ चुकी हैं... आश्वस्त हो मैं यह सोच कर सो गया कि सुबह अंतयेष्टि में शामिल होउंगा...

सुबह कार्यालय पहुंच कर मैंने निश्चय किया कि जरूरी काम निपटाने के बाद विभागीय शोकसभा की जायेगी व हममें से कुछ अंत्येष्टि में शामिल होंगे... परंतु अचानक फिर उसी मकान मालिक का फोन आया, उसकी आवाज में एक तरह का आग्रह सा था " साहब, आप जल्दी से जल्दी आइये, यहाँ पोजीशन खराब है। "... मैं तुरंत चला और कुछ ही समय में वहाँ पहुंच गया...

अब वहाँ पहुंचा तो मामला कुछ इस प्रकार था... खबर मिलते ही दोनों पुत्रियाँ-दामाद पहुंचे... मृत्यु पर शोक व्यक्त करना तो दूर, उन लोगों ने मृतका के सारे सामान को उलटना-पुलटना, विभिन्न सामानों के ताले तोड़ना व आपस में गाली गलौज करते हुऐ लड़ना शुरू कर दिया... स्थिति बिगड़ी तो लोगों ने स्थानीय पुलिस चौकी को सूचित किया... चौकी से दो सिपाही पहुंचे... उन्होंने पार्थिव शरीर को बाहर बरामदे में दरी के ऊपर लिटाया व मकान के उस भाग में ताला लगाया... और चाबी लेकर चौकी चले गये...

मृतका अपने पति की मृत्यु के बाद मृतक आश्रित के तौर पर नौकरी में लगी थीं... उनकी तीन बेटियाँ थी... सबसे बड़ी बेटी का विवाह दिल्ली में हुआ था... वह बेटी कुछ समय बाद तीन बच्चों को पीछे छोड़ चल बसी... मृतका का अपना खुद का बड़ा मकान था शहर में... पर वे अपने घर में न रह कर किराये के मकान में रह रही थी... वजह यह थी कि शहर में रहने वाली दोनों बेटी-दामादों ने घर पर कब्जा कर लिया था... लड़कियाँ हर समय माँ से इस बात को लेकर लड़ती रहती थी कि वह दूसरी को ज्यादा 'हिस्सा' देती है... मृतका दिल्ली वाली लड़की के बच्चों को कोई मदद न करे, इस बात पर दोनों बहनें एक थी... जब दोनों बेटी-दामादों द्वारा समस्त चल-अचल संपत्ति उनको देने व उन्हीं के नाम वसीयत करने का अनुचित दबाव पड़ा तो मृतका ने घर ही छोड़ दिया...

मेरे पहुंचने के समय तक न तो कोई शोक हो रहा था न ही अंत्येष्टि की कोई तैयारी... दोंनों बेटी-दामाद केवल चाबियाँ पाने व सामान खुलने की बेकरारी में आपस में लड़ते-झगड़ते बैठे थे... मैंने मकान-मालिक व पड़ोसियों को खर्चा देकर अंत्येष्टि की तैयारी शुरू करने को कहा... इसके बाद पुलिस चौकी में आदमी भेजकर चाबियाँ मंगवाई... चौकी के एक दीवान, स्थानीय पार्षद व खुद मेरी मौजूदगी में सारे ताले खोले गये... सारे जेवर, नकदी, कपड़ों व अन्य सभी सामान की एक लिस्ट बनाई गई... सभी गवाहों की मौजूदगी में लिस्ट की कई प्रतियाँ बनाई गई व बड़ी बेटी की सुपुर्दगी में सारा सामान व चाबियाँ दी गईं... मृतका की अंत्येष्टि व उस से जुड़े अन्य संस्कार करने में बेटियों-दामादों की अरूचि देखते हुऐ मैंने मिले हुए नकद रूपयों में से ग्यारह हजार रूपये सभी उपस्थितों की सहमति से बड़ी लड़की को यह कहकर दिये कि वह अपनी मृतक माता की तेरहवीं तक के सभी संस्कार इन पैसों से अच्छी तरह से करवायेंगी...

मृत्यु की गरिमा बनी रहे और मृत देह का और निरादर न हो इस लिये अपने सहकर्मियों के साथ मैं तब तक वहाँ रहा जब तक शमशान ले जाकर चिता प्रज्जवलित नहीं हो गई ।

इस पूरे घटनाक्रम के दौरान सैकड़ों लोग उस घर में आये और जो वाक्य मैंने सबसे ज्यादा सुना या यों कहिये कि लगभग हर कोई जिसे दोहरा दे रहा था... वह यह था... " बेचारी के एक भी बेटा नहीं था, कम से कम एक बेटा तो होना ही चाहिये, एक भी बेटा होता तो 'मिट्टी' की इतनी बेकदरी नहीं होती! "




इत्तफाक देखिये आपके इस ब्लॉग लेखक की भी अभी तक दो बेटियाँ ही हैं...


