सोमवार, 29 नवंबर 2010

कभी कभी हारना जीतने से भी ज्यादा जरूरी भी होता है और सुखद भी !



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मेरे ' विजेता ' मित्रों ,

आज सुबह की सैर को निकला तो अपनी-अपनी बाईकों पर खाली सड़कों का फायदा उठा रेस लगाते दिखे स्कूली बच्चे...
अपनी भी कुछ यादें तरोताजा हों गई उन्हें देख... सोचा आपसे शेयर करूं...


हाँ तो बात है तकरीबन १६ साल पहले की... मेरी Yamaha RXG 135 एकदम नई थी... जवान भी था ही तब मैं... और बाईक को तेज चलाने का शौक या सनक भी रखता था... अब उस दौर की सबसे तेज मोटरसाइकिल भी थी ही अपने पास... तो ऐसा कम ही होता था कि कोई दुपहिया मुझसे आगे निकल जाये...

अपने काम की जगह शहर से थोड़ा दूर थी... आफिस से घर जाते हुए पाँच-छह किलोमीटर का निर्जन सा इलाका पड़ता था... उस इलाके के खत्म होते ही नदी का एक पुल था जहाँ पर तीन रास्तों का ट्रैफिक आकर मिलता था और वहीं से शुरू होती थी एक अतिव्यस्त शहर की भागमभाग भी...

अब यही पाँच-छह किलोमीटर का हिस्सा ऐसा था जिसमें मैं हवा से बातें करने के अपने शौक को अंजाम देता था... वह हाफ-डे था... ऑफिस से घर को निकला तो बड़ी मस्ती में था मैं... जैसे ही मैं वहाँ पहुंचा और बाइक को तेज भगाने का इरादा किया ही था कि बगल से एक बच्चे की आवाज सुनाई दी " पापा चलो अंकल से रेस लगाते हैं। "... देखा LML स्कूटर पर सवार एक पिता-पुत्र की जोड़ी... बच्चे ने स्कूल यूनिफार्म पहनी थी... शायद स्कूल से घर जा रहे थे दोनों...

मुझे एकदम से खेल सा सूझा... मैंने क्लच दबाया और एकस्लरेटर को जोर से घुमाया... आवाज तो बहुत जोरों की आई पर स्पीड ज्यादा नहीं बढ़ी... पिता शायद समझ सा गया... और उसने भी स्कूटर की स्पीड तेज कर दी... अब यह मेरे लिये खेल सा हो गया... मोड़ों पर, स्पीड ब्रेकरों पर या उन जगहों पर जहाँ सड़क अच्छी नहीं थी मैं अपनी बाईक को धीमा कर स्कूटर को अपने से आगे निकलने देता... और सीधी सड़क पर फिर उसे पकड़ लेता और थोड़ा आगे हो जाता... बच्चा इस सबसे बहुत ही आनंदित था... और उत्साह से भर " पापा और तेज, और तेज ! " उसके यह चीखने से खेल का आनंद और बढ़ गया था...

पुल अब आने ही वाला था... एक आखिरी बार मैंने अपनी बाईक को स्कूटर से दो तीन गज आगे बढ़ाया... और फिर उसके बाद क्लच को दबा लिया... एक्सीलरेटर देने पर इंजन जोर से गरजा... परंतु बाईक की स्पीड यथावत ही रही... पिता ने इशारा समझा और स्कूटर को थोड़ा और तेज कर दिया... " हुर्रे !!! मेरे पापा जीत गये !... बच्चे की यह चीख गूंजी... पुल पर पहुंचने से पहले पिता ने अपना दाहिना हाथ हवा में उठाया और मुझे वेव किया...



कभी कभी हारना जीतने से भी ज्यादा जरूरी हो जाता है...


खास कर तब, जब आपकी इस हार से एक बच्चे का पिता उसकी नजर में हीरो हो जाता हो...


आपको क्या लगता है ?


आभार!






