बुधवार, 20 अक्तूबर 2010

चलो भाई आत्मा-आत्मा खेलते हैं आज : एक आध्यात्मिक जुगाली... ( A Spoof )


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मेरे 'आत्मीय' मित्रों ,

सबसे पहले तो यह चेता दूँ कि यह पोस्ट एक हल्का-फुल्का मजाक है, गंभीरता की उम्मीद रखने वाले सम्मानित पाठक इसे न ही पढ़ें तो उनकी 'आत्मा' के लिये अच्छा रहेगा... वैसे तो किसी को भी इस पोस्ट से बुरा नहीं लगना चाहिये परंतु यदि लग रहा है तो यह मानिये कि पूर्व के 'संचित कर्मों' के परिणाम स्वरूप इस जीवन में खुलकर हंसना आपकी 'आत्मा' के नसीब में नहीं है... वैसे यदि किसी को बुरा लगता भी है तो मेरी 'आत्मा' पर कोई बोझ नहीं है इसका...(आत्मा हो तब न बोझ उठायेगी...:-))

डिस्क्लेमर निबट गया, अब आते हैं पोस्ट पर... बीते दिनों 'आत्मा' पर चल रही ब्लॉगीय बहस में बहुतों ने बहुत कुछ कहा... जो-जो कहा गया, उसे पढ़ कर मेरे भौतिकवादी-खुराफाती दिमाग में जो सवाल-विचार उठे, वही आपके सामने हाजिर हैं।

यहाँ नीचे नीले रंग से वह बातें हैं जो किसी ब्लॉगर ने एक बार में ही या एकाधिक अवसरों पर आत्मा के बारे में कही हैं व ठीक उन बातों के नीचे है उन बातों की आध्यात्मिक जुगाली करने के बाद मेरे मन-मस्तिष्क में उमड़ते-घुमड़ते सवाल/विचार...

विभिन्न ब्लॉगर बंधुओं द्वारा कही गई इन बातों को उनके मूल रूप में आप यहाँ और यहाँ पर देख सकते हैं।

चलिये शुरू किया जाये...

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"अनेकानेक जन्म लेने के साथ कभी कभी आत्मा भी बोझ तले दब जाती है । ओवर-बर्डएंड हो जाती है । जिसके कारण मनुष्य के वर्तमान जीवन में कुछ अनसुलझी सी उलझने हो जाती हैं।"

"मृत्यु के पश्चात जब न दिमाग जिन्दा रहता है और न ही उसकी कोई कोशिका। फिर उसमें कोई स्मृतियाँ भी संचित नहीं हो सकतीं। न कोई आत्मा होती है, न ही आत्मा में संचित कोई स्मृतियाँ।"


जब न कोई आत्मा होती है न ही आत्मा में संचित कोई स्मृतियाँ तो ओवर बर्डन्ड क्या होता है... वह क्या है जिसके कारण वर्तमान जीवन में कुछ अनसुलझी उलझनें हो जाती हैं।


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"विज्ञान की मानें तो आत्मा का क्षय होता है। जैसे किसी के जीवन में कोई घटना जो उसके मस्तिष्क पर बहुत प्रभाव डालती है और व्यक्ति को गहें दुःख का अनुभव कराती है , वो आत्मा के क्षय का कारण बनती है।"
"किन्हीं घटनाओं और निरंतर असफलताओं के चलते , अवसाद से ग्रसित मनुष्य की आत्मा का बड़े अनुपात में क्षय होता है , जिसके कारण इनके अन्दर प्रायः suicide करने की टेंडेंसी आ जाती है।"


विज्ञान ने कब और कहाँ ऐसा कह दिया, और यह दुखों और असफलताओं से यह जो क्षय होता है क्या आत्महत्या करने से उसकी पूर्ति हो जाती है?


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"कोई भी पैदायशी नास्तिक नहीं होता। कुछ घटनाएं व्यक्ति को इतना निराश करती हैं , की वह इश्वर में भी विश्वास खो बैठता है। यह भी आत्मा के क्षय का एक उदाहरण है।"

पैदायशी आस्तिक होते हैं क्या ?


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"अगले जनम में कौन क्या बनेगा वो मनुष्य इसी जनम में खुद तय कर लेता है.उदहारण के लिए - (अ)जो लोग पर्यावरण प्रदूषित करते हैं वातावरण शुद्ध नहीं रखते उन्हें अगले जन्म में सूअर बन कर गंदगी साफ़ करनी पड़ती है."