तो मैं आपकी ओर समाज का कहा यह कथन सवाल के तौर पर उछाल रहा हूँ...


" कम से कम एक बेटा तो होना ही चाहिये "...



वह होता तो क्या यह सब नहीं होता ?...



जवाब देंगे न !




आभार!






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प्रिय पाठक,

आदरणीय राहुल सिंह जी की पोस्ट बिटिया... इस सारे मुद्दे को बेहद खूबसूरती से पेश करती है, अवश्य पढ़ें।


सोमवार, 20 दिसंबर 2010

हिट जायेगी या पिट जायेगी... अब यह तो आप ही डिसाइड करोगे न माईबाप ?


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मेरे 'पाठक-माईबाप' मित्रों,

इन्सान जब खुद को कमजोर पाता है तो क्या-क्या नहीं करने को मजबूर हो जाता... अपने एक मित्र हैं, उमर में थोड़ा ज्यादा हैं पर कुछ बातों में मैंने पाया है कि उनकी सोच कुछ-कुछ मुझ से ही मिलती है... अब आजकल अपने यह मित्र कुछ परेशान से हैं... वजह है उनकी बड़ी बिटिया, २९ वर्ष की हो जाने के बाद भी विवाह नहीं हो पा रहा उसका... अब किसी ने सुझाया कि पास के शहर में एक नामी ज्योतिषी हैं जो उपाय सुझा सकते हैं... तो जनाब ने मन बनाया मिलने जाने का और मेरे बार-बार मना करने के बाद भी मुझे मजबूर कर ही दिया साथ जाने को...

तो साहब, केवल और केवल इसी शर्त पर मैंने जाना मंजूर किया कि मैं वहाँ जाकर अपनी ओर से कुछ बोलूँगा नहीं... रविवार के दिन सुबह-सुबह हम निकले और ग्यारह बजे पहुंच गये ज्योतिषी महोदय के आवास पर... परिचय आदि हुआ, उन्होंने बताया कि वे चार साल पहले ही शिक्षा विभाग के एक बड़े पद से सेवानिवृत्त हुऐ हैं और ज्योतिष विद्मा महज उनका शौक है, जन सेवा के लिये वह यह कार्य करते हैं तथा वे परामर्श का कोई शुल्क नहीं लेते आदि...

इसके बाद ज्योतिषी महोदय ने मित्र से उनका जन्म स्थान, तिथि व समय पूछा, इसे एक कागज पर लिखा तथा बड़े जतन से रेशमी कपड़े में सहेज कर रखा गया एक ग्रन्थ खोला... उनके साथ बैठे एक व्यक्ति ने बताया कि यह ग्रन्थ अत्यंत दुर्लभ है और ज्योतिषी महोदय को उनके गुरू द्वारा आशीर्वाद के रूप में दिया गया है...

मेरे मित्र ने कुछ कहने का प्रयत्न किया तो उनको इशारे से चुप करा दिया गया... ज्योतिषी महोदय ने ग्रन्थ से कुछ उस कागज पर उतारा, गणनायें की, फिर बोले...कुछ बातें बताता हूँ ध्यान से सुनिये...

*१- आपकी राशि पर ग्रहों के प्रभाव के कारण आपके काम रूके हुऐ हैं, अकसर रूकावटें आती हैं।
*२- आपने काफी ऊँची जगह पहुँचना था परंतु स्थितियाँ कुछ ऐसी रही कि आप वहाँ तक नहीं पहुँच पाये जहाँ आप पहुंच सकते थे।
*३- आपकी आमदनी अच्छी-खासी है परंतु खर्चे भी आमदनी के अनुपात में ज्यादा ही रहते हैं, इसलिये हाथ तंग रहता है।
*४- अपने मन से तो आप सभी का भला ही चाहते हैं परंतु कभी-कभी आपके परिचित आपके आशय को समझ नहीं पाते व बुरा मान जाते हैं।
*५- निकट भविष्य में ही आपका एक एक्सीडेंट होने व दिल की बीमारी (हार्ट अटैक) होने की संभावना है, यह सब आपकी कुंडली में लिखा है, इसी लिये मैं आपको सचेत कर रहा हूँ।

इतना सुनना था कि हमारे मित्र भयभीत और 'महा-इम्प्रेस' हो गये... लगे उपाय पूछने... उपाय बताया गया बाँये हाथ की मध्यमा ऊंगली में 'गोमेद' धारण करने का व दाहिने हाथ की अनामिका में 'मूंगा' धारण करने का... यह दोनों रत्न ग्रहों के दुष्प्रभाव को हल्का या समाप्त करने की क्षमता रखते हैं, बताया गया... इन दोनो रत्नों की अंगूठियों की कीमत व उन को मंत्रासिक्त कर पहनने काबिल बनाने का 'खर्चा' मात्र २००० रू० बताया गया... मित्र ने तुरंत भुगतान कर दिया... बताया गया कि दो दिन बाद आदमी भेज कर अंगूठियाँ मंगवा लें...

