शनिवार, 20 नवंबर 2010

पशुबलि-कुरबानी , शाकाहार-मांसाहार , वैचारिक बहस- फ्री फॉर ऑल धर्मयुद्ध... बीचों-बीच फंसे हम और जेहन से उठते ११ सवाल... क्या उत्तर देंगे आप ?

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मेरे ' उत्तरदाता ' मित्रों,


आज और कुछ नहीं...


बस यह ग्यारह सवाल...


*** क्या यह सही नहीं है कि जीव-दया व मांसाहार निषेध के संबंधित आलेखों की बाढ़ ब्लॉगवुड में बकरीद के आस-पास ही आती है, जबकि थैंक्सगिविंग डे के दिन भी लाखों टर्की पक्षी बाकायदा भूनकर GOD को धन्यवाद देते हुऐ खा लिये जाते हैं बाकायदा customary 'Turkey Song' गाते हुए, और कहीं कोई पत्ता भी नहीं हिलता ?

*** क्या यह सही नहीं है कि बकरीद के दिन दी जाने वाली बकरे की कुर्बानी और रोजाना हलाल मीट की दुकान पर बिकते बकरे को मारने का तरीका बिलकुल एक जैसा ही है ?

*** क्या यह सही नहीं कि इस तरह के आलेख लिखने वाले महानुभावों का अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में न तो कोई मुस्लिम मित्र होता है न ही मुस्लिम समाज से उनका कोई संबंध होता है, यदि होता तो उन्हे यह ज्ञान हो जाता कि दया, ममता, करूणा आदि सभी मानवीय भावनायें एक मुसलमान के अंदर भी उतनी ही हैं जितनी उनके भीतर, आखिर हैं तो सभी इंसान ही ?

*** क्या यह सही नहीं कि ' फ्राइड चिकन चंक्स ' को बड़े शौक से खाने वाले कुछ लोग चिकन को काटना तो दूर कटते देख भी नहीं सकते क्योंकि उन्हें अपनी पैंट गीली करने का डर रहता है ?

*** क्या यह सही नहीं है कि आज भी किसी पार्टी या दावत में यदि कोई नॉनवेज पकवान बना होता है तो सर्वाधिक भीड़ उसी काउंटर पर होती है ?

*** क्या यह सही नहीं है कि प्रागैतिहासिक काल, पुरा पाषाण काल से लेकर आधुनिक काल तक मानव जाति अपना वजूद समूह में शिकार कर प्राप्त किया भोजन ग्रहण कर ही बचा पाई है, और इसी सामूहिक शिकार की आवश्यकताओं के कारण भाषा व कालांतर में मानव मस्तिष्क का भी विकास हुआ ?

*** क्या यह सही नहीं कि आततायी और आक्रमणकारी के द्वारा किये जा रहे रक्तपात को रोकने के लिये भी जवाबी रक्तपात की आवश्यकता होती है ?

*** क्या यह सही नहीं है कि कुछ मध्यकालीन अहिंसावादी, जीवदयावादी धर्मों-मतों के प्रभाव में आकर भारतीय जनमानस इतना कमजोर हो गया था कि हम कुछ मुठ्ठी भर आक्रमणकारियों का मुकाबला न कर पाये और गुलाम बन गये ?

*** क्या यह सही नहीं है कि आज के विश्व में लगभग सभी विकसित या तेजी से विकसित होने की राह पर बढ़ते देशों व उनके निवासियों में मांसाहार को लेकर कोई दुविधा या अपराधबोध नहीं है ?

*** क्या यह सही नहीं है कि आहार विज्ञानी एक मत से यह मानते हैं कि आदर्श संतुलित आहार में शाकाहार व मांसाहार दोनों का समावेश होना चाहिये ?

*** और क्या यह भी सही नहीं है हम चाहे शाकाहारी हों या मांसाहारी, By birth हों या By choice , दोनों ही स्थितियों में हमें कोई ऐसा ऊंचा नैतिक धरातल नहीं मिल जाता कि हम दूसरे को उसके आहार चयन के कारण उसे सीख दें या उसे अनाप-शनाप, आसुरी स्वभाव वाला या पशुवत कहें ?