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सोमवार, 22 नवंबर 2010

डोन्ट वरी, बी हैप्पी ! Happy days will remain here forever !... जय जय घोटाला !!!


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मेरे ' घोटालेबाज ' मित्रों,

सबसे पहले तो यह कहूँगा कि दिल मत छोटा करो यार... क्या हुआ जो कुछ जले-भुने ईमानदार नासपीटों की वजह से हाल फिलहाल में हमारे किये तीन तीन घोटाले उजागर हो गये...

क्या हुआ जो कलमाडी जी, ए० राजा जी और अशोक चवाण जी को इस्तीफा देना पड़ गया... भाई दिखाने के लिये करना पड़ता है यह सब... वैसे भी तीनों के पास काम की कोई कमी तो नहीं... जल्दी ही दूसरे काम का भी जुगाड़ कर ही देगी हमारी बिरादरी (कोऑपरेटिव सोसाइटी) उनके लिये...

आप तो यह भी तो देखो न कि कितने बड़े-बड़े नाम आज हमारे साथ खड़े हैं...

कॉमनवेल्थ खेल घोटाला, जिसमें हमने अपना खून-पसीना बहा कर जनता की हराम की कमाई का मात्र ६०-७० हजार करोड़ रूपया ही अपने लिये कमाया... कौन नहीं था उसमें हमारे साथ... पक्ष-विपक्ष के बड़े-बड़े नेता... खेल प्रशासक... नौकरशाह... सीपीडब्लूडी के बड़े-बड़े इंजीनियर... बड़ी-बड़ी रियल-एस्टेट कंपनियों के कर्ता धर्ता... सब ही तो शामिल थे...

आदर्श हाउसिंग घोटाला , क्या करते ये बेचारे फौजी उस जमीन पर 'खुखरी पार्क' बना कर या फालतू की परेड कर-कर के... पूरे १०४ आलीशान फ्लैट बनाये हमने... उन बेचारों के रहने के लिये जिनके पास रहने के लिये कहीं और छत नहीं थी... और कीमत भी कितनी कम रखी... केवल ८५ लाख... कौन कौन नहीं था इन फ्लैटों को पाने वालों में... दो-दो आर्मी चीफ... एक नेवी के एडमिरल... कई और जनरल... कैन्ट बोर्डों की जमीन ' सुरक्षित ' रखने का काम करने वाले अफसरान... मुंबई के कई नेता या उनके बेनामी चेले-चमचे... कारगिल के योद्धा और युद्ध में मारे गये शहीदों की विधवायें क्या करतीं इस प्राइम प्रापर्टी का...

टेलीकॉम २-जी घोटाला... फिर इस देश की जालिम जनता के हिस्से के एक लाख सत्तर हजार करोड़ रूपये को ही तो केवल लूटा है न हमने... अब हमारे बीबी-बच्चों को भी तो दाल-रोटी तो चाहिये ही न... देखो किस-किस को फायदा पहुंचा इसमें... नेता हर तरफ के... नौकरशाह कई कई विभागों के... टेलीकॉम क्षेत्र की लगभग हर बड़ी कंपनी के मालिक-प्रमोटर... कॉरपोरेट लाबीइस्ट... यहाँ तक कहा जा रहा है बड़े-बड़े पत्रकारों ने भी इस सब में भूमिका निभाई है...

देखा तुमने, कितनी तेजी से बढ़ रही है हमारी यह बिरादरी... आखिर यह जालिम-जनता कब तक हमारा खून चूसेगी... हम अपना खून-पसीना लगा कर दिन ब दिन नये नये, पहले से और भी बड़े घोटाले करते रहेंगे...

तुम में से कोई भी इस भय को मत पालना कि ऊपर लिखे तीनों बड़े कामों में की गई मेहनत के फलस्वरूप जो कुछ हमने कमाया है या सिर ढकने को जो छत पाई है... कोई उसे हमसे छीनेगा... इस जनता की याद्दाश्त बहुत ही कमजोर है... जाँचें बैठा दी गई हैं... चलते रहने और कभी खत्म न होने के लिये... नया ' हॉट-टॉपिक ' जल्द ही पैदा हो जायेगा... फिर सब भूल जायेंगे कि कोई घोटाला कहीं हुआ भी था...