हम लोग उठने को ही थे कि अचानक मित्र को याद आया कि मैं यहाँ आया किस काम से था... उन्होंने बिटिया का विवाह न हो पाने के बारे में बताया... ज्योतिषी महाराज ने फिर कुछ गणनायें की और कहा या तो अगले तीन-चार महीने में विवाह हो जायेगा या फिर एक वर्ष तक और इंतजार करना होगा... बिटिया को भी लेकर दोबारा परामर्श के लिये आने को कहा गया...

इस सारे समय मैं सप्रयास चुप ही रहा...उठते समय ज्योतिषी जी ने मेरे बारे में पूछा तो मैंने बताया कि मैं ब्लॉग लिखता हूँ और आज के अनुभव के बारे में पोस्ट डालूँगा...मजाक-मजाक में ही मैंने यह पूछ कि पोस्ट 'हिट जायेगी या पिट जायेगी?'...उन्होंने जो बताया वह मैं बताउंगा पोस्ट के अंत में...

अब मेरे नजरिये से इस वाकिये को देखिये... ज्योतिषी जी ने जो बताया उनमें से...

*१- " आपकी राशि पर ग्रहों के प्रभाव के कारण आपके काम रूके हुऐ हैं, अकसर रूकावटें आती हैं। "...

यह हर उस आदमी पर लागू होती है जो ज्योतिषियों के पास जाता है, यही तो वजह है जिसके कारण वह परामर्श चाहता है।

*२- " आपने काफी ऊँची जगह पहुँचना था परंतु स्थितियाँ कुछ ऐसी रही कि आप वहाँ तक नहीं पहुँच पाये जहाँ आप पहुंच सकते थे। "...

यह भी लगभग सभी पर लागू होती है अपनी वर्तमान स्थिति से सर्वदा संतुष्ट बहुत कम लोग होंगे और जो हैं उनकी ज्योतिषियों के पास जाने की संभावना शून्य है।

*३- " आपकी आमदनी अच्छी-खासी है परंतु खर्चे भी आमदनी के अनुपात में ज्यादा ही रहते हैं, इसलिये हाथ तंग रहता है। "...

यह बात चाहे गली के मुहाने पर खड़े भिखारी से कही जाये या किसी 'धनकुबेर' से... सिर उसका हाँ कहते हुऐ ही हिलेगा।

*४- " अपने मन से तो आप सभी का भला ही चाहते हैं परंतु कभी-कभी आपके परिचित आपके आशय को समझ नहीं पाते व बुरा मान जाते हैं। "...

आर्डिनरी मोर्टल्स की तो बिसात ही क्या... यह बात चाहे आप राम से कहो या रावण से दोनों सहमति दिखायेंगे।

*५- " निकट भविष्य में ही आपका एक एक्सीडेंट होने व दिल की बीमारी (हार्ट अटैक) होने की संभावना है, यह सब आपकी कुंडली में लिखा है, इसी लिये मैं आपको सचेत कर रहा हूँ। "...

अब यह दोनों चीजें वाकई हो गई तो आप सच्चे... और यदि न हुई तो रत्न प्रभाव!


तो यह था हमारे ज्योतिष से साक्षात्कार का वर्णन, अरे हाँ मैं यह तो बताना भूल ही गया कि मेरे सवाल 'पोस्ट हिट जायेगी या पिट जायेगी?' का जवाब उन्होंने दिया था कि यह निर्णय तो पाठक ही करेगा...

यह तो मानना होगा सबको कि यहाँ पर ज्योतिषी महाराज एकदम सही हैं।

इसी लिये माईबाप अब आप ही मेरे माईबाप हो!

आपका हर निर्णय सिर-माथे...


पर निर्णय तो देंगे न ?




आभार!





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अपडेट:- दो दिन बाद अंगूठियाँ आ गई थी, मित्र को पहले कभी किसी ने अंगूठी पहनते नहीं देखा था, हर कोई अंगूठियों के बारे में पूछने लगा, कुछ 'जानकारों' ने बताया कि दोनों की वास्तविक कीमत हजार-बारह सौ से ज्यादा नहीं है, मित्र काफी कंजूस हैं, व्यथित हुऐ। एक 'जानकार' ने गोमेद को सूर्य की रोशनी में देखा और बताया कि इसमें एक हल्का सा 'क्रैक' है, उनके अनुसार रत्न में यह दरार तब आती है जब आपदा टल जाये। अब मित्र और परेशान, उन्हें समझ नहीं आया कि उनकी आपदा टली या किसी और की आपदा झेला हुआ रत्न उनको पहना दिया गया है, बीच में एक रोज बीपी की दवाई खाना भूल गये,रात भर नींद नहीं आई, घुटन सी होने लगी, उन्हें रत्न जिम्मेदार लगे, उतार फेंके। अगले दिन मिले, प्रसन्न थे, बोले "अब उतार कर ज्यादा आराम महसूस कर रहा हूँ।" आजकल फिर छुट्टी लेकर वर देखने गये हैं बिटिया के लिये।





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गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

'चोरों' द्वारा शासित होने और लुटने को अभिशप्त एक बेईमान कौम हैं हम... बन्द करिये यह रोज रोज का घोटालों पर स्यापा करने का ढोंग...