क्या आप उत्तर देना चाहेंगे इन सवालों का ?





आभार!







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मूल रूप में यह आलेख एक टिप्पणी थी जो मुझ द्वारा एक ब्लॉग पोस्ट पर की गई थी , किसी वजह से यह छप नहीं पाई अत: इसे पोस्ट बना दिया गया है।






33 टिप्‍पणियां:

  1. एक बेहतरीन पोस्ट. हमारा देश भारतवर्ष अनेकता में एकता, सर्वधर्म समभाव तथा सांप्रदायिक एकता व सद्भाव के लिए अपनी पहचान रखने वाले दुनिया के कुछ प्रमुख देशों में अपना सर्वोच्च स्थान रखता है, परंतु दुर्भाग्यवश इसी देश में वैमनस्य फैलाने वाली तथा विभाजक प्रवृति की तमाम शक्तियां ऐसी भी सक्रिय हैं जिन्हें हमारे देश का यह धर्मनिरपेक्ष एवं उदारवादी स्वरूप नहीं भाता. .अवश्य पढ़ें धर्म के नाम पे झगडे क्यों हुआ करते हैं ? हिंदी ब्लॉगजगत मैं मेरी पहली ईद ,इंसानियत शहीद समाज को आज़ाद इंसान बनाया करते हैं
    ब्लोगेर की आवाज़ बड़ी दूर तक जाती है, इसका सही इस्तेमाल करें और समाज को कुछ ऐसा दे जाएं, जिस से इंसानियत आप पे गर्व करे.

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  2. शाह जी अब मैं तो थक गया इन बातों से कुछ नया चाहता हूँ. ऊपर लिखे सभी प्रश्नों का अपने पास सिर्फ एक उत्तर है की मैं omnivorous हूँ वो भी जन्म से .

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  3. हम तो साल भर खाते हैं,
    और कभी नहीं
    customary 'Turkey Song' गाते हैं।
    मच्छर जब भी मेरे आगे भुनभुनाते हैं
    मेरे हाथों ही मारे जाते हैं
    ये अलग बात है कि उस समय मेरे सर पर
    चढा जुनून होता है
    और जब उतरता है तो पाता हूं कि
    मेरे हाथों में मेरा ही ही खून होता है!

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  4. हिंसा का प्रभाव अहिंसा नहीं हो सकता है, चाहे जीभ के लिये हो या अहं के लिये।

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  5. जीभ के आगे सब नतमस्तक हैं, सारे सवाल बेमानी हैं।

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    @ प्रवीण पान्डेय जी,

    जीवों के प्रति हिंसा की अपेक्षा साथ रहते मानव समूह के प्रति वैचारिक हिंसा ज्यादा खतरनाक व निंदनीय है !


    ...

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    @ विवेक रस्तोगी जी,

    जय हो 'जीभ' देवी की !

    आखिर हर कोई जितेन्द्रिय तो नहीं हो सकता न... ;)

    पर यह भी सोचना होगा कि हमारी जीभ ऐसा क्यों करती है... कहीं इसके कारण मानव जाति के विकास व मानव शरीर की जैवीय आवश्यकताओं से जुड़े तो नहीं हैं ?


    ...

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  8. *** क्या यह सही नहीं है कि प्रागैतिहासिक काल, पुरा पाषाण काल से लेकर आधुनिक काल तक मानव जाति अपना वजूद समूह में शिकार कर प्राप्त किया भोजन ग्रहण कर ही बचा पाई है, और इसी सामूहिक शिकार की आवश्यकताओं के कारण भाषा व कालांतर में मानव मस्तिष्क का भी विकास हुआ ?

    यह बात विशेष विचारणीय है ....वैसे किसी की भी धार्मिक आस्था पर उंगली उठाना किसी तरह से भी औचित्यपूर्ण नहीं है ...

