सोमवार, 15 नवंबर 2010

जीवन का उद्देश्य, Purpose of Life : Elementary, My Dear Watson ! ओह्ह सॉरी विवेक जी . . . . . .


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मेरे 'विवेकी' मित्रों,

कुछ कारणों से कुछ समय नेट से थोड़ा दूर सा रहा... इसी दौरान विवेक रस्तोगी जी की यह पोस्ट नहीं देख पाया... आज देखी... विवेक जी लिखते हैं:-


"आखिर इस जीवन का उद्देश्य क्या है, कुछ समझ में ही नहीं आ रहा है। यह प्रश्न मेरे अंतर्मन ने मुझसे पूछा तो मैं सोच में पड़ गया कि वाकई क्या है इस जीवन का उद्देश्य… ?

सबसे पहले मैं बता दूँ कि मैं मानसिक और शारीरिक तौर पर पूर्णतया स्वस्थ हूँ और मैं विषाद या उदासी की स्थिती में भी नहीं हूँ, बहुत खुश हूँ। पर रोजाना के कार्यकलापों और जीवन के प्रपंचों को देखकर यह प्रश्न अनायास ही मन में आया।

थोड़ा मंथन करने के बाद पाया कि मुझे इस प्रश्न का उत्तर नहीं पता है, कि जीवन का उद्देश्य क्या है, क्या हम निरुद्देश्य ही जीते हैं, हम खाली हाथ आये थे और खाली हाथ ही जाना है।

जैसे कि मैंने बचपन जिया फ़िर पढ़ाई की, मस्तियाँ की फ़िर नौकरी फ़िर शादी, बच्चे और अब धन कमाना, और बस धन कमाने के लिये अपनी ऐसी तैसी करना। थोड़े वर्ष मतलब बुढ़ापे तक यही प्रपंच करेंगे फ़िर वही जीवन चक्र जो कि मेरे माता-पिता का चल रहा है वह होगा और जिस जीवन चक्र में अभी मैं उलझा हुआ हूँ, उस जीवन चक्र में उस समय तक मेरा बेटा होगा।

यह सब तो करना ही है और इसके पीछे उद्देश्य क्या छिपा है, कि परिवार की देखभाल, उनका लालन पालन, बच्चों की पढ़ाई फ़िर अपनी बीमारी और फ़िर सेवानिवृत्ति और फ़िर अंत, जीवन का अंत। पर फ़िर भी इस जीवन में हमने क्या किया, यह जीवन तो हर कोई जीता है। समझ नहीं आया।

यह सब मैंने अपने गहन अंतर्मन की बातें लिख दी हैं, मैं दर्शनिया नहीं गया हूँ, केवल व्यवहारिक होकर चिन्तन में लगा हुआ हूँ, और ये चिन्तन जारी है, जब तक कि जीवन का उद्देश्य मिल नहीं जाता है।"



कई जवाब भी मिले हैं उनको, पर अधिकाँश में घुमा-घुमा कर गोल मोल बातें ही की गई हैं सिर्फ अजित गुप्ता जी ने ही भारतीय संस्कृति का हवाला देते हुए यह कहा है कि श्रेष्ठ संतान का जनन-पालन-पोषण ही जीवन का उद्देश्य है... हमारे ग्रंथ इसको 'पितृऋण से मुक्त होना' भी कहते हैं।

इस संबंध में मेरे विचार इस प्रकार हैं...

*** अपनी समस्त मानसिक-बौद्धिक योग्यताओं के बावजूद मानव है तो प्राणी जगत का एक जीव ही... तो मानव जीवन का उद्देश्य क्यों कर किसी भी अन्य प्राणी के जीवन के उद्देश्य से भिन्न होना चाहिये ?... जरा गौर करिये आपके इर्द-गिर्द जो प्राणी दिख रहे हैं उनके जीवन का उद्देश्य क्या है ?

जवाब साफ है:-

मानव जीवन के उद्देश्य निम्न हैं...

