सोमवार, 18 अक्तूबर 2010

रूह या आत्मा ... What is this???... क्या हम महज एक नश्वर शरीर मात्र हैं ?...या कुछ ऐसा भी है जो शरीर से हटकर है?



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मेरे 'अजर-अमर' मित्रों,

विषय दुरूह है और विवादास्पद भी...

सबसे पहले तो यही फैसला कर लेते हैं कि कौन कहाँ खड़ा है...

आगे और कुछ लिखने के पहले आपसे यह जानना चाहूँगा कि:-

*** आज के समय मौजूद साक्ष्य व आज का हमारा ज्ञान भी Abiogenesis or abiotic synthesis of organic molecules & subsequent development of life... यानी प्राचीन पृथ्वी पर निर्जीव से एक कोशीय जीवन की उत्पत्ति... की ओर ईशारा करता है...

*** यह प्रिमिटिव एक कोशीय जीवन समय के बीतने के साथ-साथ जटिल होता गया और परिणाम स्वरूप आज दिखाई देने वाला प्राणी व वनस्पति जगत विकसित हुआ जिसे Organic Evolution कहते हैं।

*** इस सबके विपरीत अधिकतर धर्म यह मानते हैं कि उनके उपास्य 'ईश्वर' ने सारी दुनिया एक साथ ही बना दी... जिसमें सारे जीव व पादप आदि भी शामिल हैं... सारे जीवित प्राणी जैसे आज हैं सृष्टि के आरंभ में भी वैसे ही थे... तथा मानव अन्य प्राणियों से अलग स्थान रखता है।

*** यद्मपि गाय व सूअर से निकाले गये इन्सुलिन का मानव शरीर के भीतर भी वही कार्य करना...घोड़े तथा अन्य प्राणियों के अंदर विष को इंजेक्ट कर बनाये गये प्रतिविष का मानव को बचाने में प्रयोग होना... Recombinant DNA तकनीक से बनाई वैक्सीन व दवाइयों का मानव में प्रभावी होना... जीन मैपिंग... क्रोमोसोम की संरचना...आदि आदि अनेकों ऐसे अकाट्य सबूत हैं जो यह बताते हैं कि मानव जीवन भी जैविक विकास का ही परिणाम है...वह भी एक प्राणी ही है जिसका दिमाग अन्य सभी जन्तुओं से ज्यादा विकसित है।

तो फिर ऐसा क्यों है कि मानव जीवन की समाप्ति पर हम आत्मा या रूह जैसी कल्पना पर भरोसा करते हैं... जो कभी मृत्यु का वरण नहीं करती... या तो यहीं घूमती रहती है... या फिर चुपचाप इंतजार करती है 'उस' के फैसले का... या फिर 'उस' ही में समा जाती है... दोबारा फिर कभी न आने के लिये...




आभार!







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23 टिप्‍पणियां:

  1. soul
    why was this word coined
    can you tell ??????

    every word that is coined has a history / reason

    if you can tell why and when the word "soul" came into existence then may be the "existence of soul " can be understood

    for any word to be there has to me a "thing " or "emotion " attached to it
    like DNA is a scientific term but its given to something whose existence was there but there was no name to that existence

    i look forward to your explanation from where the "word" "soul" originated

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    Respected Rachna ji,

    Looked for the origins of the word 'soul' & the answer I found Here is :-

    "The word 'soul' stems from the Old English word ' sawol' meaning the spiritual and emotional part of a person. It appears in the year 725 in the tale of Beowulf . There are relatives of the word in many languages, for instance the Old Low Franconian 'sela', the Old Saxon 'siola' and the Middle Dutch 'siele', all meaning the same thing."

    But the question still remains... "the spiritual and emotional part of a person"... is it a seperate entity in itself ?... can it survive physical death ?

    Please enlighten.


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  3. I believe in the concept of "soul"
    When I asked "why was this word coined can you tell ?????? " I never meant the meaning of word "soul"
    I wanted to know "why was this coined at all "
    The reason being that we give names to something / emotion when we believe it exists
    Since the word soul exists the concept that " soul" is there exists

    Now the question is it a separate entity . I think yes because else why should it be given a name .