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  9. इस पूरे बहस बाजी में बस इसी तरह की एक पोस्ट की कमी थी पूरी हो गई बहस का एक तीसरा कोण | :-)

    आप के ११ सवालो के जवाब------

    १-हा

    २-पता नहीं

    ३- आप से सहमत | मेरी दो मुस्लिम मित्र शाकाहारी थी |

    ४-बिल्कूल सहमत हु और मै ऐसा ही करना चाहती हु की उन सभी को रोज जानवर कटता दिखा दिखा उन्हें वो खाने से तौबा करावा दू |

    ५-जी हा

    ६-सही कहा | पर हम अब जंगली नहीं रहें सभ्य हो गये है और खाने के लिए अनाज फल सब्जी कई तरह की चीजे उगाने में सक्षम है |

    ७- सही कहा | मुझ जैसा हिंसक कोई नहीं हर साल पेस्ट कंट्रोल करा कर कितने जीवो को मार देती हु | फिर भी कभी कभी काकरोज दिख जाये तो उसे दूसरो की तरह हाथ से मारने के बजाये उठा कर बाहर फेक देती हु | वो तब तक सुरक्षित है जब तक की वो मुझे हानी नहीं पंहुचा रहे है |

    ८-बहुत हद तक सही |

    ९- अभी तक नहीं था पर अब हम जैसे और पेटा ( शायद यही नाम है ) जैसे संस्थाये अपराधबोध पैदा करने में लगे है | बड़े बुरे है हम लोग लोगों के मुह का निवाला छीन रहे है :-)

    १०- शाकाहारी हो कर भी आप संतुलित आहार पा सकते है |

    ११- इसे धर्म से नहीं जोड़ती हु चाहती हु की लोग शाकाहारी बने पर इसके लिए किसी से इस बारे में बहस नहीं करती हु | मजाक में ही सही पर मै भी उनको राक्षस ही कहती हु | :-)

    दया ममता को शाकाहार से अलग रखती हु ये दो अलग चीजे है |

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  10. NIRBAL PAR SABKA BAS CHALTA HAI, SHAYAD TABHI INSAAN KEE KYA BAAT KAREN DEVI-DEVTA BHI KAMJOR PRANI KI HI BALI CHAHTE HAIN... SHER, HATHI, BAGH JAISE KHOOKHAR PRANI KEE BALI CHADHTE NAHI DEKHA HAI, WO SHAKTISHALI HAIN NA!! ISLIYE....
    ..N JANE KAISA YE DASTUR HAI....
    ..JEHAN MEIN BAHUT SAWAL UTPANN KARTI AAPKI POST ACHHI LAGI...
    AAPKA BLOG BHI BAHUT ACHHA LAGA.
    HAARDIK SHUBHKAMNAYNE

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  11. पहली बात तो यह स्पष्ट कर दूं कि मैंने न तो कोई आलेख लिखा और न मैंने कहीं टिप्पणियों में उग्रता दिखाई. मैं सदैव ही शाकाहार का समर्थन और जीवहिंसा का विरोध करता हूँ पर किसी का मुंह तो मैं पकड़ नहीं सकता. यहाँ मैं आपके प्रश्न-दर-प्रश्न उत्तर देने का प्रयास करता हूँ:

    १ - इसके दो कारण हैं. पहला तो यह कि भारत में बहुत कम लोग ही यह जानते हैं कि ऐसा कोई इसी पर्व भी है जिसमें टर्की भूनकर खाई जाती है. दूसरा यह कि ईसाइयों की तादाद भारत में ज्यादातर स्थानों में बहुत कम है और वे यहाँ टर्की भूनकर नहीं खाते.

    २ - जी हाँ. दोनों ही दशाओं में बकरे को मारने का तरीका एक जैसा है पर ईद के अवसर पर करोड़ों बकरे एक साथ कट जाना वाकई क्षुब्द कर देता है.
    क्या आपको भी एक ही दिन लाखों-करोड़ों पशुओं का वध होने में कुछ बुरा नहीं लगता?