पर्यावरण प्रदूषित करने वाले इतने सारे और सूअर इतने कम...बहुत नाइंसाफी है रे... और उन देशों का क्या जहाँ धर्म के कारण सूअर पलने ही नहीं दिये जाते... सूअर क्या-क्या करता है कि अगले जन्म में फिर से आदमी बन जाये?


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"धर्म पुस्तक के पांचवें सफे की तीसरी कंडिका के पच्चीसवें पैराग्राफ में लिखा है की संसार में कुल 249.88932749283767620X10^762 आत्माएं हैं. जिसे इसमें यकीन न हो वह गलत सिद्ध करके दिखा दे."

एकदम सही बात भाई मुझे तो यकीन है...जिसे न हो वह दोबारा से गिनती कर ले!


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"चार्वाक दर्शन ही एकमात्र ऐसा दर्शन है जो पुनर जन्म को नहीं मानता।

इसके अनुसार--

यावद जीवेत , सुखं जीवेद,
ऋणं कृत्वा, घृतं पिबेत।

अर्थात इसी जन्म में हम सुख-दुःख को जी लेते हैं। सभी पाप और पुन्य कर्मों का फल भी यहीं इसी जीवन में मिल जाता है। इसीलिए मृत्यु के समय कुछ भी बकाया नहीं रहता।

अतः

नया जीवन --नयी स्मृतियाँ-- नया अनुभव--नया चिंतन ।"


कमेंट नीचे मिलेगा...

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"यावद जीवेत , सुखं जीवेद,
ऋणं कृत्वा, घृतं पिबेत।

इस श्लोक का अर्थ है :: जब तक जीवो तब तक सुख के साथ जीवो ...ऋण लेकर भी दूध-घी का सेवन करना पड़े तो कीजिए ।"


अत:
नया जीवन-- नय़ा कर्जा-- नया घी-- सुख ही सुख

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"आपने इतनी आत्माए आती कहा से ये प्रश्न किया है तो वेदों पुरानो व कथाओ के अनुसार मनुष्य जरुरी नहीं है की मरने के बाद पुनह मनुष्य योनी में पैदा हो और कीड़े मकोड़े भी जरुरी नहीं है की वापस कीड़े मकोड़े बनकर पैदा हो ! अतः हो सकता है की कीड़े मकोड़े पशु पंछियों की संख्या घट रही हो और मनुष्यों की संख्या बाद रही है!"

यानी की ह्युमन पोपुलेशन एक्सप्लोजन का मूल कारण तो मलेरिया-मच्छर नियंत्रण जैसे कार्यक्रम व Insecticide/Pesticide का अधिक इस्तेमाल है...और हम परिवार नियोजन कार्यक्रम की असफलता को वजह मान बैठे हैं।


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"मनुष्य का अगला जन्म इस पर निर्भर होता है की पूर्व जन्म में मरते वक्त उस का अंतिम मनोभाव क्या था .क्यों की मरने पर सही गलत आदि निर्णय की छमता ( तार्किक शक्ति ) समाप्त हो जाती है और वह अंतिम समय के मनो भाव पर स्थिर हो जाता है और उसी के अनुसार अगला जन्म लेता है .वहा पर वो पूर्व जन्म का अच्छा और बुरा दोनों का फल प्राप्त करेगा .
भारत मुनि ब्रह्म ज्ञानी थे पर जीवन के अंतिम समय उन हो ने अपनी माँ के बिछुड़ा हुआ एक मृग का बच्चा पाल लिया और मोह ग्रस्त हो कर मरते समय उस में ही उन का चित्त था और अगला जन्म उन्हें मृग के रूप में मिला"


समझे भाई...जानवर तो पालो...पर चित्त न लगाओ उस से...जिंदगी का क्या भरोसा...कहीं आपने चित्त लगाया हुआ है और समय पूरा हो गया... फिर अगले जनम भौं भौं !!!