इस लिये बार-बार कह रहा हूँ कि हिम्मत न हारो...

लगे रहो !

हम इस जालिम जनता से अपना ' हक ' हर हाल में छीन कर रहेंगे !

जय हे...

जय हे...

जय-जय-जय हे !

घोटाला तेरी जय हो !

जय जय घोटाला !




आपका ही,

महा ' घोटालेबाज '

अध्यक्ष,

घोटालेबाज बिरादरी,

भारत।







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यह मुगालता कतई न पालिये कि यह कोई व्यंग्य है... यह पत्र तो डाक विभाग की गलती से मेरे पास आ गया... पता साफ-साफ नहीं लिखा था... मुझे काम का लगा, तो मैंने छाप दिया... शायद इस तरह यह उस आदमी तक पहुंच ही जाये जिसकी बिरादरी ने उसे यह भेजा था !



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शनिवार, 20 नवंबर 2010

पशुबलि-कुरबानी , शाकाहार-मांसाहार , वैचारिक बहस- फ्री फॉर ऑल धर्मयुद्ध... बीचों-बीच फंसे हम और जेहन से उठते ११ सवाल... क्या उत्तर देंगे आप ?

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मेरे ' उत्तरदाता ' मित्रों,


आज और कुछ नहीं...


बस यह ग्यारह सवाल...


*** क्या यह सही नहीं है कि जीव-दया व मांसाहार निषेध के संबंधित आलेखों की बाढ़ ब्लॉगवुड में बकरीद के आस-पास ही आती है, जबकि थैंक्सगिविंग डे के दिन भी लाखों टर्की पक्षी बाकायदा भूनकर GOD को धन्यवाद देते हुऐ खा लिये जाते हैं बाकायदा customary 'Turkey Song' गाते हुए, और कहीं कोई पत्ता भी नहीं हिलता ?

*** क्या यह सही नहीं है कि बकरीद के दिन दी जाने वाली बकरे की कुर्बानी और रोजाना हलाल मीट की दुकान पर बिकते बकरे को मारने का तरीका बिलकुल एक जैसा ही है ?

*** क्या यह सही नहीं कि इस तरह के आलेख लिखने वाले महानुभावों का अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में न तो कोई मुस्लिम मित्र होता है न ही मुस्लिम समाज से उनका कोई संबंध होता है, यदि होता तो उन्हे यह ज्ञान हो जाता कि दया, ममता, करूणा आदि सभी मानवीय भावनायें एक मुसलमान के अंदर भी उतनी ही हैं जितनी उनके भीतर, आखिर हैं तो सभी इंसान ही ?

*** क्या यह सही नहीं कि ' फ्राइड चिकन चंक्स ' को बड़े शौक से खाने वाले कुछ लोग चिकन को काटना तो दूर कटते देख भी नहीं सकते क्योंकि उन्हें अपनी पैंट गीली करने का डर रहता है ?

*** क्या यह सही नहीं है कि आज भी किसी पार्टी या दावत में यदि कोई नॉनवेज पकवान बना होता है तो सर्वाधिक भीड़ उसी काउंटर पर होती है ?

*** क्या यह सही नहीं है कि प्रागैतिहासिक काल, पुरा पाषाण काल से लेकर आधुनिक काल तक मानव जाति अपना वजूद समूह में शिकार कर प्राप्त किया भोजन ग्रहण कर ही बचा पाई है, और इसी सामूहिक शिकार की आवश्यकताओं के कारण भाषा व कालांतर में मानव मस्तिष्क का भी विकास हुआ ?

*** क्या यह सही नहीं कि आततायी और आक्रमणकारी के द्वारा किये जा रहे रक्तपात को रोकने के लिये भी जवाबी रक्तपात की आवश्यकता होती है ?