    ३ - मैं बचपन से मुस्लिम बाहुल्य वाले स्थानों में रहा हूँ और अभी भी मेरे मुस्लिम दोस्त हैं. कुछ दबे स्वर में अपने समाज की बुराइयों को स्वीकार भी करते हैं पर मैंने यह भी पाया है कि उन्हें बहुत छुटपन से ही दीनी-तालीम दी जाने लगती है जिसमें यही बताया जाता है कि वे ही सही हैं बाकी सब गलत हैं.
    मुझे और मेरे किसी घनिष्ठ मित्र को उनके परिवार ने धार्मिक शिक्षा नहीं दी. यदि दी होती तो मैं भी वेद-पुराण या कुण्डली-ज्योतिष पर पोस्ट लिखता और उनकी वकालत करता.

    ४ - जो लोग चिकन चंक्स को चाव से खाते हैं पर मुर्गे को कटते नहीं देख सकते उनके भीतर सुप्त अपराध बोध तो होता ही है इसलिए वे वह देखना पसंद नहीं करते.
    क्या आप किसी जीव को कटते देखते हैं या देखना पसंद करते हैं? पसंद करते हैं तो क्यों?

    ५ - यदि किसी पार्टी में नौन्वेज के काउंटर पर भीड़ लगती है तो इसके दो कारण हैं. पहला - जहाँ वेज के काउंटर बहुत से होते हैं, नौन्वेज के इक्का-दुक्का. दूसरा - हर किसी को नौन्वेज घर में नहीं मिलता, ऐसे मौकों पर सभी मांसाहारी टूट पड़ते हैं. क्या आप उस भीड़ में कभी फंसे हैं?

    जारी...

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  12. ६ - निस्संदेह पुराकाल में हर मनुष्य मांसाहारी ही था और इसने मानव-विकास में योगदान दिया, लेकिन जब शिकारी युग समाप्त हुआ तब पौधों और दुग्ध पदार्थों में इनका बेहतर विकल्प भी मिल गया. वस्तुतः, गैर-मांसाहारी भोज्य पदार्थों उगाने के कारण ही मनुष्य को शिकार पर निर्भर नहीं रहना पड़ा है.

    ७ - बेशक आक्रमण और रक्तपात को रोकने के लिए रक्तपात की ज़रुरत होती है. मैं आपसे सहमत हूँ.

    ८ - मध्यकालीन ही नहीं बल्कि कुछ प्राचीनकालीन अहिंसावादी, जीवदयावादी धर्मों-मतों के प्रभाव में आकर भारतीय जनमानस कमजोर हो गया था. इसमें कोई संदेह नहीं. लेकिन उन्हें यह पता नहीं था कि उनकी इस कमजोरी का सम्बन्ध मांसाहार नहीं लेने से है. वे यह भी नहीं जानते थे कि बर्बर आक्रमणकारी आकर उन्हें गुलाम बनायेंगे. वैसे इस प्रश्न का उत्तर तत्कालीन दार्शनिक, सामाजिक, और राजनीतिक प्रत्ययों पर निर्भर करता है, शाकाहारी या मांसाहारी होने पर नहीं. हिन्दू समाज में मांस खानेवालों की संख्या वाला एक बड़ा तबका हमेशा मौजूद रहा है. ऐसा नहीं होता तो बुद्ध-महावीर आदि ने कभी मांस न खाने के लिए उपदेश नहीं दिए होते.

    ९ - यह सही है कि लगभग सभी विकसित या तेजी से विकसित होने की राह पर बढ़ते देशों व उनके निवासियों में मांसाहार को लेकर कोई दुविधा या अपराधबोध नहीं है पर यह भी उतना ही सत्य है कि ऐसे हर देश में कम ही सही पर कुछ लोग न केवल शाकाहार का समर्थन करते हैं बल्कि वे उसे ही बेहतर मानते हैं. यहाँ यह भी स्पस्ट कर दू कि वे ऐसा किसी भारतीय के कहने पर नहीं करते.