१-
प्रजनन
: यानी अपनी नस्ल को आगे बढ़ाना... इसके लिये सबसे जरूरी है उपलब्ध विकल्पों में श्रेष्ठतम, उपयुक्त जीवन साथी का चयन... समाज के नियमों के चलते विवाह बंधन में बंध जाने के बाद भी मानव जीवन पर्यंत और बेहतर जीवन साथी की तलाश व उसे प्रभावित करने के प्रयास में लगा रहता है... यह सारी पद, प्रतिष्ठा, पैसे के पीछे की भागदौड़ के पीछे सिर्फ एक ही भाव है... विपरीत लिंगी के लिये स्वयं को और अधिक आकर्षक व चुम्बकीय बनाना!... इसके अतिरिक्त अपनी संतति के लिये दुनिया को और सुरक्षित, आरामदेह और बेहतर बनाने की चाह हमारी सारी वैज्ञानिक-तकनीकी खोजों के पीछे का ड्राईविंग फोर्स है।

२-
कुदरत द्वारा दी गई पाँच इन्द्रियों की तृप्ति
: मानव की यह पाँच इन्द्रियाँ हैं नेत्र, घ्राण, स्वाद, स्पर्श व श्रवण इन्द्रियाँ... यदि आप आंखें बंद कर कुछ समय सोचें तो आप पायेंगे कि हमारे यह सभी होटल, रेस्टोरेंट, आटोमोबाइल, फूड, वस्त्र, कॉस्मेटिक, फैशन, ग्लैमर, संगीत, नृत्य, ट्रैवल, टूरिज्म, धर्म, योग, आध्यात्म आदि अदि तमाम तरह की इंडस्ट्रीज प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मानव की इन पाँच इन्द्रियों को तृप्त करने का ही तो कार्य कर रही हैं।

स्पष्ट है कि मानव भी अपने जीवन के उद्देश्यों के मामले में अन्य जंतुओं से कोई अलग नहीं है... परंतु हुआ क्या है कि पिछले ५-१० हजार में मानव मस्तिष्क के विकसित हो जाने के कारण उसकी ईगो भी बहुत बड़ी हो गई है...मानव जीवन तो तब भी था जब भाषा-लिपि का विकास नहीं हुआ था,और जीवन तब भी था तो उद्देश्य भी रहा ही होगा... परंतु आज वह यह मानने को तैयार नहीं कि मरने के बाद मेरा हश्र भी वही होगा जो मेरी कॉलोनी के कुत्ते या चिकन शाप के ब्रायलर का होगा... अब इसी ईगो को चंपी करने के लिये पैदा की गई हैं धर्म-अध्यात्म जैसी दुरूह अवधारणायें, कुछ चालाक दिमागों के द्वारा... यह बताती हैं कि मानव अन्य जीवों से इतर है... उसका जीवन उद्देश्य है, अपने बनाने वाले को पहचानना... जीवन भर उसका गुणगान, उसकी कृपा का बखान... मृत्यु के बाद उसके फैसले के अनुसार दूसरे लोक के जीवन की सजा या इनाम... और यदि मस्का ज्यादा लगाया हो तो, जीवन के बाद उसी में मिलन...



Excuse me, but isn't it a big joke with capital J ?

Ha Ha Ha...



.... :-))


आभार!





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41 टिप्‍पणियां:

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    हुम्म,

    चार टिप्पणियाँ मिली और चारों एक लाइना... :(

    'कोई' खफा तो नहीं हो गया कहीं ?


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    मजाक कर रहा था मैं...

    प्रिय गिरी जी
    आदरणीय अरविन्द मिश्र जी
    आदरणीय सुरेश चिपलूनकर जी
    आदरणीया अजित गुप्ता जी

    आप सभी का धन्यवाद,
    मुझसे सहमत होने के लिेये!


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  3. 7/10

    अति-उत्तम विचार मंथन
    जीवन का उद्देश्य क्या है, क्या हम निरुद्देश्य ही जीते हैं, हम खाली हाथ आये थे और खाली हाथ ही जाना है।
    ऐसी बातों से ही मन में वैराग्य और अध्यात्म पनपता है. ऐसे ही प्रश्नों से जूझता मानव जंगल, पहाड़ और गुफाओं की तरफ पलायन करता रहा है.
    युगों-युगों से चले आ रहे इस सात्विक प्रश्न पर आपका सुन्दर चिंतन.