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मेरे 'अभिशप्त' मित्रों,

मेरी पिछली पोस्ट के ऊपर आदरणीय डॉक्टर अनवर जमाल साहब ने एक पोस्ट लिखी है ALPHA MALE दोषी इंसान है , भगवान नहीं । , आप पोस्ट के हेडर पर मत जाईये, ( वह हम दोनों के बीच का एक पुराना मामला है), पर पोस्ट में जो कुछ उन्होंने लिखा है उसने मुझे बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया है...

वे लिखते हैं...

"आम आदमी चुनाव में वोट उसे डालता है जो उसे अच्छी तरह खिलाता ही नहीं बल्कि शराब भी पिलाता है। यही आम आदमी तो करप्ट है तभी तो वह अच्छे प्रतिनिधियों के बजाय गुंडे मवालियों को बेईमानों को चुनता है। यही आम आदमी जज़्बात में आपा खोकर आये दिन राष्ट्रीय संपत्ति में आग लगाता रहता है। कुली ट्रेन के जनरल कोच की बर्थ पर क़ब्ज़ा जमाकर लोगों को तब बैठने देता है जबकि वे उसे पैसे देते हैं। ईंट ढोने वाला मज़्दूर हर थोड़ी देर बाद बीड़ी सुलगाकर बैठ जाएगा। राज मिस्त्री को अगर आप चिनाई का ठेका दें तो जल्दी काम निपटा देगा और अगर आप उससे दिहाड़ी पर काम कराएं तो काम कभी ख़त्म होने वाला नहीं है। सरकारी बाबू भी आम आदमियों में ही गिने जाते हैं और रैली के नाम पर ट्रेन में बिना टिकट यात्रा करने वाले किसान भी आम आदमी ही माने जाते हैं। अपने पतियों की अंटी में से बिना बताए माल उड़ाने वाली गृहणियां भी आम आदमी ही कहलाती हैं। नक़ली मावा बेचने और नक़ली घी दूध बेचने वाले व्यापारी भी आम आदमी ही हैं और दहेज देकर मांगने वालों के हौसले बढ़ाने वाले भी आम आदमी ही हैं। आम आदमी खुद भ्रष्ट है इसका क्या मुंह है किसी को ज़लील करने का ?
आवा का आवा ही बिगड़ा हुआ है भाई साहब ।
आपने सुधार के लिए जो प्रस्ताव दिया है इस पर आम आदमी कभी अमल करने वाला नहीं है।
कुछ और उपाय सोचिए।"


जब गंभीरता से इसे सोचा तो मैंने पाया कि बिना किसी अपवाद के अपने रोजमर्रा के जीवन में कई छोटी-छोटी बेईमानियाँ तो करते ही रहते हैं हम सभी (मैं भी शामिल हूँ)...

मेरे ८२ वर्षीय पिता ने एक लम्बा जीवन-अनुभव लिया है व जब हम बात करते हैं तो वे अक्सर मुझसे तीन बाते कहते हैं, इस बारे में...

१- ईमानदारी हम हिन्दुस्तानियों का जीवन आदर्श कभी नहीं रहा... हमारे खून में ईमानदारी कभी रही ही नहीं...
२- मैंने केवल उन्हीं को अपने इतने बड़े जीवन में ईमानदार पाया है जिनको कभी बेईमानी करने का मौका या पद नहीं मिला...
३- हर इंसान की कीमत होती है कोई मार्केट रेट पर बिक जाता है... तो कोई अपनी बहुत ऊंची कीमत लगाता है, और उस कीमत के मिलने तक 'ईमानदार' कहलाता है...



अगर पूर्वाग्रहों को किनारे रख आप पूरी गंभीरता व ईमानदारी से इस बारे में सोचें तो क्या यह सही नहीं...


आज जब आप अकल्पनीय यह सब पढ़ते हैं... आदरणीय खुशदीप सहगल जी अपनी इस पोस्ट में लिखते हैं...