    १० - मुझे इसकी जानकारी है कि मेरे पिछली पुश्तों में किसी ने मांस नहीं खाया. इसके बाद मैंने यह पाया कि वे सभी स्वस्थ और दीर्घायु रहे. मेरे दादा की मृत्यु ९२ साल की उम्र में हुई. और भी कई बुज़ुर्ग लंबा जिए और अंत तक स्वस्थ और समर्थ रहे. यह तर्क ही बेकार है कि शाकाहार से उचित या पूर्ण पोषण नहीं मिलता.

    ११ - मैं आपकी इस बात से पूर्णतः सहमत हूँ. शाकाहार हो या मांसाहार, वह हमारे चित्त को निर्मल या पवित्र नहीं बनाता. मैं यह नहीं कहता कि मांसाहारी व्यक्ति शाकाहारियों से नैतिक धरातल पर नीचे हैं.

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  13. आपके प्रश्न के उत्तर बस इतना ही कह सकती हूँ

    मै शाकाहारी हूँ , मुझे हिन्दू धर्म मे आस्था हैं , रुढ़िवादी सोच कि विरोधी हूँ , भारतीये संविधान कि अनुयायी हूँ । कोई क्या खाता हैं , किस धर्म मे आस्था रखता हैं इस से मुझे तब तक फरक नहीं पढता जबतक वो मेरे शाकाहारी होने पर या हिन्दू धर्म के विरोध मे नहीं बोलता । अगर मुझ अपने धर्म मे कुछ ख़राब लगता हैं तो मे उसको बदलने कि कोशिश करती हूँ , रुढ़िवादी और गलत सोच के खिलाफ बोलती हूँ क्युकी मेरा मानना हैं ही बहुत से बाते समय के साथ साथ बदलती जाती हैं । अगर हम लकीर पीटते रहेगे तो समय रुक जायेगा और तरक्की ख़तम हो जाएगी ।

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  14. ब्लाग जगत को एक तार्किक पोस्ट देने के लिए शुक्रिया ।

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  15. ब्लाग जगत को एक तार्किक पोस्ट देने के लिए शुक्रिया ।

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  16. हद है !!!!!!! या तो मैं बिलकुल मुर्ख या यूँ कह लीजिये की परम मुर्ख हूँ जो अपने मन की सीधी सी बात भी ढंग से नहीं कह पाता हूँ......... या कुछ समझदार व्यक्तियों ने अपनी समझदारी सिर्फ बात को कहीं दूसरी तरफ ले जा कर पटकने के लिए ही बुक कर रखी है..........
    इस ब्लॉग की एक पोस्ट वेदों में मांसाहार की बात पर आई ................ भाई लोग आ पधारे की नहीं गधे तू कल का छोरा क्या जाने वेद-फेद ..................देख माता जी के बलि चढ़ती है तू क्यों टांड रहा है.................... अरे भाई बात यहाँ सिर्फ इतनी हो रही थी की हर चीज का अपना एक निचित विधान होता है उसी के हिसाब से सारा काम होता है अब वेद का भी अपना एक निश्चित विधान है उसी पे चलकर उसके अर्थ को जाना जा सकता है , पर नहीं वेद के हिसाब से नहीं वेवेकानंदजी की जीवनी जो पता नहीं किस ने लिखी होगी उसमें से उद्हरण देने लगे हमारे परम धार्मिक सात्विक बंधु .

    बस हो गया ना मेरी पोस्ट का तो सत्यानाश!!!!!!!!!!! अरे भाई जिस प्रकार वेद में से ही वेद के ऊपर लगे आक्षेपों का निराकरण था, तो उसी तरह वेद में से ही सिद्ध करते की वेद में मांसाहार है ...बस फिर कौन किसको रोक सकता है हो गयी शुरू धींगा-मस्ती ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

    अगली पोस्ट थी की सिर्फ अपने जीभ के स्वाद के लिए उपरवाले के नाम ले ले कर क्यों किसी को बलि का बकरा बना कर कुर्बान कर दिया जाये ??????????