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"प्रक्रिया के दौरान एक महिला ने बताया की वह पूर्व जन्म में पुरुष थी। इसका कोई प्रमाण मिल सकता है ? सच क्या है ? गीता में एक स्थान पर बताया गया है , की विभिन्न जन्मों में योनियाँ तो बदल सकती है , मनुष्य से पक्षी और पशु बन सकते हैं, लेकिन लिंग नहीं बदलता। फिर उस महिला की बात की सत्यता क्या है ? क्या ये उसके मन की कोई दमित भावना नहीं ? या अवचेतन मन का कोई विचार ?"
"इसका गीता में उल्लेख है की मनुष्य की मृत्यु के उपरान्त उसका लिंग परिवर्तित नहीं होता। जो स्त्री है , वो स्त्री ही रहेगी।"


किस तरह की आत्मा को मच्छर योनि में जन्म लेना पड़ता है? और मादा मच्छर आदमी का खून व नर मच्छर फूलों का रस ही क्यों चूसते हैं... मच्छर ऐसे कौन से कर्म कर सकती है कि अगली योनि महिला की मिले?

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"इसलिए वेदांत के अनुसार केवल जीवधारियों में ही नहीं अपितु निर्जीवों में भी आत्मा है।
आत्मा और जीव समानार्थी शब्द नहीं हैं। मोक्ष की आवश्यकता जीव को है, आत्मा को नहीं। आत्मा का अपना कोई गुण-दोष-धर्म-जाति-लिंग नहीं होता। यह पहले जीव और फिर शरीर से संयुक्त होकर गुण-दोष युक्त हो जाता है। अच्छे कर्म करने वाले जीव क्रमशः आगामी जन्मों में मोक्ष की ओर अग्रसर होते हैं। । बुरे कर्म करने वाले निम्नतर जैविक प्रजातियों में, फिर निर्जीव पदार्थ में परिवर्तित होते रहते हैं।"


अब तो गजब कन्फ्यूजन हो गया है भाई...मकान के सामने यह रेत का ढेर एक ही आत्मा है या जितने कण उतनी आत्मायें?

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"मेरा मानना है कि-
जिस प्रकार सूरज जीवन का आधार है , फिर भी प्रत्येक प्राणी के लिए अलग-अलग सूरज नहीं है ,ठीक उसी प्रकार एक आत्मा अर्थात शक्ति पुंजभी सभी प्राणियों में समान रूप में वास करती है
अर्थात जन्म से पहले भी सूरज था और मृत्यु के बाद भी सूरज है"


अब ठीक है... यह आलेख पढ़ कर अपनी आत्मा पर बोझ न लीजियेगा...मेरी आत्मा पर फ्री फंड में बोझ बढ़ जायेगा।






आभार आपका,

आत्मीयता से अपना कीमती समय इस आलेख को पढ़ खराब करने के लिये!









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12 टिप्‍पणियां:

  1. अगली पोस्ट 'भारी मजाक' पर होनी चाहिए।
    अब आप पाठक श्रेणी के अनुसार पोस्ट लिखने लगे हैं। अच्छा प्रयोग है। मैं 'गम्भीरता की उम्मीद रखने वाला सम्मानित पाठक' नहीं हूँ इसलिए मनोयोग से पढ़ा भी, आनन्द को प्राप्त भी भया और अब हल्की फुल्की टिप्पणी कर के जा रहा हूँ
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    :)
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    ;)

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  2. इस स्पूफ या गूफ की प्रेरणा कहाँ से प्राप्त हुयी? अगर मुझसे तब आभार प्रकाश करना था :)
    यह कुछ जवाबी कीर्तन सा सूझ रहा है -यहाँ कीर्तन समां बधे इससे पूर्व फूटता हूँ यहाँ से
    आत्मा का अर्थ चेतना -सुपर कांससनेस समझिये यह कीड़े में नहीं पायी जाती !

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  3. मुझे तो केवल आज की चिंता रहती है , आत्मा परमात्मा की समझ ही नहीं है यह तो कोई गूढ़ ग्यानी ही बता सकता है ! इससे पहले की कुछ साकार निराकार के बारे में पूंछा जाए भागते हैं, जब
    कुछ समझ ही नहीं आया तो जवाब क्या ख़ाक देंगे

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  4. बढिया चुटकी ली है आपने .. पर आपके तर्क में भी दम है !!