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    @ अन्य पाठक गण,

    अब रोजी रोटी के जुगाड़ को शुरू करने निकल रहा हूँ... अत: बाकी बातें आज रात होंगी।


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    @ उस्ताद जी,

    आभार आपका,

    आज तो फर्स्ट डिवीजन में पास कर दिये आप...
    पूरा भरोसा है कि परफेक्ट टेन भी लेकर रहूँगा आपसे एक दिन... :)


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  6. प्रवीण जी, जब सारगर्भित बात होती है और स्‍थापित सत्‍य होता है तब उसमें अपने विचार और क्‍या देना, बस यही लिखना होता है कि आप सही हैं, या अच्‍छा है।

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  7. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  8. मेरे प्रिय मित्र प्रवीण,

    मानव में पशुत्व और देवत्व दोनों हैं, संभवतया देवत्व निष्क्रिय अवस्था में होता है .. पर जितनी मात्र में देवत्व जागता ही उतनी मात्र में पशुत्व मिटता है |

    अब ये भारत का जीवन दर्शन ही है जो मनुष्य का जीवन कुछ उदेश्यपूर्ण मानता हो

    ..... शायद इसीलिए आप इस बात से इनकार नहीं कर पाएंगे की भारत ने ही इस विश्व में मानवता के विकास की नीव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और निभा रहा है

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  9. दरसल ये उदेश्य विहीन जीवन दृष्टिकोण अब भारत के युवाओं में ज्यादा दिख रहा है |

    अपने आप को पशुओं से मिलाने की कोई आवशयकता नहीं है क्योंकि कहीं कहीं मुझे तो पशु .... आज कल के मनुष्य से बेहतर ही लगते हैं

    01 हर जरूरी कार्य मौसम के अनुरूप करते हैं

    02 उनमें ममता इंसान से ज्यादा होती है

    03 वो इंसान से वफादार भी होते हैं

    लगता है पशुत्व के कोम्पीटीशन में मानव पशु को भी पीछे छोड़ देगा

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    @ मित्र गौरव,

    आप आये, बहार आई!

    दोस्त, यहाँ पर हमारे सामने दो सवाल यह हैं कि:-

    * क्या मानव भी एक विकसित मस्तिष्क वाला जैविक विकास के शिखर पर खड़ा पशु नहीं है ?

    * जिस प्रकार अन्य पशुओं का व्यवहार व जीवन उनकी जैविक आवश्यकताओं व दायित्वों से निर्धारित होता है ठीक उसी प्रकार मानव का व्यवहार भी उसकी Basic Animal Instincts से ही निर्धारित होता है, क्या मानव को अन्य पशुओं से इतर अपना कोई विशेष जीवन उद्देश्य मानना चाहिये? क्या मानव की मरने के बाद नियति अन्य प्राणियों से अलग होती है या होनी चाहिये ?

    मैं यहाँ पर कह रहा हूँ कि मानव जीवन में कुछ विशेष अलग से नहीं है । यदि आप मानते हो कि मानव जीवन का कोई विशेष उद्देश्य है तो बताओ!

    मेरी समझ के अनुसार 'देव' या 'सुर' भी एक मानव जाति ही थी जिसने 'असुर' जाति को युद्ध में हराया था, ऐसा मिथक कहते हैं... यह ठीक है कि जीतने वाले का सब कुछ सही हो जाता है परंतु 'देव' जाति का सब कुछ अनुकरणीय नहीं है।


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  11. अब तो और ज्यादा confusion हो गया है :(

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  12. प्रवीण जी

    इन सब चीजो में मेरी समझ काफी छोटी है फिर भी जो है उस हिसाब से जवाब दे रही हु (आप- की पोस्ट दूसरी बार पढ़ने के बाद और आप को एक लाइन का जवाब भी नहीं चाहिए था ) जहा तक मानव की नियति की बात है तो उस पर आप से सहमत हु कि सभी प्राणी की नियति तो एक ही है कुछ बदलने वाला नहीं है | रही बात मानव और अन्य प्राणी ( पशु) के बीच का अंतर की तो उसका जवाब आप ने ही दे दिया है प्रजनन के मसले पर हमारा व्यवहार आतंरिक रूप से एक जैसा है ठीक है किन्तु हमारी पांचो इन्द्रियों को तृप्त करने की भावना ही हमें इन प्राणियों से अलग कर देती है | ये काम केवल मानव ही करता है पशु नहीं | एक भिन्नता तो यही है और यही मानव ( ज्यादातर ) के जीवन का उद्देश्य भी है जो पशुओ ( एक दो पशुए अपवाद यहाँ भी है ) का नहीं होता है वो केवल पेट भरने का काम करते है और उतना ही पेट भरते है जितना की जीने के लिए जरुरी है | जारी ------