    अरे भाई खाना ही है तो खाओ उपरले की आड़ क्यों ?????????
    पर नहीं यहाँ भी पोस्ट से उल्टी बात किसी की ईद खराब हो गयी अपने धर्म का मजाक लगा क्यों लगा भाई ?? समझ में नहीं आया कम से कम मुझे तो ........... परम समझदार जी प्रकटे पोस्ट से कोई लेना देना नहीं और हवन को घुसेड दिया बीच में "लाहोल-विला-कुवत" यार कभी तो समझदारी का परिचय दो, किसी पोस्ट पर पोस्ट से सम्बंधित कमेन्ट करो .................. मेरे दो मित्र शाकाहार-मांसाहार पर चर्चा कर रहे थी अपनी बात रख रहे थे उसमें भी टांग अडाई से बाज नहीं आये पर क्या करें समझदार ज्यादा ठहरे ना.

    ................... फिर दो वीडियो लगा दिए की देखो ऐसे निर्ममता से बलि / कुर्बानी होती है जिसको सिर्फ अपनी जीभ के चटखारे के लिए उपरवाले की आड़ में किया जाता है, और अगर ऊपर वाले की भी इसमें सहमति है तो धिक्कार है मेरी तरफ से तो !!!!!!!!! बस क्या था शुरुवात हो गयी धडाधड पोस्टों की कोई नाम लेकर कोई संकेत मात्र कर कर समर्थन-विरोध में लगें है पुराणों से रामायण से निकाल निकाल कर ला रहे है .

    अब कोई पूछे तो क्या मतलब इस बे मतलब की बात का. जब की मुद्दा तो यह था की मांसाहार में उपरवाले की घाल-घुसेड क्यों, आप को खाना है तो खाओ.
    इसमें ऐसा क्या कहर बरपा है कोई समझाए तो सही मुझ पागल अमित शर्मा को, क्योंकि मुझे कुछ समझ में नहीं आया की वेदों में मांसाहार का खंडन करना कैसे ब्लोगिंग का माहोल खराब करना हो गया,,,,,,,,,,,,,, मांसाहार के लिए अल्लाहजी/माताजी का नाम की आड़ लेने का विरोध करना कैसे ब्लॉगजगत की हवा दूषित करना हो गया ???????????

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  17. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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    @ एस.एम.मासूम जी,

    आपको पोस्ट अच्छी लगी, आभार आपका...


    @ VICHAAR SHOONYA जी,

    सही कहते हो बंधु, थक मैं भी गया हूँ... इसी लिये यह पोस्ट है... ;)

    @ मनोज कुमार जी,

    बेचारे मच्छर, आपके जूनून की खबर होती तो आपके पास तक न फटकते... :)

    @ संगीता स्वरुप ( गीत ) जी,

    आभार आपका !

    @ anshumala जी,

    आप अधिकांश बातों पर सहमत हैं, आपका आभार!


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    @ कविता रावत जी,

    आपको मेरा ब्लॉग अच्छा लगा, जानकर मेरा भी उत्साह बढ़ा है, आभार आपका ।

    @ Tarkeshwar Giri जी,

    धन्यवाद मित्र ।

    @ निशांत मिश्र - Nishant Mishra जी,

    आपकी सुलझी हुई सोच का प्रशंसक रहा हूँ पहले से, आज की आपकी टिप्पणियों ने पोस्ट को पूर्णता दी है, आभारी हूँ आपका ।

    @ रचना जी,

    बहुत सी बाते समय के साथ साथ बदलती जाती हैं ।

    यह तो आप मानेंगी कि हिन्दू धर्म अन्य की अपेक्षा काफी पुराना है... समय के साथ ही परिपक्वता भी आई है... समय के साथ ही अन्य धर्म व धर्मावलम्बी भी कट्टरता को तज देंगे... आशावान रहिये... आपका आभार।

    @ DR. ANWER JAMAL जी,

    तारीफ का शुक्रिया, आते रहियेगा ।

    @ अमित शर्मा जी,

    आप अकारण ही चिंतित-उत्तेजित हैं... ब्लॉगिंग तो माध्यम ही ऐसा है कि इसमें समाज के हर आदमी के दिलो-दिमाग में जो कुछ भी सही या गलत चल रहा है... वह ब्लॉग पोस्ट या टिप्पणियों में निकल कर आयेगा, छपेगा और मौजूद रहेगा...