*** क्या यह सही नहीं है कि कुछ मध्यकालीन अहिंसावादी, जीवदयावादी धर्मों-मतों के प्रभाव में आकर भारतीय जनमानस इतना कमजोर हो गया था कि हम कुछ मुठ्ठी भर आक्रमणकारियों का मुकाबला न कर पाये और गुलाम बन गये ?

*** क्या यह सही नहीं है कि आज के विश्व में लगभग सभी विकसित या तेजी से विकसित होने की राह पर बढ़ते देशों व उनके निवासियों में मांसाहार को लेकर कोई दुविधा या अपराधबोध नहीं है ?

*** क्या यह सही नहीं है कि आहार विज्ञानी एक मत से यह मानते हैं कि आदर्श संतुलित आहार में शाकाहार व मांसाहार दोनों का समावेश होना चाहिये ?

*** और क्या यह भी सही नहीं है हम चाहे शाकाहारी हों या मांसाहारी, By birth हों या By choice , दोनों ही स्थितियों में हमें कोई ऐसा ऊंचा नैतिक धरातल नहीं मिल जाता कि हम दूसरे को उसके आहार चयन के कारण उसे सीख दें या उसे अनाप-शनाप, आसुरी स्वभाव वाला या पशुवत कहें ?




क्या आप उत्तर देना चाहेंगे इन सवालों का ?





आभार!







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मूल रूप में यह आलेख एक टिप्पणी थी जो मुझ द्वारा एक ब्लॉग पोस्ट पर की गई थी , किसी वजह से यह छप नहीं पाई अत: इसे पोस्ट बना दिया गया है।






सोमवार, 15 नवंबर 2010

जीवन का उद्देश्य, Purpose of Life : Elementary, My Dear Watson ! ओह्ह सॉरी विवेक जी . . . . . .


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मेरे 'विवेकी' मित्रों,

कुछ कारणों से कुछ समय नेट से थोड़ा दूर सा रहा... इसी दौरान विवेक रस्तोगी जी की यह पोस्ट नहीं देख पाया... आज देखी... विवेक जी लिखते हैं:-


"आखिर इस जीवन का उद्देश्य क्या है, कुछ समझ में ही नहीं आ रहा है। यह प्रश्न मेरे अंतर्मन ने मुझसे पूछा तो मैं सोच में पड़ गया कि वाकई क्या है इस जीवन का उद्देश्य… ?

सबसे पहले मैं बता दूँ कि मैं मानसिक और शारीरिक तौर पर पूर्णतया स्वस्थ हूँ और मैं विषाद या उदासी की स्थिती में भी नहीं हूँ, बहुत खुश हूँ। पर रोजाना के कार्यकलापों और जीवन के प्रपंचों को देखकर यह प्रश्न अनायास ही मन में आया।

थोड़ा मंथन करने के बाद पाया कि मुझे इस प्रश्न का उत्तर नहीं पता है, कि जीवन का उद्देश्य क्या है, क्या हम निरुद्देश्य ही जीते हैं, हम खाली हाथ आये थे और खाली हाथ ही जाना है।

जैसे कि मैंने बचपन जिया फ़िर पढ़ाई की, मस्तियाँ की फ़िर नौकरी फ़िर शादी, बच्चे और अब धन कमाना, और बस धन कमाने के लिये अपनी ऐसी तैसी करना। थोड़े वर्ष मतलब बुढ़ापे तक यही प्रपंच करेंगे फ़िर वही जीवन चक्र जो कि मेरे माता-पिता का चल रहा है वह होगा और जिस जीवन चक्र में अभी मैं उलझा हुआ हूँ, उस जीवन चक्र में उस समय तक मेरा बेटा होगा।

यह सब तो करना ही है और इसके पीछे उद्देश्य क्या छिपा है, कि परिवार की देखभाल, उनका लालन पालन, बच्चों की पढ़ाई फ़िर अपनी बीमारी और फ़िर सेवानिवृत्ति और फ़िर अंत, जीवन का अंत। पर फ़िर भी इस जीवन में हमने क्या किया, यह जीवन तो हर कोई जीता है। समझ नहीं आया।