"कभी मीडिया के सम्मानित माने जाने वाले चेहरों का असली सच दुनिया के सामने आ रहा है...तो कभी ये हकीकत सामने आ रही है कि कैबिनेट में मंत्री बनाने का विशेषाधिकार बेशक प्रधानमंत्री का बताया जाता हो लेकिन ए राजा को तमाम विरोध के बावजूद कॉरपोरेट-मीडिया-राजनीति का शक्तिशाली गठजोड़ दूरसंचार मंत्री बनाने की ठान ले तो वो मंत्री बन कर ही रहते हैं...मंत्री ही नहीं बनते बल्कि खुल कर अपनी मनमानी भी करते हैं..यहां तक कि प्रधानमंत्री की सलाह भी उनके लिए कोई मायने नहीं रह जाती है...यानि नीरा राडिया का सिस्टम प्रधानमंत्री के सरकारी और सोनिया गांधी के राजनीतिक सिस्टम से भी ऊपर हो जाता है...शायद यही वजह है कि अपनी साख बचाने के लिए प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी को नीरा राडिया, राजा और उनके करीबियों के ठिकानों पर ताबड़तोड़ छापे डलवाने पड़ रहे हैं...लेकिन ये साख तभी बचेगी जब जनता के लूटे गए करीब दो लाख करोड़ रुपये को सूद समेत गुनहगारों से वसूल किया जाए...साथ ही सत्ता के दलालों को ऐसी सख्त सज़ा दी जाए कि दोबारा कोई नीरा राडिया, राजा, प्रदीप बैजल, बरखा दत्त, प्रभु चावला, वीर सांघवी बनने की ज़ुर्रत न कर सके...और अगर ऐसा नहीं होता तो फिर छापों की इस पूरी कवायद को हाथी निकल जाने के बाद लकीर पीटने की कवायद ही माना जाएगा...."


तो आपको क्या यकीन नहीं है कि यह सब हाथी निकल जाने के बाद लकीर पीटने की कवायद ही हो रही है... एक 'ईमानदार' सीवीसी तक तो मिल नहीं पाता इस देश में...


यह सब स्थिति केवल और केवल इसी लिये बनी है और बनी रहेगी क्योंकि अंदर ही अंदर हम सभी 'चोर' हैं...


मित्र तारकेश्वर गिरी जी का फारमूला ही सही लग रहा है अब तो...


भ्रष्टाचार को क़ानूनी मान्यता दे देनी चाहिए...


हर अच्छी-बुरी चीज की तरह इस क्रान्तिकारी कदम के उठाने का समय भी शायद आ गया है...





आभार!









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रविवार, 12 दिसंबर 2010

' अंकल ' जी, कहीं आपके कारण सड़ने न लगें एक दिन हम सारे के सारे... आज ही से सफाई करिये इस सडांध की...!!!

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मेरे 'तरोताजा' मित्रों,

क्या कहूँ इस आलेख को लिखते हुऐ मेरे हाथ की-बोर्ड पर सध कर नहीं चल रहे... काँप सा रहा हूँ मैं भावनाओं के ज्वार मैं...

बचपन से ही खबरों पर नजर रखता रहा मैं... एक छोटे हाल में पैदा हुऐ बच्चे को देखा होगा आपने... कितना भरोसा होता है उसको अपने माँ-बाप पर... आप हवा में ऊंचा उछालें फिर भी न रोता है, न घबराता है बल्कि किलकिलाकर हंसता है... क्योंकि उसे भरोसा है कि आप उसे नुकसान नहीं होने देंगे... लपक लेंगे गिरने से पहले ही...

कुछ ऐसा ही भरोसा रहा है मुझे दो संस्थाओं पर, पहली हमारी फौज और दूसरी हमारी न्यायपालिका... बेदाग होना चाहिये था इन दोनों को... अब फौज के ऊपर भी आदर्श हाउसिंग घोटाला जैसे दाग लग रहे हैं... देखना यह है कि वह कितनी सफाई कर पाती है... सफाई करती भी है या नहीं... या फिर इस सारे मामले को जाँचों व फाईलों में दबा दिया जाता है...

पर आज मैं बात करूंगा कुछ खबरों की... २६ नवंबर को माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने जो कहा उसे आप यहाँ पढ़िये...

" कुछ सड़ा हुआ है इलाहाबाद हाईकोर्ट में "

"The faith of the common man in the country is shaken to the core by such shocking and outrageous orders," said justices Katju and Mishra.

"We are sorry to say but a lot of complaints are coming against certain judges of the Allahabad High Court relating to their integrity," said the bench, without disclosing the contents of complaints.

( शिकायतें धड़ल्ले से अब नेट पर तक खुले आम लिखी जा रही हैं...यदि झूठी हैं तो शिकायतकर्ता को हिमाकत की कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिये जो दूसरों के लिये उदाहरण बन सके, अन्यथा न्याय...)

Referring to the rampant 'uncle judge' syndrome allegedly plaguing the high court, the apex court bench said, "Some judges have their kith and kin practising in the same court.

"And within a few years of starting practice, the sons or relations of the judge become multi-millionaires, have huge bank balances, luxurious cars, huge houses and are enjoying a luxurious life. This is a far cry from the days when the sons and other relatives of judges could derive no benefit from their relationship and had to struggle at the bar like any other lawyer," the bench added."

अब इसी बात पर हाईकोर्ट ने इन टिप्पणियों पर स्पष्टीकरण व इनको वापस लेने हेतु एक प्रार्थनापत्र दायर किया... जिस पर माननीय सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा...

आप देखिये यहाँ पर...