    यहाँ पर कोई आप पर कोई आक्षेप नहीं कर रहा... परंतु आपकी स्थापना के विपरीत जाकर यदि कोई यह कहता है कि प्राचीन धार्मिक ग्रन्थों में जिन चीजों का अस्तित्व आप सिरे से ही नकार रहे हैं वह मौजूद हैं... और यह बात संदर्भ सहित कही जा रही है... जैसे कि मैंने आपके ब्लॉग पर अपनी टिप्पणी में कही है... तो आपसे भी यह अपेक्षा रखना अनुचित तो नहीं होगा कि उस पर एक स्वस्थ वार्तालाप करें... हमें कभी भी पूर्वाग्रहों से ग्रसित नहीं होना चाहिये मित्र... खुले दिमाग और बड़े दिल से लो चीजों को ।


    ...

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    सभी पाठकगण,

    दया, करूणा, ममता आदि बहुत ही ऊँचे और अनुकरणीय मानवीय मूल्य हैं यह सत्य है... परंतु उतना ही बड़ा सत्य यह भी है कि मानव, समाज, देश व विश्व को यदि अपना वजूद बचाये रखना है तो हिंसा भी करनी होती है, निर्मम भी होना होता है... चाहे सांकेतिक रूप से नारियल फोड़ा जाता हो, तिल से बने आकार को काटा जाता हो, कड़ाह प्रसाद को कृपाण से काटने के बाद वितरित किया जाता हो या ईसाइयों में रोटी व वाइन को Flesh & blood कह बांटा जाता हो... मेरे विचार में सभी धर्मों में मौजूद Symbolic एवं Ritual Animal Sacrifice की यह परंपरायें एक तरह से पूरे समाज को यह याद दिलाने का उपक्रम मात्र हैं कि यह दुनिया बहुत निष्ठुर है... विश्व कभी भी इतना सुरक्षित नहीं होगा कि हिंसा की जरूरत ही नहीं पड़े... अत: यह न मान कर चलो कि तुम्हारी लड़ाई कोई और लड़ेगा... जरूरत पड़ने पर खून देने व बहाने के लिये भी तैयार रहो!

    आभार!


    ...

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  21. साइंटिस्ट ने स्टडी के दौरान ऐसे कई साक्ष्य पाए हैं, जिनके माध्यम से हमें आदिमानव से जुड़ी कई चौंकाने वाली बातें पता चलती हैं। इन साक्ष्यों से यह संकेत मिलता है कि आज से 30 हजार साल पहले गुफाओं में रहने वाला इंसान भी भोजन तैयार करने के लिए आटा पीसता था और सब्जियां तैयार करता था।

    पकाकर खाना खाता था आदिमानव
    http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/6775739.cms

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  22. नयी खोज से पता चला है कि रोटी का प्रचलन 30 हजार वर्ष पहले भी था। इस अनुसंधान ने इस धारणा को चुनौती दी है कि प्रागैतिहासिक काल का मानव मुख्य भोजन के रूप में मांस खाता था। नए साक्ष्य बताते हैं कि भारत जैसे देशों में मुख्य भोजन रोटी का उपयोग प्राचीन काल में भी होता था। ............