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  13. दूसरी बात है कि जीवन का उद्देश्य क्या होना चाहिए | तो कई लोग अपना जीवन इससे इतर भी जीना चाहते है वो खुद अन्य प्राणियों से अलग जो बौद्धिक और विचार करने कि शक्ति उन्हें मीली है उसका और ज्यादा उपयोग करना चाहते है इसलिए वो इन सब से अलग अपना जीवन उद्देश्य बना लेते है | कोई बड़े उद्देश्य बना लेता है मदर टेरेसा ने मानव सेवा को अपना उद्देश्य बनाया तो गाँधी ,भगत सिंह जैसे देश भक्तो ने देश की आजादी को अपना जीवन उद्देश्य बना लिया | तो कोई छोटा सा उद्देश्य अपने जीवन के लिए बना लेता है | हा ऐसे लोग सम्पूर्ण मानव जाती में भले बहुत कम होते है पर होते है | और रही बात अध्यात्म तथा धर्म में कही बात का तो मुझे लगता है की उसका उद्देश्य यही रहा होगा की मानव बुरइयो की और ना जा कर अच्छे कम करे भले स्वर्ग के लालच में ही | पर मुझे लगता नहीं की उनका ये उद्देश्य कभी भी पूरा हुआ होगा |

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  14. @ .... परंतु 'देव' जाति का सब कुछ अनुकरणीय नहीं है।

    मित्र प्रवीण,
    मेरी सोच अलग है .. आपने सीख तो सही ली है पर ये भी सोचिये

    असुर और देवों की लडाइयां होने की कहानिया [या जो भी है] दरअसल प्रतिभावान अनुसन्धान करने वाले [दिव्यास्त्र आदि के रूप में ] मानव [या कहें आज के देशों के बात है] जो आपसी एकता को बार बार भूलने के कारण आसुरी प्रवृति वाले लोगों से सावधान रहने का इशारा हो सकती हैं

    (भाग एक ..जारी )

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  15. @मैं यहाँ पर कह रहा हूँ कि मानव जीवन में कुछ विशेष अलग से नहीं है

    और मैं कह रहा हूँ हर एंगल से अलग है कोई मेच नहीं है

    मैं नहीं मानता की आपने मानव और पशु की शारीरिक बनावट पर गौर नहीं किया मानव वर्टिकल शेप में होता है अर्थात मस्तिष्क का स्थान सबसे ऊँचा उसके बाद पेट और फिर प्रजनन और पशु होरिजोंटल शेप में होता है अर्थात मस्तिष्क,पेट और प्रजनन एक ही स्तर पर, प्राथमिकता का पता नहीं चल पता होगा है ना ??

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  16. अंशुमाला जी की सहज प्रतिक्रिया बहुत ही अच्छी लगी ! मैं मानता हूँ कि किसी पोस्ट पर आई हुयी प्रतिक्रिया भी उस पोस्ट का ही हिस्सा होती है जो पोस्ट को सम्पूर्णता देती है ! इस लिहाज से मैं मूल्यांकन में 1 अंक और बढ़ाना चाहूँगा.

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  17. @ यदि आप मानते हो कि मानव जीवन का कोई विशेष उद्देश्य है तो बताओ

    उदेश्य शब्द से एक मंजिल होने का सा एहसास होता है, मानव जीवन एक साधना है .. सफ़र है मंजिल नहीं ... फिर भी अगर उदेश्य की बात ही है तो उदेश्य होना चाहिए ... जो नश्वर नहीं है शरीर की तरह , जो दुखी नहीं होता मन की तरह , जो भ्रमित नहीं होता बुद्दी की तरह उस स्थान पर स्थिर होना और रहना या कहें जल में कमल की तरह रहना
    इसमें सुख प्राप्त होता है .. ये सच बात है

    अब आप ये बताइये की आपका [कथित] साइन्स इस बारे में क्या कहते है ?? :)

    उत्तर देंहटाएं
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    @ अंशुमाला जी,

    मुझे लगता है कि मानव जीवन का उद्देश्य को आप भिन्न रूप में ले रही हैं... जो उदाहरण आप ने दिये हैं मदर टेरेसा या क्रान्तिकारियों के, वह Individual Life Targets हैं... जबकि यहाँ Purpose of Human Life क्या है, यह चर्चा हम कर रहे हैं।


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    मित्र गौरव,

    यद्मपि विषय से हटकर है फिर भी 'दिव्यास्त्र' की चर्चा अच्छी चलाई... पर क्या यह संभव है कि कोई संस्कृत या अन्य किसी प्राचीन भाषा में लिखे कुछ छंद उच्चारित करते हुऐ हवनकुंड में घी, अन्न व हवन सामग्री डाले और हवन कुंड से संपूर्ण विश्व को खत्म करने की क्षमता रखने वाला 'दिव्यास्त्र' निकल आये ?