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  5. इस्लाम के हिसाब से हर आदमी को एक नई आत्मा मिलति है

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  6. जानवर, किड़े मकोड़े मेँ जान होती है रूह नहीँ

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  7. कयामत के दिन इनका फैसला होगा।

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  8. आत्मा पर दिये गये वक्तव्य और उसपर आपका छक्का दोनों सुपर, एकदम संग्रहालय में रखने योग्य।

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    @ बेनामी भाई,

    आप पोस्ट पर अगर टिपियाते तो मुझे अच्छा लगता... धर्म प्रचार के लिये बहुत से अन्य ठिकाने हैं... मुझे बख्शो यार ... :(


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  10. अगर मुझे मरना ही है तो उसके बाद की कपोल कल्पना में अपना आज खराब क्यों करूं ?

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  11. आवागमन के तीन विरोधी तर्क
    इस क्रम मे सबसे बड़ी बात यह है कि सारे संसार के विद्वानों और शोध कार्य करने वाले साइंस दानों का कहना है कि इस धरती पर सबसे पहले वनस्पति जगत ने जन्म लिया। फिर जानवर पैदा हुए और उसके करोड़ों वर्ष बाद इन्सान का जन्म हुआ। अब जबकि इंसान अभी इस धरती पर पैदा ही नही हुए थे और किसी इन्सानी आत्मा ने अभी बुरे कर्म नहीं किए थे तो किन आत्माओं ने वनस्पति और जानवरों के शरीर में जन्म लिया?

    दूसरी बात यह है कि इस धारणा का मान लेने के बाद यह मानना पड़ेगा कि इस धरती पर प्राणियों की संख्या में लगातार कमी होती रहे। जो आत्मायें मोक्ष प्राप्त कर लेंगी। उनकी संख्या कम होती रहनी चाहिये। अब कि यह तथ्य हमारे सागने है कि इस विशाल धरती पर इन्सान जीव जन्तु और वनस्पति हर प्रकार के प्राणियों की जनसंख्या में लगातार वृद्धि हो रही है।

    तीसरी बात यह है कि इस संसार में जन्म लेने वालों और मरने वालों की संख्या में ज़मीन आसमान का अन्तर दिखाई देता है। मरनेवाले मनुष्य की तुलना में जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या कहीं अधिक है। कभी-कभी करोड़ो मच्छर पैदा हो जाते है जब कि मरने वाले उससे बहुत कम होते है। कहीं-कहीं कुछ बच्चों के बारे में यह मशहूर हो जाता है कि वह उस जगह को पहचान रहा है जहा वह रहता था, अपना पुराना, नाम बता देता है। और यह भी कि वह दोबारा जन्म ले रहा है। यह सब शैतान और भूत-प्रेत होते हैं जो बच्चों के सिर चढ़ कर बोलते है और इन्सानों के दीन ईमान को खराब करते हैं।

    सच्ची बात यह है कि यह सच्चाई मरने के बाद हर इन्सान के सामने आ जायेगी कि मनुष्य मरने के बाद अपने मालिक के पास जाता है, और इस संसार मे उसने जैसे कर्म किये है उनके हिसाब से सज़ा अथवा बदला पायेगा।
    कर्मो का फल मिलेगा
    यदि वह सतकर्म करेगा भलाई और नेकी की राह पर चलेगा तो वह स्वर्ग में जायेगा। स्वर्ग जहाँ हर आराम की चीज़ है। और ऐसी-ऐसी सुखप्रद और आराम की चीज़ें है जिनकों इस संसार में न किसी आँख ने देखा, न किसी कान ने सुना, और न किसी दिल में उसका ख़्याल गुजारा। और सबसे बड़ी जन्नत (स्वर्ग) की उपलब्धि यह होगी कि स्वर्गवासी लोग वहॉ अपने मालिक के अपनी आँखों से दर्शन कर सकेंगे। जिसके बराबर विनोद और मजे़ कोई चीज नहीं होगी।
    इस प्रकार जो लोग कुकर्म (बुरे काम) करेंगे, पाप करके अपने मालिक की आज्ञा का उल्लंघन करेंगे, वह नरक मे डाले जायेगे, वह वहॉ आग में जलेंगे। वहॉ उन्हें हर पाप की सज़ा और दंड मिलेगा। और सब से बड़ी सजा यह होगी कि वह अपने मालिक के दर्शन से वंचित रह जाऐगे। और उन पर उनके मालिक का अत्यन्त क्रोध होगा।­

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