यह सब मैंने अपने गहन अंतर्मन की बातें लिख दी हैं, मैं दर्शनिया नहीं गया हूँ, केवल व्यवहारिक होकर चिन्तन में लगा हुआ हूँ, और ये चिन्तन जारी है, जब तक कि जीवन का उद्देश्य मिल नहीं जाता है।"



कई जवाब भी मिले हैं उनको, पर अधिकाँश में घुमा-घुमा कर गोल मोल बातें ही की गई हैं सिर्फ अजित गुप्ता जी ने ही भारतीय संस्कृति का हवाला देते हुए यह कहा है कि श्रेष्ठ संतान का जनन-पालन-पोषण ही जीवन का उद्देश्य है... हमारे ग्रंथ इसको 'पितृऋण से मुक्त होना' भी कहते हैं।

इस संबंध में मेरे विचार इस प्रकार हैं...

*** अपनी समस्त मानसिक-बौद्धिक योग्यताओं के बावजूद मानव है तो प्राणी जगत का एक जीव ही... तो मानव जीवन का उद्देश्य क्यों कर किसी भी अन्य प्राणी के जीवन के उद्देश्य से भिन्न होना चाहिये ?... जरा गौर करिये आपके इर्द-गिर्द जो प्राणी दिख रहे हैं उनके जीवन का उद्देश्य क्या है ?

जवाब साफ है:-

मानव जीवन के उद्देश्य निम्न हैं...

१-
प्रजनन
: यानी अपनी नस्ल को आगे बढ़ाना... इसके लिये सबसे जरूरी है उपलब्ध विकल्पों में श्रेष्ठतम, उपयुक्त जीवन साथी का चयन... समाज के नियमों के चलते विवाह बंधन में बंध जाने के बाद भी मानव जीवन पर्यंत और बेहतर जीवन साथी की तलाश व उसे प्रभावित करने के प्रयास में लगा रहता है... यह सारी पद, प्रतिष्ठा, पैसे के पीछे की भागदौड़ के पीछे सिर्फ एक ही भाव है... विपरीत लिंगी के लिये स्वयं को और अधिक आकर्षक व चुम्बकीय बनाना!... इसके अतिरिक्त अपनी संतति के लिये दुनिया को और सुरक्षित, आरामदेह और बेहतर बनाने की चाह हमारी सारी वैज्ञानिक-तकनीकी खोजों के पीछे का ड्राईविंग फोर्स है।

२-
कुदरत द्वारा दी गई पाँच इन्द्रियों की तृप्ति
: मानव की यह पाँच इन्द्रियाँ हैं नेत्र, घ्राण, स्वाद, स्पर्श व श्रवण इन्द्रियाँ... यदि आप आंखें बंद कर कुछ समय सोचें तो आप पायेंगे कि हमारे यह सभी होटल, रेस्टोरेंट, आटोमोबाइल, फूड, वस्त्र, कॉस्मेटिक, फैशन, ग्लैमर, संगीत, नृत्य, ट्रैवल, टूरिज्म, धर्म, योग, आध्यात्म आदि अदि तमाम तरह की इंडस्ट्रीज प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मानव की इन पाँच इन्द्रियों को तृप्त करने का ही तो कार्य कर रही हैं।