    "उदेश्य होना चाहिए ... जो नश्वर नहीं है शरीर की तरह , जो दुखी नहीं होता मन की तरह , जो भ्रमित नहीं होता बुद्दी की तरह उस स्थान पर स्थिर होना और रहना या कहें जल में कमल की तरह रहना
    इसमें सुख प्राप्त होता है .. ये सच बात है"


    पढ़ने में तो बहुत अच्छी बातें लग रही हैं यह... पर मेरी समझ से बाहर... सामान्य हिन्दी में समझाओ कि उद्देश्य क्या है... यदि सुख प्राप्त करना तो इन्द्रियों की तृप्ति से यही तो मिलता है।


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  20. @ प्रवीण जी
    Individual Life Targets और Purpose of Human Life को आप समझाने का प्रयास करेंगे ? क्या ये दोनों बातें एक जगह आकर नहीं मिलती हैं ?

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  21. प्रवीण जी

    @तो कई लोग अपना जीवन इससे इतर भी जीना चाहते है वो खुद अन्य प्राणियों से अलग जो बौद्धिक और विचार करने कि शक्ति उन्हें मीली है उसका और ज्यादा उपयोग करना चाहते है इसलिए वो इन सब से अलग अपना जीवन उद्देश्य बना लेते है |

    मै यहाँ यही बताने का प्रयास कर रही हु कि सभी मानव को अपने जीवन में कुछ ऐसा जरुर करना चाहिए या उद्देश्य बनना चाहिए जिससे वो पशु से अलग हो क्योकि ये भी एक सत्य है कि हमारे पास बौद्धिक और विचार करने कि शक्ति है किन्तु सभी ऐसा नहीं कर पाते है और मानव हो कर भी पशु के समान जीवन जीते है | कुछ तो अपनी इन्द्रियों कि तृप्ति के लिए भी कार्य नहीं करते है | लेकिन कुछ लोग खुद से ही अपने जीवन का एक उद्देश्य बना कर खुद को पशु के जीवन से अलग करने का प्रयास करते है |

    हा एक लाइन में कहु तो हा मानव जीवन का उद्देश्य है और सृजन करना |

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    @ उस्ताद जी,

    विवेक जी के मन में सवाल उठा था... कि जन्म-बचपन-पढ़ाई-मस्ती-नौकरी-शादी-बच्चे- धनोपार्जन-बुढ़ापा-मृत्यु-अंत यह चक्र है हमारे जीवन का एक साथ हमारी कई पीढ़ियाँ इस चक्र के विभिन्न चरणों को जी रही होती हैं... क्या यही सब कुछ है या इससे हटकर भी जीवन का कोई उद्देश्य है।

    रही बात व्यक्तिगत जीवन लक्ष्यों की...तो वह तो हर किसी के होते हैं किसी का सेवा, किसी का धनपति बनना, किसी का आईएएस बनना, किसी का सामाजिक मुद्दे उठाना... तो इस प्रकार यह दोनों अलग-अलग चीजे हैं।


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  23. धर्म और आध्यात्म जैसी अवधारणाओं का जन्म इसलिए हुआ होगा कि मनुष्य में सांसारिक मोह माया के प्रति विरक्ति पैदा कर (मतलब उसे इस अवस्था मेँ ले जाना जहां इंद्रियों की संतुष्टी ही उसका उद्देश्य न रहे)उसके जीवन का उद्देशय सेवा व परमार्थ को बनाना जाए ।परँतु धर्म खुद गलत हाथों मे जाने के कारण उसका आध्यात्मिक पक्ष कमजोर हो गया ।उसकी विकृत व्याख्या के चलते धर्म से भी बडा ईश्वर को बना दिया गया ।

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  24. प्रिय मित्र प्रवीण

    @यद्मपि विषय से हटकर है फिर भी 'दिव्यास्त्र' की चर्चा अच्छी चलाई
    'दिव्यास्त्र' की चर्चा विषय से हट कर नहीं है , दरअसल विषय बहुत बड़ा है, हाँ आपका इससे जुडा आपका प्रशन मेरे सन्दर्भ से हट कर है

    @पर क्या यह संभव है कि कोई संस्कृत या अन्य किसी प्राचीन भाषा में लिखे कुछ छंद उच्चारित करते हुऐ हवनकुंड में घी, अन्न व हवन सामग्री डाले और हवन कुंड से संपूर्ण विश्व को खत्म करने की क्षमता रखने वाला 'दिव्यास्त्र' निकल आये ?

