गुरुवार, 28 अक्तूबर 2010

अंग्रेजी अपनाओ खुशहाली पाओ ! अंग्रेजी जिंदाबाद ! बच्चों के भविष्य के लिये यही कहना होगा सबको ! इस मामले में एक सी सोच है नारायणमूर्ति और दलित चिंतक चंद्रभान प्रसाद की !!!


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मेरे 'बहुभाषी' मित्रों,

दो अलग अलग खबरें हैं परंतु उनसे निकल कर आ रहा संदेश एक सा है...

इन्फोसिस के संस्थापकों में से एक व भारतीय आई टी इन्डस्ट्री के शीर्ष पुरूष एन आर नारायणमूर्ति यहाँ पर ... कहते हैं :-

"I think all state governments must make an attempt to say we will allow as many English medium schools as required because if you do not do so, then the children will not be able to move from one state to another." Job opportunities available to children who go to English medium schools generally are seen to be of a higher quality and is a reality whether one likes it or not, he said.


और ठीक उनकी ही तरह उत्तर प्रदेश के एक पिछड़े गाँव में अंग्रेजी देवी के मंदिर का निर्माण करने वाले दलित चिंतक चंद्रभान प्रसाद कहते हैं:-

Prasad said that the temple is being built to popularise English among Dalits, who form a sizeable number in not just the village but also in the area, so that they can move ahead in their lives.

"This temple would help encourage them to learn the language which has become essential for one's growth as in 20 years' time, no decent job would be available without its knowledge," Prasad said.



हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं के हित साधन के नाम पर गाल बजाना तो बहुत होता है मेरे देश में... परंतु इन भाषाओं को रोजगार से जोड़ने की, आधुनिक ज्ञान से जोड़ने की, कोई ईमानदार कोशिश आज तक तो नहीं हुई... ऐसी हालत में यह दोनों लोग एक कड़वी हकीकत को ही जुबान दे रहे हैं...


मैं तो सहमत हूँ उनसे...


आपको क्या कहना है ?


आभार!




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19 टिप्‍पणियां:

  1. वाकई कडवी हकीकत बयान की है आपने !!
    इसीलिये तमाम बातों के बावजूद उपरोक्त दोनों वक्तव्य आज के समय में आवश्यकता ही है ! हिंदी के लिए किये कार्य सिर्फ खानापूरी बनकर रह जाते हैं !

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  2. दोनो की मति मारी गयी है। दोनो इजरायल, चीन, जापान, रूस, कोरिया, जर्मनी, फ्रांस की प्रगति से आंखें मूदे हे हैं या अक्ल के अंधे हैं या गुलामी के पुजारी हैं।

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  3. कड़वी है लेकिन सच्चाई है, स्वीकार है…

    हिन्दी को रोजगार से जोड़ने वाली बात ही समस्या की जड़ है लेकिन इस जड़ के चारों तरफ़ उच्च वर्ग का एक ऐसा कॉकस कब्जा जमाये बैठा है कि उसे हटाना भी एक दुष्कर कार्य है… :) :)

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  4. 4/10

    हिंदी के नाम पर रोना अब ऊब पैदा करता है.
    सबसे पहले तो यह देखिये कि राष्ट्रभाषा हिंदी के नाम पर हम कितने एक साथ हैं.

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  5. सिर्फ सोच का अभाव है, करना चाहें तो कुछ भी असम्‍भव नहीं होता। इसके सैकडों उदाहरण हैं।

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  6. जो कोशिश करते आये है या फिर जिनका दावा है कि उन्होने कोशिश की है ,उन्हें हमारा सलाम कहियेगा !
    तब तक मैं उनके बच्चों के कांवेंट स्कूलों के नाम पता करता हूं :)

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    @ आदरणीय सतीश सक्सेना जी,
    अंशुमाला जी,
    आदरणीय सुरेश चिपलूनकर जी,
    आदरणीय प्रवीण पान्डेय जी,

    आप सभी का आभार!


    @ उस्ताद जी,

    पास तो हम आज भी हो ही गये... :)


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    @ आदरणीय अनुनाद सिंह जी,

    सर,

    इजरायल, चीन, जापान, रूस, कोरिया, जर्मनी, फ्रांस की प्रगति तो जगजाहिर है... पर यह बात भी सही है कि यह देश शुरूआत से ही अपनी मातृभाषा को ही ज्ञान विज्ञान की भाषा बनाकर चले... इन देशों ने कभी भी अंग्रेजी को अपने यहाँ पढ़ाई का माध्यम नहीं बनाया... हमारी आजादी के तुरन्त बाद हमारे नीति निर्माताओं के पास भी ऐसा मौका था... पर वह अवसर गंवा दिया गया... अब शायद बहुत देर हो चुकी है।

    यकीन जानिये ब्लॉग पर इतने दिनों बाद आपका आना मेरे लिये बहुत मायने रखता है... बहुत आभार आपका!


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    @ जाकिर अली 'रजनीश' जी,

    असम्भव वाकई कुछ नहीं... पर इस दिशा में कोई ईमानदार प्रयास होते हुऐ मुझे नहीं दिख रहा अभी तो...

    आशावान तो रहेंगे ही हम... :)


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    @ अली सैय्यद साहब,

    :-))

    सही कह रहे हैं आप... हिन्दी, मराठी, तमिल या अन्य भारतीय भाषाओं के नाम पर जिस किसी ने भी राजनीति की... उन सभी लोगों ने इन भाषाओं को रोजगार, ज्ञान-विज्ञान की भाषा बनाने के लिये कुछ भी ठोस काम नहीं किया... और यह भी हकीकत है कि अपने समर्थकों को भले ही इन लोगों ने अंग्रेजी के वर्चस्व के विरोध में आंदोलन करने को प्रेरित किया हो, परंतु इन तथाकथित धरती-पु्त्रों की नयी पीढ़ी ने अपनी शिक्षा मुल्क के श्रेष्ठ अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों से ही ली...


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  11. सत्य को सामने लाकर खड़ा कर दिया है और हमारे पास कोई जबाब नहीं

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  12. सही कहा ,
    अंग्रेजी के नाम से परेशान होने वाले मित्र ये ना समझें की हमें स्वदेश सप्रेम नहीं... यकीन करें अगर तमिल [अंग्रेजी की तरह ] ग्लोबल भाषा होती तो हम उसे सीखने पर पक्षधर होते :)
    बाकी सभी ये भी पढ़ें , मित्र प्रवीण की स्टाइल में लिखा लेख है

    "हिंदी को लूट लिया मिल के हिंदी वालों ने"
    http://my2010ideas.blogspot.com/2010/09/blog-post_23.html

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  13. ... वैसे भी हिंदी अब केवल "सुविधाजनक देश भक्ति" का साधन भर बन कर रह गयी है
    बिना कुछ किये देश भक्त बनने के मौका मिल रहा है सबको :))

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  14. हकीकत है बिन अन्ग्रेजी सब सून अपने भारत मे . मै तो i beg to say that i ......... से आगे ना बढ सका . लेकिन अपने बच्चो को कह दिया कुछ पढो या ना पढो अंग्रेजी सरूर सीख लेना .

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  15. अब सचमुच बहुत देर हो चुकी है ।

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