"The remarks are unfortunate and uncalled for and has brought down the image of the Allahabad High Court judges in the eyes of the general public. The observations have made it difficult for the judges to function," the application had stated.

Maintaining its 'there is something rotten in Allahabad HC' remark, the Supreme Court has virtually declined any relief to Allahabad High Court. The HC had asked for clarification for this comment of the Supreme Court.

At the same time, a bench of justices Markandey Katju and Gyan Sudha Mishra, while dismissing the Allahabad High Court's application for expunging the remarks, clarified that there were "excellent and good judges too" in the court.

Rejecting the arguments of senior counsel P P Rao that even a clarification that some are excellent and good judges would still cause suspicion on the integrity of the judges, the bench remarked, "It is not just time to react but also to introspect."

Reacting to the persistent plea of Rao that the clarification would not be sufficient, Justice Katju angrily retorted, "Do not tell all those things. I and my family have more than 100 years of association with the Allahabad High Court. People know who is corrupt and who is honest. So do not tell me all this."

Justice Katju further observed, "Tomorrow, if Markandey Katju starts taking bribe, then the entire country will know about it. So do not tell me as to who is honest and who is corrupt."

Rao submitted that the earlier observations had tarnished the image of the entire High Court judiciary and the rustic would not be able to distinguish between a honest and a corrupt judge.

"Do not tell me all those things about the rustic. They are much more enlightened. Do not think people of India are fools," the bench observed while dismissing the application.


अब आप बताइये क्यों हमारे माननीय सर्वोच्च न्यायालय को ऐसा कहना पड़ रहा है... यदि कुछ सड़ रहा है न्याय के मंदिरों में... तो क्या यह सड़ता-सड़ाता ही रहेगा... या सफाई होगी ?... क्या आप सफाई के हक में हैं ?... क्या आप सफाई के लायक हैं ?... यह कैसा सड़ा हुआ समाज बनते जा रहे हैं हम लोग ?...

पिछले आलेख में कुछ पाठकों ने पूछा है कि सफाई होगी कैसे, सर्जरी करेगा कौन... हमें अपने घर से शुरू करना होगा इसे... देखिये पहले अपने अंदर फिर अपने घर में फिर रिश्तेदारों में, दोस्तों में, गली में, कालोनी-मोहल्ले में, पूरे समाज में... न्यायमूर्ति ने सही कहा है कि हिन्दुस्तान का 'आम आदमी' बेवकूफ नहीं है उसे सब पता है कि कौन ईमानदार है और कौन बेईमान... 'आम आदमी' होने के नाते आपको भी पता ही होगा कि किसकी शानो-शौकत, ऐश्वर्य भ्रष्टाचार की काली कमाई से पाये गये हैं... बार-बार उन को जताओ कि कितना ही तुम पा जाओ, है तो यह चोरी के पैसे से पाया हुआ ही... अत: हमारी नजर में इसकी कोई कीमत नहीं... इस 'तुच्छता' को हर वक्त जताओ उनके सामने...आंखों में आंखें डाल कर... हो सकता है कि यह सब आपको अपने ही परिजन के साथ करना पड़े... या कुछ मामलों में खुद को ही अपनी नजर में गिरा हुआ देखना पड़े... पर यह सब करने से ही 'चोरी' आउट ऑफ फैशन होगी... और यह सड़ना रूकेगा... नहीं तो हम सारे के सारे एक दिन सड़ जायेंगे... अभी देर नहीं हुई, इस सड़न को रोका जा सकता है...


क्या आप में है यह इच्छा शक्ति ?








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@ सभी पाठकगण,

यदि इस नैतिक पतन को वाकई रोका नहीं जा सकता तो क्या यह सही नहीं रहेगा, कि...भ्रष्टाचार को क़ानूनी मान्यता दे देनी चाहिए... कम से कम अपराधबोध से तो बचे रहें सब के सब...

मित्र तारकेश्वर गिरी जी को आभार सहित...




शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

यह एक ' आमतौर पर ईमानदार समाज ' की कुछ ' काली भेड़ों ' का ' नैतिक पतन ' नहीं है... यह सबूत है एक पूरे निजाम, एक पूरी व्यवस्था के सड़ जाने का... बिना किसी अपवाद के... क्या सर्जरी के लिये तैयार हैं हमलोग ?

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मेरे ' सफेद भेड़ ' मित्रों,


यह एक ' आमतौर पर ईमानदार समाज ' की महज कुछ ' काली भेड़ों ' का ' नैतिक पतन ' नहीं है... यह सबूत है एक पूरे निजाम, एक पूरी व्यवस्था के सड़-गल जाने का...बिना किसी अपवाद के...


एक समाज के तौर पर हम अब पतन का शिकार नहीं हो रहे, बल्कि अब हम सारे के सारे ही सड़ने लगे हैं...



क्या सर्जरी के लिये इच्छुक और तैयार हैं हमलोग ?



सोचिये, फिर बताइये...