    हाँ ...मुझे पता था .. आप यही कहेंगे और मैंने इसका उत्तर पहले ही दिया है .. [मैं यहाँ मन्त्रों की शक्ति जिनसे बड़े बड़े रोग ठीक होते हैं जो मेडिकल साइंस भी दूर करने में परेशां हो रहा हो ... इस महा सामान्य तर्क का भी सहारा नहीं ले रहा ] खैर मैंने जो पहले कहा था और अब फिर से कह देता हूँ जब आप इसे गप्प मानते ही हैं तो भी ये सीख देने वाली कहानिया है

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  25. @ पढ़ने में तो बहुत अच्छी बातें लग रही हैं यह... पर मेरी समझ से बाहर.

    इस मामले में आप पूर्वाग्रह रख रहे है और जब आप इसे समझेंगे भी तो आप भी समझा तो नहीं पाएंगे , क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्दू को जब मैंने एक शो में मन्त्रों की महिमा का जीवन में महत्त्व बोलते हुए सुना तो मुझे सुकून मिला की हाँ कोई तो है जो इस डर से की मैं रूढ़िवादी ना समझ लिया जाऊं ... इस विषय [मन्त्र की महिमा ] के महत्त्व पर चुप नहीं बैठा .. लगभग हर सफल सेलिब्रेटी किसी ना किसी रूप में अध्यात्म से जुड़े हुए हैं .. शायद वे इसे शो नहीं करते हो [बाकी साइंस तो चल ही रहा है कछुए की चाल से एक दिन वो खुद ही बता देगा :)) ]

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  26. @यदि सुख प्राप्त करना तो इन्द्रियों की तृप्ति से यही तो मिलता है।

    अब सोचिये क्या आप यही बातें अगली पीढी के मुह से सुनना पसंद करेंगे ?? [आप तो सिर्फ कह रहे हैं अगली पीढी पालन भी कर सकती है ], इन्द्रिय सुख लेने में यही परेशानी है की फिर वो तो सब ही ले सकते हैं ना | किसी कथित बिगड़ी संतान के माता पिता से पूछिए की वो दुखी क्यों होते हैं जब बेटा उचित और सुख में फर्क करना भूल जाये ??

    और इस तरह तो हर परिभाषा धुंधली हो जाएगी अगली पीढी के प्रश्न ये होंगे

    ये चरित्रवान होना क्या होता है ??
    क्या चरित्रवान होने के फायदों को मेडिकल साइंस ने माना है ??

    शायद ये भी एक फर्क हो हम में और पशुओं में ...हमें चित्त वृतियों पर नियंत्रण, विचार शून्यता से भी सुख मिलता है
    मानव की डिमांड हमेशा सुख की ही रहती है क्योंकि वो सुख स्वरूप है लेकिन इस बात से ये कैसे सिद्द होगा की सुख वही है जो पशु भोगते हैं ??
    अब बात आती है सच्चा सुखा क्या है ??
    मुझे लगता है "सच्चा सुख" "सत्य" से पूरी तरह जुडा है उसे परिभाषित करना नामुमकिन है पर महसूस करने के लिए किसी बाहरी साधन की आवश्यकता नहीं होती , यही उसकी खासियत है ...
    कुछ आसान उपाय हैं मौन रहना , योग करना , मंत्रोचारण करना , प्राणायाम आदि आदि

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  27. यदि उद्देश्य इतना सीधा समझा होता तो इतना भटकाव न होता जीवन का।

    उत्तर देंहटाएं
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    मित्र गौरव,

    'चित्त वृतियों पर नियंत्रण' , 'विचार शून्यता' यह सब ऐसी बातें हैं जिनकी चर्चा करने वाले तो बहुत मिलेंगे, पर क्या कोई इन को पा पाया है आज तक...