    शाकाहारी था प्रागैतिहासिक मानव

    peoplessamachar.co.in

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  23. The theory ( Bajaj-Ibrahim-Singh) is asserted as being an additional development of the EPW of Einstein. The book claims that it is possible to envisage the earthquakes, caused by the outrageous slaughter of animals. The book is really original and is absolutely, eminently, worth-reading. This book fills certain gaps in the science of seismology which is still incipient. The arguments in the book, though highly technical and full of scientific jargon, are presented clearly and simply in the summary of the book. It is based on reports received from various parts of the world noting that several earthquakes were related to the destruction of million of the animals in or close to high-risk seismic zones. From that, a suspicion was born and the scientists inquired into what the organization of demolition of animals in the slaughter-houses of the world has to do with the earthquakes.

    http://jainsamaj.org/magazines/ahimsatimesshow.php?id=52

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  24. प्रिय मित्र प्रवीण

    ऊपर दिए दो रेफरेंस सिर्फ इसलिए दिए हैं क्योंकि मुझे भी ये नयी जानकारी मिली है तो सोचा आपसे शेयर कर लूं |

    तीसरा कमेन्ट वैसे काफी पुरानी जानकारी है सबको पता है | इस बारे में कोई विरोधाभास हो तो अवश्य बताइयेगा |

    आधुनिक विज्ञान दोनों पक्ष कह देता है कोई एक तो सही निकलेगा ही ना :))

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  25. प्रिय मित्र
    आपके लेख का पहला और तीसरा प्रश्न कुछ कम तार्किक प्रतीत हो रहे हैं , थेंक्स गिविंग डे के बारे में मुझे भी कम ही जानकारी है | इसीलिए इस पर लेख कम आते होंगे

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  26. @क्या यह सही नहीं है कि आहार विज्ञानी एक मत से यह मानते हैं कि आदर्श संतुलित आहार में शाकाहार व मांसाहार दोनों का समावेश होना चाहिये ?

    मित्र,
    मुझे नहीं लगता ऐसा कहीं कहा गया होगा वो भी एक मत से .. अगर ऐसा है तो अवश्य बताएं


    मेरा विशेष ध्यान "एकमत" शब्द पर है

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  27. अरे हाँ बताना भूल गया मैं .... शायद यहाँ कुछ अन्य प्रश्नों के उत्तर मिल जायेंगे

    http://my2010ideas.blogspot.com/2010/11/veg-vs-non-veg.html

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  28. .
    .
    .
    मित्र गौरव,

    ज्यादा कुछ न कहते हुऐ बस यही कहूँगा कि आहार के मुद्दे पर हम दोनों भिन्न विचार रखते हैं... और आपके विचारों का पूरा सम्मान करते हुऐ मैं अपने विचारों पर ही टिकना चाहूँगा... आशा है कि इस मतभेद को स्पोर्टिंग्ली लोगे ... :)


    ...


    ...

    उत्तर देंहटाएं
  29. प्रिय मित्र प्रवीण,

    आपसे एक स्वस्थ चर्चा करने को मिलती है और मुझे क्या चाहिए मित्र ?:)


    [स्वस्थ चर्चा = जिसमें सही को सही मान लिया जाता है ]

    उत्तर देंहटाएं
  30. आख़िर हमें तय करना होगा कि राक्षस किसे कहें?

    जो बेकसूर इंसानों को मारे अगर वह राक्षस, तो बेबस जानवरों को मारने वाला राक्षस क्यों नहीं?

    यह कौन-सी मानवता है और यह कौन सा न्याय है कि हमें तो खाने-पीने तक की आज़ादी चाहिए, लेकिन दूसरे जीवों को जीने तक की आज़ादी नहीं हो?

    उत्तर देंहटाएं
  31. सान का दोगलापन देखिए. अपेक्षाकृत ताकतवर जानवरों मसलन बाघों, शेरों, चीतों, हाथियों का वे संरक्षण करते हैं,

    लेकिन कमज़ोर जीवों जैसे गायों, बकरों, मुर्गों, कबूतरों, मछलियों इत्यादि को मारकर खा जाते हैं.

    वे कह सकते हैं कि अगर इन्हें मारकर न खाएं तो इनकी आबादी बहुत बढ़ जाएगी.

    इस दलील से तो इंसानों की आबादी विस्फोटक तरीके से बढ़ रही है, तो उनका कत्लेआम करने वालों का भी समर्थन किया जाना चाहिए?

    वे, जो दुनिया भर में कत्लेआम कर रहे हैं, कहां कुछ ग़लत कर रहे हैं?

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