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वैसे विश्व आज भ्रष्टाचार-विरोध-दिवस भी मना रहा है!







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शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

फिकर नॉट ! अब आप रहोगे ' जवान ' हमेशा-हमेशा... पर, बच के रहना इस बंदूक से...

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मेरे ' चिर-यौवन-आकाँक्षी' मित्रों,

एक बड़ी अच्छी खबर है...

देखिये यहाँ पर...

संभावना व्यक्त की गई है कि अगले दस सालो में ऐसी दवा खोजी जा सकती है जो Aging यानी काल प्रभाव या कालिक क्षय को रोक ही नहीं बल्कि रिवर्स भी कर सके...

अब देखिये कितनी तेजी से आगे बढ़ रहा है विज्ञान... क्लोनिंग, स्टैम सैल रिसर्च से खुलती अपार संभावनायें, ऑर्गन हार्वेस्टिंग, टिशू कल्चर, प्रयोगशाला में अंगों का कल्चर, एंटी एजिंग रिसर्च, जीन मैपिंग, जेनेटिक इंजीनियरिंग एक तरफ दूसरी तरफ यह संभावना भी कि शीघ्र ही मानव मस्तिष्क की समस्त Information ( Experiences,Reflexes, learning & Behaviour patterns ) को नैनो चिप्स में स्टोर व ट्रांसफर किया जा सकेगा... यानी साफ-साफ संकेत हैं कि अमरत्व अब दूर नहीं...

आंखें बंद कर सोचिये कि किस तरह का होगा मानव समाज आज से १५०-२०० साल बाद का... और उस समय जीवन-मृत्यु, आत्मा-परमात्मा जैसी धारणाओं का क्या होगा ?

सोचा क्या ?

अब इसी समय एक खबर... यह भी है ..XM 25... नाम की राइफल या यों कहें कि Weapon System के बारे में...

किसी भी युद्ध में होता क्या है कि योद्धा किसी पेड़, दीवार, मिट्टी का टीला, चट्टान या सैंड-बैग के पीछे आड़ (Cover) लेता है और थोड़ी सी देर के लिये अपना सिर उठाता व विरोधी पर फायर करता है... यह राइफल सामान्य लड़ाई में आड़ (Cover) लेने को एकदम बेमानी कर देगी... यानी इसको चलाने वाला अपने विरोधी को हर आड़ के पीछे मार सकता है... यानी हो गई अब अफगानिस्तान में अमेरिका विरोधी तालिबानियों की छुट्टी...

परंतु इतना खुश न होईये...

सोचिये यह हथियार अगर आतंकवादियों के पास आ गया या पाकिस्तान जैसा कोई मुल्क जो आतंकवाद को समर्थन अपनी State Policy के तहत देता है... उसने २६/११ की तरह चालीस-पचास जेहादी इस हथियार के साथ भेज दिये किसी महानगर में... Spine Chilling होगा वह नजारा!

मैं तो आज दिन भर यही सोचूंगा कि मानव जाति पहले क्या पायेगी, कहाँ पहुंचेगी ?

अमरत्व तक,

या

महाविनाश के आगोश में!



आप भी सोचिये, न...






आभार!




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आजकल छोटी बिटिया के कारण समय नहीं मिलता बिल्कुल, जितना समय मैं घर पर होता हूँ उसकी चाह यही होती है कि मेरी गोद में ही रहे... बहुत मुश्किल से २५-३० मिनट निकाल पाया इस पोस्ट के लिये... हो सकता है कि बाद में इसमें कुछ और जोड़ूं...


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बुधवार, 1 दिसंबर 2010

पर क्या यह सचमुच ' लीक ' ही हुऐ हैं... ' लीक्स ' को देखिये मेरी नजर से.. मेरे साथ-साथ... और जानिये उनके पीछे का सत्य भी !!!


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मेरे 'रहस्यखोजी' मित्रों,

आज बहुत ही हल्ला है दो दो लीक्स का...

*** हिन्दुस्तान में लीक हुऐ हैं कॉरपोरेट पोलिटिकल लाबीइस्ट नीरा राडिया के फोन वार्तालाप...

देखिये...

यहाँ...

और

यहाँ पर भी...


*** और अंतर्राष्ट्रीय परिदॄश्य पर लीक हुऐ हैं...


Secret US Embassy Cables...


मित्रों,

अंतर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय, प्रदेशीय, नगरीय, ग्रामीण बल्कि परिवार स्तर तक की राजनीति/कूटनीति में सूचनायें गुप्त रखने के लिये नहीं होती... सूचनायें 'इस्तेमाल' की जाती हैं... अपने तात्कालिक हित साधन के लिये... कभी कभी कोई व्यक्ति, सरकार या देश ऐसी स्थिति में होता है कि उस को अपने सर्वाईवल के लिये अपने पास उपलब्ध कुछ सूचनाओं को नियंत्रित तरीके से दुनिया के सामने लाना होता है... अब यह सब आधिकारिक तौर पर तो किया नहीं जा सकता है... तो फिर तरीका होते हैं 'लीक्स'... सूचना या जानकारी यदि 'लीक' होकर दुनिया को मिलती है, तो उसका एक बहुत बड़ा फायदा यह भी है कि उसकी प्रामाणिकता/विश्वसनीयता पर कोई सवाल नहीं उठाता... उसे सच ही मान लिया जाता है...