    मौन, मंत्रोच्चारण, योग व प्राणायाम... यकीन जानो मित्र इस सबको आजमा चुका हूँ मैं... परंतु जैसा बताते हैं उस तरह का विशिष्ट कुछ नहीं होता आपको इनसे... होता यह है कि दिमाग की कंडिशनिंग होती है कि यदि फलाने 'शान्ति मंत्र' का मैं १००१ बार सस्वर उच्चारण करूँ तो मुझे शान्ति मिलेगी... शान्ति मिलती भी है क्योंकि उस promise पर आप का यकीन है... परंतु एक स्थिति ऐसी भी आ जाती है कि आप समझ जाते हैं इस खेल को... अब आगे दो रास्ते हैं... या तो खुद ही गुरू बन जाओ और गुमराह करो चेले बनाकर बाकियों को...शब्द जाल बुनो और उस चीज के गुण गाओ जिससे आप खुद ही ज्यादा कुछ नहीं पा पाये... या फिर पोल खोलो... मुझे दूसरा रास्ता सही लगता है... :)

    एक बात आपको विचार करने के लिये दे रहा हूँ... 'विचार शून्यता'... जिस किसी को देखो बड़े गुण गाता है इसके... पर क्या यह संभव है ?

    यदि गौर से सोचो तो ' मैं इस समय एक ऐसी स्थिति में बैठा हूँ जिसमें मेरे दिमाग में कोई विचार नहीं चल रहा'... यह विश्वास भी तो अन्य विचारों की तरह मात्र एक विचार ही है... जो विचार शून्यता की तथाकथित स्थिति में आप मान बैठे हैं... फिर कैसी विचार शून्यता ?


    ...

    उत्तर देंहटाएं
  29. प्रिय मित्र प्रवीण,

    @जिनकी चर्चा करने वाले तो बहुत मिलेंगे, पर क्या कोई इन को पा पाया है आज तक...

    पाना उस चीज को होता है जो आपके पास ना हो मानव अपने आप में ब्रम्हांड है , मंदिर है .... उसके पास ये सब होता है

    @जिस किसी को देखो बड़े गुण गाता है इसके... पर क्या यह संभव है ?

    हाँ संभव है पर इसे डिफाइन कर पाना असंभव है [मैंने ये पहले भी कहा है की सच और सच्चे सुख को डिफाइन कर पाना नामुमकिन है]

    उत्तर देंहटाएं
  30. @' मैं इस समय एक ऐसी स्थिति में बैठा हूँ जिसमें मेरे दिमाग में कोई विचार नहीं चल रहा'... यह विश्वास भी तो अन्य विचारों की तरह मात्र एक विचार ही है...

    मेरा मानना है .... जब किसी प्रशिक्षित गुरु से कथित मेडिटेशन की क्लास ली जाती है तो विचार शून्यता का एहसास होता है आप चाह कर भी कुछ नहीं सोचते "आप नहीं सोचने को ही करते हैं " आपके चेहरे प्रसन्नता और आँखों में शान्ति की झलक होती है | अब केवल ये ही काफी नहीं आपका दिन कैसे बीतता है, आप क्या पढ़ते हो , आप क्या खाते हो, कुछ अन्य बातें भी मिश्रित होती है तब ये चीज समझ में आती है

    फालतू घाँस[बुरे विचार ] कही भी उग जाती है गुलाब [सात्विकता ] को उगाने के लिए मेहनत करनी पड़ती है

    @अब आगे दो रास्ते हैं... या तो खुद ही गुरू बन जाओ और गुमराह करो चेले बनाकर बाकियों को...शब्द जाल बुनो और उस चीज के गुण गाओ जिससे आप खुद ही ज्यादा कुछ नहीं पा पाये... या फिर पोल खोलो... मुझे दूसरा रास्ता सही लगता है... :)

    ये रस्ते साइंस के भक्तों पर भी अप्लाई होते हैं या तो फ़ोकट खोजों में खुद का भी समय खराब करो लोगों को भ्रमित करो या प्रचारक बन आधुनिक होने का सुख पा लो | आप तो एक ही पक्ष देख रहे हैं |

    आपके वाक्य में सुधार कर रहा हूँ

    अब आगे दो रास्ते हैं... या तो खुद ही "कथित वैज्ञानिक" बन जाओ और गुमराह करो "रिसर्चर" बनाकर बाकियों को...फोर्मुले और होरमोंस के कठिन नामों से जाल बुनो और उस चीज के गुण गाओ जिससे आप खुद ही ज्यादा कुछ नहीं पा पाये... या फिर पोल खोलो [ढोंगी बाबाओं की ]... :) और हाँ ... मैं सभी रास्ते और उनसे गुजरे मुसाफिर देखता रहता हूँ

    उत्तर देंहटाएं
  31. @शान्ति मिलेगी... शान्ति मिलती भी है क्योंकि उस promise पर आप का यकीन है..