स्पष्ट है कि मानव भी अपने जीवन के उद्देश्यों के मामले में अन्य जंतुओं से कोई अलग नहीं है... परंतु हुआ क्या है कि पिछले ५-१० हजार में मानव मस्तिष्क के विकसित हो जाने के कारण उसकी ईगो भी बहुत बड़ी हो गई है...मानव जीवन तो तब भी था जब भाषा-लिपि का विकास नहीं हुआ था,और जीवन तब भी था तो उद्देश्य भी रहा ही होगा... परंतु आज वह यह मानने को तैयार नहीं कि मरने के बाद मेरा हश्र भी वही होगा जो मेरी कॉलोनी के कुत्ते या चिकन शाप के ब्रायलर का होगा... अब इसी ईगो को चंपी करने के लिये पैदा की गई हैं धर्म-अध्यात्म जैसी दुरूह अवधारणायें, कुछ चालाक दिमागों के द्वारा... यह बताती हैं कि मानव अन्य जीवों से इतर है... उसका जीवन उद्देश्य है, अपने बनाने वाले को पहचानना... जीवन भर उसका गुणगान, उसकी कृपा का बखान... मृत्यु के बाद उसके फैसले के अनुसार दूसरे लोक के जीवन की सजा या इनाम... और यदि मस्का ज्यादा लगाया हो तो, जीवन के बाद उसी में मिलन...



Excuse me, but isn't it a big joke with capital J ?

Ha Ha Ha...



.... :-))


आभार!





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रविवार, 14 नवंबर 2010

धन्यवाद योगॠषि स्वामी रामदेव जी... पतंजलि आयुर्वेद के यह उत्पाद वाकई उत्कृष्ट हैं... परंतु ..........




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मेरे 'गुण ग्राही' मित्रों,

परम आदरणीय योगॠषि स्वामी रामदेव जी से आप असहमत तो हो सकते हैं परंतु उनके कथनों व योगदान को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है...

योगऋषि आजकल संपूर्ण भारत की 'भारत स्वाभिमान' यात्रा पर हैं... मेरे शहर में कुछ माह पहले जब वह आये तो उनके द्वारा बताये जाने पर शहर के पतंजलि सेवा केंद्र में जाकर मैं भी कुछ उत्पाद ले आया था...

उत्पाद थे...


*** दन्त कान्ति डेन्टल क्रीम (टूथ पेस्ट)

*** केश कान्ति हेयर क्लीन्जर (शैम्पू)

*** ओजस बॉडी क्लीन्जर (पारदर्शी साबुन)

*** तेजस बॉडी लोशन (माईश्चराइजिंग क्रीम)



यह सभी उत्पाद पतंजलि आयुर्वेद द्वारा बनाये गये हैं, पैकिंग बाजार में उपलब्ध अन्य किसी भी कंपनी के उत्पाद के समकक्ष है, कीमत वाजिब है और सबसे बढ़कर बात यह है कि व्यक्तिगत रूप से मुझे इन्हें प्रयोग करने का अनुभव इतना अच्छा रहा है कि मैं भविष्य में भी इनको प्रयोग करते रहना चाहता हूँ...

आप को कभी मौका लगे तो आजमाईये जरूर...


परंतु दो बाते हैं जो अपने ब्लॉग में लिखना जरूर चाहता हूँ,


हो सकता है कि यह बातें वहाँ तक पहुँच ही जायें जहाँ तक मैं इनको पहुंचाना चाहता हूँ...


१- सेवा केन्द्र में ढूंढने पर भी मुझे कोई शेविंग क्रीम नहीं मिली... बताया गया कि या तो नारियल तेल या एलोवेरा जेल चेहरे पर लगा कर शेव करें... पर दोनों ही तरीके प्रैक्टिकल नहीं हैं... शेविंग क्रीम भी जल्द से जल्द आनी चाहिये!


२- पतंजलि आयुर्वेद को भी जल्दी से जल्दी शेयर बाजारों में सूचीबद्ध होना चाहिये... IPO लाना चाहिये व भारत के हर आदमी को इसके शेयर खरीदने व इस उद्मम की प्रगति में भागीदार/साझीदार होने का अवसर देना चाहिये... अन्य उद्ममों की तरह यह भी अपने वित्तीय नतीजे सार्वजनिक करे... अपनी अल्प आय से वैसे तो मैंने आज तक कोई शेयर नहीं खरीदा, परंतु यदि पतंजलि आयुर्वेद का शेयर खरीदने का मौका मिले तो यह अवसर मैं गंवाऊंगा नहीं!