    There is a book called Soul Mates and Twin Flames
    In this book there is concept that the soul is a split soul and it completes itself once we meet our soulmate

    continued

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  4. Now what is an soulmate ? It has nothing to do with marriage because the book says { I am not sure if this or few other because I have read a lot on this subject } that our marriage partners are those who we have "harmed too much " in last life and the sole reason of our marriage with them is to heal the wounds of last lifes hurt caused

    where as soulmate is one who when you meet completes you in all respects . many a times soulmate is a shawdow of your ownself because its 50% of your own self

    continued

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  5. I have read that the "soul" chooses the safest womb to come and place it self for being a life .
    Concept of safest womb is that woman who will fiercely protect her unborn child . So its not the parents who bring their children in the world but its the soul which chooses the parent

    continued

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  6. The soul is a separate identity of its own . A good soul may be imprisoned in a bad body due to the karma of the soul and the moment the karma gets over the soul sets its self free

    The soul is neither good or bad its just a soul something that we cant see we cant touch but yet we can feel

    Continued

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  7. When Mother Teressa died a white pigeon was flew in front of the death carriage of her body

    It was the first sign that a noble soul has been set free and it was the reason why she was considered for saint hood

    Enough Of my comments let me read other views now I can go on and on but its your blog

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    Respected Rachna ji,

    * Just because some word was coined/used, therefore that particular thing should also exist... Isn't it a very weak argument ?... I hope you don't mean that Santa, Tooth Fairy & Stork also exist ?

    * If the soul chooses the safest womb... then why in some cases the same 'fiercely protective mother" gets the pregnancy terminated ?

    * Another notable thing you are implying here is that 'BAD KARMA' sticks to the soul/ traps it... it is getting scary & more confusing for 'body & mind' like me !!!

    * I mind it, when you say that it is Praveen's blog... Blog is of each & every stakeholder... & being its esteemed reader You also own it!



    ...

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  9. अब आप सब लोग अग्रेजी में कह रहे हैं तो
    सही ही कह रहे होंगे.

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  10. I would appreciate to be called Rachna

    I hope you don't mean that Santa, Tooth Fairy & Stork also exist ?
    The difference is that you question the FAITH and I accept the FAITH
    Faith has no science to it but science by itself is a faith

    * If the soul chooses the safest womb... then why in some cases the same 'fiercely protective mother" gets the pregnancy terminated ?

    Yes this has been asked several times the reason given is that the "soul" left the womb because it was unsafe and its journey was for that much time period only

    contd

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  11. Praveen
    As the last part of your good and bad karma

    I read that

    once we are done with all of our karmas that is as a soul we pass thru different lifes in different bodies at one point of time when everything becomes testing this journey ends ie the process of birth and rebirth gets over

    how to understand that we have reached that point where there will be no birth or rebirth that is the soul will set it self free from any body ???

    its when total detachment sets in , the person feels no need to marry , work . the cycle slowly is coming to end

    and read Dr Weiss and Elizabeth Claire
    What I am expressing is there , words are just mine

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  12. क्या मै सही जगह पर हु क्या ये हिंदी ब्लोगिंग ही है ना | :)

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  13. मैं पढता ज्यादा हूँ और लिखता हूँ बहुत कम . समय भी कम है हरेक के पास , मेरे पास भी मगर आपकी पोस्ट है शानदार , इसलिए बताना ज़रूरी समझा . शुक्रिया बहुत बहुत .

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  14. इस तरह की बात मत सोचो वरना कुछ दिन बाद नमाज़ अदा करते नज़र आओगे . अपने नस्तिकपने की खैर चाहते हो तो चुपचाप जीते रहो , बिना ज्यादा सोचे ...

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  15. जैसे परमात्मा का होना या ना हो सिद्ध नहीं किया जा सकता है ठीक उसी प्रकार से मुझे लगता है कि आत्मा का होना या ना होना सिद्ध नहीं किया जा सकता. वो कवि लोग क्या कहते हैं मानो तो गंगा माँ है ना मानो तो बहता पानी.

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  16. भारत ही नहीं दुनिया के अनेक हिस्सं में ऐसे बेवकूफी के विचार के बहुतेरे हैं
    आत्मा का वजूद विज्ञान के परे है अतः मेरे सर के ऊपर से गुजर जाता है
    क्या आदमी की आत्मा ,और कीट पतंग की आत्मा में किसी तरह का अंतर है ?
    फिर वे एक दूसरे में कैसे अंतरित हते हैं
    हमारे देश के ज़ज,डाक्टर की एक बड़ी जमात परे दर्जे की अन्धविश्वासी है और अब इस जमात में इंजीनियर आदि भी आ जुटे हैं -हमारे विज्ञान संचार के प्रयास मिट्टी में जा पड़े हैं
    बहुत चिंताजनक !

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    @ अंशुमाला जी( व बेनामी मित्र भी),

    ऐसा कुछ है नहीं, सब कुछ पहले जैसा ही है... बस मेरा प्रयास यह रहता है कि पाठक जिस भाषा में संवाद की शुरूआत करता है, उसी भाषा में जवाब भी दूं...