    हा हा हा ... आप इस बारे में कथित साइंस के कुछ इमानदार लोगों द्वारा की गयी खोजे या स्टेटमेंट नहीं पढ़ते क्या ??

    ओम के उच्चारण से नाभि से लेकर मस्तिष्क तक धमनियां सामान्य होने लगती हैं। रक्त प्रवाह सामान्य हो जाता है। ओम का असर नकारा नहीं जा सकता।

    (डा. मंजरी त्रिपाठी, एम्स-न्यूरोलोजी विभाग-अध्यक्ष)

    ओम से ओटोनोमिक नर्वस सिस्टम पर असर पड़ता है, गति कम हो जाती है, जिससे लोग शान्ति महसूस करने लगते है। एंग्जाइटी, डिप्रेशन व रक्तचाप ठीक हो जाते है।

    (डा. अनूप मिश्रा, एम्स- के मेडिसिन विभाग के पूर्व विभागाध्यक्षद)

    'साइंस` पत्रिका में प्रकाशित एक शोध पत्र में डा. मोर्गन कहते हैं कि ओम के उच्चारण से पेट, सीने और मस्तिष्क में पैदा हुये कम्पन से शरीर की मृत कोशिकाओं को नया जीवन मिलता है और नई कोशिकाओं का निर्माण होता है। उल्लेखनीय है कि इस जाप से सारे शरीर में संतुलित तरंगो का प्रवाह होने से यह कमाल होता है।


    http://www.jainteerth.com/Article_Tension.htm

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  32. ओम का उच्चारण अलग-अलग आवृतियों में करने से अनेक असाध्य रोग ठीक हो जाते हैं। साइन्स पत्रिका में प्रकाशित शोध के अनुसार ओम के लगातार जाप से चमत्कारिक प्रभाव होता है यह बन्ध्यत्व में भी लाभ पहुंचाता है तथा सेरीब्रल पाल्सी जैसे असाध्य रोग में भी इसके सकारात्मक प्रभाव देखने मे आये हैं।

    विविध मनोदैहिक व्याधियों के उपचार में औंकार मन्त्र की सफलता असंदिग्ध है। असाध्य मानसिक रोगों में भी इस मन्त्र से चमत्कार पूर्ण लाभ प्राप्त किये जा सकते हैं। तनाव अवसाद जैसे मनोरोगों से पीड़ित इन्सान के लिये यह मंत्र किसी अमोध औषधि से कम नहीं है। यह न केवल मानसिक शक्ति व शान्ति प्रदान करता है बल्कि इससे स्नायुओं की चंचलता दूर होकर विविध हृदय रोगों, उच्च व निम्न रक्त चाप, मधुमेह जैसे कष्ट साध्य रोगों का उपचार किया जाना संभव हुआ है। औंकार मन्त्र के नियमित जाप से हृदय की शुद्धि होती है मानसिक शक्ति प्रखर होती है।


    http://www.jainteerth.com/Article_Tension.htm

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  33. पांच मिनट तक ओम का जाप करने से केवल दो दिन में छात्रों के व्यवहार में परिवर्तन आ जाता है। पढ़ाई में एकाग्रता और विषय को समझने की क्षमता बढ़ जाती है । योग-विज्ञान के अनुसार प्रतिदिन ३० मिनिट तक शांति से बैठकर लगातार ओम बोलने से ३ माह में स्मरण शक्ति इतनी तीव्र हो जाती है कि एक बार पढ़ने या सुनने से याद हो जाता है।

    डा. राजेश कपूर (पंतजली योगपीठ से)


    http://www.jainteerth.com/Article_Tension.htm

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  34. सार्थक प्रतिक्रियाओं और आपके जवाब ने पोस्ट का महत्त्व काफी बढ़ा दिया है .. पोस्ट संग्रहणीय बन गयी है. इस तरह की स्वस्थ परिचर्चा ब्लॉग जगत में आवश्यक है और सुखद भी.

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  35. YAHI TO EK PATHAK KO CHAHIYE......
    ACHHE VISHYA.....SUNDAR PARICHARCHA..

    PRANAM.

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