सुन रहा है क्या, कहीं, कोई ?





आभार!






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मंगलवार, 2 नवंबर 2010

डियर चीफ, कब्जे में लो इस ' नासूर ' को और फिर ढहा दो बारूद लगाकर... तभी ' आदर्श ' स्थापित होगा, फिर से !!!


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प्रिय जनरल,

१- सबसे पहले तो यह कहूँगा कि पदासीन होने के बाद से आज तक का आपका आचरण और आपके किये कार्य़ उदाहरण देने योग्य रहे हैं, मुझे ही नहीं, हर उस आदमी को जिसने जीवन में कभी जैतूनी हरी वर्दी पहनी है या आज पहनता है, उसे गर्व है कि आप हमारे चीफ हैं।

२- पिछले काफी दिनों से संचार के हर माध्यम पर सुन और देख रहा हूँ कि मुंबई में कुछ लोगों के भ्रष्ट गठजोड़ ने सशस्त्र सेनाओं के कब्जे वाली एक बेशकीमती जमीन को कारगिल के शहीदों तथा युद्ध में मारे गये सैनिकों की विधवाओं के लिये फ्लैट बनाने के नाम पर कब्जाया और उसमें सौ से अधिक फ्लैट बना कर आपस में बंदरबाँट कर ली।

३- यह भी पता लग रहा है कि इन फ्लैटों को पाने वालों में कई सेवारत व रिटायर्ड शीर्ष सैन्य अधिकारी भी हैं जिनमें से कुछ ने अपने कार्यकाल में इस जमीन हड़पने में कुछ मदद पहुंचाई या चुप रहे या दूसरी तरफ देखा, जिसका ईनाम उन्हें भी एक एक फ्लैट देकर दिया गया।

४- इस सारे मामले को लेकर राजनीति में काफी तूफान मचा है व हर दल के द्वारा अपने घर को साफ करने व साफ दिखाने की कोशिशें जोरों पर हैं।

५- मुझे आज अखबार से पता चला कि सेना ने भी एक कोर्ट आफ इन्क्वायरी गठित की है।

६- मेरा कहना मात्र यह है चीफ कि गलत हुआ है, यह साफ जाहिर है, यह सब जाँचें और कमेटियाँ सालों साल चलती रहेंगी और समय कटता रहेगा और साथ-साथ बना रहेगा वह दाग भी जो जैतूनी-हरी वर्दी पर चिपक गया है।

७- आप के पास देश के संविधान ने कानूनी ताकत दी है, आप इस नासूर बन चुकी इमारत के ऊपर कब्जा करो, अनेकों कानून हैं इसके लिये, इसे देश की सुरक्षा के लिये खतरा घोषित करते हुऐ बारूद लगा कर ढहा दो, पूरा का पूरा, महज कुछ मंजिल तोड़ने से काम नहीं चलने वाला।

८- मैंने कहीं यह भी पढ़ा है कि इस जमीन पर हमारे सैनिक कभी परेड करते थे, इस बेहूदा इमारत को ढहाने व मलबा साफ करने के बाद फिर से जब हमारे सैनिक यहाँ परेड करेंगे, तो यकीन मानो चीफ, हर उस शख्स के होंठों पर विजय की मुस्कान होगी और सीना गर्व से चौड़ा होगा जिसने कभी अपने जीवन में जैतूनी हरी वर्दी पहनी थी या पहनता है आज, यह मुसकान होगी बेईमानी नाम के दुश्मन को अपनी फौज के दिल-दिमाग से बाहर रखने में पाई 'आदर्श बैटल विक्टरी' की।

९- मुझे पूरी उम्मीद है कि आप मेरी बात पर गौर करोगे, जनरल।


सादर आपका,



प्रवीण शाह






(मेरे नियमित पाठक मुझे क्षमा करें कि अपने चीफ को लिखे एक नितांत व्यक्तिगत पत्र को यहाँ छाप दिया है।)