अब इन्हीं मानकों पर हम दोनों लीक्स को देखेंगे...


१- कॉरपोरेट पोलिटिकल लाबीइस्ट नीरा राडिया के लीक हुऐ फोन वार्तालाप...

इनमें निकला क्या...

कि,टू जी घोटाले को लेकर जो इतना हंगामा मचाया जा रहा है...

* उसमें केवल तत्कालीन संचार मंत्री ही शामिल नहीं हैं...
* भारतीय राजनीति के सभी धुरंधर, मीडिया के बड़े-बड़े चेहरे, कॉरपोरेट जगत के सभी बड़े सितारे, टेलीकॉम की लगभग सभी कम्पनियाँ सभी या तो इनमें शामिल हैं या इनसे लाभान्वित...

मतलब यह कि...

* हमाम में सभी नंगे हैं...

असर यह हुआ कि...

सरकार पर होते विपक्ष व मीडिया के हमलों की धार कुंद हो गई... थोड़ी बहुत न्यायालय की सक्रियता बची है... अब कुछ समय बाद सारे हमले भी बंद हो जायेंगे!




२- विकिलीक्स के लीक किये Secret US Embassy Cables...


देखिये इनसे निकल क्या रहा है...


कि,

* वह देश भी जो ईरान के साथ या निरपेक्ष नजर आते हैं... चाहते हैं कि अमेरिका ईरानी परमाणु ठिकानों को नेस्तनाबूद करे...
* अकेले अपने बूते इजराइल यह काम करता है तो जरूरी नहीं कि प्रयास सफल रहे...
* अलकायदा पर अमेरिकी बमबारी में यमन सरकार की सहमति है...
* अफगानी राष्ट्रपति करजाई भरोसे लायक नहीं हैं और उनका सगा भाई ड्रग ट्रैफिकिंग में लिप्त है...

सबसे अहम खुलासे पाकिस्तान को व हमको लेकर हैं...

* पाकिस्तान बहुत तेजी से परमाणु हथियार बना रहा है, बना सकता है व उस के पास काफी परमाणु हथियार हैं... अस्थिर होने या आर्थिक बरबादी के बावजूद वह यह करता रहेगा...
* इन में से कुछ हथियार गलत नॉन स्टेट प्लेयर्स के हाथ भी जा सकते हैं...
* अमेरिका कुछ भी कर ले पाकिस्तान व पाकिस्तानी फौज भारत विरोधी आतंकवादियों को अपना समर्थन जारी रखेगी...
* सउदी अरब के शेख का मानना यह है कि आसिफ अली जरदारी जो पाकिस्तान सरकार का सिर हैं, वही सड़ा हुआ है... तो फिर शरीर तो खुद ही खराब हो जायेगा...
* आसिफ अली जरदारी खुद ही सुरक्षित व प्रभावी नहीं हैं...
* भारत यदि कभी पाक के साथ युद्ध करता है तो भारत के लिये मिश्रित परिणाम मिलेंगे...
* भविष्य में यदि भारत-पाक युद्ध होता है तो यह परमाणु युद्ध होगा...

इस तरीके से अमेरिका अप्रत्यक्ष रूप से दुनिया को व खास तौर पर हमको यह बता देना चाह रहा है कि...

* ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अमेरिकी नेतृत्व में नेस्तनाबूद करने की जरूरत है, ईजराइल अकेले यह दुस्साहस न करे...
* अफगानिस्तान में अमेरिका की नाकामी उसकी खुद की गलतियों के कारण नहीं अपितु अफगान सरकार के ही गलत हाथों में होने के कारण है...
* भारत के विरूद्ध पाक समर्थित इस्लामी आतंकी घटनायें और भी हो सकती हैं परंतु भारत युद्ध के बारे में कभी न सोचे...
* कश्मीर के मामले में अमेरिका हमारी कोई मदद नहीं कर सकता...
* पाकिस्तान के परमाणु हथियारों को गलत हाथों में जाने से रोकने के लिये अमेरिका का उसके साथ रहना जरूरी है... और दुनिया को भी इस महान काम में अमेरिका को मदद करनी चाहिये...



अब आप बताईये... इतना सेलेक्टिव और स्ट्रेटेजिक लीक्स... और उनसे निकलते यह साफ-साफ ईशारे...


मैं तो यह मानने को तैयार नहीं कि यह सूचनायें असलियत में लीक हुई हैं।

This is carefully planned & controlled release of INFORMATION, Sugar Coated & Gift Wrapped as ' LEAK '... My foot !



आप क्या सोचते हैं ?






आभार!




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