    @ हकीम युनुस खान साहब,

    आपके 'हीरे-मोती' देख आये...और 'जान है तो जहान है' भी... मुझे तो ऐसा कुछ दिखा नहीं वहाँ जिस की बिना पर आपको ऐसी आशंका हो... बड़ी बड़ी बातें करने की जगह यदि आप पोस्ट के विषय से संबंधित कुछ लिखते, तो क्या बेहतर नहीं रहता ।


    ...

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    @ Rachna,

    "Faith has no science to it but science by itself is a faith."

    I strongly contest this statement, Science comes into the act when you start having questions and doubts about anything & remain in picture till you get the answers & get your doubts cleared. This wonderful journey is Science. Science does not has any unconditional faith in anything.

    @ विचार शून्य जी,

    यकीन जानिये आप किसी चीज का होना तो सिद्ध कर सकते हैं पर किसी चीज का न होना सिद्ध करना वाकई बहुत ही मुश्किल है!

    @ आदरणीय अरविन्द मिश्र जी,

    आभार आपका...वैसे भी आप और मैं एकमत हैं यहाँ पर...:)


    ...

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  19. आत्मा, रूह , जो है यही हम हैं. यह शरीर तो इस दुनिया मैं जीवन जीने के लिए हथिआर मात्र है. रूह अमर है, यह नहीं मरती केवल अपनी जगह बदल लेती है. और यह जगह बदलना परमात्मा के हाथ मैं है. ना हम मौत का समय बता सकते हैं, ना रूक सकते हैं. म्रत्यु शरीर की होती है, आत्मा की नहीं.

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  20. आज का पूरा दिन सिर्फ ज्ञान प्राप्ति में गया कुछ वहा से आत्मा पुनर्जन्म कुछ यहाँ से उसके ना होने की बात | लगे हाथ आप की सारी पुरानी पोस्ट भी पढ़ डाली धर्म भगवान आदि आदि पर | सब पढ़ कर नतीजा वही निकला जो बहुत पहले ही समझ आ चूका था हम तर्क देकर उन्हें ( इन सब पर विश्वास करने वाले ) कुछ नहीं समझा सकते है और वो हमारे सामने ( जो इन चीजो पर विश्वास नहीं करते है ) के सामने कुछ भी साबित नहीं कर सकते है | इसलिए ऐसी पोस्ट सिर्फ अपनी बात अपने विचार रखने का माध्यम भर हो सकता है किसी को कुछ समझा नहीं सकता है | जैसा की आप ने कहा की इन्सान जन्म से नास्तिक नहीं होता है कुछ घटनाए होती है कुछ चीजे उसे बनाती है मतलब स्वयम का अनुभव | यही एक चीज ही जो संभव है की एक दिन उन्हें नास्तिक और हमें आस्तिक बना दे , बाकि तो कोई और दूसरी चीज इसमे बदलाव नहीं ला सकती है | इस तरह की और पोस्टो का इंतजार रहेगा |" नास्तिको का ब्लॉग " पर शिवम जी ने भगत सिंह का एक लेख पोस्ट किया है की वो नास्तिक क्यों थे शायद आप ने पढ़ा हो |

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  21. 1-आत्मा नश्वर नहिं, सही कहते है आत्मा अजर-अमर है।
    2-नष्ट या घात होती है प्राणों की, जो आत्मा से जुडे होते है।
    3-आत्मा अनंत है,अनंत आत्माएं मोक्ष गई और अनंत जन्म-मृत्यु के चक्र में है।
    4-एक शरीर के छूटते ही आत्मा दूसरा शरीर धारण कर लेती है।
    84 लाख योनियां है, और अनंत सुक्षम जीवराशी भी है,अतः जनसंख्या का प्रश्न बेमानी है।
    5-शुभ आत्माओं का निरंतर पवित्रता विकास होता रहेगा, कर्म-सत्ता यह प्रबंध करती रहेगी। बेहतर गुणवत्ता की कक्षाएं होती है।
    6-आत्माओं का कोई नामरूप धर्म नहिं होता, वस्तूत: जिसे हम धर्म कह्ते है वह आत्मा का निज-स्वभाव ही है। इसी लिये कोई व्यक्ती हिंसाप्रधान धर्म में जन्म लेकर भी, स्वभावत: अहिंसक हो सकता है। और कोई अहिंसा प्रधान धर्म में जन्म लेकर भी 'क्रूरता का सहभोजी' सम्भव है। अर्थार्त अपने परिवेश से पृथक भी हम देखते है।
    7- हां, प्रत्येक व्यक्ति से उसकी आत्मा संवाद करती है,'मैं कौन हूं', 'क्या मैं एक आत्मा हूं' आदि प्रश्न भी उस आत्मा के ही होते है।
    8- चेतना, ज्ञान और दर्शन आत्मा के ही गुण है।

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